1. अध्याय एक नज़र में
आधुनिक काल (संवत 1900 के बाद, यानी लगभग 1843 ई. से) Paper I का सबसे विस्तृत भाग है। इस अध्याय में नवजागरण और भारतेंदु मंडल, फिर आधुनिक कविता की प्रवृत्तियाँ (द्विवेदी युग, छायावाद, प्रगतिवाद, प्रयोगवाद, नई कविता, नवगीत, समकालीन और जनवादी कविता) तथा सिलेबस के प्रमुख कवि हैं: मैथिलीशरण गुप्त, प्रसाद, निराला, महादेवी, दिनकर, अज्ञेय, मुक्तिबोध, नागार्जुन।
2026 में पुनर्जागरण और नई मानवता, निराला की छंद-मुक्ति, प्रसाद की मानवीय भूमि और अज्ञेय का व्यक्ति-समाज द्वंद्व; 2025 में दिनकर की सामाजिक चेतना और हिंदी नवजागरण; 2024 में प्रयोगवादी भाषा और साठोत्तरी कविता में लय का ह्रास पूछे गए।
2. नवजागरण (पुनर्जागरण)
- अर्थ: 19वीं सदी में अंग्रेज़ी शिक्षा, छापाख़ाना, सुधार-आंदोलनों और उपनिवेशवाद के अनुभव से उत्पन्न बौद्धिक-सांस्कृतिक जागरण, जिसमें बुद्धिवाद, मानवतावाद, समाज-सुधार और राष्ट्रीय चेतना केंद्र में आए।
- संस्थाएँ और व्यक्तित्व: ब्रह्म समाज (राममोहन राय, 1828), आर्य समाज (दयानंद, 1875), प्रार्थना समाज, रामकृष्ण मिशन (विवेकानंद, 1897), थियोसॉफ़िकल सोसाइटी।
- "नई मानवता के जन्म का आंदोलन": मनुष्य को धर्म-जाति के बंधनों से ऊपर एक स्वतंत्र, विवेकशील इकाई के रूप में देखना; स्त्री-शिक्षा, विधवा-विवाह, बाल-विवाह और सती-निषेध, अस्पृश्यता-विरोध; इतिहास-बोध और राष्ट्र की कल्पना; विज्ञान और तर्क। साहित्य में यह भारतेंदु के "भारत दुर्दशा", गुप्त की "भारत भारती", प्रेमचंद के यथार्थवाद और छायावाद के मानवतावाद तक दिखता है।
- हिंदी नवजागरण (रामविलास शर्मा की अवधारणा, जो इसे 1857 से जोड़ते हैं): उपलब्धियाँ: खड़ी बोली गद्य और पत्रकारिता, राष्ट्रीय चेतना, समाज-सुधार, आधुनिक विधाएँ (नाटक, निबंध, उपन्यास), इतिहास-बोध, संस्थाएँ। सीमाएँ: हिंदू पुनरुत्थानवाद की छाया और "हिंदी-हिंदू-हिंदुस्तान" का सांप्रदायिक पाठ, उर्दू से अलगाव, सवर्ण-मध्यवर्गीय दृष्टि (दलित, स्त्री और किसान प्रश्न गौण), औपनिवेशिक शासन के प्रति द्वैध (राजभक्ति और देशभक्ति साथ), बंगाल नवजागरण की तुलना में धीमा और सीमित। (वीर भारत तलवार जैसे विद्वानों ने इन सीमाओं की आलोचनात्मक पड़ताल की।)
3. भारतेंदु युग (लगभग 1850-1900)
- भारतेंदु हरिश्चंद्र (1850-1885): कविता ब्रज में, गद्य खड़ी बोली में; "भारत दुर्दशा", "अंधेर नगरी", "सत्य हरिश्चंद्र", "भारत जननी" (नाटक); "कविवचन सुधा" (1868), "हरिश्चंद्र मैगज़ीन" (1873), "बाला बोधिनी" (स्त्रियों के लिए, 1874)।
- भारतेंदु मंडल: बालकृष्ण भट्ट, प्रतापनारायण मिश्र, बदरीनारायण चौधरी "प्रेमघन", राधाचरण गोस्वामी, ठाकुर जगमोहन सिंह, अंबिकादत्त व्यास।
- बालकृष्ण भट्ट (1844-1914): "हिंदी प्रदीप" (1877) के संपादक; निबंधकार ("आत्मनिर्भरता", "कल्पना"); विचार-प्रधान, विश्लेषणात्मक निबंध; उपन्यास "नूतन ब्रह्मचारी", "सौ अजान एक सुजान"।
- प्रतापनारायण मिश्र (1856-1894): "ब्राह्मण" (1883) के संपादक; हास्य-व्यंग्य और चुटीले विषयों पर निबंध ("दाँत", "भौं", "बात"); "हिंदी, हिंदू, हिंदुस्तान" का नारा।
- भारतेंदु युगीन कविता की प्रवृत्तियाँ: देशभक्ति और राजभक्ति का द्वंद्व, समाज-सुधार, अतीत-गौरव और वर्तमान की दुर्दशा, भक्ति और श्रृंगार की पुरानी धारा भी, हास्य-व्यंग्य, लोक-छंदों (कजरी, लावनी) का प्रयोग।
4. आधुनिक कविता की प्रवृत्तियाँ
| युग/आंदोलन | काल (लगभग) | प्रवृत्तियाँ | प्रमुख कवि और रचनाएँ |
|---|---|---|---|
| द्विवेदी युग | 1900-1920 | खड़ी बोली कविता, इतिवृत्तात्मकता, नैतिकता-आदर्श, राष्ट्रीयता, पौराणिक-ऐतिहासिक कथाएँ | मैथिलीशरण गुप्त (भारत भारती 1912, साकेत 1931), हरिऔध (प्रियप्रवास 1914), रामनरेश त्रिपाठी |
| छायावाद | 1918-1936 | आत्माभिव्यक्ति, प्रकृति का मानवीकरण, रहस्यवाद, सौंदर्य और प्रेम, कल्पना, लाक्षणिकता, मुक्त छंद, राष्ट्रीय-सांस्कृतिक चेतना | प्रसाद (आँसू, कामायनी 1936), निराला (परिमल, अनामिका), पंत (पल्लव), महादेवी (नीहार, यामा) |
| प्रगतिवाद | 1936 से | मार्क्सवादी दृष्टि, शोषित वर्ग, यथार्थ, क्रांति, सरल भाषा | नागार्जुन, केदारनाथ अग्रवाल, त्रिलोचन, शिवमंगल सिंह "सुमन"; पंत (ग्राम्या), निराला (कुकुरमुत्ता) |
| प्रयोगवाद | 1943 से | नए प्रयोग, व्यक्तिवाद, बौद्धिकता, नए उपमान, भाषा-शिल्प के प्रयोग | अज्ञेय ("तार सप्तक" 1943 का संपादन), मुक्तिबोध, गिरिजाकुमार माथुर |
| नई कविता | 1950 के दशक | लघु मानव, क्षणवाद, अनुभूति की प्रामाणिकता, आधुनिकता-बोध, मुक्त छंद | "नई कविता" पत्रिका (1954, जगदीश गुप्त, रामस्वरूप चतुर्वेदी); धर्मवीर भारती, कुँवर नारायण, सर्वेश्वर, रघुवीर सहाय |
| नवगीत | 1950 के अंत से | गीत की लय में आधुनिक संवेदना, लोक-बिंब | राजेंद्र प्रसाद सिंह, शंभुनाथ सिंह, नईम |
| साठोत्तरी/समकालीन | 1960 के बाद | मोहभंग, अकविता, व्यवस्था-विरोध, राजनीतिक कविता; बाद में स्त्री, दलित, आदिवासी स्वर | धूमिल (संसद से सड़क तक), राजकमल चौधरी, लीलाधर जगूड़ी; विनोद कुमार शुक्ल, मंगलेश डबराल |
| जनवादी कविता | 1970 के दशक से | जन-संघर्ष, नक्सलबाड़ी और आपातकाल के अनुभव, प्रतिबद्धता | गोरख पांडेय, आलोकधन्वा, कुमार विकल |
- प्रयोगवादी कविता की भाषा: (i) बोलचाल और बौद्धिक भाषा का मेल; (ii) नए उपमान ("बासी उपमानों" का त्याग); (iii) विज्ञान, मनोविज्ञान और नगर-जीवन के शब्द; (iv) अंग्रेज़ी और उर्दू शब्दों का निःसंकोच प्रयोग; (v) व्यंग्य, विडंबना, अमूर्तन; (vi) छंद-मुक्ति और गद्यात्मक लय; (vii) कहीं-कहीं दुर्बोधता। अज्ञेय का प्रसिद्ध विचार: कवि "शब्द" को नए अर्थ देने के लिए उसे "राहों का अन्वेषी" बनाता है।
- साठोत्तरी कविता में लयात्मकता का ह्रास: कारण और परिणाम: कारण: मोहभंग और आक्रोश को व्यक्त करने के लिए सपाटबयानी; राजनीतिक वक्तव्य-शैली; गीत को "रोमानी" मानकर अस्वीकार; पश्चिमी आधुनिकतावाद; मुद्रित पाठ और मौन पाठ की संस्कृति। परिणाम: कविता का गद्य से अंतर धुंधला; वाचिक परंपरा और जन-पाठक से दूरी; पर कथ्य की धार और यथार्थ की सीधी पकड़ बढ़ी; प्रतिक्रिया में नवगीत और ग़ज़ल (दुष्यंत कुमार, "साये में धूप", 1975) की लोकप्रियता।
5. छायावाद और उसके कवि
- नामकरण और परिभाषाएँ: मुकुटधर पांडेय (1920) ने "छायावाद" शब्द का प्रयोग किया; शुक्ल ने इसे रहस्यवाद और शैली-विशेष से जोड़ा; नंददुलारे वाजपेयी: "आध्यात्मिक छाया का भान"; नामवर सिंह: "राष्ट्रीय जागरण की काव्यात्मक अभिव्यक्ति"; रामविलास शर्मा: स्वाधीनता की आकांक्षा।
- जयशंकर प्रसाद (1889-1937): "झरना", "आँसू", "लहर", "कामायनी"। काव्य में मानवीय भूमि: मनुष्य के आंतरिक संघर्ष (श्रद्धा और इड़ा, हृदय और बुद्धि) का चित्रण; करुणा और आनंदवाद; दुःख को विकास का सत्य मानना; देवताओं के पतन के बाद मनु के रूप में मानवता का नया आरंभ; राष्ट्रीय-सांस्कृतिक गौरव ("अरुण यह मधुमय देश हमारा")। प्रसाद का मनुष्य दुर्बलताओं सहित पूर्ण मनुष्य है।
- सूर्यकांत त्रिपाठी "निराला" (1896-1961): "परिमल", "अनामिका", "गीतिका", "तुलसीदास", "कुकुरमुत्ता", "अणिमा", "बेला", "नए पत्ते"; "जूही की कली" (मुक्त छंद की पहली प्रसिद्ध कविता, जिसे "सरस्वती" ने पहले अस्वीकार किया था)। छंद-मुक्ति: निराला ने कहा कि मनुष्यों की मुक्ति की तरह कविता की भी मुक्ति होती है, और कविता की मुक्ति छंदों के शासन से अलग हो जाना है। उनका मुक्त छंद लय-विहीन नहीं, "प्रवाह और भाव" की आंतरिक लय पर आधारित (कवित्त की लय का विस्तार)। मुख्य स्वर: विद्रोह और स्वाधीनता, करुणा ("सरोज स्मृति", "भिक्षुक", "वह तोड़ती पत्थर"), ओज और शक्ति ("राम की शक्ति पूजा"), व्यंग्य ("कुकुरमुत्ता"), भक्ति और दर्शन (उत्तरकालीन गीत)।
- सुमित्रानंदन पंत (1900-1977): प्रकृति के सुकुमार कवि; "पल्लव" की भूमिका (1926) छायावाद का घोषणा-पत्र; बाद में प्रगतिवादी ("युगांत", "ग्राम्या") और अरविंद-दर्शन ("स्वर्णकिरण"); "चिदंबरा" पर ज्ञानपीठ (1968)।
- महादेवी वर्मा (1907-1987): "नीहार", "रश्मि", "नीरजा", "सांध्यगीत", "दीपशिखा"; "यामा" पर ज्ञानपीठ (1982); वेदना, रहस्यवाद, "आधुनिक मीरा"; गद्य में "श्रृंखला की कड़ियाँ" (स्त्री-विमर्श), "अतीत के चलचित्र" (रेखाचित्र)।
6. अन्य प्रमुख कवि
- मैथिलीशरण गुप्त (1886-1964): "राष्ट्रकवि"; "भारत भारती", "साकेत" (उर्मिला की उपेक्षा का निवारण), "यशोधरा", "जयद्रथ वध"; नारी के प्रति सहानुभूति, राष्ट्रीयता, भारतीय संस्कृति।
- रामधारी सिंह "दिनकर" (1908-1974): "रेणुका", "हुंकार", "कुरुक्षेत्र", "रश्मिरथी", "उर्वशी" (ज्ञानपीठ 1972), "संस्कृति के चार अध्याय" (गद्य)। सामाजिक चेतना: शोषण और वर्ग-विषमता के विरुद्ध आक्रोश, किसान-मज़दूर के प्रति सहानुभूति, जाति-विरोध (रश्मिरथी में कर्ण), युद्ध और शांति का प्रश्न, राष्ट्रीय स्वाभिमान ("परशुराम की प्रतीक्षा", 1962 के बाद), व्यवस्था की आलोचना; ओज और प्रगतिशीलता का मेल ("एक ओर राष्ट्रवादी, दूसरी ओर प्रगतिवादी")।
- सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन "अज्ञेय" (1911-1987): "तार सप्तक" (1943) से प्रयोगवाद; "हरी घास पर क्षण भर", "बावरा अहेरी", "आँगन के पार द्वार" (साहित्य अकादमी), "कितनी नावों में कितनी बार" (ज्ञानपीठ 1978); उपन्यास "शेखर: एक जीवनी", "नदी के द्वीप"। व्यक्ति और समाज का द्वंद्व: अज्ञेय व्यक्ति की स्वतंत्रता, अद्वितीयता और आत्म-अन्वेषण के कवि हैं ("नदी के द्वीप" का प्रतीक: द्वीप नदी से अलग भी है और उसी से बना भी); पर व्यक्ति का समाज के प्रति दायित्व भी स्वीकारते हैं ("यह दीप अकेला" में दीप को "पंक्ति को दे दो" का भाव)। द्वंद्व का समाधान: स्वतंत्र व्यक्ति स्वेच्छा से समाज में अपना अर्पण करे। आलोचना: व्यक्तिवाद और अभिजात बौद्धिकता।
- गजानन माधव मुक्तिबोध (1917-1964): "चाँद का मुँह टेढ़ा है" (1964), "भूरी-भूरी खाक धूल"; "अँधेरे में", "ब्रह्मराक्षस"; आलोचना "एक साहित्यिक की डायरी", "कामायनी: एक पुनर्विचार"। फ़ैंटेसी-शिल्प, आत्मसंघर्ष, मध्यवर्गीय बुद्धिजीवी की नैतिक दुविधा, मार्क्सवादी प्रतिबद्धता, लंबी कविताएँ।
- नागार्जुन (1911-1998): "युगधारा", "सतरंगे पंखोंवाली", "प्यासी पथराई आँखें", "हज़ार-हज़ार बाँहों वाली"; मैथिली में "यात्री" नाम से; उपन्यास "बलचनमा", "रतिनाथ की चाची"। जन-कवि, व्यंग्य, राजनीतिक कविता, प्रकृति और लोक-जीवन; वैविध्य (Paper II अध्याय में विस्तार)।
7. Master Summary Table
| युग/कवि | मुख्य तथ्य | परीक्षा-बिंदु |
|---|---|---|
| नवजागरण | ब्रह्म समाज 1828, आर्य समाज 1875 | नई मानवता; उपलब्धि-सीमा |
| भारतेंदु मंडल | हिंदी प्रदीप 1877, ब्राह्मण 1883 | भट्ट, मिश्र, प्रेमघन |
| द्विवेदी युग | सरस्वती 1903-20 | इतिवृत्तात्मकता |
| छायावाद | प्रसाद, निराला, पंत, महादेवी | "पल्लव" की भूमिका 1926 |
| प्रगतिवाद | PWA 1936 (लखनऊ, प्रेमचंद) | मार्क्सवाद |
| प्रयोगवाद | तार सप्तक 1943 | नए उपमान |
| नई कविता | "नई कविता" पत्रिका 1954 | लघु मानव |
| साठोत्तरी | धूमिल, अकविता | लय-ह्रास, मोहभंग |
| ज्ञानपीठ | पंत 1968, दिनकर 1972, अज्ञेय 1978, महादेवी 1982 | हिंदी कवियों का क्रम |
8. चार्ट: आधुनिक हिंदी कविता की समयरेखा
9. Mind Map
- सुधार आंदोलन, नई मानवता
- भारतेंदु मंडल
- गुप्त, हरिऔध
- प्रसाद, निराला, पंत, महादेवी
- नागार्जुन, केदार
- अज्ञेय, मुक्तिबोध
- नवगीत, साठोत्तरी
- जनवादी, समकालीन
- दिनकर, भारत भारती
- लय और भाषा के प्रश्न
10. महत्वपूर्ण One-liners
- "छायावाद" शब्द का प्रथम प्रयोग: मुकुटधर पांडेय (1920)।
- छायावाद का घोषणा-पत्र: "पल्लव" की भूमिका (पंत, 1926)।
- "तार सप्तक" के संपादक: अज्ञेय (1943)।
- "हिंदी प्रदीप": बालकृष्ण भट्ट (1877); "ब्राह्मण": प्रतापनारायण मिश्र (1883)।
- "राष्ट्रकवि": मैथिलीशरण गुप्त।
- "उर्वशी" पर ज्ञानपीठ: दिनकर (1972)।
- "चाँद का मुँह टेढ़ा है": मुक्तिबोध (1964)।
- "साये में धूप" (हिंदी ग़ज़ल): दुष्यंत कुमार (1975)।
11. टिप्स एवं ट्रिक्स
- प्रवृत्ति वाले प्रश्नों में "युग की पृष्ठभूमि → 5-6 प्रवृत्तियाँ (हर एक के साथ कवि/पंक्ति) → मूल्यांकन" ढाँचा।
- कवि-विशेष के प्रश्न में आलोचकों के मत (नामवर, रामविलास, मुक्तिबोध) जोड़ें।
- उद्धरण छोटे रखें और हमेशा अपनी व्याख्या जोड़ें।
छायावाद के चार स्तंभ: "प्र-नि-पं-म" (प्रसाद, निराला, पंत, महादेवी)। आंदोलन-क्रम: "छाया-प्रगति-प्रयोग-नई" (1918-1936-1943-1954)।
मुक्त छंद को "छंदहीन" कहना। निराला का मुक्त छंद आंतरिक लय और प्रवाह पर आधारित है; उसमें मात्रा-गणना का बंधन नहीं, लय का अनुशासन है।
12. PYQ-आधारित प्रश्न एवं हल
जयशंकर प्रसाद के काव्य में मानवीय भूमि।
मॉडल उत्तर
खंड 5 का प्रसाद बिंदु: आंतरिक संघर्ष, करुणा, आनंदवाद, दुःख का विकासवादी अर्थ, देव-संस्कृति से मानव-संस्कृति की ओर, राष्ट्रीय गौरव। उदाहरण: "आँसू" की वेदना, कामायनी के मनु। निष्कर्ष: प्रसाद का काव्य रहस्य से शुरू होकर मनुष्य पर समाप्त होता है।
दिनकर की सामाजिक चेतना।
मॉडल उत्तर
खंड 6 का दिनकर बिंदु: शोषण-विरोध, किसान-मज़दूर, जाति-प्रश्न (रश्मिरथी), युद्ध-शांति (कुरुक्षेत्र), राष्ट्रीय स्वाभिमान, व्यवस्था-आलोचना। निष्कर्ष: दिनकर में ओज और करुणा, राष्ट्रवाद और प्रगतिशीलता का संगम।
प्रयोगवादी कविता की भाषा।
मॉडल उत्तर
खंड 4 के सात भाषिक लक्षण, तार सप्तक की पृष्ठभूमि, अज्ञेय का "नए उपमान" वाला दृष्टिकोण। सीमा: दुर्बोधता और कृत्रिमता। निष्कर्ष: प्रयोगवाद ने हिंदी कविता की भाषा को आधुनिक जीवन के अनुरूप बनाया।
"अज्ञेय के काव्य में व्यक्ति और समाज का द्वंद्व है।" इस कथन को स्पष्ट कीजिए।
मॉडल उत्तर (रूपरेखा)
खंड 6 का अज्ञेय बिंदु: व्यक्ति-स्वातंत्र्य, "नदी के द्वीप" का प्रतीक, "यह दीप अकेला" का समाधान; असाध्य वीणा में व्यक्तिगत अहं का विसर्जन (प्रियंवद का "मैं" समर्पित होता है)। आलोचना और प्रतिवाद। निष्कर्ष: अज्ञेय का व्यक्ति समाज-विरोधी नहीं, समाज में स्वतंत्र आत्मदान करने वाला व्यक्ति है।
"पुनर्जागरण भारत में नई मानवता के जन्म का आंदोलन है।" इस कथन की व्याख्या कीजिए।
मॉडल उत्तर (रूपरेखा)
खंड 2: नवजागरण का अर्थ, संस्थाएँ, "नई मानवता" के आयाम (बुद्धिवाद, सुधार, स्त्री-प्रश्न, इतिहास-बोध, राष्ट्र), साहित्य में प्रतिफलन (भारतेंदु, गुप्त, प्रेमचंद, छायावाद), सीमाएँ (सवर्ण-मध्यवर्ग, पुनरुत्थानवाद)। निष्कर्ष: यह "नई मानवता" का आरंभ था, पूर्णता नहीं।
"निराला का काव्य छंद के बंधन से मुक्ति का प्रयास है।" सोदाहरण स्पष्ट कीजिए।
मॉडल उत्तर (रूपरेखा)
खंड 5 का निराला बिंदु: "जूही की कली" और "परिमल" की भूमिका में मुक्ति का तर्क; मुक्त छंद का स्वरूप (कवित्त-लय का आधार, भाव-प्रवाह); उदाहरण: "वह तोड़ती पत्थर", "राम की शक्ति पूजा" (मुक्त छंद में भी लय-अनुशासन); मुक्ति केवल छंद की नहीं, विषय और भाषा की भी (कुकुरमुत्ता का व्यंग्य, बोलचाल)। निष्कर्ष: निराला ने हिंदी कविता को रूप और कथ्य दोनों में स्वाधीन किया। (2023 का 7(b) "निराला की कविता का मुख्य स्वर" भी इसी खंड से।)
"हिंदी नवजागरण" की उपलब्धियों और सीमाओं पर विचार कीजिए।
मॉडल उत्तर (रूपरेखा)
खंड 2 का हिंदी नवजागरण बिंदु: रामविलास शर्मा की अवधारणा, उपलब्धियाँ और सीमाएँ, बंगाल नवजागरण से तुलना। निष्कर्ष: हिंदी नवजागरण ने आधुनिक हिंदी की नींव रखी, पर उसकी सामाजिक संकीर्णताएँ बाद के विमर्शों में संशोधित हुईं।
साठोत्तरी हिंदी कविता में लयात्मकता के ह्रास के कारण और परिणाम का सोदाहरण विवेचन कीजिए।
मॉडल उत्तर (रूपरेखा)
खंड 4 का साठोत्तरी बिंदु: कारण (पाँच), परिणाम (सकारात्मक और नकारात्मक), उदाहरण (धूमिल की सपाटबयानी; प्रतिक्रिया में नवगीत और दुष्यंत की ग़ज़ल)। निष्कर्ष: लय का ह्रास कविता के "कथ्य-विस्फोट" की कीमत थी।
बालकृष्ण भट्ट एवं प्रतापनारायण मिश्र के वैशिष्ट्य को निर्धारित कीजिए।
मॉडल उत्तर (रूपरेखा)
खंड 3: दोनों की पत्रिकाएँ, निबंध-शैली (भट्ट: विचार-प्रधान, गंभीर; मिश्र: हास्य-व्यंग्य, आत्मीय), भाषा-दृष्टि, राष्ट्रीय चेतना; तुलना-तालिका। निष्कर्ष: दोनों ने भारतेंदु युग के निबंध और पत्रकारिता को आधार दिया।
13. Quick Revision Summary
- नवजागरण: संस्थाएँ, नई मानवता, हिंदी नवजागरण की उपलब्धि-सीमा।
- भारतेंदु युग: भारतेंदु, भट्ट, मिश्र; देशभक्ति-राजभक्ति, सुधार।
- प्रवृत्तियाँ: द्विवेदी, छायावाद, प्रगतिवाद, प्रयोगवाद, नई कविता, नवगीत, साठोत्तरी, जनवादी (तालिका)।
- कवि: गुप्त, प्रसाद (मानवीय भूमि), निराला (छंद-मुक्ति), पंत, महादेवी, दिनकर (सामाजिक चेतना), अज्ञेय (व्यक्ति-समाज), मुक्तिबोध, नागार्जुन।
- भाषा-लय: प्रयोगवादी भाषा; साठोत्तरी लय-ह्रास।