UPSC Mains · General Studies Paper II · अध्याय 2

संघवाद एवं केंद्र-राज्य संबंध

Federalism and Centre-State Relations

संघ और राज्यों के कार्य और उत्तरदायित्व, संघीय ढाँचे की चुनौतियाँ, स्थानीय स्तर तक शक्तियों और वित्त का हस्तांतरण।

GS-2 25 मिनट

1. अध्याय एक नज़र में

पाठ्यक्रम: "संघ और राज्यों के कार्य एवं उत्तरदायित्व, संघीय ढाँचे से संबंधित विषय एवं चुनौतियाँ, स्थानीय स्तर तक शक्तियों और वित्त का हस्तांतरण तथा उसकी चुनौतियाँ।" यह GS-2 का सबसे अधिक पूछा जाने वाला क्षेत्र है — हर वर्ष 2-3 प्रश्न।

वर्षप्रश्न
2026संघवाद द्वारा विविधता का समायोजन — असममित संघवाद और विवाद समाधान; राज्यपाल की स्थिति, राज्य विधेयकों पर स्वीकृति और मंत्रिपरिषद की सलाह
2025केंद्र-राज्य वित्तीय संबंध और नियोजित विकास; राजकोषीय संघवाद में सुधार; पुनर्गठन अधिनियम 2019 के बाद जम्मू-कश्मीर विधानसभा
2024केंद्र-राज्य संबंधों में हाल के परिवर्तन और विश्वास-निर्माण; स्थानीय निकाय, सुशासन और ग्रामीण-शहरी निकायों का विलय

2. भारतीय संघवाद की प्रकृति

  • संघीय लक्षण: लिखित और सर्वोच्च संविधान, दोहरी सरकार, शक्तियों का विभाजन (सातवीं अनुसूची — संघ सूची, राज्य सूची, समवर्ती सूची), स्वतंत्र न्यायपालिका, द्विसदनीयता (राज्यसभा)।
  • एकात्मक लक्षण: अवशिष्ट शक्तियाँ केंद्र में (अनुच्छेद 248), राज्यों की सीमाएँ बदलने का अधिकार संसद को (अनुच्छेद 3), एकल संविधान और नागरिकता, अखिल भारतीय सेवाएँ, आपातकालीन प्रावधान (352, 356, 360), राज्यपाल की केंद्र द्वारा नियुक्ति, राज्य सूची पर संसद का अधिकार (अनुच्छेद 249, 250, 252, 253)।
  • विद्वानों के विवरण: के. सी. व्हेयर — "अर्ध-संघीय"; ग्रैनविल ऑस्टिन — "सहकारी संघवाद"; मॉरिस जोन्स — "सौदेबाज़ी वाला संघवाद"; अल्फ़्रेड स्टेपन — "Holding Together" संघ (अमेरिका जैसे "Coming Together" के विपरीत)।
  • न्यायालय: बोम्मई (1994) — संघवाद मूल ढाँचा; राज्य केंद्र के "उपांग" नहीं।
भारतीय संघवाद सहकारीGST परिषद, NITI Aayog प्रतिस्पर्धीनिवेश, सूचकांक रैंकिंग सौदेबाज़ीवित्त, गठबंधन राजनीति असममितअनु. 371, पाँचवीं-छठी अनुसूची
भारतीय संघवाद एक ही रूप में नहीं, बल्कि कई रूपों के मिश्रण के रूप में काम करता है।

3. असममित संघवाद और विविधता का समायोजन

  • अर्थ: संघ की इकाइयों को उनकी विशिष्ट सांस्कृतिक, ऐतिहासिक या भौगोलिक परिस्थितियों के अनुसार अलग-अलग अधिकार।
  • भारत में रूप: (1) अनुच्छेद 371 और 371A-J — महाराष्ट्र-गुजरात (विकास बोर्ड), नागालैंड (371A — प्रथागत क़ानून और भूमि पर संसदीय क़ानून लागू नहीं जब तक विधानसभा न माने), मिज़ोरम (371G), सिक्किम (371F) आदि; (2) पाँचवीं अनुसूची — अनुसूचित क्षेत्र, जनजातीय सलाहकार परिषद; PESA 1996; (3) छठी अनुसूची — असम, मेघालय, त्रिपुरा, मिज़ोरम में स्वायत्त ज़िला परिषदें; (4) केंद्रशासित प्रदेशों के विविध मॉडल — दिल्ली (239AA), पुडुचेरी, जम्मू-कश्मीर; (5) भाषाई राज्य।
  • अनुच्छेद 370: 2019 में निष्प्रभावी; सर्वोच्च न्यायालय (दिसंबर 2023) ने इसे अस्थायी प्रावधान मानकर निर्णय को वैध ठहराया, राज्य का दर्जा शीघ्र बहाल करने और सितंबर 2024 तक चुनाव कराने का निर्देश दिया।
  • औचित्य: "एकता में विविधता" — अलगाववाद के स्थान पर समायोजन; पूर्वोत्तर में शांति समझौते (मिज़ो 1986, बोडो 2020)।

4. केंद्र-राज्य विवाद समाधान तंत्र

तंत्रआधारभूमिका / सीमा
सर्वोच्च न्यायालय का मूल क्षेत्राधिकारअनुच्छेद 131केंद्र-राज्य या राज्यों के बीच क़ानूनी विवाद; राजनीतिक विवाद नहीं
अंतर-राज्य परिषदअनुच्छेद 263; गठन 1990 (सरकारिया अनुशंसा)परामर्शी; बैठकें बहुत कम (अंतिम बैठक 2016)
क्षेत्रीय परिषदेंराज्य पुनर्गठन अधिनियम 1956गृह मंत्री की अध्यक्षता; सांविधिक, परामर्शी
अंतर-राज्यीय जल विवाद न्यायाधिकरणअनुच्छेद 262; अधिनियम 1956कावेरी, कृष्णा, महादायी; निर्णय में देरी
GST परिषदअनुच्छेद 279Aकेंद्र 1/3, राज्य 2/3 मत भार; विवाद निपटान तंत्र अब तक नहीं बना
वित्त आयोगअनुच्छेद 280कर विभाजन — विवाद निवारण का "निवारक" तंत्र

5. राज्यपाल: संवैधानिक प्रमुख या केंद्र का एजेंट?

  • प्रावधान: नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा (अनुच्छेद 155), "राष्ट्रपति के प्रसादपर्यंत" (156); मंत्रिपरिषद की सहायता और सलाह से कार्य (163), पर कुछ विवेकाधीन क्षेत्र — त्रिशंकु विधानसभा में मुख्यमंत्री चयन, अनुच्छेद 356 हेतु रिपोर्ट, विधेयकों को राष्ट्रपति के लिए आरक्षित करना।
  • विधेयकों पर विकल्प (अनुच्छेद 200): स्वीकृति, स्वीकृति रोकना (धन विधेयक को छोड़कर पुनर्विचार हेतु लौटाना — पुनः पारित होने पर स्वीकृति बाध्य), या राष्ट्रपति के विचार हेतु आरक्षित (201)।
  • न्यायिक दृष्टि: शमशेर सिंह (1974) — राज्यपाल मंत्रिपरिषद की सलाह से बँधे; नबाम रेबिया (2016) — विवेक सीमित; बी. पी. सिंघल (2010) — राज्यपाल को मनमाने ढंग से नहीं हटाया जा सकता; पंजाब मामला (2023) — राज्यपाल विधेयकों को अनिश्चितकाल तक रोक नहीं सकते; तमिलनाडु मामला (अप्रैल 2025) — समय-सीमा तय की और रोके गए विधेयकों को स्वीकृत माना; इसके बाद राष्ट्रपति के संदर्भ (अनुच्छेद 143) पर नवंबर 2025 की सलाहकारी राय में संविधान पीठ ने कहा कि न्यायालय निश्चित समय-सीमा नहीं थोप सकता और "मानी गई स्वीकृति" संभव नहीं, पर अनिश्चितकालीन निष्क्रियता की सीमित न्यायिक समीक्षा हो सकती है।
  • आयोगों की अनुशंसाएँ: सरकारिया (1988) — सक्रिय राजनीति से दूर, प्रतिष्ठित व्यक्ति, मुख्यमंत्री से परामर्श; पुंछी (2010) — निश्चित 5 वर्ष का कार्यकाल, महाभियोग जैसी प्रक्रिया से हटाना, विधेयकों पर 6 माह की समय-सीमा।

6. राजकोषीय संघवाद

  • ऊर्ध्वाधर असंतुलन: राज्यों पर व्यय का लगभग 60% भार, पर राजस्व जुटाने की क्षमता कम (कर आधार का बड़ा भाग केंद्र के पास)।
  • वित्त आयोग: 14वें ने राज्यों का हिस्सा 32% से 42% किया; 15वें ने 41% (जम्मू-कश्मीर के UT बनने के कारण); 16वाँ वित्त आयोग (अध्यक्ष अरविंद पनगढ़िया) 2026-31 के लिए।
  • मुद्दे: (1) उपकर और अधिभार — विभाज्य पूल से बाहर, केंद्र के सकल कर राजस्व में इनका हिस्सा बढ़ा; (2) GST से राज्यों की कराधान स्वायत्तता घटी, 2022 में क्षतिपूर्ति समाप्त; (3) केंद्र प्रायोजित योजनाओं की शर्तें — राज्यों की प्राथमिकताओं पर असर; (4) अनुच्छेद 293 के तहत उधार पर केंद्र का नियंत्रण (केरल का मुक़दमा, 2024); (5) "जनसंख्या नियंत्रण में सफल" दक्षिणी राज्यों की शिकायत; (6) योजना आयोग के बाद (NITI Aayog, 2015) विवेकाधीन अनुदान का कोई संस्थागत मंच नहीं।
  • सुधार: उपकरों को विभाज्य पूल में लाना या सीमित करना, GST परिषद में विवाद निपटान तंत्र, राज्यों के अपने कर आधार (संपत्ति कर, शहरी निकाय) को मज़बूत करना, बजट से बाहर उधार की पारदर्शिता, परिणाम-आधारित अनुदान।

7. स्थानीय स्वशासन: शक्तियों और वित्त का हस्तांतरण

  • 73वाँ संशोधन (भाग IX, ग्यारहवीं अनुसूची — 29 विषय) और 74वाँ (भाग IXA, बारहवीं अनुसूची — 18 विषय); राज्य वित्त आयोग (243I, 243Y), राज्य निर्वाचन आयोग (243K), ज़िला योजना समिति (243ZD), महानगर योजना समिति (243ZE)।
  • "3F" की कमी: Functions (कार्य), Funds (वित्त), Functionaries (कर्मचारी) का अपर्याप्त हस्तांतरण; राज्य वित्त आयोग समय पर गठित नहीं; नगर निकायों का अपना राजस्व GDP का बहुत कम हिस्सा।
  • सफल मॉडल: केरल का "जन योजना अभियान" (1996) — योजना निधि का लगभग 35-40% स्थानीय निकायों को; कर्नाटक, महाराष्ट्र में ग्राम सभा की सक्रियता।
  • ग्रामीण-शहरी विलय का प्रश्न: तेज़ी से बढ़ते "जनगणना नगर" (census towns) और उपनगरीय क्षेत्र, जो शासन में ग्रामीण पर स्वरूप में शहरी हैं; विलय से नियोजित विकास और बेहतर सेवाएँ, पर ग्रामीण सहभागिता, संपत्ति कर का बोझ और पहचान खोने की आशंका।
भारतीय लोकतंत्र की कहानी
ग्राम सभा से संसद तक जनभागीदारी — स्थानीय स्वशासन लोकतंत्र की सबसे निचली पर सबसे निकट की कड़ी है।

8. जम्मू-कश्मीर: पुनर्गठन अधिनियम 2019 के बाद

  • राज्य से दो केंद्रशासित प्रदेश — विधानसभा वाला जम्मू-कश्मीर और बिना विधानसभा वाला लद्दाख।
  • परिसीमन (2022) के बाद 90 निर्वाचित सीटें (जम्मू 43, कश्मीर 47); उपराज्यपाल द्वारा मनोनीत सदस्यों का प्रावधान (कश्मीरी प्रवासी और PoJK से विस्थापित); 2024 में चुनाव और निर्वाचित सरकार।
  • शक्तियों की सीमा: "पुलिस" और "लोक व्यवस्था" विधानसभा के क्षेत्र से बाहर; उपराज्यपाल की शक्तियाँ अधिक (2024 में कार्य-संचालन नियमों में संशोधन — पुलिस, अखिल भारतीय सेवाएँ, भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो, महाधिवक्ता से जुड़े निर्णयों में उपराज्यपाल की भूमिका); वित्तीय विधेयक के लिए उपराज्यपाल की सिफ़ारिश।
  • मुद्दे: दोहरे सत्ता केंद्र, जवाबदेही का धुंधलापन, राज्य का दर्जा बहाल करने की माँग; लद्दाख में छठी अनुसूची की माँग।

9. विस्तृत विवेचन: अंतर-राज्यीय जल विवाद

अंतर-राज्यीय नदियों के जल-बँटवारे के विवाद भारतीय संघवाद की सबसे पुरानी और कठिन समस्याओं में हैं। नदियाँ राज्यों की सीमाएँ नहीं मानतीं, पर जल राज्य-सूची (प्रविष्टि 17) का विषय है, जबकि अंतर-राज्यीय नदियों का विनियमन और विकास संघ-सूची (प्रविष्टि 56) के तहत संसद के क़ानून के अधीन है। इस दोहरी व्यवस्था के कारण विवाद राजनीतिक, क़ानूनी और भावनात्मक, तीनों रूप ले लेते हैं।

संवैधानिक और वैधानिक ढाँचा
  • अनुच्छेद 262: संसद अंतर-राज्यीय नदी जल विवादों के निर्णय के लिए क़ानून बना सकती है, और यह भी प्रावधान कर सकती है कि ऐसे विवादों में सर्वोच्च न्यायालय या कोई अन्य न्यायालय क्षेत्राधिकार का प्रयोग न करे।
  • अंतर-राज्यीय नदी जल विवाद अधिनियम, 1956: केंद्र सरकार विवाद-अधिकरण (tribunal) गठित करती है; अधिकरण का निर्णय अंतिम और बाध्यकारी। 2002 के संशोधन से समय-सीमाएँ जोड़ी गईं।
  • नदी बोर्ड अधिनियम, 1956: नदी घाटियों के लिए बोर्डों का प्रावधान, पर व्यवहार में लगभग अप्रयुक्त।
  • सर्वोच्च न्यायालय की भूमिका: अधिकरण के निर्णय के विरुद्ध सीधी अपील नहीं, पर अनुच्छेद 136 के तहत विशेष अनुमति याचिका पर सुनवाई होती रही है (कावेरी निर्णय, 2018)।
विवादराज्यप्रमुख पड़ाव
कावेरीकर्नाटक, तमिलनाडु, केरल, पुडुचेरीअधिकरण 1990; अंतिम निर्णय 2007; सर्वोच्च न्यायालय का निर्णय फ़रवरी 2018 (कर्नाटक का हिस्सा कुछ बढ़ाया, नदी को "राष्ट्रीय संपत्ति" बताया); कावेरी जल प्रबंधन प्राधिकरण (2018)
कृष्णामहाराष्ट्र, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, तेलंगानाबछावत अधिकरण (1969-76); दूसरा अधिकरण 2004 से; तेलंगाना गठन (2014) के बाद नए प्रश्न
गोदावरीमहाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, मध्य प्रदेश, ओडिशाअधिकरण निर्णय 1980; अपेक्षाकृत सफल मॉडल (राज्यों के बीच समझौतों पर आधारित)
रावी-ब्यासपंजाब, हरियाणा, राजस्थानसतलुज-यमुना लिंक नहर का दशकों पुराना विवाद; राजनीतिक संवेदनशीलता
महादायी (मांडवी)गोवा, कर्नाटक, महाराष्ट्रअधिकरण निर्णय 2018; पेयजल परियोजना पर विवाद
वंशधाराआंध्र प्रदेश, ओडिशाअधिकरण 2010

समस्याएँ: (1) अधिकरणों का निर्णय देने में दशकों का समय; (2) निर्णयों के क्रियान्वयन की कोई प्रभावी व्यवस्था नहीं; (3) विश्वसनीय जल-आँकड़ों का अभाव और राज्यों द्वारा आँकड़ों पर विवाद; (4) संकट-वर्षों (सूखे) में जल-बँटवारे का कोई स्पष्ट सूत्र नहीं; (5) चुनावी राजनीति और क्षेत्रीय भावनाएँ, जिनसे कभी-कभी हिंसा तक होती है; (6) राज्य कभी-कभी अधिकरण के निर्णय की अनदेखी करते हैं।

सुधार: अंतर-राज्यीय नदी जल विवाद (संशोधन) विधेयक (2019 में लोकसभा से पारित) में अलग-अलग अधिकरणों के स्थान पर एक स्थायी अधिकरण (कई पीठों के साथ), विवाद समाधान समिति द्वारा पहले बातचीत, और राष्ट्रीय स्तर पर जल-आँकड़ा संग्रह की व्यवस्था का प्रस्ताव था। मिहिर शाह समिति (2016) ने केंद्रीय जल आयोग और केंद्रीय भूजल बोर्ड को मिलाकर राष्ट्रीय जल आयोग बनाने का सुझाव दिया था। दीर्घकाल में नदी-घाटी आधारित एकीकृत प्रबंधन, जल-उपयोग दक्षता (सूक्ष्म-सिंचाई), और "जल राष्ट्रीय संसाधन है" की भावना ही समाधान है।

अन्य संघीय विवाद-मंच: एक दृष्टि में

मंचआधारभूमिका और सीमा
अंतर-राज्य परिषदअनुच्छेद 263; 1990 में गठित (सरकारिया आयोग की सिफ़ारिश)नीति-समन्वय; बैठकें बहुत अनियमित
क्षेत्रीय परिषदेंराज्य पुनर्गठन अधिनियम, 1956पाँच क्षेत्रीय परिषदें (गृह मंत्री अध्यक्ष); पूर्वोत्तर परिषद अलग अधिनियम (1971) से
GST परिषदअनुच्छेद 279A (101वाँ संशोधन, 2016)"सहकारी संघवाद" का संस्थागत रूप; मोहित मिनरल्स (2022) में न्यायालय ने कहा कि इसकी सिफ़ारिशें प्रेरक मूल्य रखती हैं, बाध्यकारी नहीं
नीति आयोग2015 में योजना आयोग के स्थान पर (कार्यकारी संकल्प)शासी परिषद में सभी मुख्यमंत्री; "प्रतिस्पर्धी संघवाद" (सूचकांक, रैंकिंग)
सर्वोच्च न्यायालय का मूल क्षेत्राधिकारअनुच्छेद 131केंद्र और राज्यों के बीच क़ानूनी अधिकार के विवाद
P1अभ्यास प्रश्न · UPSC पैटर्न · 15 अंक

अंतर-राज्यीय जल विवाद अधिनियम, 1956 के अंतर्गत अधिकरण-आधारित व्यवस्था विवादों के समाधान में अपेक्षित रूप से सफल क्यों नहीं रही? सुधार के उपाय सुझाइए। (250 शब्द)

मॉडल उत्तर

भूमिका: अनुच्छेद 262 और अंतर-राज्यीय नदी जल विवाद अधिनियम, 1956 के तहत अंतर-राज्यीय जल विवाद अधिकरणों को सौंपे जाते हैं। पर कावेरी, कृष्णा और रावी-ब्यास जैसे विवाद दशकों से अनसुलझे या विवादित रहे हैं।

विफलता के कारण:

  • अत्यधिक देरी: अधिकरण गठन और निर्णय में दशकों (कावेरी: अधिकरण 1990, निर्णय 2007, अंतिम न्यायिक निर्णय 2018)।
  • क्रियान्वयन तंत्र का अभाव: निर्णय बाध्यकारी, पर लागू कराने की संस्था नहीं थी; 2018 में कावेरी प्राधिकरण बना।
  • आँकड़ों पर अविश्वास: वर्षा, प्रवाह और उपयोग के आँकड़ों पर राज्यों में असहमति।
  • संकट-बँटवारे का सूत्र नहीं: सूखे वर्षों में विवाद भड़कता है।
  • राजनीतिकरण: जल को क्षेत्रीय अस्मिता से जोड़ना; राज्यों द्वारा निर्णयों की अवहेलना।
  • न्यायिक दोहराव: अधिकरण के बाद भी सर्वोच्च न्यायालय में अपीलें, जिससे "अंतिमता" कमज़ोर।

सुधार के उपाय:

  • 2019 के संशोधन विधेयक के अनुरूप एक स्थायी अधिकरण और निर्णय की समय-सीमा।
  • विवाद समाधान समिति द्वारा पहले संवाद और मध्यस्थता।
  • स्वतंत्र, सार्वजनिक, उपग्रह-आधारित जल-आँकड़ा प्रणाली।
  • प्रत्येक बड़े विवाद के लिए कावेरी-मॉडल का क्रियान्वयन प्राधिकरण।
  • नदी-घाटी संगठन और एकीकृत जल संसाधन प्रबंधन; माँग-प्रबंधन (फ़सल-पैटर्न, सूक्ष्म-सिंचाई)।
  • अंतर-राज्य परिषद में राजनीतिक सहमति निर्माण।

निष्कर्ष: जल-विवाद केवल क़ानूनी नहीं, "सहकारी संघवाद" की परीक्षा हैं; स्थायी समाधान आँकड़ों की पारदर्शिता, संस्थागत निरंतरता और जल-संरक्षण पर साझा ज़िम्मेदारी से ही संभव है।

P2अभ्यास प्रश्न · UPSC पैटर्न · 10 अंक

"सहकारी संघवाद" और "प्रतिस्पर्धी संघवाद" परस्पर विरोधी नहीं, बल्कि पूरक हैं। उदाहरणों सहित स्पष्ट कीजिए। (150 शब्द)

मॉडल उत्तर

सहकारी संघवाद: केंद्र और राज्य साझा लक्ष्यों के लिए मिलकर काम करते हैं। उदाहरण: GST परिषद (केंद्र और राज्य मिलकर कर-दरें तय करते हैं); नीति आयोग की शासी परिषद; कोविड-19 के दौरान टीकाकरण और राहत में समन्वय; केंद्र प्रायोजित योजनाएँ।

प्रतिस्पर्धी संघवाद: राज्य निवेश, सुशासन और विकास के लिए एक-दूसरे से प्रतिस्पर्धा करते हैं। उदाहरण: व्यापार सुगमता और स्टार्ट-अप रैंकिंग; नीति आयोग के SDG इंडिया इंडेक्स, स्वास्थ्य और जल सूचकांक; आकांक्षी ज़िला कार्यक्रम की डेल्टा रैंकिंग।

पूरकता:

  • सहकारिता से साझा मानक और न्यूनतम सुरक्षा-जाल; प्रतिस्पर्धा से उन मानकों से ऊपर उठने की प्रेरणा।
  • एक राज्य का सफल नवाचार (जैसे तमिलनाडु का मध्याह्न भोजन) राष्ट्रीय नीति बनता है: राज्य "लोकतंत्र की प्रयोगशाला" बनते हैं।
  • प्रतिस्पर्धा तभी स्वस्थ है जब पिछड़े राज्यों को वित्त आयोग के समानीकरण अनुदानों से सहयोग मिले।

सावधानी: "नीचे की ओर दौड़" (race to the bottom), जैसे निवेश के लिए पर्यावरण या श्रम मानकों में ढील, से बचना होगा।

निष्कर्ष: "सहकारी-प्रतिस्पर्धी संघवाद" ही भारत जैसे विविध देश के लिए उपयुक्त मॉडल है।

10. Master Summary Table

विषयमुख्य बिंदुअनुच्छेद / स्रोत
संघवाद की प्रकृतिHolding Together; अर्ध-संघीयअनुच्छेद 1, 3, 248; बोम्मई 1994
असममितताविशेष प्रावधान, अनुसूचित क्षेत्र371A-J; पाँचवीं, छठी अनुसूची
विवाद समाधानन्यायिक, परामर्शी, वित्तीय131, 262, 263, 279A, 280
राज्यपालविवेक सीमित; विधेयकों पर विकल्प155, 163, 200, 201; पुंछी 2010
वित्तऊर्ध्वाधर असंतुलन, उपकर15वाँ FC — 41%
स्थानीय शासन3F की कमी73-74वाँ संशोधन; केरल मॉडल
जम्मू-कश्मीरविधानसभा वाला UTपुनर्गठन अधिनियम 2019; SC दिसंबर 2023

11. Mind Map

संघवाद एवं केंद्र-राज्य संबंध
विधायी
  • सातवीं अनुसूची
  • 249, 250, 252
प्रशासनिक
  • राज्यपाल, 356
  • अखिल भारतीय सेवाएँ
वित्तीय
  • वित्त आयोग, GST
  • उपकर, उधार
विवाद समाधान
  • 131, 263
  • जल न्यायाधिकरण
स्थानीय स्तर
  • 73-74वाँ
  • 3F

12. महत्वपूर्ण One-liners

  • "राज्यों का संघ": अनुच्छेद 1।
  • अंतर-राज्य परिषद: अनुच्छेद 263; गठन 1990।
  • सरकारिया आयोग रिपोर्ट: 1988; पुंछी आयोग: 2010।
  • GST परिषद: अनुच्छेद 279A (101वाँ संशोधन, 2016)।
  • वित्त आयोग: अनुच्छेद 280; 15वें FC में राज्यों का हिस्सा 41%।
  • अनुच्छेद 356 के दुरुपयोग पर रोक: एस. आर. बोम्मई (1994)।
  • नागालैंड के लिए विशेष प्रावधान: अनुच्छेद 371A।
  • महानगर योजना समिति: अनुच्छेद 243ZE।
  • अनुच्छेद 370 पर सर्वोच्च न्यायालय का निर्णय: दिसंबर 2023।
  • दिल्ली के लिए विशेष प्रावधान: अनुच्छेद 239AA।

13. टिप्स एवं ट्रिक्स

उत्तर लेखन
  • केंद्र-राज्य प्रश्नों को तीन खंडों में बाँटें — विधायी, प्रशासनिक, वित्तीय; यह ढाँचा हर प्रश्न में काम आता है।
  • सरकारिया, पुंछी, द्वितीय ARC, वेंकटचलैया आयोग (NCRWC) की अनुशंसाएँ "आगे की राह" में लिखें।
  • संतुलन रखें: केंद्रीकरण की आलोचना के साथ "राष्ट्रीय एकता, आपदा, सुरक्षा" जैसे केंद्रीय भूमिका के औचित्य भी लिखें।
याद रखने की तरकीब

स्थानीय निकायों की तीन कमी: "3F — काम, दाम, कर्मचारी" (Functions, Funds, Functionaries)।

14. PYQ-आधारित प्रश्न एवं मॉडल उत्तर

Q1UPSC 2026 · GS-2 · Q13 · 15 अंक

भारतीय संघवाद ने विविधता को किस प्रकार समायोजित किया है? असममित संघवाद और विवाद समाधान तंत्रों के संदर्भ में विवेचना कीजिए। (250 शब्द)

मॉडल उत्तर

भूमिका: भारत का संघवाद "Holding Together" प्रकार का है — एक विविध देश को एक रखने के लिए बना। इसकी सफलता का रहस्य एकरूपता नहीं, बल्कि लचीला समायोजन है।

विविधता का समायोजन: (1) भाषाई राज्य (1956 से) — क्षेत्रीय पहचान को राष्ट्रीय ढाँचे में स्थान; (2) असममित प्रावधान — अनुच्छेद 371A (नागालैंड: प्रथागत क़ानून, भूमि), 371G (मिज़ोरम), 371F (सिक्किम), 371J (हैदराबाद-कर्नाटक क्षेत्र); (3) पाँचवीं और छठी अनुसूची — जनजातीय स्वशासन, स्वायत्त ज़िला परिषदें; PESA 1996; (4) शांति समझौते — मिज़ो (1986), बोडो (2020) — अलगाववाद से मुख्यधारा; (5) विविध केंद्रशासित मॉडल (दिल्ली, पुडुचेरी)।

विवाद समाधान: (1) अनुच्छेद 131 — सर्वोच्च न्यायालय का मूल क्षेत्राधिकार; (2) अनुच्छेद 262 — जल न्यायाधिकरण; (3) अनुच्छेद 263 — अंतर-राज्य परिषद; (4) क्षेत्रीय परिषदें; (5) GST परिषद — सहमति आधारित निर्णय; (6) वित्त आयोग — राजस्व विवादों की रोकथाम।

सीमाएँ: अंतर-राज्य परिषद की बैठकें दुर्लभ; जल न्यायाधिकरणों में दशकों की देरी; GST परिषद में विवाद तंत्र नहीं; राज्यपाल से जुड़े विवाद; अनुच्छेद 370 की समाप्ति पर असममितता की बहस।

आगे की राह: अंतर-राज्य परिषद को स्थायी सचिवालय और नियमित बैठकें (पुंछी आयोग), GST विवाद प्राधिकरण, जल विवादों के लिए स्थायी न्यायाधिकरण (अंतर-राज्य नदी जल विवाद संशोधन विधेयक)।

निष्कर्ष: भारत में संघवाद "विविधता को मिटाकर एकता" नहीं, बल्कि "विविधता को स्थान देकर एकता" का मॉडल है।

Q2UPSC 2026 · GS-2 · Q11 · 15 अंक

राज्यपाल की संवैधानिक स्थिति का परीक्षण कीजिए। राज्य विधेयकों पर स्वीकृति और मंत्रिपरिषद की सहायता एवं सलाह के संदर्भ में हाल के विवादों पर चर्चा कीजिए। (250 शब्द)

मॉडल उत्तर

भूमिका: राज्यपाल राज्य का संवैधानिक प्रमुख है और केंद्र-राज्य के बीच "सेतु" भी। यह दोहरी भूमिका ही विवाद की जड़ है।

संवैधानिक स्थिति: नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा (155), प्रसादपर्यंत पद (156); अनुच्छेद 163 — मंत्रिपरिषद की सहायता और सलाह से कार्य, विवेकाधीन क्षेत्रों को छोड़कर; शमशेर सिंह (1974) — राज्यपाल नाममात्र का प्रमुख; नबाम रेबिया (2016) — विवेक केवल संविधान द्वारा स्पष्ट रूप से दिए क्षेत्रों में।

विधेयकों पर विकल्प: अनुच्छेद 200 — स्वीकृति, पुनर्विचार हेतु लौटाना (पुनः पारित होने पर स्वीकृति बाध्य), या राष्ट्रपति हेतु आरक्षित; कोई समय-सीमा नहीं लिखी — यही "पॉकेट वीटो" जैसे विलंब का कारण।

हाल के विवाद: तमिलनाडु, केरल, पंजाब, पश्चिम बंगाल में विधेयकों का लंबे समय तक लंबित रहना; विश्वविद्यालय कुलपति नियुक्तियाँ; विधानसभा सत्र बुलाने पर विवाद। पंजाब मामला (2023) — राज्यपाल अनिश्चितकाल तक विधेयक नहीं रोक सकते; तमिलनाडु मामला (अप्रैल 2025) — समय-सीमा और "मानी गई स्वीकृति"; राष्ट्रपति संदर्भ पर संविधान पीठ (नवंबर 2025) — न्यायालय निश्चित समय-सीमा नहीं थोप सकता, "मानी गई स्वीकृति" की अवधारणा स्वीकार्य नहीं, पर अनिश्चित निष्क्रियता पर सीमित न्यायिक समीक्षा।

सुधार: सरकारिया — गैर-राजनीतिक, प्रतिष्ठित व्यक्ति, मुख्यमंत्री से परामर्श; पुंछी — निश्चित कार्यकाल, हटाने की प्रक्रिया, विधेयकों पर समय-सीमा; संवैधानिक परंपराओं का संहिताकरण।

निष्कर्ष: राज्यपाल "संविधान का संरक्षक" है, "केंद्र का एजेंट" नहीं — इस भूमिका की गरिमा संयम और समयबद्धता से ही बचेगी।

Q3UPSC 2025 · GS-2 · Q14 · 15 अंक

केंद्र-राज्य वित्तीय संबंधों ने भारत में नियोजित विकास को किस प्रकार प्रभावित किया है? राजकोषीय संघवाद को सुदृढ़ करने के लिए सुधार सुझाइए। (250 शब्द)

मॉडल उत्तर

भूमिका: भारत में राज्य विकास व्यय (स्वास्थ्य, शिक्षा, कृषि, पुलिस) का बड़ा भाग उठाते हैं, पर अधिक लोचशील कर (आयकर, निगम कर, सीमा शुल्क) केंद्र के पास हैं — यही "ऊर्ध्वाधर राजकोषीय असंतुलन" है।

नियोजित विकास पर प्रभाव: (1) योजना आयोग काल (1951-2014): गाडगिल फ़ॉर्मूला से योजना सहायता; विवेकाधीन अनुदान से केंद्र का प्रभाव; (2) केंद्र प्रायोजित योजनाएँ — राष्ट्रीय प्राथमिकताओं में एकरूपता, पर राज्यों की स्वायत्तता घटी; (3) क्षेत्रीय असमानता — वित्त आयोग के "समता" मानदंड (आय दूरी) से गरीब राज्यों को अधिक; (4) NITI Aayog (2015) के बाद अनुदान का बड़ा भाग वित्त आयोग से; (5) GST (2017) — एकीकृत बाज़ार, पर राज्यों की कर स्वायत्तता सीमित, क्षतिपूर्ति 2022 में समाप्त।

वर्तमान समस्याएँ: उपकर-अधिभार का बढ़ता हिस्सा (विभाज्य पूल से बाहर); राज्यों के उधार पर नियंत्रण (अनुच्छेद 293); जनसंख्या-आधारित मानदंडों पर दक्षिणी राज्यों की आपत्ति; स्थानीय निकायों को धन का अपर्याप्त हस्तांतरण।

सुधार: (1) उपकर-अधिभार पर सीमा या उन्हें विभाज्य पूल में शामिल करना; (2) GST परिषद में विवाद निपटान प्राधिकरण; (3) केंद्र प्रायोजित योजनाओं का युक्तिकरण और "untied" अनुदान; (4) स्थायी वित्त आयोग या अंतर-राज्य परिषद के अंतर्गत वित्तीय मंच; (5) राज्यों और नगर निकायों का अपना कर आधार (संपत्ति कर) मज़बूत करना; (6) बजट-बाह्य उधार में पारदर्शिता (FRBM)।

निष्कर्ष: "सहकारी संघवाद" तभी सार्थक है जब राज्यों के पास जिम्मेदारी के अनुरूप संसाधन हों — "जितना काम, उतना दाम"।

Q4UPSC 2024 · GS-2 · Q13 · 15 अंक

हाल के वर्षों में केंद्र-राज्य संबंधों में आए परिवर्तनों की चर्चा कीजिए। विश्वास-निर्माण के उपाय सुझाइए। (250 शब्द)

मॉडल उत्तर

भूमिका: संघवाद केवल संवैधानिक प्रावधान नहीं, बल्कि केंद्र और राज्यों के बीच विश्वास पर टिका व्यवहार है।

सकारात्मक परिवर्तन: (1) GST परिषद — सहकारी संघवाद का संस्थागत मंच; (2) NITI Aayog — "टीम इंडिया", आकांक्षी ज़िला कार्यक्रम; (3) 14वें-15वें वित्त आयोग से कर हिस्से में वृद्धि; (4) प्रतिस्पर्धी संघवाद — व्यापार सुगमता, स्वास्थ्य सूचकांक रैंकिंग; (5) कोविड-19 में समन्वय।

तनाव के क्षेत्र: (1) राज्यपालों और विधेयकों पर विवाद; (2) केंद्रीय जाँच एजेंसियों पर विवाद — कई राज्यों ने CBI की "सामान्य सहमति" वापस ली; (3) दिल्ली सेवाओं पर संघर्ष — सर्वोच्च न्यायालय (मई 2023) के बाद संसद का संशोधन अधिनियम (2023); (4) उपकर-अधिभार और उधार सीमा पर वित्तीय विवाद; (5) समवर्ती सूची के विषयों (कृषि क़ानून 2020, शिक्षा, NEET) पर राज्यों से परामर्श की कमी की शिकायत; (6) भाषा और परिसीमन पर आशंकाएँ।

विश्वास-निर्माण के उपाय: (1) अंतर-राज्य परिषद की नियमित बैठकें और स्थायी सचिवालय; (2) समवर्ती सूची पर क़ानून से पहले राज्यों से संरचित परामर्श (सरकारिया); (3) राज्यपाल की नियुक्ति और विधेयकों पर समय-सीमा (पुंछी); (4) केंद्रीय एजेंसियों के लिए स्पष्ट प्रोटोकॉल; (5) उपकरों पर संयम; (6) GST विवाद तंत्र; (7) क्षेत्रीय परिषदों का सक्रिय उपयोग।

निष्कर्ष: मज़बूत केंद्र और मज़बूत राज्य परस्पर विरोधी नहीं — "मज़बूत राज्यों से ही मज़बूत राष्ट्र" बनता है।

Q5UPSC 2025 · GS-2 · Q4 · 10 अंक

जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन अधिनियम 2019 के अंतर्गत जम्मू-कश्मीर विधानसभा की संरचना और शक्तियों का परीक्षण कीजिए। (150 शब्द)

मॉडल उत्तर

पृष्ठभूमि: अगस्त 2019 में अनुच्छेद 370 निष्प्रभावी हुआ और राज्य दो केंद्रशासित प्रदेशों में बँटा — विधानसभा वाला जम्मू-कश्मीर और बिना विधानसभा वाला लद्दाख। सर्वोच्च न्यायालय (दिसंबर 2023) ने निर्णय को वैध माना और राज्य का दर्जा शीघ्र बहाल करने को कहा।

संरचना: परिसीमन (2022) के बाद 90 निर्वाचित सीटें (जम्मू 43, कश्मीर 47), SC-ST के लिए आरक्षण; उपराज्यपाल द्वारा मनोनीत सदस्य (कश्मीरी प्रवासी, PoJK से विस्थापित); कार्यकाल 5 वर्ष; 2024 में चुनाव।

शक्तियाँ और सीमाएँ: राज्य सूची और समवर्ती सूची के विषयों पर क़ानून, पर "पुलिस" और "लोक व्यवस्था" को छोड़कर; वित्तीय विधेयकों के लिए उपराज्यपाल की सिफ़ारिश; उपराज्यपाल की विवेकाधीन शक्तियाँ व्यापक — 2024 के नियम संशोधनों से पुलिस, अखिल भारतीय सेवाएँ, भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो से जुड़े निर्णय उपराज्यपाल के पास।

मूल्यांकन: लोकतांत्रिक प्रक्रिया की बहाली सकारात्मक, पर दोहरे सत्ता केंद्र से जवाबदेही धुंधली; दिल्ली जैसी खींचतान का जोखिम।

निष्कर्ष: राज्य के दर्जे की समयबद्ध बहाली ही "सहकारी संघवाद" और जनविश्वास दोनों को मज़बूत करेगी।

Q6UPSC 2024 · GS-2 · Q5 · 10 अंक

स्थानीय निकाय सुशासन में किस प्रकार योगदान देते हैं? क्या ग्रामीण और शहरी स्थानीय निकायों का विलय उचित होगा? (150 शब्द)

मॉडल उत्तर

सुशासन में योगदान: (1) सहभागिता — ग्राम सभा और वार्ड समितियों में प्रत्यक्ष लोकतंत्र; (2) जवाबदेही — सामाजिक लेखा परीक्षा (MGNREGA); (3) प्रतिक्रियाशीलता — स्थानीय ज़रूरतों के अनुसार योजना (GPDP); (4) समावेशन — महिलाओं, SC-ST का आरक्षण; (5) सेवा वितरण — जल, स्वच्छता, प्राथमिक स्वास्थ्य।

विलय के पक्ष में: तेज़ शहरीकरण, जनगणना नगरों और उपनगरीय क्षेत्रों का "ग्रामीण शासन, शहरी स्वरूप"; एकीकृत भूमि-उपयोग योजना, बेहतर अवसंरचना, संसाधनों का कुशल उपयोग; ज़िला योजना समिति (243ZD) और महानगर योजना समिति (243ZE) की भावना के अनुरूप।

विरोध में: ग्रामीण पहचान और कृषि हितों की उपेक्षा, ग्राम सभा जैसी प्रत्यक्ष सहभागिता का ह्रास, संपत्ति कर और शुल्कों का बोझ, बड़े निकायों में दूरी और नौकरशाहीकरण।

संतुलित मार्ग: पूर्ण विलय के बजाय क्षेत्रीय/ज़िला स्तर पर समन्वित योजना, संक्रमणकालीन "नगर पंचायत" मॉडल, 3F का वास्तविक हस्तांतरण, राज्य वित्त आयोगों का समय पर गठन।

Q7अभ्यास प्रश्न · UPSC पैटर्न · 15 अंक

अंतर-राज्यीय नदी जल विवाद भारतीय संघवाद के लिए स्थायी चुनौती क्यों बने हुए हैं? विवाद समाधान तंत्र को प्रभावी बनाने के उपाय सुझाइए। (250 शब्द)

मॉडल उत्तर

भूमिका: जल राज्य सूची (प्रविष्टि 17) का विषय है, पर अंतर-राज्यीय नदियों का विनियमन संघ सूची (प्रविष्टि 56) में। अनुच्छेद 262 संसद को जल विवादों के निर्णय के लिए क़ानून बनाने और सर्वोच्च न्यायालय के क्षेत्राधिकार को सीमित करने की शक्ति देता है — इसी के तहत अंतर-राज्यीय नदी जल विवाद अधिनियम 1956।

स्थायी चुनौती के कारण: (1) बढ़ती माँग, घटती आपूर्ति: सिंचाई, शहरीकरण, उद्योग; जलवायु परिवर्तन से वर्षा की अनिश्चितता; (2) राजनीतिकरण: जल "क्षेत्रीय अस्मिता" का प्रश्न — कावेरी पर कर्नाटक-तमिलनाडु में हिंसक विरोध; (3) न्यायाधिकरणों में देरी: कावेरी (1990 में गठित, अंतिम निर्णय 2007, सर्वोच्च न्यायालय का संशोधित निर्णय 2018), कृष्णा, महादायी (निर्णय 2018) — दशकों लगे; (4) निर्णयों के क्रियान्वयन की कमज़ोर व्यवस्था; (5) विश्वसनीय आँकड़ों (प्रवाह, भूजल) का अभाव; (6) अनुच्छेद 136 के अंतर्गत अपील से अंतिमता पर प्रश्न।

सुधार के प्रयास: 2002 संशोधन — न्यायाधिकरणों के लिए समय-सीमा; कावेरी जल प्रबंधन प्राधिकरण (2018) — निर्णय लागू करने की संस्था; अंतर-राज्यीय नदी जल विवाद (संशोधन) विधेयक 2019 — एकल स्थायी न्यायाधिकरण और विवाद समाधान समिति का प्रस्ताव।

आगे की राह: (1) एकल स्थायी न्यायाधिकरण और समयबद्ध निर्णय; (2) नदी बेसिन संगठन (नदी बोर्ड अधिनियम 1956 का सक्रियण) — बेसिन स्तर पर एकीकृत प्रबंधन; (3) राष्ट्रीय जल आँकड़ा केंद्र (India-WRIS); (4) माँग प्रबंधन — सूक्ष्म सिंचाई, फ़सल विविधीकरण; (5) "संकट-साझेदारी" (distress sharing) फ़ॉर्मूले पहले से तय; (6) राजनीतिक संवाद के मंच — अंतर-राज्य परिषद, क्षेत्रीय परिषदें।

निष्कर्ष: नदियाँ राज्य-सीमाएँ नहीं मानतीं — उनका प्रबंधन भी "सहकारी संघवाद" की भावना से ही संभव है।

15. Quick Revision Summary

एक नज़र में
  • भारत: "Holding Together" संघ — संघीय + एकात्मक लक्षण; संघवाद मूल ढाँचा।
  • असममित संघवाद: 371A-J, पाँचवीं-छठी अनुसूची; विवाद समाधान: 131, 262, 263, 279A, 280।
  • राज्यपाल: 163 के अंतर्गत सलाह से बँधा; विधेयकों पर विवाद और 2023-2025 के न्यायिक निर्णय।
  • राजकोषीय संघवाद: ऊर्ध्वाधर असंतुलन, उपकर, GST, वित्त आयोग।
  • स्थानीय निकाय: 3F की कमी; ग्रामीण-शहरी समन्वित योजना।
  • जम्मू-कश्मीर: विधानसभा वाला UT; उपराज्यपाल की व्यापक शक्तियाँ; राज्य दर्जे की माँग।