1. अध्याय एक नज़र में
Syllabus के तीन बिंदु इस अध्याय में हैं: "महिलाओं और महिला संगठनों की भूमिका", "जनसंख्या और संबद्ध मुद्दे, गरीबी और विकास संबंधी मुद्दे", और "नगरीकरण, उनकी समस्याएँ और उपचार"। ये GS-1 के सबसे समसामयिक हिस्से हैं — प्रश्नों में नई अवधारणाएँ ("demographic winter", "smart city और वितरणात्मक न्याय") आती हैं, इसलिए अवधारणा की स्पष्ट परिभाषा और ताज़ा आँकड़े ज़रूरी हैं।
| वर्ष | प्रश्न |
|---|---|
| 2026 | समकालीन भारत में जनसांख्यिकीय संक्रमण की चुनौतियाँ |
| 2025 | भारत में स्मार्ट सिटी नगरीय गरीबी और वितरणात्मक न्याय के मुद्दों को कैसे संबोधित करती है? |
| 2024 | लैंगिक समानता, लैंगिक समता और महिला सशक्तीकरण में अंतर; "demographic winter"; बड़े शहर छोटे क़स्बों से अधिक प्रवासियों को क्यों आकर्षित करते हैं? |
2. महिलाएँ: स्थिति, भूमिका और सशक्तीकरण
अवधारणाएँ (UPSC 2024)
| अवधारणा | अर्थ | उदाहरण |
|---|---|---|
| लैंगिक समानता (Gender Equality) | परिणाम की समानता — अधिकार, अवसर और संसाधन स्त्री-पुरुष के लिए बराबर | समान काम का समान वेतन (समान पारिश्रमिक अधिनियम 1976, अब वेतन संहिता 2019) |
| लैंगिक समता (Gender Equity) | न्याय की प्रक्रिया — असमान स्थिति को ध्यान में रखकर अलग-अलग सहायता, ताकि बराबरी तक पहुँचा जा सके | पंचायतों में महिला आरक्षण, बालिका छात्रवृत्ति, मातृत्व लाभ |
| महिला सशक्तीकरण (Empowerment) | महिलाओं की निर्णय लेने की क्षमता, आत्मविश्वास, संसाधनों पर नियंत्रण और स्वायत्तता बढ़ना (नाइला कबीर: संसाधन, एजेंसी, उपलब्धि) | स्वयं सहायता समूह, संपत्ति में अधिकार, राजनीतिक नेतृत्व |
नीतियाँ "लिंग-तटस्थ" दिखकर भी असमान प्रभाव डाल सकती हैं: जैसे सार्वजनिक परिवहन का समय-सारणी केवल कार्यालय-समय पर हो तो देखभाल-कार्य करने वाली महिलाओं को लाभ कम। इसलिए जेंडर बजटिंग (भारत में 2005-06 से), लिंग-विभाजित आँकड़े, महिलाओं से परामर्श और जेंडर ऑडिट ज़रूरी हैं।
प्रमुख संकेतक
| संकेतक | स्थिति | स्रोत |
|---|---|---|
| महिला श्रम बल भागीदारी (15+) | लगभग 41.7% (2017-18 में लगभग 23%) | PLFS 2023-24 |
| कुल लिंगानुपात | 1020 प्रति 1000 पुरुष | NFHS-5 |
| जन्म के समय लिंगानुपात | 929 (पिछले पाँच वर्षों में जन्मे बच्चे) | NFHS-5 |
| महिलाओं में एनीमिया (15-49) | लगभग 57% | NFHS-5 |
| मातृ मृत्यु अनुपात | 97 प्रति लाख जीवित जन्म (2018-20) | SRS |
| लोकसभा में महिला सांसद | लगभग 13-15% | 2019 और 2024 के चुनाव |
महिला संगठनों और आंदोलनों की भूमिका
- औपनिवेशिक काल: भारत स्त्री महामंडल (सरला देवी चौधरानी, 1910), अखिल भारतीय महिला सम्मेलन (AIWC, 1927) — शिक्षा, बाल विवाह (शारदा अधिनियम 1929), मताधिकार।
- स्वतंत्रता के बाद: SEWA (इला भट्ट, 1972 — अनौपचारिक क्षेत्र की महिला श्रमिक), मथुरा बलात्कार मामले (1979) के बाद आंदोलन और 1983 का क़ानून संशोधन, दहेज-विरोधी आंदोलन, चिपको में महिलाएँ।
- समकालीन: कुडुम्बश्री (केरल), DAY-NRLM के स्वयं सहायता समूह (करोड़ों महिलाएँ), "लखपति दीदी", निर्भया के बाद क़ानूनी सुधार (2013), कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न अधिनियम (POSH, 2013; विशाखा दिशानिर्देश 1997)।
- राजनीतिक: 73वाँ-74वाँ संशोधन (1992) से पंचायतों-नगर निकायों में एक-तिहाई आरक्षण; 106वाँ संशोधन (2023) से लोकसभा-विधानसभा में एक-तिहाई (जनगणना और परिसीमन के बाद)।
3. जनसंख्या और संबद्ध मुद्दे
जनसांख्यिकीय संक्रमण (UPSC 2026)
- भारत की स्थिति: कुल प्रजनन दर (TFR) NFHS-5 में 2.0 — प्रतिस्थापन स्तर (2.1) से नीचे; बिहार (लगभग 3.0), उत्तर प्रदेश, मेघालय में ऊँची, जबकि केरल, तमिलनाडु, पश्चिम बंगाल में बहुत नीची।
- जनसांख्यिकीय लाभांश: कार्यशील आयु (15-64) की जनसंख्या का अधिक अनुपात; आर्थिक सर्वेक्षण के अनुसार यह अवसर-खिड़की लगभग 2040 के दशक तक।
- चुनौतियाँ: (1) कौशल और रोज़गार — लाभांश "जनसांख्यिकीय बोझ" न बने; (2) क्षेत्रीय असमानता — उत्तर युवा, दक्षिण वृद्ध होता हुआ; परिसीमन और वित्तीय हस्तांतरण पर बहस; (3) तेज़ी से बढ़ती बुज़ुर्ग आबादी — पेंशन, स्वास्थ्य, देखभाल; (4) लिंगानुपात में असंतुलन; (5) महिला श्रम भागीदारी कम होने से लाभांश अधूरा; (6) नगरीकरण और प्रवास का दबाव; (7) स्वास्थ्य-पोषण (बौनापन NFHS-5 में लगभग 35.5%)।
"Demographic Winter" (UPSC 2024)
- अर्थ: लंबे समय तक प्रजनन दर प्रतिस्थापन स्तर से बहुत नीचे रहने से जनसंख्या का घटना और तेज़ी से वृद्ध होना — एक "जनसांख्यिकीय शीत ऋतु"।
- उदाहरण: दक्षिण कोरिया (TFR लगभग 0.7, विश्व में न्यूनतम में), जापान, इटली, चीन (2022 से जनसंख्या घटने लगी)।
- कारण: महँगा आवास और शिक्षा, देर से विवाह, महिलाओं पर करियर और देखभाल का दोहरा बोझ, शहरीकरण, बदलते मूल्य।
- प्रभाव: श्रम की कमी, पेंशन संकट, कम नवाचार, ग्रामीण क्षेत्रों का ख़ाली होना।
- क्या विश्व उस ओर है? वैश्विक TFR लगभग 2.3 तक गिर चुकी है; UN के अनुमान में विश्व जनसंख्या 2080 के दशक में चरम पर पहुँचकर घटने लगेगी। भारत के लिए यह दूर का, पर दक्षिणी राज्यों के लिए निकट का प्रश्न है।

4. गरीबी और विकास
- मापन का विकास: योजना आयोग की उपभोग-आधारित रेखा; लकड़ावाला (1993), तेंदुलकर (2009; 2011-12 में गरीबी 21.9%), रंगराजन (2014) समितियाँ।
- बहुआयामी गरीबी (MPI): स्वास्थ्य, शिक्षा, जीवन-स्तर के 12 संकेतक; NITI Aayog के अनुसार 2013-14 से 2022-23 के बीच लगभग 24.8 करोड़ लोग बहुआयामी गरीबी से बाहर।
- विश्व बैंक: 2025 में अत्यधिक गरीबी रेखा 3 डॉलर प्रतिदिन (2021 PPP) पर संशोधित।
- गरीबी और विकास का संबंध: संवृद्धि आवश्यक, पर पर्याप्त नहीं; मानव पूँजी, रोज़गार, सामाजिक सुरक्षा, महिला सशक्तीकरण और क्षेत्रीय संतुलन से ही टिकाऊ गरीबी-उन्मूलन।
- कार्यक्रम: MGNREGA (2005), खाद्य सुरक्षा अधिनियम (2013) और PM-GKAY, जन धन-आधार-मोबाइल (JAM) से प्रत्यक्ष लाभ अंतरण, PM आवास, आयुष्मान भारत, DAY-NRLM।

5. नगरीकरण: समस्याएँ और उपचार
तथ्य
- जनगणना 2011: नगरीय जनसंख्या 31.1%; 2036 तक लगभग 40% होने का अनुमान।
- दस लाख से अधिक जनसंख्या वाले नगर (2011): 53।
- भारत में नगरीकरण की विशेषता: "छद्म नगरीकरण" (रोज़गार के बिना), जनगणना नगरों (census towns) की तीव्र वृद्धि, महानगरों का विस्तार।
बड़े शहर अधिक प्रवासी क्यों खींचते हैं? (UPSC 2024)
- आर्थिक: औपचारिक और अनौपचारिक दोनों रोज़गार की अधिकता; ऊँची मज़दूरी; "agglomeration economies" (उद्योग, सेवाएँ, बाज़ार का संकेंद्रण)।
- सामाजिक नेटवर्क: पहले से बसे रिश्तेदार और समुदाय (chain migration) — रहने और काम खोजने में सहायता।
- सेवाएँ: बेहतर स्वास्थ्य, शिक्षा, कोचिंग, बिजली-इंटरनेट।
- आकांक्षाएँ और गुमनामी: जाति-बंधनों से मुक्ति, सामाजिक गतिशीलता।
- छोटे क़स्बों की कमज़ोरी: निवेश, उद्योग और अवसंरचना की कमी; प्रशासनिक क्षमता सीमित।
- परिणाम: प्राइमेट सिटी (primate city) का प्रभुत्व, झुग्गियाँ, भीड़, प्रदूषण; जबकि छोटे क़स्बे पिछड़ते हैं।
नगरीय समस्याएँ
झुग्गियाँ (2011 में लगभग 6.5 करोड़ लोग), आवास की कमी, जल संकट, बाढ़ (जलभराव), ठोस अपशिष्ट, वायु प्रदूषण, यातायात, अनौपचारिक रोज़गार, शहरी गरीबी, नगर निकायों की कमज़ोर वित्तीय और प्रशासनिक क्षमता।

स्मार्ट सिटी और वितरणात्मक न्याय (UPSC 2025)
- स्मार्ट सिटी मिशन (2015): 100 शहर; "क्षेत्र-आधारित विकास" (पुनर्विकास, retrofitting) और "पूरे शहर के समाधान" (ICT, एकीकृत कमांड-एंड-कंट्रोल केंद्र)।
- शहरी गरीबी पर योगदान: सस्ते आवास (PMAY-U के साथ अभिसरण), बेहतर जल-स्वच्छता, सार्वजनिक परिवहन, डिजिटल सेवाएँ, कुछ शहरों में स्ट्रीट वेंडर ज़ोन।
- वितरणात्मक न्याय की आलोचना: (1) निवेश का बड़ा हिस्सा छोटे "क्षेत्र" में — शहर के बाक़ी (विशेषकर झुग्गी) हिस्से उपेक्षित; (2) "सौंदर्यीकरण" से फेरीवालों और झुग्गीवासियों का विस्थापन; (3) SPV (विशेष प्रयोजन वाहन) से निर्वाचित नगर निकायों की भूमिका कमज़ोर; (4) तकनीक-केंद्रित, जन-केंद्रित कम; (5) डिजिटल विभाजन।
- संतुलन के उपाय: समावेशी योजना, सहभागी बजट, झुग्गी-उन्नयन (in-situ), स्ट्रीट वेंडर अधिनियम 2014 का पालन, किफ़ायती किराये के आवास (ARHC), नगर निकायों का सशक्तीकरण (74वाँ संशोधन)।
अन्य नगरीय योजनाएँ
AMRUT (2015; AMRUT 2.0, 2021), स्वच्छ भारत मिशन-शहरी, PMAY-शहरी (2015), PM SVANidhi (फेरीवालों के लिए ऋण, 2020), DAY-NULM, PM ई-बस सेवा।
6. विस्तृत विवेचन: जनसांख्यिकीय संक्रमण और बदलती आयु-संरचना
भारत की जनसंख्या-चर्चा लंबे समय तक "जनसंख्या विस्फोट" पर केंद्रित रही। आज प्रश्न बदल गया है: प्रजनन दर तेज़ी से घटी है, आयु-संरचना बदल रही है, और राज्यों के बीच जनसांख्यिकीय अंतर बढ़ रहा है। UPSC इन्हीं नए प्रश्नों को पूछता है: जनसांख्यिकीय लाभांश, वृद्धावस्था, और जनसंख्या का संघवाद पर प्रभाव।
जनसांख्यिकीय संक्रमण सिद्धांत
| चरण | जन्म दर | मृत्यु दर | जनसंख्या वृद्धि | भारत में |
|---|---|---|---|---|
| 1. पूर्व-औद्योगिक | उच्च | उच्च | धीमी | 1921 से पहले (1921 को "महान विभाजक वर्ष" कहा जाता है) |
| 2. प्रारंभिक विस्तार | उच्च | तेज़ी से गिरती | तीव्र | 1921-1951, 1951-1981 ("विस्फोटक" वृद्धि) |
| 3. उत्तर विस्तार | गिरती | निम्न | घटती पर अब भी अधिक | 1981 के बाद; अधिकांश उत्तरी राज्य |
| 4. निम्न स्थिर | निम्न | निम्न | बहुत धीमी | केरल, तमिलनाडु और अधिकांश दक्षिणी राज्य |
| 5. संकुचन (कुछ विद्वान जोड़ते हैं) | बहुत निम्न | निम्न/बढ़ती (वृद्धावस्था) | ऋणात्मक | जापान, कुछ यूरोपीय देश; भारत के कुछ राज्य भविष्य में |
वर्तमान स्थिति: NFHS-5 (2019-21) के अनुसार भारत की कुल प्रजनन दर (TFR) लगभग 2.0 पर आ गई है, जो प्रतिस्थापन स्तर (लगभग 2.1) से नीचे है। पर यह राष्ट्रीय औसत है; बिहार, उत्तर प्रदेश, मेघालय जैसे राज्यों में TFR अब भी प्रतिस्थापन स्तर से ऊपर है, जबकि केरल, तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, पश्चिम बंगाल आदि बहुत नीचे हैं। संयुक्त राष्ट्र के अनुमानों के अनुसार भारत 2023 में विश्व का सबसे अधिक जनसंख्या वाला देश बन गया। "जनसंख्या संवेग" (population momentum) के कारण TFR गिरने के बावजूद जनसंख्या अगले कुछ दशकों तक बढ़ती रहेगी, क्योंकि प्रजनन आयु में बड़ी संख्या में युवा हैं।
- अर्थ: जब कार्यशील आयु (15-64 वर्ष) की जनसंख्या का अनुपात आश्रितों (बच्चे और वृद्ध) से अधिक होता है, तो बचत, निवेश और उत्पादन बढ़ने की संभावना होती है।
- भारत की खिड़की: अनुमानतः लगभग 2040 के दशक तक; पर दक्षिणी राज्यों में यह पहले बंद होगी और उत्तरी राज्यों में बाद में।
- शर्तें: लाभांश स्वचालित नहीं; इसके लिए शिक्षा और कौशल, स्वास्थ्य और पोषण, महिला श्रम-भागीदारी, और पर्याप्त गुणवत्तापूर्ण रोज़गार आवश्यक हैं। अन्यथा यह "जनसांख्यिकीय बोझ" बन सकता है।
- पूर्वी एशिया का उदाहरण: दक्षिण कोरिया जैसे देशों ने शिक्षा और विनिर्माण में निवेश से लाभांश को आर्थिक छलाँग में बदला।
वृद्धावस्था: अगली बड़ी चुनौती
घटती प्रजनन दर और बढ़ती जीवन-प्रत्याशा से वृद्धों का अनुपात बढ़ रहा है। केरल, तमिलनाडु, हिमाचल प्रदेश जैसे राज्यों में यह प्रवृत्ति अधिक स्पष्ट है। चुनौतियाँ: (1) वृद्धों में बड़ी संख्या असंगठित क्षेत्र से आती है, जिनके पास पेंशन नहीं; (2) संयुक्त परिवार के कमज़ोर होने और युवाओं के प्रवासन से अकेले रहने वाले वृद्ध; (3) दीर्घकालिक रोग और देखभाल (geriatric care) का बोझ; (4) "वृद्धावस्था का स्त्रीकरण": महिलाओं की अधिक जीवन-प्रत्याशा के कारण बड़ी संख्या में एकाकी, आर्थिक रूप से आश्रित वृद्ध महिलाएँ। उपाय: माता-पिता और वरिष्ठ नागरिकों का भरण-पोषण तथा कल्याण अधिनियम (2007), राष्ट्रीय सामाजिक सहायता कार्यक्रम के तहत वृद्धावस्था पेंशन, आयुष्मान भारत का 70 वर्ष से अधिक आयु के सभी नागरिकों तक विस्तार (2024), "silver economy" में अवसर, और समुदाय-आधारित देखभाल।
जनसंख्या और संघवाद
राज्यों के बीच जनसांख्यिकीय अंतर अब राजनीतिक-वित्तीय प्रश्न बन गया है। (1) परिसीमन: लोकसभा सीटों का राज्यवार आवंटन 1971 की जनगणना पर स्थिर है (84वें संशोधन, 2001 द्वारा 2026 के बाद की पहली जनगणना तक बढ़ाया गया)। नई जनगणना के आधार पर पुनर्आवंटन से उन दक्षिणी राज्यों की सापेक्ष सीटें घटने की आशंका है जिन्होंने जनसंख्या-नियंत्रण में सफलता पाई। (2) वित्त आयोग: कर-हस्तांतरण में जनसंख्या को भार देने पर भी ऐसी ही बहस होती है; 15वें वित्त आयोग ने 2011 की जनसंख्या के साथ "जनसांख्यिकीय प्रदर्शन" मानदंड जोड़ा। उत्तर में यह संतुलन दिखाएँ: "एक व्यक्ति, एक मत" का लोकतांत्रिक सिद्धांत बनाम उन राज्यों को दंडित न करने का संघीय सिद्धांत जिन्होंने राष्ट्रीय लक्ष्य हासिल किए।
7. विस्तृत विवेचन: नगरीकरण के नए रूप
2011 की जनगणना के अनुसार भारत की लगभग 31% जनसंख्या नगरीय थी। पर यह आँकड़ा वास्तविक नगरीकरण को कम आँकता है, क्योंकि बहुत से क्षेत्र प्रशासनिक रूप से "ग्रामीण" होते हुए भी आर्थिक और भौतिक रूप से नगरीय हैं।
- सांविधिक नगर बनाम जनगणना नगर: सांविधिक नगर वे हैं जिनमें नगर निकाय है। "जनगणना नगर" (census towns) वे बस्तियाँ हैं जो जनसंख्या (5,000+), घनत्व (400 प्रति वर्ग किमी) और गैर-कृषि कार्यबल (पुरुष कार्यबल का 75%+) की कसौटी पूरी करती हैं, पर जिनका शासन अब भी ग्राम पंचायत करती है। 2001 से 2011 के बीच इनकी संख्या में तीव्र वृद्धि हुई, जिसे कई अध्ययन "उपेक्षित नगरीकरण" कहते हैं: नगरीय समस्याएँ, पर ग्रामीण प्रशासन और संसाधन।
- उपनगरीय फैलाव (Peri-urbanisation): बड़े शहरों के किनारे बेतरतीब विकास, जहाँ कृषि भूमि रियल एस्टेट में बदलती है, पर जल, सीवर और सड़क की योजना नहीं होती।
- सबाल्टर्न नगरीकरण: महानगरों से स्वतंत्र, छोटे शहरों और क़स्बों का अपने बल पर विकास।
- मौसमी और चक्रीय प्रवासन: करोड़ों प्रवासी मज़दूर गाँव और शहर के बीच आते-जाते रहते हैं; कोविड-19 लॉकडाउन (2020) में उनकी घर-वापसी ने उनकी अदृश्यता और सामाजिक सुरक्षा के अभाव को उजागर किया। "वन नेशन वन राशन कार्ड" इसी के उत्तर में एक कदम था।
"भारत में घटती प्रजनन दर नई चुनौतियाँ भी लेकर आई है।" राज्यों के बीच जनसांख्यिकीय विविधता के संदर्भ में इस कथन की विवेचना कीजिए। (250 शब्द)
मॉडल उत्तर
भूमिका: NFHS-5 (2019-21) में भारत की TFR लगभग 2.0 रही, जो प्रतिस्थापन स्तर से कम है। यह परिवार नियोजन, महिला शिक्षा और स्वास्थ्य सुधार की सफलता है, पर इससे नई चुनौतियाँ भी उभरी हैं।
राज्यों के बीच विविधता: दक्षिणी और कई पश्चिमी-पूर्वी राज्यों में TFR बहुत कम (केरल, तमिलनाडु लगभग 1.8 या उससे कम), जबकि बिहार (लगभग 3.0), उत्तर प्रदेश, झारखंड में अब भी अधिक। परिणामस्वरूप भारत में एक साथ "युवा भारत" और "वृद्ध होता भारत" मौजूद हैं।
नई चुनौतियाँ:
- वृद्धावस्था: कम-TFR राज्यों में वृद्धों का बढ़ता अनुपात; पेंशन, स्वास्थ्य और देखभाल का बोझ।
- श्रम-असंतुलन: दक्षिण में श्रम की कमी और उत्तर से प्रवासन; प्रवासियों के अधिकार, भाषा और सामाजिक एकीकरण के प्रश्न।
- संघीय तनाव: परिसीमन और वित्त आयोग में जनसंख्या के भार पर बहस।
- लिंगानुपात: छोटे परिवार की चाह के साथ पुत्र-वरीयता से जन्म के समय विषम लिंगानुपात का ख़तरा।
- लाभांश की खिड़की का असमान समय: उच्च-TFR राज्यों में शिक्षा-स्वास्थ्य में निवेश की तात्कालिकता।
आगे का रास्ता: उच्च-TFR राज्यों में महिला शिक्षा, स्वास्थ्य और गर्भनिरोधक की पहुँच; कम-TFR राज्यों में वृद्धावस्था नीति और प्रवासी-अनुकूल शहर; परिसीमन पर व्यापक राजनीतिक सहमति; प्रवासियों के लिए पोर्टेबल कल्याण-लाभ।
निष्कर्ष: भारत को अब "जनसंख्या नियंत्रण" की नहीं, "जनसंख्या प्रबंधन" की नीति चाहिए, जो क्षेत्रीय विविधता को ध्यान में रखे।
8. Master Summary Table
| विषय | मुख्य तथ्य | याद रखें |
|---|---|---|
| समानता-समता-सशक्तीकरण | परिणाम / प्रक्रिया / क्षमता | नाइला कबीर: संसाधन, एजेंसी, उपलब्धि |
| महिला संकेतक | LFPR ~41.7%; लिंगानुपात 1020; एनीमिया ~57% | PLFS 2023-24, NFHS-5 |
| महिला क़ानून | POSH 2013, घरेलू हिंसा 2005, 106वाँ संशोधन 2023 | विशाखा 1997 |
| जनसंख्या | TFR 2.0 (NFHS-5); लाभांश 2040 के दशक तक | उत्तर युवा, दक्षिण वृद्ध |
| Demographic winter | दीर्घकालीन अति-निम्न प्रजनन | दक्षिण कोरिया TFR ~0.7 |
| गरीबी | तेंदुलकर 21.9% (2011-12); MPI से 24.8 करोड़ बाहर | विश्व बैंक रेखा 3 डॉलर (2025) |
| नगरीकरण | 31.1% (2011); 53 मिलियन-प्लस नगर | छद्म नगरीकरण, प्राइमेट सिटी |
| स्मार्ट सिटी | 2015, 100 शहर, क्षेत्र-आधारित विकास | वितरणात्मक न्याय पर आलोचना |
9. Mind Map
- समानता, समता, सशक्तीकरण
- संगठन, क़ानून, SHG
- संक्रमण, लाभांश
- वृद्धावस्था, demographic winter
- मापन, MPI
- योजनाएँ, DBT
- प्रवास, झुग्गियाँ
- स्मार्ट सिटी, AMRUT
10. महत्वपूर्ण One-liners
- भारत में जेंडर बजटिंग की शुरुआत: 2005-06।
- SEWA की स्थापना: इला भट्ट, 1972।
- अखिल भारतीय महिला सम्मेलन: 1927।
- कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न का क़ानून: POSH अधिनियम, 2013 (विशाखा दिशानिर्देश 1997)।
- NFHS-5 में भारत की TFR: 2.0।
- प्रतिस्थापन स्तर प्रजनन दर: 2.1।
- तेंदुलकर पद्धति से गरीबी (2011-12): 21.9%।
- जनगणना 2011 में नगरीय जनसंख्या: 31.1%।
- स्मार्ट सिटी मिशन और AMRUT: 2015।
- स्ट्रीट वेंडर (आजीविका संरक्षण) अधिनियम: 2014।
- PM SVANidhi: 2020।
- नगर निकायों को संवैधानिक दर्जा: 74वाँ संशोधन (1992)।
11. टिप्स एवं ट्रिक्स
- नई अवधारणा ("demographic winter") वाले प्रश्न की पहली दो पंक्तियों में स्पष्ट परिभाषा दें; यही आधे अंक तय करती है।
- "अंतर बताइए" वाले प्रश्न में तालिका सबसे प्रभावी।
- हर उत्तर में 2-3 ताज़ा आँकड़े (NFHS-5, PLFS, SRS, MPI) स्रोत सहित।
- योजनाओं के आलोचनात्मक मूल्यांकन में "उपलब्धि-सीमा-सुधार" का ढाँचा।
Equality = "सबको एक ही आकार का जूता"; Equity = "हर व्यक्ति को उसके पैर के आकार का जूता"; Empowerment = "जूता चुनने और ख़रीदने की स्वयं की क्षमता"।
12. PYQ-आधारित प्रश्न एवं मॉडल उत्तर
लैंगिक समानता, लैंगिक समता और महिला सशक्तीकरण में अंतर स्पष्ट कीजिए। कार्यक्रम की रूपरेखा और क्रियान्वयन में लैंगिक सरोकारों को ध्यान में रखना क्यों महत्वपूर्ण है? (150 शब्द)
मॉडल उत्तर
अंतर: (1) समानता — परिणाम की बराबरी: समान अधिकार, अवसर, वेतन; (2) समता — न्यायपूर्ण प्रक्रिया: असमान प्रारंभिक स्थिति के कारण विशेष सहायता (महिला आरक्षण, बालिका छात्रवृत्ति); (3) सशक्तीकरण — महिलाओं की अपनी निर्णय-क्षमता, संसाधनों पर नियंत्रण और स्वायत्तता (SHG, संपत्ति अधिकार)। समता साधन है, समानता लक्ष्य, और सशक्तीकरण वह प्रक्रिया जिससे महिलाएँ स्वयं परिवर्तन की वाहक बनें।
लैंगिक सरोकार क्यों: (1) "लिंग-तटस्थ" नीतियाँ भी असमान प्रभाव डालती हैं (परिवहन, स्वच्छता, शहरी डिज़ाइन); (2) महिलाओं की अवैतनिक देखभाल का बोझ; (3) बेहतर परिणाम — उज्ज्वला से स्वास्थ्य, JJM से समय की बचत; (4) संसाधनों का प्रभावी उपयोग।
उपाय: जेंडर बजटिंग (2005-06 से), लिंग-विभाजित आँकड़े, महिलाओं से परामर्श, जेंडर ऑडिट।
"Demographic winter" की अवधारणा क्या है? क्या विश्व ऐसी स्थिति की ओर बढ़ रहा है? विस्तार से बताइए। (150 शब्द)
मॉडल उत्तर
अवधारणा: लंबे समय तक प्रजनन दर प्रतिस्थापन स्तर (2.1) से बहुत नीचे रहने से जनसंख्या का घटना और तेज़ी से वृद्ध होना — "जनसांख्यिकीय शीत ऋतु"।
उदाहरण: दक्षिण कोरिया (TFR लगभग 0.7), जापान, इटली, चीन (2022 से जनसंख्या में गिरावट)।
कारण: महँगे आवास-शिक्षा, देर से विवाह, महिलाओं पर दोहरा बोझ, शहरीकरण, बदलते मूल्य।
क्या विश्व उस ओर है? हाँ, आंशिक रूप से: वैश्विक TFR लगभग 2.3 तक गिरी है; यूरोप-पूर्वी एशिया शीत ऋतु में हैं, जबकि उप-सहारा अफ़्रीका अभी युवा है; UN अनुमान के अनुसार विश्व जनसंख्या इस सदी के उत्तरार्ध में चरम पर पहुँचकर घटेगी। भारत की TFR 2.0 (NFHS-5); केरल-तमिलनाडु जैसे राज्य पहले से वृद्ध हो रहे हैं।
निष्कर्ष: देशों को परिवार-अनुकूल नीतियाँ, लैंगिक समानता, पेंशन सुधार और कौशल-आधारित प्रवासन नीतियाँ अपनानी होंगी।
भारत में स्मार्ट सिटी नगरीय गरीबी और वितरणात्मक न्याय के मुद्दों को कैसे संबोधित करती है? (150 शब्द)
मॉडल उत्तर
भूमिका: स्मार्ट सिटी मिशन (2015, 100 शहर) का उद्देश्य मूल अवसंरचना, स्वच्छ वातावरण और "स्मार्ट" समाधानों से जीवन-गुणवत्ता सुधारना है।
शहरी गरीबी पर योगदान: (1) PMAY-U, AMRUT के साथ अभिसरण से आवास, जल-स्वच्छता; (2) सार्वजनिक परिवहन, स्मार्ट क्लासरूम-स्वास्थ्य केंद्र; (3) डिजिटल सेवाओं से पारदर्शिता; (4) कुछ शहरों में वेंडिंग ज़ोन, सामुदायिक केंद्र।
वितरणात्मक न्याय की सीमाएँ: (1) "क्षेत्र-आधारित विकास" में निवेश शहर के छोटे हिस्से में; (2) सौंदर्यीकरण से फेरीवालों-झुग्गीवासियों का विस्थापन; (3) SPV से निर्वाचित नगर निकायों की भूमिका कमज़ोर; (4) तकनीक-केंद्रित, जन-केंद्रित कम।
सुधार: सहभागी योजना, in-situ झुग्गी-उन्नयन, स्ट्रीट वेंडर अधिनियम 2014 का पालन, किफ़ायती किराया आवास, नगर निकायों का सशक्तीकरण।
निष्कर्ष: "स्मार्ट" शहर तभी न्यायपूर्ण होगा जब वह सबसे गरीब नागरिक के लिए भी "स्मार्ट" हो।
बड़े शहर छोटे क़स्बों की तुलना में अधिक प्रवासियों को क्यों आकर्षित करते हैं? विकासशील देशों की परिस्थितियों के संदर्भ में चर्चा कीजिए। (150 शब्द)
मॉडल उत्तर
कारण: (1) रोज़गार और मज़दूरी: उद्योग-सेवाओं का संकेंद्रण (agglomeration economies), अनौपचारिक क्षेत्र में भी काम की अधिकता; (2) सामाजिक नेटवर्क: पहले से बसे रिश्तेदार-समुदाय (chain migration); (3) सेवाएँ: स्वास्थ्य, शिक्षा, कोचिंग, बिजली-इंटरनेट; (4) आकांक्षा और गुमनामी: जाति-बंधनों से मुक्ति, सामाजिक गतिशीलता; (5) छोटे क़स्बों की कमज़ोरी: निवेश, उद्योग और प्रशासनिक क्षमता की कमी।
विकासशील देशों की विशेषता: प्राइमेट सिटी का प्रभुत्व (ढाका, लागोस, मनीला), ग्रामीण संकट से "धकेलने वाले" (push) कारक, औपचारिक रोज़गार की कमी — परिणामस्वरूप झुग्गियाँ और भीड़।
उपाय: छोटे-मध्यम शहरों में अवसंरचना और उद्योग (टियर-2/3 शहरों पर ज़ोर), ग्रामीण गैर-कृषि रोज़गार, प्रवासियों के लिए किराया आवास और पोर्टेबल कल्याण (एक राष्ट्र एक राशन कार्ड)।
समकालीन भारत में जनसांख्यिकीय संक्रमण की चुनौतियों का समालोचनात्मक परीक्षण कीजिए। (250 शब्द)
मॉडल उत्तर
भूमिका: भारत जनसांख्यिकीय संक्रमण के तीसरे चरण के उत्तरार्ध में है: मृत्यु दर पहले ही गिर चुकी है और कुल प्रजनन दर (NFHS-5) 2.0 तक आ गई है।
अवसर: कार्यशील आयु की जनसंख्या का बड़ा हिस्सा — जनसांख्यिकीय लाभांश, जो 2040 के दशक तक रहेगा।
चुनौतियाँ: (1) रोज़गार और कौशल: हर वर्ष लाखों युवा श्रम बाज़ार में; विनिर्माण की कमज़ोर हिस्सेदारी; (2) महिला श्रम भागीदारी अभी भी कम — लाभांश अधूरा; (3) क्षेत्रीय असमानता: बिहार-उत्तर प्रदेश में ऊँची TFR, दक्षिण में बहुत नीची — परिसीमन, वित्त आयोग के हस्तांतरण और अंतर-राज्यीय प्रवास पर बहस; (4) वृद्धावस्था: 60+ आबादी का तेज़ी से बढ़ना — पेंशन, स्वास्थ्य, देखभाल-अर्थव्यवस्था; (5) स्वास्थ्य-पोषण: बौनापन लगभग 35.5%, एनीमिया — मानव पूँजी कमज़ोर; (6) लिंगानुपात में असंतुलन; (7) नगरीकरण का दबाव।
समालोचना: "जनसंख्या विस्फोट" का भय अब अप्रासंगिक है; समस्या संख्या नहीं, गुणवत्ता (कौशल, स्वास्थ्य) और वितरण (क्षेत्रीय, लैंगिक) की है।
आगे का रास्ता: कौशल भारत और श्रम-प्रधान विनिर्माण, महिलाओं के लिए देखभाल-अवसंरचना, सार्वभौमिक पेंशन-स्वास्थ्य, पोषण मिशन, क्षेत्र-विशिष्ट जनसंख्या नीति।
निष्कर्ष: लाभांश स्वचालित नहीं; उसे नीतियों से "अर्जित" करना होगा, वरना यह खिड़की बोझ में बदल सकती है।
भारत में महिला श्रम बल भागीदारी में हाल की वृद्धि के कारणों और उसकी गुणवत्ता से जुड़ी चिंताओं की चर्चा कीजिए। (250 शब्द)
मॉडल उत्तर
भूमिका: PLFS के अनुसार महिला श्रम बल भागीदारी (15+) 2017-18 के लगभग 23% से बढ़कर 2023-24 में लगभग 41.7% हो गई — एक बड़ा बदलाव।
वृद्धि के कारण: (1) ग्रामीण क्षेत्रों में स्व-रोज़गार और पारिवारिक कृषि-कार्य में बढ़ती गणना; (2) SHG और DAY-NRLM से आजीविका गतिविधियाँ; (3) उज्ज्वला, जल जीवन मिशन जैसी योजनाओं से समय की बचत; (4) शिक्षा में वृद्धि; (5) आर्थिक आवश्यकता (कोविड के बाद पारिवारिक आय की ज़रूरत)।
गुणवत्ता की चिंताएँ: (1) वृद्धि का बड़ा हिस्सा "अवैतनिक पारिवारिक सहायक" और कम-आय स्व-रोज़गार में; (2) नियमित वेतन वाले औपचारिक रोज़गार में महिलाओं का अनुपात कम; (3) वेतन अंतर; (4) शहरी महिलाओं की भागीदारी अपेक्षाकृत कम; (5) सुरक्षा, परिवहन और बाल-देखभाल की कमी; (6) अवैतनिक देखभाल का दोहरा बोझ।
आगे का रास्ता: क्रेच और देखभाल-अवसंरचना, सुरक्षित परिवहन, लचीले कार्य-घंटे, महिलाओं के लिए कौशल और ऋण (मुद्रा, स्टैंड-अप इंडिया), श्रम संहिताओं में सामाजिक सुरक्षा का विस्तार, कार्यस्थल पर POSH का सख़्त पालन।
निष्कर्ष: संख्या में वृद्धि स्वागतयोग्य है, पर लक्ष्य "गरिमापूर्ण, उत्पादक और सुरक्षित" रोज़गार होना चाहिए।
वैश्वीकरण ने कुशल, युवा, अविवाहित महिलाओं के शहरी प्रवास को किस प्रकार बढ़ाया है? इसके सामाजिक परिणामों की चर्चा कीजिए। (250 शब्द)
मॉडल उत्तर
भूमिका: भारत में महिलाओं का प्रवास परंपरागत रूप से "विवाह के कारण" होता था। उदारीकरण के बाद एक नई धारा उभरी — शिक्षा और रोज़गार के लिए अकेले शहर जाने वाली युवा, कुशल, अविवाहित महिलाएँ।
वैश्वीकरण की भूमिका: (1) नए क्षेत्र: IT-ITES, BPO, बैंकिंग, खुदरा, विमानन, आतिथ्य — जहाँ महिलाओं की माँग अधिक; (2) स्वास्थ्य सेवा: केरल और पूर्वोत्तर की नर्सें — महानगरों से विदेश तक; (3) निर्यात-उन्मुख विनिर्माण: वस्त्र और इलेक्ट्रॉनिक्स कारख़ाने (तमिलनाडु, कर्नाटक); (4) उच्च शिक्षा का विस्तार और अंग्रेज़ी-डिजिटल कौशल; (5) मीडिया और उपभोक्ता संस्कृति से बदली आकांक्षाएँ।
सकारात्मक सामाजिक परिणाम: आर्थिक स्वतंत्रता और निर्णय क्षमता; विवाह की आयु बढ़ना और जीवनसाथी चयन में भागीदारी; परिवार को धन-प्रेषण; ग्रामीण-कस्बाई परिवारों में बेटियों की शिक्षा के प्रति दृष्टिकोण में बदलाव; अंतर-जातीय और अंतर-क्षेत्रीय संपर्क।
चुनौतियाँ: (1) सुरक्षा और रात की पाली में परिवहन; (2) सुरक्षित, सस्ते आवास की कमी — कामकाजी महिला छात्रावास (सखी निवास) सीमित; (3) अनुबंध आधारित, असुरक्षित नौकरियाँ; कुछ कारख़ानों में शोषणकारी व्यवस्थाएँ (आवासीय श्रम योजनाएँ); (4) "नैतिक निगरानी" और सामाजिक कलंक; (5) अकेलापन, मानसिक स्वास्थ्य; (6) विवाह या मातृत्व के बाद नौकरी छोड़ने का दबाव।
आगे का रास्ता: सखी निवास का विस्तार, सुरक्षित सार्वजनिक परिवहन (निर्भया कोष), POSH अधिनियम का पालन, लचीले कार्य विकल्प, क्रेच सुविधा।
निष्कर्ष: यह प्रवास पितृसत्तात्मक ढाँचे में "शांत क्रांति" है; नीति का काम इसे सुरक्षित और टिकाऊ बनाना है।
पर्यावरण संरक्षण के साथ सतत विकास की नीतियाँ कभी-कभी गरीबों की तात्कालिक आवश्यकताओं से टकराती हैं। उदाहरणों सहित विवेचना कीजिए। (250 शब्द)
मॉडल उत्तर
भूमिका: ब्रुंटलैंड रिपोर्ट (1987) के अनुसार सतत विकास वर्तमान की आवश्यकताएँ पूरी करते हुए भविष्य की पीढ़ियों की क्षमता से समझौता नहीं करता। पर गरीबों के लिए "वर्तमान की आवश्यकता" — भोजन, ईंधन, आजीविका — कभी-कभी पर्यावरणीय नियमों से टकराती है।
टकराव के उदाहरण: (1) वन संरक्षण बनाम आदिवासी आजीविका: संरक्षित क्षेत्रों से विस्थापन, लघु वनोपज पर रोक; (2) कोयला संक्रमण: झारखंड-छत्तीसगढ़ में लाखों लोगों की आजीविका कोयला खनन पर निर्भर; (3) प्रदूषण नियंत्रण: ईंट-भट्ठों, छोटे उद्योगों का बंद होना — अनौपचारिक मज़दूरों की रोज़ी; (4) ईंधन: स्वच्छ LPG महँगा, इसलिए लकड़ी-उपले पर वापसी; (5) तटीय और नदी नियमन: मछुआरों और रेत खनन मज़दूरों पर असर; (6) शहरी "सौंदर्यीकरण" में झुग्गियों और फेरीवालों का हटना।
दूसरा पक्ष: पर्यावरणीय क्षरण का सबसे बड़ा बोझ भी गरीबों पर — प्रदूषण, बाढ़, सूखा, उष्ण लहर; इसलिए दीर्घकाल में दोनों लक्ष्य पूरक हैं।
सामंजस्य के उदाहरण: वन अधिकार अधिनियम 2006 (संरक्षण में समुदाय की भागीदारी), MGNREGA के जल-संरक्षण कार्य, PM-KUSUM (किसान की आय + स्वच्छ ऊर्जा), उज्ज्वला, ग्रीन इंडिया मिशन, संयुक्त वन प्रबंधन, "न्यायोचित संक्रमण" (just transition) की योजना, जिला खनिज निधि।
आगे का रास्ता: नीति निर्माण में प्रभावित समुदायों की सहमति, वैकल्पिक आजीविका और कौशल, हरित रोज़गार, पारिस्थितिक सेवाओं का भुगतान।
निष्कर्ष: गांधीजी के शब्दों का भाव — पृथ्वी सबकी आवश्यकता पूरी कर सकती है, लालच नहीं। सतत विकास तभी सफल है जब वह "हरित" के साथ "न्यायपूर्ण" भी हो।
13. Quick Revision Summary
- समानता (परिणाम), समता (प्रक्रिया), सशक्तीकरण (क्षमता); जेंडर बजटिंग और मेनस्ट्रीमिंग।
- महिला संगठन: AIWC 1927, SEWA 1972, SHG आंदोलन; क़ानून: POSH, घरेलू हिंसा, 106वाँ संशोधन।
- जनसंख्या: TFR 2.0; लाभांश 2040 के दशक तक; क्षेत्रीय असमानता और वृद्धावस्था।
- Demographic winter: अति-निम्न प्रजनन; दक्षिण कोरिया, जापान, चीन।
- गरीबी: तेंदुलकर, MPI (24.8 करोड़ बाहर), योजनाएँ और DBT।
- नगरीकरण: 31.1% (2011); प्रवास के कारण; स्मार्ट सिटी और वितरणात्मक न्याय की बहस।