1. अध्याय एक नज़र में
पाठ्यक्रम: "भूकंप, सुनामी, ज्वालामुखीय गतिविधि, चक्रवात आदि जैसी महत्वपूर्ण भू-भौतिकीय परिघटनाएँ; भौगोलिक विशेषताएँ और उनकी अवस्थिति; अति महत्वपूर्ण भौगोलिक विशेषताओं (जल-स्रोतों और हिमावरण सहित) और वनस्पति एवं प्राणिजगत में परिवर्तन तथा ऐसे परिवर्तनों के प्रभाव।" यह भाग GS-3 के आपदा प्रबंधन से भी जुड़ता है — GS-1 में "क्या और क्यों" (विज्ञान), GS-3 में "कैसे निपटें" (प्रबंधन)।
| वर्ष | प्रश्न |
|---|---|
| 2026 | फ़ुजिवारा प्रभाव और उष्णकटिबंधीय चक्रवातों पर उसका प्रभाव |
| 2025 | सुनामी — निर्माण, कहाँ आती हैं, परिणाम |
| 2024 | समुद्र सतह तापमान वृद्धि और उष्णकटिबंधीय चक्रवात; बादल फटना (cloudburst); टॉर्नेडो (twister) — अधिकतर मेक्सिको की खाड़ी के आसपास क्यों |
2024 से हर वर्ष किसी न किसी मौसमी चरम घटना पर प्रश्न आया है। उत्तर का ढाँचा तय रखें: परिभाषा → निर्माण की दशाएँ (रेखाचित्र) → वितरण (मानचित्र) → प्रभाव → भारत का उदाहरण → शमन।
2. भूकंप
- अर्थ: भूपर्पटी में संचित ऊर्जा के अचानक मुक्त होने से उत्पन्न कंपन। उद्गम केंद्र (focus/hypocentre) भीतर, अधिकेंद्र (epicentre) उसके ठीक ऊपर सतह पर।
- तरंगें: P (प्राथमिक, सबसे तेज़, ठोस-तरल दोनों में), S (द्वितीयक, केवल ठोस में), सतही L तरंगें (सबसे अधिक विनाशकारी)।
- कारण: प्लेट सीमाओं पर विवर्तनिक गति (सबसे प्रमुख), ज्वालामुखी, बड़े जलाशयों से प्रेरित भूकंप (कोयना, 1967), खनन।
- मापन: परिमाण (magnitude) — रिक्टर/मोमेंट मैग्नीट्यूड पैमाना (लघुगणकीय: 1 अंक वृद्धि ≈ 32 गुना ऊर्जा); तीव्रता (intensity) — संशोधित मरकैली पैमाना (क्षति पर आधारित)।
- वैश्विक पेटियाँ: परि-प्रशांत "रिंग ऑफ़ फ़ायर" (लगभग 80% भूकंप), मध्य-महाद्वीपीय (अल्पाइन-हिमालयी) पेटी, मध्य-महासागरीय कटक।
- भारत: भारतीय प्लेट का यूरेशियाई प्लेट से टकराव — हिमालय, पूर्वोत्तर, अंडमान-निकोबार सबसे अधिक संवेदनशील; BIS का भूकंपीय क्षेत्र मानचित्र भवन संहिता का आधार। प्रमुख घटनाएँ: असम (1950), लातूर (1993 — स्थिर पठार पर भी), भुज (2001), सिक्किम (2011); पड़ोस में नेपाल (2015), तुर्की-सीरिया (2023), म्यांमार (मार्च 2025)।

3. सुनामी (UPSC 2025)
- अर्थ: जापानी शब्द — "बंदरगाह की लहर"। समुद्र तल के अचानक ऊर्ध्वाधर विस्थापन से बनी अत्यंत लंबी तरंगों की शृंखला।
- कारण: (1) क्षेपण क्षेत्रों में समुद्र के नीचे बड़े (प्रायः 7.5+ परिमाण के) उथले भूकंप — सबसे प्रमुख; (2) समुद्र के नीचे भूस्खलन; (3) ज्वालामुखी विस्फोट (क्राकाटोआ 1883, हुंगा टोंगा 2022); (4) उल्कापिंड (दुर्लभ)।
- व्यवहार: गहरे समुद्र में गति 700-800 किमी/घंटा तक पर ऊँचाई बहुत कम (जहाज़ों को पता भी नहीं चलता), तरंगदैर्घ्य सैकड़ों किमी; तट के पास उथले जल में गति घटती और ऊँचाई कई मीटर तक बढ़ जाती है (shoaling)। आने से पहले समुद्र का पीछे हटना प्राकृतिक चेतावनी है।
- कहाँ: लगभग 80% प्रशांत महासागर में (रिंग ऑफ़ फ़ायर — जापान, चिली, इंडोनेशिया, अलास्का); हिंद महासागर में सुंडा खाई (सुमात्रा) और मकरान तट; भूमध्य सागर।
- प्रमुख घटनाएँ: हिंद महासागर सुनामी (26 दिसंबर 2004, सुमात्रा, परिमाण लगभग 9.1 — 14 देशों में 2 लाख से अधिक मृत्यु; भारत में तमिलनाडु और अंडमान-निकोबार); तोहोकू, जापान (2011 — फ़ुकुशिमा परमाणु दुर्घटना); कामचटका (जुलाई 2025, परिमाण लगभग 8.8 — पूरे प्रशांत में चेतावनी)।
- भारत की तैयारी: INCOIS हैदराबाद में भारतीय सुनामी पूर्व चेतावनी केंद्र (2007) — हिंद महासागर के लिए क्षेत्रीय सेवा प्रदाता; ओडिशा के वेंकटरायपुर और नोलियासाही — UNESCO "Tsunami Ready" मान्यता (2020); मैंग्रोव और तटीय आश्रय-पट्टी।
4. ज्वालामुखी
- प्रकार (आकृति से): शील्ड (हवाई — तरल बेसाल्टिक लावा, कम विस्फोटक), मिश्रित/स्ट्रेटो (फ़ूजी, वेसुवियस — विस्फोटक), काल्डेरा, लावा पठार (दक्कन ट्रैप)।
- सक्रियता से: सक्रिय, प्रसुप्त, मृत। भारत का एकमात्र सक्रिय ज्वालामुखी — बैरन द्वीप (अंडमान); नारकोंडम — प्रसुप्त।
- वितरण: रिंग ऑफ़ फ़ायर, मध्य-महासागरीय कटक (आइसलैंड), हॉट स्पॉट (हवाई, रियूनियन — दक्कन ट्रैप का संबंध), पूर्वी अफ़्रीकी दरार।
- प्रभाव: नकारात्मक — लावा, राख, पायरोक्लास्टिक प्रवाह, विमानन बाधा (आइसलैंड 2010), सल्फ़र एरोसोल से वैश्विक शीतलन (पिनाटूबो 1991); सकारात्मक — उपजाऊ मिट्टी (काली मिट्टी), भू-तापीय ऊर्जा, खनिज, नई भूमि।
5. उष्णकटिबंधीय चक्रवात (UPSC 2024)
निर्माण की दशाएँ
- विशाल समुद्री सतह पर 26.5-27°C से अधिक तापमान, और यह गर्म परत लगभग 50 मीटर गहराई तक।
- कोरिऑलिस बल — इसलिए विषुवत रेखा के लगभग 5° के भीतर चक्रवात नहीं बनते।
- ऊर्ध्वाधर पवन-अपरूपण (wind shear) कम।
- पहले से मौजूद निम्न दाब या चक्रवाती विक्षोभ।
- मध्य क्षोभमंडल में पर्याप्त आर्द्रता और ऊपरी स्तर पर अपसरण (outflow)।
ऊर्जा का स्रोत: संघनन की गुप्त ऊष्मा (latent heat)। स्थल पर पहुँचते ही नमी का स्रोत कटता है और चक्रवात कमज़ोर पड़ता है।
समुद्र सतह तापमान (SST) वृद्धि और चक्रवात
- अधिक तीव्रता: गर्म समुद्र = अधिक वाष्पीकरण = अधिक गुप्त ऊष्मा — गंभीर और अति गंभीर चक्रवातों का अनुपात बढ़ रहा है।
- तीव्र सघनीकरण (rapid intensification): 24 घंटे में पवन गति में बहुत तेज़ वृद्धि — पूर्वानुमान और निकासी का समय घटता है (ओखी 2017, तौकते 2021)।
- अरब सागर का बदलता चरित्र: परंपरागत रूप से बंगाल की खाड़ी में अधिक चक्रवात (गर्म, शांत जल, पूर्व से आने वाले अवशेष विक्षोभ), पर अरब सागर के गर्म होने से वहाँ भी तीव्र चक्रवात बढ़े — तौकते (2021), बिपरजॉय (2023)।
- अधिक वर्षा और धीमी गति: गर्म वायु अधिक नमी धारण करती है (लगभग 7% प्रति °C); धीमे चक्रवात एक ही क्षेत्र पर अधिक वर्षा करते हैं।
- तूफ़ानी लहरें (storm surge): समुद्र-स्तर वृद्धि के साथ अधिक विनाशकारी।
- सीमा: चक्रवातों की कुल संख्या में स्पष्ट वृद्धि का प्रमाण कम, पर तीव्रता बढ़ने का प्रमाण अधिक।

| IMD वर्गीकरण | अधिकतम निरंतर पवन (किमी/घंटा) |
|---|---|
| अवदाब (Depression) | 31-49 |
| गहन अवदाब | 50-61 |
| चक्रवाती तूफ़ान | 62-88 |
| गंभीर चक्रवाती तूफ़ान | 89-117 |
| अति गंभीर चक्रवाती तूफ़ान | 118-166 |
| अत्यंत गंभीर चक्रवाती तूफ़ान | 167-221 |
| सुपर चक्रवाती तूफ़ान | 222 और अधिक |
नामकरण: उत्तरी हिंद महासागर के चक्रवातों के नाम WMO/ESCAP पैनल के 13 सदस्य देश देते हैं; 2020 में 169 नामों की सूची जारी हुई। प्रबंधन में सफलता: ओडिशा मॉडल — 1999 के सुपर चक्रवात (लगभग 10,000 मृत्यु) से फ़ैलिन (2013) और फ़ानी (2019) में न्यूनतम मृत्यु तक।
6. फ़ुजिवारा प्रभाव (UPSC 2026)
- अर्थ: जब दो चक्रवात एक-दूसरे के पर्याप्त निकट (लगभग 1,400 किमी के भीतर) आते हैं, तो वे एक साझा केंद्र के चारों ओर एक-दूसरे की परिक्रमा करने लगते हैं। जापानी मौसम विज्ञानी साकुहेई फ़ुजिवारा ने 1921 में इसका वर्णन किया।
- संभावित परिणाम: (1) दोनों का विलय होकर एक बड़ा चक्रवात; (2) बड़ा चक्रवात छोटे को सोख ले; (3) कुछ समय परिक्रमा के बाद अलग हो जाना; (4) एक-दूसरे के मार्ग और गति को बदल देना।
- प्रभाव: मार्ग का पूर्वानुमान कठिन, अचानक दिशा परिवर्तन, कहीं तीव्रता बढ़ना तो कहीं कमज़ोर पड़ना, किसी तट पर अप्रत्याशित landfall।
- उदाहरण: पूर्वी प्रशांत में हरिकेन हिलेरी और इर्विन (2017); पश्चिमी प्रशांत में टाइफ़ून हिन्नामनोर ने गार्डो को सोख लिया (2022)। प्रशांत में अधिक, क्योंकि वहाँ एक साथ कई चक्रवात बनते हैं; उत्तरी हिंद महासागर में दुर्लभ।
7. स्थानीय चरम घटनाएँ: बादल फटना और टॉर्नेडो (UPSC 2024)
बादल फटना (Cloudburst)
- IMD की परिभाषा: लगभग 20-30 वर्ग किमी के छोटे क्षेत्र में एक घंटे में 100 मिमी या अधिक वर्षा।
- निर्माण: नमी से भरी मानसूनी हवाएँ पहाड़ी ढलानों पर तेज़ी से ऊपर उठती हैं (पर्वतीय उत्थापन); विशाल कपासी-वर्षी (cumulonimbus) मेघ; ऊपर उठती वायु धाराएँ बूँदों को रोके रखती हैं और अचानक बहुत भारी मात्रा में वर्षा होती है; कभी-कभी पश्चिमी विक्षोभ और मानसून की परस्पर क्रिया।
- क्षेत्र: हिमालय (उत्तराखंड, हिमाचल, J&K, लद्दाख), पूर्वोत्तर, पश्चिमी घाट।
- उदाहरण: लेह (2010), केदारनाथ (2013 — चोराबाड़ी झील के टूटने के साथ), धराली, उत्तरकाशी और किश्तवाड़ (अगस्त 2025) की आकस्मिक बाढ़।
- प्रभाव: आकस्मिक बाढ़, भूस्खलन, मलबा प्रवाह; नदी तट पर बने भवन-सड़कें सबसे अधिक प्रभावित।
- चुनौती और उपाय: छोटे पैमाने के कारण पूर्वानुमान कठिन — डॉप्लर मौसम रडार का घना नेटवर्क, नाउकास्ट, नदी तट पर निर्माण पर रोक, ढलान स्थिरीकरण, वहन क्षमता आधारित पर्यटन।
टॉर्नेडो / Twister
- अर्थ: कपासी-वर्षी मेघ से धरातल तक पहुँचा, तीव्र गति से घूमता वायु-स्तंभ ("कीप" आकार); पवन गति 300 किमी/घंटा से अधिक हो सकती है; व्यास छोटा पर विनाश अत्यधिक। जल के ऊपर — जलस्तंभ (waterspout)।
- निर्माण: वायुमंडलीय अस्थिरता + गर्म-आर्द्र और ठंडी-शुष्क वायु का मिलन + ऊँचाई के साथ पवन की दिशा और गति में बदलाव (wind shear) → "सुपरसेल" तड़ितझंझा → घूर्णन (मेसोसाइक्लोन)।
- मापन: उन्नत फ़ुजिता (EF) पैमाना — EF0 से EF5, क्षति के आधार पर।
- मेक्सिको की खाड़ी के आसपास अधिक क्यों ("Tornado Alley"): (1) दक्षिण से मेक्सिको की खाड़ी की गर्म-आर्द्र वायु; (2) उत्तर से कनाडा की ठंडी-शुष्क ध्रुवीय वायु; (3) पश्चिम से रॉकी पर्वत से उतरती गर्म-शुष्क वायु; (4) बीच में विशाल समतल "ग्रेट प्लेन्स" — कोई पर्वतीय अवरोध नहीं, इसलिए ये वायुराशियाँ सीधे टकराती हैं; (5) वसंत में जेट स्ट्रीम से प्रबल wind shear। विश्व के सर्वाधिक टॉर्नेडो अमेरिका में आते हैं।
- भारत-बांग्लादेश: वसंत/मानसून-पूर्व काल में कालबैसाखी (Nor'westers) के साथ टॉर्नेडो — पश्चिम बंगाल, ओडिशा, असम, बांग्लादेश; दौलतपुर-सतुरिया, बांग्लादेश (1989) इतिहास का सबसे घातक टॉर्नेडो माना जाता है।
8. महत्वपूर्ण भौगोलिक विशेषताओं में परिवर्तन
| विशेषता | परिवर्तन | प्रभाव |
|---|---|---|
| हिमालयी हिमनद | पीछे हटना, पतला होना; हिमनद झीलों का विस्तार | GLOF — दक्षिण ल्होनक झील, सिक्किम (अक्टूबर 2023, तीस्ता-III बाँध नष्ट); दीर्घकाल में नदियों का जल घटना |
| आर्कटिक समुद्री बर्फ़, ग्रीनलैंड | गर्मियों में बर्फ़ का क्षेत्र घटना | समुद्र-स्तर वृद्धि, उत्तरी समुद्री मार्ग का खुलना, "अल्बेडो फ़ीडबैक" |
| झीलें | अरल सागर (सिंचाई हेतु नदियों का मोड़), चाड झील का सिकुड़ना | मत्स्य उद्योग नष्ट, लवणीय धूल भरी आँधियाँ, स्थानीय संघर्ष |
| प्रवाल भित्तियाँ | समुद्री ताप-लहरों से बार-बार विरंजन | मत्स्य, तटीय सुरक्षा, पर्यटन पर आघात |
| मैंग्रोव और आर्द्रभूमि | अतिक्रमण, झींगा पालन; कुछ क्षेत्रों में पुनर्स्थापन (MISHTI, 2023) | चक्रवात से प्राकृतिक ढाल का घटना |
| नदियाँ | मार्ग परिवर्तन (कोसी — "बिहार का शोक"), डेल्टा का धँसना | बाढ़, भूमि कटाव, विस्थापन |
वनस्पति और प्राणिजगत में परिवर्तन
- प्रजातियों का ऊँचाई और ध्रुवों की ओर खिसकना (हिमालय में वृक्ष-रेखा का ऊपर जाना, सेब की खेती का ऊँचाई की ओर खिसकना)।
- आक्रामक प्रजातियाँ — लैंटाना, प्रोसोपिस जूलीफ़्लोरा, जलकुंभी — देशी जैव-विविधता को हटाती हैं।
- प्रवास और प्रजनन के समय (phenology) में बदलाव — फूल जल्दी खिलना, परागणकर्ताओं से असंगति।
- संकटग्रस्त प्रजातियाँ: ग्रेट इंडियन बस्टर्ड (आवास हानि, बिजली लाइनें), हिम तेंदुआ (गर्म होता उच्च हिमालय)।
- प्रभाव: पारिस्थितिक सेवाओं (परागण, जल शोधन) की हानि, कृषि और आजीविका पर असर, मानव-वन्यजीव संघर्ष, नई बीमारियाँ (zoonoses)।
9. विस्तृत विवेचन: भारत का बहु-आपदा जोखिम परिदृश्य
UPSC भू-भौतिकीय घटनाओं पर प्रश्न पूछते समय अक्सर "भारत के संदर्भ में" जोड़ देता है। इसलिए केवल घटना की क्रियाविधि (mechanism) जानना पर्याप्त नहीं; यह भी जानना ज़रूरी है कि भारत के किस क्षेत्र में कौन-सा जोखिम क्यों है, और हाल के वर्षों में उसका स्वरूप कैसे बदल रहा है। भारत विश्व के सबसे अधिक आपदा-संभावित देशों में है: इसके भूभाग का बड़ा हिस्सा भूकंप-संभावित है, लंबी तटरेखा चक्रवात और सुनामी के प्रति खुली है, हिमालय भूस्खलन और हिमनद-झील विस्फोट (GLOF) का क्षेत्र है, और मैदानों में बाढ़ तथा पठारों में सूखा बार-बार आता है।
| क्षेत्र | प्रमुख जोखिम | भौगोलिक कारण | उदाहरण घटना |
|---|---|---|---|
| हिमालय (जम्मू-कश्मीर से अरुणाचल) | भूकंप, भूस्खलन, बादल फटना, GLOF, धँसाव | भारतीय और यूरेशियाई प्लेटों का टकराव; युवा, कमज़ोर चट्टानें; तीव्र ढलान | 1934 बिहार-नेपाल भूकंप; 2013 केदारनाथ; 2023 जोशीमठ धँसाव; 2023 सिक्किम GLOF |
| सिंधु-गंगा-ब्रह्मपुत्र मैदान | बाढ़, नदी-मार्ग परिवर्तन, भूकंप का प्रभाव (मोटी जलोढ़ परत कंपन बढ़ाती है) | हिमालयी नदियों का भारी अवसाद-भार, समतल ढाल | कोसी की 2008 की बाढ़ (तटबंध टूटना); असम की वार्षिक बाढ़ |
| पूर्वी तट | तीव्र चक्रवात, तूफ़ानी लहर (storm surge) | बंगाल की खाड़ी का गर्म, उथला जल; चौड़ी महाद्वीपीय शेल्फ़ | 1999 ओडिशा महाचक्रवात; 2019 फ़ानी; 2020 अम्फान |
| पश्चिमी तट | चक्रवातों की बढ़ती आवृत्ति, अत्यधिक वर्षा, भूस्खलन (पश्चिमी घाट) | अरब सागर का तेज़ी से गर्म होना | 2021 ताउते; 2023 बिपरजॉय; 2024 वायनाड भूस्खलन |
| गुजरात-कच्छ | भूकंप, सुनामी (मकरान क्षेत्र), सूखा | अंतः-प्लेट (intraplate) भ्रंश; मकरान सबडक्शन क्षेत्र | 2001 भुज भूकंप |
| प्रायद्वीपीय पठार | सूखा, लू (heatwave), कभी-कभी अंतः-प्लेट भूकंप | वृष्टि-छाया क्षेत्र, कम और अनियमित वर्षा | 1993 लातूर भूकंप; मराठवाड़ा-विदर्भ का बार-बार सूखा |
| अंडमान-निकोबार | भूकंप, सुनामी, ज्वालामुखी (बैरन द्वीप) | सुंडा सबडक्शन क्षेत्र | 2004 हिंद महासागर सुनामी |
तीन केस-अध्ययन जो उत्तर को समृद्ध बनाते हैं
(क) जोशीमठ धँसाव (2023): उत्तराखंड का यह नगर पुराने भूस्खलन-मलबे (landslide debris) पर बसा है, जो प्राकृतिक रूप से अस्थिर है। 1976 की मिश्रा समिति ने पहले ही यहाँ भारी निर्माण पर सावधानी की सलाह दी थी। अनियंत्रित निर्माण, जल-निकासी (drainage) की कमी, और क्षेत्र में चल रही बड़ी परियोजनाओं के प्रभाव को लेकर उठे प्रश्नों ने इस घटना को "प्राकृतिक" और "मानवजनित" कारणों के मिश्रण का उदाहरण बना दिया। उत्तर में यह जोड़ें कि हिमालयी नगरों के लिए "वहन क्षमता" (carrying capacity) का आकलन अनिवार्य होना चाहिए।
(ख) सिक्किम GLOF (अक्टूबर 2023): दक्षिण ल्होनक हिमनद-झील के फटने से तीस्ता नदी में अचानक बाढ़ आई, जिसने नीचे की ओर स्थित एक बाँध को भी भारी क्षति पहुँचाई। यह घटना दिखाती है कि जलवायु परिवर्तन से हिमनद पीछे हटने पर बनने वाली झीलें एक नया जोखिम हैं, और हिमालयी नदियों पर बनी अवसंरचना की योजना में इस जोखिम को गिनना ज़रूरी है। प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली (early warning system) और झीलों की उपग्रह-निगरानी इसका समाधान हैं।
(ग) वायनाड भूस्खलन (जुलाई 2024): केरल के पश्चिमी घाट क्षेत्र में अत्यधिक, केंद्रित वर्षा के बाद हुए भूस्खलनों ने कई गाँवों को तबाह कर दिया। यहाँ भारी वर्षा की तीव्रता, ढलानों पर भूमि-उपयोग परिवर्तन और पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील क्षेत्रों (ESA) से जुड़ी पुरानी बहस (गाडगिल और कस्तूरीरंगन समितियाँ) एक साथ सामने आए।
- अरब सागर: पिछले कुछ दशकों में यहाँ तीव्र चक्रवातों की संख्या और अवधि बढ़ने के संकेत मिले हैं, जिसे समुद्री सतह के तापमान में वृद्धि से जोड़ा जाता है। पश्चिमी तट के नगर, जो ऐतिहासिक रूप से कम जोखिम वाले माने जाते थे, अब अधिक तैयार रहने चाहिए।
- तीव्र वर्षा की घटनाएँ: कुल वर्षा में बड़ा परिवर्तन न होते हुए भी, कम दिनों में अधिक वर्षा (extreme rainfall events) की प्रवृत्ति बढ़ी है, जिससे शहरी बाढ़ और भूस्खलन बढ़ते हैं।
- लू: भारत में लू की अवधि और तीव्रता बढ़ रही है; कई राज्यों ने "Heat Action Plan" अपनाए हैं, जिसकी शुरुआत अहमदाबाद (2013) से मानी जाती है।
- आकाशीय बिजली: भारत में प्राकृतिक आपदाओं से होने वाली मौतों में आकाशीय बिजली का बड़ा हिस्सा है; यह प्रायः उपेक्षित "मौन आपदा" है।
भूकंप-सुरक्षा: "भूकंप नहीं, इमारतें मारती हैं"
भूकंप विज्ञान की एक प्रसिद्ध उक्ति है कि भूकंप स्वयं बहुत कम लोगों की जान लेता है; अधिकांश मौतें ख़राब तरीक़े से बनी इमारतों के गिरने से होती हैं। भारत में भारतीय मानक ब्यूरो (BIS) देश को भूकंपीय क्षेत्रों (seismic zones) में बाँटता है और भवन-निर्माण के लिए भूकंप-रोधी संहिताएँ (codes) निर्धारित करता है। समस्या संहिता की नहीं, उसके पालन की है: अनौपचारिक निर्माण, पुरानी इमारतों का सुदृढ़ीकरण (retrofitting) न होना, और स्थानीय निकायों में तकनीकी क्षमता की कमी। भुज (2001) के बाद गुजरात ने राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण बनाकर पुनर्निर्माण में भूकंप-रोधी तकनीक अपनाई, जो "बेहतर पुनर्निर्माण" (Build Back Better) का एक उदाहरण माना जाता है। जापान का अनुभव बताता है कि कठोर भवन-संहिता, नियमित अभ्यास (drills) और जन-जागरूकता से ऊँची तीव्रता के भूकंपों में भी जनहानि सीमित रखी जा सकती है।
"हिमालय में आपदाएँ प्राकृतिक कम और मानव-प्रेरित अधिक होती जा रही हैं।" हाल की घटनाओं के उदाहरण देते हुए इस कथन का परीक्षण कीजिए। (250 शब्द)
मॉडल उत्तर
भूमिका: हिमालय विश्व की सबसे युवा वलित पर्वत-श्रेणी है, जो भारतीय प्लेट के उत्तर की ओर निरंतर दबाव के कारण भू-वैज्ञानिक रूप से सक्रिय और अस्थिर है। इसलिए यहाँ भूकंप, भूस्खलन और बाढ़ स्वाभाविक हैं; पर हाल की घटनाओं में मानवीय हस्तक्षेप ने इनकी तीव्रता और प्रभाव बढ़ाया है।
प्राकृतिक कारण: (1) प्लेट-टकराव से उच्च भूकंपीयता; (2) कमज़ोर, अपक्षयित चट्टानें और तीव्र ढलान; (3) मानसून की भारी, केंद्रित वर्षा और बादल फटना; (4) जलवायु परिवर्तन से हिमनदों का पीछे हटना और हिमनद-झीलों का बनना।
मानव-प्रेरित कारण: (1) ढलानों को काटकर सड़कों का चौड़ीकरण, बिना पर्याप्त ढलान-स्थिरीकरण के; (2) जलविद्युत परियोजनाएँ और सुरंगें, जिनके संचयी (cumulative) प्रभाव का आकलन अपर्याप्त रहा है; (3) नगरों में वहन क्षमता से अधिक निर्माण और जल-निकासी की कमी (जोशीमठ 2023); (4) नदी-तटों और बाढ़-मैदानों पर अतिक्रमण (केदारनाथ 2013 में मंदाकिनी के मार्ग में निर्माण); (5) वनों की कटाई जो ढलानों को कमज़ोर करती है; (6) अनियंत्रित पर्यटन।
संतुलित निष्कर्ष: इन घटनाओं में "ट्रिगर" अक्सर प्राकृतिक होता है (भारी वर्षा, GLOF), पर "आपदा" का पैमाना मानवीय निर्णयों से तय होता है। सिक्किम GLOF (2023) में झील का फटना प्राकृतिक था, पर नीचे की अवसंरचना की संवेदनशीलता योजना का प्रश्न थी।
आगे का रास्ता: हिमालयी नगरों का वहन क्षमता आकलन; परियोजनाओं के लिए संचयी पर्यावरण प्रभाव आकलन; भूस्खलन-संवेदनशीलता मानचित्रण (GSI) के आधार पर ज़ोनिंग; हिमनद-झीलों की उपग्रह-निगरानी और प्रारंभिक चेतावनी; स्थानीय समुदायों का पारंपरिक ज्ञान; और "पर्वत-विशिष्ट" विकास मॉडल, जो मैदानी मॉडल की नकल न हो।
10. Master Summary Table
| परिघटना | मुख्य कारण | प्रमुख क्षेत्र | भारत/उदाहरण |
|---|---|---|---|
| भूकंप | प्लेट गति, संचित ऊर्जा | रिंग ऑफ़ फ़ायर, अल्पाइन-हिमालयी पेटी | भुज 2001; म्यांमार 2025 |
| सुनामी | समुद्र तल का विस्थापन | प्रशांत (~80%), सुंडा खाई | 2004; INCOIS 2007 |
| ज्वालामुखी | मैग्मा, प्लेट सीमाएँ, हॉट स्पॉट | रिंग ऑफ़ फ़ायर, आइसलैंड | बैरन द्वीप |
| चक्रवात | SST >26.5°C, कोरिऑलिस, कम wind shear | उष्णकटिबंधीय महासागर | ओडिशा मॉडल; बिपरजॉय 2023 |
| फ़ुजिवारा प्रभाव | दो चक्रवातों की निकटता (~1,400 किमी) | पश्चिमी/पूर्वी प्रशांत | हिलेरी-इर्विन 2017 |
| बादल फटना | पर्वतीय उत्थापन, नमी | हिमालय | केदारनाथ 2013; धराली 2025 |
| टॉर्नेडो | वायुराशियों का टकराव, wind shear | अमेरिका के ग्रेट प्लेन्स | कालबैसाखी; दौलतपुर-सतुरिया 1989 |
| हिमनद परिवर्तन | तापमान वृद्धि | हिमालय, आर्कटिक | दक्षिण ल्होनक GLOF 2023 |
11. Mind Map
- भूकंप
- ज्वालामुखी
- भूस्खलन
- सुनामी
- तूफ़ानी लहरें
- चक्रवात, फ़ुजिवारा
- बादल फटना, टॉर्नेडो
- हिमनद, GLOF
- समुद्री बर्फ़
- प्रजातियों का खिसकना
- आक्रामक प्रजातियाँ
12. महत्वपूर्ण One-liners
- भारत का एकमात्र सक्रिय ज्वालामुखी: बैरन द्वीप (अंडमान)।
- भारतीय सुनामी पूर्व चेतावनी केंद्र: INCOIS, हैदराबाद (2007)।
- भारत के पहले "Tsunami Ready" गाँव: वेंकटरायपुर और नोलियासाही, ओडिशा।
- चक्रवात के लिए न्यूनतम समुद्र सतह तापमान: लगभग 26.5-27°C।
- विषुवत रेखा पर चक्रवात न बनने का कारण: कोरिऑलिस बल का लगभग शून्य होना।
- फ़ुजिवारा प्रभाव का वर्णन: साकुहेई फ़ुजिवारा (1921)।
- बादल फटना (IMD): 100 मिमी/घंटा या अधिक, छोटे क्षेत्र में।
- टॉर्नेडो मापन: उन्नत फ़ुजिता (EF) पैमाना।
- भारत-बांग्लादेश की वसंतकालीन तड़ितझंझा: कालबैसाखी (Nor'westers)।
- जलाशय-प्रेरित भूकंप का भारतीय उदाहरण: कोयना (1967)।
- दक्षिण ल्होनक GLOF: सिक्किम, अक्टूबर 2023।
- उत्तरी हिंद महासागर के चक्रवात नाम देने वाले देश: 13।
13. टिप्स एवं ट्रिक्स
- हर परिघटना के लिए एक "मानक रेखाचित्र" तैयार रखें: सुनामी का shoaling, चक्रवात की संरचना, फ़ुजिवारा की परिक्रमा, Tornado Alley में तीन वायुराशियाँ।
- "क्यों वहीं" वाले प्रश्न (जैसे Tornado Alley) में उत्तर हमेशा स्थलाकृति + वायुराशियाँ + मौसम से बनाएँ।
- भारत के लिए NDMA, IMD, INCOIS, ओडिशा मॉडल जैसे संस्थागत उदाहरण अंत में जोड़ें — यह GS-1 उत्तर को GS-3 की गहराई देता है।
- जलवायु परिवर्तन का लिंक संतुलित रखें — जहाँ प्रमाण स्पष्ट हैं (तीव्रता, वर्षा) वहाँ दृढ़ता से, जहाँ अनिश्चित हैं (संख्या) वहाँ सावधानी से।
चक्रवात की दशाएँ: "गर्म-घूम-शांत-विक्षोभ-नमी" — गर्म समुद्र, घूर्णन (कोरिऑलिस), शांत ऊपरी हवा (कम shear), पूर्व विक्षोभ, नमी।
14. PYQ-आधारित प्रश्न एवं मॉडल उत्तर
सुनामी क्या हैं? ये कैसे बनती हैं? ये प्रायः कहाँ आती हैं और इनके क्या परिणाम होते हैं? (150 शब्द)
मॉडल उत्तर
अर्थ: समुद्र तल के अचानक ऊर्ध्वाधर विस्थापन से उत्पन्न, बहुत लंबे तरंगदैर्घ्य वाली समुद्री तरंगों की शृंखला ("बंदरगाह की लहर")।
निर्माण: क्षेपण क्षेत्रों में बड़े उथले समुद्री भूकंप (प्रमुख कारण), समुद्री भूस्खलन, ज्वालामुखी विस्फोट (हुंगा टोंगा 2022)। गहरे समुद्र में 700-800 किमी/घंटा की गति पर ऊँचाई कम; तट के पास उथले जल में गति घटती और ऊँचाई कई मीटर बढ़ जाती है। [रेखाचित्र: shoaling]
कहाँ: लगभग 80% प्रशांत की रिंग ऑफ़ फ़ायर में (जापान, चिली, इंडोनेशिया); हिंद महासागर में सुंडा खाई और मकरान तट।
परिणाम: भारी जनहानि (2004 में 2 लाख से अधिक), तटीय अवसंरचना और बंदरगाहों का विनाश, खेतों और भूजल में लवणता, परमाणु संयंत्र दुर्घटना (फ़ुकुशिमा 2011), मछुआरा समुदायों की आजीविका पर आघात।
तैयारी: INCOIS चेतावनी केंद्र (2007), Tsunami Ready गाँव, मैंग्रोव पट्टी, तटीय नियमन क्षेत्र (CRZ)।
फ़ुजिवारा प्रभाव क्या है? उष्णकटिबंधीय चक्रवातों पर इसके प्रभाव की चर्चा कीजिए। (150 शब्द)
मॉडल उत्तर
अर्थ: जब दो चक्रवात लगभग 1,400 किमी के भीतर आ जाते हैं, तो वे एक साझा द्रव्यमान केंद्र के चारों ओर एक-दूसरे की परिक्रमा करने लगते हैं — इसे फ़ुजिवारा प्रभाव कहते हैं (साकुहेई फ़ुजिवारा, 1921)। [रेखाचित्र: दो चक्रवात और साझा केंद्र]
चक्रवातों पर प्रभाव: (1) विलय: दो चक्रवात मिलकर एक बड़ा, अधिक शक्तिशाली चक्रवात; (2) अवशोषण: बड़ा चक्रवात छोटे को सोख लेता है (हिन्नामनोर-गार्डो, 2022); (3) मार्ग परिवर्तन: एक-दूसरे को धकेलकर दिशा बदलना — पूर्वानुमान कठिन, अप्रत्याशित landfall; (4) गति परिवर्तन: किसी क्षेत्र पर अधिक समय रुकना — अधिक वर्षा; (5) अलगाव: परिक्रमा के बाद अलग-अलग दिशा (हिलेरी-इर्विन, 2017)।
वितरण: प्रशांत में अधिक, जहाँ एक साथ कई चक्रवात बनते हैं; उत्तरी हिंद महासागर में दुर्लभ।
महत्व: तटीय राज्यों के लिए आपदा तैयारी में संयुक्त-चक्रवात परिदृश्यों को मॉडल करना आवश्यक; बेहतर संख्यात्मक मौसम पूर्वानुमान मॉडल।
समुद्र सतह तापमान में वृद्धि उष्णकटिबंधीय चक्रवातों के निर्माण को किस प्रकार प्रभावित करती है? (150 शब्द)
मॉडल उत्तर
भूमिका: उष्णकटिबंधीय चक्रवात "ऊष्मा इंजन" हैं, जिनका ईंधन गर्म समुद्र से वाष्पीकरण और संघनन की गुप्त ऊष्मा है; निर्माण के लिए लगभग 26.5°C से अधिक SST आवश्यक।
प्रभाव: (1) तीव्रता में वृद्धि: अधिक वाष्पीकरण → अधिक गुप्त ऊष्मा → तेज़ पवनें; (2) तीव्र सघनीकरण: 24 घंटे में श्रेणी कई स्तर बढ़ना (ओखी 2017, तौकते 2021) — निकासी का समय घटता है; (3) अरब सागर में बढ़ती सक्रियता: बिपरजॉय (2023) जैसे लंबी अवधि वाले तीव्र चक्रवात; (4) अधिक वर्षा: गर्म वायु में अधिक नमी — बाढ़; (5) निर्माण क्षेत्र का विस्तार: उच्च अक्षांशों तक गर्म जल; (6) समुद्र-स्तर वृद्धि के साथ अधिक विनाशकारी तूफ़ानी लहरें।
सावधानी: कुल संख्या में वृद्धि का प्रमाण अस्पष्ट; wind shear जैसे अन्य कारक भी निर्णायक हैं।
निष्कर्ष: तटीय भारत के लिए बहु-आपदा चेतावनी, चक्रवात आश्रय और मैंग्रोव पुनर्स्थापन (MISHTI) की आवश्यकता बढ़ी है।
बादल फटने (cloudburst) से आप क्या समझते हैं? इसकी क्रियाविधि और प्रभावों की व्याख्या कीजिए। (150 शब्द)
मॉडल उत्तर
अर्थ: IMD के अनुसार लगभग 20-30 वर्ग किमी के छोटे क्षेत्र में एक घंटे में 100 मिमी या अधिक वर्षा।
क्रियाविधि: (1) मानसूनी हवाएँ भारी नमी लेकर पहाड़ी ढलानों से टकराती हैं; (2) तीव्र पर्वतीय उत्थापन से विशाल कपासी-वर्षी मेघ; (3) प्रबल ऊर्ध्वगामी धाराएँ बूँदों को ऊपर रोके रखती हैं, बूँदें बड़ी होती जाती हैं; (4) धारा कमज़ोर पड़ते ही संचित जल एक साथ गिरता है; (5) पश्चिमी विक्षोभ-मानसून की परस्पर क्रिया इसे तीव्र करती है। [रेखाचित्र: ढलान पर उठती नम हवा और कपासी-वर्षी मेघ]
प्रभाव: आकस्मिक बाढ़, भूस्खलन और मलबा प्रवाह, नदी तट के गाँव-सड़कें-पुल नष्ट, जनहानि (केदारनाथ 2013; धराली और किश्तवाड़, अगस्त 2025), पर्यटन और जलविद्युत परियोजनाओं को क्षति।
उपाय: डॉप्लर रडार नेटवर्क, नाउकास्ट, नदी तटों पर निर्माण निषेध, ढलान स्थिरीकरण, पर्यटन की वहन क्षमता का निर्धारण।
टॉर्नेडो (twister) क्या है? अधिकांश टॉर्नेडो मेक्सिको की खाड़ी के आसपास के क्षेत्रों में ही क्यों आते हैं? (250 शब्द)
मॉडल उत्तर
अर्थ: कपासी-वर्षी मेघ के आधार से धरातल तक पहुँचा, अत्यंत तेज़ी से घूमता संकरा वायु-स्तंभ ("कीप")। व्यास कुछ दसियों से सैकड़ों मीटर, पर पवन गति 300 किमी/घंटा से अधिक हो सकती है; उन्नत फ़ुजिता (EF0-EF5) पैमाने पर मापा जाता है। जल के ऊपर बने टॉर्नेडो को जलस्तंभ कहते हैं।
निर्माण: (1) निचले स्तर पर गर्म-आर्द्र वायु और ऊपर ठंडी-शुष्क वायु — तीव्र अस्थिरता; (2) ऊँचाई के साथ पवन की दिशा और गति में परिवर्तन (wind shear) से क्षैतिज घूर्णन; (3) प्रबल ऊर्ध्वगामी धारा इस घूर्णन को खड़ा कर देती है — "मेसोसाइक्लोन" वाली सुपरसेल तड़ितझंझा; (4) घूमता स्तंभ धरातल को छूता है।
मेक्सिको की खाड़ी के आसपास (अमेरिका का "Tornado Alley"): (1) गर्म-आर्द्र वायु: दक्षिण में मेक्सिको की खाड़ी से; (2) ठंडी-शुष्क वायु: उत्तर में कनाडा से; (3) गर्म-शुष्क वायु: पश्चिम में रॉकी पर्वत से उतरती — ऊपर एक "ढक्कन" (cap) बनाकर अस्थिरता संचित करती है; (4) समतल ग्रेट प्लेन्स: पूर्व-पश्चिम दिशा में कोई पर्वत नहीं (यूरोप के आल्प्स या एशिया के हिमालय की तरह) — वायुराशियाँ सीधे टकराती हैं; (5) जेट स्ट्रीम: वसंत में ऊपर से प्रबल shear। परिणामस्वरूप विश्व के सर्वाधिक टॉर्नेडो अमेरिका में आते हैं।
[रेखाचित्र: उत्तर अमेरिका का मानचित्र — तीन वायुराशियों के तीर और Tornado Alley]
भारत में: मानसून-पूर्व कालबैसाखी के साथ पश्चिम बंगाल, ओडिशा, असम और बांग्लादेश में टॉर्नेडो; दौलतपुर-सतुरिया (1989) सबसे घातक माना जाता है।
निष्कर्ष: टॉर्नेडो छोटे पर अत्यंत विनाशकारी हैं; डॉप्लर रडार और त्वरित चेतावनी (अमेरिका में मिनटों की चेतावनी) से ही जनहानि घटाई जा सकती है।
हिमालयी हिमनदों के पिघलने के भारत के जल संसाधनों और आपदा जोखिम पर क्या प्रभाव हैं? (250 शब्द)
मॉडल उत्तर
भूमिका: हिंदू कुश-हिमालय को ध्रुवों के बाद सबसे बड़ा हिम-भंडार होने के कारण "तीसरा ध्रुव" कहा जाता है; गंगा, सिंधु और ब्रह्मपुत्र प्रणालियाँ इसी पर निर्भर हैं।
वर्तमान प्रवृत्ति: अधिकांश हिमनद पीछे हट रहे और पतले हो रहे हैं; हिमनद झीलों की संख्या और आकार बढ़ रहे हैं; ऊँचाई के साथ तापमान वृद्धि अधिक (elevation-dependent warming)।
जल संसाधनों पर प्रभाव: (1) निकट भविष्य में पिघलन से नदी-प्रवाह बढ़ना, फिर "peak water" के बाद दीर्घकाल में घटना; (2) शुष्क मौसम में सिंधु जैसी नदियों के प्रवाह पर सबसे अधिक असर (वहाँ हिम-पिघलन का योगदान अधिक); (3) सिंचाई, जलविद्युत, पेयजल और खाद्य सुरक्षा पर दबाव; (4) झरनों (springs) का सूखना — पहाड़ी बस्तियों का जल संकट; (5) अंतरराष्ट्रीय जल-बँटवारे पर तनाव।
आपदा जोखिम: (1) GLOF — दक्षिण ल्होनक (सिक्किम, अक्टूबर 2023) ने तीस्ता-III बाँध नष्ट किया; (2) हिमस्खलन और चट्टान-हिम गिरना — चमोली (फ़रवरी 2021); (3) पर्माफ़्रॉस्ट पिघलने से ढलानों की अस्थिरता और भूस्खलन; (4) गाद बढ़ने से जलाशयों की क्षमता घटना।
उपाय: NDMA के GLOF दिशानिर्देश, जोखिमपूर्ण झीलों की उपग्रह निगरानी और पूर्व चेतावनी, जलविद्युत परियोजनाओं का जोखिम-आधारित डिज़ाइन, राष्ट्रीय हिमालयी पारितंत्र संधारण मिशन (NAPCC के अंतर्गत), क्षेत्रीय सहयोग (ICIMOD)।
निष्कर्ष: हिमालय का पिघलना केवल पर्वतीय नहीं, बल्कि करोड़ों मैदानी लोगों की जल और खाद्य सुरक्षा का प्रश्न है।
भारतीय उपमहाद्वीप में भूकंपों के वितरण की व्याख्या प्लेट विवर्तनिकी के संदर्भ में कीजिए। (150 शब्द)
मॉडल उत्तर
मूल कारण: भारतीय प्लेट हर वर्ष कुछ सेंटीमीटर उत्तर-पूर्व की ओर खिसकते हुए यूरेशियाई प्लेट से टकरा रही है; इससे संचित तनाव भूकंपों के रूप में मुक्त होता है।
वितरण: (1) हिमालयी पेटी: मुख्य सीमांत क्षेप (Main Frontal Thrust) के साथ — कश्मीर से अरुणाचल तक सबसे अधिक संवेदनशील; बिहार-नेपाल (1934), नेपाल (2015); (2) पूर्वोत्तर: भारतीय-बर्मी प्लेट सीमा — असम (1897, 1950); (3) अंडमान-निकोबार: सुंडा क्षेपण क्षेत्र — 2004; (4) कच्छ: प्राचीन दरार क्षेत्र का पुनः सक्रिय होना — भुज (2001); (5) प्रायद्वीपीय भारत: अपेक्षाकृत स्थिर पर भ्रंश क्षेत्रों में मध्यम भूकंप — लातूर (1993), जलाशय-प्रेरित कोयना (1967)।
शमन: BIS भूकंपीय क्षेत्र मानचित्र के अनुसार भवन संहिता का पालन, भूकंप-रोधी निर्माण (भुज के बाद गुजरात मॉडल), पूर्व चेतावनी प्रणाली, स्कूल-अस्पतालों का पुनर्संरचन।
निष्कर्ष: भूकंप को रोका नहीं जा सकता; "भूकंप नहीं, कमज़ोर इमारतें मारती हैं" — इसलिए निर्माण गुणवत्ता ही मुख्य बचाव है।
15. Quick Revision Summary
- भूकंप: P, S, L तरंगें; रिंग ऑफ़ फ़ायर; हिमालय, पूर्वोत्तर, अंडमान सबसे संवेदनशील।
- सुनामी: समुद्र तल विस्थापन, shoaling; 2004; INCOIS।
- ज्वालामुखी: शील्ड बनाम स्ट्रेटो; बैरन द्वीप।
- चक्रवात: SST >26.5°C, कोरिऑलिस, कम shear; SST वृद्धि से तीव्रता और rapid intensification।
- फ़ुजिवारा प्रभाव: दो चक्रवातों की परिक्रमा, विलय, मार्ग परिवर्तन।
- बादल फटना (100 मिमी/घंटा) और टॉर्नेडो (Tornado Alley — तीन वायुराशियाँ + समतल मैदान)।
- हिमनद, झीलें, प्रवाल, मैंग्रोव और प्रजातियों में परिवर्तन — GLOF, जल संकट, जैव-विविधता हानि।