UPSC Mains · General Studies Paper II · अध्याय 7

सरकारी नीतियाँ, हस्तक्षेप एवं विकास क्षेत्र

Government Policies, Interventions and the Development Sector

विभिन्न क्षेत्रों में विकास हेतु नीतियाँ और उनके क्रियान्वयन के मुद्दे; NGO, SHG, दानदाता, संस्थाएँ और विकास प्रक्रिया।

GS-2 23 मिनट

1. अध्याय एक नज़र में

पाठ्यक्रम: "सरकारी नीतियाँ और विभिन्न क्षेत्रों में विकास के लिए हस्तक्षेप तथा उनके अभिकल्पन एवं कार्यान्वयन से उत्पन्न विषय" और "विकास प्रक्रिया तथा विकास उद्योग — NGO, SHG, विभिन्न समूहों और संघों, दानकर्ताओं, लोकोपकारी संस्थाओं, संस्थागत एवं अन्य पक्षों की भूमिका।" UPSC यहाँ "नीति की बनावट" (design) और "क्रियान्वयन की खामियों" (implementation gap) — दोनों पर प्रश्न पूछता है।

वर्षप्रश्न
2026अधिकार-आधारित कल्याण बनाम असंगठित शासन और न्यूनतम सार्वजनिक निवेश
2025नागरिक समाज संगठनों को "गैर-राज्य" के बजाय "राज्य-विरोधी" देखना; निर्णय-निर्माण का सूचना और क्रियान्वयन के स्रोत से दूर होना; महिलाओं की सामाजिक पूँजी और सशक्तीकरण
2024सार्वजनिक धर्मार्थ न्यास और समावेशी विकास; सार्वजनिक परीक्षा (अनुचित साधन निवारण) अधिनियम 2024

2. नीति चक्र और क्रियान्वयन की खामियाँ

1. एजेंडा 2. नीति निर्माण 3. स्वीकृति 4. क्रियान्वयन 5. मूल्यांकन अधिकांश विफलताएँ: चरण 4
नीति एक चक्र है; भारत में सबसे बड़ा अंतराल "अच्छी नीति" और "ज़मीनी क्रियान्वयन" के बीच है।
  • बनावट (design) की खामियाँ: "एक आकार सबके लिए" योजनाएँ, स्थानीय सलाह का अभाव, अत्यधिक केंद्रीकृत शर्तें, लक्ष्य के स्थान पर "ख़र्च" पर ध्यान।
  • क्रियान्वयन की खामियाँ: अंतिम छोर के कर्मचारियों की कमी, विभागों में समन्वय का अभाव (silos), लीकेज, विलंबित भुगतान, कमज़ोर निगरानी, डिजिटल बहिष्करण।
  • सुधार के साधन: JAM त्रिमूर्ति और DBT, साक्ष्य-आधारित नीति (DMEO, NITI), सामाजिक लेखा परीक्षा (मेघालय का सामाजिक लेखा परीक्षा क़ानून 2017), परिणाम बजट, PM गति शक्ति जैसे एकीकृत मंच, आकांक्षी ज़िला (2018) और आकांक्षी ब्लॉक (2023) कार्यक्रम।

3. सहायकता का सिद्धांत (Subsidiarity) और विकेंद्रीकृत निर्णय

  • सिद्धांत: निर्णय उस स्तर पर हों जो समस्या और सूचना के सबसे निकट हो; ऊपरी स्तर केवल वही करे जो निचला स्तर नहीं कर सकता।
  • सूचना की समस्या: केंद्र में बैठा नीति-निर्माता स्थानीय विविधता (मिट्टी, संस्कृति, आजीविका) नहीं जानता; क्रियान्वयन करने वाले के पास निर्णय की शक्ति नहीं।
  • भारतीय प्रयोग: 73-74वाँ संशोधन, ग्राम पंचायत विकास योजना (GPDP), PESA 1996 में ग्राम सभा की शक्ति, केरल का जन योजना अभियान, आकांक्षी ज़िलों में "डेल्टा रैंकिंग" से ज़िलाधिकारियों को स्वायत्तता, MGNREGA में ग्राम सभा द्वारा कार्य चयन।

4. अधिकार-आधारित कल्याण

क़ानूनवर्षअधिकार
सूचना का अधिकार2005सरकारी सूचना
MGNREGA2005100 दिन का मज़दूरी रोज़गार; 15 दिन में भुगतान, अन्यथा मुआवज़ा
वन अधिकार अधिनियम2006व्यक्तिगत और सामुदायिक वन अधिकार
शिक्षा का अधिकार20096-14 वर्ष निःशुल्क अनिवार्य शिक्षा (21A)
राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम2013लगभग दो-तिहाई जनसंख्या को सब्सिडी अनाज
भूमि अधिग्रहण (RFCTLARR)2013उचित मुआवज़ा, पुनर्वास, सहमति
  • विरोधाभास: अधिकार तो क़ानूनी हैं, पर (1) अलग-अलग मंत्रालयों में बिखरी योजनाएँ — पोषण, स्वास्थ्य, स्वच्छता, शिक्षा एक-दूसरे से जुड़े पर अलग चलते हैं; (2) सार्वजनिक निवेश कम — सरकारी स्वास्थ्य व्यय GDP के लगभग 2% के आसपास (राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति 2017 का लक्ष्य 2.5%), शिक्षा पर NEP का लक्ष्य 6%; (3) शिकायत निवारण कमज़ोर — अधिकार का "दावा" कठिन।

5. विकास उद्योग: NGO, SHG, न्यास और दानदाता

  • NGO / नागरिक समाज संगठन (CSO): सेवा वितरण (शिक्षा, स्वास्थ्य), समर्थन (advocacy), निगरानी (MKSS, ADR), आपदा राहत, शोध। विनियमन: विदेशी अंशदान (विनियमन) अधिनियम 2010, संशोधन 2020 — उप-अनुदान पर रोक, प्रशासनिक व्यय की सीमा 20%, SBI नई दिल्ली की निर्धारित शाखा में खाता अनिवार्य; NGO दर्पण पोर्टल।
  • स्वयं सहायता समूह (SHG): DAY-NRLM के अंतर्गत लगभग 10 करोड़ महिलाएँ; बैंक लिंकेज (NABARD का SHG-BLP, 1992); केरल का कुडुम्बश्री (1998); "लखपति दीदी" लक्ष्य; बिहार का जीविका।
  • लोकोपकार और न्यास: सार्वजनिक धर्मार्थ न्यास (राज्य क़ानूनों और आयकर की धारा 12A/12AB, 80G के अंतर्गत), टाटा ट्रस्ट्स, अज़ीम प्रेमजी फ़ाउंडेशन; CSR — कंपनी अधिनियम 2013 की धारा 135 (2014 से) — शुद्ध लाभ का 2%, वार्षिक लगभग ₹30,000 करोड़ के आसपास।
  • दानदाता और संस्थाएँ: विश्व बैंक, ADB, UNDP, गेट्स फ़ाउंडेशन — वित्त, तकनीकी विशेषज्ञता; आलोचना — एजेंडा-निर्धारण का प्रभाव।
भारत में विकास के आयाम
आर्थिक संवृद्धि, सामाजिक विकास, अवसंरचना और पर्यावरण — विकास प्रक्रिया में राज्य, बाज़ार और नागरिक समाज तीनों की भूमिका है।

6. सार्वजनिक परीक्षा (अनुचित साधन निवारण) अधिनियम 2024

  • पृष्ठभूमि: पिछले वर्षों में कई राज्यों और केंद्रीय परीक्षाओं में पेपर लीक; NEET-UG 2024 विवाद।
  • प्रावधान: UPSC, SSC, RRB, IBPS, NTA और केंद्रीय मंत्रालयों-विभागों की भर्ती परीक्षाओं पर लागू; अनुचित साधन (पेपर लीक, उत्तर-पुस्तिका से छेड़छाड़, प्रतिरूपण, कंप्यूटर नेटवर्क से छेड़छाड़, फ़र्ज़ी परीक्षा/वेबसाइट) के लिए 3-5 वर्ष कारावास और ₹10 लाख तक जुर्माना; सेवा प्रदाताओं पर ₹1 करोड़ तक जुर्माना; संगठित अपराध पर 5-10 वर्ष और कम से कम ₹1 करोड़; अपराध संज्ञेय, गैर-जमानती, गैर-शमनीय; जाँच DSP/ACP स्तर से नीचे नहीं।
  • संरचनात्मक सुधार: NTA सुधार पर राधाकृष्णन समिति (2024) — पेन-पेपर से कंप्यूटर-आधारित परीक्षा की ओर, सुरक्षित प्रश्न-पत्र परिवहन, परीक्षा केंद्रों का ऑडिट।

7. विस्तृत विवेचन: कल्याण-वितरण का डिजिटल परिवर्तन — JAM और DBT

1985 में तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी से जुड़ा यह कथन बहुत चर्चित हुआ कि सरकार द्वारा भेजे गए एक रुपये में से केवल लगभग 15 पैसे ही लाभार्थी तक पहुँचते हैं। "लीकेज" की यही समस्या भारत की कल्याण-नीति की केंद्रीय चुनौती रही। पिछले एक दशक में जन धन खाते, आधार और मोबाइल (JAM त्रिमूर्ति) पर आधारित प्रत्यक्ष लाभ अंतरण (Direct Benefit Transfer, DBT) ने इस वितरण-तंत्र को मौलिक रूप से बदला है। GS-2 में "सरकारी नीतियों और हस्तक्षेपों के डिज़ाइन और क्रियान्वयन से उत्पन्न मुद्दे" के अंतर्गत यह विषय अत्यंत प्रासंगिक है।

घटकभूमिकासीमाएँ
जन धन (2014)शून्य-शेष बैंक खाते; करोड़ों परिवारों का औपचारिक बैंकिंग में प्रवेश; महिलाओं के नाम खातेनिष्क्रिय खाते; अंतिम छोर पर बैंकिंग-संवाददाताओं (BC) पर निर्भरता
आधारविशिष्ट पहचान से नकली और दोहरे लाभार्थियों की छँटाई; आधार अधिनियम 2016बायोमेट्रिक प्रमाणीकरण की विफलता से वैध लाभार्थियों का बहिष्करण (exclusion error); के.एस. पुट्टास्वामी (आधार, 2018) में कल्याण के लिए प्रयोग वैध, पर निजी कंपनियों द्वारा अनिवार्य प्रयोग पर रोक
मोबाइलभुगतान की सूचना, डिजिटल भुगतान (UPI), शिकायत निवारणडिजिटल विभाजन, विशेषकर महिलाओं और वृद्धों में
DBTसब्सिडी और लाभ सीधे खाते में (PM-KISAN, LPG पहल, छात्रवृत्ति, मनरेगा मज़दूरी); सरकारी आँकड़ों के अनुसार बड़ी राशि की बचत, मुख्यतः नकली लाभार्थियों की छँटाई सेबचत के अनुमानों पर विशेषज्ञों में बहस; नकद अंतरण से वस्तुगत लाभ (जैसे PDS का अनाज) के विकल्प पर प्रश्न
नकद अंतरण बनाम वस्तुगत लाभ (Cash vs Kind): बहस के दोनों पक्ष
  • नकद के पक्ष में: लाभार्थी की पसंद की स्वतंत्रता; प्रशासनिक लागत और लीकेज में कमी; बाज़ार की दक्षता; आर्थिक सर्वेक्षण 2016-17 में सार्वभौमिक बुनियादी आय (UBI) पर चर्चा।
  • वस्तु के पक्ष में: मुद्रास्फीति से सुरक्षा (अनाज की मात्रा तय रहती है); पैसा घर की स्त्री तक न पहुँचने या शराब जैसे व्यय में जाने का जोखिम; बाज़ार और बैंक से दूरी वाले क्षेत्रों में अनाज अधिक भरोसेमंद; किसानों की MSP-आधारित ख़रीद से जुड़ाव।
  • संतुलित दृष्टि: दोनों का मिश्रण, स्थानीय संदर्भ के अनुसार; जैसे खाद्य सुरक्षा में PDS जारी रखते हुए अन्य सब्सिडी में DBT।

नीति-मूल्यांकन: "इनपुट" से "आउटकम" तक

भारतीय शासन लंबे समय तक "कितना पैसा ख़र्च हुआ" (इनपुट) और "कितने शौचालय बने" (आउटपुट) पर केंद्रित रहा, जबकि असली प्रश्न है "क्या खुले में शौच घटा और स्वास्थ्य सुधरा" (आउटकम)। इस दिशा में कुछ प्रयास: (1) आउटपुट-आउटकम निगरानी ढाँचा, जिसमें नीति आयोग के अधीन विकास निगरानी और मूल्यांकन कार्यालय (DMEO) केंद्रीय योजनाओं के लिए संकेतक तय करता है; (2) आकांक्षी ज़िला कार्यक्रम (2018) में स्वास्थ्य, शिक्षा, कृषि, वित्तीय समावेशन और अवसंरचना के संकेतकों पर ज़िलों की "रीयल-टाइम" रैंकिंग और प्रतिस्पर्धा; (3) तीसरे पक्ष द्वारा मूल्यांकन और सामाजिक अंकेक्षण; (4) "प्रमाण-आधारित नीति" के लिए यादृच्छिक नियंत्रित परीक्षण (RCT) जैसे शोध-उपकरणों का प्रयोग।

क्रियान्वयन की आम खामियाँ (उत्तर में उदाहरण सहित लिखें)
  • "एक-आकार-सब-पर" डिज़ाइन: स्थानीय परिस्थिति की अनदेखी (पहाड़ी क्षेत्रों में मैदानी मानक)।
  • लक्ष्य-केंद्रित दबाव: संख्याएँ पूरी करने के लिए गुणवत्ता से समझौता (बने पर अप्रयुक्त ढाँचे)।
  • विभागों के बीच समन्वय की कमी: पोषण के लिए स्वास्थ्य, महिला-बाल विकास, पेयजल और शिक्षा का अलग-अलग काम करना।
  • अंतिम छोर पर क्षमता: फ़्रंटलाइन कर्मियों (आंगनवाड़ी, ASHA) पर अत्यधिक बोझ और कम मानदेय।
  • शिकायत निवारण: तकनीकी त्रुटियों (आधार-बेमेल, खाता निष्क्रिय) से बाहर हुए लोगों के लिए सुलभ उपाय का अभाव।
P1अभ्यास प्रश्न · UPSC पैटर्न · 15 अंक

"प्रत्यक्ष लाभ अंतरण (DBT) ने कल्याण-वितरण में लीकेज को कम किया है, पर 'बहिष्करण' की नई समस्या पैदा की है।" विवेचना कीजिए। (250 शब्द)

मॉडल उत्तर

भूमिका: JAM त्रिमूर्ति पर आधारित DBT आज सैकड़ों केंद्रीय योजनाओं में लागू है। इसका उद्देश्य बिचौलियों को हटाकर लाभ सीधे लाभार्थी के खाते में पहुँचाना है।

उपलब्धियाँ (लीकेज में कमी):

  • नकली, दोहरे और मृत लाभार्थियों की पहचान और छँटाई; सरकार के अनुसार इससे बड़ी बचत।
  • भुगतान में तेज़ी और पारदर्शिता (मनरेगा मज़दूरी, छात्रवृत्ति)।
  • महिलाओं के नाम खातों से वित्तीय सशक्तीकरण।
  • कोविड-19 के समय करोड़ों खातों में त्वरित राहत अंतरण।

बहिष्करण की समस्या:

  • बायोमेट्रिक विफलता (वृद्ध, श्रमिकों की घिसी उँगलियाँ), नेटवर्क की समस्या।
  • आधार-बैंक खाता बेमेल या "seeding" की त्रुटियाँ, जिससे भुगतान अस्वीकृत।
  • डिजिटल साक्षरता की कमी; बैंकिंग-बिंदुओं की दूरी और BC द्वारा शोषण।
  • विभिन्न अध्ययनों और समाचार-रिपोर्टों में राशन न मिलने से जुड़ी कठिनाइयों के मामले उजागर हुए, जिन्होंने "तकनीकी बहिष्करण" पर ध्यान खींचा।
  • "समावेशन त्रुटि" घटाने के प्रयास में "बहिष्करण त्रुटि" बढ़ना — जबकि कल्याण में बहिष्करण अधिक गंभीर है।

उपाय: वैकल्पिक प्रमाणीकरण (OTP, आइरिस, अधिकारी-सत्यापन) का अनिवार्य विकल्प; "कोई भी पात्र तकनीक के कारण वंचित न हो" का स्पष्ट नियम; त्वरित शिकायत निवारण और सामाजिक अंकेक्षण; बैंकिंग-पहुँच का विस्तार (इंडिया पोस्ट पेमेंट्स बैंक); भुगतान-विफलता का रीयल-टाइम डैशबोर्ड।

निष्कर्ष: DBT एक शक्तिशाली उपकरण है, पर कल्याणकारी राज्य का लक्ष्य "दक्षता" से पहले "अधिकार" है; तकनीक को समावेशन का साधन बनना चाहिए, बाधा नहीं।

P2अभ्यास प्रश्न · UPSC पैटर्न · 10 अंक

आकांक्षी ज़िला कार्यक्रम (Aspirational Districts Programme) शासन में किन नवाचारों का प्रतिनिधित्व करता है? (150 शब्द)

मॉडल उत्तर

पृष्ठभूमि: 2018 में शुरू इस कार्यक्रम में विकास के मानकों पर पिछड़े 100 से अधिक ज़िलों को चुना गया, ताकि उन्हें राज्य और राष्ट्रीय औसत के स्तर तक लाया जा सके। बाद में इसी मॉडल पर आकांक्षी ब्लॉक कार्यक्रम (2023) शुरू हुआ।

शासन-नवाचार:

  • Convergence: केंद्र, राज्य और ज़िला स्तर की योजनाओं का समन्वय; विभिन्न विभागों का एक लक्ष्य पर संयुक्त कार्य।
  • Collaboration: केंद्रीय "प्रभारी अधिकारी", ज़िला कलेक्टर, NGO और निजी क्षेत्र की साझेदारी।
  • Competition: स्वास्थ्य-पोषण, शिक्षा, कृषि-जल संसाधन, वित्तीय समावेशन-कौशल और बुनियादी अवसंरचना के संकेतकों पर "डेल्टा रैंकिंग", यानी परिणाम-आधारित प्रतिस्पर्धा।
  • आँकड़ा-आधारित शासन: डैशबोर्ड पर रीयल-टाइम निगरानी।
  • "सबसे पीछे से शुरुआत": राष्ट्रीय औसत को सबसे पिछड़े ज़िलों से ऊपर उठाने की रणनीति।

सीमाएँ: संकेतकों पर अत्यधिक ध्यान से "डेटा-प्रबंधन" का जोखिम; कलेक्टरों के बार-बार स्थानांतरण; संरचनात्मक कारणों (भूमि, सामाजिक असमानता) पर कम ध्यान।

निष्कर्ष: UNDP के मूल्यांकन सहित कई अध्ययनों ने इसके सकारात्मक प्रभाव की सराहना की है; यह "सहकारी-प्रतिस्पर्धी संघवाद" का ज़िला-स्तरीय मॉडल है।

8. Master Summary Table

विषयमुख्य बिंदुउदाहरण / आधार
नीति चक्रक्रियान्वयन अंतरालDBT, सामाजिक लेखा परीक्षा
सहायकतानिर्णय स्रोत के निकटGPDP, PESA, आकांक्षी ज़िले
अधिकार-आधारित कल्याणक़ानूनी अधिकार, कमज़ोर निवेशMGNREGA, RTE, NFSA
CSOसेवा, समर्थन, निगरानीFCRA 2020 संशोधन
SHGमहिलाओं की सामाजिक पूँजीDAY-NRLM, कुडुम्बश्री, जीविका
लोकोपकारन्यास, CSRधारा 135; 12A, 80G
परीक्षा सुधारपेपर लीक पर दंडसार्वजनिक परीक्षा अधिनियम 2024

9. Mind Map

नीतियाँ एवं विकास क्षेत्र
नीति
  • बनावट
  • क्रियान्वयन
विकेंद्रीकरण
  • सहायकता
  • ग्राम सभा
अधिकार
  • RTI, RTE, NFSA
  • अभिसरण
नागरिक समाज
  • NGO, SHG
  • FCRA
लोकोपकार
  • न्यास
  • CSR

10. महत्वपूर्ण One-liners

  • FCRA: 2010; बड़ा संशोधन: 2020।
  • CSR अनिवार्य: कंपनी अधिनियम 2013, धारा 135 (1 अप्रैल 2014 से)।
  • SHG-बैंक लिंकेज कार्यक्रम: NABARD, 1992।
  • केरल का महिला SHG नेटवर्क: कुडुम्बश्री (1998)।
  • आकांक्षी ज़िला कार्यक्रम: 2018; आकांक्षी ब्लॉक कार्यक्रम: 2023।
  • सार्वजनिक परीक्षा (अनुचित साधन निवारण) अधिनियम: 2024।
  • NTA सुधार समिति: के. राधाकृष्णन (2024)।
  • सामाजिक लेखा परीक्षा पर पहला राज्य क़ानून: मेघालय (2017)।

11. टिप्स एवं ट्रिक्स

उत्तर लेखन
  • नीति-आधारित प्रश्नों में ढाँचा: उद्देश्य → उपलब्धि → खामियाँ (बनावट/क्रियान्वयन) → सुधार।
  • NGO/CSO पर प्रश्न में दोनों पक्ष: "लोकतंत्र की तीसरी शक्ति" और "जवाबदेही-पारदर्शिता की आवश्यकता"।
  • द्वितीय ARC, NITI Aayog के मूल्यांकन, CAG रिपोर्ट — "आगे की राह" में प्रामाणिकता लाते हैं।
याद रखने की तरकीब

विकास के पाँच कर्ता: "रा-बा-स-दा-स" — राज्य, बाज़ार, समाज (NGO-SHG), दानदाता, समुदाय।

12. PYQ-आधारित प्रश्न एवं मॉडल उत्तर

Q1UPSC 2026 · GS-2 · Q17 · 15 अंक

"भारत में अधिकार-आधारित कल्याण असंगठित शासन और न्यूनतम सार्वजनिक निवेश के साथ सह-अस्तित्व में है।" विवेचना कीजिए। (250 शब्द)

मॉडल उत्तर

भूमिका: 2005-2013 के बीच भारत ने "कल्याण को दान से अधिकार" में बदला — RTI, MGNREGA, FRA, RTE, NFSA, भूमि अधिग्रहण क़ानून। पर अधिकार का वास्तविक अर्थ तभी है जब उसे प्राप्त करने के लिए संस्थाएँ और संसाधन हों।

असंगठित शासन: (1) विभागीय विभाजन: कुपोषण — महिला एवं बाल विकास (ICDS), स्वास्थ्य, खाद्य (PDS), जल-स्वच्छता — सब अलग; (2) केंद्र-राज्य-स्थानीय निकायों में ज़िम्मेदारी का धुंधलापन; (3) एकीकृत लाभार्थी डेटा का अभाव (हाल में सुधार); (4) शिकायत निवारण बिखरा हुआ।

न्यूनतम सार्वजनिक निवेश: (1) सरकारी स्वास्थ्य व्यय GDP का लगभग 2%; (2) शिक्षा पर NEP के 6% लक्ष्य से कम; (3) MGNREGA में मज़दूरी भुगतान में देरी और बजट की कमी; (4) अंतिम छोर के कर्मचारी (आँगनवाड़ी, आशा) कम मानदेय और अधिक बोझ; (5) RTE के "उचित शिक्षक-छात्र अनुपात" जैसे मानदंड अधूरे।

परिणाम: अधिकार काग़ज़ पर, अनुभव में "याचना"; NFHS-5 में ठिगनापन 35.5%; अधिगम स्तर (ASER) कमज़ोर; कल्याण का लाभ असमान।

प्रतिवाद / प्रगति: JAM-DBT से लीकेज घटी; "वन नेशन वन राशन कार्ड"; आयुष्मान भारत; जल जीवन मिशन — सेवा वितरण में सुधार।

आगे की राह: (1) परिणाम-आधारित अभिसरण (ज़िला स्तर पर एकीकृत योजना — "पोषण अभियान" मॉडल); (2) सामाजिक क्षेत्र में निवेश बढ़ाना; (3) अंतिम छोर के कर्मियों का सशक्तीकरण; (4) सामाजिक लेखा परीक्षा और समयबद्ध शिकायत निवारण; (5) स्थानीय निकायों को धन और कार्य।

निष्कर्ष: अधिकार "क़ानून" से जन्म लेते हैं, पर "संस्थाओं और निवेश" से जीवित रहते हैं।

Q2UPSC 2025 · GS-2 · Q8 · 10 अंक

नागरिक समाज संगठनों को प्रायः "गैर-राज्य कर्ता" के बजाय "राज्य-विरोधी कर्ता" के रूप में देखा जाता है। क्या आप सहमत हैं? (150 शब्द)

मॉडल उत्तर

संदर्भ: CSO राज्य और बाज़ार से अलग "तीसरा क्षेत्र" हैं — सेवा, समर्थन और निगरानी के माध्यम से लोकतंत्र को गहरा करते हैं।

"राज्य-विरोधी" धारणा के कारण: (1) बड़ी परियोजनाओं (बाँध, खनन, परमाणु संयंत्र) के विरोध को "विकास-विरोधी" माना जाना — 2014 की एक ख़ुफ़िया रिपोर्ट में कुछ NGO से GDP पर प्रभाव का दावा; (2) विदेशी धन से एजेंडा-प्रभाव की आशंका — FCRA संशोधन 2020, कई पंजीकरण रद्द; (3) कुछ संगठनों में पारदर्शिता और जवाबदेही की कमी; (4) मानवाधिकार रिपोर्टों से सरकार की छवि पर प्रभाव।

असहमति के तर्क: (1) RTI, MGNREGA, भोजन का अधिकार, FRA जैसे क़ानून CSO के आंदोलनों से बने — ये राज्य को मज़बूत करते हैं; (2) आपदा राहत (कोविड, बाढ़), स्वास्थ्य-शिक्षा में राज्य के साझेदार; (3) आलोचना लोकतंत्र में "वफ़ादार विपक्ष" की भूमिका है, शत्रुता नहीं।

संतुलन: पारदर्शी पंजीकरण और लेखा (NGO दर्पण), द्वितीय ARC की "राष्ट्रीय स्वैच्छिक क्षेत्र नीति (2007)" के अनुरूप साझेदारी, असहमति और राष्ट्रविरोध में स्पष्ट अंतर।

निष्कर्ष: मज़बूत लोकतंत्र को मज़बूत नागरिक समाज चाहिए — "गैर-राज्य" का अर्थ "राज्य-विरोधी" नहीं।

Q3UPSC 2025 · GS-2 · Q17 · 15 अंक

"भारत के विकास मॉडलों में निर्णय-निर्माण प्रायः सूचना और क्रियान्वयन के स्रोत के निकट नहीं होता।" इस कथन का परीक्षण कीजिए और सुधार सुझाइए। (250 शब्द)

मॉडल उत्तर

भूमिका: अच्छे निर्णय के लिए दो चीज़ें चाहिए — स्थानीय सूचना (समस्या क्या है) और क्रियान्वयन की क्षमता (क्या संभव है)। जब निर्णय दिल्ली या राज्य राजधानी में हों और सूचना-क्रियान्वयन गाँव में, तो नीति और वास्तविकता में दूरी बनती है।

कथन के पक्ष में प्रमाण: (1) केंद्र प्रायोजित योजनाओं की कठोर, एकरूप शर्तें — जैसे इकाई लागत जो पहाड़ी और मैदानी क्षेत्रों में समान; (2) 73-74वें संशोधन के बावजूद 3F (कार्य, धन, कर्मचारी) का अपर्याप्त हस्तांतरण; (3) ज़िला योजना समितियाँ निष्क्रिय; (4) अंतिम छोर के कर्मियों (आँगनवाड़ी, पटवारी) को निर्णय की शक्ति नहीं, केवल रिपोर्टिंग का बोझ; (5) लक्ष्य-आधारित "ऊपर से नीचे" दृष्टि — शौचालय निर्माण का लक्ष्य, उपयोग पर कम ध्यान।

परिणाम: संसाधनों की बर्बादी, स्थानीय स्वामित्व की कमी, नीतियों का "पैबंद"।

सफल अपवाद: केरल का जन योजना अभियान; MGNREGA में ग्राम सभा द्वारा कार्य चयन; आकांक्षी ज़िला कार्यक्रम — वास्तविक समय डेटा, ज़िलाधिकारी को लचीलापन, "डेल्टा रैंकिंग"; PESA क्षेत्रों में ग्राम सभा की सहमति (नियमगिरि)।

सुधार: (1) सहायकता को संस्थागत रूप — untied फ़ंड, "बहु-विकल्प" योजनाएँ; (2) GPDP और ज़िला योजना का वास्तविक उपयोग; (3) डेटा का विकेंद्रीकरण — स्थानीय डैशबोर्ड; (4) अंतिम छोर के कर्मियों का प्रशिक्षण और विवेक (Mission Karmayogi); (5) सामाजिक लेखा परीक्षा; (6) राज्य वित्त आयोगों का सशक्तीकरण।

निष्कर्ष: गांधी के "ग्राम स्वराज" और आधुनिक "सहायकता" सिद्धांत का संदेश एक ही है — निर्णय वहाँ हो जहाँ उसके परिणाम भोगे जाते हैं।

Q4UPSC 2025 · GS-2 · Q6 · 10 अंक

महिलाओं की सामाजिक पूँजी उनके सशक्तीकरण में किस प्रकार सहायक है? SHG के उदाहरणों सहित स्पष्ट कीजिए। (150 शब्द)

मॉडल उत्तर

सामाजिक पूँजी: विश्वास, संबंधों के नेटवर्क और परस्पर सहयोग के मानदंड (रॉबर्ट पुटनम) — जो सामूहिक कार्य को संभव बनाते हैं।

सशक्तीकरण में भूमिका: (1) आर्थिक: समूह की गारंटी पर बिना संपार्श्विक ऋण (SHG-बैंक लिंकेज), बचत की आदत, सूक्ष्म उद्यम — "लखपति दीदी" पहल; (2) सामाजिक: घरेलू निर्णयों में आवाज़, बाल विवाह, घरेलू हिंसा और शराब के विरुद्ध सामूहिक कार्रवाई (बिहार में जीविका समूहों की भूमिका); (3) राजनीतिक: पंचायत चुनावों में भागीदारी, ग्राम सभा में उपस्थिति; (4) सेवा वितरण: कुडुम्बश्री — सामुदायिक रसोई, स्थानीय निकायों के साथ साझेदारी; (5) सूचना: सरकारी योजनाओं तक पहुँच।

सीमाएँ: कुछ समूहों में अभिजात वर्ग का वर्चस्व, ऋण-जाल, बाज़ार तक पहुँच की कमी, "दोहरा बोझ"।

आगे: SHG संघों को FPO/उत्पादक कंपनियों में बदलना, डिजिटल-वित्तीय साक्षरता, ई-कॉमर्स (ONDC) से जोड़ना।

निष्कर्ष: DAY-NRLM के लगभग 10 करोड़ सदस्यों के साथ SHG आंदोलन भारत की सबसे बड़ी "महिला सामाजिक पूँजी" है।

Q5UPSC 2024 · GS-2 · Q6 · 10 अंक

भारत में समावेशी विकास में सार्वजनिक धर्मार्थ न्यासों की भूमिका की चर्चा कीजिए। (150 शब्द)

मॉडल उत्तर

भूमिका: सार्वजनिक धर्मार्थ न्यास जनसाधारण के लाभ के लिए संपत्ति या धन का प्रबंधन करते हैं — शिक्षा, स्वास्थ्य, गरीबी उन्मूलन, संस्कृति; इन्हें राज्य क़ानूनों (जैसे महाराष्ट्र सार्वजनिक न्यास अधिनियम) और आयकर अधिनियम (धारा 12A/12AB, 80G) के अंतर्गत कर-छूट मिलती है।

योगदान: (1) संस्थान निर्माण: IISc (टाटा), TISS, कैंसर अस्पताल; (2) शिक्षा: अज़ीम प्रेमजी फ़ाउंडेशन का सरकारी विद्यालयों और शिक्षक प्रशिक्षण पर काम; (3) स्वास्थ्य: धार्मिक और परोपकारी अस्पताल; (4) नवाचार और जोखिम पूँजी: सरकार जो प्रयोग नहीं कर सकती, उन्हें आज़माना; (5) आपदा राहत; (6) CSR (धारा 135) के साथ मिलकर बड़े पैमाने पर संसाधन।

चिंताएँ: (1) कर-छूट का दुरुपयोग, "ट्रस्ट" के रूप में व्यावसायिक गतिविधि; (2) धन का शहरी और विकसित राज्यों में केंद्रीकरण; (3) पारदर्शिता और प्रभाव-मूल्यांकन की कमी; (4) धार्मिक न्यासों के प्रबंधन पर विवाद।

सुधार: एकीकृत पंजीकरण और ऑनलाइन प्रकटीकरण, प्रभाव-आधारित रिपोर्टिंग, पिछड़े ज़िलों की ओर प्रोत्साहन, सरकार के साथ साझेदारी (आकांक्षी ज़िले)।

निष्कर्ष: "दान" को "विकास साझेदारी" में बदलकर न्यास समावेशी विकास के प्रभावी साधन बन सकते हैं।

Q6UPSC 2024 · GS-2 · Q11 · 15 अंक

सार्वजनिक परीक्षा (अनुचित साधन निवारण) अधिनियम 2024 के प्रमुख प्रावधानों की चर्चा कीजिए। क्या यह भर्ती परीक्षाओं की विश्वसनीयता बहाल करने के लिए पर्याप्त है? (250 शब्द)

मॉडल उत्तर

भूमिका: पेपर लीक केवल परीक्षा का नहीं, करोड़ों युवाओं के विश्वास और योग्यता-आधारित शासन का संकट है। पिछले वर्षों में अनेक राज्य और केंद्रीय परीक्षाएँ रद्द हुईं; NEET-UG 2024 विवाद ने राष्ट्रीय बहस छेड़ी।

प्रमुख प्रावधान: (1) दायरा: UPSC, SSC, RRB, IBPS, NTA, केंद्रीय मंत्रालयों की भर्ती परीक्षाएँ; (2) अनुचित साधन: प्रश्न-पत्र या उत्तर-कुंजी लीक, उत्तर-पुस्तिका से छेड़छाड़, प्रतिरूपण, कंप्यूटर नेटवर्क में छेड़छाड़, फ़र्ज़ी परीक्षा या वेबसाइट; (3) दंड: 3-5 वर्ष कारावास, ₹10 लाख तक जुर्माना; सेवा प्रदाता पर ₹1 करोड़ तक जुर्माना और 4 वर्ष के लिए प्रतिबंध; संगठित अपराध पर 5-10 वर्ष और न्यूनतम ₹1 करोड़; संपत्ति की कुर्की; (4) अपराध संज्ञेय, गैर-जमानती, गैर-शमनीय; (5) जाँच DSP/ACP से ऊपर के अधिकारी द्वारा, केंद्र CBI को भी सौंप सकता है; (6) राष्ट्रीय तकनीकी समिति — डिजिटल परीक्षा सुरक्षा के मानक।

पर्याप्तता का मूल्यांकन: सकारात्मक — कठोर निवारण, संगठित गिरोहों और सेवा प्रदाताओं की जवाबदेही; सीमाएँ — (1) केवल दंडात्मक, निवारक तंत्र (प्रश्न-पत्र की सुरक्षित छपाई-परिवहन, केंद्रों का ऑडिट) प्रशासनिक सुधार पर निर्भर; (2) राज्य परीक्षाएँ इसके दायरे से बाहर — राज्यों को अपने क़ानून बनाने होंगे (कई ने बनाए); (3) जाँच और दोषसिद्धि की गति; (4) आउटसोर्स एजेंसियों पर निर्भरता; (5) परीक्षा रद्द होने से निर्दोष परीक्षार्थियों की क्षतिपूर्ति का प्रावधान नहीं।

आगे की राह: राधाकृष्णन समिति (2024) के अनुरूप कंप्यूटर-आधारित परीक्षा, एन्क्रिप्टेड डिजिटल प्रश्न-पत्र, सरकारी परीक्षा केंद्र, बहु-स्तरीय सत्यापन (बायोमेट्रिक), परीक्षा कैलेंडर और शिकायत निवारण।

निष्कर्ष: क़ानून "डर" पैदा करता है, पर "विश्वास" तकनीक, पारदर्शिता और संस्थागत क्षमता से लौटेगा।

Q7अभ्यास प्रश्न · UPSC पैटर्न · 15 अंक

प्रत्यक्ष लाभ अंतरण (DBT) ने कल्याण वितरण को किस प्रकार बदला है? इसकी सीमाओं की चर्चा कीजिए। (250 शब्द)

मॉडल उत्तर

भूमिका: DBT (2013 से) के अंतर्गत सब्सिडी और लाभ सीधे लाभार्थी के बैंक खाते में भेजे जाते हैं। इसका आधार JAM त्रिमूर्ति है — जन-धन खाते (2014), आधार (विशिष्ट पहचान) और मोबाइल।

परिवर्तन: (1) लीकेज में कमी: फ़र्ज़ी और दोहरे लाभार्थियों की पहचान — LPG (PAHAL), छात्रवृत्ति, पेंशन में; सरकार के अनुसार बड़े पैमाने पर बचत; (2) बिचौलियों का अंत: MGNREGA मज़दूरी, PM-KISAN सीधे खाते में; (3) गति और पारदर्शिता: वास्तविक समय ट्रैकिंग (PFMS); (4) वित्तीय समावेशन: महिलाओं के खाते, बचत, बीमा; (5) संकट में तत्परता: कोविड में जन-धन खातों में राशि अंतरण; (6) लक्ष्यीकरण: डेटा-आधारित नीति।

सीमाएँ: (1) बहिष्करण त्रुटि: आधार प्रमाणीकरण विफलता, आधार-बैंक लिंकिंग की गलतियाँ, नाम में अंतर — सबसे कमज़ोर वर्ग प्रभावित; (2) अंतिम छोर की पहुँच: बैंक या बैंक मित्र दूर, नक़दी निकालने में कठिनाई, वृद्धों और दिव्यांगों की समस्या; (3) "समस्या का स्थानांतरण": भ्रष्टाचार राशन दुकान से बैंक मित्र या साइबर ठगी तक; (4) नक़द सहायता सेवाओं (स्वास्थ्य, शिक्षा) का विकल्प नहीं; (5) महँगाई के साथ राशि का समायोजन नहीं; (6) डेटा सुरक्षा और निजता।

आगे की राह: प्रमाणीकरण विफलता पर वैकल्पिक सत्यापन, ग्राम स्तर पर "नक़दी-निकासी" बिंदु (डाक भुगतान बैंक), शिकायत निवारण, सामाजिक लेखा परीक्षा, DPDP अधिनियम के अनुरूप डेटा संरक्षण।

निष्कर्ष: DBT ने "पाइपलाइन" को साफ़ किया है; अब ज़रूरत है कि पाइपलाइन का आख़िरी नल हर ज़रूरतमंद तक पहुँचे।

Q8अभ्यास प्रश्न · UPSC पैटर्न · 10 अंक

सामाजिक लेखा परीक्षा कल्याणकारी योजनाओं में जवाबदेही सुनिश्चित करने का प्रभावी साधन है। स्पष्ट कीजिए। (150 शब्द)

मॉडल उत्तर

अर्थ: योजना के लाभार्थी और समुदाय स्वयं सार्वजनिक दस्तावेज़ों (मस्टर रोल, बिल, कार्य-स्थल) की जाँच करें और ग्राम सभा/जन-सुनवाई में अधिकारियों से उत्तर माँगें। इसकी जड़ें MKSS (राजस्थान) के जन-सुनवाई आंदोलन में हैं।

क़ानूनी आधार: MGNREGA धारा 17 — हर छह माह में सामाजिक लेखा परीक्षा; लेखा परीक्षा मानक (CAG के परामर्श से, 2017); मेघालय का सामाजिक लेखा परीक्षा अधिनियम (2017); सर्वोच्च न्यायालय के निर्देश (स्वराज अभियान मामले)।

प्रभावशीलता: (1) फ़र्ज़ी मज़दूरों और अधूरे कामों का उजागर होना — वसूली; (2) लाभार्थियों में अधिकार-चेतना; (3) अधिकारियों पर नैतिक दबाव; (4) आंध्र प्रदेश/तेलंगाना की स्वतंत्र सामाजिक लेखा परीक्षा इकाई एक सफल मॉडल।

सीमाएँ: राज्यों में असमान क्रियान्वयन, लेखा परीक्षा इकाइयों की स्वतंत्रता और धन की कमी, निष्कर्षों पर कार्रवाई कम, स्थानीय प्रभावशाली लोगों का दबाव, शिकायतकर्ताओं की सुरक्षा।

सुझाव: सभी प्रमुख योजनाओं (PDS, मध्याह्न भोजन, आवास) में विस्तार, स्वतंत्र इकाइयाँ, निष्कर्षों पर समयबद्ध कार्रवाई, डिजिटल प्रकटीकरण।

13. Quick Revision Summary

एक नज़र में
  • नीति चक्र: सबसे बड़ा अंतराल क्रियान्वयन में; DBT, सामाजिक लेखा परीक्षा, आकांक्षी ज़िले।
  • सहायकता: निर्णय सूचना-क्रियान्वयन के स्रोत के निकट; 3F का हस्तांतरण।
  • अधिकार-आधारित कल्याण: RTI से NFSA तक; अभिसरण और निवेश की कमी।
  • CSO: लोकतंत्र के साझेदार; FCRA 2020; "गैर-राज्य ≠ राज्य-विरोधी"।
  • SHG: महिलाओं की सामाजिक पूँजी — DAY-NRLM, कुडुम्बश्री, जीविका।
  • न्यास और CSR: समावेशी विकास के संसाधन; पारदर्शिता आवश्यक।
  • सार्वजनिक परीक्षा अधिनियम 2024: कठोर दंड + प्रशासनिक सुधार।