UPSC Mains · General Studies Paper III · अध्याय 6

विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी

Science and Technology

विकास और दैनिक जीवन में अनुप्रयोग; भारतीयों की उपलब्धियाँ, स्वदेशीकरण; IT, अंतरिक्ष, कंप्यूटर, रोबोटिक्स, नैनो-टेक, बायो-टेक और बौद्धिक संपदा अधिकार।

GS-3 29 मिनट

1. अध्याय एक नज़र में

पाठ्यक्रम: "विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी — विकास एवं अनुप्रयोग और रोज़मर्रा के जीवन पर इसका प्रभाव; विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी में भारतीयों की उपलब्धियाँ, देशज रूप से प्रौद्योगिकी का विकास और नई प्रौद्योगिकी का विकास; सूचना प्रौद्योगिकी, अंतरिक्ष, कंप्यूटर, रोबोटिक्स, नैनो-टेक्नोलॉजी, बायो-टेक्नोलॉजी और बौद्धिक संपदा अधिकारों से संबंधित विषयों के संबंध में जागरूकता।" GS-3 का यह सबसे "समसामयिक" भाग है — प्रश्न प्रायः हाल की उपलब्धि (PFBR, सेमीकंडक्टर, उपग्रह) से शुरू होते हैं।

वर्षप्रश्न
2026फ़ास्ट ब्रीडर रिएक्टर बनाम तापीय रिएक्टर — कलपक्कम PFBR; मिशन दृष्टि उपग्रह; एजेंटिक AI
2025संलयन ऊर्जा — भारत और ITER; सेमीकंडक्टर केंद्र — भारत सेमीकंडक्टर मिशन; कृषि में नैनो-प्रौद्योगिकी
2024जीवित पदार्थों पर IPR, पेटेंटों का कम व्यावसायीकरण; क्षुद्रग्रह (asteroids)
S&T उत्तरों का सूत्र

सिद्धांत (सरल भाषा में, एक रेखाचित्र) → भारत की उपलब्धि/कार्यक्रम → अनुप्रयोग → चुनौतियाँ (तकनीकी, नैतिक, नियामक) → आगे की राह। तकनीकी शब्द English में, व्याख्या हिंदी में।

2. परमाणु ऊर्जा: विखंडन और संलयन

  • भाभा का त्रि-चरणीय कार्यक्रम — भारत में यूरेनियम कम, थोरियम प्रचुर (विश्व भंडार का बड़ा हिस्सा, केरल-ओडिशा के मोनाज़ाइट बालू में):
    1. चरण 1 — PHWR: प्राकृतिक यूरेनियम ईंधन, भारी जल मंदक; उप-उत्पाद प्लूटोनियम-239।
    2. चरण 2 — फ़ास्ट ब्रीडर रिएक्टर (FBR): Pu-239 + U-238 का मिश्रित ऑक्साइड (MOX) ईंधन; जितना ईंधन जलाता है उससे अधिक "पैदा" (breed) करता है; थोरियम आवरण (blanket) से U-233 बनाता है। PFBR (500 MWe), कलपक्कम — BHAVINI द्वारा; 2024 में कोर लोडिंग, उसके बाद प्रथम क्रांतिकता (criticality) — दूसरे चरण में प्रवेश।
    3. चरण 3: थोरियम-U-233 आधारित रिएक्टर — दीर्घकालिक ऊर्जा आत्मनिर्भरता।
  • संलयन (fusion): हल्के नाभिक (हाइड्रोजन के समस्थानिक ड्यूटीरियम-ट्रिटियम) जुड़कर भारी नाभिक बनाते हैं — सूर्य की ऊर्जा का स्रोत; लाखों डिग्री तापमान पर प्लाज़्मा को चुंबकीय क्षेत्र (टोकामैक) में बाँधना। ITER (कैडराश, फ़्रांस) — 7 सदस्य (EU, अमेरिका, रूस, चीन, जापान, दक्षिण कोरिया, भारत); भारत 2005 से सदस्य, लगभग 9% योगदान मुख्यतः उपकरणों के रूप में (विश्व का सबसे बड़ा स्टेनलेस स्टील निर्वात पात्र — क्रायोस्टैट, भारतीय उद्योग द्वारा निर्मित)। भारत में प्लाज़्मा अनुसंधान संस्थान (गांधीनगर) — आदित्य और SST-1 टोकामैक।
आधारतापीय रिएक्टर (PHWR/LWR)फ़ास्ट ब्रीडर रिएक्टर
न्यूट्रॉनमंदक (भारी/हल्का जल) से धीमे किए गएतेज़ न्यूट्रॉन, मंदक नहीं
ईंधनप्राकृतिक/संवर्धित यूरेनियमPu-U MOX
शीतलकजलतरल सोडियम
ईंधन उपयोगयूरेनियम का बहुत छोटा अंशU-238 को भी उपयोगी बनाता; ईंधन "पैदा" करता है
चुनौतीपरिपक्व तकनीकसोडियम का जल-वायु से तीव्र प्रतिक्रिया, जटिल सुरक्षा
चरण 1: PHWRप्राकृतिक U → Pu चरण 2: FBRPu ब्रीडिंग, Th → U-233 चरण 3: थोरियमU-233 ईंधन PFBR, कलपक्कम = चरण 2 का द्वार
सीमित यूरेनियम और प्रचुर थोरियम के कारण भारत ने त्रि-चरणीय मार्ग चुना; FBR दोनों चरणों के बीच का पुल है।

3. AI, सेमीकंडक्टर और डिजिटल प्रौद्योगिकी

  • AI का विकास: नियम-आधारित → मशीन लर्निंग → जनरेटिव AI (LLM) → एजेंटिक AI — ऐसे AI "एजेंट" जो लक्ष्य दिए जाने पर स्वयं योजना बनाते हैं, उपकरणों (सॉफ़्टवेयर, वेब, डेटाबेस) का उपयोग करते हैं, कई चरणों में कार्य पूरा करते हैं और परिणाम के अनुसार स्वयं सुधार करते हैं — "उत्तर देने वाले" से "काम करने वाले" AI की ओर।
  • भारत: IndiaAI मिशन (मार्च 2024, ₹10,000 करोड़ से अधिक) — साझा GPU कंप्यूटिंग, स्वदेशी आधारभूत मॉडल, डेटासेट (AIKosh), भाषिणी; 2025 में AI शासन दिशानिर्देश; फ़रवरी 2026 में नई दिल्ली में AI Impact Summit।
  • सेमीकंडक्टर: भारत सेमीकंडक्टर मिशन (दिसंबर 2021, ₹76,000 करोड़) — फ़ैब, ATMP/OSAT (चिप असेंबली-परीक्षण), डिज़ाइन (DLI योजना); माइक्रोन (साणंद ATMP), टाटा-PSMC (धोलेरा फ़ैब), टाटा (असम OSAT) सहित अनेक परियोजनाएँ स्वीकृत; 2025 में पहले "मेड इन इंडिया" चिप्स।

4. अंतरिक्ष

  • उपलब्धियाँ: चंद्रयान-3 (23 अगस्त 2023 — चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव के निकट उतरने वाला पहला देश), आदित्य-L1 (2023-24), SpaDeX डॉकिंग (2025), NISAR (NASA-ISRO, 2025), गगनयान मानव अंतरिक्ष उड़ान की तैयारी, 2025 में भारतीय अंतरिक्ष यात्री की अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन यात्रा (Axiom-4), भारतीय अंतरिक्ष स्टेशन (2035 लक्ष्य)।
  • सुधार: IN-SPACe (2020), NSIL, भारतीय अंतरिक्ष नीति 2023, FDI उदारीकरण (2024) — निजी रॉकेट (स्काईरूट, अग्निकुल) और उपग्रह स्टार्टअप; निजी पृथ्वी अवलोकन उपग्रह — जैसे बेंगलुरु के स्टार्टअप GalaxEye का "दृष्टि" मिशन, जो प्रकाशीय (optical) और SAR संवेदकों को एक ही उपग्रह पर जोड़ने (OptoSAR) के लिए जाना जाता है।
  • ग्रह-रक्षा: पृथ्वी के निकट के पिंड (NEO) — NASA का DART (2022) — क्षुद्रग्रह डाइमॉर्फ़ोस की कक्षा बदली; ESA का Hera (2024); क्षुद्रग्रह अपोफ़िस का 2029 में पृथ्वी के बहुत निकट से गुज़रना — ISRO ने ग्रह-रक्षा में रुचि दिखाई।

5. जैव-प्रौद्योगिकी, नैनो-प्रौद्योगिकी और IPR

  • जैव-प्रौद्योगिकी: जीन संपादन (CRISPR) — SDN-1/2 पौधों को GM नियमों से छूट (2022), 2025 में जीन-संपादित धान की किस्में; जीनोम इंडिया परियोजना (10,000 जीनोम); स्वदेशी टीके; BioE3 नीति (2024)।
  • नैनो-प्रौद्योगिकी: 1-100 नैनोमीटर पर पदार्थ के गुण बदलते हैं (अधिक सतह क्षेत्र, प्रतिक्रियाशीलता); कृषि में नैनो यूरिया (2021), नैनो DAP (2023), नैनो-कीटनाशक, नैनो-संवेदक; स्वास्थ्य में दवा वितरण; जल शोधन।
  • IPR और जीवन रूप: पेटेंट अधिनियम 1970 की धारा 3(j) — पौधे, पशु, बीज, किस्में और "अनिवार्यतः जैविक प्रक्रियाएँ" पेटेंट योग्य नहीं, पर सूक्ष्मजीव पेटेंट योग्य (TRIPS अनुच्छेद 27.3(b)); पौधों की किस्मों के लिए अलग sui generis क़ानून — PPV&FR अधिनियम 2001 (किसानों के अधिकार सहित); जैव-विविधता अधिनियम 2002 (भारतीय जैव-संसाधनों पर IPR से पहले अनुमति, लाभ-साझेदारी); धारा 3(d) — "सदाबहार पेटेंट" पर रोक (नोवार्टिस 2013)।
पर्यावरण के लिए समाधान
स्वच्छ ऊर्जा, जैव-प्रौद्योगिकी और नई सामग्री — विज्ञान का लक्ष्य विकास को सतत बनाना है।

6. विस्तृत विवेचन: प्रौद्योगिकी का स्वदेशीकरण और उभरते राष्ट्रीय मिशन

GS-3 के पाठ्यक्रम में "प्रौद्योगिकी का स्वदेशीकरण और नई प्रौद्योगिकी का विकास" स्पष्ट रूप से शामिल है। पिछले कुछ वर्षों में भारत ने कई "मिशन-मोड" कार्यक्रम शुरू किए हैं, जिनका उद्देश्य आयात-निर्भरता घटाना और भविष्य की प्रौद्योगिकियों में स्थान बनाना है। इन पर प्रश्न प्रायः "भारत की क्षमता, चुनौतियाँ और आगे का रास्ता" के रूप में आते हैं।

मिशन / क्षेत्रमुख्य उद्देश्यचुनौतियाँ
राष्ट्रीय क्वांटम मिशन (2023)क्वांटम कंप्यूटिंग, क्वांटम संचार (उपग्रह-आधारित सुरक्षित संचार), क्वांटम संवेदन और सामग्री में क्षमता; लगभग 6,000 करोड़ रुपये का परिव्यय (2023-24 से 2030-31)अत्यधिक विशिष्ट मानव संसाधन, महँगे उपकरण, वैश्विक प्रतिस्पर्धा
राष्ट्रीय हरित हाइड्रोजन मिशन (2023)2030 तक प्रति वर्ष लगभग 50 लाख टन हरित हाइड्रोजन उत्पादन क्षमता का लक्ष्य; इलेक्ट्रोलाइज़र निर्माण और माँग-सृजन (उर्वरक, रिफ़ाइनरी, इस्पात)उच्च लागत, नवीकरणीय बिजली और जल की आवश्यकता, भंडारण-परिवहन
भारत सेमीकंडक्टर मिशन (2021)चिप निर्माण (fab), असेंबली-परीक्षण (ATMP/OSAT) और डिज़ाइन में प्रोत्साहनअत्यधिक पूँजी-गहन; अति-शुद्ध जल, निर्बाध बिजली, विशिष्ट गैसें और रसायनों की आपूर्ति-श्रृंखला
IndiaAI मिशन (2024)साझा कंप्यूट अवसंरचना (GPU), भारतीय भाषाओं के लिए आधारभूत मॉडल, डेटासेट मंच, AI कौशलडेटा की गुणवत्ता और निजता, कंप्यूट की लागत, प्रतिभा-पलायन
रक्षा स्वदेशीकरण"सकारात्मक स्वदेशीकरण सूचियाँ", रक्षा अधिग्रहण प्रक्रिया 2020 में घरेलू ख़रीद को प्राथमिकता, iDEX स्टार्ट-अप चुनौती, रक्षा गलियारे (उत्तर प्रदेश और तमिलनाडु)इंजन जैसी महत्वपूर्ण प्रौद्योगिकियों में निर्भरता; परियोजनाओं में देरी; अनुसंधान-विकास पर कम व्यय
अंतरिक्ष क्षेत्र सुधारभारतीय अंतरिक्ष नीति 2023; IN-SPACe के माध्यम से निजी क्षेत्र की भागीदारी; निजी रॉकेट और उपग्रहनियामक ढाँचे की स्पष्टता, दायित्व क़ानून
अनुसंधान और विकास (R&D): मूल समस्या
  • भारत का सकल R&D व्यय GDP के लगभग 0.6-0.7% के आसपास है, जबकि चीन, अमेरिका, दक्षिण कोरिया और इज़राइल जैसे देश इससे कई गुना अधिक व्यय करते हैं।
  • R&D व्यय में सरकार का हिस्सा अधिक और निजी क्षेत्र का कम, जबकि विकसित अर्थव्यवस्थाओं में निजी क्षेत्र प्रमुख है।
  • सुधार: अनुसंधान नेशनल रिसर्च फ़ाउंडेशन अधिनियम, 2023 — विश्वविद्यालयों में शोध के वित्तपोषण के लिए; 2025 में निजी क्षेत्र के अनुसंधान-विकास-नवाचार (RDI) के लिए बड़े कोष की घोषणा; पेटेंट प्रक्रिया का सरलीकरण।
  • पारिस्थितिकी-तंत्र: उद्योग-शिक्षा जगत सहयोग, स्टार्ट-अप्स के लिए "deep-tech" पूँजी, और सरकारी ख़रीद के माध्यम से घरेलू प्रौद्योगिकी के लिए प्रारंभिक बाज़ार।

स्वदेशीकरण बनाम आत्म-अलगाव: उत्तर लिखते समय ध्यान रखें कि "आत्मनिर्भरता" का अर्थ हर चीज़ स्वयं बनाना नहीं, बल्कि महत्वपूर्ण प्रौद्योगिकियों में "रणनीतिक निर्भरता" से बचना और वैश्विक मूल्य-श्रृंखलाओं में विश्वसनीय भागीदार बनना है। iCET जैसे सहयोग, प्रौद्योगिकी-हस्तांतरण की शर्तों वाले रक्षा सौदे और "मेक इन इंडिया" साथ-साथ चल सकते हैं।

P1अभ्यास प्रश्न · UPSC पैटर्न · 15 अंक

"भारत में प्रौद्योगिकी-स्वदेशीकरण की सबसे बड़ी बाधा अनुसंधान और विकास में कम निवेश है।" इस कथन का परीक्षण कीजिए और सुधार सुझाइए। (250 शब्द)

मॉडल उत्तर

भूमिका: अंतरिक्ष, परमाणु ऊर्जा, डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना और टीकों में भारत की सफलताएँ उल्लेखनीय हैं, पर सेमीकंडक्टर, लड़ाकू विमान इंजन, उन्नत रसायन और कई इलेक्ट्रॉनिक घटकों में आयात-निर्भरता बनी है।

कथन के पक्ष में (R&D की कमी):

  • सकल R&D व्यय GDP का लगभग 0.6-0.7%, जो प्रमुख प्रौद्योगिकी-शक्तियों से बहुत कम।
  • निजी क्षेत्र का योगदान कम; कंपनियाँ "जोखिम-रहित" आयातित प्रौद्योगिकी को प्राथमिकता देती हैं।
  • विश्वविद्यालयों में शोध-अनुदान सीमित; शोधार्थियों की संख्या प्रति दस लाख जनसंख्या पर कम।

अन्य बाधाएँ भी (कथन की सीमा):

  • मानव संसाधन: प्रतिभा-पलायन; उद्योग-अनुकूल कौशल की कमी।
  • प्रयोगशाला से बाज़ार तक: शोध का वाणिज्यीकरण कमज़ोर; उद्योग-शिक्षा जगत की दूरी।
  • पारिस्थितिकी-तंत्र: सेमीकंडक्टर जैसे क्षेत्रों में आपूर्ति-श्रृंखला, अवसंरचना और बड़े पैमाने की अर्थव्यवस्था की आवश्यकता।
  • सरकारी ख़रीद: घरेलू उत्पादों के लिए सुनिश्चित प्रारंभिक बाज़ार का अभाव (रक्षा में बदलाव शुरू)।
  • नियामक बाधाएँ: अनुमति और परीक्षण में देरी; IPR प्रक्रिया की धीमी गति।

सुधार: ANRF के माध्यम से प्रतिस्पर्धी शोध-अनुदान; निजी R&D के लिए कर-प्रोत्साहन और जोखिम-पूँजी; मिशन-मोड कार्यक्रमों (क्वांटम, हाइड्रोजन, AI, सेमीकंडक्टर) की निरंतरता; रक्षा में सकारात्मक स्वदेशीकरण सूचियाँ और iDEX; प्रवासी वैज्ञानिकों की वापसी के कार्यक्रम; सह-विकास वाले अंतरराष्ट्रीय सहयोग।

निष्कर्ष: R&D निवेश आवश्यक शर्त है, पर्याप्त नहीं; स्वदेशीकरण के लिए "धन + प्रतिभा + बाज़ार + संस्थागत तालमेल" का संपूर्ण पारिस्थितिकी-तंत्र चाहिए।

P2अभ्यास प्रश्न · UPSC पैटर्न · 15 अंक

जीनोम-संपादन (genome editing) और आनुवंशिक रूप से संशोधित (GM) फ़सलों में क्या अंतर है? भारतीय कृषि में जीनोम-संपादन की संभावनाओं और चिंताओं की चर्चा कीजिए। (250 शब्द)

मॉडल उत्तर

अंतर: GM (ट्रांसजेनिक) फ़सलों में किसी दूसरी प्रजाति का जीन डाला जाता है (जैसे Bt कपास में मृदा-जीवाणु का जीन)। जीनोम-संपादन (जैसे CRISPR-Cas9) में पौधे के अपने DNA में सटीक, छोटे परिवर्तन किए जाते हैं, प्रायः बिना कोई बाहरी जीन जोड़े; ये परिवर्तन प्राकृतिक उत्परिवर्तन या पारंपरिक प्रजनन जैसे हो सकते हैं।

भारत का नियामक रुख: 2022 में पर्यावरण मंत्रालय ने SDN-1 और SDN-2 श्रेणी के उन जीनोम-संपादित पौधों को, जिनमें बाहरी DNA नहीं है, GM फ़सलों के कठोर नियमों से छूट दी। 2025 में ICAR ने अधिक उपज और कम पानी में तैयार होने जैसे गुणों वाली जीनोम-संपादित धान की किस्में जारी कीं (परीक्षा से पहले नवीनतम स्थिति अवश्य देखें)।

संभावनाएँ:

  • जलवायु-अनुकूल किस्में: सूखा, लवणता और गर्मी सहन करने वाली।
  • कम अवधि की फ़सलें, जिससे पानी की बचत और पराली की समस्या में कमी।
  • पोषण-संवर्धन (biofortification), रोग-प्रतिरोध।
  • पारंपरिक प्रजनन से कम समय और लागत; सार्वजनिक संस्थाओं द्वारा विकास से किसानों तक सस्ती पहुँच।

चिंताएँ:

  • लक्ष्य से भिन्न (off-target) प्रभावों की दीर्घकालिक जैव-सुरक्षा।
  • बीज पर कॉर्पोरेट नियंत्रण और पेटेंट; किसानों के बीज-अधिकार (PPV&FR अधिनियम 2001)।
  • उपभोक्ता-विश्वास, लेबलिंग और निर्यात-बाज़ारों के नियम।
  • जैव-विविधता और पारंपरिक किस्मों का क्षरण।
  • GM सरसों जैसे मामलों में न्यायिक-सामाजिक विवाद से उपजा अविश्वास।

निष्कर्ष: विज्ञान-आधारित, पारदर्शी नियमन; सार्वजनिक शोध-संस्थानों की प्रमुख भूमिका; किसानों के अधिकारों की रक्षा; और जन-संवाद के साथ जीनोम-संपादन भारतीय कृषि के लिए "दूसरी हरित क्रांति" का साधन बन सकता है।

P3अभ्यास प्रश्न · UPSC पैटर्न · 15 अंक

भारत के अंतरिक्ष क्षेत्र में निजी भागीदारी के लिए किए गए सुधारों की विवेचना कीजिए। इससे ISRO की भूमिका कैसे बदल रही है? (250 शब्द)

मॉडल उत्तर

भूमिका: दशकों तक भारत का अंतरिक्ष कार्यक्रम लगभग पूरी तरह ISRO के नेतृत्व में रहा, जिसमें निजी उद्योग केवल पुर्ज़ों के आपूर्तिकर्ता थे। वैश्विक अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था में निजी कंपनियों के उदय के बाद भारत ने 2020 से इस क्षेत्र को खोलने के लिए संरचनात्मक सुधार किए।

प्रमुख सुधार:

  • IN-SPACe (2020): निजी संस्थाओं की अंतरिक्ष गतिविधियों को अधिकृत करने, बढ़ावा देने और ISRO की सुविधाओं तक पहुँच दिलाने वाली एकल-खिड़की नोडल एजेंसी।
  • NSIL: ISRO की वाणिज्यिक शाखा, जो प्रौद्योगिकी-हस्तांतरण और माँग-आधारित उपग्रह मिशन संभालती है।
  • भारतीय अंतरिक्ष नीति, 2023: ISRO, IN-SPACe, NSIL और निजी क्षेत्र की भूमिकाओं का स्पष्ट विभाजन; निजी क्षेत्र को प्रक्षेपण यान, उपग्रह, ग्राउंड स्टेशन और अंतरिक्ष-आधारित सेवाओं में पूर्ण भागीदारी।
  • FDI उदारीकरण (2024): उपग्रह निर्माण, प्रक्षेपण यान और घटकों में विदेशी निवेश की सीमाएँ उदार।
  • परिणाम: निजी कंपनियों द्वारा विकसित रॉकेट का उप-कक्षीय प्रक्षेपण (2022) और निजी लॉन्चपैड से प्रक्षेपण; सैकड़ों अंतरिक्ष स्टार्ट-अप।

ISRO की बदलती भूमिका: नियमित वाणिज्यिक कार्यों (जैसे PSLV उत्पादन) को उद्योग को सौंपकर ISRO अब उन्नत अनुसंधान और "frontier" मिशनों पर केंद्रित — गगनयान (मानव अंतरिक्ष उड़ान), चंद्रयान और आदित्य जैसे वैज्ञानिक मिशन, पुन: प्रयोज्य प्रक्षेपण यान, और भविष्य का भारतीय अंतरिक्ष स्टेशन। वह "निर्माता" से "मार्गदर्शक और प्रौद्योगिकी-प्रदाता" बन रहा है।

चुनौतियाँ: व्यापक अंतरिक्ष गतिविधि क़ानून और दायित्व-ढाँचे का अभाव; अंतरिक्ष-मलबा और स्पेक्ट्रम आवंटन; स्टार्ट-अप्स के लिए धैर्यवान पूँजी; सुरक्षा और दोहरे उपयोग की प्रौद्योगिकी पर नियंत्रण।

निष्कर्ष: उचित नियामक ढाँचे के साथ निजी भागीदारी वैश्विक अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था में भारत के हिस्से को कई गुना बढ़ा सकती है, जबकि ISRO को विज्ञान और रणनीतिक मिशनों पर ध्यान केंद्रित करने का अवसर देती है।

7. Master Summary Table

क्षेत्रमुख्य बिंदुतथ्य
FBRतेज़ न्यूट्रॉन, सोडियम शीतलक, ब्रीडिंगPFBR 500 MWe, कलपक्कम
संलयनटोकामैक, प्लाज़्माITER — भारत 2005 से, ~9%
AIजनरेटिव → एजेंटिकIndiaAI मिशन 2024
सेमीकंडक्टरफ़ैब, OSAT, डिज़ाइनISM दिसंबर 2021, ₹76,000 करोड़
अंतरिक्षनिजी भागीदारीIN-SPACe 2020; अंतरिक्ष नीति 2023
ग्रह-रक्षाNEO, DARTअपोफ़िस 2029
नैनो-कृषिनैनो उर्वरकनैनो यूरिया 2021
IPRजीवन रूप — सीमित पेटेंटधारा 3(j); PPV&FR 2001

8. Mind Map

विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी
ऊर्जा
  • FBR, थोरियम
  • संलयन, ITER
डिजिटल
  • AI, एजेंटिक AI
  • सेमीकंडक्टर
अंतरिक्ष
  • चंद्रयान, गगनयान
  • निजी उपग्रह
जैव-नैनो
  • जीन संपादन
  • नैनो उर्वरक
IPR
  • पेटेंट, PPV&FR
  • व्यावसायीकरण

9. महत्वपूर्ण One-liners

  • त्रि-चरणीय परमाणु कार्यक्रम: होमी जहाँगीर भाभा।
  • PFBR: 500 MWe, कलपक्कम (तमिलनाडु), BHAVINI।
  • ITER: कैडराश, फ़्रांस; भारत सदस्य 2005।
  • भारत सेमीकंडक्टर मिशन: दिसंबर 2021।
  • IndiaAI मिशन: मार्च 2024।
  • चंद्रयान-3 की लैंडिंग: 23 अगस्त 2023 (राष्ट्रीय अंतरिक्ष दिवस)।
  • IN-SPACe: 2020; भारतीय अंतरिक्ष नीति: 2023।
  • NASA का DART मिशन: 2022।
  • पेटेंट से सूक्ष्मजीव छूट नहीं: धारा 3(j); पौधा किस्म क़ानून: PPV&FR 2001।

10. टिप्स एवं ट्रिक्स

उत्तर लेखन
  • तकनीकी अवधारणा को एक सरल उपमा से समझाएँ (जैसे FBR — "ईंधन जलाते हुए ईंधन बनाने वाला")।
  • हर प्रश्न में "भारत के लिए महत्व" और "नैतिक/नियामक पहलू" अवश्य लिखें।
  • उपलब्धियों के साथ वर्ष लिखें, पर अनिश्चित संख्याओं से बचें।
याद रखने की तरकीब

त्रि-चरणीय कार्यक्रम: "यू-प्लू-थो" — यूरेनियम (PHWR), प्लूटोनियम (FBR), थोरियम (चरण 3)।

11. PYQ-आधारित प्रश्न एवं मॉडल उत्तर

Q1UPSC 2026 · GS-3 · Q6 · 10 अंक

फ़ास्ट ब्रीडर रिएक्टर तापीय रिएक्टर से किस प्रकार भिन्न है? कलपक्कम PFBR की क्रांतिकता भारत के परमाणु कार्यक्रम के लिए क्यों महत्वपूर्ण है? (150 शब्द)

मॉडल उत्तर

अंतर: (1) न्यूट्रॉन: तापीय रिएक्टर में मंदक (भारी/हल्का जल) न्यूट्रॉनों को धीमा करता है; FBR में मंदक नहीं, तेज़ न्यूट्रॉन; (2) ईंधन: तापीय में प्राकृतिक/संवर्धित यूरेनियम; FBR में प्लूटोनियम-यूरेनियम मिश्रित ऑक्साइड (MOX); (3) शीतलक: जल बनाम तरल सोडियम (उच्च ताप-स्थानांतरण, पर जल-वायु से तीव्र प्रतिक्रिया); (4) ब्रीडिंग: FBR में U-238 (और थोरियम आवरण) तेज़ न्यूट्रॉन सोखकर नया विखंडनीय ईंधन (Pu-239, U-233) बनाते हैं — खपत से अधिक ईंधन बनता है; (5) ईंधन का कहीं अधिक कुशल उपयोग।

PFBR का महत्व: (1) भाभा के त्रि-चरणीय कार्यक्रम के दूसरे चरण में प्रवेश — पहले चरण के PHWR से प्राप्त प्लूटोनियम का उपयोग; (2) थोरियम से U-233 बनाने का मार्ग — तीसरे चरण की नींव; (3) भारत के सीमित यूरेनियम का बहुगुणित उपयोग — ऊर्जा सुरक्षा; (4) स्वदेशी तकनीक — रूस के बाद वाणिज्यिक स्तर का FBR चलाने वाले गिने-चुने देशों में; (5) 2047 तक 100 GW परमाणु लक्ष्य और नेट-ज़ीरो में योगदान; (6) प्रयुक्त ईंधन का पुनर्चक्रण — "बंद ईंधन चक्र"।

चुनौतियाँ: सोडियम सुरक्षा, लंबी देरी और लागत, पुनर्प्रसंस्करण क्षमता।

Q2UPSC 2025 · GS-3 · Q5 · 10 अंक

संलयन ऊर्जा क्या है? ITER परियोजना में भारत की भागीदारी के महत्व की चर्चा कीजिए। (150 शब्द)

मॉडल उत्तर

संलयन ऊर्जा: दो हल्के नाभिक (ड्यूटीरियम और ट्रिटियम) अत्यधिक ताप (करोड़ों डिग्री) और दाब पर जुड़कर हीलियम बनाते हैं और विशाल ऊर्जा मुक्त करते हैं — सूर्य का ऊर्जा स्रोत। ईंधन प्रचुर (समुद्री जल से ड्यूटीरियम), दीर्घजीवी रेडियोधर्मी अपशिष्ट बहुत कम, कार्बन उत्सर्जन नहीं, "मेल्टडाउन" का जोखिम नहीं। चुनौती — प्लाज़्मा को स्थिर बाँधना (टोकामैक में चुंबकीय परिरोध) और उपयोग से अधिक ऊर्जा प्राप्त करना; अमेरिका के NIF ने 2022 में लेज़र-आधारित "इग्निशन" प्राप्त किया।

ITER: फ़्रांस के कैडराश में विश्व का सबसे बड़ा प्रायोगिक टोकामैक; सात सदस्य; लक्ष्य — 50 MW इनपुट से 500 MW संलयन शक्ति (Q=10) का प्रदर्शन।

भारत की भागीदारी (2005 से) का महत्व: (1) लगभग 9% योगदान, अधिकांश उपकरणों के रूप में — क्रायोस्टैट, शीतलन जल प्रणाली, इन-वॉल शील्डिंग, हीटिंग प्रणालियाँ — भारतीय उद्योग की उच्च-तकनीकी क्षमता; (2) परियोजना की पूरी बौद्धिक संपदा तक पहुँच; (3) प्लाज़्मा अनुसंधान संस्थान के वैज्ञानिकों का प्रशिक्षण; (4) दीर्घकालिक ऊर्जा सुरक्षा का विकल्प; (5) वैश्विक वैज्ञानिक कूटनीति।

चुनौतियाँ: ITER में बार-बार देरी और लागत वृद्धि; वाणिज्यिक संलयन अभी दशकों दूर।

Q3UPSC 2026 · GS-3 · Q15 · 10 अंक

"मिशन दृष्टि" के अंतर्गत प्रक्षेपित उपग्रह की विशेषताएँ और भारत के निजी अंतरिक्ष क्षेत्र के लिए इसका महत्व बताइए। (150 शब्द)

मॉडल उत्तर

परिचय: "दृष्टि" बेंगलुरु के अंतरिक्ष स्टार्टअप GalaxEye का पृथ्वी अवलोकन मिशन है (प्रश्न के अनुसार 3 मई 2026 को प्रक्षेपित), जिसे भारत के सबसे बड़े निजी रूप से निर्मित पृथ्वी अवलोकन उपग्रहों में गिना जाता है।

विशेषताएँ: (1) OptoSAR — एक ही उपग्रह पर प्रकाशीय (optical) कैमरा और सिंथेटिक अपर्चर रडार (SAR) का संयोजन; प्रकाशीय चित्र रंग और विवरण देते हैं पर बादल-रात में विफल, जबकि SAR बादल, धुएँ और अँधेरे में भी देख सकता है; दोनों का "डेटा संलयन" अधिक सटीक और हर मौसम में उपयोगी चित्र देता है; (2) उच्च-रिज़ॉल्यूशन, बार-बार अवलोकन।

अनुप्रयोग: सीमा और समुद्री निगरानी, आपदा (बाढ़, चक्रवात) में त्वरित आकलन, कृषि और फ़सल मानचित्रण, शहरी योजना, बुनियादी ढाँचे की निगरानी, बीमा।

निजी अंतरिक्ष क्षेत्र के लिए महत्व: (1) 2020 के सुधारों (IN-SPACe), अंतरिक्ष नीति 2023 और FDI उदारीकरण (2024) का परिणाम; (2) "डेटा-एज़-ए-सर्विस" — वैश्विक बाज़ार में भारतीय स्टार्टअप की प्रतिस्पर्धा; (3) रणनीतिक स्वायत्तता — विदेशी उपग्रह डेटा पर निर्भरता कम; (4) अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था में भारत की हिस्सेदारी बढ़ाने का लक्ष्य।

चुनौतियाँ: पूँजी, प्रक्षेपण लागत, डेटा नीति और सुरक्षा संबंधी अनुमतियाँ।

Q4UPSC 2026 · GS-3 · Q16 · 15 अंक

"एजेंटिक AI" से आप क्या समझते हैं? शासन और अर्थव्यवस्था में इसकी संभावनाओं तथा जोखिमों की चर्चा कीजिए। (250 शब्द)

मॉडल उत्तर

अवधारणा: पारंपरिक जनरेटिव AI प्रश्नों का उत्तर देता है; एजेंटिक AI लक्ष्य दिए जाने पर स्वयं योजना बनाता है, उप-कार्यों में बाँटता है, उपकरणों (वेब, सॉफ़्टवेयर, डेटाबेस, भुगतान प्रणाली) का प्रयोग करता है, कार्य निष्पादित करता है और परिणाम देखकर स्वयं सुधार करता है — न्यूनतम मानवीय हस्तक्षेप के साथ। उदाहरण: एक एजेंट जो शिकायत पढ़े, संबंधित विभाग के रिकॉर्ड जाँचे, उत्तर तैयार करे और आगे की कार्रवाई निर्धारित करे।

शासन में संभावनाएँ: (1) नागरिक सेवाएँ — बहुभाषी एजेंट (भाषिणी के साथ) से प्रमाणपत्र, शिकायत, योजना-पात्रता; (2) कृषि परामर्श — मौसम, मृदा, बाज़ार डेटा के आधार पर व्यक्तिगत सलाह; (3) स्वास्थ्य — अपॉइंटमेंट, फ़ॉलो-अप, टेलीमेडिसिन सहायता; (4) कर और अनुपालन जाँच, धोखाधड़ी पहचान; (5) आपदा प्रबंधन में वास्तविक-समय समन्वय।

अर्थव्यवस्था में: सॉफ़्टवेयर विकास, ग्राहक सेवा, लॉजिस्टिक्स, वित्त में उत्पादकता वृद्धि; भारतीय IT सेवाओं के लिए नए अवसर (एजेंट विकास और एकीकरण) और ख़तरा (पारंपरिक सेवाओं का स्वचालन)।

जोखिम: (1) जवाबदेही — स्वायत्त निर्णय में ग़लती का उत्तरदायी कौन?; (2) त्रुटियों का संचय — कई चरणों में छोटी गलतियाँ बड़ी बन सकती हैं, "मतिभ्रम" (hallucination); (3) सुरक्षा — "प्रॉम्प्ट इंजेक्शन", एजेंट का दुरुपयोग, साइबर हमले; (4) निजता — व्यापक डेटा पहुँच; (5) पक्षपात और बहिष्करण; (6) रोज़गार — सफ़ेद-कॉलर नौकरियों पर प्रभाव; (7) राष्ट्रीय सुरक्षा।

नियमन और आगे की राह: IndiaAI मिशन (2024) — कंप्यूटिंग, स्वदेशी मॉडल; 2025 के AI शासन दिशानिर्देश — जोखिम-आधारित, नवाचार-समर्थक दृष्टिकोण; "मानव-निगरानी में" (human-in-the-loop) अनिवार्यता उच्च-जोखिम निर्णयों के लिए; ऑडिट योग्य लॉग; DPDP अधिनियम 2023 का पालन; सुरक्षा परीक्षण (AI Safety Institute); कौशल पुनर्प्रशिक्षण।

निष्कर्ष: एजेंटिक AI "डिजिटल कर्मचारी" जैसा है — उसकी क्षमता का लाभ तभी है जब "उत्तरदायित्व की रेखा" मानव के पास रहे।

Q5UPSC 2025 · GS-3 · Q16 · 15 अंक

भारत को वैश्विक सेमीकंडक्टर केंद्र बनाने में भारत सेमीकंडक्टर मिशन की भूमिका और चुनौतियों की चर्चा कीजिए। (250 शब्द)

मॉडल उत्तर

भूमिका: सेमीकंडक्टर "नया तेल" हैं — स्मार्टफ़ोन से मिसाइल तक हर तकनीक का आधार। वैश्विक उत्पादन ताइवान, दक्षिण कोरिया और चीन में केंद्रित है; कोविड के दौरान चिप की कमी और अमेरिका-चीन प्रतिस्पर्धा ने आपूर्ति शृंखला की संवेदनशीलता उजागर की।

भारत सेमीकंडक्टर मिशन (दिसंबर 2021, ₹76,000 करोड़): (1) फ़ैब के लिए परियोजना लागत का 50% तक केंद्रीय समर्थन (राज्यों से अतिरिक्त); (2) डिस्प्ले फ़ैब; (3) ATMP/OSAT (असेंबली, परीक्षण, पैकेजिंग); (4) डिज़ाइन-संबद्ध प्रोत्साहन (DLI) — स्टार्टअप; (5) कौशल विकास।

प्रगति: माइक्रोन (साणंद, ATMP), टाटा इलेक्ट्रॉनिक्स-PSMC (धोलेरा — पहला वाणिज्यिक फ़ैब), टाटा (असम — OSAT), अन्य कंपनियों की OSAT इकाइयाँ — अनेक परियोजनाएँ स्वीकृत; 2025 में पहले "मेड इन इंडिया" चिप्स; विश्व के चिप डिज़ाइन इंजीनियरों में भारतीयों का बड़ा हिस्सा।

भारत की शक्तियाँ: डिज़ाइन प्रतिभा, विशाल घरेलू बाज़ार (इलेक्ट्रॉनिक्स, EV, दूरसंचार), "विश्वसनीय साझेदार" छवि (Quad, iCET/TRUST), नीतिगत प्रोत्साहन।

चुनौतियाँ: (1) अत्यधिक पूँजी और लंबी अवधि; (2) अति-शुद्ध जल और निर्बाध बिजली; (3) विशेष रसायन, गैसें, उपकरण — आयात निर्भरता; (4) अनुभवी फ़ैब संचालन प्रतिभा की कमी; (5) उन्नत नोड (5nm से कम) की तकनीक तक पहुँच सीमित — भारत अभी परिपक्व नोड (28nm+) पर; (6) वैश्विक दिग्गजों और भारी सब्सिडी वाले देशों (अमेरिका, चीन) से प्रतिस्पर्धा; (7) पारिस्थितिकी तंत्र (आपूर्तिकर्ता, R&D) का अभाव।

आगे की राह: ISM 2.0, डिज़ाइन और IP पर ध्यान, विश्वविद्यालयों में पाठ्यक्रम, क्लस्टर विकास (गुजरात, असम), अंतरराष्ट्रीय साझेदारी, महत्वपूर्ण खनिज और रसायन आपूर्ति।

निष्कर्ष: भारत का लक्ष्य "हर चिप बनाना" नहीं, बल्कि वैश्विक मूल्य शृंखला का "अनिवार्य, विश्वसनीय हिस्सा" बनना होना चाहिए।

Q6UPSC 2025 · GS-3 · Q15 · 10 अंक

कृषि में नैनो-प्रौद्योगिकी के अनुप्रयोगों और उससे जुड़ी चिंताओं की चर्चा कीजिए। (150 शब्द)

मॉडल उत्तर

आधार: नैनो पैमाने (1-100 nm) पर कणों का सतह क्षेत्र बहुत अधिक होता है, जिससे उनकी अवशोषण और प्रतिक्रिया क्षमता बढ़ती है।

अनुप्रयोग: (1) नैनो उर्वरक — IFFCO का नैनो यूरिया (2021) और नैनो DAP (2023); पत्तियों पर छिड़काव, कम मात्रा में अधिक पोषक दक्षता का दावा, परिवहन-भंडारण में आसानी, आयात और सब्सिडी में कमी; (2) नैनो-कीटनाशक — नियंत्रित रिलीज़, कम मात्रा; (3) नैनो-संवेदक — मृदा नमी, पोषक, रोग की प्रारंभिक पहचान (सटीक खेती); (4) बीज उपचार — अंकुरण; (5) फ़सल-उपरांत — नैनो-पैकेजिंग, भंडारण अवधि; (6) जल शोधन — सिंचाई जल।

चिंताएँ: (1) प्रभावशीलता — पारंपरिक उर्वरक के विकल्प के रूप में उपज पर स्वतंत्र, दीर्घकालिक बहु-स्थानीय परीक्षणों की आवश्यकता; कुछ अध्ययनों ने दावों पर प्रश्न उठाए; (2) विषाक्तता — मिट्टी के सूक्ष्मजीवों, जल-जीवों और मनुष्य पर नैनो-कणों के प्रभाव का अनिश्चित ज्ञान; (3) नियमन — उर्वरक नियंत्रण आदेश में अस्थायी अधिसूचना, ICAR/DBT के दिशानिर्देश (2020) पर व्यापक नियामक ढाँचे की आवश्यकता; (4) किसानों की जागरूकता और सही प्रयोग; (5) लागत।

निष्कर्ष: नैनो-कृषि आशाजनक है, पर "सावधानी सिद्धांत" और स्वतंत्र वैज्ञानिक प्रमाण के साथ ही बड़े पैमाने पर अपनाई जाए।

Q7UPSC 2024 · GS-3 · Q5 · 15 अंक

जीवित पदार्थों पर बौद्धिक संपदा अधिकारों से जुड़े मुद्दों की चर्चा कीजिए। भारत में पेटेंटों के कम व्यावसायीकरण के कारण क्या हैं? (250 शब्द)

मॉडल उत्तर

जीवित पदार्थ और IPR: अमेरिका में डायमंड बनाम चक्रवर्ती (1980) ने आनुवंशिक रूप से संशोधित सूक्ष्मजीव को पेटेंट योग्य माना। TRIPS (अनुच्छेद 27.3(b)) देशों को पौधों-पशुओं को पेटेंट से बाहर रखने की छूट देता है, पर सूक्ष्मजीवों और पौधा किस्मों के लिए सुरक्षा (पेटेंट या sui generis) अनिवार्य करता है।

भारत का ढाँचा: (1) पेटेंट अधिनियम की धारा 3(j) — पौधे, पशु, बीज, किस्में, प्रजातियाँ और अनिवार्यतः जैविक प्रक्रियाएँ पेटेंट योग्य नहीं; सूक्ष्मजीव पेटेंट योग्य; (2) धारा 3(c) — प्रकृति में पाए जाने वाले जीव की "खोज" पेटेंट योग्य नहीं; (3) PPV&FR अधिनियम 2001 — प्रजनकों के अधिकार के साथ किसानों के अधिकार (बीज बचाना, आदान-प्रदान, बेचना — ब्रांडेड बीज को छोड़कर); (4) जैव-विविधता अधिनियम 2002 — भारतीय जैव-संसाधन या पारंपरिक ज्ञान पर IPR के लिए राष्ट्रीय जैव-विविधता प्राधिकरण की अनुमति और लाभ-साझेदारी; (5) पारंपरिक ज्ञान डिजिटल पुस्तकालय (TKDL) — हल्दी, नीम पर "जैव-चोरी" के विरुद्ध।

मुद्दे: जैव-चोरी (biopiracy), किसानों के बीज अधिकार बनाम कंपनियों के अधिकार (Bt कपास पर विवाद), जीन अनुक्रमों पर पेटेंट, नैतिक प्रश्न ("जीवन पर स्वामित्व"), दवाओं की पहुँच (धारा 3(d) — नोवार्टिस 2013)।

कम व्यावसायीकरण के कारण: भारत में पेटेंट आवेदन और स्वीकृतियाँ तेज़ी से बढ़ी हैं, पर (1) विश्वविद्यालय-शोध संस्थानों में प्रौद्योगिकी हस्तांतरण कार्यालय कमज़ोर; (2) उद्योग-अकादमिक संबंध कम; (3) शोध का बाज़ार-उन्मुख न होना, "पेटेंट गिनती" पर ध्यान; (4) उद्यम पूँजी की कमी — प्रयोगशाला से बाज़ार तक "मृत्यु की घाटी"; (5) R&D व्यय GDP का 1% से कम, निजी क्षेत्र का हिस्सा कम; (6) मुक़दमेबाज़ी और प्रवर्तन में देरी; (7) लाइसेंसिंग और मूल्यांकन कौशल की कमी।

आगे की राह: राष्ट्रीय IPR नीति (2016) का क्रियान्वयन, अनुसंधान नेशनल रिसर्च फ़ाउंडेशन, "₹1 लाख करोड़ का अनुसंधान-नवाचार कोष", विश्वविद्यालयों में इनक्यूबेटर, IP-आधारित ऋण, वाणिज्यिक IP न्यायालय।

निष्कर्ष: भारत को "पेटेंट संख्या" से "पेटेंट मूल्य" की ओर बढ़ना होगा — साथ ही किसानों और पारंपरिक ज्ञान की रक्षा करते हुए।

Q8UPSC 2024 · GS-3 · Q16 · 10 अंक

क्षुद्रग्रह क्या हैं? पृथ्वी के लिए इनसे उत्पन्न ख़तरे और उससे निपटने के उपायों की चर्चा कीजिए। (150 शब्द)

मॉडल उत्तर

क्षुद्रग्रह: सौरमंडल के निर्माण के समय बचे चट्टानी या धात्विक पिंड, जिनमें से अधिकांश मंगल और बृहस्पति के बीच "क्षुद्रग्रह पट्टी" में हैं; जिनकी कक्षा पृथ्वी के निकट आती है, वे "पृथ्वी के निकट के पिंड" (NEO) कहलाते हैं।

ख़तरा: (1) बड़े टकराव — 6.6 करोड़ वर्ष पहले चिक्सुलुब टकराव से डायनासोरों का विलोप; (2) मध्यम आकार — तुंगुस्का (1908) से वनों का विनाश, चेल्याबिंस्क (2013) से हज़ारों घायल; (3) सुनामी, जलवायु प्रभाव, अवसंरचना की क्षति; (4) छोटे पिंडों की पहचान कठिन — अचानक ख़तरा। 2029 में अपोफ़िस पृथ्वी के बहुत निकट से गुज़रेगा (टकराव का ख़तरा नहीं)।

उपाय: (1) खोज और निगरानी — सर्वेक्षण दूरबीनें, NASA का ग्रह-रक्षा समन्वय कार्यालय, अंतरिक्ष-आधारित दूरबीनें; (2) कक्षा परिवर्तन — NASA का DART (2022) — "काइनेटिक इम्पैक्टर" से डाइमॉर्फ़ोस की कक्षा बदली; ESA का Hera (2024) परिणामों का अध्ययन; (3) गुरुत्व-ट्रैक्टर, आयन-बीम जैसी अवधारणाएँ; (4) अंतरराष्ट्रीय सहयोग — UN का IAWN और SMPAG; (5) भारत — ISRO की ग्रह-रक्षा में रुचि, अपोफ़िस से जुड़े अध्ययन, खगोलीय वेधशालाएँ।

अवसर: क्षुद्रग्रहों से नमूने (OSIRIS-REx, हायाबुसा-2) — सौरमंडल की उत्पत्ति; भविष्य में खनन।

Q9अभ्यास प्रश्न · UPSC पैटर्न · 15 अंक

भारत के अंतरिक्ष क्षेत्र में निजी भागीदारी के उद्देश्य से किए गए सुधारों का मूल्यांकन कीजिए। (250 शब्द)

मॉडल उत्तर

भूमिका: दशकों तक भारत का अंतरिक्ष कार्यक्रम ISRO-केंद्रित रहा, जिसमें उद्योग केवल पुर्ज़े देने वाला था। वैश्विक अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था के तीव्र विस्तार और भारत की छोटी हिस्सेदारी को देखते हुए 2020 से बड़े सुधार हुए।

सुधार: (1) IN-SPACe (2020) — निजी कंपनियों को अनुमति, ISRO सुविधाओं तक पहुँच, "एकल-खिड़की" नियामक; (2) NSIL — ISRO की वाणिज्यिक शाखा, PSLV/SSLV तकनीक का उद्योग को हस्तांतरण; (3) भारतीय अंतरिक्ष नीति 2023 — ISRO अनुसंधान और उन्नत मिशनों पर केंद्रित, उपग्रह-प्रक्षेपण-सेवाएँ निजी क्षेत्र को; (4) FDI उदारीकरण (2024) — उपग्रह निर्माण में 100% तक, प्रक्षेपण यान में 49% स्वचालित; (5) भू-स्थानिक डेटा नीति (2021-22) का उदारीकरण; (6) अंतरिक्ष स्टार्टअप के लिए उद्यम पूँजी कोष।

परिणाम: सैकड़ों अंतरिक्ष स्टार्टअप; स्काईरूट का विक्रम-S (2022, पहला निजी रॉकेट), अग्निकुल का 3D-प्रिंटेड इंजन वाला प्रक्षेपण (2024); निजी पृथ्वी अवलोकन उपग्रह (जैसे "दृष्टि"); उद्योग द्वारा PSLV निर्माण।

चुनौतियाँ: (1) व्यापक अंतरिक्ष गतिविधि क़ानून का अभाव — दायित्व, बीमा, लाइसेंसिंग; (2) पूँजी की कमी, लंबी अवधि; (3) ISRO पर निर्भरता (परीक्षण सुविधाएँ); (4) अंतरिक्ष मलबा और स्पेक्ट्रम; (5) वैश्विक प्रतिस्पर्धा; (6) सरकारी ख़रीद (anchor customer) सीमित।

आगे की राह: अंतरिक्ष गतिविधि अधिनियम, सरकारी विभागों द्वारा निजी डेटा-सेवाओं की ख़रीद, परीक्षण अवसंरचना का विस्तार, अंतरिक्ष स्थिरता मानक।

निष्कर्ष: ISRO "राष्ट्रीय प्रयोगशाला" और निजी क्षेत्र "वाणिज्यिक इंजन" — यही संतुलन भारत को वैश्विक अंतरिक्ष शक्ति बनाएगा।

Q10अभ्यास प्रश्न · UPSC पैटर्न · 10 अंक

जीन संपादन (CRISPR) तकनीक कृषि और स्वास्थ्य में किस प्रकार क्रांतिकारी बदलाव ला सकती है? इससे जुड़ी नैतिक चिंताएँ बताइए। (150 शब्द)

मॉडल उत्तर

तकनीक: CRISPR-Cas9 एक "आणविक कैंची" है, जो DNA के विशिष्ट स्थान को पहचानकर काटती है, जिससे जीन को निष्क्रिय, सुधारा या बदला जा सकता है; इसके आविष्कारकों को 2020 का रसायन नोबेल मिला।

कृषि: रोग-प्रतिरोधी, सूखा-सहिष्णु, अधिक पोषक फ़सलें; भारत ने 2022 में बाहरी DNA रहित (SDN-1, SDN-2) जीन-संपादित पौधों को GM नियमों से छूट दी, और 2025 में अधिक उपज वाली, जलवायु-सहिष्णु जीन-संपादित धान की किस्में जारी कीं — "ट्रांसजेनिक" GM से भिन्न, क्योंकि इनमें दूसरी प्रजाति का जीन नहीं जोड़ा जाता।

स्वास्थ्य: सिकल सेल रोग और बीटा-थैलेसीमिया की जीन-चिकित्सा (विश्व में पहली CRISPR चिकित्सा की स्वीकृति 2023); भारत का राष्ट्रीय सिकल सेल उन्मूलन मिशन (2023) — जनजातीय क्षेत्रों के लिए महत्वपूर्ण; कैंसर, आनुवंशिक रोग; त्वरित निदान।

नैतिक चिंताएँ: (1) जर्मलाइन संपादन — अगली पीढ़ियों में स्थानांतरण ("डिज़ाइनर शिशु"; चीन का 2018 का विवादित प्रयोग); (2) लक्ष्य से भिन्न स्थान पर परिवर्तन (off-target); (3) महँगी चिकित्सा — असमान पहुँच; (4) जैव-सुरक्षा और पारिस्थितिक प्रभाव (जीन ड्राइव); (5) पेटेंट और कॉरपोरेट नियंत्रण।

निष्कर्ष: ICMR के जीन-चिकित्सा दिशानिर्देशों जैसे सुदृढ़ नियामक ढाँचे के साथ CRISPR "जैव-क्रांति" का साधन बन सकता है।

12. Quick Revision Summary

एक नज़र में
  • परमाणु: त्रि-चरणीय कार्यक्रम; PFBR — चरण 2 का द्वार; संलयन — ITER में भारत।
  • डिजिटल: एजेंटिक AI (स्वायत्त कार्य) — जवाबदेही और सुरक्षा की चुनौती; IndiaAI मिशन।
  • सेमीकंडक्टर: ISM 2021 — फ़ैब, OSAT, डिज़ाइन; पारिस्थितिकी तंत्र की चुनौती।
  • अंतरिक्ष: निजी भागीदारी (IN-SPACe, नीति 2023), "दृष्टि" जैसे निजी उपग्रह; ग्रह-रक्षा (DART, अपोफ़िस)।
  • जैव-नैनो: CRISPR, नैनो उर्वरक — लाभ और सावधानी।
  • IPR: धारा 3(j), PPV&FR, जैव-विविधता अधिनियम; पेटेंट व्यावसायीकरण की कमी।