1. अध्याय एक नज़र में
बिहार पुलिस SI मुख्य परीक्षा का पेपर 1 (सामान्य हिंदी) 100 प्रश्नों और 200 अंकों का क्वालीफ़ाइंग पेपर है — इसमें कम से कम 30% अंक लाना अनिवार्य है, वरना पेपर 2 (सामान्य अध्ययन) की जाँच ही नहीं होगी। इसलिए हिंदी को हल्के में न लें। इस अध्याय में हिंदी व्याकरण की नींव — वर्ण विचार, संधि, समास, उपसर्ग और प्रत्यय — पढ़ेंगे। इन चारों से हर पेपर में लगभग 15 से 20 प्रश्न आते हैं।
- स्वर-व्यंजन का वर्गीकरण, उच्चारण स्थान (कंठ्य, तालव्य आदि), अल्पप्राण-महाप्राण।
- संधि-विच्छेद और संधि का प्रकार पहचानना (दीर्घ, गुण, वृद्धि, यण, अयादि; व्यंजन; विसर्ग)।
- समस्त पद का विग्रह और समास का भेद (अव्ययीभाव, तत्पुरुष, कर्मधारय, द्विगु, द्वंद्व, बहुव्रीहि)।
- शब्द में उपसर्ग या प्रत्यय पहचानना; कृत और तद्धित प्रत्यय।
2. वर्ण विचार
वर्ण भाषा की सबसे छोटी ध्वनि इकाई है, जिसके और टुकड़े नहीं किए जा सकते (जैसे अ, क्, म्)। वर्णों के व्यवस्थित समूह को वर्णमाला कहते हैं। हिंदी की लिपि देवनागरी है, जो बाएँ से दाएँ लिखी जाती है। मानक हिंदी वर्णमाला में सामान्यतः 11 स्वर और 33 मूल व्यंजन माने जाते हैं; इसके अलावा 4 संयुक्त व्यंजन (क्ष, त्र, ज्ञ, श्र), 2 उत्क्षिप्त (ड़, ढ़), अयोगवाह (अं, अः) आदि भी आते हैं।
स्वर — जिन वर्णों का उच्चारण बिना किसी दूसरे वर्ण की सहायता के होता है (अ, आ, इ, ई, उ, ऊ, ऋ, ए, ऐ, ओ, औ)। व्यंजन — जिनका उच्चारण स्वर की सहायता से होता है (क = क् + अ)।
स्वरों का वर्गीकरण
- मात्रा/उच्चारण काल के आधार पर — ह्रस्व स्वर (एक मात्रा; अ, इ, उ, ऋ), दीर्घ स्वर (दो मात्रा; आ, ई, ऊ, ए, ऐ, ओ, औ), प्लुत स्वर (तीन मात्रा; पुकारने में — ओ३म्, हे राम३)।
- मूल स्वर — अ, इ, उ, ऋ; संधि स्वर — बाकी (दो स्वरों के मेल से)। संयुक्त स्वर — ए, ऐ, ओ, औ (ए = अ + इ, ऐ = अ + ए, ओ = अ + उ, औ = अ + ओ)।
- ओष्ठों की आकृति के आधार पर — वृत्ताकार (उ, ऊ, ओ, औ), अवृत्ताकार (अ, आ, इ, ई, ए, ऐ)।
- अयोगवाह — अनुस्वार (अं) और विसर्ग (अः); ये न पूर्णतः स्वर हैं न व्यंजन। अनुनासिक — चंद्रबिंदु (ँ) — जैसे हँस, चाँद।
व्यंजनों का वर्गीकरण
| वर्ग | व्यंजन | उच्चारण स्थान | नाम |
|---|---|---|---|
| क वर्ग | क ख ग घ ङ | कंठ | कंठ्य |
| च वर्ग | च छ ज झ ञ | तालु | तालव्य |
| ट वर्ग | ट ठ ड ढ ण | मूर्धा | मूर्धन्य |
| त वर्ग | त थ द ध न | दाँत | दंत्य |
| प वर्ग | प फ ब भ म | होंठ | ओष्ठ्य |
| अंतःस्थ | य र ल व | — | अर्धस्वर (य, व); र — लुंठित; ल — पार्श्विक |
| ऊष्म | श ष स ह | श-तालव्य, ष-मूर्धन्य, स-दंत्य, ह-कंठ्य | संघर्षी |
- स्पर्श व्यंजन — क से म तक 25 (पाँच वर्ग)। हर वर्ग का पाँचवाँ वर्ण नासिक्य (ङ, ञ, ण, न, म)।
- अल्पप्राण — कम वायु; हर वर्ग का पहला, तीसरा, पाँचवाँ वर्ण + अंतःस्थ (क, ग, ङ, च, ज, ञ ...)। महाप्राण — अधिक वायु; हर वर्ग का दूसरा, चौथा वर्ण + ऊष्म (ख, घ, छ, झ ... श, ष, स, ह)।
- अघोष — स्वरतंत्रियों में कंपन नहीं; हर वर्ग का पहला, दूसरा वर्ण + श, ष, स। सघोष (घोष) — कंपन होता है; हर वर्ग का तीसरा, चौथा, पाँचवाँ वर्ण + य, र, ल, व, ह + सभी स्वर।
- दंतोष्ठ्य — व और फ़। "ऋ" का उच्चारण स्थान मूर्धा। "ए, ऐ" — कंठ-तालव्य; "ओ, औ" — कंठोष्ठ्य।
3. संधि
दो निकटवर्ती वर्णों के मेल से जो विकार (परिवर्तन) होता है, उसे संधि कहते हैं। जैसे — विद्या + आलय = विद्यालय (आ + आ = आ)। संधि किए गए शब्द को अलग करना संधि-विच्छेद कहलाता है। संधि के तीन भेद हैं — स्वर संधि, व्यंजन संधि, विसर्ग संधि।
(क) स्वर संधि — पाँच भेद
| भेद | नियम | उदाहरण |
|---|---|---|
| दीर्घ संधि | समान स्वर मिलकर दीर्घ: अ/आ + अ/आ = आ; इ/ई + इ/ई = ई; उ/ऊ + उ/ऊ = ऊ | हिम + आलय = हिमालय; रवि + इंद्र = रवींद्र; गिरि + ईश = गिरीश; भानु + उदय = भानूदय; वधू + उत्सव = वधूत्सव |
| गुण संधि | अ/आ + इ/ई = ए; अ/आ + उ/ऊ = ओ; अ/आ + ऋ = अर् | देव + इंद्र = देवेंद्र; महा + ईश = महेश; सूर्य + उदय = सूर्योदय; महा + उत्सव = महोत्सव; महा + ऋषि = महर्षि |
| वृद्धि संधि | अ/आ + ए/ऐ = ऐ; अ/आ + ओ/औ = औ | एक + एक = एकैक; सदा + एव = सदैव; मत + ऐक्य = मतैक्य; वन + औषधि = वनौषधि; महा + औषध = महौषध |
| यण संधि | इ/ई + भिन्न स्वर = य्; उ/ऊ + भिन्न स्वर = व्; ऋ + भिन्न स्वर = र् | इति + आदि = इत्यादि; यदि + अपि = यद्यपि; प्रति + एक = प्रत्येक; सु + आगत = स्वागत; अनु + एषण = अन्वेषण; पितृ + आज्ञा = पित्राज्ञा |
| अयादि संधि | ए/ऐ/ओ/औ + भिन्न स्वर = अय्/आय्/अव्/आव् | ने + अन = नयन; गै + अक = गायक; पो + अन = पवन; पौ + अक = पावक; नौ + इक = नाविक |
- शब्द में "्य" या "्व" (आधा य/व) दिखे — जैसे इत्यादि, स्वागत — तो प्रायः यण संधि।
- "य/व" पूरे दिखें और पहले खंड में ए/ऐ/ओ/औ हो — जैसे नयन, पवन — तो अयादि।
- "े" या "ो" की मात्रा जोड़ पर — गुण; "ै" या "ौ" — वृद्धि।
- जोड़ पर दीर्घ मात्रा (ा, ी, ू) — दीर्घ।
(ख) व्यंजन संधि — प्रमुख नियम
- वर्ग का पहला वर्ण + स्वर या सघोष वर्ण → वर्ग का तीसरा वर्ण: दिक् + अंबर = दिगंबर; वाक् + ईश = वागीश; सत् + आचार = सदाचार; अच् + अंत = अजंत; षट् + आनन = षडानन; जगत् + ईश = जगदीश।
- वर्ग का पहला वर्ण + न/म → वर्ग का पाँचवाँ वर्ण: वाक् + मय = वाङ्मय; जगत् + नाथ = जगन्नाथ; उत् + नति = उन्नति; सत् + मार्ग = सन्मार्ग।
- त् + च/छ = च्च/च्छ: उत् + चारण = उच्चारण; सत् + चरित्र = सच्चरित्र। त् + ज = ज्ज: सत् + जन = सज्जन। त् + ल = ल्ल: उत् + लास = उल्लास। त् + श = च्छ: उत् + श्वास = उच्छ्वास। त् + ह = द्ध: उत् + हार = उद्धार।
- म् + क से म तक का कोई वर्ण → अनुस्वार या उसी वर्ग का पंचम वर्ण: सम् + कल्प = संकल्प; सम् + तोष = संतोष। म् + य/र/ल/व/श/ष/स/ह → अनुस्वार: सम् + सार = संसार; सम् + योग = संयोग।
- स्वर + छ → च्छ: वि + छेद = विच्छेद; परि + छेद = परिच्छेद।
- ऋ, र, ष के बाद "न" आए और बीच में कोई विशेष व्यवधान न हो तो "न" → "ण": परि + नाम = परिणाम; राम + अयन = रामायण; प्र + मान = प्रमाण।
- स से पहले अ/आ के अलावा कोई स्वर हो तो स → ष: अभि + सेक = अभिषेक; वि + सम = विषम; नि + सिद्ध = निषिद्ध।
(ग) विसर्ग संधि — प्रमुख नियम
- विसर्ग से पहले अ और बाद में अ या सघोष व्यंजन → ओ: मनः + योग = मनोयोग; यशः + दा = यशोदा; मनः + बल = मनोबल; अधः + गति = अधोगति; सरः + ज = सरोज।
- विसर्ग से पहले इ/उ और बाद में सघोष → र्: निः + आशा = निराशा; दुः + उपयोग = दुरुपयोग; निः + धन = निर्धन; दुः + गुण = दुर्गुण; आशीः + वाद = आशीर्वाद।
- विसर्ग + च/छ → श्; ट/ठ → ष्; त/थ → स्: निः + चल = निश्चल; धनुः + टंकार = धनुष्टंकार; नमः + ते = नमस्ते; दुः + शासन = दुश्शासन।
- विसर्ग से पहले इ/उ और बाद में क/प → ष्: निः + कपट = निष्कपट; दुः + कर = दुष्कर; निः + फल = निष्फल।
- निः/दुः + र → र का लोप, पूर्व स्वर दीर्घ: निः + रोग = नीरोग; निः + रस = नीरस।
- अपवाद — विसर्ग में कोई परिवर्तन नहीं: अंतः + करण = अंतःकरण; प्रातः + काल = प्रातःकाल; पुनः + अपि = पुनरपि (र् बनता है)।
विद्यालय = विद्या + आलय (दीर्घ) · परमेश्वर = परम + ईश्वर (गुण) · सदैव = सदा + एव (वृद्धि) · अत्यधिक = अति + अधिक (यण) · पवित्र = पो + इत्र (अयादि) · उल्लास = उत् + लास (व्यंजन) · मनोरथ = मनः + रथ (विसर्ग) · निर्जन = निः + जन (विसर्ग) · संसार = सम् + सार (व्यंजन) · महोदय = महा + उदय (गुण)
4. समास
दो या अधिक शब्दों को मिलाकर, बीच के विभक्ति चिह्नों या योजक शब्दों को हटाकर एक नया छोटा शब्द बनाना समास है। बना हुआ शब्द समस्त पद और उसे अलग करना विग्रह कहलाता है। पहला पद पूर्वपद और दूसरा उत्तरपद। समास में शब्द मिलते हैं, संधि में वर्ण — यही दोनों का मूल अंतर है।
| समास | पहचान (प्रधान पद) | उदाहरण और विग्रह |
|---|---|---|
| अव्ययीभाव | पूर्वपद प्रधान और अव्यय; पूरा पद क्रिया-विशेषण का काम करता है | यथाशक्ति (शक्ति के अनुसार), प्रतिदिन (हर दिन), आजन्म (जन्म से लेकर), भरपेट (पेट भरकर), निडर, बेखटके, घर-घर, हाथोंहाथ |
| तत्पुरुष | उत्तरपद प्रधान; बीच की विभक्ति (कर्ता और संबोधन छोड़कर) लुप्त | राजपुत्र (राजा का पुत्र — संबंध), रसोईघर (रसोई के लिए घर — संप्रदान), हस्तलिखित (हाथ से लिखित — करण), देशनिकाला (देश से निकाला — अपादान), ग्रामवास (ग्राम में वास — अधिकरण), स्वर्गप्राप्त (स्वर्ग को प्राप्त — कर्म) |
| कर्मधारय | उत्तरपद प्रधान; विशेषण-विशेष्य या उपमान-उपमेय संबंध | नीलकमल (नीला है जो कमल), महात्मा (महान है जो आत्मा), चंद्रमुख (चंद्र के समान मुख), कमलनयन (कमल के समान नयन), पीतांबर (पीला है जो अंबर) |
| द्विगु | पूर्वपद संख्यावाचक; समूह का बोध | चौराहा (चार राहों का समूह), त्रिभुवन (तीन भुवनों का समूह), नवरत्न, पंचवटी, सप्ताह, शताब्दी, दोपहर |
| द्वंद्व | दोनों पद प्रधान; विग्रह में "और / या / अथवा"; प्रायः योजक चिह्न (-) | माता-पिता (माता और पिता), राम-लक्ष्मण, दाल-भात, पाप-पुण्य (पाप या पुण्य), ऊँच-नीच, अन्न-जल |
| बहुव्रीहि | कोई पद प्रधान नहीं; दोनों मिलकर किसी तीसरे (अन्य) अर्थ की ओर संकेत | लंबोदर (लंबा है उदर जिसका — गणेश), दशानन (दस हैं आनन जिसके — रावण), चक्रपाणि (चक्र है पाणि में जिसके — विष्णु), नीलकंठ (नीला है कंठ जिसका — शिव), पीतांबर (पीले हैं वस्त्र जिसके — कृष्ण), गजानन, चतुर्भुज (विष्णु) |
कुछ शब्द विग्रह के अनुसार अलग समास बनते हैं: नीलकंठ — "नीला है जो कंठ" = कर्मधारय; "नीला है कंठ जिसका अर्थात् शिव" = बहुव्रीहि। पीतांबर — "पीला वस्त्र" = कर्मधारय; "पीले वस्त्र वाले कृष्ण" = बहुव्रीहि। चतुर्भुज — "चार भुजाओं का समूह" (ज्यामिति आकृति) = द्विगु; "चार भुजाएँ हैं जिसकी अर्थात् विष्णु" = बहुव्रीहि। प्रश्न में दिए विग्रह को ध्यान से पढ़ें — विग्रह में "जिसका/जिसके/जिसकी" और किसी विशेष व्यक्ति का नाम हो तो बहुव्रीहि।
5. उपसर्ग
जो शब्दांश किसी शब्द के आरंभ में जुड़कर उसके अर्थ में परिवर्तन या विशेषता लाते हैं, उन्हें उपसर्ग कहते हैं। जैसे — "हार" में "प्र" जोड़ने पर "प्रहार", "वि" जोड़ने पर "विहार", "सम्" जोड़ने पर "संहार"। उपसर्ग स्वतंत्र रूप से प्रयोग नहीं होते।
| प्रकार | उपसर्ग (अर्थ) | उदाहरण |
|---|---|---|
| संस्कृत (तत्सम) — 22 | अति (अधिक), अधि (ऊपर), अनु (पीछे), अप (बुरा/विरुद्ध), अभि (सामने), अव (हीन), आ (तक), उत्/उद् (ऊपर), उप (निकट), दुर्/दुस् (बुरा), नि (निषेध/भीतर), निर्/निस् (बिना), परा (उलटा), परि (चारों ओर), प्र (आगे/अधिक), प्रति (विरुद्ध/हर), वि (विशेष/अलग), सम् (अच्छी तरह), सु (अच्छा) | अत्यधिक, अधिकार, अनुज, अपमान, अभियान, अवगुण, आजीवन, उत्थान, उपवन, दुर्गुण, निवास, निर्धन, पराजय, परिक्रमा, प्रगति, प्रतिदिन, विज्ञान, संयोग, सुपुत्र |
| हिंदी (तद्भव) | अ/अन (नहीं), अध (आधा), उन (एक कम), औ/अव (हीन), दु (बुरा), नि (रहित), भर (पूरा), कु (बुरा), स/सु (अच्छा) | अछूता, अनजान, अधपका, उन्नीस, औगुन, दुबला, निडर, भरपेट, कपूत, सपूत |
| उर्दू-फ़ारसी | बे (बिना), ला (नहीं), ना (नहीं), गैर (भिन्न), बद (बुरा), खुश (अच्छा), हम (साथ), कम (थोड़ा), बा (सहित), सर (मुख्य), हर (प्रत्येक) | बेईमान, लापता, नापसंद, गैरहाज़िर, बदनाम, खुशबू, हमदर्द, कमज़ोर, बाकायदा, सरपंच, हरदिन |
एक शब्द में दो उपसर्ग भी हो सकते हैं: निराकरण = निर् + आ + करण; अनुपयोग = अन् + उप + योग; सुसंगठित = सु + सम् + गठित। "अभ्यागत" में उपसर्ग "अभि" और "आ" दोनों हैं।
6. प्रत्यय
जो शब्दांश किसी शब्द के अंत में जुड़कर नए शब्द बनाते हैं, उन्हें प्रत्यय कहते हैं। प्रत्यय के दो मुख्य भेद हैं — कृत प्रत्यय (क्रिया की धातु के अंत में; बने शब्द को "कृदंत" कहते हैं) और तद्धित प्रत्यय (संज्ञा, सर्वनाम, विशेषण के अंत में; बने शब्द को "तद्धितांत")।
| प्रकार | प्रत्यय | उदाहरण |
|---|---|---|
| कृत — कर्तृवाचक | -अक, -वाला, -हार, -इया, -ऐया, -ता | पाठक, गायक, पढ़नेवाला, राखनहार, लुटिया, गवैया, दाता |
| कृत — भाववाचक | -आई, -आवट, -आन, -ई, -न, -ना | पढ़ाई, लिखावट, थकान, हँसी, चलन, लिखना |
| कृत — करणवाचक | -ना, -नी, -औना | बेलना, ओढ़नी, खिलौना |
| कृत — विशेषण | -आऊ, -ता, -इत | बिकाऊ, टिकाऊ, बहता, लिखित, पठित |
| तद्धित — भाववाचक | -ता, -त्व, -पन, -आई, -आस, -इमा | मानवता, बंधुत्व, बचपन, अच्छाई, मिठास, लालिमा |
| तद्धित — कर्तृवाचक | -कार, -इया, -ई, -एरा, -दार | चित्रकार, दुखिया, तेली, लुटेरा, दुकानदार |
| तद्धित — विशेषण | -इक, -ईय, -ई, -ईला, -वान, -मान, -इत | धार्मिक, भारतीय, शहरी, रंगीला, धनवान, बुद्धिमान, पुष्पित |
| तद्धित — ऊनवाचक (लघुता) | -इया, -ई, -ड़ी, -ओला | खटिया, टोकरी, पगड़ी, खटोला |
"इक" प्रत्यय लगने पर पहले स्वर की वृद्धि होती है: धर्म → धार्मिक, समाज → सामाजिक, इतिहास → ऐतिहासिक, भूगोल → भौगोलिक, सप्ताह → साप्ताहिक, नीति → नैतिक, वेद → वैदिक। "ऐतिहासिक" में मूल शब्द "इतिहास" है, "ऐतिहास" नहीं।
7. मास्टर सारणी — नियम एक नज़र में (Master Rule Table)
| विषय | मुख्य नियम / सूत्र | उदाहरण |
|---|---|---|
| दीर्घ संधि | सवर्ण स्वर → दीर्घ | हिमालय, रवींद्र |
| गुण संधि | अ + इ = ए, अ + उ = ओ, अ + ऋ = अर् | देवेंद्र, सूर्योदय, महर्षि |
| वृद्धि संधि | अ + ए = ऐ, अ + ओ = औ | सदैव, वनौषधि |
| यण संधि | इ → य्, उ → व्, ऋ → र् | इत्यादि, स्वागत, पित्राज्ञा |
| अयादि संधि | ए → अय्, ऐ → आय्, ओ → अव्, औ → आव् | नयन, गायक, पवन, पावक |
| व्यंजन संधि | पहला वर्ण → तीसरा/पाँचवाँ; त् → च्च/ज्ज/ल्ल/द्ध | दिगंबर, जगन्नाथ, उल्लास, उद्धार |
| विसर्ग संधि | अः → ओ; इः/उः → र्; विसर्ग → श्/ष्/स् | मनोबल, निराशा, निश्चल, नमस्ते |
| अव्ययीभाव | पूर्वपद अव्यय, प्रधान | यथाशक्ति, प्रतिदिन |
| तत्पुरुष | उत्तरपद प्रधान, विभक्ति लुप्त | राजपुत्र, रसोईघर |
| कर्मधारय | विशेषण-विशेष्य / उपमान-उपमेय | नीलकमल, चंद्रमुख |
| द्विगु | पूर्वपद संख्या | चौराहा, त्रिभुवन |
| द्वंद्व | दोनों पद प्रधान, "और/या" | माता-पिता, पाप-पुण्य |
| बहुव्रीहि | तीसरा अर्थ प्रधान | लंबोदर, दशानन |
| उपसर्ग | शब्द के आगे | प्रहार, बेईमान |
| प्रत्यय | शब्द के पीछे; कृत (धातु) / तद्धित (संज्ञा आदि) | पाठक / मानवता |
8. माइंड मैप
- स्वर — ह्रस्व, दीर्घ, प्लुत
- व्यंजन — स्पर्श, अंतःस्थ, ऊष्म
- अल्पप्राण-महाप्राण
- घोष-अघोष
- स्वर — 5 भेद
- व्यंजन
- विसर्ग
- अव्ययीभाव
- तत्पुरुष, कर्मधारय, द्विगु
- द्वंद्व
- बहुव्रीहि
- उपसर्ग — संस्कृत, हिंदी, उर्दू
- कृत प्रत्यय
- तद्धित प्रत्यय
9. टिप्स एवं ट्रिक्स
- संधि-विच्छेद के विकल्पों में पहले देखें कि दोनों खंड सार्थक शब्द हैं या नहीं — निरर्थक खंड वाला विकल्प तुरंत हटाएँ।
- विकल्प को वापस जोड़कर देखें — क्या वही शब्द बनता है? "सूर्योदय" के लिए "सूर्य + उदय" जोड़ें: अ + उ = ओ ✓।
- समास में विग्रह के शब्द देखें: "और" → द्वंद्व; "का समूह" → द्विगु; "जिसका/जिसके" + नाम → बहुव्रीहि; "के समान" या "है जो" → कर्मधारय।
- उपसर्ग-प्रत्यय वाले प्रश्न में मूल शब्द पहले पहचानें, फिर आगे का भाग उपसर्ग और पीछे का प्रत्यय।
- "संसार" में उपसर्ग "सम्" है और संधि व्यंजन संधि है — "सं" लिखा देखकर उलझें नहीं।
- "पवित्र" अयादि संधि है (पो + इत्र), गुण नहीं।
- "नीरोग" सही है, "निरोग" भी प्रचलित है पर संधि के नियम से "निः + रोग = नीरोग"।
- "ऋ" स्वर है, व्यंजन नहीं; "क्ष, त्र, ज्ञ" संयुक्त व्यंजन हैं।
10. महत्वपूर्ण वन-लाइनर
- हिंदी की लिपि देवनागरी है।
- हर वर्ग का पाँचवाँ वर्ण नासिक्य होता है।
- "व" दंतोष्ठ्य वर्ण है।
- अनुस्वार और विसर्ग को अयोगवाह कहते हैं।
- प्लुत स्वर में तीन मात्राओं का समय लगता है।
- संधि में वर्णों का और समास में शब्दों का मेल होता है।
- "महर्षि" में गुण संधि है।
- "स्वागत" में यण संधि है।
- "नायक" (नै + अक) में अयादि संधि है।
- "मनोबल" में विसर्ग संधि है।
- द्विगु समास का पूर्वपद संख्यावाचक होता है।
- बहुव्रीहि में कोई भी पद प्रधान नहीं होता।
- "यथाशक्ति" अव्ययीभाव समास है।
- संस्कृत के उपसर्गों की संख्या 22 मानी जाती है।
- धातु के अंत में लगने वाले प्रत्यय कृत प्रत्यय कहलाते हैं।
- "ऐतिहासिक" में "इक" तद्धित प्रत्यय है।
11. PYQ आधारित प्रश्न — विस्तृत उत्तर सहित
"सूर्योदय" का सही संधि-विच्छेद है —
- सूर्य + ओदय
- सूर्य + उदय
- सूर्यो + दय
- सूर + उदय
उत्तर एवं व्याख्या
सूर्य (अ) + उदय (उ) = अ + उ = ओ → सूर्योदय; यह गुण संधि है। "ओदय" और "दय" सार्थक शब्द नहीं हैं, और "सूर" से "सूर्य" नहीं बनता।
उत्तर: (B) सूर्य + उदय
"इत्यादि" में कौन-सी संधि है?
- दीर्घ
- गुण
- यण
- वृद्धि
उत्तर एवं व्याख्या
इति + आदि: "इ" के बाद भिन्न स्वर "आ" आया, तो "इ" का "य्" हो गया → इत्यादि। यह यण संधि है; पहचान — जोड़ पर आधा "य" (त्य)। दीर्घ में समान स्वर, गुण में ए/ओ और वृद्धि में ऐ/औ बनते हैं।
उत्तर: (C) यण
"निराशा" का संधि-विच्छेद क्या है?
- नि + आशा
- निर + आशा
- निः + आशा
- नी + राशा
उत्तर एवं व्याख्या
निः + आशा: विसर्ग से पहले "इ" और बाद में स्वर "आ" है, इसलिए विसर्ग "र्" में बदल जाता है → निराशा; यह विसर्ग संधि है। "नि + आशा" से "न्याशा" (यण) बनता, और "निर" कोई उपसर्ग रूप नहीं है।
उत्तर: (C) निः + आशा
"दशानन" में कौन-सा समास है, यदि इसका अर्थ रावण हो?
- द्विगु
- कर्मधारय
- बहुव्रीहि
- तत्पुरुष
उत्तर एवं व्याख्या
विग्रह — "दस हैं आनन (मुख) जिसके अर्थात् रावण"। यहाँ "दस" और "आनन" दोनों गौण हैं और तीसरे व्यक्ति (रावण) का बोध हो रहा है, इसलिए बहुव्रीहि समास है। केवल "दस मुखों का समूह" अर्थ होता तो द्विगु होता।
उत्तर: (C) बहुव्रीहि
"यथाशक्ति" में कौन-सा समास है?
- अव्ययीभाव
- तत्पुरुष
- द्वंद्व
- कर्मधारय
उत्तर एवं व्याख्या
"यथाशक्ति" का विग्रह है "शक्ति के अनुसार"। पहला पद "यथा" अव्यय है और प्रधान है, तथा पूरा पद क्रिया-विशेषण का काम करता है — इसलिए अव्ययीभाव समास है।
उत्तर: (A) अव्ययीभाव
"चौराहा" में कौन-सा समास है?
- द्वंद्व
- द्विगु
- बहुव्रीहि
- अव्ययीभाव
उत्तर एवं व्याख्या
विग्रह — "चार राहों का समूह"। पूर्वपद "चौ" (चार) संख्यावाचक है और समूह का बोध होता है, इसलिए द्विगु समास है। इसमें न दोनों पद प्रधान हैं (द्वंद्व), न कोई तीसरा अर्थ (बहुव्रीहि)।
उत्तर: (B) द्विगु
"अत्यधिक" शब्द में उपसर्ग कौन-सा है?
- अ
- अत्
- अति
- अधि
उत्तर एवं व्याख्या
"अत्यधिक" = अति + अधिक; यहाँ "अति" उपसर्ग है (अर्थ — बहुत), और जोड़ने पर यण संधि से "इ" का "य्" हुआ। "अत्" कोई उपसर्ग नहीं है और "अधि" मूल शब्द "अधिक" का भाग है।
उत्तर: (C) अति
"मिठास" शब्द में कौन-सा प्रत्यय है?
- -आस
- -ठास
- -स
- -इठास
उत्तर एवं व्याख्या
मीठा + आस = मिठास; "आस" तद्धित भाववाचक प्रत्यय है (जैसे खटास)। जुड़ने पर "मी" की मात्रा ह्रस्व होकर "मि" हो गई। बाकी विकल्प हिंदी में मान्य प्रत्यय नहीं हैं।
उत्तर: (A) -आस
निम्न में से महाप्राण व्यंजन कौन-सा है?
- क
- ग
- घ
- ङ
उत्तर एवं व्याख्या
हर वर्ग का दूसरा और चौथा वर्ण महाप्राण होता है (उच्चारण में अधिक वायु निकलती है); क वर्ग में "ख" और "घ" महाप्राण हैं। क, ग, ङ पहले, तीसरे और पाँचवें वर्ण होने से अल्पप्राण हैं।
उत्तर: (C) घ
"नीलकमल" में कौन-सा समास है?
- कर्मधारय
- बहुव्रीहि
- द्विगु
- द्वंद्व
उत्तर एवं व्याख्या
विग्रह — "नीला है जो कमल"। "नीला" विशेषण है और "कमल" विशेष्य; उत्तरपद प्रधान है, इसलिए कर्मधारय समास है। यहाँ किसी तीसरे व्यक्ति का बोध नहीं, अतः बहुव्रीहि नहीं।
उत्तर: (A) कर्मधारय
निम्नलिखित में से किस शब्द में अयादि संधि है?
- नयन
- नदीश
- नरेश
- न्यून
उत्तर एवं व्याख्या
ने + अन: "ए" के बाद भिन्न स्वर आने पर "ए" → "अय्" → नयन; यह अयादि संधि है। नदीश (नदी + ईश) दीर्घ, नरेश (नर + ईश) गुण संधि है और न्यून (नि + ऊन) में यण संधि है।
उत्तर: (A) नयन
"उच्छ्वास" का सही संधि-विच्छेद है —
- उच् + छ्वास
- उत् + श्वास
- उद् + श्वास
- उ + च्छ्वास
उत्तर एवं व्याख्या
उत् + श्वास: व्यंजन संधि के नियम से "त्" के बाद "श" आने पर "त्" → "च्" और "श" → "छ" हो जाता है → उच्छ्वास। "उत्" उपसर्ग है (अर्थ ऊपर); "उच्", "उद्" या "उ" यहाँ सही पूर्वपद नहीं बनाते।
उत्तर: (B) उत् + श्वास
12. त्वरित पुनरावृत्ति
- वर्ण: 11 स्वर, 33 मूल व्यंजन; 25 स्पर्श, 4 अंतःस्थ, 4 ऊष्म; उच्चारण क्रम — कंठ, तालु, मूर्धा, दाँत, होंठ।
- अल्पप्राण — 1, 3, 5वाँ वर्ण; महाप्राण — 2, 4वाँ + ऊष्म।
- स्वर संधि: दीर्घ (हिमालय), गुण (देवेंद्र), वृद्धि (सदैव), यण (इत्यादि), अयादि (नयन)।
- व्यंजन संधि: दिगंबर, जगन्नाथ, उल्लास, उद्धार, संसार; विसर्ग संधि: मनोबल, निराशा, निश्चल।
- समास: अव्ययीभाव (यथाशक्ति), तत्पुरुष (राजपुत्र), कर्मधारय (नीलकमल), द्विगु (चौराहा), द्वंद्व (माता-पिता), बहुव्रीहि (लंबोदर)।
- उपसर्ग आगे, प्रत्यय पीछे; कृत — धातु से (पाठक), तद्धित — संज्ञा से (मानवता)।