UPSC Mains · Geography · Paper II · अध्याय 7

भारत: भौतिक स्वरूप एवं संसाधन

India: Physical Setting and Resources

भौतिक प्रदेश, अपवाह तंत्र, मानसून तंत्र, मृदा, प्राकृतिक वनस्पति; खनिज, ऊर्जा और जल संसाधन; संसाधन संरक्षण।

Paper II 27 मिनट

1. अध्याय एक नज़र में

यह Paper II (भारत का भूगोल) के पहले दो खंडों का अध्याय है।

  • भौतिक विन्यास: पड़ोसी देशों से स्थानिक संबंध, संरचना और उच्चावच, अपवाह तंत्र और जलागम, भू-आकृतिक प्रदेश, मानसून की क्रियाविधि और वर्षा के प्रतिरूप, उष्णकटिबंधीय चक्रवात और पश्चिमी विक्षोभ, बाढ़ और सूखा, जलवायु प्रदेश, प्राकृतिक वनस्पति, मृदाएँ।
  • संसाधन: भूमि, सतही और भू-जल, ऊर्जा, खनिज, जैविक और समुद्री संसाधन, वन और वन्यजीव तथा उनका संरक्षण।

2025 में करेवा, हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्र और फ़सल-प्रतिरूप, प्रवाल भित्तियाँ, पूर्वी घाट का भूमि-उपयोग और जलागम पूछे गए। 2024 में शिवालिक का निर्माण, हिमनद, उच्च वर्षा के क्षेत्र, गिद्ध प्रजनन केंद्र और "कैच द रेन" अभियान आए। हर वर्ष Paper II का पहला प्रश्न मानचित्र पर स्थान-चिह्नांकन होता है (10 स्थान, प्रत्येक के 2 अंक); इसकी सत्यापित सूची नीचे दी गई है।

भूगोल: भारत का भौतिक पर्यावरण इन्फ़ोग्राफ़िक
भारत का भौतिक पर्यावरण: अवस्थिति, संरचना, भू-आकृतिक विभाग, अपवाह, जलवायु और प्राकृतिक वनस्पति (NCERT आधारित infographic)।

2. अवस्थिति, संरचना और भू-आकृतिक विभाग

  • अवस्थिति: मुख्य भूमि का अक्षांशीय विस्तार 8°4' उत्तर से 37°6' उत्तर और देशांतरीय विस्तार 68°7' पूर्व से 97°25' पूर्व तक है। कर्क रेखा भारत को लगभग दो बराबर भागों में बाँटती है। मानक याम्योत्तर 82°30' पूर्व है (मिर्ज़ापुर के पास)। भारत की स्थल-सीमा लगभग 15,200 किमी और मुख्य भूमि की तट-रेखा लगभग 6,100 किमी है।
  • पड़ोसी देशों से स्थानिक संबंध: भारत की सीमा सात देशों से लगती है: पाकिस्तान, अफ़ग़ानिस्तान (PoK के माध्यम से), चीन, नेपाल, भूटान, म्यांमार और बांग्लादेश। श्रीलंका और मालदीव समुद्री पड़ोसी हैं। हिंद महासागर में भारत की केंद्रीय स्थिति सामरिक लाभ देती है।
  • संरचना: तीन प्रमुख भाग हैं: (1) प्रायद्वीपीय खंड, जो प्राचीन गोंडवाना का भाग है और आर्कियन चट्टानों से बना स्थिर क्षेत्र है; (2) हिमालय और अन्य तृतीयक (Tertiary) पर्वत, जो युवा और वलित हैं; (3) सिंधु-गंगा-ब्रह्मपुत्र का मैदान, जो जलोढ़ से भरा अग्र-गर्त (foredeep) है।
  • भू-आकृतिक विभाग: (1) उत्तरी पर्वत, (2) उत्तरी मैदान, (3) प्रायद्वीपीय पठार, (4) भारतीय मरुस्थल, (5) तटीय मैदान, (6) द्वीप समूह।
भूगोल: भारत के पर्वत इन्फ़ोग्राफ़िक
भारत के पर्वत: हिमालय की श्रेणियाँ, प्रायद्वीपीय पर्वत, पश्चिमी और पूर्वी घाट (NCERT आधारित infographic)।

हिमालय: अनुदैर्ध्य विभाजन

श्रेणीऔसत ऊँचाईविशेषताएँ
ट्रांस-हिमालयलगभग 6,000 मीटरकाराकोरम, लद्दाख, ज़ास्कर, कैलाश श्रेणियाँ; K2 (गॉडविन ऑस्टिन, 8,611 मीटर, PoK-चीन सीमा क्षेत्र में)
वृहद हिमालय (हिमाद्रि)लगभग 6,000 मीटरसबसे ऊँचे शिखर (कंचनजंगा 8,586 मीटर, भारत में सबसे ऊँचा); ग्रेनाइट कोर; हिमनद
लघु हिमालय (हिमाचल)3,700-4,500 मीटरपीर पंजाल, धौलाधार, महाभारत श्रेणी; पर्वतीय नगर (शिमला, मसूरी, नैनीताल); कश्मीर घाटी, कांगड़ा, कुल्लू घाटियाँ
शिवालिक (बाह्य हिमालय)900-1,100 मीटरचौड़ाई 10-50 किमी; दून घाटियाँ; असंपिंडित अवसाद
  • प्रमुख भ्रंश (उत्तर से दक्षिण): सिंधु-सांगपो सीवन क्षेत्र (ISZ), मुख्य केंद्रीय क्षेप (MCT), मुख्य सीमा क्षेप (MBT) और हिमालयी अग्र क्षेप (HFT, जिसे मुख्य अग्र क्षेप भी कहते हैं)।
  • प्रादेशिक विभाजन (सिडनी बुरार्ड): पंजाब हिमालय (सिंधु से सतलुज), कुमाऊँ हिमालय (सतलुज से काली), नेपाल हिमालय (काली से तीस्ता) और असम हिमालय (तीस्ता से दिहांग)।
  • पूर्वांचल: पटकाई, नागा, मिज़ो (लुशाई) पहाड़ियाँ।

शिवालिक का निर्माण (UPSC 2024)

  • उत्पत्ति: वृहद और लघु हिमालय के उत्थान के साथ नदियों ने भारी मात्रा में अवसाद (बजरी, गोलाश्म, बालू, मृत्तिका) दक्षिण की ओर बने अग्र-गर्त में जमा किया। बाद में हिमालय के उत्थान के अंतिम चरण में ये अवसाद स्वयं वलित और उत्थित होकर शिवालिक श्रेणी बन गए। समय-काल मध्य-मायोसीन से प्रारंभिक प्लीस्टोसीन तक है (लगभग 2 करोड़ से 20 लाख वर्ष पूर्व)।
  • प्रमाण: शिवालिक "समूह" के तीन भाग हैं (निम्न, मध्य, ऊपरी शिवालिक), जिनमें नीचे से ऊपर अवसाद मोटे होते जाते हैं, जो उत्थान के बढ़ने का संकेत है। इनमें समृद्ध कशेरुकी जीवाश्म मिलते हैं (हाथी-वंश, घोड़े, जिराफ़, और कपि-जीवाश्म जैसे शिवापिथेकस)।
  • भू-आकृतियाँ: उत्तर में MBT और दक्षिण में HFT से सीमित। शिवालिक और लघु हिमालय के बीच अनुदैर्ध्य "दून" घाटियाँ हैं: देहरादून, पाटली दून, कोटली दून। पंजाब और हिमाचल के होशियारपुर-ऊना क्षेत्र में अपरदन-जनित मौसमी धाराएँ "चो" कहलाती हैं। अरुणाचल में इन्हें डफ़ला, मिरी, अबोर और मिश्मी पहाड़ियाँ कहा जाता है।
  • समस्याएँ: असंपिंडित चट्टानें, वनोन्मूलन और खनन से तीव्र अपरदन और भू-स्खलन होते हैं; भूकंप-संवेदनशील HFT भी यहीं है।

करेवा (UPSC 2025)

  • अर्थ: कश्मीर घाटी में पीर पंजाल श्रेणी की ढलानों के साथ मिलने वाले प्लीस्टोसीन काल के झील-जनित (lacustrine) और हिमनद-नदीय निक्षेपों के सपाट-शीर्ष वाले पठारी टीले। स्थानीय रूप से इन्हें "वुडर" कहा जाता है।
  • उत्पत्ति: पीर पंजाल के उत्थान से झेलम का प्रवाह अवरुद्ध हुआ और घाटी में एक विशाल झील (करेवा झील) बनी। उसमें मृत्तिका, बालू, गाद और हिमनद-जनित अवसाद जमा हुए। बाद में बारामूला गॉर्ज के कटने से झील का जल निकल गया और निक्षेप करेवा के रूप में बचे रह गए।
  • महत्व: केसर की खेती (पंपोर), बादाम, अखरोट और सेब के बाग; जीवाश्म और पुरा-जलवायु अभिलेख; पुरातत्व (बुर्ज़होम जैसे नवपाषाण स्थल)।
  • ख़तरे: निर्माण कार्यों (सड़क, रेल) के लिए मिट्टी का खनन, नगरीकरण, और केसर-क्षेत्र का सिकुड़ना।

पूर्वी घाट और उसका भूमि-उपयोग (UPSC 2025)

  • संरचना: असंतत, नीची और प्राचीन श्रेणी, जिसे महानदी, गोदावरी, कृष्णा और कावेरी नदियों ने काटकर अलग-अलग पहाड़ियों में बाँट दिया है। इसमें ओडिशा और आंध्र प्रदेश की पहाड़ियाँ, नल्लामलाई, वेलिकोंडा, पालकोंडा, जावडी, शेवरॉय और नीलगिरि से मिलन शामिल हैं। यह पश्चिमी घाट से कम ऊँची और कम आर्द्र है।
  • भूमि-उपयोग:
    • वन: साल, सागौन और आर्द्र तथा शुष्क पर्णपाती वन।
    • स्थानांतरी कृषि: कोंध, सौरा, गदबा और अन्य जनजातियाँ "पोडु" कृषि करती हैं।
    • सीढ़ीदार खेत: मोटे अनाज और रागी।
    • बागान: अराकू घाटी (आंध्र प्रदेश) में कॉफ़ी।
    • खनन: बॉक्साइट (ओडिशा के कोरापुट और पंचपटमाली, नियमगिरि); 2013 में सर्वोच्च न्यायालय के आदेश पर हुई ग्राम सभाओं ने नियमगिरि में वेदांता की खनन परियोजना को अस्वीकार किया।
    • जलाशय और जलविद्युत: मचकुंड, बालिमेला।
    • संरक्षित क्षेत्र: सिमलीपाल (ओडिशा) और नागार्जुनसागर-श्रीशैलम (आंध्र प्रदेश-तेलंगाना)।
  • समस्याएँ: वनोन्मूलन, खनन से विस्थापन, मृदा अपरदन, पोडु के चक्र का छोटा होना, और जैव-विविधता का क्षरण। पश्चिमी घाट की तुलना में संरक्षण पर ध्यान कम रहा है।
  • सुधार: वन अधिकार अधिनियम (2006), PESA, सामुदायिक वन प्रबंधन, जलागम विकास, और सतत खनन।

3. अपवाह तंत्र, हिमनद और जलागम

भूगोल: भारत की नदियाँ इन्फ़ोग्राफ़िक
भारत की नदियाँ: हिमालयी और प्रायद्वीपीय अपवाह तंत्र, प्रमुख नदी-बेसिन और अपवाह प्रतिरूप (NCERT आधारित infographic)।
आधारहिमालयी नदियाँप्रायद्वीपीय नदियाँ
प्रवाहबारहमासी (हिमनद और वर्षा से जल)मौसमी (वर्षा पर निर्भर)
घाटीगहरे गॉर्ज, V-आकार; पूर्ववर्ती (antecedent) नदियाँचौड़ी, उथली, परिपक्व घाटियाँ
मार्गविसर्प, मार्ग-परिवर्तन (कोसी)स्थिर, कठोर चट्टानों से नियंत्रित
मुहानाविशाल डेल्टा (गंगा-ब्रह्मपुत्र)पूर्व में डेल्टा; पश्चिम (नर्मदा, तापी) में ज्वारनदमुख (estuary)
  • अपवाह प्रतिरूप: वृक्षाकार (गंगा मैदान), अरीय (अमरकंटक, जहाँ से नर्मदा, सोन और महानदी निकलती हैं), जालीनुमा (सिंहभूम), अभिकेंद्री (लोकटक झील) और पूर्ववर्ती (सिंधु, सतलुज, ब्रह्मपुत्र, जो हिमालय से भी पुरानी हैं)।
  • नदी-जोड़ परियोजना: केन-बेतवा लिंक परियोजना पहली परियोजना है, जिसकी आधारशिला दिसंबर 2024 में रखी गई। इस परियोजना पर पन्ना बाघ अभयारण्य के आंशिक डूबने का पर्यावरणीय विवाद है।

हिमनद (UPSC 2024)

  • भारतीय हिमालय में: GSI के अनुसार भारतीय हिमालय में लगभग 9,500 से अधिक हिमनद हैं। प्रमुख हिमनद: सियाचिन (काराकोरम, लगभग 76 किमी; विश्व का सबसे ऊँचा युद्धक्षेत्र), गंगोत्री (उत्तराखंड, लगभग 30 किमी; भागीरथी का स्रोत गोमुख), ज़ेमू (सिक्किम; कंचनजंगा क्षेत्र), मिलम और पिंडारी (कुमाऊँ)।
  • प्रकार: घाटी हिमनद, सर्क (cirque) हिमनद, लटकते (hanging) हिमनद, पर्वतपादीय (piedmont) हिमनद।
  • महत्व: इन्हें "एशिया का जल-स्तंभ" या "तीसरा ध्रुव" कहा जाता है। ये गंगा, सिंधु और ब्रह्मपुत्र को बारहमासी बनाते हैं। इनसे जलविद्युत, सिंचाई, पेयजल और पर्यटन जुड़े हैं।
  • पीछे हटना (retreat): तापमान वृद्धि और ब्लैक कार्बन के कारण हिमनद लगातार पीछे हट रहे हैं। इससे अल्पकाल में जल-प्रवाह बढ़ता है, पर दीर्घकाल में संकट आता है ("पीक वॉटर")।
  • GLOF (हिमनद झील विस्फोट बाढ़): अक्टूबर 2023 में सिक्किम की दक्षिण ल्होनक झील के फटने से तीस्ता में आई बाढ़ ने चुंगथांग में तीस्ता-III बाँध को तोड़ दिया। फ़रवरी 2021 की चमोली (ऋषिगंगा) आपदा भी उल्लेखनीय है। NDMA के GLOF दिशानिर्देश (2020) और संवेदनशील झीलों की पहचान इसके उत्तर हैं।
  • अध्ययन संस्थान: वाडिया हिमालय भूविज्ञान संस्थान (देहरादून) और राष्ट्रीय ध्रुवीय एवं समुद्री अनुसंधान केंद्र (NCPOR, गोवा), जिसका हिमांश केंद्र चंद्रा बेसिन (हिमाचल) में है।

जलागम प्रबंधन (UPSC 2025)

  • अर्थ: जलागम (watershed) वह भू-क्षेत्र है जिसका पूरा जल एक ही बिंदु (नदी, नाला, झील) की ओर बहता है। इसका आकार लघु जलागम से लेकर नदी-बेसिन तक हो सकता है।
  • प्रबंधन के घटक: "शिखर से घाटी तक" (ridge to valley) उपागम; मृदा और जल संरक्षण (समोच्च बाँध, चेक-डैम, खेत-तालाब); वनीकरण; फ़सल-प्रतिरूप; चराई-नियंत्रण; सामुदायिक सहभागिता; आजीविका।
  • सफल उदाहरण: रालेगण सिद्धि (अण्णा हज़ारे) और हिवरे बाज़ार (पोपटराव पवार), दोनों महाराष्ट्र में; सुखोमाजरी (हरियाणा, जहाँ 1970-80 के दशक में सहभागी जलागम प्रबंधन का प्रारंभिक मॉडल बना); झाबुआ (मध्य प्रदेश)।
  • सरकारी कार्यक्रम: सूखा-प्रवण क्षेत्र कार्यक्रम (DPAP, 1973), मरुस्थल विकास कार्यक्रम (DDP), एकीकृत जलागम प्रबंधन कार्यक्रम (IWMP, 2009), और PMKSY का जलागम विकास घटक (WDC-PMKSY 2.0)।

"कैच द रेन" अभियान (UPSC 2024)

  • शुरुआत: जल शक्ति मंत्रालय ने 2019 में जल शक्ति अभियान शुरू किया। इसके "जल शक्ति अभियान: कैच द रेन" संस्करण की शुरुआत प्रधानमंत्री ने 22 मार्च 2021 (विश्व जल दिवस) को की। इसका नारा है: "वर्षा जहाँ गिरे, जब गिरे, उसे वहीं संग्रहित करें।"
  • घटक: वर्षा-जल संचयन संरचनाएँ, पारंपरिक जल-स्रोतों और तालाबों का पुनरुद्धार, बोरवेल पुनर्भरण, जलागम विकास, सघन वनीकरण, हर ज़िले में "जल शक्ति केंद्र", और जल-स्रोतों की जियो-टैगिंग तथा गणना।
  • संबंधित पहल: मिशन अमृत सरोवर (2022, हर ज़िले में 75 सरोवर), अटल भू-जल योजना और MGNREGA के जल-कार्य। 2024 का विषय "नारी शक्ति से जल शक्ति" था।
  • मूल्यांकन: अभियान ने जन-जागरूकता और संरचनाओं की संख्या बढ़ाई, पर रखरखाव, गुणवत्ता, वैज्ञानिक स्थल-चयन और परिणामों (भू-जल स्तर) की निगरानी अभी चुनौतियाँ हैं।

4. मानसून, वर्षा, चक्रवात और जलवायु प्रदेश

भूगोल: भारतीय मानसून इन्फ़ोग्राफ़िक
भारतीय मानसून: क्रियाविधि, आगमन और वापसी, वर्षा का वितरण, एल नीनो और हिंद महासागर द्विध्रुव (NCERT आधारित infographic)।
  • मानसून की क्रियाविधि:
    • तापीय संकल्पना: स्थल और जल का विभेदी तापन।
    • ITCZ का उत्तर की ओर खिसकना: जुलाई में इससे गंगा मैदान के ऊपर मानसून द्रोणी बनती है।
    • तिब्बत पठार का तापन: ऊपरी वायुमंडल में उच्च दाब और उष्णकटिबंधीय पूर्वी जेट-धारा।
    • उपोष्ण पश्चिमी जेट-धारा का उत्तर की ओर हटना: यह मानसून के "विस्फोट" (burst) से जुड़ा है।
    • दूरस्थ संबंध (teleconnections): एल नीनो (कमज़ोर मानसून), ला नीना, हिंद महासागर द्विध्रुव (धनात्मक IOD अनुकूल) और MJO।
  • आगमन और वापसी: मानसून सामान्यतः 1 जून के आसपास केरल पहुँचता है और लगभग 8 जुलाई तक पूरे देश को ढक लेता है। उत्तर-पश्चिम भारत से वापसी की नई सामान्य तिथि लगभग 17 सितंबर है। लौटते मानसून और उत्तर-पूर्वी मानसून (अक्टूबर-दिसंबर) से तमिलनाडु में वर्षा होती है।
  • विराम (break): मानसून द्रोणी के हिमालय की तलहटी की ओर खिसकने से मैदानों में शुष्क अवधि आती है, जबकि हिमालय और पूर्वोत्तर में भारी वर्षा होती है।
  • पश्चिमी विक्षोभ: भूमध्यसागर से आने वाले शीतोष्ण चक्रवात शीत ऋतु में पश्चिमी हिमालय में हिमपात और पंजाब-हरियाणा में वर्षा लाते हैं, जो रबी (गेहूँ) के लिए उपयोगी है।
  • उष्णकटिबंधीय चक्रवात: बंगाल की खाड़ी में अरब सागर से अधिक चक्रवात बनते हैं, पर हाल के वर्षों में अरब सागर में चक्रवात बढ़े हैं (2019 में क्यार, 2021 में ताउते, 2023 में बिपरजॉय)। ओडिशा का 1999 का सुपर चक्रवात और 2019 का फ़ानी उल्लेखनीय हैं; ओडिशा का "शून्य मृत्यु" आपदा प्रबंधन मॉडल प्रसिद्ध है।

उच्च वर्षा के क्षेत्र (UPSC 2024)

  • क्षेत्र: पश्चिमी घाट का पवनाभिमुख ढाल (कोंकण, मालाबार; आगुम्बे, महाबलेश्वर), पूर्वोत्तर भारत (मेघालय की खासी और जयंतिया पहाड़ियाँ: मौसिनराम और सोहरा यानी चेरापूंजी, जहाँ वार्षिक औसत 11,000 मिमी से अधिक है), हिमालय की तलहटी (उप-हिमालयी पश्चिम बंगाल, असम, अरुणाचल) और अंडमान-निकोबार। इन क्षेत्रों में 200 सेमी से अधिक वर्षा होती है।
  • कारण:
    • पर्वतीय (orographic) वर्षा: आर्द्र दक्षिण-पश्चिम मानसूनी पवनें पश्चिमी घाट और खासी पहाड़ियों से टकराकर ऊपर उठती हैं।
    • कीप-आकार (funnel) की स्थलाकृति: मौसिनराम के दक्षिण में बांग्लादेश के मैदान से आती पवनें पहाड़ियों की घाटियों में संकुचित होकर तेज़ी से उठती हैं।
    • बंगाल की खाड़ी की शाखा: यह सीधे पूर्वोत्तर की पहाड़ियों से टकराती है।
    • मानसून द्रोणी और "विराम": विराम के दौरान वर्षा हिमालय की तलहटी में केंद्रित होती है।
    • समुद्र की निकटता और चक्रवात: अंडमान-निकोबार में।
  • विरोधाभास: पवनाविमुख (वृष्टि-छाया) क्षेत्रों जैसे दक्कन का भीतरी भाग, लद्दाख और शिलांग में वर्षा बहुत कम होती है।
  • प्रभाव: उष्णकटिबंधीय सदाबहार वन, जैव-विविधता हॉटस्पॉट, जलविद्युत क्षमता, बागान (चाय, कॉफ़ी, रबर, मसाले), और साथ में भू-स्खलन, बाढ़ तथा मृदा का निक्षालन (लैटेराइट मृदा)।
  • बाढ़ और सूखा: बाढ़-प्रवण क्षेत्र हैं ब्रह्मपुत्र, गंगा (बिहार की कोसी को "बिहार का शोक" कहा जाता है) और तटीय डेल्टा। राष्ट्रीय बाढ़ आयोग (1980) ने लगभग 4 करोड़ हेक्टेयर भूमि को बाढ़-प्रवण माना था। सूखा-प्रवण क्षेत्र हैं पश्चिमी राजस्थान, कच्छ, दक्कन का वृष्टि-छाया क्षेत्र और बुंदेलखंड।
  • जलवायु प्रदेश: कोपेन और ट्रेवार्था के वर्गीकरण के अनुसार भारत में ये प्रदेश हैं: Amw (कोंकण-मालाबार), As (कोरोमंडल), Aw (अधिकांश प्रायद्वीप), BShw (अर्ध-शुष्क), BWhw (थार), Cwg (गंगा मैदान), Dfc (सिक्किम-अरुणाचल) और E (उच्च हिमालय)।

5. वनस्पति, मृदा, जैव और समुद्री संसाधन

भूगोल: भारत के वन इन्फ़ोग्राफ़िक
भारत के वन: प्राकृतिक वनस्पति के प्रकार, वितरण, वन आवरण और संरक्षण (NCERT आधारित infographic)।
  • वनों के प्रकार: उष्णकटिबंधीय सदाबहार (पश्चिमी घाट, पूर्वोत्तर, अंडमान), आर्द्र पर्णपाती (साल, सागौन), शुष्क पर्णपाती, कँटीले वन (थार), पर्वतीय वन (चीड़, देवदार, बुरांश) और मैंग्रोव (सुंदरबन, जहाँ सुंदरी वृक्ष मिलता है; भितरकनिका)।
  • वन आवरण: भारत वन स्थिति रिपोर्ट (ISFR) 2023 के अनुसार वन और वृक्ष आवरण भौगोलिक क्षेत्र का 25.17% है (वन आवरण 21.76% और वृक्ष आवरण 3.41%)। राष्ट्रीय वन नीति (1988) का लक्ष्य 33% है।
  • मृदाएँ (ICAR): जलोढ़ (खादर और बांगर), काली या रेगुर (दक्कन ट्रैप; उच्च जलधारण क्षमता; कपास), लाल और पीली, लैटेराइट (निक्षालन; काजू), शुष्क, लवणीय और क्षारीय (रेह, कल्लर), पीटमय (केरल, सुंदरबन) और वन मृदाएँ।
  • वन्यजीव संरक्षण: वन्यजीव संरक्षण अधिनियम (1972), प्रोजेक्ट टाइगर (1973; 2022 की गणना में 3,682 बाघ), प्रोजेक्ट एलिफ़ेंट (1992), बायोस्फ़ीयर रिज़र्व, रामसर स्थल (90 से अधिक), और प्रोजेक्ट चीता (2022, कूनो)।

गिद्ध प्रजनन केंद्र (UPSC 2024)

  • संकट: 1990 के दशक से जिप्स (Gyps) प्रजातियों, यानी सफ़ेद पीठ वाले, लंबी चोंच वाले और पतली चोंच वाले गिद्धों की संख्या में 90% से अधिक की गिरावट आई। मुख्य कारण पशुओं के उपचार में प्रयुक्त डाइक्लोफ़ेनाक दवा थी: मृत पशुओं का मांस खाने से गिद्धों के गुर्दे नष्ट हो जाते थे।
  • प्रजनन केंद्र: पहला जटायु संरक्षण प्रजनन केंद्र पिंजौर (हरियाणा) में है, जो हरियाणा वन विभाग और बॉम्बे नेचुरल हिस्ट्री सोसाइटी (BNHS) का संयुक्त प्रयास है। BNHS के अन्य प्रमुख केंद्र राजाभातखावा (पश्चिम बंगाल), रानी (असम) और भोपाल (मध्य प्रदेश) में हैं। कुछ राज्यों ने अपने केंद्र भी स्थापित किए हैं। कैद में प्रजनन के बाद पक्षियों को "गिद्ध सुरक्षित क्षेत्रों" में मुक्त किया जाता है।
  • नीति: 2006 में पशु-चिकित्सा में डाइक्लोफ़ेनाक पर प्रतिबंध लगा, और बाद में ऐसी कुछ अन्य हानिकारक पशु-दवाओं (जैसे केटोप्रोफ़ेन और एसिक्लोफ़ेनाक) पर भी। गिद्ध संरक्षण कार्य योजना 2020-25 लागू है। SAVE (Saving Asia's Vultures from Extinction) संघ भी इस दिशा में काम करता है।
  • पारिस्थितिक महत्व: गिद्ध "प्रकृति के सफ़ाईकर्मी" हैं। उनकी कमी से आवारा कुत्तों की संख्या बढ़ी, रेबीज़ के मामले बढ़े, और पारसी समुदाय की "टावर ऑफ़ साइलेंस" जैसी पारंपरिक अंतिम संस्कार प्रथा पर भी प्रभाव पड़ा।

प्रवाल भित्तियाँ (UPSC 2025)

  • भारत में वितरण:
    • मन्नार की खाड़ी: तटीय भित्तियाँ और 21 प्रवाल द्वीप; मन्नार की खाड़ी समुद्री राष्ट्रीय उद्यान (1986) और बायोस्फ़ीयर रिज़र्व (1989)।
    • कच्छ की खाड़ी: समुद्री राष्ट्रीय उद्यान (1982); अत्यधिक लवणता और ज्वारीय परास वाली कठोर परिस्थितियाँ।
    • लक्षद्वीप: एटॉल (वलयाकार प्रवाल द्वीप)।
    • अंडमान-निकोबार: तटीय और अवरोधक भित्तियाँ; सबसे समृद्ध जैव-विविधता।
    • मालवण (महाराष्ट्र): बिखरी हुई (patchy) भित्तियाँ।
  • महत्व: "समुद्र के वर्षावन"; मत्स्य-प्रजनन स्थल; तटीय सुरक्षा (2004 की सुनामी में भित्तियों ने तटों को आंशिक सुरक्षा दी); पर्यटन; औषधियाँ।
  • ख़तरे: समुद्री तापमान बढ़ने से विरंजन (2024 के वैश्विक विरंजन का प्रभाव लक्षद्वीप और मन्नार में भी पड़ा), अम्लीकरण, अवसादन, प्रवाल-खनन (ऐतिहासिक रूप से चूने के लिए), विनाशकारी मत्स्यन, प्रदूषण और पर्यटन का दबाव।
  • संरक्षण: वन्यजीव संरक्षण अधिनियम की अनुसूची I में प्रवालों की सुरक्षा, तटीय विनियमन क्षेत्र (CRZ) अधिसूचना, समुद्री संरक्षित क्षेत्र, ZSI और NCCR द्वारा निगरानी, और प्रवाल-पुनर्स्थापन (मन्नार में कृत्रिम भित्तियाँ)।
  • समुद्री संसाधन: भारत का अनन्य आर्थिक क्षेत्र (EEZ) लगभग 20 लाख वर्ग किमी है। इसमें मत्स्य, बॉम्बे हाई (तेल), केरल और ओडिशा की तटीय बालू में मोनाज़ाइट (थोरियम) और इल्मेनाइट, और मध्य हिंद महासागर द्रोणी में बहुधात्विक पिंड शामिल हैं।

6. हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्र और फ़सल-प्रतिरूप (UPSC 2025)

  • ऊँचाई के अनुसार क्षेत्रीकरण:
    • घाटियाँ और तराई (1,000 मीटर से कम): धान, गेहूँ, गन्ना।
    • मध्य ढाल (1,000-2,500 मीटर): सीढ़ीदार खेतों में मक्का, मंडुआ (रागी), झंगोरा जैसे मोटे अनाज, दालें, आलू; बागवानी (हिमाचल और जम्मू-कश्मीर में सेब)।
    • ऊँचे क्षेत्र (2,500 मीटर से अधिक): जौ, फाफर (कुट्टू), ऋतु-प्रवास (transhumance) आधारित पशुचारण, जैसे गद्दी, बकरवाल और भोटिया समुदाय।
    • ठंडा मरुस्थल (लद्दाख, स्पीति): जौ, मटर, खुबानी; कृत्रिम हिमनद या "बर्फ़ स्तूप" (सोनम वांगचुक)।
  • पूर्वोत्तर हिमालय: झूम कृषि; अपातानी जनजाति की ज़ीरो घाटी (अरुणाचल) में धान के साथ मछली-पालन की आर्द्र कृषि; नागालैंड के किकरुमा गाँव की "ज़ाबो" प्रणाली (वन, कृषि, पशुपालन और जल-संरक्षण का समन्वय); सिक्किम में पूर्ण जैविक खेती (2016 में पहला पूर्ण जैविक राज्य) और बड़ी इलायची।
  • पारिस्थितिक कारक: तीव्र ढलान, पतली मृदा, कम तापमान और छोटा कृषि-मौसम, सिंचाई के लिए "कूल" और "गूल" जैसी पारंपरिक नहरें, और वन से कृषि को मिलने वाला चारा और पत्तियों की खाद।
  • चुनौतियाँ: जलवायु परिवर्तन (सेब-पट्टी का ऊपर की ओर खिसकना; बर्फ़ की कमी), बंदर और जंगली सूअर से फ़सल-हानि, पलायन से "भूतहा गाँव" (उत्तराखंड), भू-स्खलन, बाज़ार से दूरी, और खंडित जोतें।
  • समाधान: जलवायु-अनुकूल किस्में, बागवानी और पुष्प-कृषि, जैविक प्रमाणन, मूल्य-शृंखला (भौगोलिक संकेतक, जैसे दार्जिलिंग चाय और कश्मीरी केसर), सूक्ष्म-सिंचाई, कृषि-वानिकी, और राष्ट्रीय हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्र संरक्षण मिशन।

7. खनिज और ऊर्जा संसाधन

भूगोल: भारत के खनिज और ऊर्जा संसाधन इन्फ़ोग्राफ़िक
भारत के खनिज और ऊर्जा संसाधन: वितरण, खनिज पेटियाँ और संरक्षण (NCERT आधारित infographic)।
खनिज / ऊर्जाप्रमुख क्षेत्रटिप्पणी
कोयलाझरिया, रानीगंज, बोकारो (दामोदर घाटी), कोरबा, तालचेर, सिंगरौलीगोंडवाना कोयला (लगभग 98%); तृतीयक कोयला पूर्वोत्तर में
लौह-अयस्कओडिशा (क्योंझर, सुंदरगढ़), झारखंड (नोआमुंडी, गुआ), छत्तीसगढ़ (बैलाडीला), कर्नाटक (बेल्लारी, कुद्रेमुख)हेमेटाइट और मैग्नेटाइट
बॉक्साइटओडिशा (पंचपटमाली), झारखंड, छत्तीसगढ़, गुजरातलैटेराइट से संबद्ध
मैंगनीज़मध्य प्रदेश (बालाघाट), महाराष्ट्र (नागपुर-भंडारा), ओडिशाइस्पात के लिए आवश्यक
पेट्रोलियमबॉम्बे हाई, असम (डिगबोई, 1889 से), गुजरात (अंकलेश्वर), कृष्णा-गोदावरी बेसिनआयात-निर्भरता 85% से अधिक
अभ्रक, यूरेनियमअभ्रक: कोडरमा (झारखंड), नेल्लोर; यूरेनियम: जादुगुड़ा (झारखंड), तुम्मलपल्ले (आंध्र प्रदेश)परमाणु ऊर्जा
हीरापन्ना (मध्य प्रदेश; NMDC की मझगवाँ खान)किम्बरलाइट पाइप
  • ऊर्जा संकट और समाधान: कोयले पर निर्भरता (बिजली उत्पादन का बड़ा भाग); गैर-जीवाश्म क्षमता का तेज़ विस्तार (सौर ऊर्जा में राजस्थान का भादला और गुजरात का खावड़ा, जो विश्व के सबसे बड़े नवीकरणीय ऊर्जा पार्कों में है); 2030 तक 500 GW गैर-जीवाश्म क्षमता का लक्ष्य; राष्ट्रीय हरित हाइड्रोजन मिशन (2023); और परमाणु ऊर्जा (थोरियम-आधारित तीन-चरणीय कार्यक्रम)।

8. मानचित्र स्थान: 2024-25 के प्रश्न-पत्रों से सत्यापित सूची

स्थानराज्य / संघ राज्य क्षेत्रभौगोलिक महत्व
लूणकरणसरराजस्थान (बीकानेर)थार मरुस्थल की लवणीय झील
गुआझारखंड (पश्चिमी सिंहभूम)लौह-अयस्क खान (SAIL)
रायडाकभूटान, पश्चिम बंगाल और असमभूटान से आने वाली ब्रह्मपुत्र की सहायक नदी (भूटान में वांग छू)
एकता नगर (केवड़िया)गुजरात (नर्मदा ज़िला)सरदार सरोवर बाँध; स्टैच्यू ऑफ़ यूनिटी
चंदनवाड़ीजम्मू-कश्मीर (अनंतनाग, पहलगाम के पास)लिद्दर घाटी; अमरनाथ यात्रा का आधार-स्थल
बबीनाउत्तर प्रदेश (झाँसी)बुंदेलखंड; सैन्य छावनी
टाटीपाकाआंध्र प्रदेश (गोदावरी डेल्टा)ONGC की लघु रिफ़ाइनरी; कृष्णा-गोदावरी बेसिन
आलो (अलोंग)अरुणाचल प्रदेश (पश्चिम सियांग)सियांग घाटी; अग्रिम लैंडिंग ग्राउंड
कराईकलपुडुचेरी (तमिलनाडु तट पर)कावेरी डेल्टा; बंदरगाह
पन्नामध्य प्रदेशहीरा खान; पन्ना बाघ अभयारण्य; केन नदी
ऋषिकुल्याओडिशा (गंजाम)नदी-मुहाने पर ऑलिव रिडले कछुओं का सामूहिक नीड़न
दातार पहाड़ीगुजरात (जूनागढ़, गिरनार क्षेत्र)गिरनार पहाड़ियों का भाग; तीर्थ-स्थल
किकरुमानागालैंड (फेक ज़िला)"ज़ाबो" जल-संरक्षण आधारित कृषि; सीढ़ीदार खेत
ब्यालालुकर्नाटक (बेंगलुरु के पास)इसरो का भारतीय गहन अंतरिक्ष नेटवर्क (IDSN)
नेय्यारकेरल (तिरुवनंतपुरम)नेय्यार नदी, बाँध और वन्यजीव अभयारण्य
उत्तरलाईराजस्थान (बाड़मेर)वायु सेना का हवाई अड्डा; थार मरुस्थल
श्री विजयपुरमअंडमान-निकोबारपोर्ट ब्लेयर का नया नाम (सितंबर 2024); राजधानी
मानचित्र-प्रश्न की तैयारी

हर स्थान के लिए दो बातें लिखें: (1) सटीक स्थिति (राज्य, ज़िला, नदी या पर्वत के संदर्भ में) और (2) भौगोलिक या समसामयिक महत्व (30 शब्द)। चिह्न मानचित्र पर सही स्थान पर लगाएँ और स्थान का नाम उसके पास लिखें। समाचारों में आए स्थानों (नए नाम, आपदाएँ, परियोजनाएँ, संरक्षित क्षेत्र, सैन्य अड्डे) की सूची बनाते रहें।

9. Master Summary Table

विषयमुख्य तथ्ययाद रखें
शिवालिकअग्र-गर्त के अवसादों का उत्थान; मायोसीन से प्लीस्टोसीनदून, चो; MBT और HFT के बीच
करेवाप्लीस्टोसीन झील-निक्षेप; कश्मीर घाटीकेसर (पंपोर)
पूर्वी घाटअसंतत; नदियों से कटापोडु, नियमगिरि (2013), अराकू कॉफ़ी
हिमनदसियाचिन, गंगोत्री, ज़ेमूदक्षिण ल्होनक GLOF (2023)
जलागमशिखर से घाटीरालेगण सिद्धि, सुखोमाजरी; WDC-PMKSY
कैच द रेन22 मार्च 2021"जहाँ गिरे, जब गिरे"
उच्च वर्षापश्चिमी घाट, मेघालय, अंडमानपर्वतीय वर्षा; कीप-आकार
वन आवरणISFR 2023: 25.17%वन 21.76%, वृक्ष 3.41%
गिद्धडाइक्लोफ़ेनाक पर प्रतिबंध (2006)पिंजौर, राजाभातखावा, रानी, भोपाल
प्रवालमन्नार, कच्छ, लक्षद्वीप, अंडमानअनुसूची I; CRZ

10. चार्ट: हिमालय की अनुप्रस्थ काट (दक्षिण से उत्तर)

HFT MBT MCT ISZ गंगा मैदान शिवालिक लघु हिमालय वृहद हिमालय ट्रांस-हिमालय दक्षिणउत्तर
हिमालय की अनुप्रस्थ काट: दक्षिण से उत्तर की ओर शिवालिक (HFT और MBT के बीच), लघु हिमालय (MBT और MCT के बीच), वृहद हिमालय और ट्रांस-हिमालय (सिंधु-सांगपो सीवन क्षेत्र के पार)। ऊँचाइयाँ और चौड़ाइयाँ सांकेतिक हैं।

11. Mind Map

भारत: भौतिक विन्यास और संसाधन
उच्चावच
  • हिमालय, शिवालिक, करेवा
  • पठार, पूर्वी घाट
जल
  • नदियाँ, हिमनद, GLOF
  • जलागम, कैच द रेन
जलवायु
  • मानसून, उच्च वर्षा
  • चक्रवात, बाढ़-सूखा
जैव
  • वन, मृदा
  • गिद्ध, प्रवाल
संसाधन
  • खनिज, ऊर्जा
  • हिमालयी कृषि, मानचित्र

12. महत्वपूर्ण One-liners

  • भारत का मानक याम्योत्तर: 82°30' पूर्व।
  • भारत में स्थित सबसे ऊँचा शिखर: कंचनजंगा (8,586 मीटर)।
  • शिवालिक और लघु हिमालय के बीच की घाटियाँ: दून।
  • कश्मीर में केसर की खेती: करेवा (पंपोर)।
  • भारत में स्थित सबसे लंबा हिमनद (काराकोरम): सियाचिन।
  • "कैच द रेन" अभियान की शुरुआत: 22 मार्च 2021।
  • ISFR 2023 के अनुसार वन और वृक्ष आवरण: 25.17%।
  • गिद्धों की गिरावट का मुख्य कारण: डाइक्लोफ़ेनाक।
  • पोर्ट ब्लेयर का नया नाम: श्री विजयपुरम।
  • इसरो का गहन अंतरिक्ष नेटवर्क: ब्यालालु (कर्नाटक)।

13. टिप्स एवं ट्रिक्स

Paper II के लिए
  • हर उत्तर में भारत का रेखा-मानचित्र (कम से कम एक) बनाएँ, जैसे वर्षा-वितरण, प्रवाल-क्षेत्र या गिद्ध केंद्र।
  • भौतिक प्रश्नों में भी मानवीय आयाम जोड़ें: कृषि, आपदा, नीति।
  • नवीनतम रिपोर्टें (ISFR 2023, बाघ गणना 2022) और योजनाएँ (कैच द रेन, अमृत सरोवर) नाम और वर्ष सहित लिखें।
याद रखने की तरकीब

हिमालय के भ्रंश दक्षिण से उत्तर: "H-B-C-I" (HFT, MBT, MCT, ISZ)। बुरार्ड का विभाजन: "पं-कु-ने-अ" (सिंधु, सतलुज, काली, तीस्ता, दिहांग)।

14. PYQ-आधारित प्रश्न एवं मॉडल उत्तर

Q1UPSC 2024 · Paper II · 3(b)

भारतीय हिमालय के हिमनदों के वितरण, महत्व और उनके पीछे हटने के परिणामों की विवेचना कीजिए।

मॉडल उत्तर (रूपरेखा)

वितरण: 9,500 से अधिक हिमनद (GSI); सियाचिन, गंगोत्री, ज़ेमू, मिलम, पिंडारी; मानचित्र सहित।

महत्व: "तीसरा ध्रुव"; बारहमासी नदियाँ, जलविद्युत, सिंचाई, पर्यटन।

पीछे हटना: तापमान, ब्लैक कार्बन; "पीक वॉटर"।

परिणाम: GLOF (दक्षिण ल्होनक 2023, चमोली 2021), जल-सुरक्षा, कृषि, जैव-विविधता।

उपाय: निगरानी (NCPOR, वाडिया संस्थान), NDMA के GLOF दिशानिर्देश, पूर्व-चेतावनी, NMSHE।

निष्कर्ष: हिमनदों की सुरक्षा दक्षिण एशिया की जल और खाद्य सुरक्षा का प्रश्न है।

Q2UPSC 2025 · Paper II · 2(b)

भारत में प्रवाल भित्तियों के वितरण, महत्व और उनके सामने उपस्थित ख़तरों की विवेचना कीजिए।

मॉडल उत्तर (रूपरेखा)

दशाएँ: तापमान लगभग 20-29°C, स्वच्छ उथला जल।

वितरण (मानचित्र सहित): मन्नार, कच्छ, लक्षद्वीप, अंडमान-निकोबार, मालवण।

महत्व: जैव-विविधता, मत्स्य, तटीय सुरक्षा, पर्यटन।

ख़तरे: विरंजन (2024), अम्लीकरण, अवसादन, खनन, मत्स्यन, प्रदूषण।

संरक्षण: अनुसूची I, CRZ, समुद्री उद्यान, पुनर्स्थापन।

निष्कर्ष: प्रवाल जलवायु परिवर्तन के "प्रथम शिकार" हैं; स्थानीय दबाव घटाकर उनकी सहनशीलता बढ़ाई जा सकती है।

Q3UPSC 2025 · Paper II · 3(b)

पूर्वी घाट के भूमि-उपयोग प्रतिरूप और उससे संबंधित समस्याओं की विवेचना कीजिए।

मॉडल उत्तर (रूपरेखा)

भौतिक विन्यास: असंतत, नदियों से कटा; प्रमुख पहाड़ियाँ।

भूमि-उपयोग: वन, पोडु, सीढ़ीदार खेत, अराकू कॉफ़ी, बॉक्साइट खनन, जलाशय, संरक्षित क्षेत्र।

समस्याएँ: वनोन्मूलन, विस्थापन (नियमगिरि), अपरदन, पोडु का छोटा चक्र।

उपाय: FRA, PESA, सामुदायिक वन, जलागम, सतत खनन।

निष्कर्ष: पूर्वी घाट को पश्चिमी घाट जैसी संरक्षण-प्राथमिकता देने की आवश्यकता है।

Q4UPSC 2024 · Paper II · 6(c)

जल शक्ति अभियान "कैच द रेन" के उद्देश्यों, घटकों और उपलब्धियों का मूल्यांकन कीजिए।

मॉडल उत्तर (रूपरेखा)

पृष्ठभूमि: जल-तनाव; भू-जल का अति-दोहन।

अभियान: जल शक्ति अभियान 2019; कैच द रेन 22 मार्च 2021; नारा।

घटक: वर्षा-जल संचयन, पारंपरिक स्रोतों का पुनरुद्धार, पुनर्भरण, जलागम, वनीकरण, जल शक्ति केंद्र, जियो-टैगिंग।

संबंधित पहल: अमृत सरोवर, अटल भू-जल योजना, MGNREGA।

मूल्यांकन: जागरूकता और संरचनाएँ बनाम रखरखाव, गुणवत्ता और परिणामों की निगरानी।

निष्कर्ष: "जन-भागीदारी" ही इस अभियान की स्थिरता की कुंजी है।

Q5UPSC 2024 · Paper II · 1(b) · 10 अंक

शिवालिक श्रेणी के निर्माण की व्याख्या कीजिए।

मॉडल उत्तर

उत्पत्ति: उत्थित हिमालय से अपरदित अवसाद अग्र-गर्त में जमा हुए, फिर उनका वलन और उत्थान हुआ; मायोसीन से प्लीस्टोसीन।

प्रमाण: तीन उप-समूह, ऊपर की ओर मोटे होते अवसाद, जीवाश्म।

स्थलरूप: MBT और HFT के बीच; दून; चो।

आरेख: अनुप्रस्थ काट।

Q6UPSC 2025 · Paper II · 1(b) · 10 अंक

करेवा क्या हैं? उनके आर्थिक महत्व पर टिप्पणी कीजिए।

मॉडल उत्तर

अर्थ: प्लीस्टोसीन झील और हिमनद-नदीय निक्षेप; वुडर।

उत्पत्ति: पीर पंजाल के उत्थान से झील बनी; बारामूला गॉर्ज कटने से जल निकला।

महत्व: केसर (पंपोर), बादाम, अखरोट, सेब; पुरातत्व (बुर्ज़होम)।

ख़तरा: निर्माण के लिए मिट्टी का खनन।

Q7UPSC 2025 · Paper II · 1(c) · 10 अंक

हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्र और फ़सल-प्रतिरूप के बीच संबंध पर टिप्पणी कीजिए।

मॉडल उत्तर

ऊँचाई-क्षेत्रीकरण: घाटियों में धान, ढलानों पर मक्का और मोटे अनाज, सेब; ऊँचाई पर जौ और कुट्टू; ठंडा मरुस्थल।

पूर्वोत्तर: झूम, अपातानी, किकरुमा का ज़ाबो, सिक्किम की जैविक खेती।

चुनौतियाँ: जलवायु परिवर्तन, पलायन, वन्यजीव।

समाधान: GI, जैविक खेती, बागवानी।

Q8UPSC 2024 · Paper II · 5(a) · 10 अंक

भारत के उच्च वर्षा वाले क्षेत्रों और उसके कारणों की व्याख्या कीजिए।

मॉडल उत्तर

क्षेत्र: पश्चिमी घाट का पवनाभिमुख ढाल, मेघालय (मौसिनराम, सोहरा), उप-हिमालयी क्षेत्र, अंडमान; मानचित्र सहित।

कारण: पर्वतीय वर्षा, कीप-आकार, बंगाल की खाड़ी की शाखा, मानसून-विराम, चक्रवात।

प्रभाव: सदाबहार वन, बागान, भू-स्खलन, निक्षालन।

Q9UPSC 2024 · Paper II · 1(c) · 10 अंक

भारत में गिद्ध संरक्षण प्रजनन केंद्रों पर टिप्पणी कीजिए।

मॉडल उत्तर

संकट: जिप्स प्रजातियों में 90% से अधिक गिरावट; डाइक्लोफ़ेनाक।

केंद्र: पिंजौर (पहला, जटायु), राजाभातखावा, रानी, भोपाल; BNHS; मानचित्र सहित।

नीति: 2006 का प्रतिबंध; कार्य योजना 2020-25; गिद्ध सुरक्षित क्षेत्र।

महत्व: प्रकृति के सफ़ाईकर्मी; रेबीज़ से संबंध।

Q10UPSC 2025 · Paper II · 5(c) · 10 अंक

सतत ग्रामीण विकास में जलागम प्रबंधन की भूमिका पर टिप्पणी कीजिए।

मॉडल उत्तर

अर्थ: जलागम; शिखर से घाटी उपागम।

घटक: मृदा और जल संरक्षण, वनीकरण, चराई-नियंत्रण, सहभागिता।

उदाहरण: रालेगण सिद्धि, हिवरे बाज़ार, सुखोमाजरी।

कार्यक्रम: DPAP, IWMP 2009, WDC-PMKSY 2.0।

15. Quick Revision Summary

परीक्षा से पहले एक बार ज़रूर पढ़ें
  • विन्यास: अवस्थिति, पड़ोसी देश; तीन संरचनात्मक खंड; छह भू-आकृतिक विभाग।
  • हिमालय: चार श्रेणियाँ, चार भ्रंश, बुरार्ड का विभाजन; शिवालिक; करेवा।
  • पठार: पश्चिमी और पूर्वी घाट; पूर्वी घाट का भूमि-उपयोग।
  • जल: हिमालयी और प्रायद्वीपीय नदियाँ; अपवाह प्रतिरूप; हिमनद और GLOF; जलागम; कैच द रेन।
  • जलवायु: मानसून की क्रियाविधि; उच्च वर्षा; पश्चिमी विक्षोभ; चक्रवात; बाढ़-सूखा; कोपेन प्रदेश।
  • जैव और समुद्री: वन (ISFR 2023), मृदा, गिद्ध, प्रवाल, EEZ।
  • संसाधन: खनिज पेटियाँ, ऊर्जा; हिमालयी कृषि; मानचित्र-स्थान।