1. अध्याय एक नज़र में
लगभग 750 से 1526 ई. तक का यह अध्याय Paper I के खंड A के अंतिम भाग और खंड B के पहले भाग को जोड़ता है:
- प्रारंभिक मध्यकाल (750-1200): त्रिपक्षीय संघर्ष (पाल, प्रतिहार, राष्ट्रकूट); राजपूतों का उदय; चोल और स्थानीय स्वशासन; अरबों की सिंध-विजय और अल-बिरूनी; सामाजिक गतिशीलता; अग्रहार और शिक्षा; मंदिर-स्थापत्य (नागर, द्रविड़, वेसर); शंकर, रामानुज और माध्व।
- दिल्ली सल्तनत (1206-1526): स्थापना और सुदृढ़ीकरण, इक़्ता, अलाउद्दीन खलजी के सुधार, तुग़लक़ प्रयोग, फ़िरोज़ शाह, बरनी, स्त्रियों की स्थिति, सूफ़ी संप्रदाय (क़लंदरिया सहित)।
- पंद्रहवीं शताब्दी के क्षेत्रीय राज्य: विजयनगर, बहमनी, मालवा (चित्रकला)।
2025 में प्रारंभिक मध्यकाल की सामाजिक गतिशीलता, कला-साहित्य के विकास के चरण, अलाउद्दीन के आर्थिक उपाय और बरनी का "फ़तवा-ए-जहाँदारी" पूछा गया। 2024 में अग्रहार और शिक्षा, वेसर शैली, फ़िरोज़ शाह की आर्थिक नीति, क़लंदरिया, आचार्य-त्रयी, 13वीं-14वीं शताब्दी में हिंदू और मुस्लिम स्त्रियों की स्थिति, बहमनी स्थापत्य और मालवा चित्र-शैली आए।
2. प्रारंभिक मध्यकालीन राजनीति (750-1200)
| शक्ति | क्षेत्र | प्रमुख शासक और उपलब्धियाँ |
|---|---|---|
| पाल | बंगाल-बिहार | गोपाल (लगभग 750 ई. में "मात्स्यन्याय" के बाद चुना गया), धर्मपाल (विक्रमशिला), देवपाल; बौद्ध धर्म का संरक्षण; तिब्बत और दक्षिण-पूर्व एशिया से संबंध |
| गुर्जर-प्रतिहार | पश्चिमी और उत्तरी भारत | नागभट्ट प्रथम (अरबों का प्रतिरोध), नागभट्ट द्वितीय, मिहिर भोज (कन्नौज); अरब यात्री सुलेमान (851) ने उनकी शक्तिशाली अश्वसेना की प्रशंसा की |
| राष्ट्रकूट | दक्कन | दंतिदुर्ग, कृष्ण प्रथम (एलोरा का कैलास मंदिर), ध्रुव और गोविंद तृतीय (उत्तर भारत पर अभियान), अमोघवर्ष (कन्नड़ ग्रंथ "कविराजमार्ग") |
- त्रिपक्षीय संघर्ष: लगभग 200 वर्षों तक कन्नौज और गंगा दोआब पर नियंत्रण के लिए चला। कन्नौज हर्ष के बाद "साम्राज्य का प्रतीक" था। कोई स्थायी विजेता नहीं निकला; तीनों शक्तियाँ कमज़ोर हुईं, जिससे क्षेत्रीय राज्य (राजपूत) उभरे और बाद में ग़ज़नवी और ग़ोरी आक्रमणों के लिए रास्ता खुला।
- अरबों की सिंध-विजय (712 ई.): मुहम्मद बिन क़ासिम ने राजा दाहिर को हराया। स्रोत "चचनामा" है। प्रभाव सीमित रहा, पर अरब जगत से ज्ञान का आदान-प्रदान (अंक-पद्धति, खगोल, चिकित्सा) बढ़ा।
- अल-बिरूनी: महमूद ग़ज़नवी के साथ भारत आया। "किताब-उल-हिंद" (लगभग 1030) में संस्कृत ग्रंथों के अध्ययन के आधार पर भारतीय दर्शन, विज्ञान, जाति और रीति-रिवाजों का विश्लेषणात्मक विवरण दिया। उसने भारतीयों के "ज्ञान के प्रति आत्म-संतोष" की आलोचना भी की।
- राजपूतों की उत्पत्ति: अग्निकुल मिथक (पृथ्वीराज रासो), विदेशी उत्पत्ति का सिद्धांत (कर्नल टॉड; हूण और गुर्जर) और देशी उत्पत्ति। बी.डी. चट्टोपाध्याय के अनुसार राजपूत "राज्य-निर्माण की प्रक्रिया" से बने: भूमि-अनुदान, कृषि-विस्तार, जनजातीय और पशुपालक समूहों का क्षत्रिय-दर्जे की ओर उन्नयन ("राजपूतीकरण"), और वंशावलियों के माध्यम से वैधता।
- चोल: विजयालय (लगभग 850), राजराज प्रथम (985-1014; तंजावुर का बृहदेश्वर मंदिर, 1010), और राजेंद्र प्रथम (1014-1044; गंगा तक अभियान, गंगैकोंडचोलपुरम; लगभग 1025 में श्रीविजय पर नौसैनिक अभियान)। स्थानीय स्वशासन: उत्तरमेरूर अभिलेख (परांतक प्रथम, 919 और 921 ई.) में सभा के सदस्यों के चयन के लिए "कुडवोलै" (घड़े में पर्ची डालकर चुनाव), योग्यताओं, और "वारियम" (समितियों) का वर्णन है। उर (ग्राम), सभा (ब्राह्मण ग्राम) और नगरम (व्यापारी) स्थानीय संस्थाएँ थीं। चोल राज्य के स्वरूप पर बहस है: नीलकंठ शास्त्री इसे केंद्रीकृत मानते हैं, जबकि बर्टन स्टाइन इसे "खंडीय राज्य" (segmentary state) कहते हैं।
प्रारंभिक मध्यकाल में सामाजिक गतिशीलता (UPSC 2025)
- जाति-पदानुक्रम का विस्तार: जनजातियों और शिल्पी समूहों का "जाति" के रूप में समावेश; उपजातियों की संख्या में वृद्धि। अल-बिरूनी ने भी अनेक "अंत्यज" समूहों का उल्लेख किया।
- धार्मिक वैधता: ब्राह्मणों ने नए शासकों को वंशावलियाँ और क्षत्रिय-दर्जा दिया (हिरण्यगर्भ जैसे दान-संस्कार), बदले में भूमि-अनुदान पाए। मंदिर नए शासकों की वैधता के केंद्र बने।
- आर्थिक परिवर्तन: भूमि-अनुदानों से कृषि का विस्तार; ब्राह्मण भूस्वामी बने; शूद्र किसान बने (ह्वेनसांग ने शूद्रों को कृषक कहा); कायस्थ एक नए लिपिक वर्ग के रूप में उभरे, क्योंकि अनुदान-पत्रों और राजस्व-अभिलेखों की आवश्यकता थी।
- राजनीतिक संरक्षण: सामंत-शासक और योद्धा समूह (राजपूत) ऊपर उठे; गतिशीलता का मार्ग सैन्य सेवा और भूमि से होकर था।
- विरोधी प्रवृत्तियाँ: स्त्रियों और अंत्यजों की स्थिति कठोर हुई। दूसरी ओर, भक्ति आंदोलन (आलवार और नायनार, जिनमें निम्न जातियों और स्त्रियों जैसे आंडाल भी थे) ने आध्यात्मिक समानता का स्थान दिया।
- इतिहासलेखन: आर.एस. शर्मा (सामंतवाद के अंतर्गत किसानों की अधीनता) और बी.डी. चट्टोपाध्याय (एकीकरण और क्षेत्रीय राज्य-निर्माण)। "संस्कृतीकरण" (एम.एन. श्रीनिवास की समाजशास्त्रीय अवधारणा) को भी तुलना के लिए जोड़ा जा सकता है।
- निष्कर्ष: गतिशीलता संभव थी, पर "समूह के रूप में" और "पदानुक्रम के भीतर"। ढाँचा बदला नहीं, उसका विस्तार हुआ और वह पुनर्गठित हुआ।
3. प्रारंभिक मध्यकालीन संस्कृति: शिक्षा, स्थापत्य, दर्शन
अग्रहार और शिक्षा (UPSC 2024)
- अग्रहार और ब्रह्मदेय: ब्राह्मणों को कर-मुक्त अनुदान में दिए गए गाँव। ये वैदिक और शास्त्रीय शिक्षा के आवासीय केंद्र बने।
- संस्थाएँ: घटिका (कांची; कदंबों के तालगुंड अभिलेख में उल्लेख), मंदिरों से जुड़े विद्यालय और मठ। उदाहरण: एण्णायिरम (तमिलनाडु; राजेंद्र चोल के 1023 के अभिलेख में 340 छात्रों और अध्यापकों के लिए अनुदान), सालोटगी (कर्नाटक; राष्ट्रकूट काल, 945 ई. का अभिलेख, छात्रावास सहित) और त्रिभुवनी (पुडुचेरी के निकट)।
- पाठ्यक्रम: वेद, व्याकरण (पाणिनि), मीमांसा, न्याय, वेदांत, पुराण, ज्योतिष और कभी-कभी आयुर्वेद। छात्रों को निःशुल्क भोजन और आवास मिलता था, जिसका व्यय भूमि-अनुदान से चलता था।
- भूमिका: संस्कृत परंपरा का संरक्षण और प्रसार, जिससे क्षेत्रीय राज्यों में "संस्कृत विश्व" (शेल्डन पोलॉक का "Sanskrit cosmopolis") का निर्माण हुआ; ब्राह्मणवादी विचारधारा का ग्रामीण क्षेत्रों तक पहुँचना।
- सीमाएँ: शिक्षा मुख्यतः ऊँची जातियों तक सीमित थी। इसके समानांतर बौद्ध महाविहार (नालंदा, विक्रमशिला, ओदंतपुरी) और जैन केंद्र भी थे।
मंदिर-स्थापत्य: नागर, द्रविड़, वेसर
| शैली | पहचान | उदाहरण |
|---|---|---|
| नागर (उत्तर) | वक्ररेखीय शिखर, आमलक; गर्भगृह के ऊपर ऊँचा शिखर; उरुशृंग | खजुराहो (चंदेल, लगभग 950-1050), ओडिशा (लिंगराज; कोणार्क, तेरहवीं शताब्दी), मोढेरा (सोलंकी) |
| द्रविड़ (दक्षिण) | सीढ़ीदार पिरामिडाकार विमान; ऊँचा गोपुरम (बाद में); प्राकार (चहारदीवारी) | तंजावुर का बृहदेश्वर, गंगैकोंडचोलपुरम, दारासुरम (चोल) |
| वेसर (दक्कन) | नागर और द्रविड़ का मिश्रण | पट्टडकल और ऐहोल (प्रारंभिक प्रयोग); कल्याणी के चालुक्य (लक्कुंडी); होयसल (बेलूर, हलेबिडु, सोमनाथपुर) |
- वेसर शैली की विशेषताएँ (UPSC 2024):
- द्रविड़ विमान की सीढ़ियाँ, पर ऊँचाई कम और रूपरेखा नागर जैसी वक्र।
- तारकाकार (stellate) योजना, विशेषकर होयसल मंदिरों में।
- ऊँचा "जगती" (चबूतरा), जिस पर प्रदक्षिणा-पथ होता है।
- मुलायम क्लोराइट शिस्ट (साबुन-पत्थर) पर अत्यंत बारीक नक़्क़ाशी: पशुओं, लताओं और पौराणिक दृश्यों की क्षैतिज पट्टियाँ।
- खराद पर गढ़े गए (lathe-turned) चमकदार स्तंभ।
- अनेक गर्भगृह (त्रिकूट, जैसे सोमनाथपुर)।
- पल्लव और चोल कला: महाबलीपुरम के रथ और "गंगावतरण" शिला-उत्कीर्णन; चोल कांस्य मूर्तियाँ (नटराज: "लुप्त-मोम" विधि)।
प्रारंभिक मध्यकाल में कला और साहित्य के विकास के चरण (UPSC 2025)
- पहला चरण (लगभग 750-950): शैलकृत से संरचनात्मक मंदिरों की ओर संक्रमण (एलोरा का कैलास); राजकीय संरक्षण (राष्ट्रकूट, पाल, पल्लव); पाल कला (कांस्य, ताड़पत्र-चित्र, बौद्ध पांडुलिपियाँ); आलवार और नायनार के भक्ति-गीत।
- दूसरा चरण (लगभग 950-1100): विशाल "राजकीय मंदिर" (बृहदेश्वर, खजुराहो, लिंगराज), जो राजा की दैवीय सत्ता और राज्य की आर्थिक संस्था (भूमि, धन, कर्मचारी) के प्रतीक थे; तमिल भक्ति साहित्य का संकलन (तेवारम; नाथमुनि द्वारा "नालायिर दिव्य प्रबंधम"); कन्नड़ के "तीन रत्न" पम्प, पोन्न और रन्न।
- तीसरा चरण (लगभग 1100-1300): क्षेत्रीय शैलियों का परिपक्व होना (होयसल, कोणार्क, सोलंकी); क्षेत्रीय भाषाओं का उदय (कंबन की तमिल रामायण "रामावतारम"; अपभ्रंश); संस्कृत काव्य और इतिहास (कल्हण की "राजतरंगिणी", 1148-49; जयदेव का "गीतगोविंद"; बिल्हण का "विक्रमांकदेवचरित")।
- समाज और संरक्षण से संबंध: संरक्षण सम्राटों से बढ़कर सामंतों, व्यापारियों, मंदिर-समुदायों और मठों तक फैला; "क्षेत्रीय पहचान" का उदय (भाषा और शैली); भक्ति का प्रसार, जिससे मंदिर-केंद्रित धर्म बना; और मंदिर का कृषि, व्यापार और कला-केंद्र के रूप में उदय।
- निष्कर्ष: इस काल की कला "क्षेत्रीयकरण" और "मंदिरीकरण" की प्रक्रियाओं का दर्पण थी।
आचार्य-त्रयी और वेदांत (UPSC 2024)
| आचार्य | दर्शन | मूल सिद्धांत | योगदान |
|---|---|---|---|
| शंकराचार्य (आठवीं शताब्दी; कालडी, केरल) | अद्वैत | "ब्रह्म सत्यं जगन्मिथ्या"; माया; ज्ञान-मार्ग; जीव और ब्रह्म का अभेद | प्रस्थानत्रयी पर भाष्य (उपनिषद, गीता, ब्रह्मसूत्र); चार मठ (शृंगेरी, द्वारका, पुरी, ज्योतिर्मठ); बौद्ध और मीमांसा से शास्त्रार्थ; हिंदू धर्म का दार्शनिक एकीकरण |
| रामानुज (ग्यारहवीं-बारहवीं शताब्दी; श्रीरंगम) | विशिष्टाद्वैत | ब्रह्म (विष्णु) ही परम सत्य है, पर जीव और जगत उसके वास्तविक "विशेषण" हैं; भक्ति और शरणागति (प्रपत्ति) | श्रीभाष्य; भक्ति को दार्शनिक आधार; परंपरा के अनुसार मंदिर-पूजा में निम्न जातियों के प्रति उदारता |
| माध्वाचार्य (तेरहवीं शताब्दी; उडुपी) | द्वैत | ईश्वर, जीव और जगत का स्थायी भेद ("पंच-भेद"); विष्णु सर्वोच्च | उडुपी मठ; कन्नड़ क्षेत्र की हरिदास परंपरा पर प्रभाव |
- समग्र योगदान: इन आचार्यों ने वेदांत को प्रमुख भारतीय दर्शन बनाया। शंकर ने बौद्ध चुनौती का उत्तर दिया। रामानुज और माध्व ने भक्ति आंदोलन को दार्शनिक आधार दिया, जिसका प्रभाव बाद के रामानंद, वल्लभ (शुद्धाद्वैत) और चैतन्य पर पड़ा। मठ-संस्थाएँ धार्मिक संगठन की स्थायी इकाई बनीं।
4. दिल्ली सल्तनत: स्थापना से तुग़लक़ तक
- स्थापना: तराइन का प्रथम युद्ध (1191) मुहम्मद ग़ोरी हारा; तराइन का द्वितीय युद्ध (1192) पृथ्वीराज तृतीय की पराजय हुई। 1206 में क़ुतुबुद्दीन ऐबक सुल्तान बना।
- इल्तुतमिश (1211-36): इक़्ता व्यवस्था का संगठन, "तुर्कान-ए-चहलगानी" (चालीस अमीरों का दल), चाँदी का टंका और ताँबे का जीतल, ख़लीफ़ा से मान्यता (1229)। 1221 में चंगेज़ ख़ाँ के ख़तरे से बचाव किया।
- रज़िया (1236-40): सल्तनत की एकमात्र महिला शासक।
- बलबन (1266-87): राजत्व का सिद्धांत ("ज़िल्ल-ए-इलाही" यानी ईश्वर की छाया; सिजदा और पायबोस जैसे दरबारी शिष्टाचार), चहलगानी का दमन, दीवान-ए-अर्ज़ (सैन्य विभाग) का सुदृढ़ीकरण, और मंगोलों से सीमा-रक्षा।
अलाउद्दीन खलजी के आर्थिक उपाय (UPSC 2025)
- बाज़ार-नियंत्रण: अनाज, कपड़ा, घोड़े, दास और पशुओं के मूल्य निश्चित किए गए। "शहना-ए-मंडी" (बाज़ार अधीक्षक), "दीवान-ए-रियासत" (वाणिज्य विभाग), गुप्तचर (बरीद, मुनहियान), राजकीय अन्न-भंडार, और व्यापारियों का पंजीकरण।
- भू-राजस्व: दोआब में उपज का आधा भाग (50%), जो भूमि की माप (मसाहत) पर आधारित था। अतिरिक्त कर: "चराई" (पशुओं पर) और "घरी" (घरों पर)। ग्रामीण मुखियाओं (खूत, मुक़द्दम, चौधरी) के विशेषाधिकार समाप्त किए गए।
- सेना: नक़द वेतन, "दाग़" (घोड़ों पर निशान) और "हुलिया" (सैनिकों का विवरण), ताकि झूठी हाज़िरी रोकी जा सके।
- उद्देश्य (बरनी के अनुसार): मंगोल आक्रमणों के विरुद्ध एक बड़ी सेना को कम वेतन पर बनाए रखना।
- केंद्रीकरण का पक्ष:
- ग्रामीण अभिजात (खूत, मुक़द्दम) की आर्थिक शक्ति तोड़कर विद्रोह की क्षमता समाप्त करना। बरनी के अनुसार वे "घोड़े पर चढ़ने और अच्छे वस्त्र पहनने" की स्थिति में नहीं रहे।
- अमीरों की संपत्ति ज़ब्त करना, मदिरा-निषेध, और अमीरों के आपसी मेल-जोल पर नियंत्रण (षड्यंत्र-विरोधी अध्यादेश)।
- अधिशेष का सीधे राज्य के पास आना, यानी "राज्य और किसान के बीच बिचौलियों का अंत"।
- इरफ़ान हबीब ने इसे कृषि-अधिशेष पर राज्य के प्रत्यक्ष दावे की दिशा में बड़ा कदम माना है।
- सीमाएँ: मूल्य-नियंत्रण मुख्यतः दिल्ली तक सीमित था। ये उपाय दमन और भय पर आधारित थे, और अलाउद्दीन की मृत्यु के बाद समाप्त हो गए।
- निष्कर्ष: आर्थिक उपाय सैन्य आवश्यकता से प्रेरित थे, पर उनका गहरा प्रभाव राजनीतिक केंद्रीकरण के रूप में सामने आया। दोनों उद्देश्य एक-दूसरे से जुड़े थे।
- मुहम्मद बिन तुग़लक़ (1325-51): राजधानी का दौलताबाद स्थानांतरण (1327), सांकेतिक मुद्रा (पीतल और ताँबे के सिक्के, 1329-30), दोआब में कर-वृद्धि (अकाल के साथ), क़राचिल अभियान, और कृषि विभाग "दीवान-ए-अमीर-ए-कोही"। इब्न बतूता ("रिहला") इसी के समय आया।
फ़िरोज़ शाह तुग़लक़ की आर्थिक नीति (UPSC 2024)
- कर-व्यवस्था: शरीअत के विरुद्ध माने गए लगभग 24 करों को समाप्त किया गया, और केवल चार कर रखे गए: ख़राज (भू-राजस्व), ख़ुम्स (युद्ध की लूट का पाँचवाँ भाग), जज़िया (जिसे ब्राह्मणों पर भी लगाया गया) और ज़कात। सिंचाई कर "हक़्क़-ए-शर्ब" (उपज का दसवाँ भाग) लगाया गया।
- सिंचाई और कृषि: पश्चिमी यमुना नहर (रजवाह, उलुग़ख़ानी) और सतलुज तथा घग्गर से नहरें; कुएँ; उद्यान; हरियाणा क्षेत्र में कृषि-विस्तार।
- नगर और निर्माण: हिसार, फ़तेहाबाद, जौनपुर और फ़िरोज़ाबाद (दिल्ली) बसाए; सराय, पुल और मदरसे बनवाए; अशोक के टोपरा और मेरठ स्तंभ दिल्ली लाए गए।
- कारख़ाने और दास: लगभग 1.8 लाख दास (अफ़ीफ़ के अनुसार) कारख़ानों और सेवा में लगाए गए; "दीवान-ए-बंदगान"। कल्याण के लिए "दीवान-ए-ख़ैरात" और "दार-उल-शफ़ा" (अस्पताल) बने।
- मुद्रा: मिश्रित धातु के छोटे सिक्के (अधा और बिख), जिससे छोटे लेन-देन में सुविधा हुई।
- प्रभाव: समकालीन लेखक (अफ़ीफ़) अनाज की प्रचुरता और कम कीमतों की प्रशंसा करते हैं। पर इक़्ता और सैन्य पद वंशानुगत बना दिए गए, कमज़ोर सैनिकों को भी सेवा में रखा गया, और भ्रष्टाचार बढ़ा। इससे राज्य की सैन्य और वित्तीय शक्ति कमज़ोर हुई और 1398 में तैमूर के आक्रमण के आगे सल्तनत टिक नहीं सकी।
- निष्कर्ष: यह "कल्याणकारी, पर दीर्घकाल में राज्य को दुर्बल करने वाली" नीति थी।
बरनी का "फ़तवा-ए-जहाँदारी" (UPSC 2025)
- लेखक और कृतियाँ: ज़ियाउद्दीन बरनी (लगभग 1285-1357)। "तारीख़-ए-फ़िरोज़शाही" (इतिहास) और "फ़तवा-ए-जहाँदारी" (राजनीतिक सिद्धांत)।
- विषय-वस्तु: आदर्श सुल्तान के लिए सलाह: शरीअत के साथ "ज़वाबित" (राज्य द्वारा बनाए नियम) की आवश्यकता; उच्च-कुल (अशराफ़) को ही पद देने और "निम्न-कुल" (अजलाफ़) को पदों से दूर रखने की सलाह; हिंदुओं के प्रति कठोर दृष्टि; और महमूद ग़ज़नवी को आदर्श के रूप में प्रस्तुत करना।
- "विलाप" क्यों:
- यह निर्देशात्मक (prescriptive) है, वर्णनात्मक नहीं। यह बताता है कि राज्य "कैसा होना चाहिए", यह नहीं कि "कैसा था"।
- मुहम्मद बिन तुग़लक़ की मृत्यु के बाद बरनी को दरबार से बाहर कर दिया गया और वह निर्धनता तथा कारावास में रहा। उसकी रचना में अपनी दुर्दशा, "निम्न-कुल" के लोगों की पदोन्नति और "आदर्श शासन" के न होने की निराशा झलकती है।
- पीटर हार्डी (Historians of Medieval India, 1960) और मोहम्मद हबीब ने बरनी को "नैतिक-धार्मिक दृष्टि से इतिहास लिखने वाला" कहा है।
- फिर भी महत्व: सल्तनत की राजनीतिक विचारधारा, धर्म और राज्य के तनाव ("ज़वाबित" की स्वीकृति) और अभिजात वर्ग की मानसिकता को समझने का प्रमुख स्रोत।
- निष्कर्ष: कथन सही है। यह सल्तनत का "विवरण" नहीं, एक अभिजात विद्वान का "विलाप" और "स्वप्न" है, जिसे आलोचनात्मक दृष्टि से पढ़ना चाहिए।
5. सल्तनत कालीन समाज, सूफ़ी मत और क्षेत्रीय राज्य
13वीं-14वीं शताब्दी में हिंदू और मुस्लिम स्त्रियों की स्थिति (UPSC 2024)
| पक्ष | हिंदू स्त्रियाँ | मुस्लिम स्त्रियाँ |
|---|---|---|
| संपत्ति | "स्त्रीधन" तक सीमित; पैतृक संपत्ति में सीमित अधिकार (मिताक्षरा और दायभाग में भिन्नता) | क़ुरान के अनुसार उत्तराधिकार में निश्चित हिस्सा (भाई का आधा); "मेहर" |
| विवाह और तलाक़ | बाल-विवाह; ऊँची जातियों में विधवा-पुनर्विवाह वर्जित; तलाक़ का प्रावधान नहीं | बहुविवाह की अनुमति; "ख़ुला" द्वारा तलाक़ का अधिकार; विधवा-पुनर्विवाह मान्य |
| सामाजिक प्रथाएँ | सती (इब्न बतूता का वर्णन; सुल्तान की अनुमति का उल्लेख), जौहर (रणथंभौर, 1301) | पर्दा (विशेषकर अभिजात वर्ग में), हरम |
| अपवाद और अवसर | निम्न जातियों और किसान स्त्रियों का खेती और शिल्प में श्रम; भक्ति (कश्मीर की लल्ला या लल देद, चौदहवीं शताब्दी) | रज़िया सुल्तान; सूफ़ी दरगाहों में स्त्रियों की उपस्थिति |
- समानताएँ: दोनों समुदायों में पितृसत्ता; अभिजात स्त्रियों का एकांत (पर्दा, जो हिंदू अभिजात वर्ग में भी फैला); निम्न वर्ग की स्त्रियों की अधिक आर्थिक भागीदारी पर कम सामाजिक प्रतिष्ठा। स्रोत (बरनी, अमीर ख़ुसरो, इब्न बतूता) मुख्यतः पुरुष और अभिजात दृष्टि से हैं, इसलिए सामान्य स्त्रियों की स्थिति कम दिखती है।
- निष्कर्ष: क़ानूनी अधिकारों में मुस्लिम स्त्रियों की स्थिति कुछ बेहतर थी, पर व्यवहार में दोनों पर वर्ग और पितृसत्ता का समान प्रभाव था।
- सूफ़ी सिलसिले: चिश्ती (मुईनुद्दीन चिश्ती, अजमेर; निज़ामुद्दीन औलिया, दिल्ली; समा यानी संगीत; राज्य से दूरी), सुहरावर्दी (बहाउद्दीन ज़करिया, मुल्तान; राज्य से निकटता) और फ़िरदौसी (बिहार; शरफ़ुद्दीन यहया मनेरी)। "बा-शरा" (शरीअत मानने वाले) और "बे-शरा" (शरीअत न मानने वाले) का भेद महत्वपूर्ण है।
क़लंदरिया (UPSC 2024)
- स्वरूप: "बे-शरा" घुमंतू दरवेशों का समूह, जो मध्य एशिया और ईरान से आया। ये संसार-त्याग, भिक्षा और फ़क़ीरी पर ज़ोर देते थे और "चहार ज़र्ब" (सिर, दाढ़ी, मूँछ और भौंहें मुँडाना) करते थे। ये सामाजिक मानदंडों और रूढ़िवादी उलेमा को खुली चुनौती देते थे।
- भारत में: तेरहवीं शताब्दी में दिल्ली में शेख़ अबू बक्र तूसी हैदरी क़लंदरी, और पानीपत के बू अली शाह क़लंदर (मृत्यु 1324), जिनकी दरगाह आज भी लोकप्रिय है।
- मध्यकालीन संस्कृति में योगदान:
- जन-सामान्य, विशेषकर निम्न वर्ग, तक सूफ़ी विचार (प्रेम, समर्पण) का प्रसार।
- नाथ योगियों और अन्य संन्यासी परंपराओं से संवाद, जिससे समन्वयवादी लोक-धर्म बना।
- संगीत और काव्य (फ़ारसी तथा स्थानीय बोलियों में)।
- रूढ़िवाद और सत्ता की आलोचना।
- सीमाएँ: चिश्ती संतों, जैसे निज़ामुद्दीन औलिया, ने उनके आचरण की आलोचना की। ये संगठित सिलसिला नहीं बन सके, और राज्य तथा उलेमा ने उन पर संदेह किया।
विजयनगर, बहमनी और मालवा
- विजयनगर (1336): हरिहर और बुक्क ने स्थापना की। कृष्णदेवराय (1509-29) ने तेलुगु ग्रंथ "आमुक्तमाल्यदा" लिखा। तालीकोटा (राक्षस-तंगड़ी) का युद्ध 1565 में हुआ। अन्य विशेषताएँ: "नायंकर" व्यवस्था (सैन्य भूमि-अनुदान), "आयगार" (ग्राम सेवक), हम्पी (UNESCO विश्व धरोहर), और यात्री (निकोलो कोंटी, अब्दुर रज़्ज़ाक़, डोमिंगो पेस, नूनिज़)।
बहमनी स्थापत्य (UPSC 2024)
- संदर्भ: 1347 में अलाउद्दीन हसन बहमन शाह ने बहमनी राज्य स्थापित किया। पहली राजधानी गुलबर्गा थी, फिर अहमद शाह वली के समय 1429 के आसपास बीदर।
- प्रमुख इमारतें:
- गुलबर्गा की जामा मस्जिद (लगभग 1367): पूरा प्रांगण छत से ढका हुआ, बिना खुले आँगन के; अनेक गुंबद और चौड़े मेहराब। यह भारत में अद्वितीय योजना है।
- गुलबर्गा का हफ़्त गुंबद (शाही मक़बरे)।
- बीदर का महमूद गवाँ मदरसा (1472): ईरानी (ख़ुरासानी) शैली; तीन मंज़िलें; चमकीली रंगीन टाइलें (glazed tiles); मीनारें।
- बीदर का क़िला और अश्तूर के मक़बरे: अहमद शाह वली के मक़बरे के भीतर रंगीन चित्रकारी।
- विशेषताएँ: ईरानी प्रभाव (टाइलें, ऊँचे गुंबद, चौड़े मेहराब), तुग़लक़ स्थापत्य की निरंतरता (मोटी ढलवाँ दीवारें), और स्थानीय दक्कनी सामग्री तथा शिल्पी (काला बेसाल्ट)। बीदर का "बिदरी" धातु-शिल्प भी उल्लेखनीय है।
- महत्व: इसने बाद के दक्कनी सल्तनतों (बीजापुर का गोल गुंबद, गोलकुंडा) के लिए आधार तैयार किया, यानी एक विशिष्ट "दक्कनी" इंडो-इस्लामी शैली बनी।
मालवा चित्र-शैली (UPSC 2024)
- सल्तनत कालीन चरण: मांडू के ख़लजी सुल्तान ग़यासुद्दीन ख़लजी के समय (लगभग 1500) की "नेमतनामा" (पाक-कला की पुस्तक) में फ़ारसी (तुर्कमान) शैली और स्थानीय तत्वों का मिश्रण है।
- सत्रहवीं शताब्दी का मालवा चरण (राजपूत चित्रकला की एक शाखा): "रसिकप्रिया" (लगभग 1634), "अमरुशतक" (लगभग 1652) और रागमाला शृंखलाएँ।
- विशेषताएँ: सपाट और गहरे रंग (लाल, भूरा, काला पृष्ठभूमि), वास्तु-विभाजनों से चित्र को खानों में बाँटना, पेड़ों की पंक्तियाँ, बड़ी आँखों वाली आकृतियाँ, लोक-ऊर्जा, सरल संयोजन, और कृष्ण-भक्ति तथा शृंगार के विषय।
- महत्व: यह मुग़ल प्रभाव से अपेक्षाकृत स्वतंत्र, "देशज" रूप है, जो मेवाड़ और बुंदेलखंड शैलियों से संबंधित है।
6. Master Summary Table
| विषय | मुख्य तथ्य | याद रखें |
|---|---|---|
| त्रिपक्षीय संघर्ष | पाल, प्रतिहार, राष्ट्रकूट; कन्नौज | कैलास (कृष्ण प्रथम) |
| सिंध | 712 ई.; चचनामा | अल-बिरूनी लगभग 1030 |
| चोल | उत्तरमेरूर 919 और 921; कुडवोलै | स्टाइन: खंडीय राज्य |
| अग्रहार | एण्णायिरम 1023; सालोटगी 945 | घटिका |
| वेसर | होयसल: तारकाकार योजना, जगती, साबुन-पत्थर | बेलूर, हलेबिडु |
| आचार्य-त्रयी | अद्वैत, विशिष्टाद्वैत, द्वैत | शृंगेरी, श्रीरंगम, उडुपी |
| अलाउद्दीन | बाज़ार-नियंत्रण; 50% राजस्व; दाग़-हुलिया | बरनी: मंगोल-रक्षा |
| फ़िरोज़ शाह | 4 कर; हक़्क़-ए-शर्ब; नहरें | वंशानुगत इक़्ता |
| बरनी | तारीख़-ए-फ़िरोज़शाही; फ़तवा-ए-जहाँदारी | ज़वाबित; अशराफ़ और अजलाफ़ |
| क़लंदरिया | बे-शरा; चहार ज़र्ब | बू अली शाह (पानीपत) |
| बहमनी | गुलबर्गा जामा मस्जिद; महमूद गवाँ मदरसा | ईरानी टाइलें |
| मालवा चित्र | नेमतनामा; रसिकप्रिया 1634 | सपाट रंग, खाने |
7. चार्ट: दिल्ली सल्तनत के वंश
8. Mind Map
- त्रिपक्षीय संघर्ष, राजपूत
- चोल, सिंध, अल-बिरूनी
- सामाजिक गतिशीलता, अग्रहार
- मंदिर-शैलियाँ, आचार्य-त्रयी
- इल्तुतमिश, बलबन
- अलाउद्दीन, तुग़लक़
- बरनी
- स्त्रियाँ, सूफ़ी, क़लंदरिया
- विजयनगर, बहमनी
- मालवा चित्र-शैली
9. महत्वपूर्ण One-liners
- एलोरा का कैलास मंदिर: राष्ट्रकूट कृष्ण प्रथम।
- "कुडवोलै" चुनाव-प्रणाली का अभिलेख: उत्तरमेरूर।
- "किताब-उल-हिंद": अल-बिरूनी।
- विशिष्टाद्वैत: रामानुज; द्वैत: माध्व।
- होयसल मंदिरों की योजना: तारकाकार (stellate)।
- "ज़िल्ल-ए-इलाही": बलबन।
- "शहना-ए-मंडी": अलाउद्दीन खलजी का बाज़ार अधीक्षक।
- सिंचाई कर "हक़्क़-ए-शर्ब": फ़िरोज़ शाह तुग़लक़।
- "फ़तवा-ए-जहाँदारी": ज़ियाउद्दीन बरनी।
- बीदर का ईरानी शैली का मदरसा: महमूद गवाँ (1472)।
10. टिप्स एवं ट्रिक्स
- सल्तनत के प्रश्नों में फ़ारसी स्रोत (बरनी, अफ़ीफ़, इब्न बतूता, अमीर ख़ुसरो) और इतिहासकार (इरफ़ान हबीब, के.ए. निज़ामी, पीटर हार्डी) का उल्लेख करें।
- स्थापत्य के प्रश्नों में छोटा रेखाचित्र (योजना या शिखर) बनाएँ और उदाहरण दें।
- "कथन" वाले प्रश्नों में पहले कथन का अर्थ समझाएँ, फिर पक्ष, विपक्ष और अपना निर्णय लिखें।
सल्तनत के वंश: "ग़ु-ख-तु-सै-लो"। फ़िरोज़ के चार कर: "ख़रा-ख़ुम्स-जज़ि-ज़का"।
11. PYQ-आधारित प्रश्न एवं मॉडल उत्तर
"प्रारंभिक मध्यकालीन भारत में सामाजिक गतिशीलता जाति-पदानुक्रम, धार्मिक वैधता, आर्थिक परिवर्तन और राजनीतिक संरक्षण की जटिल अंतःक्रिया से आकार लेती थी।" आलोचनात्मक मूल्यांकन कीजिए कि इन कारकों ने मिलकर समाज की संरचना को कैसे पुनर्गठित किया।
मॉडल उत्तर (रूपरेखा)
जाति: जनजातियों का समावेश; उपजातियों में वृद्धि; अंत्यज।
धार्मिक वैधता: वंशावलियाँ, दान-संस्कार, मंदिर।
आर्थिक: भूमि-अनुदान, कृषि-विस्तार, ब्राह्मण भूस्वामी, शूद्र किसान, कायस्थ।
राजनीतिक: राजपूतीकरण; सैन्य सेवा।
विरोधी प्रवृत्तियाँ: स्त्रियों और अंत्यजों की स्थिति; भक्ति।
इतिहासलेखन: शर्मा बनाम चट्टोपाध्याय।
निष्कर्ष: "पदानुक्रम के भीतर समूह-गतिशीलता"; ढाँचे का विस्तार हुआ, अंत नहीं।
प्रारंभिक मध्यकालीन भारत में कला और साहित्य के विकास के प्रमुख चरणों का आलोचनात्मक मूल्यांकन कीजिए और बताइए कि ये चरण समाज में व्यापक परिवर्तनों और संरक्षण के प्रतिरूपों को कैसे प्रतिबिंबित करते हैं।
मॉडल उत्तर (रूपरेखा)
पहला चरण (750-950): कैलास; पाल कला; आलवार और नायनार।
दूसरा चरण (950-1100): राजकीय मंदिर; तमिल भक्ति का संकलन; कन्नड़ के तीन रत्न।
तीसरा चरण (1100-1300): होयसल, कोणार्क; कंबन, कल्हण, जयदेव।
सामाजिक प्रतिबिंब: सामंतों और व्यापारियों का संरक्षण; क्षेत्रीय पहचान; मंदिर की केंद्रीयता; भक्ति।
निष्कर्ष: कला "क्षेत्रीयकरण" और "मंदिरीकरण" का दर्पण थी।
बरनी का "फ़तवा-ए-जहाँदारी" दिल्ली सल्तनत का यथार्थ विवरण नहीं, बल्कि एक विलाप था। स्पष्ट कीजिए।
मॉडल उत्तर (रूपरेखा)
लेखक और कृतियाँ: बरनी।
विषय-वस्तु: शरीअत और ज़वाबित; अशराफ़ बनाम अजलाफ़; आदर्श सुल्तान।
विलाप क्यों: निर्देशात्मक; दरबार से निष्कासन और दुर्दशा; निम्न-कुल की पदोन्नति पर निराशा; हार्डी और हबीब के मत।
महत्व: राजनीतिक विचारधारा और अभिजात मानसिकता का स्रोत।
निष्कर्ष: कथन सही है; आलोचनात्मक पाठ आवश्यक है।
भारतीय वेदांत में आचार्य-त्रयी के योगदान का विश्लेषण कीजिए।
मॉडल उत्तर (रूपरेखा)
शंकर: अद्वैत, माया, ज्ञान; भाष्य; चार मठ; बौद्धों से शास्त्रार्थ।
रामानुज: विशिष्टाद्वैत; भक्ति और प्रपत्ति; श्रीभाष्य; सामाजिक उदारता।
माध्व: द्वैत; पंच-भेद; उडुपी; हरिदास परंपरा।
तुलना-तालिका बनाएँ।
प्रभाव: भक्ति आंदोलन का दार्शनिक आधार; मठ-संस्था।
निष्कर्ष: वेदांत का प्रमुख भारतीय दर्शन बनना।
13वीं और 14वीं शताब्दी के भारत में हिंदू और मुस्लिम स्त्रियों की स्थिति की तुलना कीजिए।
मॉडल उत्तर (रूपरेखा)
तुलना-तालिका: संपत्ति, विवाह और तलाक़, प्रथाएँ, अपवाद।
समानताएँ: पितृसत्ता, पर्दा, वर्ग-भेद।
स्रोतों की सीमा: पुरुष और अभिजात दृष्टि।
निष्कर्ष: क़ानूनी अधिकार भिन्न थे, पर व्यवहार में समानता अधिक थी।
इंडो-इस्लामी स्थापत्य के विकास में बहमनी सुल्तानों के योगदान की विवेचना कीजिए।
मॉडल उत्तर (रूपरेखा)
संदर्भ: 1347; गुलबर्गा और बीदर।
इमारतें: गुलबर्गा की जामा मस्जिद, हफ़्त गुंबद, महमूद गवाँ मदरसा, बीदर का क़िला, अश्तूर।
विशेषताएँ: ईरानी, तुग़लक़ और स्थानीय तत्व; बिदरी शिल्प।
महत्व: दक्कनी शैली की नींव (बीजापुर, गोलकुंडा)।
प्रारंभिक मध्यकालीन भारत में शिक्षा के प्रसार में अग्रहारों की भूमिका का परीक्षण कीजिए।
मॉडल उत्तर (रूपरेखा)
अग्रहार और ब्रह्मदेय: कर-मुक्त गाँव।
संस्थाएँ: घटिका, एण्णायिरम, सालोटगी, त्रिभुवनी।
पाठ्यक्रम: वेद, व्याकरण, दर्शन; निःशुल्क व्यवस्था।
भूमिका: संस्कृत विश्व, ब्राह्मणवादी विचारधारा का प्रसार।
सीमाएँ: जातिगत सीमितता; बौद्ध और जैन विकल्प।
"अलाउद्दीन खलजी के आर्थिक उपायों का उद्देश्य दिल्ली सल्तनत में राजनीतिक सत्ता का केंद्रीकरण था।" स्पष्ट कीजिए।
मॉडल उत्तर
उपाय: बाज़ार-नियंत्रण, 50% राजस्व, चराई और घरी, खूत-मुक़द्दम पर अंकुश, दाग़ और हुलिया।
उद्देश्य: बरनी के अनुसार सेना; पर केंद्रीकरण भी (ग्रामीण अभिजात, अमीर, षड्यंत्र-विरोधी अध्यादेश)।
निष्कर्ष: दोनों उद्देश्य जुड़े थे; उपाय दमन पर आधारित और अल्पकालिक थे।
फ़िरोज़ शाह तुग़लक़ की आर्थिक नीतियों का मूल्यांकन कीजिए।
मॉडल उत्तर
नीतियाँ: 4 कर, हक़्क़-ए-शर्ब, नहरें, नगर, कारख़ाने और दास, छोटे सिक्के, कल्याण।
प्रभाव: समृद्धि (अफ़ीफ़) बनाम वंशानुगत इक़्ता से सैन्य दुर्बलता; 1398।
मंदिर-स्थापत्य की वेसर शैली की मुख्य विशेषताओं को स्पष्ट कीजिए।
मॉडल उत्तर
स्वरूप: नागर और द्रविड़ का मिश्रण; चालुक्य और होयसल।
विशेषताएँ: नीचा सीढ़ीदार विमान, तारकाकार योजना, जगती, साबुन-पत्थर, खराद पर बने स्तंभ, त्रिकूट।
उदाहरण: बेलूर, हलेबिडु, सोमनाथपुर, लक्कुंडी; रेखाचित्र।
मध्यकालीन भारतीय संस्कृति में क़लंदरिया के योगदान का मूल्यांकन कीजिए।
मॉडल उत्तर
स्वरूप: बे-शरा दरवेश; चहार ज़र्ब।
भारत में: अबू बक्र तूसी, बू अली शाह क़लंदर।
योगदान: जन-सामान्य तक प्रसार, नाथ योगियों से संवाद, संगीत, रूढ़िवाद की आलोचना।
सीमाएँ: चिश्ती आलोचना; असंगठित स्वरूप।
उदाहरणों सहित मालवा चित्र-शैली की मुख्य विशेषताओं की विवेचना कीजिए।
मॉडल उत्तर
चरण: मांडू का नेमतनामा (लगभग 1500); सत्रहवीं शताब्दी की रसिकप्रिया, अमरुशतक, रागमाला।
विशेषताएँ: सपाट गहरे रंग, खाने, पेड़ों की पंक्तियाँ, बड़ी आँखें, लोक-ऊर्जा, कृष्ण और शृंगार विषय।
महत्व: मुग़ल प्रभाव से अपेक्षाकृत स्वतंत्र देशज रूप।
12. Quick Revision Summary
- प्रारंभिक मध्यकाल: त्रिपक्षीय संघर्ष, सिंध, अल-बिरूनी, राजपूत, चोल स्वशासन, सामाजिक गतिशीलता।
- संस्कृति: अग्रहार और शिक्षा; नागर, द्रविड़ और वेसर; कला और साहित्य के तीन चरण; आचार्य-त्रयी।
- सल्तनत: तराइन, इल्तुतमिश, बलबन, अलाउद्दीन, मुहम्मद तुग़लक़, फ़िरोज़ शाह, बरनी।
- समाज और धर्म: स्त्रियों की स्थिति, सूफ़ी सिलसिले, क़लंदरिया।
- क्षेत्रीय राज्य: विजयनगर, बहमनी स्थापत्य, मालवा चित्र-शैली।