UPSC Mains · Anthropology · Paper II · अध्याय 7

भारतीय सभ्यता का विकास एवं प्रागैतिहास

Evolution of Indian Culture and Civilisation

भारत की पुरापाषाण, मध्यपाषाण, नवपाषाण संस्कृतियाँ; हड़प्पा सभ्यता; भारतीय जनसंख्या के नृजातीय और भाषाई तत्व; पुरा-मानव जीवाश्म।

Paper II 28 मिनट

1. अध्याय एक नज़र में

Paper II का पहला भाग भारतीय सभ्यता का विकास है — प्रागैतिहासिक (पुरापाषाण, मध्यपाषाण, नवपाषाण, ताम्रपाषाण), आद्य-ऐतिहासिक (सिंधु सभ्यता) और भारत का पुरा-मानवशास्त्र (शिवालिक प्राइमेट, नर्मदा मानव)। Paper I के "प्रागैतिहासिक पुरातत्व" से भी यहीं से प्रश्न आते हैं। 2024 में मेहरगढ़, भारतीय पुरापाषाण की ऐश्यूलियन-ओल्डोवान परंपराएँ, हड़प्पा का समुद्री व्यापार, राखीगढ़ी और दक्षिण भारत के पुरापाषाण स्थल पूछे गए; 2023 में मध्यपाषाण स्थल, पुरापाषाण पर्यावरण, लौह युग, सिंधु घाटी, मध्यपाषाण और स्थायी जीवन, उत्तराखंड की शैल-कला, रामापिथेकस-शिवापिथेकस बहस और शिवालिक जीवाश्म।

प्रागैतिहासिक भारत: सचित्र अध्ययन चार्ट
प्रागैतिहासिक भारत — पुरापाषाण से ताम्रपाषाण तक प्रमुख स्थल, उपकरण और जीवन-शैली (NCERT आधारित infographic)।

2. भारत का पुरा-मानवशास्त्र (Palaeo-anthropology)

शिवालिक के जीवाश्म प्राइमेट

  • शिवालिक निक्षेप — हिमालय की तलहटी (जम्मू से नेपाल तक; पोटवार पठार, पाकिस्तान) की नदी-जनित अवसादी परतें; मध्य-मायोसीन से प्रारंभिक प्लीस्टोसीन (लगभग 1.8 करोड़ से 5 लाख वर्ष पूर्व); "नियोजीन" स्तनधारियों (हाथी-वंश, घोड़े, जिराफ़, गैंडे) और प्राइमेट का समृद्ध भंडार; तीन भाग — निम्न, मध्य, उच्च शिवालिक।
  • प्रमुख जीवाश्म — शिवापिथेकस (गाय पिलग्रिम, 1910); रामापिथेकस पंजाबिकस (जी. एडवर्ड लुईस, 1932, हरितालयंगर — हिमाचल प्रदेश); गिगैंटोपिथेकस बिलासपुरेंसिस (एल्विन सिमन्स और एस.आर.के. चोपड़ा, 1969 — अब Indopithecus); सिवालादापिस, इंडराल्लोरिस (छोटे प्राइमेट); क्रिप्टोपिथेकस, ड्रायोपिथेकस से संबंधित रूप।

रामापिथेकस-शिवापिथेकस बहस (UPSC 2023)

चरणविचारआधार
1960-70 का दशकरामापिथेकस प्रथम होमिनिड (मानव-रेखा का पूर्वज) — एल्विन सिमन्स, डेविड पिलबीमपरवलयाकार (parabolic) दंत-चाप, छोटे कैनाइन, मोटा इनेमल — मानव जैसे लक्षण
1970 के अंतआणविक घड़ी (सारिच और विल्सन, 1967) — मानव-चिंपैंज़ी विचलन केवल ~50 लाख वर्ष पूर्व; अतः 1.4 करोड़ वर्ष पुराना रामापिथेकस होमिनिड नहीं हो सकताप्रोटीन/DNA तुलना
1980 के बादरामापिथेकस वास्तव में शिवापिथेकस की मादा (लैंगिक द्विरूपता) — दोनों एक ही वंश; ओरंगुटान की रेखा के पूर्वजपिलबीम (1982) — पोटवार से मिली खोपड़ी GSP 15000 — चेहरा ओरंगुटान जैसा (संकीर्ण अंतर-कक्षीय दूरी, अवतल चेहरा)

महत्व — (1) "मानव पूर्वज एशिया में" की परिकल्पना का अंत, अफ़्रीकी उत्पत्ति का समर्थन; (2) आणविक और जीवाश्म साक्ष्य के समन्वय का उदाहरण; (3) दंत-लक्षणों के आधार पर निष्कर्ष की सीमाएँ (होमोप्लासी — अभिसारी विकास); (4) शिवालिक मायोसीन वानरों के विकिरण (radiation) और जलवायु परिवर्तन (वनों का घास-मैदानों में बदलना, ~80 लाख वर्ष पूर्व — C4 घास) का सर्वोत्तम अभिलेख।

भारत में होमिनिन साक्ष्य

  • नर्मदा मानव — हथनोरा (सीहोर, म.प्र.), अरुण सोनकिया (GSI), 1982 — आंशिक कपाल; पहले "होमो इरेक्टस नर्मदेंसिस", अब पुरातन होमो सेपियंस / होमो हाइडलबर्गेंसिस जैसे लक्षण (केनेथ केनेडी); मध्य-प्लीस्टोसीन। बाद में हँसली (clavicle) और पसलियाँ (सांख्यान)।
  • भारत में प्रत्यक्ष होमिनिन जीवाश्म अत्यंत कम — उपकरण अधिक, कंकाल कम (अम्लीय मिट्टी, कम उत्खनन)।

3. पुरापाषाण काल (Palaeolithic)

  • प्रारंभ — रॉबर्ट ब्रूस फ़ुट (GSI) ने 30 मई 1863 को पल्लवरम (चेन्नई के निकट) में पहला पुरापाषाण हस्त-कुठार (handaxe) खोजा — "भारतीय प्रागितिहास के जनक"।
  • दो परंपराएँ (पुराना विभाजन) — सोहन (Soanian) परंपरा — डी टेरा और पैटरसन (1939), सोहन घाटी (पाकिस्तान) — कोर और फ़्लेक, चॉपर-चॉपिंग उपकरण; मद्रासियन परंपरा — हस्त-कुठार और विदारणी (cleaver) — दक्षिण भारत। आज यह विभाजन अस्वीकार — दोनों परंपराएँ अनेक स्थानों पर साथ मिलती हैं।

ओल्डोवान और ऐश्यूलियन परंपराएँ (UPSC 2024)

पक्षओल्डोवान (Mode 1)ऐश्यूलियन (Mode 2)
नामओल्डुवाई गॉर्ज (तंज़ानिया) — लीकी दंपतीसेंट-ऐश्यूल (फ़्रांस)
उपकरणचॉपर, चॉपिंग टूल, साधारण फ़्लेक — कंकड़ (pebble) पर कुछ प्रहारहस्त-कुठार (द्विमुखी — bifacial, आँसू/बादाम आकार), विदारणी (cleaver), गँड़ासा; मानक "मानसिक साँचा" (mental template)
तकनीकसीधा कठोर-हथौड़ा प्रहारकठोर और मृदु हथौड़ा (हड्डी/लकड़ी), बड़े फ़्लेक-ब्लैंक; बाद में लेवालुआ की शुरुआत
निर्माताहोमो हैबिलिस (और प्रारंभिक होमो)होमो इरेक्टस/अर्गेस्टर, होमो हाइडलबर्गेंसिस
भारत मेंसोहन घाटी, शिवालिक; रिवात (पाकिस्तान, ~19 लाख वर्ष — विवादित), मसोल (पंजाब — ~26 लाख वर्ष का दावा, 2016, विवादित); कई ऐश्यूलियन स्थलों में चॉपर-चॉपिंग तत्वअत्तिरमपक्कम (तमिलनाडु — लगभग 15 लाख वर्ष, शांति पप्पू और साथी, 2011); इसमपुर (हुंसगी घाटी, कर्नाटक — ~12 लाख वर्ष, के. पड्डय्या); भीमबेटका, डीडवाना (राजस्थान — 16R टीला), नेवासा, बेलन घाटी, चिरकी-नेवासा, हुंसगी-बैचबल, सिंगी तालाव
  • भारतीय ऐश्यूलियन की विशेषता — क्वार्टज़ाइट का प्रमुख उपयोग; बड़ी संख्या में विदारणी; प्रारंभिक (अत्तिरमपक्कम — एशिया में सबसे प्राचीन ऐश्यूलियन में से) से उत्तर ऐश्यूलियन तक लंबी निरंतरता; "Movius Line" (हैलम मोवियस, 1948 — पूर्व एशिया में हस्त-कुठार नहीं) के पश्चिम में भारत।
  • अत्तिरमपक्कम (2018, Nature) — लगभग 3.85 लाख से 1.72 लाख वर्ष पूर्व मध्य पुरापाषाण (लेवालुआ) तकनीक का उदय — पहले की अपेक्षा बहुत पहले; "आधुनिक मानव के अफ़्रीका से बाहर आने से पहले" — स्थानीय विकास या प्रारंभिक प्रवासन की बहस।

मध्य और उच्च पुरापाषाण

कालउपकरणप्रमुख स्थल
मध्य पुरापाषाण (~3.85 लाख-40 हज़ार वर्ष)फ़्लेक उपकरण — स्क्रेपर, बेधक (borer), बिंदु (point); लेवालुआ तकनीक; "नेवासियन" (एच.डी. सांकलिया)नेवासा (प्रवरा नदी, महाराष्ट्र), भीमबेटका, बेलन, सोन घाटी, ज्वालापुरम, अत्तिरमपक्कम, डीडवाना
उच्च पुरापाषाण (~40-10 हज़ार वर्ष)फलक (blade), तक्षणी (burin), हड्डी उपकरण; मनके, कलापटणे (महाराष्ट्र — शुतुरमुर्ग अंडे के छिलके पर नक़्क़ाशी), बेलन, भीमबेटका, कुरनूल गुफाएँ (हड्डी उपकरण), बाघोर-I (सोन घाटी — "मातृदेवी" पत्थर — केनोयर, क्लार्क, पाल और शर्मा, 1983)
  • ज्वालापुरम (आंध्र प्रदेश) — माइकल पेट्राग्लिया (2007): टोबा ज्वालामुखी विस्फोट (~74,000 वर्ष पूर्व) की राख के नीचे और ऊपर मध्य पुरापाषाण उपकरण — मानव टोबा से बचे रहे (विवादित व्याख्या)।

पुरापाषाण पर्यावरण (UPSC 2023)

  • प्लीस्टोसीन जलवायु — हिमनद (glacial) और अंतर-हिमनद (interglacial) काल; भारत में प्रत्यक्ष हिमनद केवल हिमालय में, शेष भारत में आर्द्र (pluvial) और शुष्क (inter-pluvial) चरण।
  • साक्ष्य — (1) नदी वेदिकाएँ (river terraces) — कश्मीर-सोहन (डी टेरा और पैटरसन — 4 हिमनद, 3 अंतर-हिमनद, सोहन की 5 वेदिकाएँ), नर्मदा, बेलन, सोन; (2) अवसाद अनुक्रम — बजरी (आर्द्र, तेज़ धारा) बनाम गाद (शुष्क); (3) जीवाश्म जीव — नर्मदा घाटी के हाथी (Palaeoloxodon namadicus), दरियाई घोड़ा, बोस (Bos namadicus) — जल-प्रचुर घास के मैदान; (4) पराग विश्लेषण (palynology) — राजस्थान की झीलें (डीडवाना, सांभर — गुरदीप सिंह): आर्द्र-शुष्क चक्र; (5) राजस्थान के बालू टीले — शुष्क चरण; (6) लैटेराइट और लाल मिट्टी (अत्तिरमपक्कम); (7) टोबा राख (ज्वालापुरम, सोन घाटी); (8) स्थिर समस्थानिक (stable isotopes) — C3/C4 वनस्पति।
  • मानव अनुकूलन — जल-स्रोतों (नदी, झील, झरने) के पास स्थल; ऐश्यूलियन स्थल प्रायः कच्चे माल (क्वार्टज़ाइट) के निकट; शुष्क चरणों में रेगिस्तान से पलायन, आर्द्र चरणों में थार में भी बस्तियाँ (डीडवाना 16R)।

4. मध्यपाषाण काल (Mesolithic)

  • काल — लगभग 12,000 से 4,000 वर्ष पूर्व (क्षेत्र के अनुसार भिन्न); होलोसीन की गर्म-आर्द्र जलवायु।
  • उपकरण — सूक्ष्मपाषाण (microliths) — 1-5 सेमी के ज्यामितीय (त्रिभुज, समलंब, अर्धचंद्र — lunate) और अज्यामितीय फलक; लकड़ी/हड्डी के हत्थे में जोड़कर संयुक्त उपकरण (composite tools) — तीर, हँसिया, भाला; पहली बार तीर-कमान का व्यापक प्रयोग; कच्चा माल — कैल्सेडनी, चर्ट, एगेट।

प्रमुख मध्यपाषाण स्थल (UPSC 2023)

स्थलराज्यविशेषता
बागोरराजस्थान (कोठारी नदी, भीलवाड़ा)भारत का सबसे बड़ा मध्यपाषाण स्थल (वी.एन. मिश्रा); भेड़-बकरी पालन के साक्ष्य; झोपड़ी के फ़र्श; तीन चरण
आदमगढ़मध्य प्रदेश (होशंगाबाद)पशुपालन के प्रारंभिक साक्ष्य (आर.वी. जोशी); शैलचित्र
लंघनाजगुजरातसांकलिया; मानव कंकाल, सूक्ष्मपाषाण, गैंडे-हिरण की हड्डियाँ
सराय नाहर रायउत्तर प्रदेश (प्रतापगढ़)समाधियाँ (एक कब्र में चार व्यक्ति), चूल्हे, झोपड़ियाँ
महदहाउत्तर प्रदेश (प्रतापगढ़)झील किनारे बस्ती, युगल समाधि, हड्डी के आभूषण, वधस्थल (butchering) क्षेत्र
दमदमाउत्तर प्रदेश (प्रतापगढ़)40 से अधिक समाधियाँ, कुछ में दोहरी-तिहरी कब्रें, चूल्हे
चोपानी मांडोउत्तर प्रदेश (बेलन घाटी)गोल झोपड़ियाँ, हस्त-निर्मित मृद्भांड के प्रारंभिक साक्ष्य, जंगली चावल (जी.आर. शर्मा)
भीमबेटकामध्य प्रदेश (रायसेन)शैलाश्रय, शैलचित्र (शिकार, नृत्य) — वी.एस. वाकणकर (1957), यूनेस्को धरोहर (2003)
बीरभानपुरपश्चिम बंगाल (दामोदर)बी.बी. लाल; खुले स्थल पर सूक्ष्मपाषाण
टेरी स्थल, सनगनकल्लुतमिलनाडु, कर्नाटकतटीय लाल बालू-टीलों पर सूक्ष्मपाषाण

टाइपो-तकनीकी विशेषताएँ

  • प्रकार (Typology) — फलक (blade), बैक्ड ब्लेड (एक धार भोथरी), बिंदु, अर्धचंद्र, त्रिभुज, समलंब, बेधक, स्क्रेपर, तक्षणी (burin)।
  • तकनीक — कोर से नियंत्रित दबाव-शल्कन (pressure flaking) और अप्रत्यक्ष प्रहार (punch technique); "फ़्लूटेड कोर"; माइक्रोबुरिन तकनीक (फलक को खाँचे से तोड़ना); ज्यामितीय आकार बाद के चरण में (बागोर, सराय नाहर राय); स्थानीय कच्चे माल के अनुसार भिन्नता।

क्या मध्यपाषाण स्थायी जीवन की ओर पहला कदम था? (UPSC 2023)

  • हाँ के पक्ष में — (1) झोपड़ी के फ़र्श, खंभों के गड्ढे (बागोर, चोपानी मांडो, महदहा); (2) औपचारिक समाधियाँ और कब्रिस्तान (सराय नाहर राय, दमदमा, महदहा) — स्थान से लगाव; (3) पशुपालन (बागोर, आदमगढ़) और जंगली अनाज संग्रह (चोपानी मांडो); (4) मृद्भांड के प्रारंभिक रूप; (5) पीसने के पत्थर (sil-lodha); (6) झीलों (प्रतापगढ़ की "ऑक्स-बो" झीलें) के पास मौसमी/अर्ध-स्थायी शिविर — "broad spectrum revolution" (केंट फ़्लैनरी)।
  • सीमाएँ — अधिकांश समूह अभी भी शिकारी-संग्राहक और मौसमी रूप से गतिशील; खेती का प्रत्यक्ष प्रमाण नवपाषाण में; क्षेत्रीय भिन्नता — गंगा घाटी में अर्ध-स्थायी, राजस्थान में पशुपालन, दक्षिण में तटीय।
  • निष्कर्ष — मध्यपाषाण काल "संक्रमण काल" है — स्थायी जीवन की ओर पहला ठोस कदम, जिसकी परिणति नवपाषाण कृषि में हुई।

उत्तराखंड की प्रागैतिहासिक शैल-कला (UPSC 2023)

  • लखुडियार (अल्मोड़ा, सुयाल नदी के किनारे, बाड़ेछीना के पास) — "लाख गुफाएँ"; लाल, काले और सफ़ेद रंग के चित्र — हाथ पकड़कर नाचते मानव समूह (कतार में), पशु, लहरदार रेखाएँ, ज्यामितीय आकृतियाँ; अनुमानित मध्यपाषाण/ताम्रपाषाण काल।
  • अन्य — फलसीमा, ल्वेथाप, पेटशाल (अल्मोड़ा), किमनी (चमोली), हुडली (उत्तरकाशी), ग्वारख्या गुफा (चमोली)।
  • महत्व — हिमालयी क्षेत्र में प्रागैतिहासिक मानव-उपस्थिति, सामूहिक अनुष्ठान/नृत्य, भीमबेटका जैसी परंपरा से साम्य; संरक्षण की चुनौतियाँ (पर्यटन, मौसम, भित्ति-लेखन)।

5. नवपाषाण और ताम्रपाषाण काल

मेहरगढ़ (UPSC 2024)

मेहरगढ़ — दक्षिण एशिया में कृषि का सबसे प्राचीन ज्ञात केंद्र

बलूचिस्तान (पाकिस्तान) में बोलन दर्रे के निकट कच्छी मैदान; ज़ाँ-फ़्रांस्वा जारिज (Jean-François Jarrige) के नेतृत्व में फ़्रांसीसी दल ने 1974-86 तक उत्खनन किया; प्रारंभिक चरण लगभग 7000 ई.पू. (कुछ अनुमान इससे भी पहले)।

  • खाद्य-उत्पादन के साक्ष्य — (1) जौ (छह-पंक्ति और दो-पंक्ति), गेहूँ (इमर, आइनकॉर्न, ब्रेड-गेहूँ) — अनाज-छाप (impressions) मिट्टी की ईंटों में; (2) भंडारगृह (कोठरियों वाली संरचनाएँ — granaries); (3) पीसने के पत्थर, हँसिये (बिटुमेन से जुड़े सूक्ष्मपाषाण); (4) बाद में कपास (5वीं सहस्राब्दी ई.पू. — दक्षिण एशिया में सबसे प्राचीन में से)।
  • पशुपालन — बकरी (सबसे पहले), भेड़, और ज़ेबू (कूबड़ वाला) मवेशी — रिचर्ड मीडो का अध्ययन: पशुओं के आकार में क्रमिक कमी — स्थानीय पालतूकरण का संकेत; प्रारंभिक स्तरों में जंगली पशुओं (गज़ेल, हिरण) का शिकार भी, बाद में पालतू पशुओं का अनुपात बढ़ा।
  • अन्य — कच्ची ईंटों के आयताकार घर, समाधियाँ (शवों के साथ बकरी, मनके), दंत-चिकित्सा (दाँतों में ड्रिल — लगभग 9000-7500 वर्ष पूर्व; कोप्पा और साथी, Nature 2006), लैपिस लाज़ुली और समुद्री शंख (दूर-व्यापार), बाद में मृद्भांड (~5500 ई.पू.) और ताँबा।
  • महत्व — (1) कृषि का स्वतंत्र/स्थानीय विकास (पश्चिम एशिया से केवल प्रसार नहीं — ज़ेबू पालतूकरण); (2) हड़प्पा सभ्यता की पृष्ठभूमि — ग्राम से नगर तक की निरंतरता (मेहरगढ़ → नौशारो → हड़प्पा); (3) "नवपाषाण क्रांति" (गॉर्डन चाइल्ड) का दक्षिण एशियाई प्रमाण; (4) भारतीय उपमहाद्वीप में स्थायी ग्राम-जीवन, शिल्प-विशेषीकरण, व्यापार का प्रारंभ।

भारत के अन्य नवपाषाण क्षेत्र

क्षेत्रस्थलविशेषता
उत्तर (कश्मीर)बुर्ज़होम, गुफ़्क्रालगर्त-आवास (pit dwellings); मालिक के साथ कुत्ते की समाधि; हड्डी के उपकरण; छिद्रित पत्थर
मध्य गंगा / विंध्यकोल्डिहवा, महागढ़ा, लहुरादेवा, चिरांद (बिहार)चावल के प्रारंभिक साक्ष्य (लहुरादेवा — ~7वीं सहस्राब्दी ई.पू. का दावा); चिरांद — हड्डी के उपकरण
पूर्वोत्तरदाओजाली हाडिंग, सरुतारु (असम)कंधेदार कुल्हाड़ी (shouldered celts), दक्षिण-पूर्व एशियाई संबंध, झूम
दक्षिणउतनूर, कुपगल, बुदिहाल (राख टीले — ash mounds), ब्रह्मगिरि, संगनकल्लु, पिक्लीहल, पैयमपल्लीमवेशी-पालन, गोबर के ढेर जलाने से राख टीले (एफ़.आर. ऑलचिन)

ताम्रपाषाण संस्कृतियाँ

  • आहाड़-बनास (राजस्थान — आहाड़, गिलुंद, बालाथल), कायथा (म.प्र.), मालवा (नवदाटोली, एरण), जोर्वे (महाराष्ट्र — इनामगाँव, दाइमाबाद — काँसे का रथ), गेरुए रंग के मृद्भांड (OCP), गंगा घाटी के "ताम्र-निधि" (copper hoards)।
  • इनामगाँव (एम.के. धवलीकर) — सिंचाई नहर, बाँध, अन्नभंडार, मुखिया का घर — मुखियातंत्र जैसी सामाजिक जटिलता; घर के फ़र्श के नीचे कलश-समाधि।

6. सिंधु-सरस्वती (हड़प्पा) सभ्यता

  • काल — प्रारंभिक हड़प्पा (~3300-2600 ई.पू.), परिपक्व हड़प्पा (~2600-1900 ई.पू.), उत्तर हड़प्पा (~1900-1300 ई.पू.)।
  • खोज — दयाराम साहनी (हड़प्पा, 1921), आर.डी. बनर्जी (मोहनजोदड़ो, 1922), जॉन मार्शल (ASI महानिदेशक) ने 1924 में घोषणा की।
  • विस्तार — पश्चिम में सुत्कागेन-डोर (बलूचिस्तान-ईरान सीमा), पूर्व में आलमगीरपुर (मेरठ), उत्तर में माँडा (जम्मू) और शोर्तुगई (अफ़ग़ानिस्तान — व्यापार चौकी), दक्षिण में दाइमाबाद (महाराष्ट्र); क्षेत्रफल लगभग 10 लाख वर्ग किमी से अधिक — समकालीन मिस्र और मेसोपोटामिया से बड़ा।
  • विशेषताएँ — ग्रिड-योजना वाले नगर, गढ़ (citadel) और निचला नगर, पकी ईंटें (मानक अनुपात 1:2:4), ढकी नालियाँ, विशाल स्नानागार (मोहनजोदड़ो), अन्नागार, मानक बाट (द्विआधारी और दशमलव), मुहरें (एक-शृंगी पशु), अपठित लिपि (~400 चिह्न, दाएँ से बाएँ), मनके-शिल्प, काँसे की "नर्तकी"।
  • भारत के प्रमुख स्थल — धोलावीरा (गुजरात — जल-प्रबंधन, यूनेस्को 2021), लोथल, राखीगढ़ी, कालीबंगा (जुते खेत, अग्नि-वेदियाँ), बनावली, सुरकोटड़ा (घोड़े की हड्डियाँ — विवादित), भिर्राणा (प्रारंभिक स्तर ~7वीं-6ठी सहस्राब्दी ई.पू. का दावा), सिनौली (उ.प्र. — "रथ", 2018)।

"सिंधु घाटी बड़ी सभ्यता की पहली बस्ती थी" — आलोचनात्मक टिप्पणी (UPSC 2023)

  • पक्ष में — (1) प्राचीन विश्व की सबसे विस्तृत कांस्य-युगीन सभ्यता; (2) अपने समय की सबसे उन्नत नगर-योजना और स्वच्छता; (3) मेहरगढ़ से निरंतरता — दक्षिण एशिया की पहली नगरीय क्रांति ("प्रथम नगरीकरण"); (4) भिर्राणा जैसे स्थलों के प्राचीन स्तर।
  • विपक्ष में — (1) मेसोपोटामिया (उरुक, ~3500 ई.पू.) और मिस्र (~3100 ई.पू. एकीकृत राज्य) में नगरीकरण और राज्य पहले; (2) "पहली" से अधिक उपयुक्त "दक्षिण एशिया की पहली" और "समकालीन सभ्यताओं में सबसे विस्तृत"; (3) लिपि अपठित — राजनीतिक संगठन, धर्म के बारे में निष्कर्ष सीमित; (4) राजमहल, मंदिर, राजसी समाधियों का अभाव — "राज्य" की प्रकृति पर बहस (ग्रेगरी पोसेल — "faceless" सभ्यता; शासक-विहीन या व्यापारी-पुरोहित नेतृत्व?)।
  • निष्कर्ष — सिंधु सभ्यता दक्षिण एशिया की पहली नगरीय सभ्यता और विश्व की तीन प्राचीनतम सभ्यताओं में सबसे विस्तृत है; पर कालक्रम में "विश्व की पहली" नहीं।

हड़प्पा का समुद्री व्यापार (UPSC 2024)

  • मेसोपोटामियाई ग्रंथ — मेलुहा (सिंधु क्षेत्र), दिलमुन (बहरीन), मगन (ओमान); अक्कद के सरगोन (~2300 ई.पू.) का अभिलेख — मेलुहा, मगन, दिलमुन के जहाज़ अक्कद के घाट पर।
  • पुरातात्विक साक्ष्य — (1) लोथल (गुजरात — एस.आर. राव, 1955-60) — ईंटों का "गोदी-बाड़ा" (dockyard) — कुछ विद्वान इसे जलाशय मानते हैं; मनके-कारख़ाना, फ़ारस की खाड़ी की मुहर; (2) मेसोपोटामिया (उर, किश) में हड़प्पाई मुहरें, कार्नेलियन के उकेरे मनके; (3) फ़ारस की खाड़ी शैली की गोल मुहरें; (4) ओमान (रास अल-जिंज़) में हड़प्पाई मृद्भांड; (5) तटीय बंदरगाह — सुत्कागेन-डोर, सोत्का-कोह, बालाकोट, कुंतासी, धोलावीरा (कच्छ का रण — तब समुद्र से जुड़ा); (6) मोहनजोदड़ो की मुहर पर नाव का चित्र, लोथल से मिट्टी की नाव-आकृति।
  • वस्तुएँ — निर्यात: कार्नेलियन, लैपिस (अफ़ग़ानिस्तान से मध्यस्थ व्यापार), हाथीदाँत, सागौन, कपास, मोर; आयात: ताँबा (ओमान), टिन, चाँदी, ऊन।
  • पतन — ~1900 ई.पू. के बाद मेसोपोटामियाई ग्रंथों में मेलुहा का उल्लेख घटा — व्यापार-ह्रास भी नगरीय पतन का एक कारक।
  • आज — लोथल में राष्ट्रीय समुद्री विरासत परिसर (National Maritime Heritage Complex) का निर्माण।

राखीगढ़ी (UPSC 2024 Paper II, 2023 Paper I)

  • स्थिति — हिसार ज़िला, हरियाणा; घग्गर-दृषद्वती क्षेत्र; 7-11 टीले (RGR-1 से RGR-7 आदि); भारत में सबसे बड़ा हड़प्पा स्थल (क्षेत्रफल के अनुमान भिन्न — 350 हेक्टेयर तक)।
  • उत्खनन — अमरेंद्र नाथ (ASI, 1997-2000); वसंत शिंदे (डेक्कन कॉलेज, 2013 से); ASI (2021-22, 2022-23 में पुनः)।
  • साक्ष्य — प्रारंभिक से परिपक्व हड़प्पा तक निरंतर अनुक्रम (~5000 वर्ष पूर्व से पहले के स्तर); नियोजित सड़कें, नालियाँ, कच्ची-पक्की ईंटों के घर; मनके और शंख-शिल्प कार्यशालाएँ, आभूषण (सोना, कार्नेलियन), मुहरें; कब्रिस्तान (60+ समाधियाँ) — शव के साथ मृद्भांड, आभूषण; एक युगल-समाधि; अग्नि-वेदियाँ।
  • प्राचीन DNA (Shinde और साथी, Cell, 2019) — एक स्त्री कंकाल (I6113) का जीनोम: (1) स्टेपी (मध्य एशियाई) वंश का अभाव; (2) अनातोलियाई कृषक वंश का अभाव — अर्थात् कृषि केवल पश्चिम एशियाई प्रवासियों से नहीं आई; (3) "ईरानी-संबद्ध" शिकारी-संग्राहक और "प्राचीन पैतृक दक्षिण भारतीय (AASI)" वंश का मिश्रण — आधुनिक दक्षिण एशियाइयों का प्रमुख पूर्वज समूह।
  • महत्व — (1) सिंधु सभ्यता का पूर्वी विस्तार और सरस्वती क्षेत्र का महत्व; (2) स्थानीय कृषि-विकास; (3) दक्षिण एशियाई जनसंख्या इतिहास; (4) केंद्रीय बजट 2020 में "पाँच प्रतिष्ठित पुरातात्विक स्थलों" में शामिल, स्थल-संग्रहालय।
  • सीमाएँ/बहस — एक ही जीनोम (छोटा नमूना), DNA का क्षरण, निष्कर्षों की राजनीतिक व्याख्याएँ ("आर्य प्रवासन" बहस) — सावधानी आवश्यक।

7. लौह युग और महापाषाण

  • प्रारंभ — उत्तर भारत में चित्रित धूसर मृद्भांड (PGW) संस्कृति (~1200-600 ई.पू.) — अहिच्छत्र, अतरंजीखेड़ा, हस्तिनापुर (बी.बी. लाल); मल्हार और राजा नल का टीला (उ.प्र. — राकेश तिवारी) — ~1800-1500 ई.पू. के लौह साक्ष्य; दक्षिण में महापाषाण (megalithic) समाधियाँ — ब्रह्मगिरि, आदिचनल्लूर, पैयमपल्ली, जूनापानी, हल्लूर (~1000 ई.पू.)।
  • नवीन दावा — तमिलनाडु पुरातत्व विभाग की रिपोर्ट (जनवरी 2025) — सिवगलई (तूतुकुडी) के लौह की रेडियोमीट्रिक तिथि लगभग 3345 ई.पू. — विद्वानों में बहस जारी।
  • सांस्कृतिक प्रभाव (UPSC 2023) — (1) कृषि विस्तार — लौह कुल्हाड़ी और हल-फाल से गंगा के घने जंगलों की सफ़ाई, धान की खेती (डी.डी. कोसांबी, आर.एस. शर्मा — बहस: कुछ विद्वान अग्नि से सफ़ाई को प्रमुख मानते हैं); (2) अधिशेष और द्वितीय नगरीकरण (6ठी सदी ई.पू.) — NBPW, महाजनपद; (3) राज्य-निर्माण — लौह हथियार, सेना (मगध — लौह खदानें); (4) शिल्प-विशेषीकरण — लोहार जाति; (5) महापाषाण संस्कृति — सामाजिक श्रेणीकरण, पूर्वज-पूजा, आज भी खासी, मुंडा, गोंड में महापाषाण परंपरा (sasandiri — मुंडा पत्थर); (6) व्यापार — "वूट्ज़" इस्पात (दक्षिण भारत) — रोम तक प्रसिद्ध; (7) धार्मिक परिवर्तन — यज्ञ में पशुबलि के विरुद्ध बौद्ध-जैन विचार (कृषि हेतु पशु संरक्षण)।

8. भौतिक संस्कृति और पुरातत्व; नृजाति-पुरातत्व

  • भौतिक संस्कृति (Material culture) — मनुष्य द्वारा निर्मित और उपयोग की गई वस्तुएँ (उपकरण, बर्तन, घर, आभूषण) — पुरातत्व का प्राथमिक स्रोत; वस्तुएँ सामाजिक संबंधों, प्रस्थिति, विश्वासों का संकेत (इयान हॉडर — "symbolic and structural archaeology")।
  • नृजाति-पुरातत्व (Ethno-archaeology) — जीवित समुदायों के अध्ययन से प्राचीन अवशेषों की व्याख्या — लुईस बिनफ़ोर्ड (नुनामिउत इनुइट) "मध्य-स्तरीय सिद्धांत"; भारत में — के. पड्डय्या (हुंसगी), वी.एन. मिश्रा, गुर्जर पशुपालकों/कुम्हारों/मनके निर्माताओं (खंभात — केनोयर) का अध्ययन; बाघोर-I का "शक्ति-स्थल" — आज के कोल-बैगा "माई" पत्थर से तुलना।
  • भारत में जीवित प्रागैतिहासिक परंपराएँ — महापाषाण (खासी, मुंडा, गोंड), सूक्ष्मपाषाण जैसे उपकरण (कुछ शिकारी समूह), शैलचित्र परंपरा (सवरा "इडितल", वारली चित्रकला), झूम खेती।

9. Master Summary Table

कालसमय (लगभग)उपकरण/विशेषताप्रमुख स्थल
शिवालिक प्राइमेट1.8 करोड़-5 लाख वर्षशिवापिथेकस (= रामापिथेकस), गिगैंटोपिथेकसहरितालयंगर, पोटवार
निम्न पुरापाषाण~15 लाख-3.85 लाख वर्षओल्डोवान चॉपर, ऐश्यूलियन हस्त-कुठार, विदारणीअत्तिरमपक्कम, इसमपुर, पल्लवरम, सोहन, डीडवाना
मध्य पुरापाषाण~3.85 लाख-40 हज़ारफ़्लेक, लेवालुआ, नेवासियननेवासा, ज्वालापुरम
उच्च पुरापाषाण~40-10 हज़ारफलक, तक्षणी, हड्डी उपकरण, कलापटणे, बेलन, कुरनूल, बाघोर-I
मध्यपाषाण~12,000-4,000 वर्ष पूर्वसूक्ष्मपाषाण, संयुक्त उपकरण, समाधियाँबागोर, आदमगढ़, सराय नाहर राय, महदहा, भीमबेटका
नवपाषाण~7000 ई.पू. सेकृषि, पशुपालन, पॉलिशदार कुल्हाड़ीमेहरगढ़, बुर्ज़होम, चिरांद, उतनूर
ताम्रपाषाण~3000-1000 ई.पू.ताँबा, चित्रित मृद्भांडआहाड़, इनामगाँव, नवदाटोली
हड़प्पा~2600-1900 ई.पू. (परिपक्व)नगर-योजना, मुहरें, समुद्री व्यापारधोलावीरा, लोथल, राखीगढ़ी
लौह युग~1800/1200 ई.पू. सेPGW, महापाषाण, NBPWअतरंजीखेड़ा, मल्हार, आदिचनल्लूर

10. चार्ट: भारतीय प्रागितिहास का समय-पैमाना

निम्न पुरापाषाण~15 लाख – 3.85 लाख वर्ष मध्य पुरापाषाण~3.85 लाख–40 हज़ार उच्च पुरा40–10 हज़ार मध्यपाषाण12–4 हज़ार नवपाषाण7000 ई.पू. हड़प्पा2600 ई.पू. पैमाना रेखीय नहीं — हाल के कालों को विस्तार से दिखाया गया है अत्तिरमपक्कम, इसमपुर बागोर मेहरगढ़ राखीगढ़ी
भारतीय प्रागितिहास का सरलीकृत समय-पैमाना (तिथियाँ अनुमानित; क्षेत्र के अनुसार भिन्न)।

11. Mind Map

भारतीय सभ्यता का विकास
पुरा-मानवशास्त्र
  • शिवालिक, रामापिथेकस बहस
  • नर्मदा मानव
पुरापाषाण
  • ओल्डोवान, ऐश्यूलियन
  • अत्तिरमपक्कम, इसमपुर
  • पर्यावरण — वेदिकाएँ, पराग
मध्यपाषाण
  • सूक्ष्मपाषाण
  • बागोर, प्रतापगढ़ स्थल
  • लखुडियार, भीमबेटका कला
नवपाषाण-ताम्रपाषाण
  • मेहरगढ़
  • बुर्ज़होम, राख टीले
  • इनामगाँव
हड़प्पा + लौह
  • समुद्री व्यापार, लोथल
  • राखीगढ़ी aDNA
  • PGW, महापाषाण

12. महत्वपूर्ण One-liners

  • भारत में पहला पुरापाषाण उपकरण — रॉबर्ट ब्रूस फ़ुट, पल्लवरम, 30 मई 1863।
  • रामापिथेकस की खोज — जी.ई. लुईस, 1932 (हरितालयंगर); अब शिवापिथेकस की मादा — पिलबीम (GSP 15000)।
  • नर्मदा मानव — अरुण सोनकिया, 1982, हथनोरा।
  • अत्तिरमपक्कम ऐश्यूलियन — ~15 लाख वर्ष (शांति पप्पू, 2011)।
  • सोहन संस्कृति — डी टेरा और पैटरसन (1939)।
  • भीमबेटका — वी.एस. वाकणकर (1957), यूनेस्को धरोहर 2003।
  • भारत का सबसे बड़ा मध्यपाषाण स्थल — बागोर (वी.एन. मिश्रा)।
  • मेहरगढ़ उत्खनन — ज़ाँ-फ़्रांस्वा जारिज (1974-86); बोलन दर्रा।
  • लोथल गोदी-बाड़ा — एस.आर. राव; धोलावीरा यूनेस्को — 2021।
  • राखीगढ़ी aDNA (Cell, 2019) — स्टेपी और अनातोलियाई वंश अनुपस्थित।

13. टिप्स एवं ट्रिक्स

प्रागितिहास के उत्तर
  • हर उत्तर में भारत का मानचित्र बनाकर स्थल चिह्नित करें — यह 2-3 अतिरिक्त अंक दिला सकता है।
  • उपकरणों के सरल रेखाचित्र (हस्त-कुठार, विदारणी, सूक्ष्मपाषाण अर्धचंद्र) बनाएँ।
  • नवीनतम खोजें (अत्तिरमपक्कम 2018, राखीगढ़ी aDNA 2019, सिनौली 2018, सिवगलई 2025 दावा) अवश्य जोड़ें।
याद रखने की तरकीब

प्रतापगढ़ के तीन मध्यपाषाण स्थल — "सराय-महदहा-दमदमा = समाधि त्रिकोण"; व्यापार साथी — "मेलुहा = सिंधु, दिलमुन = बहरीन, मगन = ओमान"।

14. PYQ-आधारित प्रश्न एवं मॉडल उत्तर

Q1UPSC 2024 · Paper I · 2(b)

मेहरगढ़ के विशेष संदर्भ में खाद्य-उत्पादन और पशुओं के पालतूकरण के साक्ष्यों का वर्णन कीजिए। इसके महत्व पर प्रकाश डालिए।

मॉडल उत्तर (रूपरेखा)

भूमिका: मेहरगढ़ (बलूचिस्तान, बोलन दर्रा) — जारिज के फ़्रांसीसी दल द्वारा 1974-86 में उत्खनित; ~7000 ई.पू. से आरंभ, दक्षिण एशिया में कृषि का सबसे प्राचीन ज्ञात स्थल।

खाद्य-उत्पादन के साक्ष्य: छह-पंक्ति जौ (प्रमुख), इमर और आइनकॉर्न गेहूँ — कच्ची ईंटों में अनाज की छाप; कोठरियों वाले अन्नागार; बिटुमेन से जड़े सूक्ष्मपाषाण हँसिये; पीसने के पत्थर; बाद में कपास (5वीं सहस्राब्दी ई.पू.)।

पशुपालन: प्रारंभिक स्तरों में गज़ेल, हिरण, जंगली भैंस का शिकार; क्रमशः बकरी, भेड़ और ज़ेबू मवेशी का अनुपात बढ़ा; पशुओं के आकार में कमी (मीडो) — स्थानीय पालतूकरण, विशेषकर ज़ेबू का दक्षिण एशिया में स्वतंत्र पालतूकरण; समाधियों में बकरी के बच्चे।

अन्य: आयताकार कच्ची ईंटों के घर, समाधियाँ, दंत-चिकित्सा (ड्रिल), लैपिस और शंख का दूर-व्यापार, बाद में मृद्भांड और ताँबा।

महत्व: (1) कृषि का स्थानीय विकास; (2) हड़प्पा सभ्यता की ग्रामीण पृष्ठभूमि (मेहरगढ़ → नौशारो); (3) गॉर्डन चाइल्ड की "नवपाषाण क्रांति" का दक्षिण एशियाई उदाहरण; (4) स्थायी ग्राम-जीवन, शिल्प-विशेषीकरण और व्यापार की शुरुआत; (5) मानव स्वास्थ्य और आहार परिवर्तन के अध्ययन (दंत क्षय)।

निष्कर्ष: मेहरगढ़ ने यह सिद्ध किया कि भारतीय उपमहाद्वीप कृषि-क्रांति का केवल ग्राहक नहीं, बल्कि एक स्वतंत्र केंद्र भी था (आरेख: मेहरगढ़ की स्थिति का मानचित्र)।

Q2UPSC 2024 · Paper I · 4(b)

उपयुक्त चित्रों सहित भारतीय पुरापाषाण संस्कृतियों की ऐश्यूलियन और ओल्डोवान परंपराओं की विवेचना कीजिए।

मॉडल उत्तर (रूपरेखा)

भूमिका: निम्न पुरापाषाण की दो प्रमुख उपकरण परंपराएँ — ओल्डोवान (Mode 1) और ऐश्यूलियन (Mode 2)। भारत में पहले इन्हें "सोहन" और "मद्रासियन" कहकर अलग माना गया।

ओल्डोवान (चॉपर-चॉपिंग): कंकड़ पर कुछ प्रहार — एकमुखी चॉपर, द्विमुखी चॉपिंग टूल, फ़्लेक; भारत में सोहन घाटी, शिवालिक, बेलन के प्रारंभिक स्तर; रिवात और मसोल के प्राचीन दावे विवादित।

ऐश्यूलियन: द्विमुखी हस्त-कुठार (नाशपाती, अंडाकार, त्रिकोणाकार), विदारणी (सीधी धार), गँड़ासा; कठोर और मृदु हथौड़ा; क्वार्टज़ाइट; स्थल — अत्तिरमपक्कम (~15 लाख वर्ष), इसमपुर (~12 लाख वर्ष, उत्खनित कार्यशाला), हुंसगी-बैचबल, डीडवाना, भीमबेटका, नेवासा, पल्लवरम, सिंगी तालाव।

तुलना: तकनीक (सरल बनाम मानकीकृत द्विमुखी), निर्माता (प्रारंभिक होमो बनाम होमो इरेक्टस), संज्ञानात्मक क्षमता (योजना, सममिति)।

भारतीय विशेषताएँ: दोनों परंपराएँ कई स्थलों पर सह-अस्तित्व में — "सोहन बनाम मद्रासियन" विभाजन अस्वीकार; विदारणियों की प्रचुरता; Movius Line के पश्चिम।

चित्र: (1) चॉपर — एक ओर धार; (2) हस्त-कुठार — दोनों मुखों पर शल्कन; (3) विदारणी — चौड़ी सीधी धार।

निष्कर्ष: अत्तिरमपक्कम जैसे स्थलों ने भारत को एशिया में प्रारंभिक मानव-प्रसार के प्रमुख केंद्र के रूप में स्थापित किया है।

Q3UPSC 2023 · Paper I · 4(c)

भारत के विशेष संदर्भ में प्रमुख मध्यपाषाण स्थलों की पहचान कीजिए और उनकी टाइपो-तकनीकी विशेषताओं का वर्णन कीजिए।

मॉडल उत्तर (रूपरेखा)

भूमिका: मध्यपाषाण (~12,000-4,000 वर्ष पूर्व) — होलोसीन की गर्म जलवायु में सूक्ष्मपाषाण-आधारित संस्कृतियाँ।

प्रमुख स्थल (मानचित्र सहित): राजस्थान — बागोर, तिलवारा; गुजरात — लंघनाज; म.प्र. — आदमगढ़, भीमबेटका; उ.प्र. — सराय नाहर राय, महदहा, दमदमा, चोपानी मांडो; बंगाल — बीरभानपुर; दक्षिण — तमिलनाडु के टेरी स्थल, संगनकल्लु; ओडिशा, झारखंड के छोटानागपुर क्षेत्र।

टाइपोलॉजी: बैक्ड ब्लेड, बिंदु, अर्धचंद्र, त्रिभुज, समलंब, बेधक, स्क्रेपर, तक्षणी; अज्यामितीय (प्रारंभिक) और ज्यामितीय (उत्तर)।

तकनीक: फ़्लूटेड कोर से दबाव-शल्कन, अप्रत्यक्ष प्रहार, माइक्रोबुरिन तकनीक; कैल्सेडनी, चर्ट, एगेट; लकड़ी/हड्डी के हत्थे में जोड़कर संयुक्त उपकरण (तीर-कमान, हँसिया)।

अन्य सांस्कृतिक लक्षण: समाधियाँ, झोपड़ियाँ, पशुपालन (बागोर), शैलचित्र (भीमबेटका), हड्डी के आभूषण (महदहा)।

निष्कर्ष: सूक्ष्मपाषाण तकनीक ने कम कच्चे माल से अधिक कुशल उपकरण बनाए — यह बदलते पर्यावरण और छोटे शिकार के प्रति अनुकूलन था।

Q4UPSC 2023 · Paper II · 6(c)

"शिवालिक निक्षेप विविध नियोजीन जीवाश्म प्राइमेट दर्शाते हैं।" आलोचनात्मक परीक्षण कीजिए।

मॉडल उत्तर (रूपरेखा)

भूमिका: शिवालिक — हिमालय की तलहटी की नदी-जनित अवसादी परतें (मध्य-मायोसीन से प्लीस्टोसीन); एशिया में मायोसीन वानरों का सबसे समृद्ध अभिलेख।

प्रमुख प्राइमेट: (1) शिवापिथेकस (पिलग्रिम 1910) — बड़े, मोटे इनेमल वाले वानर; (2) रामापिथेकस (लुईस 1932) — अब शिवापिथेकस की मादा; (3) गिगैंटोपिथेकस/इंडोपिथेकस बिलासपुरेंसिस (1969) — विशाल वानर; (4) छोटे प्राइमेट — सिवालादापिस (adapiform), इंडराल्लोरिस (लोरिस-संबंधी); (5) बंदर — प्रेस्बाइटिस, मकाका जैसे बाद के रूप।

महत्व: वानरों का एशियाई विकिरण; ओरंगुटान वंश का उद्गम (GSP 15000); जलवायु परिवर्तन (C4 घास, ~80 लाख वर्ष पूर्व) से वानरों का ह्रास; "रामापिथेकस होमिनिड" परिकल्पना का निरसन।

आलोचनात्मक पक्ष: अधिकांश जीवाश्म दाँत और जबड़े — पोस्ट-क्रेनियल अवशेष कम; तिथि-निर्धारण (पैलियोमैग्नेटिक) की अनिश्चितताएँ; अनेक खोजें पाकिस्तान के पोटवार में — भारतीय शिवालिक में व्यवस्थित उत्खनन कम; जीवाश्म-तस्करी और संरक्षण की समस्याएँ।

निष्कर्ष: कथन सही है — शिवालिक नियोजीन प्राइमेट विविधता का विश्व-स्तरीय अभिलेख है, पर भारतीय भाग में अधिक व्यवस्थित शोध की आवश्यकता है।

Q5UPSC 2024 · Paper II · 3(a)

राखीगढ़ी से प्राप्त साक्ष्यों और हड़प्पा सभ्यता से उनके संबंधों का आलोचनात्मक वर्णन कीजिए।

मॉडल उत्तर (रूपरेखा)

भूमिका: राखीगढ़ी (हिसार, हरियाणा) — घग्गर-दृषद्वती क्षेत्र का विशाल बहु-टीला स्थल, भारत में सबसे बड़ा हड़प्पा स्थल।

साक्ष्य: (1) अनुक्रम — प्रारंभिक हड़प्पा (हाकरा) से परिपक्व हड़प्पा तक निरंतरता; (2) नगर-योजना — सड़कें, नालियाँ, ईंटों के घर, चबूतरे; (3) शिल्प — मनके (कार्नेलियन, स्टीटाइट), शंख-चूड़ियाँ, ताँबा, सोने के आभूषण, कार्यशालाएँ; (4) मुहरें और मुद्रांकन; (5) कब्रिस्तान — 60+ समाधियाँ, शवाधान के साथ बर्तन; (6) अग्नि-वेदियाँ; (7) प्राचीन DNA (2019) — स्टेपी और अनातोलियाई वंश का अभाव, ईरानी-संबद्ध + AASI वंश।

हड़प्पा सभ्यता से संबंध: (1) सिंधु सभ्यता का पूर्वी केंद्र — मोहनजोदड़ो/हड़प्पा जैसी योजना; (2) सरस्वती-घग्गर क्षेत्र में सबसे घनी बस्तियाँ — क्षेत्र का केंद्रीय महत्व; (3) स्थानीय विकास — मेहरगढ़-जैसी निरंतरता; (4) शिल्प और व्यापार नेटवर्क में भागीदारी; (5) जनसंख्या इतिहास — हड़प्पावासी आधुनिक दक्षिण एशियाइयों के प्रमुख पूर्वज।

आलोचनात्मक पक्ष: एक जीनोम से व्यापक निष्कर्ष; क्षेत्रफल के अनुमान टीलों को एक मानने पर निर्भर; अतिक्रमण और संरक्षण; DNA निष्कर्षों का राजनीतिकरण।

निष्कर्ष: राखीगढ़ी ने हड़प्पा सभ्यता को भारतीय भूभाग में गहराई से जड़ित, स्थानीय रूप से विकसित और आधुनिक जनसंख्या से जुड़ी सभ्यता के रूप में पुनर्परिभाषित किया है (मानचित्र: प्रमुख हड़प्पा स्थल)।

Q6UPSC 2024 · Paper II · 8(a)

उपयुक्त उदाहरणों सहित दक्षिण भारत के महत्वपूर्ण पुरापाषाण स्थलों का वर्णन कीजिए। दक्षिण भारतीय पुरापाषाण संस्कृतियों का क्या महत्व है?

मॉडल उत्तर (रूपरेखा)

स्थल: (1) पल्लवरम (फ़ुट, 1863 — भारतीय प्रागितिहास का आरंभ); (2) अत्तिरमपक्कम (कोर्टल्लयार घाटी — ~15 लाख वर्ष ऐश्यूलियन; 3.85 लाख वर्ष से मध्य पुरापाषाण); (3) गुडियम गुफा (तमिलनाडु — शैलाश्रय); (4) इसमपुर और हुंसगी-बैचबल घाटी (कर्नाटक — पड्डय्या; उत्खनित ऐश्यूलियन कार्यशाला, चूना-पत्थर कच्चा माल); (5) ज्वालापुरम (आंध्र — टोबा राख से पहले-बाद के उपकरण); (6) कुरनूल गुफाएँ (बिल्लासर्गम — उच्च पुरापाषाण हड्डी उपकरण, फ़ुट); (7) रेनिगुंटा, नागार्जुनकोंडा, गिद्दलूर; (8) केरल-तटीय टेरी (बाद के काल)।

महत्व: (1) एशिया के सबसे प्राचीन ऐश्यूलियन स्थलों में — होमो इरेक्टस का प्रारंभिक प्रसार; (2) मध्य पुरापाषाण का प्रारंभिक उदय (अत्तिरमपक्कम 2018) — आधुनिक मानव प्रवासन मॉडलों पर पुनर्विचार; (3) टोबा विस्फोट और मानव-अस्तित्व की बहस; (4) निम्न से उच्च पुरापाषाण तक लंबी निरंतरता; (5) कच्चे माल और भू-आकृति के साथ मानव-अनुकूलन (नृजाति-पुरातात्विक अध्ययन — पड्डय्या); (6) भारतीय प्रागितिहास की पद्धति (वैज्ञानिक तिथि-निर्धारण — कॉस्मोजेनिक न्यूक्लाइड, OSL) का विकास।

निष्कर्ष: दक्षिण भारत विश्व प्रागितिहास में "प्रारंभिक मानव-प्रसार का गलियारा" है — यहाँ के स्थल अफ़्रीका से बाहर मानव-यात्रा की कहानी के प्रमुख अध्याय हैं (मानचित्र आवश्यक)।

Q7UPSC 2023 · Paper II · 3(b)

क्या मध्यपाषाण संस्कृति स्थायी जीवन-शैली की ओर पहला कदम थी? उपयुक्त उदाहरणों सहित उत्तर दीजिए।

मॉडल उत्तर (रूपरेखा)

भूमिका: पुरापाषाण के घुमंतू शिकारी-संग्राहक और नवपाषाण के स्थायी कृषकों के बीच मध्यपाषाण एक संक्रमण काल है।

पक्ष में साक्ष्य: (1) झोपड़ी के फ़र्श और खंभे के गड्ढे — बागोर, चोपानी मांडो, महदहा; (2) औपचारिक कब्रिस्तान — सराय नाहर राय, दमदमा (40+ समाधियाँ), महदहा — क्षेत्र-स्वामित्व की भावना; (3) पशुपालन — बागोर (भेड़-बकरी), आदमगढ़; (4) जंगली चावल का संग्रह और पीसने के पत्थर — चोपानी मांडो; (5) प्रारंभिक मृद्भांड — चोपानी मांडो; (6) झील-आधारित संसाधन-समृद्ध पर्यावरण में अर्ध-स्थायी शिविर — "broad spectrum" अर्थव्यवस्था।

सीमाएँ: अधिकतर मौसमी गतिशीलता; खेती का प्रत्यक्ष प्रमाण कम; क्षेत्रीय विविधता — कई समूह (भीमबेटका) पूरी तरह शिकारी।

नृजाति-पुरातात्विक दृष्टि: आज के कुछ समुदाय (बिरहोर, चेंचू) भी मौसमी आधार-शिविर बनाते हैं — अर्ध-स्थायित्व का मॉडल।

निष्कर्ष: हाँ — मध्यपाषाण संस्कृति स्थायी जीवन की ओर "पहला कदम" थी; यह पूर्ण स्थायित्व नहीं, बल्कि उसकी पूर्व-शर्तें (संसाधन-आधारित बस्ती, पशुपालन, समाधि-स्थल) बनाती है।

Q8UPSC 2024 · Paper I · 1(b) · 10 अंक

हड़प्पा का समुद्री व्यापार — टिप्पणी लिखिए।

मॉडल उत्तर

स्रोत: मेसोपोटामियाई ग्रंथों में मेलुहा (सिंधु), दिलमुन (बहरीन), मगन (ओमान); सरगोन का अभिलेख (~2300 ई.पू.)।

पुरातात्विक साक्ष्य: लोथल का गोदी-बाड़ा और मनके कारख़ाना; उर-किश में हड़प्पाई मुहरें और उकेरे कार्नेलियन मनके; बहरीन में फ़ारस की खाड़ी शैली की मुहरें; ओमान (रास अल-जिंज़) में हड़प्पाई मृद्भांड; तटीय बंदरगाह — सुत्कागेन-डोर, सोत्का-कोह, बालाकोट, कुंतासी, धोलावीरा; मुहरों पर नाव के चित्र।

वस्तुएँ: निर्यात — कार्नेलियन, हाथीदाँत, लकड़ी, कपास; आयात — ताँबा, टिन, चाँदी।

महत्व: प्राचीन विश्व का प्रारंभिक "समुद्री नेटवर्क"; ~1900 ई.पू. के बाद ह्रास — नगरीय पतन से संबंध; आज लोथल में राष्ट्रीय समुद्री विरासत परिसर।

15. Quick Revision Summary

परीक्षा से पहले एक बार ज़रूर पढ़ें
  • पुरा-मानवशास्त्र — शिवालिक (शिवापिथेकस = रामापिथेकस, ओरंगुटान रेखा; गिगैंटोपिथेकस); नर्मदा मानव (1982)।
  • पुरापाषाण — फ़ुट 1863; ओल्डोवान/सोहन बनाम ऐश्यूलियन; अत्तिरमपक्कम, इसमपुर; पर्यावरण — वेदिकाएँ, पराग, टोबा।
  • मध्यपाषाण — सूक्ष्मपाषाण, बागोर, आदमगढ़, प्रतापगढ़ स्थल, भीमबेटका, लखुडियार; स्थायित्व की ओर पहला कदम।
  • नवपाषाण-ताम्रपाषाण — मेहरगढ़ (जौ, गेहूँ, ज़ेबू, दंत-चिकित्सा), बुर्ज़होम, राख टीले, इनामगाँव।
  • हड़प्पा — विस्तार, नगर-योजना, समुद्री व्यापार (मेलुहा, लोथल), राखीगढ़ी (aDNA 2019); "पहली" सभ्यता — आलोचनात्मक दृष्टि।
  • लौह युग — PGW, मल्हार, महापाषाण, सिवगलई दावा; कृषि विस्तार, द्वितीय नगरीकरण।