UPSC Mains · Hindi Literature · Paper I · अध्याय 7

हिंदी आलोचना

Hindi Criticism

आलोचना का उद्भव; आचार्य रामचंद्र शुक्ल, हजारी प्रसाद द्विवेदी, रामविलास शर्मा, नगेंद्र; सैद्धांतिक, व्यावहारिक, प्रगतिवादी, मनोविश्लेषणवादी आलोचना और नई समीक्षा।

Paper I 12 मिनट

1. अध्याय एक नज़र में

सिलेबस का बिंदु 5 "आलोचना" है: (क) हिंदी आलोचना का उद्भव और विकास: सैद्धांतिक, व्यावहारिक, प्रगतिवादी, मनोविश्लेषणवादी आलोचना और नई समीक्षा; (ख) प्रमुख आलोचक: रामचंद्र शुक्ल, हजारी प्रसाद द्विवेदी, रामविलास शर्मा और नगेंद्र। यह अध्याय Paper II के लिए भी आधार है, क्योंकि वहाँ शुक्ल का "चिंतामणि" और "निबंध निलय" (द्विवेदी, रामविलास के निबंध) निर्धारित हैं।

2026 में हजारी प्रसाद द्विवेदी की आलोचना-दृष्टि का सांस्कृतिक पक्ष और मनोविश्लेषणवादी आलोचना का विकास; 2025 में प्रगतिवादी आलोचना की वर्तमान चुनौतियाँ; 2024 में रामविलास शर्मा की आलोचना-दृष्टि का सांस्कृतिक पक्ष; 2023 में शुक्ल की सैद्धांतिक आलोचना पूछी गई।

2. हिंदी आलोचना का उद्भव और विकास

चरणस्वरूपप्रमुख नाम/रचनाएँ
भारतेंदु युगपुस्तक-समीक्षा, गुण-दोष विवेचन; पत्रिकाओं में आरंभबदरीनारायण चौधरी "प्रेमघन" (आनंद कादंबिनी में "संयोगिता स्वयंवर" की समीक्षा), बालकृष्ण भट्ट
द्विवेदी युगनैतिकतावादी, भाषा-परिष्कार; तुलनात्मक आलोचनामहावीर प्रसाद द्विवेदी; मिश्रबंधु ("हिंदी नवरत्न"); पद्मसिंह शर्मा ("बिहारी सतसई: तुलनात्मक अध्ययन"); देव-बिहारी विवाद
शुक्ल युगव्यवस्थित सैद्धांतिक और व्यावहारिक आलोचना; लोकमंगलरामचंद्र शुक्ल: "चिंतामणि", "रस मीमांसा", "गोस्वामी तुलसीदास", "सूरदास", "जायसी ग्रंथावली" की भूमिका
शुक्लोत्तर: स्वच्छंदतावादीछायावाद का समर्थन, सौष्ठववादीनंददुलारे वाजपेयी, शांतिप्रिय द्विवेदी
ऐतिहासिक-सांस्कृतिकपरंपरा, लोक, मानवतावादहजारी प्रसाद द्विवेदी
प्रगतिवादी/मार्क्सवादीवर्ग-दृष्टि, यथार्थवाद, साहित्य और समाजशिवदान सिंह चौहान, प्रकाशचंद्र गुप्त, रामविलास शर्मा, मुक्तिबोध, नामवर सिंह
मनोविश्लेषणवादीलेखक और पात्र का अवचेतन, कुंठा, दमित इच्छाएँइलाचंद्र जोशी, अज्ञेय (आंशिक), डॉ. नगेंद्र (रस और मनोविज्ञान का संयोग), देवराज
नई समीक्षा (New Criticism) और रूपवादीपाठ-केंद्रित, संरचना, भाषा, बिंब, विडंबनाअज्ञेय, विजयदेव नारायण साही, रामस्वरूप चतुर्वेदी, "नई कविता" के आलोचक
शैलीविज्ञान और बाद के विमर्शभाषा-वैज्ञानिक विश्लेषण; स्त्री, दलित, उत्तर-आधुनिक, उत्तर-औपनिवेशिकरवींद्रनाथ श्रीवास्तव, नित्यानंद तिवारी; विमर्शवादी आलोचक
  • सैद्धांतिक आलोचना: साहित्य के स्वरूप, प्रयोजन, रस, अलंकार, कल्पना, सौंदर्य जैसे सिद्धांतों का निरूपण (शुक्ल की "रस मीमांसा", नगेंद्र की "रस सिद्धांत")।
  • व्यावहारिक आलोचना: किसी विशेष रचना या रचनाकार का मूल्यांकन (शुक्ल की तुलसी, सूर, जायसी पर आलोचना)।

3. आचार्य रामचंद्र शुक्ल (1884-1941)

  • कृतियाँ: "हिंदी साहित्य का इतिहास" (1929), "चिंतामणि" (भाग 1: 1939; मनोविकार और साहित्य-सिद्धांत पर निबंध), "रस मीमांसा" (मरणोपरांत), "गोस्वामी तुलसीदास", "सूरदास", "त्रिवेणी"; "जायसी ग्रंथावली" और "भ्रमरगीत सार" का संपादन।
  • सैद्धांतिक आलोचना के प्रमुख बिंदु:
    • लोकमंगल: काव्य का प्रयोजन लोकमंगल; "साधनावस्था" और "सिद्धावस्था" के लोकमंगल में भेद; इसी कसौटी पर तुलसी सर्वोच्च।
    • रस-सिद्धांत की नई व्याख्या: रस को "हृदय की मुक्तावस्था" और लोक-हृदय में लीन होने की दशा माना ("कविता क्या है" निबंध); साधारणीकरण "आलंबनत्व धर्म" का होता है।
    • भाव और मनोविकार: "चिंतामणि" के निबंध (श्रद्धा-भक्ति, करुणा, लोभ और प्रीति, उत्साह, क्रोध) में भावों का मनोवैज्ञानिक-सामाजिक विश्लेषण।
    • प्रकृति-चित्रण: प्रकृति के आलंबन रूप में वर्णन का समर्थन; उद्दीपन रूप की आलोचना।
    • विरोध: "कलावाद", "अभिव्यंजनावाद" (क्रोचे) और रहस्यवाद का विरोध; यथार्थ और जीवन से जुड़ाव।
    • भाषा: सूत्रात्मक, तर्कपूर्ण, विनोदयुक्त गंभीर गद्य।
  • सीमाएँ: नैतिकतावादी दृष्टि, कबीर और रीति-कवियों के प्रति कठोरता, छायावाद की अपूर्ण समझ, मर्यादावाद।

4. आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी (1907-1979)

  • कृतियाँ: आलोचना-इतिहास: "हिंदी साहित्य की भूमिका" (1940), "कबीर" (1942), "हिंदी साहित्य का आदिकाल" (1952), "नाथ संप्रदाय", "सूर साहित्य"; निबंध: "अशोक के फूल", "कल्पलता", "कुटज", "विचार और वितर्क"; उपन्यास: "बाणभट्ट की आत्मकथा", "चारुचंद्रलेख", "पुनर्नवा", "अनामदास का पोथा"।
  • आलोचना-दृष्टि का सांस्कृतिक पक्ष:
    • परंपरा का सातत्य: हिंदी साहित्य को भारतीय चिंता-धारा (वैदिक, बौद्ध, जैन, सिद्ध-नाथ, लोक) के निरंतर प्रवाह में देखना; भक्ति "हताशा" नहीं, स्वाभाविक विकास।
    • लोक और शास्त्र का संवाद: लोक-परंपरा, लोक-विश्वास और लोक-भाषा की प्रतिष्ठा; शास्त्र को लोक की कसौटी पर परखना।
    • मानवतावाद: "मनुष्य ही साहित्य का लक्ष्य है"; साहित्य का उद्देश्य मनुष्य को पशु-सामान्य धरातल से ऊपर उठाना।
    • कबीर का पुनर्मूल्यांकन: कबीर को अक्खड़, फक्कड़, मस्तमौला व्यक्तित्व और "वाणी के डिक्टेटर" के रूप में प्रतिष्ठित किया; नाथ-सिद्ध परंपरा से संबंध खोजा।
    • सांस्कृतिक समन्वय: आर्य-अनार्य, शास्त्र-लोक, हिंदू-मुस्लिम संस्कृतियों के मेल को भारतीय संस्कृति का मूल स्वभाव माना ("अशोक के फूल" में फूल के इतिहास से संस्कृति का इतिहास)।
    • इतिहास-बोध: साहित्य को उसके संपूर्ण सांस्कृतिक-ऐतिहासिक संदर्भ में; "दूसरी परंपरा" (नामवर सिंह की पुस्तक "दूसरी परंपरा की खोज", 1982, द्विवेदी की इसी दृष्टि पर)।
  • शुक्ल से भिन्नता: शुक्ल का केंद्र तुलसी और लोकमंगल, द्विवेदी का केंद्र कबीर और लोक-परंपरा; शुक्ल नैतिक-मर्यादावादी, द्विवेदी उदार-मानवतावादी।

5. डॉ. रामविलास शर्मा (1912-2000)

  • कृतियाँ: "प्रेमचंद और उनका युग", "भारतेंदु युग", "निराला की साहित्य साधना" (तीन खंड; साहित्य अकादमी 1970), "आचार्य रामचंद्र शुक्ल और हिंदी आलोचना", "महावीर प्रसाद द्विवेदी और हिंदी नवजागरण", "भारत के प्राचीन भाषा परिवार और हिंदी", "भारतीय संस्कृति और हिंदी प्रदेश", "पश्चिमी एशिया और ऋग्वेद"; "परंपरा का मूल्यांकन"। निबंध "तुलसी साहित्य के सामंत-विरोधी मूल्य" (Paper II के निबंध निलय में)।
  • आलोचना-दृष्टि: मार्क्सवादी, पर भारतीय परंपरा से गहरे जुड़े: "परंपरा का मूल्यांकन" उनका केंद्रीय सूत्र। साहित्य को जातीय (राष्ट्रीय) जीवन और उसके सामाजिक-आर्थिक विकास से जोड़ना।
  • सांस्कृतिक पक्ष:
    • हिंदी जाति और हिंदी प्रदेश की अवधारणा: हिंदी भाषी क्षेत्र को एक "जाति" (nationality) के रूप में देखना, जिसकी साझा भाषा, संस्कृति और इतिहास है।
    • लोकजागरण और हिंदी नवजागरण: भक्ति आंदोलन को "लोकजागरण" और 1857 से आरंभ होने वाले "हिंदी नवजागरण" की अवधारणा।
    • परंपरा में प्रगतिशील तत्वों की खोज: वैदिक साहित्य, भक्ति, तुलसी, भारतेंदु, प्रेमचंद, निराला में जन-पक्षधरता; तुलसी के मूल्यों को सामंत-विरोधी सिद्ध करना।
    • भाषा और इतिहास: आर्यों के बाहर से आने के सिद्धांत की आलोचना, भारत के प्राचीन भाषा-परिवारों का अध्ययन।
    • संस्कृति में श्रमिक-किसान जनता की केंद्रीयता; शुक्ल को "लोकवादी" परंपरा के रूप में अपनाना।
  • आलोचना: परंपरा के प्रति अति-उत्साह, कभी-कभी "राष्ट्रवादी" झुकाव; प्रयोगवाद और नई कविता (विशेषकर अज्ञेय) के प्रति कठोरता।

6. डॉ. नगेंद्र (1915-1999)

  • कृतियाँ: "रस सिद्धांत" (साहित्य अकादमी 1965), "रीतिकाव्य की भूमिका", "देव और उनकी कविता", "सुमित्रानंदन पंत", "साकेत: एक अध्ययन", "आधुनिक हिंदी कविता की मुख्य प्रवृत्तियाँ"; "हिंदी साहित्य का इतिहास" (संपादित, 1973); "भारतीय काव्यशास्त्र की भूमिका"।
  • आलोचना-दृष्टि: रसवादी, पर रस-सिद्धांत की आधुनिक-मनोवैज्ञानिक व्याख्या; फ्रायड के मनोविश्लेषण से प्रभावित; साधारणीकरण को "कवि की अपनी अनुभूति" का साधारणीकरण माना (शुक्ल के "आलंबनत्व धर्म" से भिन्न); भारतीय और पाश्चात्य काव्यशास्त्र का समन्वय; व्यक्तिवादी-सौंदर्यवादी झुकाव।
  • महत्व: रीतिकाल और छायावाद का सहानुभूतिपूर्ण पुनर्मूल्यांकन; अकादमिक आलोचना और काव्यशास्त्र को व्यवस्थित किया।

7. प्रगतिवादी और मनोविश्लेषणवादी आलोचना

  • प्रगतिवादी आलोचना: प्रगतिशील लेखक संघ (1936) से; साहित्य समाज का प्रतिबिंब और परिवर्तन का औज़ार; वर्ग-संघर्ष, यथार्थवाद, जन-पक्षधरता; प्रमुख: शिवदान सिंह चौहान, प्रकाशचंद्र गुप्त, रामविलास शर्मा, मुक्तिबोध ("नई कविता का आत्मसंघर्ष", "कामायनी: एक पुनर्विचार"), नामवर सिंह ("कविता के नए प्रतिमान", 1968, साहित्य अकादमी 1971), मैनेजर पांडेय ("साहित्य और इतिहास-दृष्टि")।
  • प्रगतिवादी आलोचना की वर्तमान चुनौतियाँ: (i) सोवियत संघ का विघटन और "विचारधारा के अंत" का विमर्श; (ii) अस्मितावादी विमर्श (दलित, स्त्री, आदिवासी) का यह आरोप कि वर्ग-दृष्टि ने जाति और लिंग की उपेक्षा की; (iii) उत्तर-आधुनिकता और संरचनावाद-उत्तरसंरचनावाद के पाठ-केंद्रित सिद्धांत; (iv) वैश्वीकरण और बाज़ार ने वर्ग-संरचना को जटिल किया; (v) सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का उभार और परंपरा पर नए दावे; (vi) अतीत की यांत्रिकता और "पार्टी-लाइन" आलोचना की छवि। प्रतिक्रिया: अस्मिता-विमर्शों से संवाद, सौंदर्य और विचारधारा का संतुलन (मुक्तिबोध और नामवर की परंपरा), वैश्वीकरण-आलोचना में प्रासंगिकता।
  • मनोविश्लेषणवादी आलोचना का विकास: फ्रायड, एडलर, युंग के प्रभाव में 1930-40 के दशक से; इलाचंद्र जोशी (साहित्य को दमित इच्छाओं की अभिव्यक्ति माना; "साहित्य सर्जना"), अज्ञेय (रचना-प्रक्रिया और व्यक्तित्व, "त्रिशंकु" के निबंध; "पीड़ा" और "कुंठा" की भूमिका), जैनेंद्र के उपन्यासों की मनोवैज्ञानिक व्याख्या, नगेंद्र (रस और मनोविज्ञान का संयोग; "आधुनिक हिंदी कविता की मुख्य प्रवृत्तियाँ" में छायावाद को "स्थूल के प्रति सूक्ष्म का विद्रोह" और कुंठा की अभिव्यक्ति के रूप में देखना), देवराज, डॉ. रघुवंश। योगदान: लेखक के व्यक्तित्व और पात्रों के अंतर्मन की गहरी समझ; छायावाद और मनोवैज्ञानिक कथा की व्याख्या। सीमा: सामाजिक संदर्भ की उपेक्षा, यौन-केंद्रिकता, लेखक के जीवन को रचना का सीधा कारण मानना।
  • नई समीक्षा: टी.एस. इलियट, आई.ए. रिचर्ड्स और अमेरिकी "न्यू क्रिटिसिज़्म" से प्रभावित; रचना को स्वायत्त इकाई मानकर उसकी भाषा, बिंब, विडंबना, तनाव का "निकट पाठ" (close reading); हिंदी में अज्ञेय, साही, रामस्वरूप चतुर्वेदी ("भाषा और संवेदना"), "नई कविता" के आलोचक; प्रगतिवादियों ने इसे "रूपवाद" कहकर आलोचना की।

8. Master Summary Table

आलोचक/धारामूल सूत्रप्रमुख कृति
शुक्ललोकमंगल, रस = हृदय की मुक्तावस्थाचिंतामणि, रस मीमांसा, इतिहास 1929
हजारी प्रसाद द्विवेदीपरंपरा, लोक, मानवतावादहिंदी साहित्य की भूमिका 1940, कबीर 1942
रामविलास शर्मापरंपरा का मूल्यांकन, हिंदी जाति, नवजागरणनिराला की साहित्य साधना, भारतेंदु युग
नगेंद्ररस का मनोवैज्ञानिक पुनर्पाठरस सिद्धांत (1965)
नामवर सिंहनई कविता/कहानी के प्रतिमान, दूसरी परंपराकविता के नए प्रतिमान (1968)
मुक्तिबोधआत्मसंघर्ष, ज्ञानात्मक संवेदनकामायनी: एक पुनर्विचार
मनोविश्लेषणवादीअवचेतन, दमनइलाचंद्र जोशी, अज्ञेय
नई समीक्षानिकट पाठ, स्वायत्त रचनासाही, रामस्वरूप चतुर्वेदी

9. चार्ट: हिंदी आलोचना की चार दृष्टियाँ

साहित्य शुक्लहजारी प्रसाद द्विवेदी रामविलास शर्मानगेंद्र लोकमंगल, नैतिक कसौटीतुलसी केंद्र परंपरा, लोक, मानवतावादकबीर केंद्र वर्ग, हिंदी जाति, नवजागरणनिराला, प्रेमचंद केंद्र रस, मनोविज्ञानरीति, छायावाद केंद्र
सिलेबस के चार प्रमुख आलोचक: हर एक की कसौटी और उसका "प्रिय" कवि।

10. Mind Map

हिंदी आलोचना
उद्भव
  • भारतेंदु-द्विवेदी युग
  • तुलनात्मक, देव-बिहारी विवाद
शुक्ल
  • लोकमंगल, रस
  • सैद्धांतिक + व्यावहारिक
द्विवेदी और रामविलास
  • परंपरा, लोक
  • हिंदी जाति, नवजागरण
धाराएँ
  • प्रगतिवादी, मनोविश्लेषणवादी
  • नई समीक्षा, शैलीविज्ञान
नगेंद्र और आगे
  • रस का पुनर्पाठ
  • नामवर, मुक्तिबोध, विमर्श

11. महत्वपूर्ण One-liners

  • "चिंतामणि" (भाग 1): रामचंद्र शुक्ल (1939)।
  • "हिंदी साहित्य की भूमिका": हजारी प्रसाद द्विवेदी (1940)।
  • "निराला की साहित्य साधना": रामविलास शर्मा।
  • "रस सिद्धांत": नगेंद्र।
  • "कविता के नए प्रतिमान": नामवर सिंह (1968)।
  • "दूसरी परंपरा की खोज": नामवर सिंह (1982)।
  • "कामायनी: एक पुनर्विचार": मुक्तिबोध।
  • "बिहारी सतसई: तुलनात्मक अध्ययन": पद्मसिंह शर्मा।

12. टिप्स एवं ट्रिक्स

उत्तर-लेखन
  • आलोचक-विशेष के प्रश्न में: जीवन/कृतियाँ (संक्षेप), 4-5 सैद्धांतिक बिंदु, एक व्यावहारिक उदाहरण (किस कवि का मूल्यांकन कैसे किया), अन्य आलोचकों से तुलना, सीमाएँ।
  • धारा-विशेष के प्रश्न में: उद्भव (प्रभाव-स्रोत), प्रमुख आलोचक, कसौटियाँ, योगदान, सीमाएँ।
याद रखने की तरकीब

"शुक्ल-तुलसी, द्विवेदी-कबीर, रामविलास-निराला, नगेंद्र-रस"।

सामान्य भूल

नगेंद्र को "मनोविश्लेषणवादी आलोचक" मात्र लिखना: वे मूलतः रसवादी हैं जिन्होंने रस-सिद्धांत की व्याख्या में मनोविज्ञान का उपयोग किया।

13. PYQ-आधारित प्रश्न एवं हल

Q1UPSC 2026 · Paper I · 5(d) · 10 अंक

हजारी प्रसाद द्विवेदी की आलोचना-दृष्टि का सांस्कृतिक पक्ष।

मॉडल उत्तर

खंड 4 के छह बिंदु (सातत्य, लोक-शास्त्र, मानवतावाद, कबीर, समन्वय, इतिहास-बोध), शुक्ल से भिन्नता, "दूसरी परंपरा"। निष्कर्ष: द्विवेदी ने आलोचना को "संस्कृति-चिंतन" बनाया।

Q2UPSC 2024 · Paper I · 5(d) · 10 अंक

रामविलास शर्मा की आलोचना-दृष्टि का सांस्कृतिक पक्ष।

मॉडल उत्तर

खंड 5 के पाँच बिंदु (हिंदी जाति, लोकजागरण-नवजागरण, परंपरा में प्रगतिशील तत्व, भाषा-इतिहास, जनता की केंद्रीयता), आलोचना। निष्कर्ष: मार्क्सवाद और भारतीय परंपरा का अनूठा संगम।

Q3UPSC 2023 · Paper I · 5(e) · 10 अंक

आचार्य रामचंद्र शुक्ल की सैद्धांतिक आलोचना।

मॉडल उत्तर

खंड 3 के छह सैद्धांतिक बिंदु, "कविता क्या है" और "रस मीमांसा" के संदर्भ, सीमाएँ। निष्कर्ष: शुक्ल ने भारतीय रस-सिद्धांत को आधुनिक, लोकोन्मुख आधार दिया।

Q4UPSC 2026 · Paper I · 7(a)

हिंदी की मनोविश्लेषणवादी आलोचना का विकास निरूपित कीजिए।

मॉडल उत्तर (रूपरेखा)

खंड 7: पाश्चात्य स्रोत (फ्रायड, एडलर, युंग), चरण और आलोचक (इलाचंद्र जोशी, अज्ञेय, नगेंद्र, देवराज), योगदान (छायावाद, जैनेंद्र, अज्ञेय के कथा-साहित्य की व्याख्या), सीमाएँ, बाद में प्रगतिवाद और नई समीक्षा से टकराव। निष्कर्ष: इसने आलोचना को "मन के भीतर" झाँकना सिखाया, पर समाज से कटकर एकांगी हुई।

Q5UPSC 2025 · Paper I · 7(a)

प्रगतिवादी आलोचना को वर्तमान समय में किस प्रकार की चुनौतियाँ मिल रही हैं? सोदाहरण विवेचना कीजिए।

मॉडल उत्तर (रूपरेखा)

खंड 7: प्रगतिवादी आलोचना का संक्षिप्त परिचय और उपलब्धियाँ; छह चुनौतियाँ (उदाहरण: दलित विमर्श का "वर्ग बनाम वर्ण" प्रश्न; स्त्री-विमर्श की आलोचना); प्रतिक्रिया और प्रासंगिकता। निष्कर्ष: प्रगतिवादी आलोचना संवादधर्मी बनकर ही प्रासंगिक रह सकती है।

Q6अभ्यास प्रश्न · 15 अंक

शुक्ल और हजारी प्रसाद द्विवेदी की आलोचना-दृष्टि की तुलना कीजिए।

मॉडल उत्तर (रूपरेखा)

तुलना-तालिका: भक्ति का उद्भव (हताशा बनाम स्वाभाविक विकास), केंद्रीय कवि (तुलसी बनाम कबीर), कसौटी (लोकमंगल बनाम मानवतावाद-लोक), इतिहास-पद्धति (परिस्थिति बनाम परंपरा), शैली (तर्क-सूत्र बनाम ललित, सांस्कृतिक)। निष्कर्ष: दोनों परस्पर पूरक; हिंदी आलोचना की "दो परंपराएँ"।

Q7अभ्यास प्रश्न · 15 अंक

नगेंद्र के रस-सिद्धांत की आधुनिक व्याख्या की समीक्षा कीजिए।

मॉडल उत्तर (रूपरेखा)

खंड 6: रस-सिद्धांत की परंपरा (भरत से विश्वनाथ), शुक्ल की व्याख्या, नगेंद्र का साधारणीकरण-मत और मनोविज्ञान का प्रयोग, भारतीय-पाश्चात्य समन्वय; आलोचना (आधुनिक जटिल संवेदना, विशेषकर नई कविता, पर रस की सीमित प्रयोज्यता)।

14. Quick Revision Summary

परीक्षा से पहले एक बार ज़रूर पढ़ें
  • विकास: भारतेंदु-द्विवेदी युग → शुक्ल → स्वच्छंदतावादी, सांस्कृतिक, प्रगतिवादी, मनोविश्लेषणवादी, नई समीक्षा, शैलीविज्ञान, विमर्श।
  • शुक्ल: लोकमंगल, रस, भाव, प्रकृति; सीमाएँ।
  • द्विवेदी: परंपरा, लोक, कबीर, मानवतावाद, सांस्कृतिक पक्ष।
  • रामविलास: परंपरा का मूल्यांकन, हिंदी जाति, नवजागरण, तुलसी के सामंत-विरोधी मूल्य।
  • नगेंद्र: रस सिद्धांत, मनोविज्ञान, रीतिकाल और छायावाद का पुनर्मूल्यांकन।
  • धाराएँ: प्रगतिवादी (चुनौतियाँ), मनोविश्लेषणवादी (विकास), नई समीक्षा।