1. अध्याय एक नज़र में
GS-1 का यह भाग पूछता है: "विश्व भर के मुख्य प्राकृतिक संसाधनों का वितरण (दक्षिण एशिया और भारतीय उपमहाद्वीप सहित); विश्व के विभिन्न भागों (भारत सहित) में प्राथमिक, द्वितीयक और तृतीयक क्षेत्र के उद्योगों की अवस्थिति के लिए उत्तरदायी कारक।" हाल के वर्षों में इस भाग से सबसे अधिक प्रश्न आए हैं, और लगभग हर प्रश्न में संसाधन को तकनीक, पर्यावरण और खाद्य/ऊर्जा सुरक्षा से जोड़ने की माँग है।
| वर्ष | प्रश्न (विषय) |
|---|---|
| 2026 | दक्षिण एशिया में जल — संपदा और संघर्ष का स्रोत; जलवायु-स्मार्ट कृषि में उपग्रह तकनीक; वैश्विक व्यापार का केंद्र अटलांटिक से हिंद-प्रशांत की ओर; भारत में मानव-जनित भूमि-उपयोग परिवर्तन |
| 2025 | गैर-कृषि प्राथमिक गतिविधियाँ और भौतिक लक्षण; सौर ऊर्जा के लाभ; अपतटीय (offshore) तेल भंडार; AI-ड्रोन-GIS-RS से अवस्थितिक नियोजन; गंगा बेसिन में जनसंख्या वितरण |
| 2024 | गंगा घाटी में भूजल में गिरावट और खाद्य सुरक्षा |
UPSC अब "कहाँ है" से ज़्यादा "क्यों वहाँ है और उसका क्या असर है" पूछता है। हर उत्तर में तीन परतें रखें: (1) भौगोलिक कारण, (2) आर्थिक/सामाजिक प्रभाव, (3) नीति और आगे की राह।
2. प्राकृतिक संसाधनों का वितरण
भारत के प्रमुख खनिज
| संसाधन | प्रमुख क्षेत्र | भौगोलिक कारण |
|---|---|---|
| कोयला | दामोदर घाटी (झरिया, रानीगंज), महानदी, गोदावरी, सोन घाटियाँ | गोंडवाना काल की अवसादी चट्टानें — भारत का लगभग 98% कोयला गोंडवाना का |
| लौह अयस्क | ओडिशा, झारखंड, छत्तीसगढ़ (बैलाडीला), कर्नाटक, गोवा | प्राचीन धारवाड़ चट्टानें — हेमेटाइट और मैग्नेटाइट |
| बॉक्साइट | ओडिशा (पंचपटमाली), गुजरात, झारखंड, महाराष्ट्र | उष्णकटिबंधीय लैटेराइट अपक्षय |
| खनिज तेल-गैस | मुंबई हाई, कृष्णा-गोदावरी बेसिन, असम, गुजरात (अंकलेश्वर), बाड़मेर | अवसादी बेसिन, अपनति (anticline) जाल |
| महत्वपूर्ण खनिज (critical minerals) | लिथियम — रियासी (J&K, 2023 में भंडार की सूचना); दुर्लभ मृदा — केरल-ओडिशा के तटीय मोनाज़ाइट बालू | पेग्मेटाइट, प्लेसर निक्षेप |
नीति: 30 महत्वपूर्ण खनिजों की सूची (2023), खान और खनिज (विकास एवं विनियमन) संशोधन अधिनियम 2023 से इन खनिजों की नीलामी केंद्र के हाथ में, राष्ट्रीय महत्वपूर्ण खनिज मिशन (2025), KABIL (विदेश में खनिज संपत्ति अर्जन — अर्जेंटीना में लिथियम)।

विश्व स्तर पर
- पेट्रोलियम: पश्चिम एशिया (फ़ारस की खाड़ी), रूस, अमेरिका (शेल), वेनेज़ुएला (भारी तेल) — इसीलिए होर्मुज़ जलडमरूमध्य रणनीतिक।
- लौह अयस्क: ऑस्ट्रेलिया (पिलबारा), ब्राज़ील (काराजास), चीन; ताँबा: चिली, पेरू; लिथियम: "लिथियम त्रिकोण" (चिली-अर्जेंटीना-बोलीविया), ऑस्ट्रेलिया; कोबाल्ट: कांगो (DRC); दुर्लभ मृदा: प्रसंस्करण में चीन का प्रभुत्व।
- सबक: संसाधन का असमान वितरण ही व्यापार, भू-राजनीति और "संसाधन अभिशाप" (resource curse) का कारण बनता है।
3. प्राथमिक गतिविधियाँ और भौतिक लक्षण (UPSC 2025)
प्राथमिक गतिविधियाँ सीधे प्रकृति पर निर्भर हैं, इसलिए उनका वितरण उच्चावच, जलवायु, मिट्टी और जल से तय होता है। कृषि के अलावा गैर-कृषि प्राथमिक गतिविधियाँ:
| गतिविधि | भौतिक आधार | भारत में उदाहरण |
|---|---|---|
| मत्स्यन | लंबी तटरेखा (नई गणना 2024 में लगभग 11,098 किमी), चौड़ा मग्नतट, नदी-डेल्टा | केरल, गुजरात, आंध्र प्रदेश; अंतर्देशीय मत्स्य में पश्चिम बंगाल और आंध्र |
| खनन | प्राचीन पठारी चट्टानें | छोटानागपुर, ओडिशा, छत्तीसगढ़ |
| वानिकी / लघु वनोपज | अधिक वर्षा, पहाड़ी भूभाग | पूर्वोत्तर, पश्चिमी घाट, मध्य भारत (तेंदू पत्ता, महुआ, लाख) |
| पशुपालन / ऋतु-प्रवास (transhumance) | पर्वतीय घास के मैदान, शुष्क क्षेत्र | गद्दी, बकरवाल, गुज्जर (हिमालय); रेबारी/राइका (थार) |
| उत्खनन (quarrying) | संगमरमर, ग्रेनाइट, बलुआ पत्थर | राजस्थान (मकराना), कर्नाटक, तमिलनाडु |
| समुद्री शैवाल, मोती | उथले, गर्म, शांत तटीय जल | मन्नार की खाड़ी, कच्छ |

4. उद्योगों की अवस्थिति के कारक
- वेबर का न्यूनतम-लागत सिद्धांत (1909): उद्योग वहाँ लगेगा जहाँ परिवहन लागत न्यूनतम हो; भार-ह्रासी (weight-losing) कच्चे माल वाले उद्योग कच्चे माल के पास (लोहा-इस्पात, चीनी, सीमेंट), भार-वर्धक उद्योग बाज़ार के पास (पेय पदार्थ)।
- भौतिक कारक: कच्चा माल, ऊर्जा, जल, जलवायु (सूती वस्त्र के लिए आर्द्रता)।
- मानवीय कारक: श्रम, बाज़ार, पूँजी, परिवहन, सरकारी नीति (SEZ, PLI, औद्योगिक गलियारे), संकुलन लाभ (agglomeration)।
- मुक्त (footloose) उद्योग: IT, इलेक्ट्रॉनिक्स — कुशल श्रम, इंटरनेट और जीवन-गुणवत्ता से तय।
| उद्योग | अवस्थिति | मुख्य कारण |
|---|---|---|
| लोहा-इस्पात | जमशेदपुर (1907), भिलाई, राउरकेला, बोकारो, दुर्गापुर | कोयला-लोहा-चूना पत्थर की निकटता (छोटानागपुर) |
| सूती वस्त्र | मुंबई, अहमदाबाद, कोयंबटूर | कपास क्षेत्र, आर्द्र जलवायु, बंदरगाह, बाज़ार; बाद में कपास क्षेत्र की ओर विकेंद्रीकरण |
| चीनी | उत्तर प्रदेश से महाराष्ट्र-कर्नाटक की ओर खिसकाव | दक्षिण में अधिक सुक्रोज़, लंबा पेराई काल, सहकारी समितियाँ |
| एल्युमिनियम | ओडिशा (अंगुल, दामनजोड़ी), छत्तीसगढ़ (कोरबा) | बॉक्साइट + सस्ती बिजली |
| IT / सेवाएँ | बेंगलुरु, हैदराबाद, पुणे, गुरुग्राम | कुशल श्रम, शिक्षा संस्थान, नीति |
| सेमीकंडक्टर (नया) | गुजरात (साणंद, धोलेरा), असम (मोरीगाँव) | भारत सेमीकंडक्टर मिशन (2021) की सब्सिडी, जल-बिजली की उपलब्धता, गलियारे |

विश्व के उदाहरण: जर्मनी का रूर (कोयला आधारित, अब सेवा अर्थव्यवस्था में बदला), अमेरिका का पिट्सबर्ग ("स्टील सिटी" से तकनीकी केंद्र), सिलिकॉन वैली (footloose), चीन के तटीय SEZ (निर्यात + सस्ता श्रम)। तृतीयक क्षेत्र: बेंगलुरु, डबलिन, सिंगापुर।
5. ऊर्जा संसाधन: अपतटीय तेल और सौर ऊर्जा (UPSC 2025)
अपतटीय तेल भंडार
- निर्माण: करोड़ों वर्ष पहले उथले समुद्रों में प्लवक और समुद्री जीवों के अवशेष अवसादों के साथ दबे; ऊष्मा और दाब से हाइड्रोकार्बन बने। इसके लिए चाहिए — स्रोत चट्टान (shale), भंडार चट्टान (छिद्रिल बलुआ पत्थर/चूना पत्थर), आवरण चट्टान (cap rock) और जाल (अपनति, भ्रंश, लवण गुंबद)।
- महाद्वीपीय मग्नतट क्यों: मोटी अवसादी परतें, नदी-डेल्टाओं से जैविक पदार्थ (कृष्णा-गोदावरी, गंगा-ब्रह्मपुत्र), निष्क्रिय तटीय सीमाओं पर स्थिर बेसिन।
- उदाहरण: मुंबई हाई (खोज 1974), KG-D6 (गैस), उत्तरी सागर, मेक्सिको की खाड़ी, फ़ारस की खाड़ी, ब्राज़ील का "प्री-सॉल्ट" भंडार।
| आधार | अपतटीय (offshore) | स्थलीय (onshore) |
|---|---|---|
| लागत | बहुत अधिक (प्लेटफ़ॉर्म, गहरे समुद्र की तकनीक) | कम |
| भंडार का आकार | प्रायः बड़े, कम खोजे गए | कई पुराने क्षेत्र परिपक्व (असम) |
| पर्यावरणीय जोखिम | तेल रिसाव का बड़ा ख़तरा (Deepwater Horizon, 2010), समुद्री जैव-विविधता | भूमि अधिग्रहण, वन-विस्थापन |
| अन्य | चक्रवात से बाधा; समुद्री सीमा और EEZ विवाद | स्थानीय विरोध, सुरक्षा |
भारत: कच्चे तेल की 85% से अधिक आवश्यकता आयात से; इसलिए HELP (2016) और Open Acreage Licensing Policy से खोज बढ़ाने का प्रयास, अंडमान और गहरे समुद्र में अन्वेषण ("Samudra Manthan" — राष्ट्रीय गहरे जल अन्वेषण मिशन की घोषणा, 2025)।
सौर ऊर्जा
- भौगोलिक आधार: उष्णकटिबंधीय स्थिति, वर्ष में लगभग 250-300 धूप वाले दिन; थार, लद्दाख और दक्कन सबसे उपयुक्त।
- प्रगति: स्थापित सौर क्षमता जनवरी 2025 में 100 GW पार; जून 2025 में स्थापित बिजली क्षमता का 50% गैर-जीवाश्म स्रोतों से (NDC लक्ष्य से पाँच वर्ष पहले); लक्ष्य — 2030 तक 500 GW गैर-जीवाश्म क्षमता।
- पारिस्थितिक लाभ: कार्बन उत्सर्जन और वायु प्रदूषण में कमी, कोयला खनन से भूमि-जल क्षरण में कमी, ताप बिजलीघरों की तुलना में जल की बचत।
- आर्थिक लाभ: आयात बिल और ऊर्जा असुरक्षा में कमी, किसानों की आय (PM-KUSUM — सौर पंप, "अन्नदाता से ऊर्जादाता"), छत पर सौर से बिजली बिल में राहत (PM सूर्य घर मुफ़्त बिजली योजना, 2024), रोज़गार, विनिर्माण (PLI से सौर मॉड्यूल)।
- चुनौतियाँ: भंडारण (बैटरी), भूमि की आवश्यकता, चीन पर उपकरण निर्भरता, ग्रेट इंडियन बस्टर्ड के आवास में बिजली लाइनें, DISCOMs की वित्तीय हालत, ई-अपशिष्ट।
- अंतरराष्ट्रीय: अंतरराष्ट्रीय सौर गठबंधन (ISA, 2015, मुख्यालय गुरुग्राम), "One Sun One World One Grid"।
6. जल संसाधन: भूजल और दक्षिण एशिया
गंगा घाटी में भूजल संकट (UPSC 2024)
- भारत विश्व का सबसे बड़ा भूजल उपयोगकर्ता है (वैश्विक निकासी का लगभग एक-चौथाई), और सिंचाई का बड़ा भाग भूजल से होता है।
- कारण: धान-गेहूँ चक्र (पंजाब-हरियाणा में धान जैसी जल-गहन फ़सल), मुफ़्त या सस्ती बिजली, ट्यूबवेल की बाढ़, शहरीकरण से पुनर्भरण में कमी, वर्षा की अनियमितता।
- स्थिति: केंद्रीय भूजल बोर्ड के आकलन में पंजाब, हरियाणा, राजस्थान और दिल्ली में निकासी पुनर्भरण से अधिक; पंजाब में निकासी का स्तर 150% से अधिक।
- गुणवत्ता: मध्य और निचली गंगा घाटी (बिहार, पश्चिम बंगाल, उत्तर प्रदेश) में आर्सेनिक, पंजाब में यूरेनियम और नाइट्रेट।
- खाद्य सुरक्षा पर प्रभाव: यह मैदान केंद्रीय पूल को गेहूँ-धान का बड़ा भाग देता है; भूजल गिरने से सिंचाई लागत बढ़ती है, छोटे किसान बाहर होते हैं, और लंबे समय में उत्पादन अस्थिर होता है।
- उपाय: अटल भूजल योजना (2019, सहभागी प्रबंधन), जल शक्ति अभियान — "Catch the Rain", मिशन अमृत सरोवर (2022), पंजाब का भूजल संरक्षण अधिनियम 2009 (धान रोपाई में देरी), फ़सल विविधीकरण, सूक्ष्म सिंचाई, बिजली का मीटर आधारित मूल्य।
दक्षिण एशिया में जल: संपदा भी, संघर्ष भी (UPSC 2026)
| नदी / समझौता | देश | स्थिति |
|---|---|---|
| सिंधु जल संधि (1960, विश्व बैंक की मध्यस्थता) | भारत-पाकिस्तान | अप्रैल 2025 में भारत ने संधि को स्थगित (abeyance) रखा |
| गंगा जल बँटवारा संधि (1996, 30 वर्ष) | भारत-बांग्लादेश | फ़रक्का पर बँटवारा; संधि की अवधि 2026 में पूरी — नवीनीकरण पर वार्ता |
| तीस्ता | भारत-बांग्लादेश | समझौता लंबित; चीन की तीस्ता परियोजना में रुचि |
| कोसी (1954), गंडक (1959), महाकाली संधि (1996) | भारत-नेपाल | बाढ़ नियंत्रण, सिंचाई; नेपाल में असंतोष के मुद्दे |
| चुखा, ताला, मंगदेछू जलविद्युत | भारत-भूटान | सहयोग का सफल मॉडल — भूटान की आय का प्रमुख स्रोत |
| यारलुंग त्सांगपो (ब्रह्मपुत्र) | चीन-भारत-बांग्लादेश | मेडोग में विशाल बाँध का निर्माण (2025 से) — भारत की चिंता; जल-आँकड़े साझा करने के MoU |
7. भूमि-उपयोग परिवर्तन और जनसंख्या वितरण
- मानव-जनित भूमि-उपयोग परिवर्तन के कारक: शहरीकरण और अवसंरचना (राजमार्ग, गलियारे), कृषि विस्तार और गहनता, खनन, बाँध, झूम खेती, वन भूमि का अन्य उपयोग, औद्योगीकरण।
- परिणाम: ISRO के मरुस्थलीकरण एटलस (2021) के अनुसार 2018-19 में देश की लगभग 30% भूमि (97.85 मिलियन हेक्टेयर) क्षरण की स्थिति में; जैव-विविधता हानि, नगरीय ऊष्मा द्वीप, शहरी बाढ़ (बेंगलुरु, चेन्नई), मानव-वन्यजीव संघर्ष, मिट्टी का अपरदन, कृषि भूमि में कमी से खाद्य सुरक्षा पर दबाव।
- सकारात्मक पक्ष: भारत वन स्थिति रिपोर्ट 2023 के अनुसार वन और वृक्ष आवरण भौगोलिक क्षेत्र का लगभग 25%; कृषि-वानिकी का विस्तार।

गंगा बेसिन में जनसंख्या वितरण (UPSC 2025)
- गंगा बेसिन भारत के लगभग 26% क्षेत्र पर है और देश की लगभग 43% जनसंख्या को सहारा देता है।
- भूमि: समतल, गहरा जलोढ़ मैदान — खेती, सड़क-रेल निर्माण सरल।
- मिट्टी: उपजाऊ खादर (नया जलोढ़) और भांगर — गहन कृषि, ऊँचा घनत्व (बिहार का घनत्व 2011 में 1,106 व्यक्ति/वर्ग किमी, देश में सर्वाधिक)।
- जल: सदानीरा हिमनद-पोषित नदियाँ, उथला भूजल, नहरें।
- भिन्नता: हिमालयी ऊपरी भाग, बुंदेलखंड और छोटानागपुर की ऊबड़-खाबड़ सीमाओं पर घनत्व कम; डेल्टा और मध्य मैदान में सर्वाधिक; बाढ़-प्रवण उत्तर बिहार में भी अधिक घनत्व पर अधिक सुभेद्यता।

8. तकनीक और संसाधन नियोजन
- GIS और सुदूर संवेदन (RS): उपग्रह चित्रों और मानचित्र परतों से स्थल-उपयुक्तता विश्लेषण — उद्योग, सड़क, सौर पार्क, बाँध कहाँ बनें; ISRO का भुवन पोर्टल।
- AI और ड्रोन: बड़े आँकड़ों से पैटर्न पहचान, सटीक सर्वेक्षण; SVAMITVA योजना (2020) — ड्रोन से ग्रामीण आबादी भूमि के संपत्ति कार्ड; किसान ड्रोन; PM गति शक्ति राष्ट्रीय मास्टर प्लान (2021) — GIS आधारित समन्वित अवसंरचना नियोजन।
- उपग्रह आधारित कृषि: FASAL (फ़सल पूर्वानुमान), CHAMAN (बागवानी), NADAMS (सूखा निगरानी), YES-TECH (PMFBY में उपज आकलन), कृषि निर्णय सहायता प्रणाली (Krishi-DSS, 2024), डिजिटल कृषि मिशन (2024); NISAR (NASA-ISRO, 2025 में प्रक्षेपित) — मिट्टी की नमी, फ़सल और भूमि-परिवर्तन की निगरानी।
9. वैश्विक व्यापार का हिंद-प्रशांत की ओर खिसकाव (UPSC 2026)
- ऐतिहासिक: 19वीं-20वीं शताब्दी में औद्योगिक यूरोप और अमेरिका के कारण अटलांटिक विश्व व्यापार का केंद्र रहा।
- बदलाव के कारण: जापान, "एशियन टाइगर्स", चीन, ASEAN और भारत का उदय; विश्व की आधी से अधिक जनसंख्या और GDP हिंद-प्रशांत में; वैश्विक मूल्य शृंखलाएँ पूर्वी एशिया में; मलक्का जलडमरूमध्य और दक्षिण चीन सागर से बड़ा समुद्री व्यापार; RCEP (2022 से प्रभावी), CPTPP जैसे व्यापार समझौते।
- भौगोलिक कारक: लंबी तटरेखाएँ, बड़े बंदरगाह (शंघाई, सिंगापुर), प्रमुख समुद्री चोक पॉइंट, ऊर्जा का पश्चिम एशिया से पूर्व की ओर प्रवाह।
- भारत के लिए: सागरमाला, विझिंजम गहरा बंदरगाह (2025), ग्रेट निकोबार परियोजना, IMEC गलियारा, Quad और IPEF; चुनौती — चीन का प्रभाव, समुद्री सुरक्षा।
10. विस्तृत विवेचन: भारतीय उद्योगों की अवस्थिति — केस-अध्ययन
"उद्योगों की अवस्थिति के कारक" का सिद्धांत (कच्चा माल, ऊर्जा, बाज़ार, श्रम, परिवहन, पूँजी, सरकारी नीति) तभी उत्तर में प्रभावी बनता है जब उसे भारतीय उद्योगों के ठोस उदाहरणों से जोड़ा जाए। साथ ही UPSC अक्सर "अवस्थिति में परिवर्तन" (shift) पूछता है: कोई उद्योग पहले कहाँ था और अब कहाँ क्यों जा रहा है। नीचे के केस-अध्ययन इसी दृष्टि से बनाए गए हैं।
| उद्योग | पारंपरिक अवस्थिति और कारण | परिवर्तन / नई प्रवृत्ति |
|---|---|---|
| लौह-इस्पात | छोटानागपुर पठार और उसके आसपास (जमशेदपुर, बोकारो, दुर्गापुर, राउरकेला, भिलाई): लौह-अयस्क, कोयला, चूना पत्थर और मैंगनीज़ पास-पास; भारी, "भार-ह्रासी" (weight-losing) कच्चा माल, इसलिए कच्चे माल के निकट अवस्थिति | तटीय इस्पात संयंत्र (विशाखापत्तनम, ओडिशा तट): आयातित कोकिंग कोयला और निर्यात के लिए बंदरगाह-निकटता; कच्चे माल से "बंदरगाह-अवस्थिति" की ओर झुकाव |
| सूती वस्त्र | मुंबई और अहमदाबाद: कपास उत्पादक क्षेत्र (काली मिट्टी), आर्द्र जलवायु (धागा टूटने में कमी), बंदरगाह, पूँजी और बाज़ार | कपास "शुद्ध" कच्चा माल है (भार कम नहीं होता), इसलिए उद्योग बाज़ार और सस्ते श्रम की ओर फैला: तमिलनाडु (कोयंबटूर, तिरुप्पुर), पावरलूम केंद्र (भिवंडी, सूरत); मुंबई की मिलों का 1980 के दशक के बाद पतन |
| चीनी | पहले मुख्यतः उत्तर प्रदेश-बिहार (गन्ना उत्पादक क्षेत्र); गन्ना जल्दी सूखता और रस खोता है, इसलिए खेत के निकट मिल | महाराष्ट्र, कर्नाटक, तमिलनाडु की ओर विस्तार: उष्णकटिबंधीय जलवायु में अधिक शर्करा-अंश, लंबा पेराई-मौसम, सहकारी चीनी मिलें |
| सीमेंट | चूना पत्थर और जिप्सम क्षेत्रों के निकट (मध्य प्रदेश, राजस्थान, आंध्र प्रदेश) | भारी उत्पाद होने से बाज़ार-निकट "grinding units"; बंदरगाहों के पास इकाइयाँ |
| पेट्रोरसायन और शोधन | बंदरगाह-निकट (मुंबई, कोच्चि) और तेल क्षेत्रों के पास (असम में डिगबोई, विश्व की सबसे पुरानी चालू रिफ़ाइनरियों में गिनी जाती है) | जामनगर (गुजरात) में विश्व के सबसे बड़े शोधन परिसरों में से एक: तटीय अवस्थिति, आयातित कच्चा तेल, निर्यात-उन्मुख |
| सूचना प्रौद्योगिकी | बेंगलुरु, हैदराबाद, पुणे, चेन्नई, NCR: कुशल मानव संसाधन, शिक्षण संस्थान, अनुकूल जलवायु, सरकारी प्रोत्साहन (सॉफ़्टवेयर टेक्नोलॉजी पार्क), "agglomeration" का लाभ | "फ़ुटलूज़" (कच्चे माल से मुक्त) उद्योग; अब टियर-2 शहरों (कोयंबटूर, इंदौर, जयपुर, भुवनेश्वर) की ओर विस्तार, दूरस्थ कार्य से नई संभावनाएँ |
| ऑटोमोबाइल | "ऑटो-क्लस्टर": चेन्नई, पुणे-चाकण, गुड़गाँव-मानेसर, साणंद | सहायक उद्योगों (ancillaries) का समूहन; इलेक्ट्रिक वाहन और बैटरी-निर्माण के नए क्लस्टर |
| सेमीकंडक्टर और इलेक्ट्रॉनिक्स | पहले नगण्य; इलेक्ट्रॉनिक्स असेंबली नोएडा और तमिलनाडु में | PLI योजनाओं और भारत सेमीकंडक्टर मिशन के अंतर्गत गुजरात, असम आदि में इकाइयों की घोषणा; पानी, निर्बाध बिजली और कुशल श्रम की आवश्यकता नई अवस्थिति-चुनौतियाँ |
- वेबर का न्यूनतम लागत सिद्धांत: उद्योग वहाँ स्थापित होता है जहाँ परिवहन लागत न्यूनतम हो। "भार-ह्रासी" कच्चे माल (लौह-अयस्क, गन्ना) वाले उद्योग कच्चे माल के पास; "शुद्ध" या भार-वर्धी उत्पाद वाले उद्योग बाज़ार के पास।
- समूहन लाभ (Agglomeration economies): एक स्थान पर कई इकाइयों से साझा अवसंरचना, कुशल श्रम और आपूर्तिकर्ता मिलते हैं (IT, ऑटो क्लस्टर)।
- औद्योगिक जड़त्व (Industrial inertia): मूल कारण समाप्त होने के बाद भी उद्योग पुरानी जगह बना रहता है, क्योंकि वहाँ स्थापित अवसंरचना और श्रम है।
- नीति-प्रेरित अवस्थिति: पिछड़े क्षेत्रों में सार्वजनिक क्षेत्र के संयंत्र (भिलाई, बोकारो), विशेष आर्थिक क्षेत्र (SEZ), PLI योजनाएँ।
11. विस्तृत विवेचन: महत्वपूर्ण खनिज (Critical Minerals)
ऊर्जा संक्रमण (सौर, पवन, इलेक्ट्रिक वाहन, बैटरी) ने लिथियम, कोबाल्ट, निकल, दुर्लभ मृदा तत्वों (rare earth elements) और ग्रेफ़ाइट जैसे खनिजों को नई भू-राजनीति के केंद्र में ला दिया है। इनका खनन और विशेषकर प्रसंस्करण (processing) कुछ ही देशों में केंद्रित है, जिससे आपूर्ति-श्रृंखला का जोखिम बढ़ता है।
- भारत की पहल: 2023 में खान मंत्रालय ने 30 महत्वपूर्ण खनिजों की सूची जारी की; खान और खनिज (विकास और विनियमन) अधिनियम में 2023 के संशोधन से कुछ महत्वपूर्ण खनिजों की नीलामी केंद्र सरकार को सौंपी गई; राष्ट्रीय महत्वपूर्ण खनिज मिशन (2025) की घोषणा; विदेश में खनिज परिसंपत्तियाँ प्राप्त करने के लिए KABIL (Khanij Bidesh India Ltd)।
- घरेलू संभावनाएँ: जम्मू-कश्मीर के रियासी में लिथियम के अनुमानित भंडार की सूचना (2023); पूर्वी तट की रेत में दुर्लभ मृदा तत्वों से जुड़े खनिज (मोनाज़ाइट)।
- चुनौतियाँ: अन्वेषण में कम निवेश, प्रसंस्करण तकनीक का अभाव, पर्यावरणीय और सामाजिक प्रभाव (जनजातीय क्षेत्रों में खनन), पुनर्चक्रण (recycling) की कमज़ोर व्यवस्था।
- अंतरराष्ट्रीय सहयोग: खनिज सुरक्षा साझेदारी (MSP) में भारत की भागीदारी, क्वाड और अन्य द्विपक्षीय समझौते (जैसे ऑस्ट्रेलिया, अर्जेंटीना के साथ)।
भारत में लौह-इस्पात उद्योग की अवस्थिति "कच्चे माल-उन्मुख" से "बंदरगाह-उन्मुख" क्यों हो रही है? (150 शब्द)
मॉडल उत्तर
पारंपरिक अवस्थिति: लौह-इस्पात उद्योग भार-ह्रासी कच्चे माल (लौह-अयस्क, कोकिंग कोयला, चूना पत्थर) पर निर्भर है, इसलिए वेबर के सिद्धांत के अनुसार ये संयंत्र छोटानागपुर पठार और उसके आसपास (जमशेदपुर, बोकारो, राउरकेला, भिलाई, दुर्गापुर) स्थापित हुए।
बदलाव के कारण:
- भारत में उच्च गुणवत्ता का कोकिंग कोयला सीमित है; बड़ी मात्रा आयात होती है, इसलिए बंदरगाह के पास संयंत्र से परिवहन लागत घटती है।
- निर्यात-उन्मुख उत्पादन के लिए बंदरगाह-निकटता।
- बड़े एकीकृत संयंत्रों के लिए भूमि और जल की उपलब्धता तटीय क्षेत्रों में।
- सागरमाला जैसी बंदरगाह-आधारित विकास नीति और तटीय आर्थिक क्षेत्र।
- उदाहरण: विशाखापत्तनम, ओडिशा तट (पारादीप-धामरा क्षेत्र), गुजरात तट।
निष्कर्ष: यह परिवर्तन दिखाता है कि वैश्वीकरण के युग में "कच्चे माल की निकटता" की जगह "आपूर्ति-श्रृंखला की दक्षता" अवस्थिति का मुख्य निर्धारक बन रही है; पर ओडिशा-झारखंड जैसे खनिज-समृद्ध राज्य, जहाँ अयस्क और बंदरगाह दोनों पास हैं, दोनों लाभ उठा सकते हैं।
सूचना प्रौद्योगिकी उद्योग को "फ़ुटलूज़" उद्योग क्यों कहा जाता है? इसके बावजूद यह भारत के कुछ ही शहरों में क्यों केंद्रित है? (150 शब्द)
मॉडल उत्तर
फ़ुटलूज़ क्यों: IT उद्योग किसी भारी कच्चे माल या विशेष ऊर्जा-स्रोत पर निर्भर नहीं; इसका "उत्पाद" डिजिटल रूप में कहीं भी भेजा जा सकता है। इसलिए सैद्धांतिक रूप से यह कहीं भी स्थापित हो सकता है।
फिर भी केंद्रीकरण के कारण:
- कुशल मानव संसाधन: बेंगलुरु, हैदराबाद, पुणे, चेन्नई में इंजीनियरिंग कॉलेज और शोध संस्थान।
- समूहन लाभ: कंपनियाँ, स्टार्ट-अप, निवेशक और सेवा-प्रदाता एक साथ; ज्ञान का प्रसार (knowledge spillover)।
- अवसंरचना: उच्च-गति इंटरनेट, अंतरराष्ट्रीय हवाई संपर्क, निर्बाध बिजली।
- नीति: सॉफ़्टवेयर टेक्नोलॉजी पार्क, राज्य सरकारों के प्रोत्साहन।
- प्रारंभिक लाभ और जड़त्व: जो शहर पहले आगे निकले, वहाँ प्रतिभा और निवेश आता रहा।
नई प्रवृत्ति: महानगरों में बढ़ती लागत, यातायात और जल-संकट के कारण टियर-2 शहरों और दूरस्थ कार्य की ओर विस्तार, जो क्षेत्रीय असमानता घटाने का अवसर है।
12. Master Summary Table
| विषय | मुख्य बिंदु | तथ्य/योजना |
|---|---|---|
| खनिज | गोंडवाना कोयला, धारवाड़ लोहा, लैटेराइट बॉक्साइट | 30 महत्वपूर्ण खनिज (2023); NCMM (2025) |
| उद्योग अवस्थिति | वेबर — भार-ह्रासी कच्चे माल के पास | चीनी का दक्षिण की ओर खिसकाव; ISM 2021 |
| अपतटीय तेल | मग्नतट, डेल्टा, अवसादी जाल | मुंबई हाई 1974; HELP 2016 |
| सौर | पारिस्थितिक + आर्थिक लाभ | 100 GW (जनवरी 2025); 500 GW लक्ष्य 2030 |
| भूजल | धान-गेहूँ, मुफ़्त बिजली | अटल भूजल 2019; पंजाब अधिनियम 2009 |
| दक्षिण एशिया जल | संपदा + संघर्ष | सिंधु संधि स्थगित (2025); गंगा संधि 2026 |
| भूमि-उपयोग | शहरीकरण, खनन, कृषि | ~30% भूमि क्षरित (ISRO एटलस 2021) |
| तकनीक | GIS, RS, AI, ड्रोन | SVAMITVA 2020; गति शक्ति 2021; NISAR 2025 |
| व्यापार | अटलांटिक → हिंद-प्रशांत | RCEP, IPEF, सागरमाला |
13. Mind Map
- खनिज, ऊर्जा
- जल, भूमि
- मत्स्यन, खनन
- वानिकी, पशुपालन
- वेबर सिद्धांत
- लोहा, वस्त्र, चीनी, सेमीकंडक्टर
- IT, footloose
- व्यापार मार्ग
- GIS, उपग्रह, AI
- गति शक्ति, PLI
14. महत्वपूर्ण One-liners
- भारत का "खनिज हृदय-स्थल": छोटानागपुर पठार।
- भारत का लगभग 98% कोयला: गोंडवाना चट्टानों में।
- भारत का पहला बड़ा इस्पात संयंत्र: TISCO, जमशेदपुर (1907)।
- मुंबई हाई की खोज: 1974।
- न्यूनतम-लागत उद्योग अवस्थिति सिद्धांत: अल्फ़्रेड वेबर (1909)।
- अंतरराष्ट्रीय सौर गठबंधन का मुख्यालय: गुरुग्राम।
- ड्रोन से ग्रामीण संपत्ति कार्ड: SVAMITVA (2020)।
- GIS आधारित अवसंरचना नियोजन: PM गति शक्ति (2021)।
- भूजल का सहभागी प्रबंधन: अटल भूजल योजना (2019)।
- भारत-बांग्लादेश गंगा जल संधि: 1996।
- सिंधु जल संधि: 1960; अप्रैल 2025 में भारत द्वारा स्थगित।
- लिथियम भंडार की सूचना (2023): रियासी, जम्मू-कश्मीर।
15. टिप्स एवं ट्रिक्स
- "अवस्थिति के कारक" वाले प्रश्न में कारकों को भौतिक बनाम मानवीय में बाँटें और हर कारक के साथ एक भारतीय उदाहरण दें।
- भारत का रूपरेखा मानचित्र बनाकर स्थान अंकित करें — मुंबई हाई, KG बेसिन, भड़ला सौर पार्क, छोटानागपुर।
- संसाधन प्रश्नों में SDG (SDG 6 जल, SDG 7 ऊर्जा, SDG 15 भूमि) से जोड़ना निष्कर्ष को मज़बूत बनाता है।
- आँकड़े वही लिखें जिन पर भरोसा हो; अनिश्चित हों तो "लगभग" या प्रवृत्ति लिखें, गढ़ा हुआ अंक नहीं।
उद्योग अवस्थिति के कारक: "क-ऊ-श्र-बा-प-नी" — कच्चा माल, ऊर्जा, श्रम, बाज़ार, परिवहन, नीति।
16. PYQ-आधारित प्रश्न एवं मॉडल उत्तर
अपतटीय तेल भंडारों की उपस्थिति की भौगोलिक व्याख्या कीजिए। स्थलीय भंडारों की तुलना में ये किस प्रकार भिन्न हैं? (250 शब्द)
मॉडल उत्तर
भूमिका: विश्व के कच्चे तेल उत्पादन का बड़ा भाग अपतटीय क्षेत्रों से आता है — मेक्सिको की खाड़ी, उत्तरी सागर, फ़ारस की खाड़ी, ब्राज़ील, और भारत में मुंबई हाई तथा KG बेसिन।
भौगोलिक व्याख्या: (1) अवसादी बेसिन: महाद्वीपीय मग्नतट पर करोड़ों वर्षों से मोटी अवसादी परतें जमा होती हैं; (2) जैविक स्रोत: उथले, गर्म समुद्रों में प्लवक की प्रचुरता, नदी-डेल्टाओं से जैविक पदार्थ; (3) ऊष्मा और दाब: दबे पदार्थ "तेल खिड़की" के तापमान पर हाइड्रोकार्बन बनते हैं; (4) जाल संरचनाएँ: अपनति, भ्रंश और लवण गुंबद — छिद्रिल भंडार चट्टान के ऊपर अपारगम्य आवरण चट्टान तेल को रोकती है; (5) निष्क्रिय तटीय सीमाओं (जैसे भारत का पश्चिमी तट) पर स्थिर बेसिन।
[रेखाचित्र: अपनति जाल — आवरण चट्टान, गैस, तेल, जल की परतें]
स्थलीय से भिन्नता: (1) अपतटीय की खोज और उत्पादन लागत कहीं अधिक — प्लेटफ़ॉर्म, गहरे जल की तकनीक; (2) भंडार प्रायः बड़े और कम खोजे गए, जबकि कई स्थलीय क्षेत्र (असम) परिपक्व; (3) तेल रिसाव से समुद्री पारितंत्र पर बड़ा जोखिम (Deepwater Horizon, 2010); (4) चक्रवात और समुद्री दशाओं से बाधा; (5) EEZ और समुद्री सीमा के विवाद (दक्षिण चीन सागर); (6) स्थलीय में भूमि अधिग्रहण और स्थानीय विरोध की समस्या अधिक।
भारत: आयात निर्भरता 85% से अधिक; HELP (2016), OALP, गहरे जल मिशन से अपतटीय अन्वेषण पर ज़ोर।
निष्कर्ष: अपतटीय भंडार ऊर्जा सुरक्षा की कुंजी हैं, पर उनका दोहन उन्नत तकनीक और सख़्त पर्यावरणीय सुरक्षा के साथ ही होना चाहिए।
भारत में गैर-कृषि प्राथमिक गतिविधियाँ भौतिक लक्षणों से किस प्रकार जुड़ी हैं? उदाहरण सहित स्पष्ट कीजिए। (150 शब्द)
मॉडल उत्तर
भूमिका: प्राथमिक गतिविधियाँ प्रकृति से सीधे संसाधन निकालती हैं, इसलिए उनका वितरण भौतिक भूगोल का प्रतिबिंब है।
संबंध: (1) तटरेखा और मग्नतट → मत्स्यन: केरल, गुजरात, आंध्र; डेल्टा क्षेत्रों में अंतर्देशीय मत्स्य (पश्चिम बंगाल); (2) प्राचीन पठार → खनन: छोटानागपुर, ओडिशा, छत्तीसगढ़ में कोयला-लोहा-बॉक्साइट; (3) अधिक वर्षा वाले पहाड़ी वन → वानिकी और लघु वनोपज: पूर्वोत्तर, पश्चिमी घाट, मध्य भारत (तेंदू पत्ता, लाख); (4) पर्वतीय घास के मैदान → ऋतु-प्रवास पशुपालन: गद्दी, बकरवाल; शुष्क थार में ऊँट-भेड़ पालन (राइका); (5) चट्टानी संरचना → उत्खनन: मकराना संगमरमर, दक्षिण के ग्रेनाइट; (6) उथला शांत समुद्र → समुद्री शैवाल: मन्नार की खाड़ी।
निष्कर्ष: इन गतिविधियों को सतत बनाने के लिए क्षेत्र-विशिष्ट नीति चाहिए — जैसे ब्लू इकोनॉमी, वन अधिकार अधिनियम, खनन में DMF।
भारत में सौर ऊर्जा के पारिस्थितिक और आर्थिक लाभों की चर्चा कीजिए। (150 शब्द)
मॉडल उत्तर
भूमिका: उष्णकटिबंधीय स्थिति और वर्ष में 250-300 धूप वाले दिन भारत को सौर ऊर्जा के लिए आदर्श बनाते हैं; स्थापित सौर क्षमता जनवरी 2025 में 100 GW पार कर गई।
पारिस्थितिक लाभ: (1) ग्रीनहाउस गैस और वायु प्रदूषण में कमी — NDC और 2070 नेट-ज़ीरो लक्ष्य में सहायक; (2) कोयला खनन से भूमि क्षरण और वन-हानि में कमी; (3) ताप बिजलीघरों की तुलना में जल की बचत; (4) सौर पंप से डीज़ल का उपयोग घटता है।
आर्थिक लाभ: (1) तेल-कोयला आयात बिल और ऊर्जा असुरक्षा में कमी; (2) किसानों की अतिरिक्त आय — PM-KUSUM; (3) छत सौर से घरेलू बिजली ख़र्च में राहत — PM सूर्य घर (2024); (4) विनिर्माण और रोज़गार (PLI); (5) दूरस्थ गाँवों का विद्युतीकरण।
चुनौतियाँ: भंडारण, भूमि, चीन पर निर्भरता, ग्रिड एकीकरण।
निष्कर्ष: ISA के नेतृत्व के साथ सौर ऊर्जा भारत के लिए "हरित विकास" और ऊर्जा आत्मनिर्भरता दोनों का मार्ग है।
गंगा बेसिन में जनसंख्या के वितरण और घनत्व को भूमि, मिट्टी और जल संसाधनों के संदर्भ में स्पष्ट कीजिए। (250 शब्द)
मॉडल उत्तर
भूमिका: गंगा बेसिन भारत के लगभग 26% क्षेत्र पर फैला है पर देश की लगभग 43% जनसंख्या को सहारा देता है — विश्व के सबसे घने बसे नदी बेसिनों में से एक।
भूमि: समतल, विस्तृत जलोढ़ मैदान — कृषि, बस्तियाँ, सड़क-रेल नेटवर्क आसान; इसके विपरीत हिमालयी ऊपरी भाग (उत्तराखंड) और दक्षिणी सीमांत (बुंदेलखंड, छोटानागपुर की तलहटी) ऊबड़-खाबड़ होने से कम घने।
मिट्टी: गहरी, उपजाऊ जलोढ़ — खादर (हर वर्ष बाढ़ से नवीनीकृत) और भांगर; गहन धान-गेहूँ खेती अधिक लोगों का भरण करती है; बुंदेलखंड की पथरीली, कम उपजाऊ मिट्टी पर घनत्व कम।
जल: हिमनद-पोषित सदानीरा नदियाँ, उथला भूजल, सबसे बड़ा नहर-ट्यूबवेल नेटवर्क — वर्ष भर सिंचाई; डेल्टा में प्रचुर जल।
[रूपरेखा मानचित्र: ऊपरी, मध्य, निचला गंगा मैदान — घनत्व के क्षेत्र]
प्रतिरूप: पश्चिम से पूर्व की ओर वर्षा बढ़ने के साथ घनत्व बढ़ता है — बिहार (1,106/वर्ग किमी, 2011) और पश्चिम बंगाल (1,028) सर्वाधिक; ऐतिहासिक कारक — प्राचीन नगर, तीर्थ, प्रशासनिक केंद्र (पाटलिपुत्र, वाराणसी, प्रयागराज)।
चुनौतियाँ: उत्तर बिहार में बाढ़-प्रवण क्षेत्र में भी अधिक घनत्व — सुभेद्यता; भूजल गिरावट, आर्सेनिक, भूमि जोतों का छोटा होना, प्रवासन।
निष्कर्ष: बेसिन का घनत्व प्राकृतिक संसाधनों की देन है; अब चुनौती इन्हीं संसाधनों को टिकाऊ रखते हुए गैर-कृषि रोज़गार बढ़ाने की है (नमामि गंगे, शहरीकरण, कृषि-प्रसंस्करण)।
अवस्थितिक और क्षेत्रीय नियोजन में GIS और सुदूर संवेदन के साथ कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) और ड्रोन की भूमिका की चर्चा कीजिए। (250 शब्द)
मॉडल उत्तर
भूमिका: नियोजन का मूल प्रश्न है — "क्या, कहाँ और कितना"। GIS परतों में स्थानिक आँकड़े जोड़ता है, सुदूर संवेदन (RS) बड़े क्षेत्र के अद्यतन चित्र देता है, ड्रोन सटीक स्थानीय आँकड़े और AI इन सबमें पैटर्न पहचान व पूर्वानुमान करता है।
अवस्थितिक नियोजन (स्थल चयन): (1) उद्योग, सौर पार्क, लॉजिस्टिक्स हब के लिए स्थल-उपयुक्तता विश्लेषण — भूमि, जल, सड़क, आबादी की परतें; (2) सड़क-रेल संरेखण में वन और बस्तियों से बचाव; (3) PM गति शक्ति (2021) — मंत्रालयों की परियोजनाओं का एक GIS मंच पर समन्वय।
क्षेत्रीय नियोजन: (1) शहरी मास्टर प्लान, अतिक्रमण और ऊष्मा द्वीप की पहचान; (2) SVAMITVA (2020) — ड्रोन से ग्रामीण संपत्ति कार्ड, ऋण तक पहुँच; (3) कृषि — फ़सल मानचित्रण, उपज आकलन (YES-TECH), किसान ड्रोन से छिड़काव; (4) आपदा — बाढ़ मानचित्रण, भूस्खलन क्षेत्र, चक्रवात के बाद क्षति आकलन; (5) संसाधन — खनिज अन्वेषण, वन आवरण निगरानी (भारत वन स्थिति रिपोर्ट), भूजल पुनर्भरण स्थल।
चुनौतियाँ: आँकड़ों की गुणवत्ता और मानकीकरण, निजता (ड्रोन निगरानी), कुशल मानव संसाधन की कमी, एल्गोरिद्म पूर्वाग्रह, विभागों के बीच आँकड़े साझा न करना।
आगे की राह: राष्ट्रीय भू-स्थानिक नीति (2022), ड्रोन नियम (2021) का उदारीकरण, ओपन डेटा, स्थानीय निकायों का प्रशिक्षण।
निष्कर्ष: ये तकनीकें नियोजन को "अनुमान" से "साक्ष्य-आधारित" बनाती हैं — पर निर्णय में स्थानीय समुदाय की भागीदारी बनी रहनी चाहिए।
गंगा घाटी में भूजल स्तर में गिरावट किस प्रकार खाद्य सुरक्षा को प्रभावित कर रही है? चर्चा कीजिए। (250 शब्द)
मॉडल उत्तर
भूमिका: गंगा-सिंधु मैदान भारत का अन्न भंडार है, और यहाँ की सिंचाई का अधिकांश भाग भूजल पर निर्भर है। भारत विश्व का सबसे बड़ा भूजल उपयोगकर्ता है।
गिरावट के कारण: (1) हरित क्रांति का धान-गेहूँ चक्र — पंजाब-हरियाणा में धान जैसी जल-गहन फ़सल; (2) मुफ़्त/सस्ती बिजली और MSP-खरीद की निश्चितता; (3) ट्यूबवेल की संख्या में विस्फोट; (4) शहरीकरण और कंक्रीट से पुनर्भरण में कमी; (5) वर्षा की अनियमितता और जलवायु परिवर्तन।
स्थिति: CGWB के आकलन में पंजाब, हरियाणा, राजस्थान, दिल्ली में निकासी पुनर्भरण से अधिक; पंजाब में 150% से अधिक; मध्य-निचली घाटी में आर्सेनिक संदूषण।
खाद्य सुरक्षा पर प्रभाव: (1) उपलब्धता: केंद्रीय पूल को गेहूँ-धान का बड़ा भाग इसी क्षेत्र से — उत्पादन पर दीर्घकालिक ख़तरा; (2) पहुँच: गहरे बोरवेल की लागत छोटे किसानों को बाहर करती है, कर्ज़ बढ़ता है; (3) स्थिरता: सूखे के वर्षों में बफ़र समाप्त; (4) पोषण/उपयोग: आर्सेनिक युक्त जल से सिंचित अनाज और पेयजल से स्वास्थ्य संकट।
उपाय: फ़सल विविधीकरण (दालें, मोटे अनाज — अंतरराष्ट्रीय मिलेट वर्ष 2023), DSR (धान की सीधी बुआई), सूक्ष्म सिंचाई, अटल भूजल योजना, मिशन अमृत सरोवर, पंजाब अधिनियम 2009, बिजली सब्सिडी का प्रत्यक्ष हस्तांतरण, MSP में जल-बचत फ़सलों को प्रोत्साहन।
निष्कर्ष: आज की खाद्य सुरक्षा कल की जल सुरक्षा की क़ीमत पर नहीं होनी चाहिए — "More crop per drop" ही रास्ता है।
दक्षिण एशिया में जल संसाधन एक संपदा भी हैं और संघर्ष का स्रोत भी। विवेचना कीजिए। (150 शब्द)
मॉडल उत्तर
संपदा के रूप में: सिंधु, गंगा, ब्रह्मपुत्र प्रणालियाँ करोड़ों लोगों की कृषि, पेयजल, मत्स्य और नौवहन का आधार; जलविद्युत — भारत-भूटान सहयोग (चुखा, ताला, मंगदेछू) भूटान की आय का बड़ा स्रोत; अंतर्देशीय जलमार्ग (भारत-बांग्लादेश प्रोटोकॉल मार्ग)।
संघर्ष के स्रोत: (1) भारत-पाकिस्तान — सिंधु जल संधि (1960), जिसे भारत ने अप्रैल 2025 में स्थगित रखा; (2) भारत-बांग्लादेश — तीस्ता समझौता लंबित, गंगा संधि (1996) की अवधि 2026 में पूरी; (3) भारत-नेपाल — कोसी-गंडक में बाढ़ और लाभ बँटवारे पर असंतोष; (4) चीन — ब्रह्मपुत्र पर मेडोग बाँध, आँकड़े साझा करने की सीमित व्यवस्था; (5) राज्यों के बीच भी (कावेरी)।
कारण: ऊपरी-निचले तटवर्ती का असंतुलन, जनसंख्या दबाव, जलवायु परिवर्तन से हिमनदों का घटना, राजनीतिक अविश्वास।
आगे: बेसिन-स्तरीय सहयोग, बाढ़ पूर्वानुमान आँकड़ों का साझा, संयुक्त जलविद्युत, जल कूटनीति — जल को "साझा समृद्धि" का माध्यम बनाना।
जलवायु-स्मार्ट कृषि और खाद्य सुरक्षा को बढ़ावा देने में उपग्रह-आधारित तकनीकों की भूमिका का परीक्षण कीजिए। (250 शब्द)
मॉडल उत्तर
भूमिका: जलवायु-स्मार्ट कृषि (CSA) के तीन लक्ष्य हैं — उत्पादकता बढ़ाना, जलवायु के प्रति अनुकूलन, और उत्सर्जन घटाना। उपग्रह इन तीनों के लिए बड़े क्षेत्र के समय पर आँकड़े देते हैं।
भूमिका: (1) मौसम पूर्वानुमान: INSAT शृंखला से वर्षा, चक्रवात, उष्ण लहर की चेतावनी — बुआई-कटाई का समय; (2) फ़सल निगरानी: FASAL से उत्पादन पूर्वानुमान, CHAMAN से बागवानी; (3) सूखा और मिट्टी की नमी: NADAMS, NISAR (2025) से नमी और फ़सल-स्वास्थ्य; (4) फ़सल बीमा: YES-TECH से उपज आकलन, दावों का शीघ्र निपटान (PMFBY); (5) सटीक खेती: खाद-जल का आवश्यकता अनुसार उपयोग — लागत और उत्सर्जन कम; (6) भूमि और जल नियोजन: परती भूमि, जल निकाय, भूजल पुनर्भरण स्थल; (7) निर्णय मंच: Krishi-DSS (2024), डिजिटल कृषि मिशन — किसान रजिस्ट्री और डिजिटल फ़सल सर्वेक्षण।
खाद्य सुरक्षा पर: उत्पादन का पूर्व अनुमान → खरीद, भंडारण और निर्यात नीति समय पर; आपदा में राहत का लक्ष्यीकरण।
सीमाएँ: छोटी जोतों में रिज़ॉल्यूशन की समस्या, बादलों में ऑप्टिकल उपग्रह की सीमा (इसलिए रडार — NISAR, EOS-04), किसानों तक अंतिम छोर पर सलाह का अभाव, डिजिटल विभाजन।
आगे की राह: कृषि विज्ञान केंद्र और FPO के माध्यम से स्थानीय भाषा में सलाह, निजी स्टार्टअप-ISRO साझेदारी, भू-स्थानिक आँकड़ों की खुली पहुँच।
निष्कर्ष: अंतरिक्ष तकनीक "खेत से अंतरिक्ष तक" की कड़ी बनाकर कृषि को जलवायु-जोखिम के प्रति लचीला बना सकती है।
"वैश्विक व्यापार का केंद्र अटलांटिक से हिंद-प्रशांत की ओर खिसक रहा है।" इस परिवर्तन के लिए उत्तरदायी कारकों और भारत के लिए इसके निहितार्थों की चर्चा कीजिए। (250 शब्द)
मॉडल उत्तर
भूमिका: औद्योगिक क्रांति से 20वीं शताब्दी तक यूरोप-उत्तर अमेरिका के बीच अटलांटिक व्यापार विश्व अर्थव्यवस्था का केंद्र रहा। 21वीं शताब्दी में यह केंद्र हिंद-प्रशांत की ओर खिसका है।
कारक: (1) आर्थिक उदय: जापान, दक्षिण कोरिया, चीन, ASEAN और भारत; (2) जनसांख्यिकी: विश्व की आधी से अधिक जनसंख्या — विशाल बाज़ार और श्रम; (3) विनिर्माण और मूल्य शृंखलाएँ: इलेक्ट्रॉनिक्स, वाहन, सेमीकंडक्टर पूर्वी एशिया में; (4) भूगोल: मलक्का, होर्मुज़, बाब-अल-मंदेब जैसे चोक पॉइंट, बड़े बंदरगाह (शंघाई, सिंगापुर, बुसान); (5) ऊर्जा प्रवाह: पश्चिम एशिया का तेल पूर्व की ओर; (6) व्यापार समझौते: RCEP, CPTPP; (7) अमेरिका की "Pivot to Asia" और Indo-Pacific रणनीतियाँ।
भारत के लिए अवसर: केंद्रीय भौगोलिक स्थिति, 7,500+ किमी (नई गणना में 11,000+ किमी) तटरेखा, अंडमान-निकोबार की मलक्का के निकट स्थिति; सागरमाला, विझिंजम, ग्रेट निकोबार, IMEC; "China+1" से विनिर्माण निवेश; SAGAR/MAHASAGAR दृष्टि।
चुनौतियाँ: चीन की नौसैनिक उपस्थिति और "String of Pearls", समुद्री डकैती (लाल सागर संकट), बंदरगाह क्षमता और लॉजिस्टिक लागत, RCEP से बाहर रहने का व्यापार प्रभाव।
[विश्व रूपरेखा मानचित्र: प्रमुख समुद्री मार्ग और चोक पॉइंट]
निष्कर्ष: इस परिवर्तन का लाभ उठाने के लिए भारत को समुद्री अवसंरचना, विनिर्माण प्रतिस्पर्धा और Quad-IPEF जैसी साझेदारियों को साथ लेकर चलना होगा।
भारत में मानव-जनित भूमि-उपयोग परिवर्तनों के प्रमुख चालकों और उनके परिणामों की चर्चा कीजिए। (250 शब्द)
मॉडल उत्तर
भूमिका: भूमि-उपयोग परिवर्तन का अर्थ है भूमि के एक उपयोग से दूसरे में बदलाव — वन से कृषि, कृषि से नगर। भारत की सीमित भूमि पर जनसंख्या और विकास का दबाव इसे तेज़ कर रहा है।
चालक: (1) शहरीकरण: उपनगरीय कृषि भूमि का रियल एस्टेट में बदलना, जल निकायों पर अतिक्रमण; (2) अवसंरचना: राजमार्ग, औद्योगिक गलियारे, हवाई अड्डे; (3) कृषि: विस्तार, गहनता, बाग़ानों का फैलाव; (4) खनन: मध्य भारत के वन क्षेत्रों में; (5) बाँध और नहरें; (6) झूम खेती का छोटा चक्र (पूर्वोत्तर); (7) नीतिगत कारक: SEZ, भूमि अधिग्रहण।
परिणाम: (1) भूमि क्षरण: ISRO एटलस (2021) — लगभग 30% भूमि क्षरित; (2) जैव-विविधता हानि और आवास विखंडन — मानव-वन्यजीव संघर्ष; (3) शहरी बाढ़ और नगरीय ऊष्मा द्वीप (बेंगलुरु, चेन्नई); (4) मिट्टी का अपरदन, गाद से जलाशयों की क्षमता में कमी; (5) उपजाऊ कृषि भूमि की हानि — खाद्य सुरक्षा; (6) विस्थापन और सामाजिक संघर्ष (आदिवासी क्षेत्र); (7) स्थानीय जलवायु और जल-चक्र में परिवर्तन।
उपाय: राष्ट्रीय भूमि-उपयोग नीति, GIS आधारित ज़ोनिंग, भूमि क्षरण तटस्थता लक्ष्य (2030 तक 2.6 करोड़ हेक्टेयर पुनरुद्धार), ग्रीन इंडिया मिशन, शहरी हरित पट्टी और आर्द्रभूमि संरक्षण, सहभागी वन प्रबंधन।
निष्कर्ष: भूमि एक सीमित संसाधन है; विकास की योजना "भूमि की वहन क्षमता" के अनुरूप ही टिकाऊ हो सकती है।
17. Quick Revision Summary
- खनिज: गोंडवाना कोयला, धारवाड़ लोहा, लैटेराइट बॉक्साइट; महत्वपूर्ण खनिज मिशन।
- प्राथमिक गतिविधियाँ भौतिक भूगोल का दर्पण — तट से मत्स्य, पठार से खनन, पर्वत से पशुचारण।
- उद्योग अवस्थिति: वेबर, भौतिक-मानवीय कारक, footloose उद्योग, सेमीकंडक्टर का नया भूगोल।
- ऊर्जा: अपतटीय तेल (मग्नतट, जाल संरचनाएँ) और सौर ऊर्जा के पारिस्थितिक-आर्थिक लाभ।
- जल: गंगा घाटी का भूजल संकट, दक्षिण एशिया की जल कूटनीति।
- भूमि-उपयोग परिवर्तन और गंगा बेसिन का जनसंख्या घनत्व।
- तकनीक: GIS, RS, AI, ड्रोन, उपग्रह कृषि; व्यापार का हिंद-प्रशांत की ओर खिसकाव।