1. अध्याय एक नज़र में
पाठ्यक्रम: "केंद्र एवं राज्यों द्वारा जनसंख्या के अति संवेदनशील वर्गों के लिए कल्याणकारी योजनाएँ और उनका कार्य-निष्पादन; इनकी सुरक्षा एवं बेहतरी के लिए गठित तंत्र, विधि, संस्थान एवं निकाय", "स्वास्थ्य, शिक्षा, मानव संसाधनों से संबंधित सामाजिक क्षेत्र/सेवाओं के विकास और प्रबंधन से संबंधित विषय" तथा "गरीबी और भूख से संबंधित विषय"। GS-2 में हर वर्ष इस भाग से 3-4 प्रश्न आते हैं — और लगभग हर प्रश्न "समता" (equity) बनाम "दक्षता" की बहस पर।
| वर्ष | प्रश्न |
|---|---|
| 2026 | जनजातीय विकास नीति और समता-आधारित शासन; कुपोषण — सार्वजनिक स्वास्थ्य, सामाजिक समता और कल्याण शासन का प्रश्न; शिक्षा — कल्याणकारी दायित्व या रणनीतिक निवेश? |
| 2025 | संसाधनों के स्वामित्व में असमानता और "गरीबी का विरोधाभास" |
| 2024 | गरीबी और कुपोषण का दुष्चक्र; सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवा में राज्य की भूमिका बनाम बाज़ारीकरण |
2. गरीबी, असमानता और भूख
- गरीबी का मापन: लकड़ावाला (1993), तेंदुलकर (2009 — 2011-12 में 21.9%), रंगराजन (2014) समितियाँ; अब बहुआयामी दृष्टि — NITI बहुआयामी गरीबी सूचकांक (स्वास्थ्य, शिक्षा, जीवन स्तर के 12 संकेतक): 2013-14 से 2022-23 के बीच लगभग 24.8 करोड़ लोग बहुआयामी गरीबी से बाहर (अनुमानित अनुपात लगभग 29% से 11%)।
- विश्व बैंक (2025): नई अंतरराष्ट्रीय रेखा ($3 प्रतिदिन, 2021 PPP) पर अत्यधिक गरीबी 2011-12 के लगभग 27% से घटकर 2022-23 में लगभग 5.3%।
- असमानता: उपभोग आधारित Gini अपेक्षाकृत कम दिखता है, पर आय और संपत्ति में असमानता ऊँची — वर्ल्ड इनइक्वैलिटी लैब के अनुमान में शीर्ष 1% के पास राष्ट्रीय आय का लगभग 22.6% और संपत्ति का लगभग 40% (2022-23)। भूमि: कृषि जनगणना 2015-16 — सीमांत और लघु जोतें कुल जोतों का लगभग 86%, पर क्षेत्रफल का लगभग 47%।
- कुपोषण (NFHS-5, 2019-21): 5 वर्ष से कम आयु में ठिगनापन (stunting) 35.5%, दुबलापन (wasting) 19.3%, कम वज़न 32.1%; 6-59 माह के बच्चों में रक्ताल्पता 67.1%, महिलाओं (15-49) में 57%। साथ ही मोटापा भी बढ़ रहा है — "कुपोषण का दोहरा बोझ"।
- योजनाएँ: NFSA 2013 और PM गरीब कल्याण अन्न योजना (निःशुल्क अनाज), पोषण अभियान (2018), मिशन सक्षम आँगनवाड़ी और पोषण 2.0, PM POSHAN (मध्याह्न भोजन), चावल का फ़ोर्टिफ़िकेशन, एनीमिया मुक्त भारत, जल जीवन मिशन, स्वच्छ भारत।
3. जनजातीय विकास
- स्थिति: जनगणना 2011 के अनुसार अनुसूचित जनजातियाँ जनसंख्या का 8.6%; 700 से अधिक समुदाय; 75 विशेष रूप से कमज़ोर जनजातीय समूह (PVTG)।
- नीति का विकास: नेहरू का "जनजातीय पंचशील" (1950 के दशक, वेरियर एल्विन के विचारों से प्रभावित) — आदिवासियों पर कुछ थोपा न जाए, भूमि-वन अधिकारों का सम्मान, उनके अपने लोगों से प्रशासन; जनजातीय उप-योजना (1974-75, अब DAPST); पाँचवीं-छठी अनुसूची; PESA 1996; वन अधिकार अधिनियम 2006; एकलव्य आदर्श आवासीय विद्यालय।
- हाल की पहलें: PM-JANMAN (2023) — PVTG बस्तियों में आवास, सड़क, जल, स्वास्थ्य; धरती आबा जनजातीय ग्राम उत्कर्ष अभियान (2024); वन धन विकास केंद्र।
- समस्याएँ (ख़ाखा समिति, 2014): विकास परियोजनाओं से विस्थापन — स्वतंत्रता के बाद विस्थापितों में आदिवासियों का अनुपात असमान रूप से बड़ा; FRA दावों की अस्वीकृति; PESA नियम कई राज्यों में देर से; स्वास्थ्य-शिक्षा संकेतकों में पिछड़ापन; वामपंथी उग्रवाद प्रभावित क्षेत्र।
- समता-आधारित शासन: "समानता" (सबको एक जैसा) नहीं, "समता" (ज़रूरत के अनुसार) — स्वशासन, सहमति (ग्राम सभा), सांस्कृतिक सम्मान और अधिकार-आधारित दृष्टि।
4. स्वास्थ्य: राज्य बनाम बाज़ार
- व्यय: राष्ट्रीय स्वास्थ्य लेखा अनुमानों के अनुसार सरकारी स्वास्थ्य व्यय GDP का लगभग 2% से कम; जेब से व्यय (OOPE) कुल स्वास्थ्य व्यय के लगभग 64% (2013-14) से घटकर लगभग 39% (2021-22) — फिर भी अधिक।
- ढाँचा: उप-केंद्र → PHC → CHC → ज़िला अस्पताल; आयुष्मान आरोग्य मंदिर (पूर्व के स्वास्थ्य एवं कल्याण केंद्र); PM-JAY (2018) — प्रति परिवार ₹5 लाख वार्षिक बीमा, 2024 से 70 वर्ष से ऊपर सभी को; जन औषधि केंद्र।
- बाज़ारीकरण की समस्याएँ: निजी अस्पतालों में अनावश्यक प्रक्रियाएँ, मूल्य में अपारदर्शिता, ग्रामीण क्षेत्रों में अनुपस्थिति, बीमा-आधारित मॉडल में "प्राथमिक स्वास्थ्य" की उपेक्षा; क्लिनिकल प्रतिष्ठान अधिनियम 2010 का कमज़ोर क्रियान्वयन।
- अच्छे उदाहरण: केरल और तमिलनाडु का सार्वजनिक स्वास्थ्य तंत्र; राजस्थान का स्वास्थ्य का अधिकार अधिनियम (2023); भोर समिति (1946) की सार्वभौमिक सार्वजनिक स्वास्थ्य दृष्टि।
5. शिक्षा: कल्याण या निवेश?
- संवैधानिक आधार: अनुच्छेद 21A (86वाँ संशोधन 2002), RTE 2009, अनुच्छेद 45 (प्रारंभिक बाल्यावस्था देखभाल), अनुच्छेद 46।
- NEP 2020: 5+3+3+4 ढाँचा, आधारभूत साक्षरता-संख्याज्ञान (NIPUN भारत 2021), मातृभाषा में शिक्षा, उच्च शिक्षा में 2035 तक 50% GER, सार्वजनिक व्यय GDP का 6%।
- चुनौतियाँ: सीखने के स्तर (ASER) में कमी, शिक्षकों की रिक्तियाँ और प्रशिक्षण, डिजिटल विभाजन, ड्रॉपआउट (विशेषकर माध्यमिक स्तर पर लड़कियाँ), निजी शिक्षा की बढ़ती लागत, कोचिंग संस्कृति।
- मानव पूँजी सिद्धांत (शुल्ट्ज़, बेकर): शिक्षा व्यय उपभोग नहीं, भविष्य का निवेश — उत्पादकता, नवाचार, जनसांख्यिकीय लाभांश।

6. विस्तृत विवेचन: कमज़ोर वर्गों के संरक्षण के लिए तंत्र, क़ानून और संस्थाएँ
GS-2 के पाठ्यक्रम में "जनसंख्या के कमज़ोर वर्गों के लिए कल्याणकारी योजनाएँ, इन योजनाओं का प्रदर्शन, तथा इन वर्गों की सुरक्षा और बेहतरी के लिए गठित तंत्र, क़ानून, संस्थाएँ और निकाय" स्पष्ट रूप से शामिल हैं। इस विषय पर अच्छे उत्तर के लिए हर वर्ग के संदर्भ में तीन चीज़ें याद रखें: संवैधानिक प्रावधान, प्रमुख क़ानून, और निगरानी करने वाली संस्था। फिर बताएँ कि क्रियान्वयन में अंतर कहाँ है।
| वर्ग | संवैधानिक प्रावधान | प्रमुख क़ानून | संस्था / निकाय | क्रियान्वयन की चुनौतियाँ |
|---|---|---|---|---|
| अनुसूचित जाति | अनुच्छेद 15(4), 16(4A), 17, 46, 330, 332, 338 | नागरिक अधिकार संरक्षण अधिनियम 1955; SC/ST (अत्याचार निवारण) अधिनियम 1989 (2015, 2018 संशोधन); हाथ से मैला उठाने वालों के नियोजन का प्रतिषेध अधिनियम 2013 | राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग (अनुच्छेद 338) | अत्याचार के मामलों में कम दोषसिद्धि; हाथ से मैला ढोने की प्रथा का बने रहना; सीवर-सफ़ाई में मौतें |
| अनुसूचित जनजाति | अनुच्छेद 244, 275(1), 338A; पाँचवीं और छठी अनुसूची | PESA 1996; वन अधिकार अधिनियम 2006 | राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग (89वाँ संशोधन, 2003) | वन-अधिकार दावों की अस्वीकृति; विस्थापन; PESA नियमों का असमान क्रियान्वयन |
| महिलाएँ | अनुच्छेद 14, 15(3), 39, 42, 243D, 243T; 106वाँ संशोधन (2023) | घरेलू हिंसा से संरक्षण अधिनियम 2005; कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न (POSH) अधिनियम 2013; दहेज प्रतिषेध अधिनियम 1961; मातृत्व लाभ (संशोधन) 2017 (26 सप्ताह) | राष्ट्रीय महिला आयोग (1992, सांविधिक) | कम रिपोर्टिंग; POSH की आंतरिक समितियों का अभाव; असंगठित क्षेत्र की महिलाओं की पहुँच |
| बच्चे | अनुच्छेद 21A, 24, 39(e)-(f), 45 | शिक्षा का अधिकार अधिनियम 2009; POCSO 2012; किशोर न्याय अधिनियम 2015; बाल-विवाह प्रतिषेध अधिनियम 2006; बाल श्रम (संशोधन) अधिनियम 2016 | राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग (NCPCR, 2007) | बाल-विवाह और बाल-श्रम का बने रहना; POCSO मामलों में देरी; बाल देखभाल संस्थानों की निगरानी |
| दिव्यांगजन | अनुच्छेद 41; राज्य सूची प्रविष्टि 9 | दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम 2016 (21 प्रकार की दिव्यांगता; सरकारी नौकरियों में 4% आरक्षण) | मुख्य आयुक्त, दिव्यांगजन | सुगम्यता (accessibility) मानकों का कमज़ोर पालन; प्रमाणपत्र प्राप्ति की कठिनाई |
| ट्रांसजेंडर व्यक्ति | अनुच्छेद 14, 15, 21 (NALSA, 2014 निर्णय में "तीसरे लिंग" को मान्यता) | ट्रांसजेंडर व्यक्ति (अधिकार संरक्षण) अधिनियम 2019 | राष्ट्रीय ट्रांसजेंडर व्यक्ति परिषद | पहचान-प्रमाणपत्र की प्रक्रिया पर आलोचना; शिक्षा-रोज़गार में भेदभाव; सामाजिक स्वीकार्यता |
| वरिष्ठ नागरिक | अनुच्छेद 41 | माता-पिता और वरिष्ठ नागरिकों का भरण-पोषण तथा कल्याण अधिनियम 2007 | भरण-पोषण अधिकरण (ज़िला स्तर) | असंगठित क्षेत्र के वृद्धों के लिए अपर्याप्त पेंशन; वृद्धाश्रमों का नियमन |
| अल्पसंख्यक | अनुच्छेद 29, 30, 350A, 350B | राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग अधिनियम 1992 | राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग (सांविधिक); भाषाई अल्पसंख्यकों के लिए विशेष अधिकारी (अनुच्छेद 350B) | शैक्षिक-आर्थिक पिछड़ापन (सच्चर समिति, 2006); सांप्रदायिक हिंसा से सुरक्षा |
- सिफ़ारिशी शक्ति: अधिकांश आयोगों के पास दीवानी न्यायालय की कुछ शक्तियाँ (समन, साक्ष्य) हैं, पर उनकी सिफ़ारिशें बाध्यकारी नहीं।
- नियुक्तियों में राजनीतिक प्रभाव और रिक्तियाँ: अध्यक्ष-सदस्यों के पद लंबे समय तक ख़ाली रहना।
- संसाधन और कर्मचारी: राज्य-स्तरीय आयोगों में विशेष रूप से कमज़ोरी।
- रिपोर्टों पर चर्चा का अभाव: वार्षिक रिपोर्टें संसद में देर से रखी जाती हैं और शायद ही बहस होती है।
- अतिव्याप्ति: मानवाधिकार आयोग और विशेष आयोगों के कार्यक्षेत्र में दोहराव।
सुधार: पारदर्शी, द्विदलीय नियुक्ति प्रक्रिया; सिफ़ारिशों पर सरकार का समयबद्ध, सार्वजनिक उत्तर; पर्याप्त बजट और स्वतंत्र जाँच-कर्मचारी; ज़िला-स्तर तक पहुँच; और नागरिक समाज के साथ सहयोग।
"भारत में कमज़ोर वर्गों के संरक्षण के लिए क़ानूनों की कमी नहीं, उनके क्रियान्वयन की कमी है।" दो वर्गों के उदाहरण लेकर विवेचना कीजिए। (250 शब्द)
मॉडल उत्तर
भूमिका: संविधान के अनुच्छेद 15(4), 17, 21A, 46 और अनेक विशेष क़ानूनों के रूप में भारत में कमज़ोर वर्गों के लिए व्यापक क़ानूनी ढाँचा है, पर ज़मीनी परिणाम अक्सर इन क़ानूनों की भावना से पीछे रह जाते हैं।
उदाहरण 1: अनुसूचित जाति
- क़ानून: SC/ST (अत्याचार निवारण) अधिनियम 1989 (विशेष न्यायालय, कठोर प्रावधान); हाथ से मैला उठाने का प्रतिषेध अधिनियम 2013।
- क्रियान्वयन-अंतर: NCRB के आँकड़ों में अत्याचार के मामलों में कम दोषसिद्धि और अधिक लंबितता; गवाहों का दबाव में मुकरना; सीवर-सफ़ाई में मौतें अब भी होती हैं, जबकि सर्वोच्च न्यायालय (सफ़ाई कर्मचारी आंदोलन, 2014) ने मुआवज़े और रोकथाम के निर्देश दिए थे।
उदाहरण 2: महिलाएँ (कार्यस्थल)
- क़ानून: POSH अधिनियम 2013 (विशाखा दिशानिर्देश, 1997 के आधार पर); हर नियोक्ता पर आंतरिक समिति और ज़िले में स्थानीय समिति का दायित्व।
- क्रियान्वयन-अंतर: अनेक संस्थानों में समितियाँ गठित ही नहीं या निष्क्रिय (सर्वोच्च न्यायालय ने 2023 में ऑरेलियानो फ़र्नांडिस मामले में इस पर चिंता जताई); असंगठित क्षेत्र की महिलाओं के लिए स्थानीय समितियाँ अक्रिय; प्रतिशोध का भय।
कारण: प्रवर्तन एजेंसियों में संवेदनशीलता और प्रशिक्षण का अभाव; पुलिस और न्यायपालिका पर बोझ; सामाजिक पूर्वाग्रह; पीड़ितों की जागरूकता और कानूनी सहायता की कमी; निगरानी संस्थाओं की कमज़ोरी।
उपाय: विशेष न्यायालयों में रिक्तियाँ भरना; पीड़ित और गवाह संरक्षण; पुलिस का संवेदनशीलता प्रशिक्षण; अनुपालन का सार्वजनिक ऑडिट; विधिक सेवा प्राधिकरणों (NALSA) से मुफ़्त सहायता; सामाजिक जागरूकता।
निष्कर्ष: आंबेडकर के शब्दों में संविधान कितना भी अच्छा हो, उसे लागू करने वाले अच्छे न हों तो वह बुरा सिद्ध होगा; यही सिद्धांत संरक्षणकारी क़ानूनों पर भी लागू होता है।
"वन नेशन वन राशन कार्ड" (ONORC) योजना ने प्रवासी श्रमिकों की खाद्य सुरक्षा में किस प्रकार योगदान दिया है? इसकी सीमाएँ भी बताइए। (150 शब्द)
मॉडल उत्तर
पृष्ठभूमि: राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम, 2013 के लाभार्थी पहले केवल अपनी निर्धारित राशन दुकान से अनाज ले सकते थे। ONORC (2019 से चरणबद्ध, कोविड-19 के बाद तेज़ विस्तार) से लाभार्थी देश में कहीं भी ePoS-युक्त राशन दुकान से अपना हक़ ले सकते हैं।
योगदान:
- प्रवासी श्रमिक शहर में और उनका परिवार गाँव में, दोनों अपने-अपने हिस्से का राशन ले सकते हैं।
- कोविड-19 लॉकडाउन की घर-वापसी ने इसकी आवश्यकता उजागर की; सर्वोच्च न्यायालय ने 2021 में सभी राज्यों में इसे लागू करने का निर्देश दिया।
- आधार-आधारित प्रमाणीकरण से दोहरे और नकली कार्ड की छँटाई; राशन डीलरों पर प्रतिस्पर्धा का दबाव।
- अब सभी राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों में लागू।
सीमाएँ:
- बायोमेट्रिक विफलता और नेटवर्क की समस्या से बहिष्करण।
- NFSA कवरेज 2011 की जनगणना पर आधारित, जिससे बढ़ी जनसंख्या के कई पात्र बाहर।
- प्रवासियों के पहुँचने पर दुकानों में अतिरिक्त अनाज की कमी; राज्यों की अपनी योजनाओं के लाभ पोर्टेबल नहीं।
- भाषा और जानकारी की बाधाएँ; असंगठित श्रमिकों के पंजीकरण (ई-श्रम) से अधूरा जुड़ाव।
निष्कर्ष: ONORC "पोर्टेबल कल्याण" की दिशा में बड़ा कदम है; इसे स्वास्थ्य, शिक्षा और सामाजिक सुरक्षा लाभों की पोर्टेबिलिटी तक विस्तारित करना अगला लक्ष्य होना चाहिए।
7. Master Summary Table
| क्षेत्र | मुख्य स्थिति | योजना / क़ानून |
|---|---|---|
| गरीबी | MPI: ~24.8 करोड़ बाहर (2013-14 से 2022-23) | NFSA, PMGKAY, MGNREGA |
| असमानता | आय-संपत्ति में ऊँची, भूमि में असमान | भूमि सुधार, प्रगतिशील कराधान |
| कुपोषण | ठिगनापन 35.5%, रक्ताल्पता 67.1% (NFHS-5) | पोषण 2.0, PM POSHAN |
| जनजाति | 8.6%; 75 PVTG | FRA, PESA, PM-JANMAN |
| स्वास्थ्य | GHE ~2% GDP; OOPE ~39% | PM-JAY, आरोग्य मंदिर |
| शिक्षा | सीखने का संकट | RTE, NEP 2020, NIPUN |
8. Mind Map
- MPI
- NFSA, पोषण
- SC, ST, OBC
- महिलाएँ, वृद्ध, दिव्यांग
- सार्वजनिक बनाम निजी
- PM-JAY
- RTE
- NEP 2020
- आयोग
- सामाजिक लेखा परीक्षा
9. महत्वपूर्ण One-liners
- NFSA: 2013; ग्रामीण 75%, शहरी 50% तक कवरेज।
- पोषण अभियान: मार्च 2018।
- NFHS-5 में ठिगनापन: 35.5%।
- PM-JAY: 2018, ₹5 लाख प्रति परिवार।
- जनजातीय पंचशील: नेहरू (वेरियर एल्विन से प्रभावित)।
- PVTG के लिए मिशन: PM-JANMAN (2023)।
- जनजातीय स्थिति पर उच्चस्तरीय समिति: वर्जीनियस ख़ाखा (2014)।
- शिक्षा का अधिकार: अनुच्छेद 21A, RTE 2009।
- सार्वभौमिक स्वास्थ्य की आरंभिक दृष्टि: भोर समिति (1946)।
10. टिप्स एवं ट्रिक्स
- हर उत्तर में कम से कम एक आँकड़ा (NFHS-5, MPI, NHA) — पर स्रोत और वर्ष के साथ।
- "समता" और "समानता" का अंतर लिखें; अंबेडकर का "सामाजिक लोकतंत्र" निष्कर्ष के लिए उपयोगी।
- कल्याण को "ख़र्च" नहीं, "मानव पूँजी में निवेश" के रूप में प्रस्तुत करें — आर्थिक तर्क से सामाजिक प्रश्न मज़बूत होता है।
कुपोषण के तीन रूप: "ठि-दु-क" — ठिगनापन (उम्र के अनुसार कम लंबाई), दुबलापन (लंबाई के अनुसार कम वज़न), कम वज़न (उम्र के अनुसार)।
11. PYQ-आधारित प्रश्न एवं मॉडल उत्तर
भारत की जनजातीय विकास नीति को समता-आधारित शासन की दृष्टि से परखिए। (150 शब्द)
मॉडल उत्तर
समता-आधारित शासन: सबको एक जैसी योजना नहीं, बल्कि ऐतिहासिक वंचना और विशिष्ट संस्कृति को ध्यान में रखकर अधिक संसाधन, अधिक स्वायत्तता और सहमति।
नीति में समता के तत्व: (1) पाँचवीं-छठी अनुसूची और PESA 1996 — ग्राम सभा को भूमि, लघु वनोपज, स्थानीय संसाधनों पर अधिकार; (2) वन अधिकार अधिनियम 2006 — "ऐतिहासिक अन्याय" को सुधारना; (3) DAPST — जनसंख्या के अनुपात में बजट; (4) PM-JANMAN (2023) — PVTG पर लक्षित; (5) एकलव्य विद्यालय।
खामियाँ: (1) खनन-बाँध परियोजनाओं से विस्थापन और अपर्याप्त पुनर्वास (ख़ाखा समिति); (2) FRA दावों की बड़े पैमाने पर अस्वीकृति; (3) PESA नियमों में देरी, ग्राम सभा की सहमति की औपचारिकता; (4) DAPST निधियों का अन्यत्र उपयोग; (5) "मुख्यधारा" में लाने की एकरूप दृष्टि बनाम सांस्कृतिक स्वायत्तता।
आगे की राह: नेहरू के पंचशील की भावना — "उन्हें उनकी अपनी प्रतिभा के अनुसार विकसित होने दें"; ग्राम सभा की वास्तविक सहमति, सामुदायिक वन अधिकार, जनजातीय भाषाओं में शिक्षा, स्थानीय नेतृत्व।
कुपोषण केवल सार्वजनिक स्वास्थ्य का नहीं, बल्कि सामाजिक समता और कल्याण शासन का भी प्रश्न है। चर्चा कीजिए। (150 शब्द)
मॉडल उत्तर
सार्वजनिक स्वास्थ्य: NFHS-5 में 35.5% बच्चे ठिगने, 67.1% में रक्ताल्पता — बीमारी, मृत्यु दर, संज्ञानात्मक विकास पर प्रभाव।
सामाजिक समता: कुपोषण असमान रूप से वितरित — SC-ST, गरीब परिवारों, ग्रामीण क्षेत्रों, लड़कियों और कुछ राज्यों (बिहार, झारखंड, मेघालय) में अधिक; माँ की शिक्षा, विवाह की आयु, घर में भोजन का लैंगिक वितरण, स्वच्छता — सब सामाजिक कारक।
कल्याण शासन: ICDS, PDS, मध्याह्न भोजन, स्वास्थ्य, जल-स्वच्छता अलग-अलग मंत्रालयों में; आँगनवाड़ी कर्मियों पर बोझ; पोषण ट्रैकर के बावजूद गुणवत्ता की निगरानी कमज़ोर।
समाधान: पोषण 2.0 के अंतर्गत अभिसरण, पहले 1000 दिनों पर ध्यान, मोटे अनाज और विविध आहार, फ़ोर्टिफ़िकेशन, जल-स्वच्छता, महिलाओं की शिक्षा और आय, सामुदायिक निगरानी (जन आंदोलन)।
निष्कर्ष: कुपोषण "थाली की कमी" से अधिक "अवसरों की असमानता" का संकेतक है।
गरीबी और कुपोषण एक दुष्चक्र बनाते हैं। इस चक्र को तोड़ने के उपाय सुझाइए। (150 शब्द)
मॉडल उत्तर
दुष्चक्र: गरीबी → अपर्याप्त और कम पौष्टिक भोजन, असुरक्षित जल-स्वच्छता → कुपोषण और बार-बार बीमारी → ठिगनापन, कम सीखना, कम उत्पादकता → कम आय → गरीबी। कुपोषित माँ कम वज़न के शिशु को जन्म देती है — चक्र अगली पीढ़ी तक। [रेखाचित्र: चक्र]
चक्र तोड़ने के उपाय: (1) पोषण-विशिष्ट: गर्भवती-धात्री महिलाओं और पहले 1000 दिनों पर ध्यान (PMMVY, पोषण 2.0), फ़ोर्टिफ़ाइड अनाज, आयरन-फ़ोलिक एसिड, स्तनपान; (2) पोषण-संवेदी: जल जीवन मिशन, स्वच्छ भारत, महिलाओं की शिक्षा, बाल विवाह रोकथाम; (3) आय सुरक्षा: MGNREGA, SHG, न्यूनतम मज़दूरी, नक़द हस्तांतरण; (4) खाद्य विविधता: PDS में दालें और मोटे अनाज; (5) स्वास्थ्य तंत्र: टीकाकरण, कृमि-मुक्ति; (6) शासन: अभिसरण और सामुदायिक निगरानी।
उदाहरण: तमिलनाडु का पोषण कार्यक्रम, ओडिशा में गर्भवती महिलाओं के लिए अंडे-आहार, छत्तीसगढ़ का सुपोषण अभियान।
निष्कर्ष: पोषण में निवेश सबसे ऊँचा प्रतिफल देने वाला मानव पूँजी निवेश है।
संसाधनों के स्वामित्व में असमानता "गरीबी का विरोधाभास" (प्रचुरता के बीच गरीबी) किस प्रकार उत्पन्न करती है? भारत के संदर्भ में विवेचना कीजिए। (250 शब्द)
मॉडल उत्तर
भूमिका: "गरीबी का विरोधाभास" — संसाधन-समृद्ध क्षेत्र या तेज़ी से बढ़ती अर्थव्यवस्था में भी व्यापक गरीबी। अमर्त्य सेन के अनुसार गरीबी संसाधनों की कमी से कम, बल्कि उन तक "हक़" (entitlements) और "क्षमताओं" की कमी से अधिक है।
भारत में स्वरूप: (1) खनिज-समृद्ध क्षेत्र: झारखंड, ओडिशा, छत्तीसगढ़ — देश के खनिजों का बड़ा भाग, पर बहुआयामी गरीबी ऊँची; खनन का लाभ बाहर, विस्थापन और प्रदूषण स्थानीय; (2) भूमि: सीमांत-लघु जोतें 86%, पर क्षेत्रफल केवल लगभग 47%; भूमिहीन कृषि मज़दूर; (3) संपत्ति: शीर्ष 1% के पास संपत्ति का बड़ा भाग; (4) अन्न भंडार और भूख: FCI के गोदाम भरे, फिर भी कुपोषण; (5) उपजाऊ गंगा मैदान में भी उच्च गरीबी — भूमि-संबंधों की ऐतिहासिक असमानता (ज़मींदारी विरासत)।
तंत्र: संसाधनों पर नियंत्रण → राजनीतिक-आर्थिक शक्ति → नीतियाँ अभिजात वर्ग के अनुकूल; ऋण, शिक्षा, बाज़ार तक असमान पहुँच; "संसाधन अभिशाप" — शासन की कमज़ोरी, भ्रष्टाचार, संघर्ष (वामपंथी उग्रवाद)।
प्रगति: MPI में बड़ी कमी, DBT और सामाजिक सुरक्षा का विस्तार — पर संपत्ति-असमानता बनी हुई।
उपाय: (1) ज़िला खनिज निधि (DMF) का स्थानीय समुदाय-केंद्रित उपयोग; (2) भूमि सुधार — पट्टेदारी क़ानून (मॉडल भूमि पट्टा अधिनियम 2016), भूमि अभिलेखों का डिजिटलीकरण, महिलाओं के भूमि अधिकार; (3) FRA-PESA से संसाधनों पर सामुदायिक अधिकार; (4) प्रगतिशील कराधान और सार्वजनिक सेवाओं में निवेश; (5) कौशल और ऋण तक पहुँच; (6) संसाधन-आधारित उद्योगों में स्थानीय रोज़गार और लाभ-साझेदारी।
निष्कर्ष: प्रचुरता का अर्थ समृद्धि तभी है जब स्वामित्व और अवसर का वितरण न्यायपूर्ण हो — यही संविधान के अनुच्छेद 39(b)-(c) का निर्देश है।
शिक्षा — कल्याणकारी दायित्व या रणनीतिक निवेश? भारत के संदर्भ में विवेचना कीजिए। (250 शब्द)
मॉडल उत्तर
भूमिका: परंपरागत दृष्टि में शिक्षा राज्य का "कल्याणकारी दायित्व" है — हर बच्चे का अधिकार; आर्थिक दृष्टि में यह "रणनीतिक निवेश" — मानव पूँजी जो संवृद्धि, नवाचार और राष्ट्रीय शक्ति बढ़ाती है। भारत के लिए दोनों दृष्टियाँ परस्पर पूरक हैं।
कल्याणकारी दायित्व के रूप में: (1) अनुच्छेद 21A और RTE 2009 — 6-14 वर्ष के बच्चों का मौलिक अधिकार; (2) 25% आरक्षण निजी विद्यालयों में (धारा 12(1)(c)); (3) मध्याह्न भोजन, छात्रवृत्तियाँ; (4) सामाजिक गतिशीलता — अंबेडकर का "शिक्षित बनो" संदेश; (5) लड़कियों की शिक्षा से विवाह आयु, स्वास्थ्य और प्रजनन दर पर प्रभाव।
रणनीतिक निवेश के रूप में: (1) जनसांख्यिकीय लाभांश — कार्यशील जनसंख्या को कौशल; (2) ज्ञान अर्थव्यवस्था — AI, सेमीकंडक्टर, अनुसंधान (अनुसंधान नेशनल रिसर्च फ़ाउंडेशन 2023); (3) "सॉफ़्ट पावर" — विश्वविद्यालयों का अंतरराष्ट्रीयकरण; (4) पूर्वी एशियाई देशों (दक्षिण कोरिया) का अनुभव — शिक्षा में भारी निवेश से तीव्र विकास।
वर्तमान अंतराल: सार्वजनिक व्यय NEP के 6% लक्ष्य से कम; सीखने का संकट (ASER); शिक्षकों की कमी; उच्च शिक्षा में गुणवत्ता और रोज़गार-योग्यता का अंतर; कौशल प्रणाली का शिक्षा से कमज़ोर जुड़ाव।
आगे की राह: आधारभूत साक्षरता पर ध्यान (NIPUN), शिक्षक प्रशिक्षण, व्यावसायिक शिक्षा का मुख्यधारा में समावेश (NEP), सार्वजनिक व्यय में वृद्धि, अनुसंधान-उद्योग संबंध, डिजिटल समावेशन।
निष्कर्ष: शिक्षा पर ख़र्च "दया" नहीं, भविष्य की "पूँजी" है — जो राष्ट्र आज कक्षा में निवेश करता है, वही कल वैश्विक प्रतिस्पर्धा में आगे रहता है।
सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवा में राज्य की भूमिका पर उसके बढ़ते बाज़ारीकरण के संदर्भ में चर्चा कीजिए। (250 शब्द)
मॉडल उत्तर
भूमिका: स्वास्थ्य "सार्वजनिक वस्तु" के गुण रखता है — संक्रामक रोग नियंत्रण, टीकाकरण, स्वच्छता का लाभ पूरे समाज को; साथ ही "सूचना की असमानता" के कारण बाज़ार अकेले न्यायपूर्ण परिणाम नहीं देता। संविधान में अनुच्छेद 21 (जीवन — स्वास्थ्य सहित), 38, 39(e), 47 राज्य का दायित्व बताते हैं।
बाज़ारीकरण की प्रवृत्ति: (1) बाह्य-रोगी और अस्पताल सेवाओं में निजी क्षेत्र का बड़ा हिस्सा; (2) सरकारी व्यय GDP के लगभग 2% से कम; (3) बीमा-आधारित मॉडल (PM-JAY) में निजी अस्पतालों की भागीदारी; (4) चिकित्सा शिक्षा का निजीकरण।
समस्याएँ: (1) OOPE अब भी कुल व्यय का लगभग 39% — हर वर्ष लाखों परिवार गरीबी में; (2) अनावश्यक प्रक्रियाएँ, अपारदर्शी मूल्य; (3) ग्रामीण और पिछड़े क्षेत्रों में निजी सेवा का अभाव; (4) प्राथमिक और निवारक स्वास्थ्य की उपेक्षा; (5) कोविड-19 ने सार्वजनिक तंत्र की अनिवार्यता दिखाई।
राज्य की भूमिका: (1) प्रदाता — प्राथमिक स्वास्थ्य (आयुष्मान आरोग्य मंदिर), ज़िला अस्पताल; (2) वित्तपोषक — PM-JAY, राज्य योजनाएँ; (3) नियामक — क्लिनिकल प्रतिष्ठान अधिनियम, NPPA द्वारा स्टेंट-घुटना प्रत्यारोपण के मूल्य नियंत्रण, जन औषधि; (4) सार्वजनिक स्वास्थ्य — रोग निगरानी (IDSP), एक स्वास्थ्य दृष्टिकोण।
संतुलित मॉडल: राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति 2017 — सरकारी व्यय 2.5% GDP; सार्वजनिक प्राथमिक स्वास्थ्य + विनियमित निजी द्वितीयक-तृतीयक सेवा (रणनीतिक क्रय); केरल-तमिलनाडु का अनुभव; राजस्थान का स्वास्थ्य का अधिकार।
निष्कर्ष: बाज़ार दक्षता ला सकता है, पर समता और सार्वभौमिकता की गारंटी केवल राज्य दे सकता है — "स्वास्थ्य सबके लिए" का लक्ष्य राज्य के नेतृत्व में ही संभव है।
भारत में तेज़ी से बढ़ती वृद्ध जनसंख्या के लिए सामाजिक सुरक्षा तंत्र की पर्याप्तता का परीक्षण कीजिए। (250 शब्द)
मॉडल उत्तर
भूमिका: UNFPA की India Ageing Report 2023 के अनुसार 60+ आयु वर्ग का अनुपात 2022 के लगभग 10.5% से बढ़कर 2050 तक लगभग 20% से अधिक हो सकता है; दक्षिणी राज्यों और हिमाचल में यह परिवर्तन और तेज़।
चुनौतियाँ: (1) आय सुरक्षा: अधिकांश श्रमिक अनौपचारिक क्षेत्र में — पेंशन नहीं; (2) स्वास्थ्य: दीर्घकालिक रोग, विकलांगता, मनोभ्रंश; (3) सामाजिक: संयुक्त परिवारों का विघटन, प्रवासन, अकेलापन, उपेक्षा और दुर्व्यवहार; (4) महिलाएँ: वृद्ध विधवाओं का बड़ा अनुपात, संपत्ति और आय कम ("वृद्धावस्था का स्त्रीकरण")।
वर्तमान तंत्र: (1) इंदिरा गांधी राष्ट्रीय वृद्धावस्था पेंशन (NSAP) — केंद्र का अंशदान बहुत कम राशि; (2) अटल पेंशन योजना, PM श्रम योगी मानधन; (3) माता-पिता और वरिष्ठ नागरिकों का भरण-पोषण अधिनियम 2007; (4) PM-JAY में 70+ सभी का समावेश (2024); (5) राष्ट्रीय वृद्धजन स्वास्थ्य देखभाल कार्यक्रम (NPHCE); (6) राष्ट्रीय वयोश्री योजना; (7) सामाजिक सुरक्षा संहिता 2020।
पर्याप्तता का मूल्यांकन: पेंशन राशि अपर्याप्त और राज्यों में असमान; जराचिकित्सा विशेषज्ञों और देखभाल केंद्रों की कमी; डिजिटल पहुँच की बाधाएँ; दीर्घकालिक देखभाल (long-term care) का ढाँचा लगभग अनुपस्थित।
आगे की राह: सार्वभौमिक न्यूनतम पेंशन, समुदाय-आधारित देखभाल, "सिल्वर इकोनॉमी" (वृद्धों के लिए उत्पाद-सेवाएँ, रोज़गार), जराचिकित्सा प्रशिक्षण, अंतर-पीढ़ीगत कार्यक्रम, केरल के "वयोमित्रम्" जैसे मॉडल।
निष्कर्ष: "जनसांख्यिकीय लाभांश" के बाद "जनसांख्यिकीय दायित्व" आता है — उसकी तैयारी आज से करनी होगी।
अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम के प्रभावी क्रियान्वयन में बाधाओं की चर्चा कीजिए। (150 शब्द)
मॉडल उत्तर
पृष्ठभूमि: अधिनियम 1989 अनुच्छेद 17 (अस्पृश्यता उन्मूलन) और 46 को साकार करता है; 2015 संशोधन — नए अपराध (सामाजिक-आर्थिक बहिष्कार आदि), विशेष न्यायालय, पीड़ितों के अधिकार; सुभाष काशीनाथ महाजन (2018) के निर्देशों (अग्रिम ज़मानत, प्रारंभिक जाँच) के बाद 2018 संशोधन से धारा 18A — अग्रिम ज़मानत पर रोक बहाल (पृथ्वी राज चौहान 2020 में वैध)।
बाधाएँ: (1) कम दोषसिद्धि दर और भारी लंबित मामले; (2) प्राथमिकी दर्ज करने में अनिच्छा, गवाहों को धमकी; (3) विशेष न्यायालयों और विशेष लोक अभियोजकों की कमी; (4) जाँच में देरी — 60 दिन की समय-सीमा का पालन नहीं; (5) पीड़ितों को राहत और पुनर्वास में देरी; (6) सामाजिक दबाव से समझौते; (7) "दुरुपयोग" की धारणा, जिससे संस्थागत उदासीनता।
सुधार: हर ज़िले में अनन्य विशेष न्यायालय, गवाह संरक्षण योजना (2018), समयबद्ध जाँच की निगरानी, पुलिस का संवेदीकरण, NCSC-NCST की सक्रिय निगरानी, राज्य-स्तरीय सतर्कता समितियों की नियमित बैठकें।
निष्कर्ष: क़ानून की कठोरता से अधिक ज़रूरी है उसका निष्पक्ष और त्वरित क्रियान्वयन — तभी संविधान का "समानता का वादा" ज़मीन पर उतरेगा।
12. Quick Revision Summary
- गरीबी: बहुआयामी दृष्टि; MPI में बड़ी कमी, पर आय-संपत्ति-भूमि असमानता ऊँची।
- कुपोषण: NFHS-5 — ठिगनापन 35.5%, रक्ताल्पता 67.1%; गरीबी-कुपोषण दुष्चक्र; अभिसरण आवश्यक।
- जनजाति: पंचशील, PESA, FRA, PM-JANMAN; समता-आधारित शासन।
- स्वास्थ्य: कम सरकारी व्यय, ऊँचा OOPE; राज्य — प्रदाता, वित्तपोषक, नियामक।
- शिक्षा: अधिकार भी, निवेश भी; NEP 2020, NIPUN।
- वृद्ध: तेज़ी से बढ़ता अनुपात; पेंशन और दीर्घकालिक देखभाल की कमी।