1. अध्याय एक नज़र में
पाठ्यक्रम: "प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष कृषि सहायता तथा न्यूनतम समर्थन मूल्य से संबंधित विषय; जन वितरण प्रणाली — उद्देश्य, कार्य, सीमाएँ, सुधार; बफ़र स्टॉक तथा खाद्य सुरक्षा; प्रौद्योगिकी मिशन; पशुपालन संबंधी अर्थशास्त्र", "भारत में खाद्य प्रसंस्करण एवं संबंधित उद्योग — कार्यक्षेत्र एवं महत्व, स्थान, ऊपरी और नीचे की अपेक्षाएँ, आपूर्ति शृंखला प्रबंधन" तथा "भारत में भूमि सुधार"।
| वर्ष | प्रश्न |
|---|---|
| 2026 | कृषि सब्सिडी और WTO कृषि समझौता; खाद्य अभाव से अधिशेष तक — विविधीकरण की नीतियाँ; शीघ्र नष्ट होने वाली फ़सलों के प्रसंस्करण में जैव-प्रौद्योगिकी |
| 2025 | खाद्य प्रसंस्करण उद्योग और रोज़गार |
| 2024 | बफ़र स्टॉक; कुछ क्षेत्रों में सफल भूमि सुधार; मोटे अनाज और पोषण सुरक्षा |
2. कृषि सब्सिडी और MSP
- प्रत्यक्ष सहायता: PM-KISAN (2019 — ₹6,000 वार्षिक), राज्यों की आय सहायता योजनाएँ (तेलंगाना रायथु बंधु, ओडिशा कालिया), फ़सल बीमा (PMFBY 2016) प्रीमियम सब्सिडी।
- अप्रत्यक्ष सहायता: उर्वरक (सबसे बड़ी — यूरिया का नियंत्रित मूल्य, P&K पर पोषक-आधारित सब्सिडी 2010), बिजली, सिंचाई, ब्याज अनुदान (किसान क्रेडिट कार्ड), बीज, कृषि यंत्र।
- MSP: 22 फ़सलों के लिए (CACP की सिफ़ारिश पर; गन्ने का FRP अलग); 2018 से MSP को उत्पादन लागत (A2+FL) के कम से कम 1.5 गुना पर निर्धारित; पर प्रभावी ख़रीद मुख्यतः धान-गेहूँ की और कुछ राज्यों में। PM-AASHA — दालें-तिलहन की ख़रीद (PSS) और मूल्य-अंतर भुगतान।
- समस्याएँ: यूरिया के सस्ते होने से NPK असंतुलन और मृदा क्षरण, धान-गेहूँ की ओर झुकाव, भूजल दोहन, सब्सिडी का बड़े किसानों को अधिक लाभ, राजकोषीय बोझ।
3. WTO कृषि समझौता (AoA)
| बॉक्स | प्रकृति | सीमा |
|---|---|---|
| Amber Box | व्यापार-विकृतकारी — मूल्य समर्थन, इनपुट सब्सिडी (AMS) | विकासशील देश: उत्पादन मूल्य का 10% (de minimis); विकसित: 5% |
| Blue Box | उत्पादन सीमित करने वाली शर्तों से जुड़ी सहायता | कोई सीमा नहीं |
| Green Box | न्यूनतम विकृति — अनुसंधान, अवसंरचना, प्रत्यक्ष आय सहायता, पर्यावरण | कोई सीमा नहीं |
| विकास बॉक्स (अनु. 6.2) | विकासशील देशों के निम्न-आय किसानों को इनपुट सब्सिडी | छूट |
- भारत का मुद्दा: सार्वजनिक भंडारण (public stockholding) के लिए MSP पर ख़रीद को AMS में गिनने की विधि — "बाहरी संदर्भ मूल्य" 1986-88 का पुराना; बाली "शांति खंड" (2013) — स्थायी समाधान तक ऐसी ख़रीद पर विवाद नहीं; भारत ने चावल के लिए इसका प्रयोग किया; स्थायी समाधान अब तक नहीं (MC13, 2024)।
- विकसित देशों का दोहरा मानदंड: भारी "ग्रीन बॉक्स" और प्रति किसान बहुत अधिक सहायता, जबकि भारत की प्रति किसान सहायता बहुत कम।
4. PDS, बफ़र स्टॉक और खाद्य सुरक्षा
- विकास: सार्वभौमिक PDS → लक्षित PDS (1997) → अंत्योदय (2000) → NFSA 2013 (ग्रामीण 75%, शहरी 50% तक; प्राथमिकता परिवार 5 किग्रा/व्यक्ति/माह) → PM गरीब कल्याण अन्न योजना (कोविड से; जनवरी 2024 से 5 वर्ष के लिए निःशुल्क अनाज)।
- सुधार: राशन कार्ड डिजिटलीकरण, आधार-आधारित ePoS, "वन नेशन वन राशन कार्ड" (प्रवासी श्रमिक), चावल फ़ोर्टिफ़िकेशन।
- बफ़र स्टॉक: FCI और राज्य एजेंसियों द्वारा केंद्रीय पूल; तिमाही-वार "बफ़र मानदंड" (परिचालन + रणनीतिक भंडार); उद्देश्य — PDS, आपात स्थिति, मूल्य स्थिरीकरण (खुले बाज़ार बिक्री योजना — OMSS)। समस्या — मानदंड से कहीं अधिक भंडार (विशेषकर चावल), भंडारण लागत, अनाज की बर्बादी, FCI की "आर्थिक लागत" ऊँची; शांता कुमार समिति (2015) — FCI पुनर्गठन, विकेंद्रीकृत ख़रीद, नक़द हस्तांतरण।
5. खाद्य प्रसंस्करण उद्योग
- महत्व: "खेत और थाली के बीच की कड़ी" — फ़सल-उपरांत हानि में कमी, किसान की आय, संगठित विनिर्माण में सबसे बड़े रोज़गारदाताओं में, निर्यात, पोषण।
- चुनौतियाँ: फल-सब्ज़ियों के प्रसंस्करण का स्तर कम, कच्चे माल की असमान गुणवत्ता और मौसमी उपलब्धता, कोल्ड चेन की कमी, असंगठित सूक्ष्म इकाइयाँ, ऋण, खाद्य सुरक्षा मानक (FSSAI) का अनुपालन।
- योजनाएँ: PM किसान संपदा योजना (मेगा फ़ूड पार्क, कोल्ड चेन), PM-FME (2020, "एक ज़िला एक उत्पाद" आधार पर सूक्ष्म उद्यम), खाद्य प्रसंस्करण के लिए PLI (2021), खाद्य प्रसंस्करण में 100% FDI (स्वचालित मार्ग), "वर्ल्ड फ़ूड इंडिया"।

6. भारत में भूमि सुधार
- चरण: (1) ज़मींदारी उन्मूलन (1950 का दशक — सबसे सफल); (2) काश्तकारी सुधार — लगान नियमन, स्वामित्व; (3) भूमि हदबंदी (ceiling) — अधिशेष भूमि का पुनर्वितरण; (4) चकबंदी; (5) भूदान-ग्रामदान (विनोबा भावे, 1951); (6) भूमि अभिलेखों का आधुनिकीकरण।
- सफल क्षेत्र: केरल (भूमि सुधार अधिनियम 1963, 1969 संशोधन — काश्तकारों को स्वामित्व, "कुडिकिडप्पु" अधिकार), पश्चिम बंगाल (ऑपरेशन बर्गा, 1978 — बटाईदारों का पंजीकरण), जम्मू-कश्मीर (1950 का "बड़ी जोत उन्मूलन" अधिनियम — बिना मुआवज़े भूमि वितरण), पंजाब-हरियाणा में चकबंदी।
- सफलता के कारण: राजनीतिक इच्छाशक्ति, किसान आंदोलन और संगठन, सटीक अभिलेख, पंचायतों की भागीदारी।
- वर्तमान: डिजिटल भारत भू-अभिलेख आधुनिकीकरण कार्यक्रम (DILRMP), ULPIN ("भू-आधार" — 14 अंकों की विशिष्ट भूखंड संख्या), SVAMITVA (2020), मॉडल भूमि पट्टा अधिनियम (2016), निर्णायक स्वत्व (conclusive titling) की दिशा।
7. विस्तृत विवेचन: MSP की गणना, ख़रीद-तंत्र और "क़ानूनी MSP" की बहस
न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) भारतीय कृषि-नीति का सबसे चर्चित उपकरण है। 2020-21 के किसान आंदोलन के बाद "MSP की क़ानूनी गारंटी" की माँग राष्ट्रीय बहस का विषय बनी। इस पर संतुलित उत्तर लिखने के लिए यह समझना आवश्यक है कि MSP कैसे तय होता है, किसे वास्तव में मिलता है, और उसकी क़ानूनी गारंटी के निहितार्थ क्या होंगे।
| लागत-अवधारणा | क्या शामिल है |
|---|---|
| A2 | किसान द्वारा वास्तव में नक़द या वस्तु के रूप में चुकाई गई लागत: बीज, उर्वरक, कीटनाशक, किराए का श्रम, सिंचाई, ईंधन, पट्टे का किराया आदि |
| A2 + FL | A2 + परिवार के श्रम (family labour) का आरोपित मूल्य |
| C2 | A2 + FL + अपनी भूमि का आरोपित किराया और अपनी स्थायी पूँजी पर ब्याज — "व्यापक लागत" |
- संस्था: कृषि लागत और मूल्य आयोग (CACP) अनुशंसा करता है; अंतिम निर्णय केंद्रीय मंत्रिमंडल की आर्थिक मामलों की समिति का। CACP एक संलग्न कार्यालय है, सांविधिक निकाय नहीं।
- कवरेज: 22 अनिवार्य फ़सलों के लिए MSP (14 ख़रीफ़, 6 रबी, 2 वाणिज्यिक — जूट और खोपरा), और गन्ने के लिए "उचित और लाभकारी मूल्य" (FRP)।
- सूत्र: 2018-19 से सरकार MSP को A2+FL लागत का कम से कम डेढ़ गुना रखती है। राष्ट्रीय किसान आयोग (स्वामीनाथन आयोग, 2006) ने C2 लागत पर 50% का सुझाव दिया था; किसान संगठन इसी "C2 + 50%" की माँग करते हैं।
- अन्य कारक: माँग-आपूर्ति, घरेलू और अंतरराष्ट्रीय मूल्य, अंतर-फ़सल मूल्य समता, उपभोक्ता पर प्रभाव।
MSP की वास्तविक पहुँच
MSP की घोषणा 22 फ़सलों के लिए होती है, पर प्रभावी सरकारी ख़रीद मुख्यतः धान और गेहूँ की होती है, और वह भी कुछ ही राज्यों (पंजाब, हरियाणा, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, तेलंगाना आदि) में केंद्रित है। शांता कुमार समिति (2015) ने अनुमान लगाया था कि केवल लगभग 6% किसान ही MSP पर अपनी उपज बेच पाते हैं। दलहन और तिलहन की ख़रीद PM-AASHA (2018) के तहत मूल्य समर्थन योजना और मूल्य-अंतर भुगतान जैसे घटकों से होती है, पर उसका दायरा सीमित है। परिणाम: (1) क्षेत्रीय असमानता — जहाँ ख़रीद नहीं, वहाँ किसान MSP से कम पर बेचते हैं; (2) धान-गेहूँ की ओर झुकाव और फ़सल-विविधीकरण में बाधा; (3) FCI के गोदामों में बफ़र मानक से अधिक भंडार और भंडारण लागत।
| "क़ानूनी MSP" के पक्ष में | विपक्ष में / चिंताएँ |
|---|---|
| किसानों को मूल्य-जोखिम से सुरक्षा और आय-स्थिरता | सभी 22 फ़सलों की पूरी ख़रीद का वित्तीय बोझ बहुत बड़ा |
| व्यापारियों द्वारा शोषण पर रोक; बिचौलियों की मनमानी समाप्त | निजी व्यापारी MSP से कम गुणवत्ता की उपज न ख़रीदें तो बाज़ार ठप; अनुपालन कठिन |
| दलहन-तिलहन को MSP मिलने से विविधीकरण | अंतरराष्ट्रीय मूल्यों से ऊँचे दाम पर निर्यात कठिन; WTO में "Amber Box" सीमा का प्रश्न |
| उन क्षेत्रों के किसानों से न्याय जहाँ ख़रीद नहीं | खाद्य मुद्रास्फीति और उपभोक्ता पर बोझ |
मध्य मार्ग के सुझाव: दलहन-तिलहन जैसी कमी वाली फ़सलों के लिए मूल्य-अंतर भुगतान (deficiency payment) का विस्तार; ग्रामीण हाटों (GrAMs) और e-NAM से बाज़ार-पहुँच; FPO और गोदाम-रसीद (warehouse receipt) से भंडारण और ऋण; फ़सल-विशिष्ट न्यूनतम ख़रीद-लक्ष्य; और आय-सहायता (जैसे PM-KISAN) को मूल्य-सहायता के साथ जोड़ना।
न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) की वर्तमान व्यवस्था की सीमाएँ क्या हैं? "क़ानूनी MSP" के बजाय कौन-से वैकल्पिक उपाय किसानों की आय-सुरक्षा सुनिश्चित कर सकते हैं? (250 शब्द)
मॉडल उत्तर
भूमिका: 1960 के दशक में खाद्य-सुरक्षा के लिए शुरू MSP ने हरित क्रांति को प्रोत्साहन दिया। पर आज इसकी संरचना कई सीमाओं से ग्रस्त है।
सीमाएँ:
- सीमित पहुँच: घोषणा 22 फ़सलों की, प्रभावी ख़रीद मुख्यतः धान-गेहूँ की; शांता कुमार समिति के अनुसार लगभग 6% किसान ही लाभान्वित।
- क्षेत्रीय असमानता: ख़रीद कुछ राज्यों में केंद्रित; बिहार जैसे राज्यों के किसान प्रायः MSP से नीचे बेचते हैं।
- पर्यावरणीय प्रभाव: धान-गेहूँ चक्र से भूजल-संकट और पराली।
- लागत-सूत्र विवाद: A2+FL बनाम C2।
- भंडारण बोझ: बफ़र मानक से अधिक भंडार।
- WTO सीमाएँ: "de minimis" सीमा और शांति-खंड पर निर्भरता।
वैकल्पिक उपाय:
- मूल्य-अंतर भुगतान: बाज़ार मूल्य और MSP के अंतर का सीधा भुगतान, बिना भौतिक ख़रीद के (भावांतर का अनुभव और उसकी कमियों से सीख)।
- आय-सहायता: PM-KISAN जैसे प्रत्यक्ष हस्तांतरण, जो फ़सल-तटस्थ और WTO-अनुकूल ("Green Box") हैं।
- बाज़ार-सुधार: e-NAM, ग्रामीण हाटों का उन्नयन, APMC सुधार।
- FPO और सामूहिक सौदेबाज़ी।
- गोदाम-रसीद वित्तपोषण: संकट-बिक्री (distress sale) से बचाव।
- फ़सल-बीमा (PMFBY) और मौसम-आधारित बीमा का सुदृढ़ीकरण।
- विविधीकरण-प्रोत्साहन: दलहन-तिलहन और मिलेट के लिए सुनिश्चित ख़रीद।
निष्कर्ष: किसानों की आय-सुरक्षा का लक्ष्य केवल "मूल्य" से नहीं, "मूल्य + आय + बाज़ार + जोखिम-प्रबंधन" के समन्वित पैकेज से ही प्राप्त होगा, जो वित्तीय रूप से टिकाऊ और पर्यावरण-अनुकूल हो।
भारत विश्व के सबसे बड़े खाद्य उत्पादकों में है, फिर भी खाद्य प्रसंस्करण का स्तर कम क्यों है? सुधार के उपाय बताइए। (150 शब्द)
मॉडल उत्तर
स्थिति: भारत दूध, दलहन और कई फलों-सब्ज़ियों में अग्रणी उत्पादक है, पर फलों-सब्ज़ियों के कुल उत्पादन का केवल एक छोटा हिस्सा ही प्रसंस्कृत होता है, और कटाई के बाद की हानि (post-harvest loss) बड़ी है।
कारण:
- शीत-भंडारण और शीत-श्रृंखला की कमी, विशेषकर उत्पादन क्षेत्रों के पास।
- छोटी जोतें और बिखरी आपूर्ति; गुणवत्ता और मात्रा की अनिश्चितता।
- उच्च पूँजी-लागत, ऋण की कठिनाई; असंगठित इकाइयों की बहुलता।
- मानक, प्रमाणन और खाद्य-सुरक्षा अनुपालन की जटिलता।
- प्रसंस्कृत खाद्य की घरेलू माँग पर प्राथमिक कर और उपभोक्ता-आदतें।
सरकारी पहलें: प्रधानमंत्री किसान संपदा योजना (मेगा फ़ूड पार्क, एकीकृत शीत-श्रृंखला); खाद्य प्रसंस्करण के लिए PLI योजना; प्रधानमंत्री सूक्ष्म खाद्य उद्यम उन्नयन योजना (PMFME, "एक ज़िला एक उत्पाद" दृष्टिकोण); खाद्य प्रसंस्करण में 100% FDI (स्वचालित मार्ग) और भारत में निर्मित खाद्य उत्पादों के ई-कॉमर्स सहित व्यापार में 100% FDI (अनुमोदन मार्ग)।
आगे का रास्ता: FPO को प्रसंस्करण-इकाइयों से सीधे जोड़ना (संविदा खेती का पारदर्शी ढाँचा); उत्पादन-क्लस्टर में शीत-श्रृंखला; निर्यात-मानकों का प्रशिक्षण; ब्रांडिंग और GI उत्पादों का प्रचार।
निष्कर्ष: खाद्य प्रसंस्करण "खेत से थाली" तक मूल्य-वृद्धि कर किसानों की आय बढ़ाने और खाद्य-हानि घटाने का सबसे प्रभावी साधन है।
8. Master Summary Table
| विषय | मुख्य बिंदु | तथ्य / योजना |
|---|---|---|
| सब्सिडी | प्रत्यक्ष + अप्रत्यक्ष | PM-KISAN 2019; उर्वरक सबसे बड़ी |
| MSP | 22 फ़सलें; 1.5 गुना लागत | CACP; PM-AASHA |
| WTO | Amber, Blue, Green बॉक्स | de minimis 10%; शांति खंड 2013 |
| PDS | लक्षित, अधिकार-आधारित | NFSA 2013; ONORC; PMGKAY |
| बफ़र | मानदंड से अधिक भंडार | शांता कुमार समिति 2015 |
| खाद्य प्रसंस्करण | हानि में कमी, रोज़गार | PMKSY, PM-FME 2020, PLI 2021 |
| भूमि सुधार | केरल, बंगाल, J&K सफल | ऑपरेशन बर्गा 1978; ULPIN |
| मोटे अनाज | पोषण + जलवायु | अंतरराष्ट्रीय मिलेट वर्ष 2023 |
9. Mind Map
- MSP, PM-KISAN
- उर्वरक, बिजली
- बॉक्स
- शांति खंड
- NFSA, PDS
- बफ़र स्टॉक
- खाद्य प्रसंस्करण
- जैव-प्रौद्योगिकी
- भूमि सुधार
- भूमि अभिलेख
10. महत्वपूर्ण One-liners
- CACP की स्थापना: 1965 (कृषि मूल्य आयोग के रूप में)।
- NFSA: 2013; "वन नेशन वन राशन कार्ड": 2019 से चरणबद्ध।
- WTO कृषि समझौता: 1995; बाली शांति खंड: 2013।
- पोषक-आधारित सब्सिडी (P&K): 2010।
- ऑपरेशन बर्गा: पश्चिम बंगाल, 1978।
- भूदान आंदोलन: विनोबा भावे, 1951 (पोचमपल्ली, तेलंगाना)।
- अंतरराष्ट्रीय मिलेट वर्ष: 2023 (भारत का प्रस्ताव) — "श्री अन्न"।
- PM-FME योजना: 2020।
11. टिप्स एवं ट्रिक्स
- WTO प्रश्नों में बॉक्स-तालिका और भारत का "खाद्य सुरक्षा बनाम व्यापार विकृति" तर्क अनिवार्य।
- सब्सिडी पर प्रश्नों में "सब्सिडी हटाना" नहीं, "युक्तिकरण और लक्ष्यीकरण" की भाषा — DBT, पोषक-आधारित।
- भूमि सुधार पर "सफल क्यों" वाले प्रश्न में राजनीतिक-सामाजिक कारकों पर बल दें।
WTO बॉक्स: "लाल-पीला-नीला-हरा" — लाल (निषिद्ध), पीला/Amber (सीमित), नीला (शर्तों के साथ), हरा (अनुमत)।
12. PYQ-आधारित प्रश्न एवं मॉडल उत्तर
भारत की कृषि सब्सिडी को WTO के कृषि समझौते के संदर्भ में परखिए। भारत के हितों की रक्षा कैसे की जा सकती है? (250 शब्द)
मॉडल उत्तर
भूमिका: WTO का कृषि समझौता (1995) घरेलू सहायता को व्यापार-विकृति के आधार पर "बॉक्सों" में बाँटता है — Amber (AMS, सीमित), Blue और Green (सीमा-मुक्त)।
भारत की सब्सिडी का वर्गीकरण: (1) MSP पर ख़रीद (मूल्य समर्थन) — Amber Box; (2) उर्वरक, बिजली, सिंचाई — इनपुट सब्सिडी, पर अनुच्छेद 6.2 के "विकास बॉक्स" में निम्न-आय/संसाधन-विहीन किसानों के लिए छूट; (3) PM-KISAN, अनुसंधान, अवसंरचना — Green Box।
विवाद: AMS की गणना 1986-88 के "बाहरी संदर्भ मूल्य" से — मुद्रास्फीति का समायोजन नहीं, इसलिए भारत का समर्थन कृत्रिम रूप से ऊँचा दिखता है; चावल के लिए भारत ने 10% de minimis सीमा पार होने पर बाली "शांति खंड" (2013) का प्रयोग किया; सार्वजनिक भंडारण का स्थायी समाधान अब तक नहीं (MC13, 2024 में भी नहीं)।
भारत के तर्क: (1) 80 करोड़ से अधिक लोगों की खाद्य सुरक्षा "व्यापार विकृति" नहीं, जीवन का प्रश्न; (2) विकसित देशों की प्रति किसान सहायता कई गुना अधिक, बड़ा हिस्सा Green Box के नाम पर; (3) छोटे किसानों की आजीविका।
हितों की रक्षा: (1) G33 और विकासशील देशों के साथ सार्वजनिक भंडारण पर स्थायी समाधान; (2) संदर्भ मूल्य को मुद्रास्फीति से जोड़ने की माँग; (3) घरेलू सुधार — मूल्य समर्थन से आय समर्थन (Green Box) की ओर क्रमिक बदलाव, DBT; (4) फ़सल विविधीकरण — धान पर निर्भरता कम; (5) निर्यात नीति में स्थिरता — सब्सिडी वाले भंडार के निर्यात पर विवाद से बचना।
निष्कर्ष: भारत का लक्ष्य "नीतिगत स्थान" (policy space) बचाना है, ताकि खाद्य सुरक्षा और किसानों की आय से समझौता न हो।
भारत ने खाद्य अभाव से खाद्य अधिशेष तक की यात्रा कैसे तय की? अब कृषि विविधीकरण की नीतियाँ क्यों आवश्यक हैं? (250 शब्द)
मॉडल उत्तर
अभाव का दौर: 1943 का बंगाल अकाल, 1950-60 के दशक में PL-480 के तहत अमेरिकी गेहूँ पर निर्भरता ("ship-to-mouth"), 1965-66 के सूखे।
अधिशेष तक की यात्रा: (1) हरित क्रांति (1966-67 से) — उच्च उपज वाली किस्में (नॉर्मन बोरलॉग, एम. एस. स्वामीनाथन), उर्वरक, सिंचाई, पंजाब-हरियाणा-पश्चिमी उत्तर प्रदेश; (2) संस्थाएँ — FCI और CACP (1965), MSP और सुनिश्चित ख़रीद; (3) अनुसंधान — ICAR, कृषि विश्वविद्यालय; (4) ऑपरेशन फ़्लड, पीली क्रांति, नीली क्रांति; आज खाद्यान्न उत्पादन 350 मिलियन टन से अधिक, चावल का विश्व का सबसे बड़ा निर्यातक।
विविधीकरण क्यों: (1) पारिस्थितिक — धान-गेहूँ चक्र से भूजल संकट, मृदा क्षरण, पराली जलाना; (2) पोषण — कैलोरी पर्याप्त, पर प्रोटीन-सूक्ष्म पोषक की कमी; (3) आयात निर्भरता — खाद्य तेल (लगभग 55-60%), दालें; (4) आय — उच्च मूल्य फ़सलें, पशुपालन, मत्स्य अधिक आय देते हैं; (5) जलवायु जोखिम — मोटे अनाज और दालें अधिक सहनशील; (6) भंडार का बोझ — मानदंड से अधिक चावल-गेहूँ भंडार।
नीतियाँ: फ़सल विविधीकरण कार्यक्रम (पंजाब-हरियाणा), राष्ट्रीय खाद्य तेल मिशन, दाल आत्मनिर्भरता मिशन, मिलेट मिशन ("श्री अन्न"), MIDH (बागवानी), मत्स्य संपदा, पशुधन मिशन; हरियाणा की "मेरा पानी मेरी विरासत" (धान छोड़ने पर प्रोत्साहन)।
बाधाएँ: MSP-ख़रीद का धान-गेहूँ की ओर झुकाव, अन्य फ़सलों में बाज़ार जोखिम।
निष्कर्ष: हरित क्रांति ने "पर्याप्त भोजन" दिया; अब "सदाबहार क्रांति" (स्वामीनाथन) — पोषक, टिकाऊ और लाभकारी कृषि — की आवश्यकता है।
भारत में बफ़र स्टॉक के उद्देश्यों की चर्चा कीजिए। इसके प्रबंधन से जुड़ी समस्याएँ क्या हैं? (150 शब्द)
मॉडल उत्तर
उद्देश्य: (1) NFSA और अन्य कल्याण योजनाओं के लिए अनाज की निरंतर आपूर्ति; (2) सूखा-बाढ़ जैसी आपात स्थितियों के लिए रणनीतिक भंडार; (3) खुले बाज़ार बिक्री योजना (OMSS) से क़ीमतों का स्थिरीकरण; (4) MSP पर ख़रीद से किसानों को मूल्य समर्थन; (5) निर्यात और मानवीय सहायता।
प्रबंधन: FCI और राज्य एजेंसियाँ (विकेंद्रीकृत ख़रीद); तिमाही-वार बफ़र मानदंड।
समस्याएँ: (1) मानदंड से कहीं अधिक भंडार (विशेषकर चावल) — भंडारण और ब्याज लागत; (2) भंडारण क्षमता की कमी — खुले में (CAP) भंडारण से अनाज की बर्बादी; (3) FCI की ऊँची "आर्थिक लागत" और खाद्य सब्सिडी का भार; (4) ख़रीद कुछ राज्यों में केंद्रित; (5) धान-गेहूँ पर झुकाव; (6) OMSS का समय पर प्रयोग न होना; (7) लीकेज।
सुधार: शांता कुमार समिति (2015) — FCI पुनर्गठन, निजी भंडारण (PEG/साइलो), विकेंद्रीकृत ख़रीद का विस्तार, गोदाम रसीद; गतिशील बफ़र मानदंड; अतिरिक्त भंडार का समय पर निपटान (इथेनॉल, निर्यात, OMSS); दालें-तिलहन-मोटे अनाज का भी भंडार।
भारत के कुछ भागों में भूमि सुधार सफल क्यों रहे, जबकि अन्यत्र विफल? विश्लेषण कीजिए। (250 शब्द)
मॉडल उत्तर
भूमिका: स्वतंत्रता के बाद भूमि सुधार का उद्देश्य था — सामंती संरचना तोड़ना, जोतने वाले को भूमि का स्वामित्व ("land to the tiller"), उत्पादकता और सामाजिक न्याय।
सफलता के उदाहरण: (1) ज़मींदारी उन्मूलन — लगभग पूरे देश में, सबसे सफल चरण; (2) केरल — भूमि सुधार (संशोधन) अधिनियम 1969: काश्तकारों को स्वामित्व, भूमिहीनों को आवास-भूखंड ("कुडिकिडप्पु"); (3) पश्चिम बंगाल — ऑपरेशन बर्गा (1978): लाखों बटाईदारों का पंजीकरण, बेदख़ली से सुरक्षा, उपज में हिस्सा; (4) जम्मू-कश्मीर — 1950 में बड़ी जोतों का बिना मुआवज़ा उन्मूलन; (5) पंजाब-हरियाणा — चकबंदी से उत्पादकता।
सफलता के कारण: (1) राजनीतिक इच्छाशक्ति — वाम और सुधारवादी सरकारें; (2) किसान आंदोलन और संगठन (केरल, बंगाल); (3) पंचायतों और स्थानीय संगठनों की भागीदारी — बटाईदारों की पहचान; (4) सटीक भूमि अभिलेख; (5) सामाजिक सुधार आंदोलनों की पृष्ठभूमि।
अन्यत्र विफलता के कारण: (1) भूस्वामी वर्ग का राजनीतिक प्रभुत्व — क़ानूनों में ढील और देरी; (2) "बेनामी" हस्तांतरण, फ़र्ज़ी विभाजन से हदबंदी से बचाव; (3) मौखिक काश्तकारी — पंजीकरण नहीं, बेदख़ली; (4) अभिलेखों की कमी; (5) न्यायिक मुक़दमेबाज़ी; (6) प्रशासनिक उदासीनता; (7) अधिशेष भूमि का कम वितरण, जो वितरित हुई वह भी अनुपजाऊ।
वर्तमान प्रासंगिकता: भूमि अभिलेख डिजिटलीकरण (DILRMP, ULPIN), काश्तकारों की पहचान और ऋण-बीमा तक पहुँच (मॉडल भूमि पट्टा अधिनियम 2016), महिलाओं के भूमि अधिकार, निर्णायक स्वत्व।
निष्कर्ष: भूमि सुधार "क़ानून" से अधिक "राजनीति और संगठन" का प्रश्न रहा — जहाँ वंचित संगठित थे, वहाँ सुधार सफल हुए।
पोषण सुरक्षा सुनिश्चित करने में मोटे अनाजों (मिलेट्स) की भूमिका की चर्चा कीजिए। (150 शब्द)
मॉडल उत्तर
भूमिका: ज्वार, बाजरा, रागी, कोदो, कुटकी, साँवा जैसे मोटे अनाज ("श्री अन्न") भारत की पारंपरिक खाद्य संस्कृति का हिस्सा हैं; भारत विश्व का सबसे बड़ा उत्पादक है; भारत के प्रस्ताव पर 2023 अंतरराष्ट्रीय मिलेट वर्ष घोषित हुआ।
पोषण में भूमिका: (1) फ़ाइबर, प्रोटीन, आयरन, कैल्शियम (रागी में विशेष रूप से अधिक), ज़िंक की प्रचुरता — रक्ताल्पता और कुपोषण से लड़ाई; (2) कम ग्लाइसेमिक इंडेक्स — मधुमेह और जीवनशैली रोगों में लाभकारी; (3) ग्लूटेन-मुक्त; (4) "छिपी भूख" (सूक्ष्म पोषक कमी) का समाधान।
जलवायु और कृषि लाभ: कम पानी, कम उर्वरक, सूखा और ऊँचा तापमान सहन करने की क्षमता, शुष्क क्षेत्रों के छोटे किसानों के लिए उपयुक्त, मृदा स्वास्थ्य।
पहलें: PDS, मध्याह्न भोजन और आँगनवाड़ी में मोटे अनाज, ओडिशा मिलेट मिशन (2017), भारतीय मिलेट अनुसंधान संस्थान (हैदराबाद) को वैश्विक उत्कृष्टता केंद्र, MSP, PLI में मिलेट-आधारित उत्पाद।
चुनौतियाँ: कम उत्पादकता, प्रसंस्करण (छिलका उतारना) कठिन, शहरी माँग और बाज़ार की कमी, ख़रीद व्यवस्था सीमित।
निष्कर्ष: मोटे अनाज "पोषण, जलवायु और किसान" — तीनों के लिए "स्मार्ट भोजन" हैं।
खाद्य प्रसंस्करण उद्योग रोज़गार सृजन में किस प्रकार योगदान दे सकता है? इसके विकास में बाधाएँ क्या हैं? (150 शब्द)
मॉडल उत्तर
रोज़गार में योगदान: (1) संगठित विनिर्माण में सबसे बड़े रोज़गारदाताओं में (उद्योगों का वार्षिक सर्वेक्षण — ASI); (2) श्रम-गहन — छँटाई, ग्रेडिंग, पैकेजिंग में ग्रामीण महिलाओं को काम; (3) ग्रामीण क्षेत्रों में उद्योग — प्रवासन में कमी; (4) "पिछड़े संबंध" (backward linkages) — अनुबंध खेती, संग्रह केंद्र, परिवहन; "अगले संबंध" (forward linkages) — खुदरा, निर्यात, लॉजिस्टिक्स; (5) सूक्ष्म उद्यम — PM-FME (2020) के तहत "एक ज़िला एक उत्पाद" आधार पर SHG और FPO इकाइयाँ।
बाधाएँ: (1) फल-सब्ज़ियों में प्रसंस्करण का स्तर कम; (2) कोल्ड चेन और गुणवत्तापूर्ण कच्चे माल की कमी; (3) असंगठित सूक्ष्म इकाइयाँ — तकनीक, ऋण, ब्रांडिंग की कमी; (4) FSSAI मानकों और निर्यात प्रमाणन का अनुपालन; (5) कृषि उत्पादों पर नीतिगत अनिश्चितता (भंडारण सीमा, निर्यात प्रतिबंध); (6) बिजली और लॉजिस्टिक्स लागत।
उपाय: PMKSY, PLI (2021), मेगा फ़ूड पार्क का बेहतर उपयोग, क्लस्टर-आधारित विकास, FPO-प्रसंस्करण संबंध, प्रशिक्षण, निर्यात ब्रांडिंग।
शीघ्र नष्ट होने वाली फ़सलों के प्रसंस्करण और भंडारण में जैव-प्रौद्योगिकी की भूमिका की चर्चा कीजिए। (150 शब्द)
मॉडल उत्तर
समस्या: फल, सब्ज़ियाँ, दूध, मछली जैसी शीघ्र नष्ट होने वाली वस्तुओं में फ़सल-उपरांत हानि सबसे अधिक — कोल्ड चेन की कमी और जैविक क्षय।
जैव-प्रौद्योगिकी के अनुप्रयोग: (1) पकने में देरी — एथिलीन उत्पादन या उसकी प्रतिक्रिया को नियंत्रित करने वाली आनुवंशिक तकनीकें (विश्व में देर से पकने वाले टमाटर का उदाहरण), जीन संपादन (CRISPR) से भूरापन न होने वाली किस्में; भारत में SDN-1/2 जीन संपादित पौधों को GM नियमों से छूट (2022); (2) जैव-परिरक्षण — लैक्टिक एसिड बैक्टीरिया, बैक्टीरियोसिन (निसिन) से प्राकृतिक परिरक्षक; (3) खाद्य कोटिंग — जैविक, खाने योग्य परतें जो नमी-हानि और सड़न रोकें; (4) एंज़ाइम — रस निकालने, स्पष्टीकरण, गुणवत्ता में; (5) किण्वन — अचार, दही, मूल्य संवर्धित उत्पाद; (6) जैव-नियंत्रण — फफूँदी रोकने वाले सूक्ष्मजीव; (7) नैदानिक किट — विषाक्त पदार्थों और रोगाणुओं की त्वरित जाँच; (8) विकिरण (BARC) जैसी संबद्ध तकनीकें — भंडारण अवधि बढ़ाना।
नीतिगत समर्थन: BioE3 नीति (2024) — जैव-आधारित विनिर्माण, कार्यात्मक खाद्य; जैव-प्रौद्योगिकी विभाग और BIRAC।
चुनौतियाँ: जैव-सुरक्षा और उपभोक्ता स्वीकृति, नियामक स्पष्टता, लागत, छोटे किसानों तक पहुँच।
निष्कर्ष: जैव-प्रौद्योगिकी "कोल्ड चेन का पूरक" बनकर हानि घटा सकती है और किसान की आय बढ़ा सकती है।
MSP को क़ानूनी गारंटी देने की माँग के पक्ष और विपक्ष में तर्कों का परीक्षण कीजिए। (250 शब्द)
मॉडल उत्तर
पृष्ठभूमि: MSP 22 फ़सलों के लिए घोषित होता है, पर इसका कोई क़ानूनी अधिकार नहीं; प्रभावी ख़रीद मुख्यतः धान-गेहूँ की और कुछ राज्यों में ही, इसलिए अधिकांश किसानों को MSP का लाभ नहीं मिलता। 2020-21 के किसान आंदोलन के बाद क़ानूनी गारंटी की माँग प्रमुख हुई।
पक्ष में तर्क: (1) किसानों को मूल्य जोखिम से सुरक्षा — मजबूरन बिक्री (distress sale) रुकेगी; (2) सभी राज्यों और फ़सलों के किसानों के साथ समानता; (3) दालें-तिलहन जैसी विविध फ़सलों की ओर बदलाव को प्रोत्साहन; (4) किसान आय और ग्रामीण माँग में स्थिरता; (5) स्वामीनाथन आयोग की भावना।
विपक्ष में तर्क: (1) राजकोषीय बोझ — सभी फ़सलों की MSP पर ख़रीद या मूल्य-अंतर भुगतान बहुत महँगा; (2) बाज़ार विकृति — निजी व्यापारी MSP से नीचे ख़रीद नहीं कर पाएँगे, गुणवत्ता न होने पर ख़रीद रुकेगी; (3) मुद्रास्फीति और प्रसंस्करण उद्योग की लागत; (4) WTO — Amber Box की सीमा; (5) भंडारण — अतिरिक्त अनाज का क्या होगा; (6) धान-गेहूँ जैसी फ़सलों में अति-उत्पादन और पर्यावरणीय क्षति बढ़ सकती है; (7) कार्यान्वयन — लाखों गाँवों में ख़रीद ढाँचा।
मध्य मार्ग: (1) मूल्य-कमी भुगतान (मध्य प्रदेश की भावांतर योजना जैसा) — बाज़ार मूल्य और MSP के अंतर का भुगतान, चयनित फ़सलों के लिए; (2) PM-AASHA का विस्तार; (3) दालें-तिलहन-मोटे अनाज की सुनिश्चित ख़रीद (राज्य एजेंसियाँ, NAFED); (4) FPO और e-NAM से बाज़ार मूल्य सुधार; (5) आय समर्थन (Green Box) की ओर बदलाव; (6) फ़सल बीमा और भंडारण-आधारित ऋण।
निष्कर्ष: लक्ष्य किसान की "आय सुरक्षा" है — इसके लिए सार्वभौमिक क़ानूनी MSP की जगह विविध, लक्षित और राजकोषीय रूप से टिकाऊ उपकरणों का मिश्रण अधिक व्यावहारिक है।
पशुपालन और डेयरी क्षेत्र छोटे किसानों की आय का "बीमा" क्यों माने जाते हैं? इस क्षेत्र की चुनौतियाँ बताइए। (150 शब्द)
मॉडल उत्तर
महत्व: भारत विश्व का सबसे बड़ा दुग्ध उत्पादक है (ऑपरेशन फ़्लड, 1970 — वर्गीज़ कुरियन); पशुधन क्षेत्र कृषि GVA में हिस्सा लगातार बढ़ा रहा है और फ़सल क्षेत्र से तेज़ी से बढ़ा है। अधिकांश पशुधन छोटे, सीमांत और भूमिहीन परिवारों के पास है, और महिलाएँ इस कार्य की मुख्य वाहक हैं।
"बीमा" क्यों: (1) दूध से दैनिक/साप्ताहिक नक़द आय — फ़सल आय मौसमी; (2) सूखे-फ़सल हानि में आय का स्थिर स्रोत; (3) पशु "चलती-फिरती बचत" — आपात में बिक्री; (4) गोबर से खाद और बायोगैस; (5) पोषण (दूध, अंडा, मांस)।
चुनौतियाँ: (1) प्रति पशु कम उत्पादकता; (2) चारे और पशु-आहार की कमी; (3) रोग — खुरपका-मुँहपका, लम्पी स्किन रोग (2022); (4) पशु चिकित्सा सेवाओं की कमी; (5) संगठित विपणन का सीमित दायरा (सहकारिताएँ कुछ राज्यों में मज़बूत); (6) आवारा पशुओं की समस्या; (7) जलवायु — ऊष्मा तनाव, मीथेन उत्सर्जन।
योजनाएँ: राष्ट्रीय गोकुल मिशन (देशी नस्लें), राष्ट्रीय पशुधन मिशन, राष्ट्रीय पशु रोग नियंत्रण कार्यक्रम (टीकाकरण), पशुपालन अवसंरचना विकास कोष, पशुपालकों के लिए किसान क्रेडिट कार्ड।
निष्कर्ष: पशुपालन को "सहायक" नहीं, कृषि आय के "मुख्य स्तंभ" के रूप में नीति-ध्यान चाहिए।
13. Quick Revision Summary
- सब्सिडी: प्रत्यक्ष (PM-KISAN) + अप्रत्यक्ष (उर्वरक, बिजली); MSP — 22 फ़सलें, ख़रीद सीमित।
- WTO: बॉक्स व्यवस्था; AMS की पुरानी गणना; शांति खंड; स्थायी समाधान लंबित।
- PDS-NFSA-PMGKAY; बफ़र मानदंड से अधिक भंडार; FCI सुधार।
- खाद्य अभाव → अधिशेष (हरित क्रांति) → अब विविधीकरण और पोषण।
- खाद्य प्रसंस्करण: रोज़गार और हानि-नियंत्रण; जैव-प्रौद्योगिकी का योगदान।
- भूमि सुधार: केरल, बंगाल, J&K सफल — राजनीतिक इच्छाशक्ति और संगठन।
- मोटे अनाज और पशुपालन — पोषण, जलवायु और आय सुरक्षा।