1. अध्याय एक नज़र में
पाठ्यक्रम: "संरक्षण, पर्यावरण प्रदूषण और क्षरण, पर्यावरण प्रभाव का आकलन।" पर्यावरण GS-3 का सबसे अधिक पूछा जाने वाला क्षेत्र है — हर वर्ष 3-4 प्रश्न, जो जलवायु प्रतिबद्धताओं, जैव-विविधता, प्रदूषण, अपशिष्ट और जल संकट को जोड़ते हैं।
| वर्ष | प्रश्न |
|---|---|
| 2026 | कुनमिंग-मॉन्ट्रियल वैश्विक जैव-विविधता ढाँचा और भारत की प्रतिबद्धताएँ; ठोस अपशिष्ट प्रबंधन — दिल्ली बनाम इंदौर |
| 2025 | कार्बन अवशोषण, उपयोग और भंडारण (CCUS); तटीय जलभृतों में समुद्री जल का प्रवेश; पर्यावरणीय ख़तरे के रूप में खनन; पेरिस प्रतिबद्धताएँ, COP26 और अद्यतन NDC (2022) |
| 2024 | नदी जल का औद्योगिक प्रदूषण; पर्यावरणीय NGO और EIA के परिणाम; मीठे पानी की कमी और वैकल्पिक तकनीकें |
2. जलवायु परिवर्तन: भारत की प्रतिबद्धताएँ
- वैश्विक ढाँचा: UNFCCC (1992) → क्योटो प्रोटोकॉल (1997) → पेरिस समझौता (2015) — तापमान वृद्धि को 2°C से "काफ़ी नीचे", 1.5°C का प्रयास; राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित योगदान (NDC), हर 5 वर्ष में अद्यतन; "साझा पर विभेदित उत्तरदायित्व" (CBDR-RC)।
- COP26 (ग्लासगो, 2021) — भारत का "पंचामृत": (1) 2030 तक 500 GW गैर-जीवाश्म क्षमता; (2) 2030 तक ऊर्जा आवश्यकता का 50% नवीकरणीय से; (3) 2030 तक अनुमानित उत्सर्जन में 1 अरब टन कमी; (4) उत्सर्जन तीव्रता में 45% कमी; (5) 2070 तक नेट-ज़ीरो।
- अद्यतन NDC (अगस्त 2022): 2005 की तुलना में 2030 तक GDP की उत्सर्जन तीव्रता में 45% कमी; 2030 तक स्थापित बिजली क्षमता का लगभग 50% गैर-जीवाश्म स्रोतों से (जून 2025 में ही प्राप्त); 2.5-3 अरब टन CO₂ के अतिरिक्त कार्बन सिंक; LiFE (पर्यावरण के लिए जीवनशैली) जन-आंदोलन।
- अन्य: जलवायु परिवर्तन पर राष्ट्रीय कार्य योजना (2008, 8 मिशन), भारतीय कार्बन बाज़ार (कार्बन क्रेडिट व्यापार योजना 2023), हरित ऋण कार्यक्रम (2023), अंतरराष्ट्रीय सौर गठबंधन।
3. जैव-विविधता संरक्षण
- कुनमिंग-मॉन्ट्रियल वैश्विक जैव-विविधता ढाँचा (KMGBF, दिसंबर 2022, COP15): 2050 के 4 लक्ष्य और 2030 के 23 टारगेट — "30x30" (भूमि और समुद्र का 30% संरक्षित), 30% क्षरित पारितंत्रों का पुनरुद्धार, आक्रामक प्रजातियों के प्रवेश में 50% कमी, कीटनाशकों के जोखिम में आधी कमी, हानिकारक सब्सिडी में कमी, जैव-विविधता वित्त का संग्रह, लाभ-साझेदारी (डिजिटल अनुक्रम जानकारी — COP16 का "कैली कोष")।
- भारत: अद्यतन राष्ट्रीय जैव-विविधता रणनीति और कार्य योजना (NBSAP) — COP16 (कैली, 2024) में 23 राष्ट्रीय लक्ष्यों के साथ; जैव-विविधता (संशोधन) अधिनियम 2023; संरक्षित क्षेत्र, बाघ परियोजना (1973), प्रोजेक्ट चीता (2022), रामसर स्थलों का विस्तार, MISHTI (मैंग्रोव, 2023), अमृत धरोहर (आर्द्रभूमि), "अन्य प्रभावी क्षेत्र-आधारित संरक्षण उपाय" (OECM)।

4. प्रदूषण, अपशिष्ट और जल
- नदी प्रदूषण: CPCB (2022) — 279 नदियों पर 311 प्रदूषित खंड; मुख्य स्रोत — अनुपचारित सीवेज (उपचार क्षमता की कमी) और औद्योगिक बहिःस्राव (चर्म-शोधन — कानपुर, वस्त्र रंगाई — तिरुप्पुर, औषधि — हैदराबाद, चीनी-आसवनी); भारी धातुएँ, रंग, रसायन।
- ठोस अपशिष्ट: ठोस अपशिष्ट प्रबंधन नियम 2016 — स्रोत पर पृथक्करण, उपयोगकर्ता शुल्क, विस्तारित उत्पादक दायित्व (EPR); स्वच्छ भारत मिशन-शहरी 2.0 (2021) — "कचरा-मुक्त शहर", पुराने डंपसाइट का उपचार; प्लास्टिक अपशिष्ट नियम — एकल-उपयोग प्लास्टिक पर प्रतिबंध (2022)।
- जल संकट: भूजल अति-दोहन, तटीय जलभृतों में लवणता, शहरी जल संकट (चेन्नई 2019); जल जीवन मिशन (2019) — ग्रामीण घरों में नल जल।
5. पर्यावरण प्रभाव आकलन (EIA)
- ढाँचा: पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम 1986 के अंतर्गत EIA अधिसूचना 1994, फिर 2006; श्रेणी A (केंद्र) और B (राज्य); चरण — स्क्रीनिंग, स्कोपिंग, जनसुनवाई, मूल्यांकन।
- समस्याएँ: परियोजना-प्रस्तावक द्वारा नियुक्त सलाहकार — हितों का टकराव; "कट-पेस्ट" रिपोर्टें; जनसुनवाई की औपचारिकता और स्थानीय भाषा में दस्तावेज़ों की कमी; संचयी प्रभाव का आकलन नहीं; स्वीकृति के बाद अनुपालन की कमज़ोर निगरानी; "कार्योत्तर" (post-facto) स्वीकृति पर विवाद; प्रारूप EIA अधिसूचना 2020 पर व्यापक आपत्तियाँ।
6. विस्तृत विवेचन: पर्यावरण संरक्षण का क़ानूनी ढाँचा और मानव-वन्यजीव संघर्ष
पर्यावरण पर GS-3 के प्रश्न प्रायः किसी क़ानून के संशोधन, किसी न्यायिक सिद्धांत या किसी संघर्ष (विकास बनाम संरक्षण) से जुड़े होते हैं। उत्तर में क़ानूनों के नाम गिनाना पर्याप्त नहीं; यह बताना ज़रूरी है कि हर क़ानून किस समस्या का उत्तर है और उसकी आलोचना क्या है।
| क़ानून | मुख्य प्रावधान | हाल के परिवर्तन / बहस |
|---|---|---|
| वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 | संरक्षित क्षेत्र (राष्ट्रीय उद्यान, अभयारण्य), प्रजातियों की अनुसूचियाँ, शिकार पर प्रतिबंध | 2022 के संशोधन से अनुसूचियों का सरलीकरण (चार अनुसूचियाँ), CITES के प्रावधानों का क्रियान्वयन, आक्रामक विदेशी प्रजातियों का नियमन |
| वन (संरक्षण) अधिनियम, 1980 | वन भूमि के ग़ैर-वानिकी उपयोग के लिए केंद्र की पूर्व अनुमति | 2023 के संशोधन से नाम "वन (संरक्षण एवं संवर्धन) अधिनियम"; सीमा के निकट की रणनीतिक परियोजनाओं और कुछ श्रेणियों को छूट; "वन" की परिभाषा पर टी.एन. गोदावर्मन (1996) के व्यापक "शब्दकोशीय अर्थ" से संभावित टकराव को लेकर चिंता और न्यायिक चुनौती |
| पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986 | भोपाल गैस त्रासदी के बाद "छत्र" (umbrella) क़ानून; केंद्र को व्यापक शक्तियाँ; EIA अधिसूचना इसी के तहत | जन विश्वास अधिनियम, 2023 से कई अपराधों में कारावास के स्थान पर आर्थिक दंड; EIA अधिसूचना 2020 के मसौदे (पश्च-अनुमोदन, जन-सुनवाई में छूट) पर विवाद |
| जैव-विविधता अधिनियम, 2002 | राष्ट्रीय जैव-विविधता प्राधिकरण, राज्य बोर्ड, स्थानीय जैव-विविधता प्रबंधन समितियाँ; लाभ-साझाकरण (ABS) | 2023 के संशोधन से आयुष उद्योग और शोध को कुछ छूट; स्थानीय समुदायों के लाभ-हिस्से पर प्रश्न |
| वन अधिकार अधिनियम, 2006 | वन-निवासियों के व्यक्तिगत और सामुदायिक वन अधिकार; ग्राम सभा की भूमिका | दावों की बड़ी संख्या में अस्वीकृति; नियमगिरि (2013) में ग्राम सभा की सहमति का महत्व |
| राष्ट्रीय हरित अधिकरण अधिनियम, 2010 | पर्यावरण मामलों के लिए विशेष अधिकरण | त्वरित निर्णय, पर रिक्तियों और अनुपालन की समस्या |
- प्रदूषक भुगतान सिद्धांत (Polluter Pays): इंडियन काउंसिल फ़ॉर एनवायरो-लीगल एक्शन (1996)।
- एहतियाती सिद्धांत (Precautionary): वेल्लोर सिटीज़न्स वेलफ़ेयर फ़ोरम (1996) — वैज्ञानिक अनिश्चितता के बहाने कार्रवाई न टालें।
- सार्वजनिक न्यास सिद्धांत (Public Trust): एम.सी. मेहता बनाम कमल नाथ (1997) — प्राकृतिक संसाधन राज्य के पास जनता की धरोहर के रूप में।
- पूर्ण दायित्व (Absolute Liability): एम.सी. मेहता (ओलियम गैस रिसाव, 1987)।
- स्वच्छ पर्यावरण का अधिकार: अनुच्छेद 21 का भाग; 2024 में सर्वोच्च न्यायालय ने ग्रेट इंडियन बस्टर्ड मामले में "जलवायु परिवर्तन के प्रतिकूल प्रभावों से मुक्त रहने के अधिकार" को अनुच्छेद 14 और 21 से जोड़ा।
मानव-वन्यजीव संघर्ष
हाथियों, बाघों, तेंदुओं और जंगली सूअरों से फ़सल-हानि, पशु-हानि और मानव-मृत्यु की घटनाएँ केरल, ओडिशा, असम, झारखंड, महाराष्ट्र और उत्तराखंड जैसे राज्यों में गंभीर समस्या हैं। कारण: आवास का विखंडन (सड़कें, नहरें, खनन, रेलमार्ग), वन्यजीव गलियारों (corridors) का अवरोध, कुछ संरक्षित क्षेत्रों में वन्यजीव संख्या में वृद्धि से वहन-क्षमता पर दबाव, आक्रामक पौधों से चारे में कमी, और बस्तियों का वनों के किनारे विस्तार। उपाय: गलियारों की पहचान और संरक्षण; रेलमार्गों पर गति-सीमा और अंडरपास; प्रारंभिक चेतावनी (हाथियों की आवाजाही के SMS अलर्ट, जैसा कुछ राज्यों में प्रयोग हुआ); सौर बाड़ और मधुमक्खी-बाड़ जैसे ग़ैर-घातक उपाय; त्वरित और पर्याप्त मुआवज़ा; फ़सल-बीमा में वन्यजीव-क्षति को शामिल करना; और स्थानीय समुदायों को संरक्षण का लाभार्थी बनाना (इको-टूरिज़्म)। संघर्ष का स्थायी समाधान "बाड़ और गोली" नहीं, सह-अस्तित्व के लिए स्थान बनाना है।
वन (संरक्षण) संशोधन अधिनियम, 2023 के प्रमुख प्रावधानों की विवेचना कीजिए। इससे वन संरक्षण और विकास के बीच संतुलन पर क्या प्रभाव पड़ सकता है? (250 शब्द)
मॉडल उत्तर
भूमिका: वन (संरक्षण) अधिनियम, 1980 भारत में वनों के विनाश को रोकने का प्रमुख क़ानून रहा है। 2023 के संशोधन ने इसका नाम "वन (संरक्षण एवं संवर्धन) अधिनियम" किया और इसके दायरे में महत्वपूर्ण परिवर्तन किए।
प्रमुख प्रावधान:
- दायरे की परिभाषा: अधिनियम मुख्यतः उन भूमियों पर लागू जो भारतीय वन अधिनियम या अन्य क़ानूनों के तहत वन घोषित/अधिसूचित हैं, या 1980 के बाद सरकारी रिकॉर्ड में वन के रूप में दर्ज हैं।
- छूट: अंतरराष्ट्रीय सीमा या नियंत्रण रेखा से 100 किमी के भीतर राष्ट्रीय महत्व की रणनीतिक रैखिक परियोजनाएँ; सुरक्षा संबंधी अवसंरचना; सड़क और रेल किनारे की छोटी पट्टियाँ।
- नई अनुमत गतिविधियाँ: चिड़ियाघर, सफ़ारी, इको-टूरिज़्म को "वानिकी गतिविधि" माना गया।
- प्रस्तावना: कार्बन तटस्थता और वृक्षावरण बढ़ाने के राष्ट्रीय लक्ष्यों का उल्लेख।
संभावित सकारात्मक प्रभाव: सीमा-क्षेत्रों में रणनीतिक अवसंरचना की गति; निजी भूमि पर वृक्षारोपण (agro-forestry) को प्रोत्साहन, क्योंकि पेड़ लगाने से भूमि "वन" नहीं बन जाएगी; स्पष्टता से विवादों में कमी।
चिंताएँ:
- गोदावर्मन (1996) में वन की "शब्दकोशीय" व्यापक परिभाषा से अलग होकर बड़ी मात्रा में "डीम्ड फ़ॉरेस्ट" (अभिलिखित न किए गए वन) संरक्षण से बाहर होने की आशंका; इस पर सर्वोच्च न्यायालय में याचिकाएँ।
- पूर्वोत्तर और हिमालय जैसे पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील सीमा-क्षेत्रों में व्यापक छूट।
- वन अधिकार अधिनियम के तहत ग्राम सभा की सहमति की भूमिका पर अस्पष्टता।
- प्राकृतिक वन की हानि की भरपाई प्रतिपूरक वृक्षारोपण से गुणवत्ता में नहीं होती।
निष्कर्ष: विकास और संरक्षण का संतुलन तभी संभव है जब छूट पारदर्शी और न्यूनतम हों, संचयी पर्यावरणीय प्रभाव आकलन हो, और वन-निवासियों के अधिकारों का सम्मान हो।
भारत की कार्बन क्रेडिट ट्रेडिंग योजना (CCTS, 2023) क्या है? उत्सर्जन घटाने में इसकी संभावनाएँ और चुनौतियाँ बताइए। (150 शब्द)
मॉडल उत्तर
परिचय: ऊर्जा संरक्षण (संशोधन) अधिनियम, 2022 के तहत केंद्र सरकार ने 2023 में कार्बन क्रेडिट ट्रेडिंग योजना अधिसूचित की, जिससे भारतीय कार्बन बाज़ार की नींव रखी गई। ऊर्जा दक्षता ब्यूरो (BEE) इसका प्रशासक है।
दो तंत्र:
- अनुपालन तंत्र (Compliance): ऊर्जा-गहन उद्योगों (जैसे सीमेंट, एल्युमिनियम, इस्पात, रिफ़ाइनरी) के लिए उत्सर्जन-तीव्रता लक्ष्य; लक्ष्य से बेहतर प्रदर्शन करने वाले क्रेडिट बेच सकते हैं, पीछे रहने वाले ख़रीदेंगे।
- स्वैच्छिक तंत्र (Offset): ग़ैर-बाध्यकारी संस्थाएँ उत्सर्जन-न्यूनीकरण परियोजनाओं से क्रेडिट अर्जित कर सकती हैं।
संभावनाएँ: उत्सर्जन घटाने का बाज़ार-आधारित, लागत-प्रभावी उपाय; पुरानी PAT (Perform, Achieve and Trade) योजना का अनुभव; NDC लक्ष्यों (उत्सर्जन-तीव्रता में कमी) में सहायता; यूरोपीय संघ के CBAM जैसे उपायों के सामने भारतीय निर्यातकों के लिए घरेलू कार्बन-मूल्य का आधार।
चुनौतियाँ: विश्वसनीय मापन, रिपोर्टिंग और सत्यापन (MRV); पर्याप्त कठोर लक्ष्य न होने पर क्रेडिट का मूल्य कम; बाज़ार में हेरफेर और "ग्रीनवॉशिंग"; MSME की क्षमता।
निष्कर्ष: मज़बूत MRV, क्रमशः कठोर होते लक्ष्य और पारदर्शी रजिस्ट्री से CCTS भारत के निम्न-कार्बन संक्रमण का प्रभावी उपकरण बन सकती है।
7. Master Summary Table
| विषय | मुख्य बिंदु | तथ्य |
|---|---|---|
| पेरिस/NDC | उत्सर्जन तीव्रता 45%, 50% गैर-जीवाश्म | अद्यतन NDC अगस्त 2022; नेट-ज़ीरो 2070 |
| KMGBF | 23 टारगेट, 30x30 | COP15, 2022; भारत NBSAP 2024 |
| CCUS | कठिन-घटाव उद्योग | NITI रिपोर्ट 2022 |
| नदी प्रदूषण | सीवेज + उद्योग | CPCB: 311 खंड |
| ठोस अपशिष्ट | स्रोत पृथक्करण | SWM नियम 2016; इंदौर मॉडल |
| खनन | भूमि, जल, वायु, विस्थापन | MMDR 2015, DMF |
| EIA | जनसुनवाई, निगरानी | अधिसूचना 2006 |
| जल | भूजल, लवणता, विलवणीकरण | जल जीवन मिशन 2019 |
8. Mind Map
- NDC, पंचामृत
- CCUS
- KMGBF
- संरक्षित क्षेत्र
- नदी, वायु
- अपशिष्ट
- खनन
- जल संकट
- EIA, NGT
- NGO, समुदाय
9. महत्वपूर्ण One-liners
- पेरिस समझौता: 2015 (COP21); "पंचामृत": COP26, ग्लासगो 2021।
- भारत का अद्यतन NDC: अगस्त 2022; नेट-ज़ीरो लक्ष्य: 2070।
- KMGBF: दिसंबर 2022, COP15; 23 टारगेट।
- पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम: 1986; EIA अधिसूचना: 2006।
- राष्ट्रीय हरित अधिकरण: 2010।
- ठोस अपशिष्ट प्रबंधन नियम: 2016।
- CPCB के अनुसार प्रदूषित नदी खंड: 311 (279 नदियों पर)।
- जलवायु परिवर्तन राष्ट्रीय कार्य योजना: 2008, 8 मिशन।
10. टिप्स एवं ट्रिक्स
- पर्यावरण प्रश्नों में "विकास बनाम पर्यावरण" नहीं, "सतत विकास" और "न्यायपूर्ण संक्रमण" की भाषा।
- हर उत्तर में एक भारतीय उदाहरण (इंदौर, तिरुप्पुर ZLD, सौराष्ट्र लवणता) — अंक बढ़ाता है।
- अंतरराष्ट्रीय प्रतिबद्धताओं पर "CBDR-RC" और "जलवायु वित्त" का तर्क भारत की स्थिति स्पष्ट करता है।
पंचामृत: "500-50-1-45-70" — 500 GW, 50% नवीकरणीय, 1 अरब टन कमी, 45% तीव्रता, 2070 नेट-ज़ीरो।
11. PYQ-आधारित प्रश्न एवं मॉडल उत्तर
पेरिस समझौते के अंतर्गत भारत की प्रतिबद्धताओं, COP26 की घोषणाओं और 2022 के अद्यतन NDC का परीक्षण कीजिए। इनकी प्राप्ति में चुनौतियाँ क्या हैं? (250 शब्द)
मॉडल उत्तर
भूमिका: विश्व की सबसे बड़ी जनसंख्या और तीसरे सबसे बड़े कुल उत्सर्जक (पर प्रति व्यक्ति उत्सर्जन वैश्विक औसत से बहुत कम) के रूप में भारत की जलवायु नीति "विकास और जलवायु" दोनों को साधती है — CBDR-RC के सिद्धांत पर।
प्रतिबद्धताएँ: (1) पहला NDC (2015) — 2030 तक उत्सर्जन तीव्रता में 33-35% कमी, 40% गैर-जीवाश्म बिजली क्षमता, 2.5-3 अरब टन अतिरिक्त कार्बन सिंक; (2) COP26 का पंचामृत (2021) — 500 GW गैर-जीवाश्म, 50% ऊर्जा आवश्यकता नवीकरणीय से, 1 अरब टन उत्सर्जन कमी, 45% तीव्रता कमी, 2070 नेट-ज़ीरो; (3) अद्यतन NDC (अगस्त 2022) — तीव्रता में 45% कमी (2005 आधार), 2030 तक लगभग 50% गैर-जीवाश्म क्षमता, LiFE जन-आंदोलन; दीर्घकालिक कम-उत्सर्जन विकास रणनीति (2022)।
प्रगति: 2005-2020 के बीच उत्सर्जन तीव्रता में एक-तिहाई से अधिक कमी (द्विवार्षिक अद्यतन रिपोर्ट); जून 2025 में गैर-जीवाश्म स्थापित क्षमता 50% — लक्ष्य से पाँच वर्ष पहले; सौर क्षमता में तीव्र वृद्धि; E20 इथेनॉल मिश्रण; भारतीय कार्बन बाज़ार।
चुनौतियाँ: (1) कोयले पर निर्भरता — बिजली उत्पादन (क्षमता नहीं) में अब भी बड़ा हिस्सा; कोयला क्षेत्रों (झारखंड, ओडिशा, छत्तीसगढ़) में "न्यायपूर्ण संक्रमण"; (2) भंडारण और ग्रिड — नवीकरणीय की अनिरंतरता; (3) जलवायु वित्त — विकसित देशों का $100 अरब वार्षिक वादा अधूरा; COP29 का नया लक्ष्य ($300 अरब, 2035 तक) अपर्याप्त माना गया; (4) कठिन-घटाव क्षेत्र — इस्पात, सीमेंट, उर्वरक; (5) तकनीक और खनिज — बैटरी, सौर उपकरणों की आयात निर्भरता; (6) CBAM जैसे एकतरफ़ा व्यापार उपाय; (7) अनुकूलन (adaptation) की बढ़ती लागत।
आगे की राह: हरित हाइड्रोजन, परमाणु, भंडारण, ऊर्जा दक्षता, कार्बन बाज़ार, वन-आवरण, ग्लोबल साउथ के साथ जलवायु न्याय की आवाज़।
निष्कर्ष: भारत ने "कम कहा, अधिक किया" — पर 2070 तक का मार्ग वित्त, तकनीक और न्यायपूर्ण संक्रमण पर निर्भर है।
कुनमिंग-मॉन्ट्रियल वैश्विक जैव-विविधता ढाँचे की मुख्य विशेषताएँ बताइए। इसके अंतर्गत भारत की प्रतिबद्धताओं की चर्चा कीजिए। (150 शब्द)
मॉडल उत्तर
KMGBF (दिसंबर 2022, COP15): आइची लक्ष्यों (2011-2020, अधिकांश अप्राप्त) का उत्तराधिकारी; दृष्टि — "2050 तक प्रकृति के साथ सामंजस्य में जीवन"।
मुख्य विशेषताएँ: 4 दीर्घकालिक लक्ष्य (2050) और 23 टारगेट (2030): (1) "30x30" — 30% भूमि, अंतर्देशीय जल और समुद्री क्षेत्र का संरक्षण; (2) 30% क्षरित पारितंत्रों का पुनरुद्धार; (3) आक्रामक प्रजातियों के प्रवेश में 50% कमी; (4) पोषक तत्वों की हानि और कीटनाशक जोखिम में आधी कमी; (5) हानिकारक सब्सिडी में प्रति वर्ष कम से कम $500 अरब की कमी; (6) सभी स्रोतों से $200 अरब वार्षिक जैव-विविधता वित्त; (7) आनुवंशिक संसाधनों और डिजिटल अनुक्रम जानकारी से लाभ-साझेदारी; (8) स्वदेशी समुदायों के अधिकार।
भारत की प्रतिबद्धताएँ: COP16 (2024) में 23 राष्ट्रीय लक्ष्यों के साथ अद्यतन NBSAP; जैव-विविधता (संशोधन) अधिनियम 2023; संरक्षित क्षेत्रों के साथ OECM (सामुदायिक संरक्षित क्षेत्र, पवित्र उपवन); आर्द्रभूमि (अमृत धरोहर), मैंग्रोव (MISHTI), प्रोजेक्ट चीता; भारत ने विकासशील देशों की परिस्थिति के अनुसार "30x30" को वैश्विक लक्ष्य माना, राष्ट्रीय नहीं; कीटनाशक लक्ष्य पर संख्यात्मक प्रतिबद्धता से सावधानी (खाद्य सुरक्षा)।
चुनौतियाँ: वित्त, जैव-विविधता प्रबंधन समितियों की क्षमता, विकास परियोजनाओं से संघर्ष।
दिल्ली और इंदौर के ठोस अपशिष्ट प्रबंधन मॉडलों की तुलना कीजिए। अन्य शहरों के लिए क्या सबक हैं? (250 शब्द)
मॉडल उत्तर
भूमिका: भारत के शहर प्रतिदिन बड़ी मात्रा में ठोस अपशिष्ट उत्पन्न करते हैं, जिसका बड़ा भाग अब भी डंपसाइट पर जाता है। दिल्ली और इंदौर दो विपरीत अनुभवों के प्रतीक हैं।
दिल्ली: (1) गाज़ीपुर, भलस्वा, ओखला के "कचरे के पहाड़" — आग, मीथेन, रिसाव (leachate) से भूजल प्रदूषण, 2017 में गाज़ीपुर का भूस्खलन; (2) स्रोत पर पृथक्करण कमज़ोर; (3) अपशिष्ट-से-ऊर्जा संयंत्रों पर निर्भरता — मिश्रित कचरे से कम दक्षता और प्रदूषण; (4) कई एजेंसियाँ (नगर निगम, NDMC, DDA) — समन्वय की कमी; (5) पुराने कचरे के जैव-खनन (bio-mining) की धीमी गति।
इंदौर: (1) स्वच्छ सर्वेक्षण में लगातार शीर्ष (बाद में "सुपर स्वच्छ लीग"); (2) घर-घर संग्रह और स्रोत पर छह श्रेणियों में पृथक्करण; (3) गीले कचरे से बायो-CNG संयंत्र (गोबरधन) — शहर की बसों के लिए ईंधन; सूखे कचरे के लिए सामग्री पुनर्प्राप्ति सुविधाएँ; (4) पुराने देवगुराड़िया डंपसाइट का जैव-खनन से उपचार — भूमि की पुनर्प्राप्ति; (5) जन-भागीदारी — व्यवहार परिवर्तन अभियान, जुर्माना, NGO और स्व-सहायता समूह; (6) अनौपचारिक कचरा बीनने वालों का एकीकरण; (7) राजनीतिक-प्रशासनिक नेतृत्व की निरंतरता; उपयोगकर्ता शुल्क से वित्तीय स्थिरता।
सबक: (1) स्रोत पर पृथक्करण सबसे निर्णायक; (2) विकेंद्रीकृत प्रसंस्करण (खाद, बायोगैस) — "शून्य लैंडफ़िल" लक्ष्य; (3) जन-भागीदारी और व्यवहार परिवर्तन; (4) अनौपचारिक श्रमिकों का सम्मानजनक समावेश; (5) EPR — उत्पादकों का दायित्व (प्लास्टिक, ई-कचरा); (6) डेटा-आधारित निगरानी (GPS वाहन); (7) एकीकृत संस्थागत ज़िम्मेदारी; (8) SWM नियम 2016 और स्वच्छ भारत मिशन-शहरी 2.0 का पालन।
निष्कर्ष: इंदौर दिखाता है कि अपशिष्ट प्रबंधन "तकनीक" से अधिक "शासन और नागरिक व्यवहार" का प्रश्न है।
कार्बन अवशोषण, उपयोग और भंडारण (CCUS) क्या है? भारत के नेट-ज़ीरो लक्ष्य में इसकी भूमिका पर चर्चा कीजिए। (150 शब्द)
मॉडल उत्तर
अर्थ: उद्योगों और बिजलीघरों से निकलने वाली CO₂ को (1) पकड़ना (दहन-पूर्व, दहन-पश्चात, ऑक्सी-ईंधन विधियाँ); (2) उपयोग करना — यूरिया, सोडा ऐश, मेथनॉल, निर्माण सामग्री, तेल क्षेत्रों में तेल की वसूली बढ़ाना (EOR); या (3) भंडारण करना — गहरे लवणीय जलभृतों, ख़ाली तेल-गैस क्षेत्रों या बेसाल्ट चट्टानों (जहाँ CO₂ खनिज बनकर स्थायी हो जाती है) में।
भारत के लिए महत्व: (1) इस्पात, सीमेंट, उर्वरक, रिफ़ाइनरी जैसे "कठिन-घटाव" क्षेत्रों का डी-कार्बनीकरण, जहाँ केवल नवीकरणीय पर्याप्त नहीं; (2) कोयला-आधारित बिजली के संक्रमणकाल में उत्सर्जन कमी; (3) "चक्रीय कार्बन अर्थव्यवस्था" — CO₂ को उत्पाद में बदलना; (4) NITI Aayog की नीति रिपोर्ट (2022) और DST की अनुसंधान पहलें; (5) दक्कन ट्रैप के बेसाल्ट में भंडारण की संभावना; कुछ उद्योगों में पायलट परियोजनाएँ।
चुनौतियाँ: उच्च लागत और ऊर्जा आवश्यकता, भंडारण स्थलों का भू-वैज्ञानिक मानचित्रण, रिसाव का जोखिम, नियामक ढाँचे और कार्बन मूल्य का अभाव, "जीवाश्म ईंधन को लंबा जीवन देने" की आलोचना।
निष्कर्ष: CCUS नवीकरणीय का विकल्प नहीं, बल्कि नेट-ज़ीरो 2070 के लिए आवश्यक "पूरक उपकरण" है — कार्बन बाज़ार और नीति-समर्थन से ही व्यवहार्य होगा।
तटीय जलभृतों में समुद्री जल के प्रवेश के कारणों, प्रभावों और उपायों की चर्चा कीजिए। (150 शब्द)
मॉडल उत्तर
प्रक्रिया: तटीय क्षेत्रों में मीठा भूजल समुद्री जल के ऊपर/साथ संतुलन में रहता है; मीठे पानी का दबाव घटने पर खारा जल भूमि की ओर बढ़ता है। [रेखाचित्र: खारे-मीठे जल की सीमा का खिसकना]
कारण: (1) सिंचाई, उद्योग और शहरी आपूर्ति के लिए भूजल का अति-दोहन; (2) समुद्र-स्तर वृद्धि और तूफ़ानी लहरें; (3) नदियों पर बाँधों से नदी-प्रवाह और पुनर्भरण में कमी; (4) बालू खनन और मैंग्रोव विनाश; (5) झींगा पालन (खारे जल के तालाब)।
भारत में: सौराष्ट्र-कच्छ (गुजरात), चेन्नई का मिंजूर क्षेत्र, ओडिशा, केरल, लक्षद्वीप जैसे द्वीप।
प्रभाव: पेयजल की लवणता और स्वास्थ्य, मिट्टी का लवणीकरण — कृषि उपज में गिरावट, नारियल-सुपारी बागानों को क्षति, ग्रामीण पलायन, उद्योगों की लागत।
उपाय: (1) भूजल निकासी का विनियमन; (2) प्रबंधित जलभृत पुनर्भरण — चेक-डैम, पुनर्भरण कुएँ, तालाब; (3) ज्वारीय नियामक और उप-सतही अवरोध; (4) सतही जल से वैकल्पिक आपूर्ति, विलवणीकरण; (5) मैंग्रोव पुनर्स्थापन; (6) लवण-सहिष्णु फ़सलें; (7) गुजरात का लवणता प्रवेश रोकथाम कार्यक्रम एक उदाहरण।
खनन एक पर्यावरणीय ख़तरा किस प्रकार है? भारत में सतत खनन सुनिश्चित करने के उपाय सुझाइए। (250 शब्द)
मॉडल उत्तर
भूमिका: खनिज विकास, ऊर्जा संक्रमण (लिथियम, ताँबा, दुर्लभ मृदा) और रोज़गार के लिए आवश्यक हैं, पर अधिकांश खनिज भंडार वनों, जनजातीय क्षेत्रों और नदी-जलग्रहण क्षेत्रों में हैं — इसलिए खनन का पर्यावरणीय-सामाजिक मूल्य बहुत अधिक है।
पर्यावरणीय ख़तरे: (1) वन और जैव-विविधता हानि — खुली खदानें, हाथी गलियारों का विखंडन; (2) भूमि क्षरण — ओवरबर्डन के ढेर, खदानें खुली छोड़ना; (3) जल प्रदूषण — अम्लीय खदान अपवाह, भारी धातुएँ, गाद; भूजल स्तर में गिरावट; (4) वायु प्रदूषण — धूल, कोयला खदानों की आग (झरिया — एक सदी से अधिक समय से); (5) नदी तल का बालू खनन — कटाव, पुलों की नींव, जलीय जीवन; (6) स्वास्थ्य — सिलिकोसिस, न्यूमोकोनियोसिस; (7) सामाजिक — आदिवासियों का विस्थापन, आजीविका हानि; (8) जलवायु — मीथेन, वन-सिंक की हानि; अरावली जैसी पारिस्थितिक ढालों का क्षरण।
उदाहरण: गोवा और बेल्लारी में अवैध लौह-अयस्क खनन पर सर्वोच्च न्यायालय के प्रतिबंध; नियमगिरि में ग्राम सभाओं द्वारा अस्वीकृति (2013)।
सतत खनन के उपाय: (1) कठोर EIA और संचयी प्रभाव आकलन; (2) खदान बंदी योजना और प्रगतिशील पुनर्वास — वनीकरण, जलाशय; (3) ज़िला खनिज निधि (DMF) — MMDR संशोधन 2015 — प्रभावित समुदायों के लिए पारदर्शी उपयोग; (4) FRA और PESA के अंतर्गत ग्राम सभा की सहमति; (5) तकनीक — ड्रोन-उपग्रह से अवैध खनन की निगरानी, सुरक्षित भूमिगत खनन, धूल नियंत्रण; (6) सतत बालू खनन दिशानिर्देश (2016, प्रवर्तन दिशानिर्देश 2020); (7) "स्टार रेटिंग" खदानों की; (8) चक्रीय अर्थव्यवस्था — धातुओं का पुनर्चक्रण, ई-कचरे से महत्वपूर्ण खनिज; (9) पर्यावरणीय क्षति के लिए "प्रदूषक भुगतान करे" सिद्धांत।
निष्कर्ष: खनन को "निष्कर्षण" से "प्रबंधन" की ओर ले जाना होगा — ताकि खनिज-समृद्ध क्षेत्र "संसाधन अभिशाप" से मुक्त हों।
भारत में नदी जल के औद्योगिक प्रदूषण के कारणों और नियंत्रण के उपायों की चर्चा कीजिए। (150 शब्द)
मॉडल उत्तर
स्थिति: CPCB के अनुसार 279 नदियों पर 311 प्रदूषित खंड; सीवेज के साथ औद्योगिक बहिःस्राव प्रमुख कारण।
कारण: (1) अत्यधिक प्रदूषणकारी उद्योग — चर्म-शोधन (कानपुर में क्रोमियम), वस्त्र-रंगाई (तिरुप्पुर, पाली), औषधि, कागज़, चीनी-आसवनी, रसायन; (2) बहिःस्राव उपचार संयंत्र (ETP) का न होना या न चलाना; (3) सामान्य बहिःस्राव उपचार संयंत्रों (CETP) की कमी और कम दक्षता — छोटे उद्योग; (4) निगरानी और दंड का कमज़ोर प्रवर्तन; (5) औद्योगिक क्लस्टरों का नदियों के किनारे होना; (6) रात में या बारिश के दौरान अवैध निर्वहन।
प्रभाव: भारी धातुएँ और विषैले रसायन — पेयजल, सिंचाई, मछलियाँ, खाद्य शृंखला; जैव-विविधता हानि।
उपाय: (1) जल अधिनियम 1974 और पर्यावरण अधिनियम 1986 का प्रवर्तन; (2) 17 श्रेणियों के अत्यधिक प्रदूषणकारी उद्योगों में ऑनलाइन निरंतर बहिःस्राव निगरानी (OCEMS); (3) शून्य द्रव निर्वहन (ZLD) — तिरुप्पुर का अनुभव; (4) CETP उन्नयन; (5) नमामि गंगे (2014) — औद्योगिक अनुपालन; (6) NGT के आदेश और "प्रदूषक भुगतान करे" जुर्माना; (7) स्वच्छ तकनीक और जल पुनर्चक्रण के लिए प्रोत्साहन; (8) सार्वजनिक प्रकटीकरण और नागरिक निगरानी।
पर्यावरणीय NGO ने भारत में पर्यावरण प्रभाव आकलन (EIA) के परिणामों को किस प्रकार प्रभावित किया है? (250 शब्द)
मॉडल उत्तर
भूमिका: EIA (अधिसूचना 2006) का उद्देश्य परियोजनाओं के पर्यावरणीय प्रभावों का पूर्व आकलन और जनसुनवाई के माध्यम से प्रभावित समुदायों की भागीदारी है। पर्यावरणीय NGO इस प्रक्रिया में "प्रहरी" की भूमिका निभाते हैं।
सकारात्मक प्रभाव: (1) जनसुनवाई को सार्थक बनाना — स्थानीय भाषा में जानकारी, समुदायों को संगठित करना, तकनीकी आपत्तियाँ प्रस्तुत करना; (2) EIA रिपोर्टों की गुणवत्ता पर प्रश्न — कॉपी-पेस्ट, ग़लत आँकड़ों का पर्दाफ़ाश; (3) मुक़दमे — NGT और न्यायालयों में चुनौती, जिससे शर्तें कड़ी हुईं या परियोजनाएँ पुनर्विचार हेतु लौटीं; (4) अधिकार-आधारित निर्णय — नियमगिरि (2013) में ग्राम सभाओं द्वारा खनन अस्वीकृति; ओडिशा में POSCO परियोजना की वापसी; (5) नीति पर प्रभाव — प्रारूप EIA अधिसूचना 2020 पर लाखों आपत्तियाँ, "कार्योत्तर" स्वीकृति पर बहस; (6) शोध और डेटा — CSE, कल्पवृक्ष, LIFE जैसे संगठनों के अध्ययन; (7) अनुपालन की निगरानी।
आलोचनाएँ: (1) परियोजनाओं में देरी और लागत वृद्धि — "विकास-विरोधी" का आरोप; (2) कुछ मामलों में विदेशी वित्तपोषण और एजेंडा के आरोप — FCRA के अंतर्गत कुछ संगठनों के पंजीकरण रद्द; (3) स्थानीय हितों का प्रतिनिधित्व करने का दावा कभी-कभी विवादित; (4) "प्रतिक्रियात्मक" भूमिका — प्रारंभिक योजना चरण में कम भागीदारी।
सुधार की आवश्यकता (EIA में): सलाहकारों की स्वतंत्र मान्यता (प्रस्तावक द्वारा भुगतान नहीं), संचयी और रणनीतिक पर्यावरण आकलन, जनसुनवाई में सार्थक भागीदारी, स्वीकृति के बाद निगरानी, NGO-सरकार संवाद मंच।
निष्कर्ष: NGO EIA को "औपचारिकता" से "लोकतांत्रिक जवाबदेही" बनाने में सहायक रहे हैं — संवाद और पारदर्शिता से उनकी भूमिका और रचनात्मक बन सकती है।
भारत में मीठे पानी की बढ़ती कमी के कारण बताइए। इसे दूर करने के लिए वैकल्पिक तकनीकों की चर्चा कीजिए। (250 शब्द)
मॉडल उत्तर
भूमिका: भारत में विश्व की लगभग 18% जनसंख्या है, पर मीठे जल संसाधनों का केवल लगभग 4%; प्रति व्यक्ति वार्षिक जल उपलब्धता लगातार घटकर "जल-तनाव" की सीमा के निकट है।
कारण: (1) जनसंख्या और शहरीकरण; (2) कृषि में अकुशल सिंचाई (लगभग 80% उपयोग); (3) भूजल अति-दोहन; (4) प्रदूषण — सीवेज, उद्योग, आर्सेनिक-फ़्लोराइड; (5) जलवायु परिवर्तन — अनियमित वर्षा, हिमनदों का पिघलना; (6) आर्द्रभूमि और जल निकायों का अतिक्रमण; (7) जल का कम मूल्य निर्धारण और बर्बादी; (8) अंतर-राज्यीय विवाद।
वैकल्पिक तकनीकें: (1) विलवणीकरण — रिवर्स ऑस्मोसिस; चेन्नई के मिंजूर और नेम्मेली संयंत्र; नवीकरणीय ऊर्जा से संचालित विलवणीकरण; चुनौती — ऊर्जा लागत और खारा अवशेष (brine); (2) अपशिष्ट जल पुनर्चक्रण — नागपुर का उपचारित जल बिजलीघर को बेचना, बेंगलुरु में उपचारित जल से टैंकों का पुनर्भरण, उद्योगों में ZLD; (3) वर्षा जल संचयन — तमिलनाडु में भवनों के लिए अनिवार्य; छत संचयन, पुनर्भरण कुएँ; (4) सूक्ष्म सिंचाई और सटीक कृषि; (5) वायुमंडलीय जल जनित्र और कोहरा-संग्रह (नमी से जल); (6) स्मार्ट जल प्रबंधन — IoT मीटर, रिसाव पहचान, "24x7" आपूर्ति; (7) प्रबंधित जलभृत पुनर्भरण — अटल भूजल, अमृत सरोवर; (8) पारंपरिक प्रणालियों का पुनर्जीवन — बावड़ी, जोहड़, कुंड; (9) प्रकृति-आधारित समाधान — आर्द्रभूमि, स्पंज शहर।
नीतिगत समर्थन: जल जीवन मिशन, AMRUT 2.0, जल शक्ति अभियान, राष्ट्रीय जल नीति का अद्यतन।
निष्कर्ष: तकनीक आवश्यक है, पर "माँग प्रबंधन" — कम बर्बादी, उचित मूल्य और पुनर्चक्रण — ही जल सुरक्षा की स्थायी कुंजी है।
उत्तर भारत में शीतकालीन वायु प्रदूषण के कारणों और समाधान की चर्चा कीजिए। (150 शब्द)
मॉडल उत्तर
कारण: (1) भौगोलिक-मौसमी — सर्दियों में तापमान व्युत्क्रमण (inversion) और धीमी हवाएँ प्रदूषकों को सतह के पास फँसा देती हैं; हिमालय से घिरा भू-आबद्ध गंगा मैदान; (2) पराली जलाना — पंजाब-हरियाणा में धान की कटाई के बाद (अक्टूबर-नवंबर); (3) वाहन उत्सर्जन; (4) निर्माण और सड़क धूल; (5) उद्योग और ताप-विद्युत संयंत्र; (6) घरेलू ईंधन — लकड़ी, उपले; खुले में कचरा जलाना; (7) त्योहारों में आतिशबाज़ी।
प्रभाव: PM2.5 का अत्यधिक स्तर — श्वसन और हृदय रोग, जीवन प्रत्याशा में कमी, उत्पादकता हानि।
समाधान: (1) राष्ट्रीय स्वच्छ वायु कार्यक्रम (NCAP, 2019) — शहरों के लिए लक्ष्य और धन; (2) वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग (CAQM, 2021) और "क्रमिक प्रतिक्रिया कार्य योजना" (GRAP); (3) पराली के लिए फ़सल अवशेष प्रबंधन मशीनें (हैप्पी सीडर), बायो-डीकंपोज़र, पराली से बायो-CNG और ईंधन-गोलियाँ, धान का विविधीकरण; (4) BS-VI, इलेक्ट्रिक वाहन, सार्वजनिक परिवहन; (5) निर्माण धूल नियंत्रण; (6) उद्योगों में स्वच्छ ईंधन (PNG); (7) उज्ज्वला; (8) क्षेत्रीय ("एयरशेड") दृष्टिकोण — राज्यों के बीच समन्वय।
निष्कर्ष: वायु प्रदूषण "मौसमी आपदा" नहीं, "वर्षभर की संरचनात्मक समस्या" है — समाधान भी वर्षभर, बहु-राज्यीय होना चाहिए।
12. Quick Revision Summary
- जलवायु: पेरिस, पंचामृत, अद्यतन NDC 2022 (45% तीव्रता, 50% गैर-जीवाश्म — 2025 में प्राप्त), नेट-ज़ीरो 2070; CCUS पूरक उपकरण।
- जैव-विविधता: KMGBF (23 टारगेट, 30x30); भारत NBSAP 2024।
- प्रदूषण: नदियों के 311 खंड; ZLD, OCEMS, नमामि गंगे; शीतकालीन वायु प्रदूषण — NCAP, CAQM।
- अपशिष्ट: इंदौर मॉडल — पृथक्करण, बायो-CNG, जन-भागीदारी।
- जल: तटीय लवणता, भूजल; विलवणीकरण, पुनर्चक्रण, संचयन।
- खनन और EIA: DMF, खदान बंदी, ग्राम सभा, स्वतंत्र आकलन; NGO — प्रहरी।