UPSC Mains · General Studies Paper II · अध्याय 5

कार्यपालिका, न्यायपालिका एवं दबाव समूह

Executive, Judiciary, Pressure Groups

कार्यपालिका और न्यायपालिका की संरचना, संगठन और कार्य; मंत्रालय और विभाग; दबाव समूह और औपचारिक-अनौपचारिक संघ।

GS-2 24 मिनट

1. अध्याय एक नज़र में

पाठ्यक्रम: "कार्यपालिका और न्यायपालिका की संरचना, संगठन और कार्य — सरकार के मंत्रालय एवं विभाग; प्रभावक समूह और औपचारिक/अनौपचारिक संघ तथा शासन प्रणाली में उनकी भूमिका।" न्यायपालिका से हर वर्ष प्रश्न आता है — नियुक्ति (कॉलेजियम), जनहित याचिका, संवैधानिक नैतिकता; और दबाव समूहों से नया प्रश्न — कॉरपोरेट धन और राजनीतिक शक्ति।

वर्षप्रश्न
2026दबाव समूह, सामाजिक आंदोलन और कॉरपोरेट लॉबी; कॉरपोरेट संपदा और राजनीतिक शक्ति
2025संवैधानिक नैतिकता — न्यायिक स्वतंत्रता बनाम जवाबदेही; कॉलेजियम का विकास, भारत बनाम अमेरिका में न्यायाधीशों की नियुक्ति; पर्यावरणीय दबाव समूह
2024जनहित याचिका का विकास — क्या इसने भारतीय न्यायपालिका को विश्व की सबसे शक्तिशाली न्यायपालिका बना दिया?

2. कार्यपालिका: संरचना और संगठन

  • राष्ट्रपति: नाममात्र का प्रमुख; अनुच्छेद 74 — मंत्रिपरिषद की सलाह बाध्यकारी (42वाँ संशोधन), एक बार पुनर्विचार हेतु लौटा सकता है (44वाँ संशोधन)। विवेक के क्षेत्र: त्रिशंकु संसद में प्रधानमंत्री की नियुक्ति, "पॉकेट वीटो" (अनुच्छेद 111 में समय-सीमा नहीं — 1986 का भारतीय डाक विधेयक)।
  • प्रधानमंत्री और मंत्रिपरिषद: वास्तविक कार्यपालिका; सामूहिक उत्तरदायित्व (75(3)); मंत्रिपरिषद का आकार लोकसभा की 15% तक (91वाँ संशोधन)।
  • प्रशासनिक तंत्र: कैबिनेट सचिवालय (कैबिनेट सचिव — सबसे वरिष्ठ सिविल सेवक, समन्वय), प्रधानमंत्री कार्यालय (PMO), मंत्रालय और विभाग — "कार्य आवंटन नियम 1961" और "कार्य-संचालन नियम 1961" (अनुच्छेद 77)। मंत्रालय नीति बनाता है; संलग्न और अधीनस्थ कार्यालय क्रियान्वयन करते हैं।
  • कैबिनेट समितियाँ: सुरक्षा पर (CCS), आर्थिक मामलों पर (CCEA), नियुक्ति समिति (ACC) आदि।

3. न्यायपालिका: संरचना, नियुक्ति और स्वतंत्रता

  • एकीकृत न्याय व्यवस्था: सर्वोच्च न्यायालय (अनुच्छेद 124) → उच्च न्यायालय (214) → अधीनस्थ न्यायालय (233-237)।
  • सर्वोच्च न्यायालय के क्षेत्राधिकार: मूल (131), रिट (32), अपीलीय (132-134A, 136 — विशेष अनुमति याचिका), सलाहकारी (143), अभिलेख न्यायालय (129), पूर्ण न्याय (142)।
  • स्वतंत्रता के उपाय: कार्यकाल की सुरक्षा (महाभियोग जैसी कठिन प्रक्रिया — अनुच्छेद 124(4), न्यायाधीश (जाँच) अधिनियम 1968), वेतन संचित निधि पर भारित, सेवानिवृत्ति के बाद SC न्यायाधीश की वकालत पर रोक, अवमानना की शक्ति।

न्यायाधीशों की नियुक्ति: कॉलेजियम का विकास

मामलावर्षसिद्धांत
प्रथम न्यायाधीश मामला (एस. पी. गुप्ता)1981"परामर्श" का अर्थ "सहमति" नहीं — कार्यपालिका की प्रधानता
द्वितीय न्यायाधीश मामला1993CJI की राय प्रधान; दो वरिष्ठतम न्यायाधीशों से परामर्श — कॉलेजियम का जन्म
तृतीय न्यायाधीश मामला (राष्ट्रपति संदर्भ)1998CJI + 4 वरिष्ठतम न्यायाधीश (SC हेतु); HC हेतु CJI + 2
चतुर्थ न्यायाधीश मामला (NJAC)201599वाँ संशोधन और NJAC अधिनियम रद्द — न्यायिक स्वतंत्रता मूल ढाँचा; कॉलेजियम पुनर्स्थापित, सुधार का संकेत
आधारभारतअमेरिका
नियुक्तिकॉलेजियम की सिफ़ारिश पर राष्ट्रपति; सरकार एक बार लौटा सकती हैराष्ट्रपति नामांकन, सीनेट की सुनवाई और पुष्टि
पारदर्शिताबंद प्रक्रिया; 2017 से कुछ प्रस्ताव सार्वजनिकसार्वजनिक सुनवाई (Senate Judiciary Committee)
कार्यकालSC — 65 वर्ष, HC — 62 वर्ष तकआजीवन (good behaviour)
जोखिम"न्यायाधीश ही न्यायाधीश चुनें" — भाई-भतीजावाद के आरोप, देरीनियुक्तियों का राजनीतिकरण, वैचारिक ध्रुवीकरण

4. जनहित याचिका (PIL) और न्यायिक सक्रियता

  • उद्भव: आपातकाल के बाद न्यायपालिका की वैधता पुनर्स्थापित करने के प्रयास में; न्यायमूर्ति पी. एन. भगवती और वी. आर. कृष्ण अय्यर; "locus standi" का उदारीकरण — कोई भी जनहितैषी व्यक्ति वंचितों की ओर से याचिका दे सकता है; पत्र को भी याचिका माना गया (epistolary jurisdiction)।
  • प्रमुख मामले: हुसैनारा ख़ातून (1979) — विचाराधीन क़ैदियों का त्वरित न्याय; एस. पी. गुप्ता (1981); बंधुआ मुक्ति मोर्चा (1984); एम. सी. मेहता — गंगा प्रदूषण, दिल्ली में CNG; विशाखा (1997); PUCL भोजन का अधिकार (2001 से — मध्याह्न भोजन); टी. एन. गोदावर्मन (वन)।
  • आलोचना: "Publicity/Private Interest Litigation", न्यायिक अतिरेक (नीतिगत विषयों में), न्यायालयों का बोझ, आदेशों का क्रियान्वयन कठिन; बलवंत सिंह चौफाल (2010) — PIL के दुरुपयोग पर दिशानिर्देश।
1979हुसैनारा ख़ातून 1981एस. पी. गुप्ता 1986एम. सी. मेहता 1997विशाखा 2010दुरुपयोग पर दिशानिर्देश अधिकारों का विस्तार → पर्यावरण, शासन → संयम की आवश्यकता
जनहित याचिका वंचितों तक न्याय पहुँचाने के साधन से शासन के लगभग हर क्षेत्र तक फैली — इसलिए अब संयम पर बल।

5. संवैधानिक नैतिकता और न्यायिक जवाबदेही

  • अर्थ: संविधान के मूल्यों — स्वतंत्रता, समानता, गरिमा, बंधुत्व, विधि का शासन — के प्रति निष्ठा, जो बहुसंख्यक "सामाजिक नैतिकता" से ऊपर है। आंबेडकर ने ग्रोट को उद्धृत करते हुए कहा था कि संवैधानिक नैतिकता स्वाभाविक भावना नहीं, उसे विकसित करना पड़ता है।
  • न्यायिक प्रयोग: मनोज नरूला (2014), NCT दिल्ली (2018), नवतेज जौहर (2018), सबरीमाला (2018), जोसेफ़ शाइन (2018 — व्यभिचार अपराध नहीं)।
  • न्यायिक जवाबदेही के तंत्र: महाभियोग (आज तक कोई न्यायाधीश हटाया नहीं गया), आंतरिक प्रक्रिया (1999), "न्यायिक जीवन के मूल्यों का पुनर्कथन" (1997), CJI कार्यालय RTI के दायरे में (2019), संपत्ति घोषणा — अप्रैल 2025 में सर्वोच्च न्यायालय ने न्यायाधीशों की संपत्ति की घोषणाएँ वेबसाइट पर डालने का निर्णय लिया; 2025 में एक उच्च न्यायालय न्यायाधीश से जुड़े नकदी विवाद के बाद न्यायाधीश (जाँच) अधिनियम 1968 के अंतर्गत संसदीय प्रक्रिया।
  • लंबित न्यायिक मानक और जवाबदेही विधेयक (2010) — व्यपगत।

6. दबाव समूह और सामाजिक आंदोलन

प्रकारउदाहरण
व्यावसायिक / कॉरपोरेटFICCI, CII, ASSOCHAM, NASSCOM
श्रमिक संघINTUC, BMS, AITUC, CITU
किसान संगठनभारतीय किसान यूनियन, संयुक्त किसान मोर्चा (2020-21 आंदोलन, कृषि क़ानून नवंबर 2021 में निरस्त)
पेशेवरIMA, बार काउंसिल
पर्यावरणीयचिपको (1973), साइलेंट वैली अभियान, नर्मदा बचाओ आंदोलन (1985), CSE, नियमगिरि (2013 ग्राम सभाएँ)
अधिकार-आधारितMKSS (RTI आंदोलन), भोजन का अधिकार अभियान
जाति/धर्म/भाषा आधारितविभिन्न सामुदायिक संगठन
  • दबाव समूह बनाम राजनीतिक दल: दल सत्ता प्राप्त करना चाहते हैं; दबाव समूह केवल नीति को प्रभावित करना।
  • कॉरपोरेट धन और राजनीति: चुनावी बॉन्ड योजना (2018) — सर्वोच्च न्यायालय ने फ़रवरी 2024 (ADR बनाम भारत संघ) में असंवैधानिक घोषित की: मतदाता के सूचना के अधिकार (19(1)(a)) का उल्लंघन, असीमित कॉरपोरेट दान से "quid pro quo" का जोखिम; कंपनी अधिनियम की धारा 182 में 2017 का संशोधन (7.5% की सीमा हटाना) भी रद्द।
  • लॉबिंग: भारत में कोई क़ानून नहीं (अमेरिका — Lobbying Disclosure Act 1995); पारदर्शी पंजीकरण की आवश्यकता।

7. विस्तृत विवेचन: न्यायिक लंबितता और न्यायिक सुधार

"न्याय में देरी, न्याय से इनकार है" (Justice delayed is justice denied) भारतीय न्याय-व्यवस्था की सबसे बड़ी चुनौती का सार है। राष्ट्रीय न्यायिक डेटा ग्रिड (NJDG) के अनुसार देश की अदालतों में करोड़ों मामले लंबित हैं, जिनमें से अधिकांश ज़िला और अधीनस्थ न्यायालयों में हैं। जेलों में बंद क़ैदियों में बड़ा हिस्सा विचाराधीन (undertrial) क़ैदियों का है। इसलिए न्यायिक सुधार केवल न्यायपालिका का नहीं, मानवाधिकार और आर्थिक विकास का भी प्रश्न है; अनुबंधों के प्रवर्तन में देरी निवेश के माहौल को प्रभावित करती है।

लंबितता के कारणव्याख्या
न्यायाधीशों की कमीप्रति दस लाख जनसंख्या पर न्यायाधीशों का अनुपात कम; विधि आयोग की 120वीं रिपोर्ट (1987) ने प्रति दस लाख 50 न्यायाधीशों की सिफ़ारिश की थी, वास्तविक अनुपात उससे बहुत कम; उच्च न्यायालयों और अधीनस्थ न्यायालयों में बड़ी संख्या में रिक्त पद
सरकार सबसे बड़ा वादीलंबित मामलों में बड़ा हिस्सा ऐसे मामलों का है जिनमें सरकार या सरकारी उपक्रम पक्षकार हैं; अनावश्यक अपीलें
प्रक्रियात्मक देरीबार-बार स्थगन (adjournments), गवाहों की अनुपस्थिति, समन की तामील में देरी
अवसंरचनाअदालत-कक्षों, कर्मचारियों और तकनीकी सहायता की कमी, विशेषकर ज़िला स्तर पर
जाँच की गुणवत्ताआपराधिक मामलों में कमज़ोर जाँच से लंबे मुक़दमे और कम दोषसिद्धि
क़ानूनों की बढ़ती संख्या और जटिलतानए अधिकार और नियामक क़ानून, पर उनके प्रभाव का "न्यायिक प्रभाव आकलन" नहीं

सुधार के प्रयास

  • ई-कोर्ट्स परियोजना: अदालतों का कंप्यूटरीकरण, ई-फ़ाइलिंग, वर्चुअल सुनवाई; तीसरा चरण (2023 में स्वीकृत) "काग़ज़-रहित" और डिजिटल अदालतों पर केंद्रित। कोविड-19 के दौरान वर्चुअल सुनवाई ने इसकी उपयोगिता सिद्ध की।
  • NJDG: लंबित मामलों के आँकड़े सार्वजनिक, जिससे निगरानी और जवाबदेही संभव।
  • वैकल्पिक विवाद समाधान: लोक अदालतें, मध्यस्थता अधिनियम 2023, वाणिज्यिक न्यायालय अधिनियम 2015 में पूर्व-मुक़दमा मध्यस्थता।
  • प्ली-बार्गेनिंग (2005 से दंड प्रक्रिया में; अब भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता 2023 में भी), फ़ास्ट-ट्रैक और विशेष न्यायालय (POCSO, सांसदों-विधायकों के मामले)।
  • नए आपराधिक क़ानून (2023, लागू जुलाई 2024): सुनवाई और निर्णय के लिए समय-सीमाएँ, इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य और ई-समन का प्रावधान।
  • राष्ट्रीय मुक़दमा नीति का विचार: सरकार द्वारा अनावश्यक मुक़दमेबाज़ी कम करना।
अखिल भारतीय न्यायिक सेवा (AIJS): पक्ष और विपक्ष

अनुच्छेद 312 में 42वें संशोधन (1976) द्वारा AIJS का प्रावधान जोड़ा गया, पर यह अब तक नहीं बनी।

  • पक्ष: प्रतिभाशाली युवाओं को आकर्षित करना, राष्ट्रीय स्तर की पारदर्शी भर्ती, अधीनस्थ न्यायपालिका में सामाजिक विविधता (आरक्षण के माध्यम से), रिक्तियों को समय पर भरना।
  • विपक्ष: अधीनस्थ न्यायपालिका पर राज्यों का नियंत्रण (अनुच्छेद 233-235) और संघवाद का प्रश्न; स्थानीय भाषा और स्थानीय क़ानूनों के ज्ञान की आवश्यकता; कई राज्यों और उच्च न्यायालयों की असहमति।

सर्वोच्च न्यायालय की संरचना पर बहस

सर्वोच्च न्यायालय अपने समय का बड़ा हिस्सा विशेष अनुमति याचिकाओं (अनुच्छेद 136) पर लगाता है, जिससे संविधान पीठों के महत्वपूर्ण मामले वर्षों लंबित रहते हैं। विधि आयोग (229वीं रिपोर्ट, 2009) ने संवैधानिक मामलों के लिए दिल्ली में एक संवैधानिक पीठ और चार क्षेत्रों में "अपील की कैसेशन पीठों" (Cassation benches) का सुझाव दिया था। कुछ विशेषज्ञ अलग "राष्ट्रीय अपील न्यायालय" (National Court of Appeal) का सुझाव देते हैं, जबकि आलोचक इसे संवैधानिक संशोधन और सर्वोच्च न्यायालय की एकता का प्रश्न मानते हैं।

P1अभ्यास प्रश्न · UPSC पैटर्न · 15 अंक

भारत में न्यायिक लंबितता के कारणों की विवेचना कीजिए। प्रौद्योगिकी इस समस्या के समाधान में कहाँ तक सहायक हो सकती है? (250 शब्द)

मॉडल उत्तर

भूमिका: NJDG के आँकड़े दिखाते हैं कि भारतीय अदालतों में करोड़ों मामले लंबित हैं, जिनका बड़ा भाग ज़िला न्यायालयों में है। यह अनुच्छेद 21 के तहत "त्वरित न्याय" के अधिकार (हुसैनआरा ख़ातून, 1979) का उल्लंघन है।

कारण: न्यायाधीशों की कमी और रिक्तियाँ; सरकार द्वारा अत्यधिक मुक़दमेबाज़ी; बार-बार स्थगन; कमज़ोर अवसंरचना; जाँच की खामियाँ; जटिल प्रक्रियाएँ और अपीलों की बहुलता; वैकल्पिक विवाद समाधान का सीमित प्रयोग।

प्रौद्योगिकी की भूमिका:

  • ई-फ़ाइलिंग और ई-समन: तामील में देरी कम।
  • वर्चुअल सुनवाई: गवाहों, विचाराधीन क़ैदियों (जेल से वीडियो-कॉन्फ़्रेंस) और दूर-दराज़ के वादियों के लिए सुगमता।
  • NJDG और डेटा-विश्लेषण: पुराने मामलों की पहचान, केस-प्रबंधन, न्यायाधीशों के कार्यभार का संतुलन।
  • AI उपकरण: सर्वोच्च न्यायालय ने निर्णयों के क्षेत्रीय भाषाओं में अनुवाद (SUVAS) और शोध-सहायता (SUPACE) जैसी पहलें की हैं।
  • ऑनलाइन विवाद समाधान (ODR): छोटे वाणिज्यिक और उपभोक्ता विवादों के लिए।

सीमाएँ: डिजिटल विभाजन; ग्रामीण अदालतों में इंटरनेट और उपकरणों की कमी; डेटा सुरक्षा; AI में पक्षपात का जोखिम; प्रौद्योगिकी न्यायाधीशों की कमी का विकल्प नहीं।

निष्कर्ष: प्रौद्योगिकी एक "बल-गुणक" है, पर स्थायी समाधान के लिए रिक्तियाँ भरना, अवसंरचना, सरकारी मुक़दमेबाज़ी में कमी, स्थगन पर अंकुश और मध्यस्थता की संस्कृति एक साथ आवश्यक हैं।

P2अभ्यास प्रश्न · UPSC पैटर्न · 10 अंक

दबाव समूह राजनीतिक दलों से किस प्रकार भिन्न हैं? लोकतंत्र में इनकी भूमिका का मूल्यांकन कीजिए। (150 शब्द)

मॉडल उत्तर

अंतर: राजनीतिक दल चुनाव लड़कर सत्ता प्राप्त करना चाहते हैं और व्यापक मुद्दों पर कार्यक्रम रखते हैं; दबाव समूह सत्ता नहीं चाहते, बल्कि किसी विशिष्ट हित (व्यापार, श्रम, किसान, पेशेवर, पर्यावरण) के लिए नीति को प्रभावित करते हैं। दल सार्वजनिक रूप से जवाबदेह हैं; दबाव समूह प्रायः पर्दे के पीछे लॉबिंग करते हैं।

भारत में उदाहरण: FICCI, CII (व्यापार); AITUC, BMS (श्रम); किसान संगठन; भारतीय चिकित्सा संघ; छात्र संगठन; पर्यावरण और अधिकार-आधारित आंदोलन।

सकारात्मक भूमिका: नीति-निर्माण में विशेषज्ञता और ज़मीनी सूचना; चुनावों के बीच नागरिक सहभागिता; हाशिए के समूहों की आवाज़; सरकार पर जवाबदेही का दबाव (RTI आंदोलन)।

चिंताएँ: संसाधन-संपन्न समूहों का असमान प्रभाव ("नियामक कब्ज़ा"); लॉबिंग में पारदर्शिता का अभाव (भारत में कोई लॉबिंग क़ानून नहीं); हड़ताल, बंद और हिंसक आंदोलनों से सार्वजनिक जीवन में बाधा; जाति और क्षेत्र आधारित संकीर्ण माँगें।

निष्कर्ष: दबाव समूह बहुलवादी लोकतंत्र का स्वाभाविक भाग हैं; पारदर्शी लॉबिंग नियम, पूर्व-विधायी परामर्श और कमज़ोर वर्गों के संगठनों को समान मंच देकर इनकी भूमिका को संतुलित बनाया जा सकता है।

P3अभ्यास प्रश्न · UPSC पैटर्न · 10 अंक

उच्चतर न्यायपालिका में नियुक्ति की कॉलेजियम प्रणाली की आलोचनाओं और सुधार-विकल्पों की चर्चा कीजिए। (150 शब्द)

मॉडल उत्तर

विकास: संविधान (अनुच्छेद 124, 217) में "परामर्श" शब्द है। "न्यायाधीशों के तीन मामलों" (1981, 1993, 1998) से कॉलेजियम प्रणाली विकसित हुई, जिसमें मुख्य न्यायाधीश और वरिष्ठतम न्यायाधीश नियुक्तियों की सिफ़ारिश करते हैं। 99वें संशोधन द्वारा बनाया गया राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग (NJAC) 2015 में न्यायिक स्वतंत्रता के आधार पर असंवैधानिक घोषित हुआ।

आलोचनाएँ: पारदर्शिता का अभाव (चयन के मानदंड और कारण सार्वजनिक नहीं); "न्यायाधीशों द्वारा न्यायाधीशों की नियुक्ति", जो विश्व में दुर्लभ है; सामाजिक विविधता (महिलाएँ, पिछड़े वर्ग) की कमी; सरकार द्वारा सिफ़ारिशों को लंबित रखने से रिक्तियाँ और टकराव; प्रक्रिया-ज्ञापन (Memorandum of Procedure) पर वर्षों से असहमति।

सुधार-विकल्प: संशोधित प्रक्रिया-ज्ञापन में स्पष्ट मानदंड और समय-सीमा; कॉलेजियम के प्रस्तावों के कारणों का सीमित प्रकाशन (2017 से कुछ प्रयास); स्वतंत्र सचिवालय और योग्य उम्मीदवारों का डेटाबेस; विविधता को मानदंड में शामिल करना; न्यायिक प्रधानता बनाए रखते हुए संतुलित संरचना वाला नया आयोग, जिस पर व्यापक सहमति हो।

निष्कर्ष: लक्ष्य न्यायिक स्वतंत्रता और जवाबदेही, दोनों को साथ साधना है; पारदर्शिता स्वतंत्रता की शत्रु नहीं, उसकी विश्वसनीयता का आधार है।

8. Master Summary Table

विषयमुख्य बिंदुआधार
कार्यपालिकाराष्ट्रपति नाममात्र, PM वास्तविकअनुच्छेद 74, 75, 77; कार्य आवंटन नियम 1961
कॉलेजियम1993 से; NJAC रद्द 2015न्यायाधीश मामले 1981-2015
PILlocus standi का उदारीकरणहुसैनारा 1979; चौफाल 2010
संवैधानिक नैतिकतासंवैधानिक मूल्य > बहुसंख्यक नैतिकतानरूला 2014; नवतेज 2018
जवाबदेहीमहाभियोग, आंतरिक प्रक्रिया, RTI1968 अधिनियम; CJI-RTI 2019; संपत्ति घोषणा 2025
दबाव समूहनीति पर प्रभाव, सत्ता नहींचुनावी बॉन्ड निर्णय 2024

9. Mind Map

कार्यपालिका, न्यायपालिका, दबाव समूह
कार्यपालिका
  • राष्ट्रपति, PM
  • मंत्रालय, विभाग
न्यायपालिका
  • क्षेत्राधिकार
  • कॉलेजियम
सक्रियता
  • PIL
  • संवैधानिक नैतिकता
जवाबदेही
  • महाभियोग
  • पारदर्शिता
दबाव समूह
  • कॉरपोरेट, किसान
  • पर्यावरण

10. महत्वपूर्ण One-liners

  • कॉलेजियम का जन्म: द्वितीय न्यायाधीश मामला (1993)।
  • NJAC रद्द: 2015 (99वाँ संशोधन)।
  • PIL के जनक माने जाते हैं: न्यायमूर्ति पी. एन. भगवती और वी. आर. कृष्ण अय्यर।
  • पहली प्रमुख PIL: हुसैनारा ख़ातून (1979)।
  • चुनावी बॉन्ड असंवैधानिक: फ़रवरी 2024।
  • CJI कार्यालय RTI के अंतर्गत: 2019।
  • सर्वोच्च न्यायालय की "पूर्ण न्याय" की शक्ति: अनुच्छेद 142।
  • मंत्रालयों का कार्य आवंटन: अनुच्छेद 77, कार्य आवंटन नियम 1961।
  • नर्मदा बचाओ आंदोलन: 1985; चिपको: 1973।

11. टिप्स एवं ट्रिक्स

उत्तर लेखन
  • न्यायपालिका पर प्रश्नों में "स्वतंत्रता" और "जवाबदेही" को विरोधी नहीं, पूरक दिखाएँ — "Independence is not immunity"।
  • आँकड़े: न्यायालयों में 5 करोड़ से अधिक लंबित मामले (NJDG), प्रति 10 लाख जनसंख्या पर लगभग 21 न्यायाधीश।
  • दबाव समूह प्रश्नों में सकारात्मक (लोकतंत्र का विस्तार) और नकारात्मक (संकीर्ण हित, धन-बल) दोनों पक्ष।
याद रखने की तरकीब

न्यायाधीश मामले: "81-93-98-15 = सरकार-CJI-कॉलेजियम-NJAC रद्द"।

12. PYQ-आधारित प्रश्न एवं मॉडल उत्तर

Q1UPSC 2025 · GS-2 · Q13 · 15 अंक

भारत में न्यायाधीशों की नियुक्ति की कॉलेजियम प्रणाली के विकास का पता लगाइए। अमेरिका की प्रणाली से इसकी तुलना कीजिए। (250 शब्द)

मॉडल उत्तर

भूमिका: अनुच्छेद 124(2) और 217 के अनुसार राष्ट्रपति CJI और अन्य न्यायाधीशों से "परामर्श" कर नियुक्ति करते हैं। "परामर्श" की व्याख्या ने ही कॉलेजियम को जन्म दिया — एक ऐसी प्रणाली जो संविधान के पाठ में नहीं, न्यायिक व्याख्या में है।

विकास: (1) प्रथम न्यायाधीश मामला (1981): परामर्श ≠ सहमति, कार्यपालिका प्रधान; (2) द्वितीय (1993): न्यायिक स्वतंत्रता के लिए CJI की राय प्रधान, कॉलेजियम का जन्म; (3) तृतीय (1998): SC हेतु CJI + 4 वरिष्ठतम न्यायाधीश; (4) NJAC (2014-15): 99वाँ संशोधन — CJI, 2 वरिष्ठ न्यायाधीश, विधि मंत्री, 2 प्रख्यात व्यक्ति; चतुर्थ न्यायाधीश मामला (2015) में रद्द — कार्यपालिका को वीटो जैसी शक्ति न्यायिक स्वतंत्रता के विरुद्ध; (5) उसके बाद प्रक्रिया ज्ञापन (MoP) पर गतिरोध, 2017 से प्रस्ताव सार्वजनिक करने की पहल।

अमेरिका से तुलना: (1) अमेरिका में राष्ट्रपति नामांकन करता है, सीनेट सार्वजनिक सुनवाई के बाद पुष्टि — लोकतांत्रिक वैधता और पारदर्शिता अधिक; भारत में बंद कमरे में निर्णय; (2) अमेरिका में आजीवन कार्यकाल, भारत में आयु सीमा; (3) अमेरिका में नियुक्तियों का स्पष्ट राजनीतिकरण (वैचारिक "बहुमत" की लड़ाई); भारत में राजनीतिक प्रभाव से बचाव पर भाई-भतीजावाद और देरी के आरोप।

सुधार: MoP को अंतिम रूप, पारदर्शी मानदंड (वरिष्ठता, योग्यता, विविधता), स्थायी सचिवालय, रिक्तियों की समयबद्ध पूर्ति, सरकार द्वारा सिफ़ारिशों पर समय-सीमा में निर्णय।

निष्कर्ष: लक्ष्य "न्यायाधीशों द्वारा न्यायाधीशों का चयन" बनाम "सरकार द्वारा चयन" नहीं, बल्कि स्वतंत्र, पारदर्शी और जवाबदेह प्रक्रिया होना चाहिए।

Q2UPSC 2024 · GS-2 · Q14 · 15 अंक

भारत में जनहित याचिका के विकास का पता लगाइए। क्या इसने भारतीय सर्वोच्च न्यायालय को विश्व की सबसे शक्तिशाली न्यायपालिका बना दिया है? (250 शब्द)

मॉडल उत्तर

भूमिका: PIL ने "locus standi" के पारंपरिक नियम को बदलकर न्यायालय के द्वार उन लोगों के लिए खोले जो स्वयं न्यायालय तक नहीं पहुँच सकते थे।

विकास के चरण: (1) 1979-1990 — अधिकार विस्तार: हुसैनारा ख़ातून (विचाराधीन क़ैदी), एस. पी. गुप्ता (1981 — locus standi), बंधुआ मुक्ति मोर्चा (1984), पत्र-याचिकाएँ; (2) 1990-2010 — पर्यावरण और शासन: एम. सी. मेहता (गंगा, CNG), विशाखा (1997), टी. एन. गोदावर्मन (वन), भोजन का अधिकार (मध्याह्न भोजन), विनीत नारायण (1998 — CBI); (3) 2010 के बाद — संयम और विनियमन: बलवंत सिंह चौफाल (2010) के दिशानिर्देश, तुच्छ याचिकाओं पर जुर्माना।

"सबसे शक्तिशाली" होने के तर्क: (1) मूल ढाँचा सिद्धांत से संविधान संशोधन तक की समीक्षा; (2) अनुच्छेद 142 के तहत "पूर्ण न्याय"; (3) "निरंतर परमादेश" (continuing mandamus) से कार्यपालिका की निगरानी; (4) न्यायाधीशों की नियुक्ति पर नियंत्रण (कॉलेजियम); (5) नीतिगत क्षेत्रों — प्रदूषण, कोयला ब्लॉक (2014), 2G स्पेक्ट्रम (2012) में हस्तक्षेप।

प्रतिवाद: (1) शक्ति का स्रोत PIL से अधिक संवैधानिक ढाँचा है; (2) अमेरिकी सर्वोच्च न्यायालय भी गर्भपात, नागरिक अधिकार जैसे मुद्दों पर निर्णायक; (3) भारत में क्रियान्वयन कार्यपालिका पर निर्भर — कई आदेश काग़ज़ पर; (4) लंबित मामलों से न्यायालय की क्षमता सीमित।

चिंताएँ: न्यायिक अतिरेक, विशेषज्ञता की कमी, लोकतांत्रिक वैधता, "Publicity Interest Litigation"।

निष्कर्ष: PIL ने भारतीय न्यायपालिका को "जनता की न्यायपालिका" बनाया; उसकी शक्ति तभी वैध है जब वह संयम, पारदर्शिता और संस्थागत सम्मान के साथ प्रयुक्त हो।

Q3UPSC 2025 · GS-2 · Q11 · 15 अंक

"संवैधानिक नैतिकता" की अवधारणा स्पष्ट कीजिए। न्यायिक स्वतंत्रता और न्यायिक जवाबदेही के बीच संतुलन की चर्चा कीजिए। (250 शब्द)

मॉडल उत्तर

अवधारणा: संवैधानिक नैतिकता का अर्थ है संविधान के मूल्यों (स्वतंत्रता, समानता, गरिमा, बंधुत्व) और उसकी प्रक्रियाओं के प्रति निष्ठा — सत्ता का प्रयोग संविधान की भावना के अनुसार, केवल शब्दों के अनुसार नहीं। आंबेडकर के अनुसार इसे लोकतंत्र में "विकसित" करना पड़ता है। न्यायालय ने इसे "सामाजिक नैतिकता" से ऊपर रखा — नवतेज जौहर (2018), सबरीमाला (2018); और संस्थाओं के लिए भी लागू माना — मनोज नरूला (2014), NCT दिल्ली (2018)।

न्यायिक स्वतंत्रता: मूल ढाँचा (NJAC 2015); कार्यकाल-सुरक्षा, वेतन, अवमानना शक्ति, कॉलेजियम — ताकि न्यायाधीश बिना भय या पक्षपात निर्णय दे सकें।

जवाबदेही की आवश्यकता: लोकतंत्र में हर शक्ति को जवाबदेह होना चाहिए; न्यायपालिका पर भी आरोप — नियुक्ति में अपारदर्शिता, लंबित मामले, सेवानिवृत्ति के बाद पद, कुछ भ्रष्टाचार के आरोप।

वर्तमान तंत्र: महाभियोग (अत्यंत कठिन), आंतरिक प्रक्रिया (1999), न्यायिक मूल्यों का पुनर्कथन (1997), CJI कार्यालय RTI के अधीन (2019), संपत्ति घोषणाएँ सार्वजनिक करने का निर्णय (2025)।

संतुलन के उपाय: (1) न्यायिक मानक और जवाबदेही क़ानून (2010 के विधेयक की तर्ज़ पर) — पर न्यायपालिका की भागीदारी से; (2) पारदर्शी नियुक्ति मानदंड; (3) सेवानिवृत्ति के बाद "कूलिंग-ऑफ़" अवधि; (4) निर्णयों के कारण, समयबद्धता, केस-प्रबंधन; (5) आंतरिक शिकायत तंत्र का संस्थानीकरण।

निष्कर्ष: संवैधानिक नैतिकता की माँग है कि न्यायपालिका दूसरों को जिस पारदर्शिता का पाठ पढ़ाती है, उसे स्वयं भी अपनाए — स्वतंत्रता और जवाबदेही एक ही सिक्के के दो पहलू हैं।

Q4UPSC 2026 · GS-2 · Q15 · 15 अंक

दबाव समूहों, सामाजिक आंदोलनों और कॉरपोरेट लॉबियों में अंतर स्पष्ट कीजिए। भारत में कॉरपोरेट संपदा और राजनीतिक शक्ति के संबंध का परीक्षण कीजिए। (250 शब्द)

मॉडल उत्तर

अंतर: (1) दबाव समूह — संगठित, विशिष्ट हित वाले (श्रमिक संघ, किसान संगठन, IMA), नीति प्रभावित करना लक्ष्य, सत्ता नहीं; (2) सामाजिक आंदोलन — व्यापक, कम संगठित, जन-भागीदारी पर आधारित, व्यवस्था या मूल्य परिवर्तन का लक्ष्य (चिपको, RTI आंदोलन, किसान आंदोलन 2020-21); (3) कॉरपोरेट लॉबी — व्यवसायों के संगठित हित (CII, FICCI, क्षेत्र-विशेष संघ), संसाधन-समृद्ध, नीति निर्माताओं तक प्रत्यक्ष पहुँच।

सकारात्मक भूमिका: विशेषज्ञ इनपुट (GST, दिवाला संहिता पर परामर्श), नीतियों को व्यावहारिक बनाना, निवेश और रोज़गार।

कॉरपोरेट संपदा और राजनीतिक शक्ति: (1) चुनावी वित्त: चुनावी बॉन्ड (2018) से असीमित और गुप्त कॉरपोरेट दान — सर्वोच्च न्यायालय (फ़रवरी 2024) ने असंवैधानिक माना, क्योंकि यह मतदाता के जानने के अधिकार का उल्लंघन और "quid pro quo" (दान के बदले लाभ) का जोखिम था; (2) नीति पर प्रभाव: कर छूट, अनुकूल नियम, प्राकृतिक संसाधनों का आवंटन — कोयला ब्लॉक (2014) और 2G (2012) निर्णयों से उजागर; (3) "Crony capitalism" और नियामक कब्ज़ा (regulatory capture); (4) मीडिया स्वामित्व से सार्वजनिक विमर्श पर प्रभाव; (5) "परिक्रामी द्वार" — अधिकारियों का सेवानिवृत्ति के बाद कॉरपोरेट पद।

सुधार: लॉबिंग का पंजीकरण और प्रकटीकरण क़ानून, राजनीतिक दलों के वित्त की पूर्ण पारदर्शिता (राज्य वित्त पोषण पर विचार — इंद्रजीत गुप्ता समिति 1998), सेवानिवृत्त अधिकारियों के लिए कूलिंग-ऑफ़, स्वतंत्र नियामक, प्रतिस्पर्धा आयोग को मज़बूत करना।

निष्कर्ष: लोकतंत्र में धन की आवाज़ हो सकती है, पर वह "एक व्यक्ति, एक मत" की बराबरी को दबा न दे।

Q5UPSC 2025 · GS-2 · Q15 · 15 अंक

भारत में पर्यावरणीय दबाव समूहों ने नीति-निर्माण को किस प्रकार प्रभावित किया है? उदाहरण सहित चर्चा कीजिए। (250 शब्द)

मॉडल उत्तर

भूमिका: पर्यावरणीय दबाव समूह स्थानीय समुदायों के आंदोलनों से लेकर शोध संस्थानों और वैश्विक NGO तक फैले हैं; इन्होंने भारत में "पर्यावरण बनाम विकास" की बहस को "सतत और न्यायपूर्ण विकास" की ओर मोड़ा।

प्रभाव के उदाहरण: (1) चिपको (1973): उत्तराखंड में वृक्ष कटाई पर रोक; 1980 में हिमालयी वनों में व्यावसायिक कटाई पर प्रतिबंध, वन संरक्षण अधिनियम 1980 की पृष्ठभूमि; (2) साइलेंट वैली अभियान (केरल शास्त्र साहित्य परिषद): जलविद्युत परियोजना रद्द, 1984 में राष्ट्रीय उद्यान; (3) नर्मदा बचाओ आंदोलन (1985): विश्व बैंक की वापसी (1993), पुनर्वास नीति पर बहस; (4) CSE: दिल्ली में CNG (एम. सी. मेहता PIL के साथ), शीतल पेयों में कीटनाशक की रिपोर्ट से मानक; (5) नियमगिरि (2013): सर्वोच्च न्यायालय के निर्देश पर ग्राम सभाओं ने खनन अस्वीकार किया — FRA और PESA की शक्ति; (6) शहरी आंदोलन: आरे वन (मुंबई), हसदेव अरण्य (छत्तीसगढ़)।

साधन: जनहित याचिका, NGT में याचिकाएँ, शोध और मीडिया अभियान, जन आंदोलन, संसदीय समितियों को सुझाव।

आलोचना: "विकास-विरोधी" होने और विदेशी धन (FCRA) के आरोप — कुछ संगठनों के FCRA पंजीकरण रद्द; परियोजनाओं में देरी।

निष्कर्ष: पर्यावरणीय दबाव समूह "लोकतंत्र के पारिस्थितिक प्रहरी" हैं; उनके साथ टकराव के बजाय संवाद और पारदर्शी EIA-जनसुनवाई से बेहतर नीतियाँ बनेंगी।

Q6अभ्यास प्रश्न · UPSC पैटर्न · 15 अंक

भारत में न्यायिक लंबन के कारणों का विश्लेषण कीजिए और न्याय वितरण को सुदृढ़ करने के उपाय सुझाइए। (250 शब्द)

मॉडल उत्तर

भूमिका: राष्ट्रीय न्यायिक डेटा ग्रिड के अनुसार देश के न्यायालयों में 5 करोड़ से अधिक मामले लंबित हैं, जिनमें अधिकांश ज़िला न्यायालयों में; "न्याय में देरी, न्याय से इनकार" (Justice delayed is justice denied)।

कारण: (1) न्यायाधीशों की कमी: प्रति 10 लाख जनसंख्या पर लगभग 21 न्यायाधीश (विधि आयोग ने 50 का सुझाव दिया था); उच्च न्यायालयों में बड़ी रिक्तियाँ; (2) सरकार सबसे बड़ा वादी — लगभग आधे मामलों में पक्षकार; (3) बार-बार स्थगन, प्रक्रियात्मक जटिलता; (4) अवसंरचना और कर्मचारियों की कमी; (5) विचाराधीन क़ैदियों की बड़ी संख्या — जेलों में लगभग तीन-चौथाई; (6) ADR का सीमित प्रयोग।

उपाय: (1) रिक्तियों का समयबद्ध भरना; अखिल भारतीय न्यायिक सेवा (अनुच्छेद 312) पर विचार; (2) राष्ट्रीय मुक़दमा नीति — सरकारी मुक़दमों में कमी; (3) ई-कोर्ट्स चरण III (2023), वर्चुअल सुनवाई, AI आधारित अनुवाद (SUVAS); (4) लोक अदालत, मध्यस्थता अधिनियम 2023, वाणिज्यिक न्यायालय; (5) स्थगन पर सीमा, केस-प्रबंधन; (6) ग्राम न्यायालय (2008 अधिनियम) का सक्रियण; (7) नए आपराधिक क़ानूनों (2023) में समय-सीमाओं का पालन।

निष्कर्ष: न्यायिक सुधार केवल न्यायपालिका का नहीं, कार्यपालिका और विधायिका का साझा दायित्व है — त्वरित न्याय अनुच्छेद 21 का अंग है (हुसैनारा ख़ातून)।

Q7अभ्यास प्रश्न · UPSC पैटर्न · 10 अंक

"भारत का राष्ट्रपति केवल रबर स्टांप नहीं है।" संवैधानिक प्रावधानों और व्यवहार के आलोक में परीक्षण कीजिए। (150 शब्द)

मॉडल उत्तर

संवैधानिक स्थिति: अनुच्छेद 53 — संघ की कार्यपालिका शक्ति राष्ट्रपति में निहित; पर अनुच्छेद 74 — मंत्रिपरिषद की सलाह से कार्य, जो 42वें संशोधन (1976) के बाद बाध्यकारी है। शमशेर सिंह (1974) — राष्ट्रपति संवैधानिक प्रमुख।

"रबर स्टांप" से आगे की भूमिका: (1) पुनर्विचार का अधिकार: 44वें संशोधन (1978) से सलाह को एक बार पुनर्विचार हेतु लौटा सकते हैं; (2) पॉकेट वीटो: अनुच्छेद 111 में समय-सीमा न होने से — ज्ञानी ज़ैल सिंह ने भारतीय डाक (संशोधन) विधेयक 1986 को रोके रखा; (3) त्रिशंकु लोकसभा में प्रधानमंत्री की नियुक्ति में विवेक (1989, 1996, 1998 के अनुभव); (4) सलाह का अधिकार — "परामर्श, प्रोत्साहन और चेतावनी" (बेजहॉट); प्रधानमंत्री से सूचना माँगने का अधिकार (अनुच्छेद 78); (5) दया याचिकाएँ — विलंब और लौटाने के उदाहरण; (6) नैतिक प्रभाव — राष्ट्र की अंतरात्मा की आवाज़ (के. आर. नारायणन द्वारा 1997 और 1998 में अनुच्छेद 356 की सिफ़ारिशें लौटाना)।

सीमा: राष्ट्रपति सरकार का विकल्प नहीं; अंतिम उत्तरदायित्व मंत्रिपरिषद का, जो संसद के प्रति जवाबदेह है।

निष्कर्ष: राष्ट्रपति "संविधान का संरक्षक" है — उसकी शक्ति आदेश में नहीं, संयम और नैतिक प्रभाव में है।

13. Quick Revision Summary

एक नज़र में
  • कार्यपालिका: राष्ट्रपति नाममात्र (74), PM-मंत्रिपरिषद वास्तविक; कार्य आवंटन नियम 1961।
  • न्यायपालिका: एकीकृत व्यवस्था; कॉलेजियम (1993-1998), NJAC रद्द (2015); अमेरिका में सीनेट-पुष्टि।
  • PIL: 1979 से अधिकार-विस्तार; 2010 से संयम।
  • संवैधानिक नैतिकता: मूल्य-निष्ठा; स्वतंत्रता + जवाबदेही (RTI 2019, संपत्ति घोषणा 2025)।
  • दबाव समूह: नीति पर प्रभाव; कॉरपोरेट धन — चुनावी बॉन्ड निर्णय 2024; लॉबिंग क़ानून की आवश्यकता।
  • पर्यावरणीय समूह: चिपको, साइलेंट वैली, NBA, नियमगिरि।