1. अध्याय एक नज़र में
पाठ्यक्रम: "संसद और राज्य विधायिका — संरचना, कार्य, कार्य-संचालन, शक्तियाँ एवं विशेषाधिकार और इनसे उत्पन्न होने वाले विषय।" हाल के प्रश्न संसद की गुणवत्ता पर हैं — क्या संसद कार्यपालिका को जवाबदेह रख पा रही है? क्या अध्यक्ष निष्पक्ष है?
| वर्ष | प्रश्न |
|---|---|
| 2026 | दल-बदल विरोधी क़ानून के अंतर्गत लोकसभा अध्यक्ष की पक्षपात के प्रति संवेदनशीलता |
| 2024 | कैबिनेट प्रणाली द्वारा संसदीय सर्वोच्चता का हाशियाकरण |
| पूर्व वर्ष (प्रवृत्ति) | संसदीय समितियाँ, विशेषाधिकार, विधान परिषदें, धन विधेयक, संसदीय कार्यवाही में गिरावट |
2. संरचना और कार्य
| पक्ष | लोकसभा | राज्यसभा |
|---|---|---|
| सदस्य | अधिकतम 550 निर्वाचित (वर्तमान 543) | अधिकतम 250 (238 निर्वाचित + 12 मनोनीत); वर्तमान 245 |
| निर्वाचन | प्रत्यक्ष, FPTP | राज्य विधानसभाओं द्वारा, एकल संक्रमणीय मत से आनुपातिक प्रतिनिधित्व |
| कार्यकाल | 5 वर्ष (भंग हो सकती है) | स्थायी सदन; हर 2 वर्ष में एक-तिहाई सदस्य सेवानिवृत्त |
| धन विधेयक | केवल यहीं प्रस्तुत; अंतिम शक्ति | 14 दिन में सिफ़ारिश, अस्वीकार नहीं कर सकती |
| अविश्वास प्रस्ताव | केवल लोकसभा में | नहीं |
| विशेष शक्तियाँ | — | अनुच्छेद 249 (राज्य सूची पर क़ानून), 312 (नई अखिल भारतीय सेवा) |
- कार्य: विधि-निर्माण, कार्यपालिका पर नियंत्रण (प्रश्नकाल, शून्यकाल, ध्यानाकर्षण, स्थगन प्रस्ताव, अविश्वास प्रस्ताव), वित्तीय नियंत्रण (बजट, अनुदान माँगें, CAG रिपोर्ट), संविधान संशोधन, निर्वाचन (राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति), न्यायाधीशों का महाभियोग।
- राज्य विधायिका: विधान परिषद (अनुच्छेद 169) केवल छह राज्यों में — आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, कर्नाटक, महाराष्ट्र, बिहार, उत्तर प्रदेश; परिषद धन विधेयक को 14 दिन और साधारण विधेयक को अधिकतम 3+1 माह रोक सकती है।

3. संसदीय कार्यप्रणाली में चुनौतियाँ
- बैठकों में कमी: पहली लोकसभा में लगभग 135 बैठकें प्रति वर्ष थीं; हाल की लोकसभाओं में लगभग 55-70; 17वीं लोकसभा (2019-24) में कुल 274 बैठकें — पूर्ण कार्यकाल वाली लोकसभाओं में सबसे कम (PRS)।
- समितियों को कम विधेयक: विधेयकों का समितियों को संदर्भित होना — 14वीं लोकसभा में 60%, 15वीं में 71%, 16वीं में 25%, 17वीं में 16% (PRS)।
- व्यवधान: प्रश्नकाल और शून्यकाल का बार-बार स्थगन; बिना चर्चा के विधेयक पारित।
- धन विधेयक का प्रयोग: अनुच्छेद 110 का व्यापक प्रयोग, जिससे राज्यसभा की भूमिका घटती है — आधार अधिनियम (पुट्टस्वामी 2018 में बहुमत ने वैध माना, असहमति में न्यायमूर्ति चंद्रचूड़ ने "संविधान के साथ धोखा" कहा); रोजर मैथ्यू (2019) में प्रश्न बड़ी पीठ को।
- उपाध्यक्ष का पद: 17वीं लोकसभा में पूरे कार्यकाल रिक्त (अनुच्छेद 93 "यथाशीघ्र" चुनाव कहता है)।
- राज्य विधानसभाएँ: औसतन वर्ष में बहुत कम बैठकें; कई विधेयक उसी दिन पारित।
- व्हिप और दल-बदल क़ानून: सांसद की स्वतंत्र राय सीमित — "पार्टी लाइन" पर मतदान।
4. अध्यक्ष और दल-बदल विरोधी क़ानून
- दसवीं अनुसूची (52वाँ संशोधन, 1985): स्वेच्छा से दल छोड़ने या व्हिप के विरुद्ध मतदान पर अयोग्यता; निर्णय सदन के अध्यक्ष/सभापति द्वारा। 91वाँ संशोधन (2003) — एक-तिहाई के "विभाजन" का अपवाद हटाया, केवल दो-तिहाई का "विलय" मान्य; मंत्रिपरिषद का आकार 15% तक सीमित।
- किहोतो होलोहन (1992): क़ानून वैध, पर अध्यक्ष का निर्णय न्यायिक समीक्षा योग्य (अधिकरण के रूप में कार्य)।
- कीशम मेघचंद्र (2020): अयोग्यता याचिका पर सामान्यतः 3 माह में निर्णय; संसद एक स्वतंत्र अधिकरण पर विचार करे।
- सुभाष देसाई (2023, महाराष्ट्र): अध्यक्ष "उचित समय" में निर्णय दें; विधायक दल नहीं, "राजनीतिक दल" व्हिप नियुक्त करता है; राज्यपाल का शक्ति परीक्षण बुलाना उचित नहीं था; नबाम रेबिया (2016) का प्रश्न (हटाने का प्रस्ताव लंबित हो तो अध्यक्ष अयोग्यता पर निर्णय ले सकते हैं या नहीं) बड़ी पीठ को।
- समस्या: अध्यक्ष सत्तारूढ़ दल से निर्वाचित होते हैं और प्रायः दल से त्यागपत्र नहीं देते (ब्रिटेन के विपरीत, जहाँ अध्यक्ष दल छोड़ देता है और "Speaker seeks re-election" परंपरा); अयोग्यता याचिकाओं पर चयनात्मक देरी।
- सुझाव: दिनेश गोस्वामी समिति (1990) और विधि आयोग (170वीं रिपोर्ट) — निर्णय राष्ट्रपति/राज्यपाल द्वारा निर्वाचन आयोग की सलाह पर; स्वतंत्र अधिकरण; केवल अविश्वास प्रस्ताव और धन विधेयक जैसे मतों तक व्हिप सीमित करना।
5. संसदीय विशेषाधिकार और समितियाँ
- विशेषाधिकार (अनुच्छेद 105, 194): सदन में बोलने और मतदान की स्वतंत्रता, कार्यवाही प्रकाशित करने का अधिकार, सत्र के दौरान दीवानी मामलों में गिरफ़्तारी से छूट; सदन की अवमानना पर दंड। संहिताबद्ध नहीं — 44वें संशोधन (1978) से पहले ब्रिटिश हाउस ऑफ़ कॉमन्स के समान माने जाते थे।
- न्यायिक निर्णय: राजा राम पाल (2007) — सदस्यों के निष्कासन की शक्ति, पर न्यायिक समीक्षा योग्य; सीता सोरेन (2024) — सात न्यायाधीशों की पीठ ने पी. वी. नरसिम्हा राव (1998) को पलटा: सदन में मत या भाषण के लिए रिश्वत लेने पर विशेषाधिकार से छूट नहीं।
- समितियाँ: लोक लेखा समिति (1921 से; अध्यक्ष परंपरागत रूप से विपक्ष से), प्राक्कलन समिति, सार्वजनिक उपक्रम समिति, 24 विभागीय स्थायी समितियाँ (1993 से), संयुक्त संसदीय समितियाँ (JPC), संसद की "लघु संसद"।
6. विस्तृत विवेचन: संसदीय समितियाँ — "लघु संसद" की कार्यप्रणाली
संसद का अधिकांश वास्तविक, विस्तृत काम सदन में नहीं, समितियों में होता है। सदन में समय सीमित होता है और बहसें प्रायः दलगत होती हैं; समितियों में सदस्य बंद कमरे में, दलगत रेखाओं से ऊपर उठकर, विशेषज्ञों और अधिकारियों से पूछताछ करते हुए विधेयकों और व्यय की जाँच करते हैं। इसलिए समितियों को "लघु संसद" (mini-parliament) कहा जाता है।
| समिति | संरचना | कार्य | विशेष बिंदु |
|---|---|---|---|
| लोक लेखा समिति (PAC) | 22 सदस्य (15 लोकसभा, 7 राज्यसभा) | CAG की रिपोर्टों की जाँच; सरकारी व्यय की वैधता और औचित्य | परंपरा से अध्यक्ष विपक्ष का सदस्य; "post-mortem" प्रकृति की समिति |
| प्राक्कलन समिति | 30 सदस्य (केवल लोकसभा) | बजट अनुमानों में मितव्ययिता और दक्षता के सुझाव | "सतत मितव्ययिता समिति" कही जाती है |
| सार्वजनिक उपक्रम समिति | 22 सदस्य | सार्वजनिक उपक्रमों की रिपोर्ट और लेखा की जाँच | — |
| विभाग-संबद्ध स्थायी समितियाँ (DRSC) | 24 समितियाँ (1993 से; प्रत्येक में 31 सदस्य: 21 लोकसभा, 10 राज्यसभा) | विधेयकों, अनुदान माँगों और विभागों की नीतियों की जाँच | वर्ष भर कार्यरत; मंत्री इनके सदस्य नहीं होते |
| संयुक्त संसदीय समिति (JPC) | किसी विशेष विधेयक या घोटाले के लिए गठित तदर्थ समिति | गहन जाँच | बोफ़ोर्स, प्रतिभूति घोटाला, 2G जैसे मामलों में; कई महत्वपूर्ण विधेयकों पर भी |
| अधीनस्थ विधान समिति | दोनों सदनों में | सरकार द्वारा बनाए नियमों-विनियमों की जाँच कि वे मूल क़ानून की सीमा में हैं | प्रत्यायोजित विधान पर संसदीय नियंत्रण का उपकरण |
PRS लेजिस्लेटिव रिसर्च के विश्लेषण के अनुसार 15वीं लोकसभा (2009-14) में लगभग 71% विधेयक समितियों को भेजे गए थे, जबकि 16वीं (2014-19) में लगभग 27% और 17वीं (2019-24) में लगभग 16%। साथ ही कई विधेयक बहुत कम बहस के साथ पारित हुए। इसके परिणाम: (1) क़ानूनों की गुणवत्ता और प्रारूपण पर प्रभाव, जिससे बाद में संशोधन या न्यायिक चुनौती; (2) हितधारकों से परामर्श का अभाव; (3) विपक्ष की भूमिका सीमित होना; (4) कार्यपालिका की जवाबदेही में कमी। उत्तर में सुझाव दें: सभी महत्वपूर्ण विधेयकों का अनिवार्य समिति-संदर्भ (जैसा कई संसदीय लोकतंत्रों में), समितियों को स्वतंत्र शोध-सहायता, और रिपोर्टों पर सरकार की "की गई कार्रवाई" (Action Taken) की समय-सीमा।
संसदीय कार्यप्रणाली को सुदृढ़ करने के अन्य उपाय
- न्यूनतम बैठक-दिवस: संविधान के कामकाज की समीक्षा हेतु राष्ट्रीय आयोग (NCRWC, 2002) ने लोकसभा के लिए वर्ष में कम से कम 120 और राज्यसभा के लिए 100 बैठकों का सुझाव दिया था; हाल के वर्षों में औसत इससे काफ़ी कम रहा है।
- विपक्ष के लिए समय: ब्रिटेन की तरह "विपक्ष दिवस" (Opposition Days) का विचार।
- व्यवधान पर नियम: कार्य-स्थगन और व्यवधान से नष्ट समय; "No work, no pay" जैसे सुझाव और आचार समितियों की भूमिका।
- पूर्व-विधायी परामर्श नीति (2014): विधेयक के मसौदे को कम से कम 30 दिन सार्वजनिक परामर्श के लिए रखने की नीति, जिसका पालन असंगत रहा है।
- सांसदों को शोध-सहायता: LAMP फ़ेलोशिप जैसी पहलें; संसद पुस्तकालय और शोध सेवा का सुदृढ़ीकरण।
राज्य विधानमंडल: विधान परिषद की बहस
अनुच्छेद 169 के तहत कोई राज्य विधानसभा के विशेष बहुमत से प्रस्ताव पारित करे और संसद क़ानून बनाए, तो विधान परिषद बनाई या समाप्त की जा सकती है। वर्तमान में कुछ ही राज्यों (जैसे उत्तर प्रदेश, बिहार, महाराष्ट्र, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना) में परिषद है। पक्ष: विधेयकों पर पुनर्विचार, विशेषज्ञों, शिक्षकों और स्नातकों का प्रतिनिधित्व। विपक्ष: ख़र्च, विधायी प्रक्रिया में देरी, और चुनाव हारे नेताओं को "पिछले दरवाज़े" से प्रवेश का माध्यम। परिषद की शक्तियाँ राज्यसभा से भी कम हैं: वह साधारण विधेयक को अधिकतम चार महीने (पहली बार तीन, दूसरी बार एक) तक ही रोक सकती है।
"संसदीय समितियाँ कार्यपालिका की जवाबदेही सुनिश्चित करने का सबसे प्रभावी साधन हैं, पर हाल के वर्षों में उनकी भूमिका कमज़ोर हुई है।" विवेचना कीजिए। (250 शब्द)
मॉडल उत्तर
भूमिका: संसदीय लोकतंत्र में कार्यपालिका विधायिका के प्रति उत्तरदायी है (अनुच्छेद 75(3))। प्रश्नकाल और बहसों के अलावा समितियाँ इस उत्तरदायित्व का सबसे विस्तृत और गैर-दलीय उपकरण हैं।
प्रभावशीलता के कारण:
- विशेषज्ञता: सदस्य किसी एक विभाग पर लंबे समय तक काम कर गहरी समझ बनाते हैं।
- दलगत सीमाओं से ऊपर, बंद कमरे में चर्चा; मीडिया के लिए दिखावा नहीं।
- अधिकारियों, विशेषज्ञों और जनता से साक्ष्य लेने की शक्ति।
- वित्तीय नियंत्रण: PAC द्वारा CAG रिपोर्टों की जाँच; DRSC द्वारा अनुदान माँगों की जाँच।
- सफल उदाहरण: कई विधेयकों में समितियों के सुझावों से महत्वपूर्ण संशोधन (जैसे व्यक्तिगत डेटा संरक्षण विधेयक पर JPC की विस्तृत रिपोर्ट)।
कमज़ोरी के संकेत:
- विधेयकों का समितियों को भेजा जाना तेज़ी से घटा (PRS: 15वीं लोकसभा में ~71% से 17वीं में ~16%)।
- सिफ़ारिशें बाध्यकारी नहीं; सरकार की "की गई कार्रवाई" रिपोर्ट में देरी।
- बैठकों में सदस्यों की कम उपस्थिति; शोध-सहायता की कमी।
- समितियों की रिपोर्टों पर सदन में शायद ही चर्चा होती है।
- अध्यादेशों और धन विधेयक मार्ग के प्रयोग से समिति-जाँच से बचाव पर प्रश्न।
सुधार: महत्वपूर्ण विधेयकों का अनिवार्य संदर्भ; समिति रिपोर्टों पर सदन में बहस का समय; स्वतंत्र शोध-कर्मचारी; सिफ़ारिशों पर समयबद्ध सरकारी उत्तर; कार्यवाही का अधिक पारदर्शी सारांश।
निष्कर्ष: समितियों का सुदृढ़ीकरण केवल विपक्ष के लिए नहीं, बेहतर क़ानून और सुशासन के लिए आवश्यक है; यही संसद को "रबर स्टैम्प" बनने से बचाता है।
"राज्यसभा केवल 'दूसरा सदन' नहीं, बल्कि भारतीय संघवाद का संस्थागत प्रतिनिधि है।" इस भूमिका का मूल्यांकन कीजिए। (150 शब्द)
मॉडल उत्तर
संघीय भूमिका: राज्यसभा के सदस्य राज्य विधानसभाओं द्वारा चुने जाते हैं; अनुच्छेद 249 (राष्ट्रीय हित में राज्य-सूची पर क़ानून की अनुमति) और अनुच्छेद 312 (नई अखिल भारतीय सेवा) जैसी विशेष शक्तियाँ उसे राज्यों के हितों से जोड़ती हैं। वह स्थायी सदन है, इसलिए निरंतरता देता है, और जल्दबाज़ी में पारित विधेयकों पर पुनर्विचार का मंच है।
सीमाएँ:
- अमेरिकी सीनेट के विपरीत राज्यों को समान प्रतिनिधित्व नहीं; सीटें जनसंख्या के अनुसार।
- 2003 के संशोधन से निवास की शर्त हटने के बाद (कुलदीप नैयर, 2006 में न्यायालय ने वैध माना) सदस्य का उस राज्य का निवासी होना आवश्यक नहीं, जिससे "राज्यों का प्रतिनिधित्व" कमज़ोर होने की आलोचना।
- खुली मतदान-प्रणाली (open ballot) से दलीय अनुशासन प्रबल, राज्य-हित गौण।
- धन विधेयक पर सीमित शक्ति; धन विधेयक मार्ग के प्रयोग से भूमिका और घटती है।
सुधार-सुझाव: निवास की शर्त पुनः लागू करने पर विचार; राज्यों के प्रतिनिधित्व के संतुलन पर बहस; विशेषज्ञों के मनोनयन का बेहतर प्रयोग।
निष्कर्ष: राज्यसभा संघीय संतुलन का महत्वपूर्ण स्तंभ है, पर उसकी संघीय भावना को सुदृढ़ करने के लिए संरचनात्मक सुधार आवश्यक हैं।
7. Master Summary Table
| विषय | मुख्य बिंदु | आधार |
|---|---|---|
| संरचना | लोकसभा 543, राज्यसभा 245 | अनुच्छेद 79-81 |
| धन विधेयक | राज्यसभा की सीमित भूमिका; अध्यक्ष का प्रमाणन | 110; पुट्टस्वामी 2018; रोजर मैथ्यू 2019 |
| दल-बदल | अध्यक्ष निर्णायक; न्यायिक समीक्षा | दसवीं अनुसूची; किहोतो 1992; सुभाष देसाई 2023 |
| विशेषाधिकार | असंहिताबद्ध; रिश्वत पर छूट नहीं | 105, 194; सीता सोरेन 2024 |
| गिरावट | कम बैठकें, कम समिति संदर्भ | 17वीं LS: 274 बैठकें, 16% विधेयक समितियों को |
| विधान परिषद | 6 राज्य | अनुच्छेद 169 |
8. Mind Map
- द्विसदनीयता
- विधान परिषद
- विधि, वित्त
- कार्यपालिका पर नियंत्रण
- अध्यक्ष
- दसवीं अनुसूची
- 105, 194
- संहिताकरण बहस
- न्यूनतम बैठकें
- समितियाँ
9. महत्वपूर्ण One-liners
- दल-बदल विरोधी क़ानून: 52वाँ संशोधन (1985), दसवीं अनुसूची।
- "विभाजन" का अपवाद समाप्त: 91वाँ संशोधन (2003)।
- अध्यक्ष का निर्णय न्यायिक समीक्षा योग्य: किहोतो होलोहन (1992)।
- सदन में रिश्वत पर विशेषाधिकार नहीं: सीता सोरेन (2024)।
- संयुक्त बैठक: अनुच्छेद 108 (धन और संविधान संशोधन विधेयक पर नहीं)।
- विभागीय स्थायी समितियाँ: 1993 से; अब 24।
- लोक लेखा समिति की स्थापना: 1921।
- उपाध्यक्ष का चुनाव: अनुच्छेद 93।
- विधान परिषद वाले राज्य: 6।
10. टिप्स एवं ट्रिक्स
- PRS के आँकड़े (बैठकें, समिति संदर्भ) संसद-गिरावट के उत्तरों को प्रमाणिक बनाते हैं।
- सुधार में ब्रिटेन की परंपराएँ (निष्पक्ष स्पीकर, "Shadow Cabinet", विपक्ष दिवस) उदाहरण के रूप में दें।
- "संसदीय सर्वोच्चता" को "संवैधानिक सर्वोच्चता" से अलग पहचानें — भारत में संसद सर्वोच्च नहीं, संविधान सर्वोच्च है।
संसद के नियंत्रण उपकरण: "प्र-शू-ध्या-स्थ-अ" — प्रश्नकाल, शून्यकाल, ध्यानाकर्षण, स्थगन प्रस्ताव, अविश्वास प्रस्ताव।
11. PYQ-आधारित प्रश्न एवं मॉडल उत्तर
दल-बदल विरोधी क़ानून के अंतर्गत लोकसभा अध्यक्ष का पद पक्षपात के प्रति संवेदनशील क्यों है? सुधार सुझाइए। (150 शब्द)
मॉडल उत्तर
भूमिका: दसवीं अनुसूची के अनुच्छेद 6 के अंतर्गत अयोग्यता का निर्णय अध्यक्ष/सभापति करते हैं — एक राजनीतिक पदधारी को अर्ध-न्यायिक भूमिका।
संवेदनशीलता के कारण: (1) अध्यक्ष सत्तारूढ़ दल के सदस्य और अगला चुनाव उसी दल से लड़ते हैं; (2) निर्णय की कोई समय-सीमा संविधान में नहीं — सत्ता पक्ष के अनुकूल याचिकाओं को लंबित रखना या विरोधियों की याचिकाओं पर शीघ्र निर्णय; (3) "विलय" और "स्वेच्छा से सदस्यता छोड़ने" की व्याख्या में विवेक; (4) नबाम रेबिया (2016) के कारण, हटाने का प्रस्ताव लंबित होने पर अध्यक्ष की भूमिका पर अनिश्चितता।
न्यायिक प्रयास: किहोतो (1992) — न्यायिक समीक्षा; कीशम मेघचंद्र (2020) — 3 माह; सुभाष देसाई (2023) — "उचित समय"।
सुधार: (1) निर्णय निर्वाचन आयोग की बाध्यकारी सलाह पर राष्ट्रपति/राज्यपाल द्वारा (दिनेश गोस्वामी समिति, विधि आयोग); (2) स्वतंत्र अधिकरण (सर्वोच्च न्यायालय का सुझाव); (3) संविधान में समय-सीमा; (4) ब्रिटिश परंपरा — अध्यक्ष चुने जाने पर दल से त्यागपत्र।
निष्कर्ष: अध्यक्ष की निष्पक्षता केवल पद की गरिमा नहीं, बल्कि जनादेश की रक्षा का प्रश्न है।
"कैबिनेट प्रणाली ने संसदीय सर्वोच्चता को हाशिए पर पहुँचा दिया है।" विवेचना कीजिए। (250 शब्द)
मॉडल उत्तर
भूमिका: संसदीय प्रणाली में सिद्धांततः कार्यपालिका विधायिका के प्रति उत्तरदायी है (अनुच्छेद 75(3))। पर व्यवहार में मज़बूत दलीय अनुशासन और बहुमत के कारण कैबिनेट ही संसद के एजेंडे, समय और परिणाम को नियंत्रित करती है — इसे "कैबिनेट तानाशाही" (लॉर्ड हेलशम का शब्द) कहा गया।
हाशियाकरण के संकेत: (1) विधायी एजेंडा: लगभग सभी विधेयक सरकार के; निजी सदस्य विधेयक 1970 के बाद से पारित नहीं; (2) समिति संदर्भ में गिरावट: 15वीं लोकसभा में 71% से 17वीं में 16%; (3) कम बैठकें और कम बहस: 17वीं लोकसभा में 274 बैठकें; कई विधेयक बिना चर्चा के; (4) धन विधेयक मार्ग से राज्यसभा को दरकिनार करना; (5) अध्यादेश; (6) दल-बदल क़ानून और व्हिप से सांसदों की स्वतंत्रता सीमित; (7) बजट पर "गिलोटिन" — अधिकांश मंत्रालयों की अनुदान माँगें बिना चर्चा के पारित; (8) उपाध्यक्ष का पद रिक्त रहना।
प्रतिवाद: (1) भारत में संसद नहीं, संविधान सर्वोच्च है; (2) कैबिनेट की प्रधानता संसदीय प्रणाली की स्वाभाविक विशेषता है — स्थिर शासन; (3) प्रश्नकाल, CAG-PAC, न्यायिक समीक्षा अब भी प्रभावी अंकुश; (4) गठबंधन काल में संसद अधिक प्रभावी रही — यानी यह संरचनात्मक नहीं, राजनीतिक परिस्थिति है।
सुधार: न्यूनतम बैठकें (NCRWC — लोकसभा 120, राज्यसभा 100 दिन), सभी विधेयकों का समिति को अनिवार्य संदर्भ, पूर्व-विधायी परामर्श नीति (2014) का पालन, "विपक्ष दिवस", स्वतंत्र संसदीय बजट कार्यालय, धन विधेयक पर स्पष्ट न्यायिक सीमा।
निष्कर्ष: संसद का बल केवल क़ानून बनाने में नहीं, सरकार से प्रश्न पूछने में है — "जवाबदेही" ही संसदीय लोकतंत्र की आत्मा है।
संसदीय विशेषाधिकारों के संहिताकरण की आवश्यकता पर चर्चा कीजिए। हाल के न्यायिक निर्णयों ने इस बहस को किस प्रकार प्रभावित किया है? (250 शब्द)
मॉडल उत्तर
भूमिका: विशेषाधिकार वे विशेष अधिकार और उन्मुक्तियाँ हैं जिनके बिना सदन और सदस्य स्वतंत्र रूप से कार्य नहीं कर सकते (अनुच्छेद 105, 194)। भारत में इन्हें आज तक किसी क़ानून में संहिताबद्ध नहीं किया गया।
संहिताकरण के पक्ष में: (1) अनिश्चितता: अवमानना और विशेषाधिकार हनन की परिभाषा अस्पष्ट, सदन स्वयं ही "अभियोजक और न्यायाधीश"; (2) मौलिक अधिकारों से टकराव: पत्रकारों, नागरिकों की अभिव्यक्ति स्वतंत्रता (19(1)(a)) — केशव सिंह मामला (1965) में विधानसभा और उच्च न्यायालय का टकराव; (3) दुरुपयोग की आशंका: आलोचना करने वालों के विरुद्ध विशेषाधिकार प्रस्ताव; (4) NCRWC (2002) ने संहिताकरण की सिफ़ारिश की।
विरोध में: संहिताकरण से विशेषाधिकार न्यायिक समीक्षा के अधीन हो जाएँगे और सदन की स्वायत्तता घटेगी; लचीलापन समाप्त होगा।
न्यायिक निर्णय: (1) एम. एस. एम. शर्मा (1959): विशेषाधिकार अनुच्छेद 19(1)(a) पर प्रभावी; (2) केशव सिंह (1965): न्यायालय यह देख सकता है कि विशेषाधिकार अस्तित्व में है या नहीं; (3) राजा राम पाल (2007): निष्कासन वैध पर समीक्षा योग्य; (4) सीता सोरेन (2024): सदन में मत या भाषण के लिए रिश्वत लेना विशेषाधिकार से संरक्षित नहीं — नरसिम्हा राव (1998) पलटा; विशेषाधिकार "सदन के कार्य के लिए आवश्यक" हों, व्यक्तिगत उन्मुक्ति के लिए नहीं।
संतुलित मार्ग: विशेषाधिकारों की न्यूनतम, स्पष्ट सूची; अवमानना की परिभाषा; प्रेस और नागरिकों के लिए प्रक्रियात्मक सुरक्षा; दंड की सीमा।
निष्कर्ष: विशेषाधिकार संसद की "ढाल" हैं, "तलवार" नहीं — सीता सोरेन निर्णय ने इसी सिद्धांत को पुष्ट किया।
संसदीय समितियाँ कार्यपालिका की जवाबदेही सुनिश्चित करने में किस प्रकार सहायक हैं? इनकी प्रभावशीलता बढ़ाने के उपाय बताइए। (150 शब्द)
मॉडल उत्तर
भूमिका: संसद के पास सीमित समय है; समितियाँ "लघु संसद" के रूप में विस्तृत जाँच करती हैं।
योगदान: (1) विधायी जाँच: विभागीय स्थायी समितियाँ विधेयकों पर विशेषज्ञ और हितधारकों की राय लेती हैं — जैसे डेटा संरक्षण विधेयक पर JPC; (2) वित्तीय जवाबदेही: लोक लेखा समिति CAG रिपोर्ट की जाँच करती है (2G, राष्ट्रमंडल खेल); प्राक्कलन समिति व्यय में मितव्ययिता सुझाती है; (3) सर्वदलीय सहमति: बंद कमरे में दलगत राजनीति कम; (4) दीर्घकालिक नीति जाँच — विभागों की अनुदान माँगें।
कमज़ोरियाँ: विधेयकों का कम संदर्भ (17वीं लोकसभा में 16%), सिफ़ारिशें बाध्यकारी नहीं, सदस्यों की कम उपस्थिति, शोध सहायता की कमी, एक वर्ष का कार्यकाल।
उपाय: सभी विधेयकों का अनिवार्य संदर्भ, दो वर्ष का कार्यकाल, विशेषज्ञ शोध कर्मचारी, "की गई कार्रवाई" रिपोर्ट पर सदन में चर्चा, संसदीय बजट कार्यालय।
राज्यों में विधान परिषदों की उपयोगिता का समालोचनात्मक परीक्षण कीजिए। (150 शब्द)
मॉडल उत्तर
प्रावधान: अनुच्छेद 169 — विधानसभा के विशेष बहुमत के प्रस्ताव पर संसद साधारण क़ानून से परिषद बना या समाप्त कर सकती है; अभी छह राज्यों में। सदस्य: विधानसभा, स्थानीय निकाय, स्नातक, शिक्षक द्वारा निर्वाचित और राज्यपाल द्वारा मनोनीत।
पक्ष में: (1) जल्दबाज़ी में बने क़ानूनों पर "पुनर्विचार का सदन"; (2) शिक्षकों, स्नातकों, विशेषज्ञों का प्रतिनिधित्व; (3) विधानसभा पर अतिरिक्त कार्यभार कम; (4) राज्यसभा जैसा संतुलन।
विपक्ष में: (1) परिषद केवल विधेयक को टाल सकती है, रोक नहीं सकती — "विलंब करने वाला सदन"; (2) हारे हुए नेताओं का "पिछला दरवाज़ा"; (3) राजकोष पर भार; (4) स्नातक-शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र की प्रासंगिकता पर प्रश्न; (5) राजनीतिक कारणों से बनाना-समाप्त करना (आंध्र प्रदेश का 2020 का प्रस्ताव और फिर वापसी)।
सुझाव: परिषद बनाने-हटाने पर राष्ट्रीय नीति (संसदीय समिति ने सुझाया), विशेषज्ञता आधारित मनोनयन, स्थानीय निकायों का प्रतिनिधित्व बढ़ाना।
निष्कर्ष: परिषद की उपयोगिता उसके प्रयोग पर निर्भर है — "विचारशील सदन" बने, "राजनीतिक पुनर्वास केंद्र" नहीं।
धन विधेयक के मार्ग का बढ़ता प्रयोग राज्यसभा की संवैधानिक भूमिका को किस प्रकार प्रभावित करता है? न्यायिक दृष्टिकोण सहित चर्चा कीजिए। (250 शब्द)
मॉडल उत्तर
भूमिका: अनुच्छेद 110 के अनुसार धन विधेयक वह है जो केवल कराधान, उधार, संचित निधि, विनियोग आदि विषयों से संबंधित हो। ऐसे विधेयक पर राज्यसभा केवल 14 दिनों में सिफ़ारिश दे सकती है, जिसे लोकसभा मानने के लिए बाध्य नहीं। अनुच्छेद 110(3) — कोई विधेयक धन विधेयक है या नहीं, इस पर लोकसभा अध्यक्ष का निर्णय "अंतिम"।
चिंता: जब सामान्य नीतिगत विषयों वाले विधेयकों को धन विधेयक प्रमाणित किया जाता है, तो (1) राज्यसभा — जो राज्यों का प्रतिनिधित्व करने वाला संघीय सदन है — की विधायी जाँच समाप्त हो जाती है; (2) द्विसदनीयता का "पुनर्विचार" का उद्देश्य विफल; (3) सरकार के पास राज्यसभा में बहुमत न होने पर "शॉर्टकट" का प्रलोभन; (4) संघवाद और शक्तियों के संतुलन पर प्रभाव।
न्यायिक दृष्टिकोण: (1) पुट्टस्वामी (आधार, 2018): बहुमत ने आधार अधिनियम को धन विधेयक के रूप में वैध माना, क्योंकि उसका मुख्य उद्देश्य संचित निधि से सब्सिडी का लक्षित वितरण था; न्यायमूर्ति चंद्रचूड़ की असहमति — अध्यक्ष का प्रमाणन न्यायिक समीक्षा योग्य, और यह "संविधान के साथ धोखा"; (2) रोजर मैथ्यू (2019): वित्त अधिनियम 2017 द्वारा अधिकरणों में बदलाव के संदर्भ में न्यायालय ने माना कि अध्यक्ष का निर्णय न्यायिक समीक्षा से पूर्णतः बाहर नहीं, और आधार निर्णय की व्याख्या का प्रश्न बड़ी पीठ को भेजा।
सुधार: (1) धन विधेयक की "केवल" शर्त की सख़्त व्याख्या; (2) प्रमाणन के कारण दर्ज करना; (3) अध्यक्ष के निर्णय की सीमित न्यायिक समीक्षा का स्पष्ट सिद्धांत; (4) विवादित मामलों में दोनों सदनों की संयुक्त समिति से परामर्श की परंपरा।
निष्कर्ष: राज्यसभा "बाधा" नहीं, "संघीय संतुलन" है — धन विधेयक का मार्ग अपवाद रहे, नियम नहीं।
राज्य विधानसभाओं की कार्यप्रणाली में गिरावट के कारणों का विश्लेषण कीजिए। (150 शब्द)
मॉडल उत्तर
संकेत: PRS के विश्लेषणों के अनुसार अनेक राज्य विधानसभाएँ वर्ष में औसतन 30 से कम दिन बैठती हैं; बड़ी संख्या में विधेयक प्रस्तुत होने के उसी दिन या अगले दिन बिना समिति जाँच के पारित होते हैं; बजट पर सीमित चर्चा; अध्यादेशों पर निर्भरता।
कारण: (1) सत्र बुलाने का अधिकार व्यवहार में सरकार के पास — न्यूनतम बैठकों की कोई बाध्यता नहीं (अनुच्छेद 174 केवल 6 माह का अंतराल रोकता है); (2) अधिकांश राज्यों में विभागीय स्थायी समितियाँ नहीं; (3) व्यवधान और ध्रुवीकृत राजनीति; (4) विधायकों का ध्यान निर्वाचन क्षेत्र-सेवा पर, विधि-निर्माण पर कम; (5) शोध सहायता और कर्मचारियों का अभाव; (6) दल-बदल क़ानून से स्वतंत्र बहस सीमित।
सुधार: संविधान या क़ानून में न्यूनतम बैठकें (NCRWC — 50-90 दिन, राज्य के आकार अनुसार), विभागीय समितियाँ (केरल, ओडिशा जैसे राज्यों का अनुभव), विधेयकों का पूर्व-प्रकाशन, विधायकों के लिए शोध फ़ेलोशिप, ई-विधान (नेवा)।
निष्कर्ष: संघवाद की मज़बूती केवल केंद्र-राज्य शक्तियों पर नहीं, राज्य विधानसभाओं की गुणवत्ता पर भी निर्भर है।
12. Quick Revision Summary
- संसद: लोकसभा (543), राज्यसभा (245); धन विधेयक पर लोकसभा प्रधान।
- गिरावट: कम बैठकें, कम समिति संदर्भ, धन विधेयक और अध्यादेश मार्ग।
- दल-बदल: अध्यक्ष की भूमिका पर प्रश्न; किहोतो, मेघचंद्र, सुभाष देसाई; स्वतंत्र अधिकरण का सुझाव।
- विशेषाधिकार: असंहिताबद्ध; सीता सोरेन (2024) — रिश्वत पर छूट नहीं।
- समितियाँ: "लघु संसद"; PAC, विभागीय स्थायी समितियाँ।
- विधान परिषद: छह राज्य; विचारशील सदन बनाम राजनीतिक पुनर्वास।