UPSC Mains · History · Paper II · अध्याय 6

ब्रिटिश विस्तार एवं औपनिवेशिक अर्थव्यवस्था

British Expansion and the Colonial Economy

यूरोपीय कंपनियाँ, प्लासी-बक्सर, सहायक संधि, व्यपगत सिद्धांत; भू-राजस्व व्यवस्थाएँ, धन निकासी, विऔद्योगीकरण, रेलवे और अकाल।

Paper II 22 मिनट

1. अध्याय एक नज़र में

Paper II (आधुनिक भारत) के खंड A का पहला बड़ा भाग:

  • यूरोपीय प्रवेश: पुर्तगाली, डच, अंग्रेज़ और फ़्रांसीसी कंपनियाँ; कर्नाटक युद्ध।
  • ब्रिटिश विस्तार: प्लासी और बक्सर; मैसूर; मराठे (सालबाई); पंजाब (रणजीत सिंह और सिख राजतंत्र)।
  • प्रारंभिक प्रशासनिक ढाँचा: द्वैध शासन से प्रत्यक्ष नियंत्रण; रेगुलेटिंग एक्ट, पिट्स इंडिया एक्ट, चार्टर एक्ट; उपयोगितावाद।
  • औपनिवेशिक अर्थव्यवस्था: स्थायी बंदोबस्त, रैयतवाड़ी, महालवाड़ी; कृषि का वाणिज्यीकरण; विऔद्योगीकरण; धन की निकासी; रेलवे, तार, डाक; अकाल।

2025 में सिख राजतंत्र की "नेपोलियन जैसी" उन्नति और पतन, पेशवाओं के अधीन घरेलू कलह, विऔद्योगीकरण, स्थायी बंदोबस्त पर फ़िज़ियोक्रैट प्रभाव, और कर्नाटक युद्धों में फ़्रांसीसी विफलता पूछी गई। 2024 में "प्लासी के बाद भाड़े का सैनिक राजा-निर्माता बना", उपयोगितावाद और सामाजिक सुधार, कृषि का वाणिज्यीकरण, और सालबाई की संधि की सामरिक क़ीमत आए।

2. यूरोपीय प्रतिद्वंद्विता और कर्नाटक युद्ध

  • कंपनियाँ: अंग्रेज़ ईस्ट इंडिया कंपनी (1600), डच VOC (1602) और फ़्रांसीसी कंपनी (1664, कोलबेर द्वारा, राज्य-नियंत्रित)। अंग्रेज़ों को 1717 में फ़र्रुख़सियर का फ़रमान ("दस्तक" द्वारा बंगाल में कर-मुक्त व्यापार) मिला। डच पेडोंग (बेदारा) के युद्ध (1759) में अंग्रेज़ों से हारकर भारत में पीछे हट गए।
युद्धयूरोपीय संदर्भमुख्य घटनाएँपरिणाम
प्रथम (1746-48)ऑस्ट्रियाई उत्तराधिकार युद्धडूप्ले ने मद्रास पर अधिकार किया; सेंट टोमे (अड्यार) में छोटी फ़्रांसीसी सेना ने नवाब अनवरुद्दीन की बड़ी सेना को हरायाएक्स-ला-शापेल की संधि से मद्रास लौटाया गया; यूरोपीय प्रशिक्षित पैदल सेना की श्रेष्ठता सिद्ध हुई
द्वितीय (1749-54)यूरोप में शांति के समयहैदराबाद और कर्नाटक के उत्तराधिकार विवाद (चंदा साहिब बनाम मुहम्मद अली); क्लाइव द्वारा अर्काट की रक्षा (1751)1754 में डूप्ले को वापस बुलाया गया; गोदेहू संधि
तृतीय (1756-63)सप्तवर्षीय युद्धवांडिवाश (1760): आयर कूट ने लाली को हराया; 1761 में पांडिचेरी का पतनपेरिस की संधि (1763); फ़्रांसीसी केवल व्यापारी बनकर रह गए

फ़्रांसीसी विफलता के कारण (UPSC 2025)

  • प्रारंभिक चमक: डूप्ले की "भारतीय राजनीति में हस्तक्षेप" की नीति (कठपुतली नवाब, जागीरें), प्रशिक्षित सिपाही सेना और बुसी का हैदराबाद पर प्रभाव, जिसने भारतीय शासकों को चकित कर दिया।
  • विफलता के कारण:
    • कंपनी का स्वरूप: फ़्रांसीसी कंपनी राज्य-नियंत्रित थी; निर्णय पेरिस में होते थे; पूँजी और लाभ कम थे। अंग्रेज़ कंपनी निजी, व्यावसायिक और लाभदायक थी।
    • वित्त: डूप्ले के युद्धों से कंपनी पर कर्ज़ बढ़ा, इसलिए 1754 में उसे वापस बुलाया गया।
    • नौसेना: ब्रिटिश नौसैनिक श्रेष्ठता से फ़्रांसीसी आपूर्ति और सैनिक-सहायता कट गई।
    • बंगाल के संसाधन: प्लासी (1757) के बाद अंग्रेज़ों को बंगाल का धन मिला, जबकि फ़्रांसीसी दक्कन पर निर्भर थे।
    • प्राथमिकताएँ: फ़्रांसीसी सरकार का ध्यान यूरोप और अमेरिका पर था।
    • नेतृत्व: लाली का अहंकार और साथियों से टकराव; बुसी को हैदराबाद से वापस बुलाना एक भूल थी।
  • निष्कर्ष: फ़्रांसीसी "राजनीतिक कल्पना" में आगे थे, पर "आर्थिक और नौसैनिक आधार" में पीछे। इसी असंतुलन ने उनकी शानदार शुरुआत को अपमानजनक अंत में बदल दिया।

3. बंगाल: प्लासी, बक्सर और कंपनी-राज

  • प्लासी (23 जून 1757): सिराजुद्दौला बनाम क्लाइव। यह युद्ध से अधिक षड्यंत्र था: मीर जाफ़र (सेनापति), जगत सेठ (साहूकार), अमीचंद और राय दुर्लभ।
  • बक्सर (22 अक्टूबर 1764): मीर क़ासिम, अवध के शुजाउद्दौला और मुग़ल सम्राट शाह आलम द्वितीय की संयुक्त सेना हारी। इलाहाबाद की संधि (1765) से कंपनी को बंगाल, बिहार और ओडिशा की "दीवानी" (राजस्व अधिकार) मिली।
  • द्वैध शासन (1765-72): राजस्व कंपनी के पास, प्रशासन नवाब के पास, यानी "शक्ति बिना उत्तरदायित्व"। 1770 का बंगाल अकाल (जनसंख्या का लगभग एक-तिहाई प्रभावित होने का अनुमान) इसकी दुखद परिणति था। 1772 में वारेन हेस्टिंग्स ने द्वैध शासन समाप्त किया।

"प्लासी के बाद भाड़े का सैनिक राजा-निर्माता बना" (UPSC 2024)

  • अर्थ: कंपनी, जो मूलतः एक व्यापारिक संस्था थी और भारतीय सिपाहियों की "भाड़े की" सेना रखती थी, बंगाल में नवाबों को बनाने और हटाने लगी।
  • प्रमाण:
    • 1757 में मीर जाफ़र को नवाब बनाया गया, बदले में कंपनी को 24 परगना की ज़मींदारी, भारी "उपहार" और क्लाइव को जागीर मिली।
    • 1760 में मीर जाफ़र को हटाकर मीर क़ासिम को नवाब बनाया गया, बदले में बर्दवान, मिदनापुर और चटगाँव मिले।
    • 1763 में मीर क़ासिम (जिसने दस्तक के दुरुपयोग का विरोध किया और सेना का आधुनिकीकरण किया) को हटाकर फिर मीर जाफ़र को लाया गया।
    • 1765 में नज्मुद्दौला नवाब बना, और दीवानी कंपनी को मिल गई।
  • परिणाम: नवाबी केवल नाम की रह गई; बंगाल के राजस्व से कंपनी की सेना और व्यापार का वित्तपोषण हुआ (भारत की "विजय भारत के धन से"); कंपनी के कर्मचारियों का निजी भ्रष्टाचार बढ़ा (Nabobs); और ब्रिटिश संसद ने हस्तक्षेप किया (रेगुलेटिंग एक्ट, 1773)।
  • निष्कर्ष: प्लासी ने भारत में "व्यापारी से शासक" बनने की प्रक्रिया शुरू की। कथन व्यंग्यात्मक, पर ऐतिहासिक रूप से सटीक है।

4. मैसूर, मराठे और पंजाब

  • मैसूर: हैदर अली और टीपू सुल्तान। चार आंग्ल-मैसूर युद्ध: 1767-69, 1780-84 (मंगलौर की संधि), 1790-92 (श्रीरंगपट्टनम की संधि; आधा राज्य छिना) और 1799 (टीपू की मृत्यु)। टीपू का आधुनिकीकरण उल्लेखनीय है: रॉकेट, फ़्रांसीसी संपर्क, व्यापार-प्रोत्साहन और नई मुद्रा।
  • सहायक संधि (वेलेज़ली, 1798): देशी राज्य में ब्रिटिश सेना और रेज़िडेंट रखा जाता था, जिसका ख़र्च राज्य उठाता था; विदेश नीति ब्रिटिश नियंत्रण में चली जाती थी। हैदराबाद पहला प्रमुख राज्य था जिसने इसे स्वीकार किया।
  • व्यपगत का सिद्धांत (डलहौज़ी): सतारा (1848), झाँसी और नागपुर (1853-54) का विलय; 1856 में "कुशासन" के आधार पर अवध का विलय।

पेशवाओं के अधीन घरेलू कलह के बीज (UPSC 2025)

  • संरचनात्मक कारण:
    • छत्रपति (सतारा) केवल नाममात्र का शासक रह गया और पेशवा वास्तविक शासक बना, जिससे वैधता का द्वैत पैदा हुआ।
    • मराठा संघ के सरदार (सिंधिया, होल्कर, गायकवाड़, भोंसले) अपने-अपने क्षेत्रों में लगभग स्वतंत्र थे, और "सरंजाम" वंशानुगत हो गए।
    • सरदारों के बीच प्रतिद्वंद्विता थी, जैसे सिंधिया और होल्कर।
  • पारिवारिक कलह: 1773 में नारायणराव की हत्या हुई, जिसमें रघुनाथराव की भूमिका मानी गई। "बारभाई" परिषद (नाना फडणवीस) ने इसका विरोध किया, और रघुनाथराव अंग्रेज़ों से जा मिला (सूरत की संधि, 1775), जिससे प्रथम आंग्ल-मराठा युद्ध हुआ।
  • सामाजिक तनाव: चितपावन ब्राह्मणों का प्रशासन पर प्रभुत्व और मराठा सरदारों में असंतोष।
  • व्यक्तिगत प्रतिद्वंद्विता: महादजी सिंधिया और नाना फडणवीस; दोनों की मृत्यु (1794 और 1800) के बाद नेतृत्व-शून्य।
  • परिणाम: बाजीराव द्वितीय ने होल्कर से हारकर 1802 में बसीन की संधि (सहायक संधि) स्वीकार की, जिससे दूसरा (1803-05) और तीसरा (1817-18) आंग्ल-मराठा युद्ध हुआ और पेशवाई का अंत हुआ।
  • निष्कर्ष: कथन सही है। मराठा शक्ति की संरचना में ही विखंडन के बीज थे, जिनका लाभ अंग्रेज़ों ने उठाया।

सालबाई की संधि (1782) (UPSC 2024)

  • प्रावधान: 17 मई 1782 को महादजी सिंधिया की मध्यस्थता से प्रथम आंग्ल-मराठा युद्ध का अंत हुआ। सालसेट द्वीप अंग्रेज़ों के पास रहा, रघुनाथराव को पेंशन दी गई, और यथास्थिति (status quo) बनी रही। इसके बाद लगभग बीस वर्ष शांति रही।
  • मराठों के लिए सामरिक क़ीमत:
    • अंग्रेज़ों को अमेरिकी स्वतंत्रता संग्राम के बाद पुनर्गठित होने का समय मिला।
    • अंग्रेज़ों ने इस शांति में मैसूर (टीपू) से निपट लिया। मराठों ने 1790-92 में उलटे अंग्रेज़ों का साथ दिया, जिससे एकमात्र संभावित भारतीय सहयोगी कमज़ोर हुआ।
    • मराठों ने आधुनिक सेना और नौसेना का संस्थागत विकास नहीं किया; महादजी की यूरोपीय प्रशिक्षित बटालियनें व्यक्तिगत थीं, संघ की नहीं।
    • संघ में आंतरिक फूट बढ़ती रही।
    • अंग्रेज़ों ने मराठा राजनीति में "मध्यस्थ" और "रेज़िडेंट" के रूप में पैर जमाए।
  • निष्कर्ष: सालबाई अल्पकाल में मराठा कूटनीति की सफलता थी, पर दीर्घकाल में "रणनीतिक भूल" सिद्ध हुई, क्योंकि शांति का लाभ शत्रु ने अधिक उठाया।

सिख राजतंत्र (UPSC 2025)

  • उत्थान: रणजीत सिंह (1780-1839) ने सुकरचकिया मिसल से शुरुआत की, 1799 में लाहौर पर अधिकार किया और 1801 में "महाराजा" की उपाधि ली। मुल्तान (1818), कश्मीर (1819) और पेशावर (1834) जीते। अमृतसर की संधि (1809) से सतलुज अंग्रेज़ों के साथ सीमा बनी।
  • सफलता के कारण: सेना का आधुनिकीकरण, जिसमें यूरोपीय अधिकारियों (वेंतूरा, आलार्ड, अविताबिले, कोर्ट) द्वारा प्रशिक्षित "फ़ौज-ए-ख़ास" और तोपख़ाना शामिल था; धर्मनिरपेक्ष प्रशासन (फ़क़ीर अज़ीज़ुद्दीन, डोगरा, ब्राह्मण); और कूटनीति, यानी अंग्रेज़ों से टकराव से बचना।
  • पतन: 1839 में उनकी मृत्यु के बाद उत्तराधिकार का संकट (खड़क सिंह, नौनिहाल सिंह, शेर सिंह, और रानी जिंदाँ के संरक्षण में दलीप सिंह); सेना की "पंचायतों" का राजनीतिक हो जाना; दरबारी षड्यंत्र (डोगरा)। पहला आंग्ल-सिख युद्ध (1845-46; लाहौर की संधि) और दूसरा (1848-49) हुआ, और 1849 में डलहौज़ी ने पंजाब का विलय किया।
  • "नेपोलियन जैसा" कथन: उत्थान अचानक (बीस वर्षों में बिखरी मिसलों से साम्राज्य तक), सफलता शानदार, और पतन पूर्ण (मृत्यु के दस वर्ष के भीतर)।
  • मूल्यांकन: कथन सटीक है, पर कारण स्पष्ट करना ज़रूरी है: व्यक्तिगत राजतंत्र में संस्थानीकरण का अभाव, उत्तराधिकार की कोई स्पष्ट व्यवस्था न होना, और शक्तिशाली सेना का स्वयं राजनीतिक शक्ति बन जाना। नेपोलियन से भिन्नता यह है कि रणजीत सिंह ने कोई स्थायी संहिता या संस्थाएँ नहीं छोड़ीं।

5. प्रशासनिक ढाँचा और उपयोगितावाद

अधिनियममुख्य प्रावधान
रेगुलेटिंग एक्ट (1773)बंगाल का गवर्नर, गवर्नर-जनरल बना (वारेन हेस्टिंग्स); चार सदस्यों की परिषद; कलकत्ता में सर्वोच्च न्यायालय (1774); कंपनी पर संसदीय नियंत्रण की शुरुआत
पिट्स इंडिया एक्ट (1784)बोर्ड ऑफ़ कंट्रोल; दोहरा नियंत्रण (कंपनी और ब्रिटिश सरकार)
चार्टर एक्ट (1813)व्यापारिक एकाधिकार समाप्त (चाय और चीन-व्यापार को छोड़कर); शिक्षा पर एक लाख रुपये; मिशनरियों को अनुमति
चार्टर एक्ट (1833)भारत का गवर्नर-जनरल (बेंटिंक); कंपनी की व्यापारिक भूमिका समाप्त; विधि आयोग; पदों पर भेदभाव निषेध (धारा 87, पर व्यवहार में नहीं)
चार्टर एक्ट (1853)सिविल सेवा में खुली प्रतियोगिता; विधायी और कार्यकारी कार्यों का पृथक्करण

उपयोगितावाद और सामाजिक सुधार (UPSC 2024)

  • सिद्धांत: जेरेमी बेंथम का "अधिकतम लोगों का अधिकतम सुख"; जेम्स मिल ("History of British India", 1817) ने भारतीय समाज को "पिछड़ा" बताते हुए अच्छे क़ानून और प्रशासन से सुधार की बात कही; जॉन स्टुअर्ट मिल ने भी कंपनी में काम किया।
  • सुधार:
    • बेंटिंक (1828-35): सती-प्रथा का उन्मूलन (1829), ठगी का दमन (स्लीमैन) और कन्या-वध के विरुद्ध उपाय।
    • मैकाले का शिक्षा कार्यवृत्त (1835) और अंग्रेज़ी शिक्षा।
    • विधि का संहिताकरण: मैकाले की अध्यक्षता में विधि आयोग, भारतीय दंड संहिता का मसौदा (1837), जो 1860 में लागू हुआ।
    • राजस्व में रिकार्डो के "लगान सिद्धांत" का प्रयोग (उत्तर-पश्चिमी प्रांतों के महालवाड़ी और बंबई के बंदोबस्त; प्रिंगल)।
  • इतिहासलेखन: एरिक स्टोक्स (The English Utilitarians and India, 1959) ने दिखाया कि भारत उपयोगितावादी विचारों की "प्रयोगशाला" बना।
  • सीमाएँ:
    • सुधार औपनिवेशिक श्रेष्ठता की भावना से प्रेरित थे ("सभ्य बनाने का मिशन")।
    • भारतीय सुधारकों (राममोहन राय) की भूमिका भी उतनी ही महत्वपूर्ण थी।
    • 1857 के बाद सामाजिक हस्तक्षेप से पीछे हटना पड़ा।
    • उदारवादी और रूढ़िवादी (मुनरो, एल्फ़िंस्टन जैसे "पितृवादी") प्रशासकों के मतभेद।
    • क़ानून और राजस्व में व्यावहारिक हितों की प्रधानता।
  • निष्कर्ष: उपयोगितावाद ने कंपनी-प्रशासन को "विधि, संहिता और सुधार" की भाषा दी, पर उसका मूल उद्देश्य औपनिवेशिक शासन को कुशल और वैध बनाना था।

6. औपनिवेशिक अर्थव्यवस्था

व्यवस्थाक्षेत्र और वर्षकिससे बंदोबस्तविशेषताएँ और प्रभाव
स्थायी बंदोबस्तबंगाल, बिहार, ओडिशा; 1793 (कॉर्नवालिस)ज़मींदारराजस्व सदा के लिए निश्चित (लगान का लगभग 10/11 भाग राज्य को); "सूर्यास्त क़ानून"; पुराने ज़मींदारों का पतन और नए ज़मींदार; किसानों का शोषण; उप-सामंतीकरण (पत्तनी)
रैयतवाड़ीमद्रास (मुनरो और रीड, 1820), बंबईकिसान (रैयत)उच्च राजस्व-दर (लगभग आधा); समय-समय पर पुनर्निर्धारण; साहूकारों पर निर्भरता
महालवाड़ीउत्तर-पश्चिमी प्रांत (होल्ट मैकेंज़ी, 1822; आर.एम. बर्ड), पंजाबग्राम-समुदाय (महाल)संयुक्त उत्तरदायित्व; अत्यधिक माँग

स्थायी बंदोबस्त और फ़िज़ियोक्रैट विचार (UPSC 2025)

  • फ़िज़ियोक्रैट विचार (फ़्रांस्वा क्वेस्ने): भूमि ही धन का एकमात्र वास्तविक स्रोत है; कृषि ही "उत्पादक" है; भूमि पर निजी संपत्ति और "अहस्तक्षेप" (laissez-faire)।
  • प्रभाव का तर्क: रणजीत गुहा (A Rule of Property for Bengal, 1963) के अनुसार बंगाल परिषद के सदस्य फ़िलिप फ़्रांसिस के 1776 के प्रस्ताव पर फ़िज़ियोक्रैट विचारों का गहरा प्रभाव था: भूमि पर निश्चित कर, ज़मींदारों को स्थायी संपत्ति-अधिकार, और कृषि में निवेश से समृद्धि। कॉर्नवालिस ने 1793 में इन्हीं विचारों को लागू किया।
  • अन्य कारक:
    • व्हिग विचारधारा: इंग्लैंड के "भूस्वामी अभिजात" जैसा वर्ग भारत में बनाना, जो सुधार करे और शासन का समर्थक बने।
    • व्यावहारिक कारण: 1770 के अकाल के बाद राजस्व में अस्थिरता, बार-बार के अल्पकालिक ठेकों की विफलता, कंपनी को निश्चित आय की आवश्यकता, और संग्रह में सरलता।
    • एडम स्मिथ के मुक्त-बाज़ार विचार।
  • निष्कर्ष: फ़िज़ियोक्रैट विचारों ने बंदोबस्त को "बौद्धिक औचित्य" दिया, पर उसका निर्णायक कारण कंपनी की वित्तीय और प्रशासनिक आवश्यकताएँ थीं। परिणाम अपेक्षा के विपरीत रहे: ज़मींदार "सुधारक" नहीं, "किराया वसूलने वाले" बने।

कृषि का वाणिज्यीकरण (UPSC 2024)

  • फ़सलें और क्षेत्र: नील (बंगाल-बिहार; 1859-60 का नील विद्रोह), अफ़ीम (बिहार और मालवा; चीन-व्यापार के लिए), कपास (दक्कन; अमेरिकी गृहयुद्ध (1861-65) के समय उछाल और फिर गिरावट, जिसके बाद 1875 के दक्कन दंगे हुए), जूट (बंगाल), चाय (असम; 1830 के दशक से बागान), गन्ना, और गेहूँ (पंजाब की नहर-बस्तियाँ)।
  • ब्रिटिश राजस्व-नीति की भूमिका:
    • ऊँची और नक़द राजस्व-माँग, जिसे पूरा करने के लिए किसानों को नक़दी फ़सलें उगानी और बेचनी पड़ीं।
    • समय पर कर-भुगतान की बाध्यता, जिससे साहूकारों से ऋण लेना पड़ा।
    • भूमि का "बिकाऊ संपत्ति" बन जाना।
  • अन्य कारक: ब्रिटिश उद्योग की कच्चे माल की माँग, निर्यात-बाज़ार, रेलवे (1853 से), स्वेज़ नहर (1869), और बागान-पूँजी।
  • परिणाम:
    • "बलात् वाणिज्यीकरण", यानी किसान लाभ के लिए नहीं, कर और ऋण के दबाव में नक़दी फ़सलें उगाते थे।
    • ऋणग्रस्तता और भूमि का साहूकारों के हाथ में जाना (दक्कन कृषक राहत अधिनियम, 1879; पंजाब भूमि हस्तांतरण अधिनियम, 1900)।
    • खाद्य फ़सलों का क्षेत्र घटना और अकालों की तीव्रता।
    • मूल्य-अस्थिरता (कपास का संकट)।
    • कुछ क्षेत्रों में समृद्धि (पंजाब की नहर-बस्तियाँ)।
  • बहस: तीर्थंकर रॉय जैसे आर्थिक इतिहासकार बाज़ार-विस्तार के सकारात्मक पक्ष पर बल देते हैं।
  • निष्कर्ष: राजस्व-नीतियों ने वाणिज्यीकरण की "गति" बढ़ाई, पर उसका लाभ किसान के बजाय साहूकार, व्यापारी और औपनिवेशिक अर्थव्यवस्था को मिला।

विऔद्योगीकरण (UPSC 2025)

  • कथन: औपनिवेशिक शासन ने भारतीय बाज़ार को ब्रिटिश मशीन-निर्मित वस्तुओं के लिए खोला और देशी हस्तशिल्प उद्योगों को नष्ट कर दिया।
  • कारण:
    • 1813 के बाद "एकतरफ़ा मुक्त व्यापार": भारत में ब्रिटिश वस्तुओं पर नाममात्र शुल्क, जबकि ब्रिटेन में भारतीय वस्त्रों पर ऊँचे शुल्क (उन्नीसवीं शताब्दी के प्रारंभ में कुछ वस्त्रों पर 70-80% तक)।
    • सस्ता मशीन-निर्मित कपड़ा।
    • दरबारी संरक्षण का अंत (रियासतों का विलय)।
    • कंपनी द्वारा बुनकरों पर दबाव (अग्रिम-भुगतान और कम दाम)।
    • कच्चे कपास का निर्यात।
    • रेलवे से गाँवों तक ब्रिटिश माल की पहुँच।
  • प्रमाण: ढाका के मलमल उद्योग का पतन और ढाका की जनसंख्या में गिरावट। अमिय बागची के अध्ययन के अनुसार गंगा-क्षेत्र के बिहार में औद्योगिक जनसंख्या का अनुपात 1809-13 में 18.6% से घटकर 1901 में 8.5% रह गया।
  • बहस: मॉरिस डी. मॉरिस (1968) और तीर्थंकर रॉय के अनुसार हस्तशिल्प का पूर्ण विनाश नहीं, बल्कि "पुनर्गठन" हुआ: हथकरघा ने सस्ते मशीन-निर्मित धागे से नए बाज़ार पाए, और विलासिता-वस्तुएँ घटीं जबकि मोटा कपड़ा टिका रहा। उन्नीसवीं शताब्दी के अंत में आधुनिक कपड़ा मिलें (मुंबई, अहमदाबाद) भी उभरीं।
  • निष्कर्ष: विऔद्योगीकरण एक वास्तविक प्रक्रिया थी, विशेषकर कुछ क्षेत्रों और उत्पादों में, जिसने कारीगरों को कृषि पर निर्भर बनाया ("कृषि पर बढ़ता बोझ")। पर इसका पैमाना और स्वरूप क्षेत्र-विशेष के अनुसार भिन्न था।
010%20% 18.6%1809-13 8.5%1901 स्रोत: अमिय बागची का अध्ययन (गंगा-क्षेत्र का बिहार)
विऔद्योगीकरण का एक प्रसिद्ध प्रमाण: गंगा-क्षेत्र के बिहार में कुल जनसंख्या में औद्योगिक जनसंख्या का अनुपात लगभग आधे से भी कम रह गया (अमिय बागची के आँकड़े)।
  • धन की निकासी: दादाभाई नौरोजी ("Poverty and Un-British Rule in India", 1901) और आर.सी. दत्त ("Economic History of India", 1901-03) ने इसकी व्याख्या की। "होम चार्जेज़" (पेंशन, ब्याज, सैन्य व्यय), कंपनी के लाभ और कर्मचारियों की बचत ब्रिटेन जाती थीं, जिसके बदले भारत को कोई समान लाभ नहीं मिलता था।
  • रेलवे, तार और डाक: पहली रेल 1853 में बंबई-ठाणे के बीच चली; डलहौज़ी के समय तार और 1854 में डाक व्यवस्था का आधुनिकीकरण हुआ। रेलवे के निर्माण में "गारंटी प्रणाली" थी, यानी ब्रिटिश निवेशकों को 5% की गारंटी, जिसका भार भारतीय करदाताओं पर था। रेलवे ने बंदरगाह और भीतरी भागों को जोड़कर निर्यात और आयात बढ़ाया, बाज़ार का एकीकरण किया, अकाल-राहत में मदद की, पर साथ ही विऔद्योगीकरण भी बढ़ाया।
  • अकाल: 1770 (बंगाल), 1876-78, 1896-97, 1899-1900 और 1943 (बंगाल)। अकाल आयोग (1880 में स्ट्रैची, 1898, 1901) बने और "अकाल संहिता" बनाई गई।
  • यूरोपीय व्यावसायिक उद्यम और उसकी सीमाएँ: बागान, जूट मिलें और खनन पर "प्रबंध एजेंसियों" का नियंत्रण; भारतीय उद्यम की बाधाएँ (भेदभावपूर्ण ऋण और शुल्क नीतियाँ)। फिर भी टाटा (TISCO, 1907) जैसे भारतीय उद्यम उभरे।

7. Master Summary Table

विषयमुख्य तथ्ययाद रखें
कर्नाटक युद्ध1746-48, 1749-54, 1756-63वांडिवाश 1760; पेरिस 1763
प्लासी और बक्सर1757; 1764; दीवानी 1765राजा-निर्माता कंपनी
मराठेसालबाई 1782; बसीन 1802नारायणराव की हत्या 1773
सिख राजलाहौर 1799; अमृतसर 1809विलय 1849
अधिनियम1773, 1784, 1813, 1833, 1853बोर्ड ऑफ़ कंट्रोल 1784
उपयोगितावादबेंथम, जेम्स मिल; बेंटिंकस्टोक्स 1959
स्थायी बंदोबस्त1793; फ़िज़ियोक्रैट प्रभावरणजीत गुहा 1963
वाणिज्यीकरणनील, अफ़ीम, कपास, जूट, चायदक्कन दंगे 1875
विऔद्योगीकरणबागची: 18.6% से 8.5%मॉरिस और रॉय की आपत्ति
निकासीनौरोजी 1901; आर.सी. दत्तहोम चार्जेज़

8. Mind Map

ब्रिटिश विस्तार और औपनिवेशिक अर्थव्यवस्था
प्रतिद्वंद्विता
  • कर्नाटक युद्ध
  • फ़्रांसीसी विफलता
विस्तार
  • प्लासी, बक्सर, मैसूर
  • मराठे, सिख, सहायक संधि
प्रशासन
  • अधिनियम
  • उपयोगितावाद
भूमि
  • स्थायी, रैयतवाड़ी, महालवाड़ी
  • वाणिज्यीकरण
प्रभाव
  • विऔद्योगीकरण, निकासी
  • रेलवे, अकाल

9. महत्वपूर्ण One-liners

  • फ़र्रुख़सियर का फ़रमान: 1717।
  • वांडिवाश का युद्ध: 1760 (आयर कूट बनाम लाली)।
  • दीवानी की प्राप्ति: इलाहाबाद की संधि (1765)।
  • सालबाई की संधि के मध्यस्थ: महादजी सिंधिया।
  • सहायक संधि स्वीकार करने वाला पहला प्रमुख राज्य: हैदराबाद (1798)।
  • "A Rule of Property for Bengal": रणजीत गुहा (1963)।
  • "The English Utilitarians and India": एरिक स्टोक्स (1959)।
  • सती-प्रथा का उन्मूलन: 1829 (बेंटिंक)।
  • पहली रेलगाड़ी: 1853 (बंबई-ठाणे)।
  • "Poverty and Un-British Rule in India": दादाभाई नौरोजी।

10. टिप्स एवं ट्रिक्स

आधुनिक भारत के उत्तर
  • Paper II के Q1 के "कथन" वाले प्रश्नों में 150 शब्दों में कथन का अर्थ, दो-तीन प्रमाण, एक प्रति-तर्क और निर्णय लिखें।
  • आर्थिक प्रश्नों में राष्ट्रवादी (नौरोजी, दत्त), मार्क्सवादी (बागची, हबीब) और संशोधनवादी (मॉरिस, रॉय) तीनों दृष्टियों का उल्लेख करें।
  • भूमि-व्यवस्थाओं की तुलना-तालिका हमेशा अंक दिलाती है।
याद रखने की तरकीब

अधिनियमों का क्रम: "73-84-13-33-53" (रेगुलेटिंग, पिट्स, चार्टर, चार्टर, चार्टर)। भूमि-व्यवस्थाएँ: "ज़मींदार-रैयत-महाल"।

11. PYQ-आधारित प्रश्न एवं मॉडल उत्तर

Q1UPSC 2025 · Paper II · 2(a)

क्या आप सहमत हैं कि 1793 में बंगाल में भू-राजस्व के स्थायी निर्धारण का विचार फ़िज़ियोक्रैट विचारधारा से अत्यधिक प्रभावित था? विवेचना कीजिए।

मॉडल उत्तर (रूपरेखा)

फ़िज़ियोक्रैट विचार: क्वेस्ने; भूमि ही धन; निजी संपत्ति; अहस्तक्षेप।

प्रभाव: फ़िलिप फ़्रांसिस (1776); रणजीत गुहा (1963); कॉर्नवालिस।

अन्य कारक: व्हिग भूस्वामी विचार; 1770 के बाद की अस्थिरता; निश्चित आय; संग्रह; एडम स्मिथ।

परिणाम: ज़मींदार "सुधारक" नहीं बने; सूर्यास्त क़ानून; किसानों का शोषण।

निष्कर्ष: आंशिक सहमति; बौद्धिक औचित्य फ़िज़ियोक्रैट था, निर्णायक कारण व्यावहारिक।

Q2UPSC 2025 · Paper II · 3(a)

"कर्नाटक युद्धों के दौरान फ़्रांसीसी स्थिति, जिसने एक समय अपनी राजनीतिक सफलताओं से भारतीय जगत को चकित कर दिया था, अपमान और विफलता में समाप्त होने के लिए अभिशप्त थी।" स्पष्ट कीजिए।

मॉडल उत्तर (रूपरेखा)

प्रारंभिक चमक: डूप्ले, सेंट टोमे, बुसी, कठपुतली नवाब।

तीन युद्ध: तालिका।

विफलता के कारण: राज्य-नियंत्रित कंपनी, वित्त, नौसेना, बंगाल के संसाधन, फ़्रांस की प्राथमिकताएँ, लाली।

निष्कर्ष: "राजनीतिक कल्पना बनाम आर्थिक और नौसैनिक आधार"।

Q3UPSC 2024 · Paper II · 2(a)

ब्रिटिश राजस्व नीतियों के परिणामस्वरूप भारत में कृषि के वाणिज्यीकरण की गति बढ़ी। आलोचनात्मक परीक्षण कीजिए।

मॉडल उत्तर (रूपरेखा)

फ़सलें और क्षेत्र: नील, अफ़ीम, कपास, जूट, चाय, गेहूँ; मानचित्र।

राजस्व-नीति की भूमिका: नक़द माँग, समयबद्धता, ऋण, बिकाऊ भूमि।

अन्य कारक: ब्रिटिश उद्योग, निर्यात, रेलवे, स्वेज़।

परिणाम: बलात् वाणिज्यीकरण, ऋणग्रस्तता, अकाल, अस्थिरता; पंजाब की समृद्धि।

बहस: तीर्थंकर रॉय।

निष्कर्ष: गति बढ़ी, पर लाभ किसान को कम मिला।

Q4UPSC 2024 · Paper II · 3(c)

सालबाई की संधि से प्राप्त बीस वर्षों की शांति मराठों को सामरिक दृष्टि से बहुत महँगी पड़ी। स्पष्ट कीजिए।

मॉडल उत्तर (रूपरेखा)

संधि: 1782; महादजी; प्रावधान।

सामरिक क़ीमत: ब्रिटिश पुनर्गठन; मैसूर से निपटना और मराठों का ब्रिटिश पक्ष लेना; आधुनिकीकरण का अभाव; फूट; रेज़िडेंट।

परिणाम: बसीन (1802), दूसरा और तीसरा युद्ध।

निष्कर्ष: अल्पकालिक कूटनीतिक सफलता, दीर्घकालिक रणनीतिक भूल।

Q5UPSC 2025 · Paper II · 1(a) · 10 अंक

"सिख राजतंत्र अपने उत्थान की आकस्मिकता, अपनी सफलता की चमक और अपने पतन की पूर्णता में नेपोलियन जैसा था।" आलोचनात्मक परीक्षण कीजिए।

मॉडल उत्तर

उत्थान: 1799, 1801; मुल्तान, कश्मीर, पेशावर; फ़ौज-ए-ख़ास।

पतन: उत्तराधिकार का संकट, सेना की पंचायतें, दो युद्ध, 1849।

मूल्यांकन: उपमा सटीक; कारण: संस्थानीकरण का अभाव; नेपोलियन से भिन्नता (कोई संहिता नहीं)।

Q6UPSC 2025 · Paper II · 1(b) · 10 अंक

"पेशवाओं के अधीन मराठा व्यवस्था में घरेलू कलह के बीज गहराई से बोए गए थे।" आलोचनात्मक परीक्षण कीजिए।

मॉडल उत्तर

संरचना: छत्रपति बनाम पेशवा; स्वायत्त सरदार; वंशानुगत सरंजाम।

कलह: नारायणराव की हत्या, रघुनाथराव, बारभाई; महादजी और नाना; चितपावन प्रभुत्व।

परिणाम: बसीन 1802; पेशवाई का अंत।

Q7UPSC 2025 · Paper II · 1(e) · 10 अंक

"औपनिवेशिक शासन ने भारतीय बाज़ारों को ब्रिटिश निर्मित वस्तुओं के लिए खोला और विऔद्योगीकरण, यानी देशी हस्तशिल्प उद्योगों के विनाश को जन्म दिया।" आलोचनात्मक परीक्षण कीजिए।

मॉडल उत्तर

कारण: एकतरफ़ा मुक्त व्यापार, शुल्क, संरक्षण का अंत, कच्चा कपास, रेलवे।

प्रमाण: ढाका; बागची (18.6% से 8.5%)।

प्रति-तर्क: मॉरिस और रॉय; पुनर्गठन; मिलें।

निष्कर्ष: वास्तविक, पर क्षेत्रानुसार भिन्न।

Q8UPSC 2024 · Paper II · 1(a) · 10 अंक

प्लासी के युद्ध के बाद भाड़े का सैनिक राजा-निर्माता बन गया। आलोचनात्मक परीक्षण कीजिए।

मॉडल उत्तर

प्रमाण: मीर जाफ़र (1757), मीर क़ासिम (1760), फिर मीर जाफ़र (1763), नज्मुद्दौला और दीवानी (1765)।

परिणाम: नाममात्र की नवाबी; बंगाल का धन; Nabobs; रेगुलेटिंग एक्ट।

निष्कर्ष: व्यापारी से शासक बनने की शुरुआत।

Q9UPSC 2024 · Paper II · 1(b) · 10 अंक

उपयोगितावाद के मूल्यों ने कंपनी प्रशासन को भारतीय समाज में सुधार का प्रयास करने के लिए प्रेरित किया। आलोचनात्मक परीक्षण कीजिए।

मॉडल उत्तर

सिद्धांत: बेंथम, जेम्स मिल।

सुधार: सती 1829, ठगी, मैकाले, IPC, रिकार्डो का लगान।

सीमाएँ: श्रेष्ठता-भाव, भारतीय सुधारकों की भूमिका, 1857 के बाद पीछे हटना, पितृवादी प्रशासक।

इतिहासलेखन: स्टोक्स।

12. Quick Revision Summary

परीक्षा से पहले एक बार ज़रूर पढ़ें
  • यूरोपीय: कंपनियाँ, फ़रमान, कर्नाटक युद्ध, फ़्रांसीसी विफलता।
  • बंगाल: प्लासी, बक्सर, दीवानी, द्वैध शासन, "राजा-निर्माता" कंपनी।
  • विस्तार: मैसूर, सहायक संधि, व्यपगत; मराठा कलह, सालबाई; सिख राजतंत्र।
  • प्रशासन: 1773 से 1853 तक के अधिनियम; उपयोगितावाद।
  • अर्थव्यवस्था: तीन भू-व्यवस्थाएँ, फ़िज़ियोक्रैट बहस, वाणिज्यीकरण, विऔद्योगीकरण, निकासी, रेलवे, अकाल, यूरोपीय उद्यम।