UPSC Mains · Philosophy · Paper I · अध्याय 3

विश्लेषणात्मक दर्शन, घटनाक्रियावाद एवं अस्तित्ववाद

Analytic Philosophy, Phenomenology and Existentialism

मूर, रसेल, विट्गेंस्टीन, तार्किक प्रत्यक्षवाद, क्वाइन, स्ट्रॉसन; हुसर्ल, कीर्केगार्ड, सार्त्र, हाइडेगर।

Paper I 29 मिनट

1. अध्याय एक नज़र में

बीसवीं शताब्दी के पाश्चात्य दर्शन की दो बड़ी धाराएँ हैं:

  • विश्लेषणात्मक दर्शन (Analytic Philosophy): भाषा और तर्क के विश्लेषण से दार्शनिक समस्याएँ सुलझाना। इसमें मूर, रसेल, विट्गेंस्टीन, तार्किक प्रत्यक्षवादी, क्वाइन और स्ट्रॉसन आते हैं।
  • महाद्वीपीय दर्शन (Continental Philosophy): चेतना और मानव अस्तित्व का वर्णन। इसमें हुसर्ल का घटनाक्रियावाद और कीर्केगार्ड, सार्त्र तथा हाइडेगर का अस्तित्ववाद आते हैं।

यह Paper I का सबसे अधिक पूछा जाने वाला अध्याय है। 2025 में 7 और 2024 में 8 प्रश्न इसी से आए। इनके विषय थे: सार्त्र का स्वतः-सत् और स्वार्थ-सत्, रसेल का वर्णन-सिद्धांत, विट्गेंस्टीन के पूर्व और उत्तर विचार, सत्यापन सिद्धांत, मूर का प्रत्ययवाद-खंडन और सामान्य बुद्धि, हुसर्ल बनाम देकार्त, क्वाइन के "दो सिद्धांत-दोष", निजी भाषा, कीर्केगार्ड का "सत्य आत्मनिष्ठता है", और "अस्तित्व सार से पहले है"।

2. जी.ई. मूर (1873-1958)

2.1 प्रत्ययवाद का खंडन ("The Refutation of Idealism", 1903) (UPSC 2025)

  • लक्ष्य: बर्कले और ब्रैडली का प्रत्ययवाद, जिसका मूल वाक्य है "Esse est percipi"।
  • पहला तर्क (विश्लेषणात्मक या संश्लेषणात्मक?):
    • यदि "esse" और "percipi" का अर्थ एक है, तो वाक्य पुनरुक्ति है और कुछ नहीं बताता।
    • यदि अर्थ भिन्न है, तो वाक्य संश्लेषणात्मक है, और उसकी अनिवार्यता का कोई प्रमाण प्रत्ययवादी नहीं देते।
    • प्रत्ययवादी दोनों अर्थों के बीच झूलते हैं; यही उनकी भूल है।
  • दूसरा तर्क (कर्म और विषय का भेद):
    • "नीले की संवेदना" और "हरे की संवेदना" में एक तत्व समान है, यानी चेतना; और एक तत्व भिन्न है, यानी नीला या हरा।
    • इसलिए चेतना (कर्म, act) और उसका विषय (object) दो अलग चीज़ें हैं। नीला चेतना का अंग नहीं, चेतना का विषय है।
    • चेतना "पारदर्शी" (diaphanous) है: अंतर्दर्शन में हम चेतना को नहीं, केवल नीले को देखते हैं, इसीलिए दोनों को एक मान लेने की भूल होती है।
    • जब हम नीले को जानते हैं, तो हम मन से बाहर की किसी चीज़ को जानते हैं। इस प्रकार बाह्य जगत का ज्ञान उतना ही निश्चित है जितना हमारी संवेदनाओं का।
  • महत्व: प्रत्यक्ष यथार्थवाद (Direct Realism) और विश्लेषणात्मक पद्धति की शुरुआत।
  • आलोचना: "नीला" विषय भौतिक वस्तु है या इंद्रिय-प्रदत्त (sense-datum)? मूर बाद में इंद्रिय-प्रदत्तों के सिद्धांत में उलझ गए।

2.2 सामान्य बुद्धि का समर्थन ("A Defence of Common Sense", 1925) (UPSC 2024)

  • सामान्य बुद्धि के सत्यवाक्य (Truisms): "अभी एक जीवित मानव शरीर है, जो मेरा है"; "यह शरीर कुछ समय पहले जन्मा था"; "पृथ्वी मेरे जन्म से बहुत पहले से अस्तित्व में है"; "अन्य मनुष्य भी हैं, जिनके शरीर और अनुभव हैं"।
  • मूर के तर्क:
    • निश्चितता: मैं इन्हें निश्चित रूप से जानता हूँ; इनमें से किसी को नकारने वाले किसी भी दार्शनिक तर्क के आधार-वाक्य इनसे कम निश्चित होंगे।
    • आत्म-खंडन: जो दार्शनिक कहता है "कोई अन्य मनुष्य नहीं जानता कि भौतिक वस्तुएँ हैं", वह "अन्य मनुष्यों" और "दार्शनिकों" के अस्तित्व को पहले ही मान लेता है।
    • सत्य जानना बनाम विश्लेषण जानना: हम इन वाक्यों का सत्य निश्चित रूप से जानते हैं, भले उनका सही विश्लेषण (भौतिक वस्तु क्या है) विवादित हो। दार्शनिक का काम विश्लेषण है, खंडन नहीं।
  • "बाह्य जगत का प्रमाण" (1939): "यह एक हाथ है, और यह दूसरा हाथ है; इसलिए कम से कम दो बाह्य वस्तुएँ हैं।"
  • आलोचना:
    • संशयवादी का प्रश्न अनुत्तरित: मूर यह कैसे जानते हैं? (प्रश्न-याचना का आरोप)।
    • विट्गेंस्टीन ("On Certainty", 1969): ये वाक्य "ज्ञान" नहीं, बल्कि हमारे भाषा-खेल की "आधारशिला" (hinge propositions) हैं, जिन पर संदेह का प्रश्न ही नहीं उठता।

3. बर्ट्रेंड रसेल (1872-1970)

3.1 वर्णन-सिद्धांत ("On Denoting", 1905) (UPSC 2025)

  • समस्या: "स्वर्ण-पर्वत बहुत ऊँचा है" या "फ़्रांस का वर्तमान राजा गंजा है" जैसे वाक्यों का उद्देश्य किस वस्तु की ओर संकेत करता है? जो है ही नहीं, उसके बारे में सार्थक बात कैसे?
  • माइनॉन्ग का उत्तर: स्वर्ण-पर्वत "अस्तित्व" नहीं रखता पर "उपस्थित" (subsists) है। रसेल के अनुसार यह सत्ता-मीमांसा को "अनावश्यक रूप से भीड़भरा" बनाता है और "यथार्थ-बोध" (robust sense of reality) के विरुद्ध है।
  • रसेल का विश्लेषण: "स्वर्ण-पर्वत बहुत ऊँचा है" का तार्किक रूप तीन वाक्यों का संयोग है:
    • कम से कम एक वस्तु है जो स्वर्णिम है और पर्वत है।
    • अधिक से अधिक एक ऐसी वस्तु है।
    • वह वस्तु बहुत ऊँची है।
    प्रतीकों में: ∃x[(Gx ∧ Mx) ∧ ∀y((Gy ∧ My) → y = x) ∧ Hx]।
  • परिणाम: पहला घटक असत्य है, इसलिए पूरा वाक्य असत्य है (न अर्थहीन, न सत्यता-मूल्य-रहित)। "स्वर्ण-पर्वत" नाम नहीं है; वह विधेयों में घुल जाता है। अतः किसी "अस्तित्वहीन वस्तु" को मानने की आवश्यकता नहीं।
  • निषेध की द्विअर्थकता: "स्वर्ण-पर्वत ऊँचा नहीं है" के दो अर्थ हैं: प्राथमिक प्रयोग (ऐसा पर्वत है और वह ऊँचा नहीं, जो असत्य है) और द्वितीयक प्रयोग (ऐसा नहीं कि एक स्वर्ण-पर्वत है जो ऊँचा है, जो सत्य है)। इस तरह बहिष्कृत मध्य का नियम बचा रहता है।
  • स्ट्रॉसन की आलोचना ("On Referring", 1950): वाक्य नहीं, उसका प्रयोग सत्य या असत्य होता है। अस्तित्व "पूर्वधारणा" (presupposition) है, कथन नहीं; पूर्वधारणा विफल हो तो सत्य-असत्य का प्रश्न ही नहीं उठता।

3.2 अपूर्ण प्रतीक और तार्किक परमाणुवाद (UPSC 2024)

  • अपूर्ण प्रतीक (Incomplete Symbols): वे अभिव्यक्तियाँ जिनका अकेले कोई अर्थ नहीं; उनका अर्थ केवल पूरे वाक्य के संदर्भ में परिभाषित होता है (contextual definition)। उदाहरण: निश्चित वर्णन ("the so-and-so") और "वर्ग" (classes)।
  • तार्किक व्यक्तिवाचक नाम (Logically Proper Names): केवल "यह", "वह" जैसे शब्द, जो प्रत्यक्ष परिचय (acquaintance) के विषय (इंद्रिय-प्रदत्त) की ओर सीधे संकेत करते हैं।
  • परिचय-ज्ञान और वर्णन-ज्ञान: हम इंद्रिय-प्रदत्तों और सार्वभौमिकों को सीधे जानते हैं; शेष (भौतिक वस्तुएँ, अन्य मन) वर्णन से।
  • अपूर्ण प्रतीकों से तार्किक परमाणुवाद तक:
    • व्याकरणिक रूप भ्रामक है; विश्लेषण से "तार्किक रूप" प्रकट होता है।
    • विश्लेषण को अंत तक ले जाएँ तो "परमाणु वाक्य" (atomic propositions) बचते हैं, जिनमें केवल तार्किक नाम और विधेय होते हैं।
    • ये वाक्य "परमाणु तथ्यों" (atomic facts) का चित्रण करते हैं। जटिल (आणविक) वाक्य परमाणु वाक्यों के सत्यता-फलन हैं।
    • भाषा और जगत में संरचनात्मक समानता (isomorphism) है। यही "तार्किक परमाणुवाद" ("The Philosophy of Logical Atomism", 1918) है।
  • ओकम का उस्तरा: "जहाँ संभव हो, अनुमानित सत्ताओं के स्थान पर तार्किक निर्मितियाँ रखो।"

4. लुडविग विट्गेंस्टीन (1889-1951)

4.1 पूर्व से उत्तर विट्गेंस्टीन (UPSC 2025)

आधारपूर्व: "Tractatus" (1921)उत्तर: "Philosophical Investigations" (1953)
भाषा का कार्यएक: तथ्यों का चित्रणअनेक: आदेश, प्रश्न, प्रार्थना, मज़ाक़
अर्थचित्र-सिद्धांत: वाक्य तथ्य का तार्किक चित्र"अर्थ प्रयोग है" (§43)
आदर्श भाषातार्किक रूप से पूर्ण, सटीकसाधारण भाषा "पूरी तरह ठीक" है
संरचनापरमाणु तथ्य, प्रारंभिक वाक्यभाषा-खेल (language games), जीवन-रूप
सामान्य पदसाझा सारपारिवारिक सादृश्य (family resemblance)
दर्शनकहना बनाम दिखाना; "जिसके बारे में बोल नहीं सकते, उस पर मौन"दर्शन "चिकित्सा" है: "मक्खी को बोतल से बाहर निकलने का रास्ता दिखाना"
  • कथन का अर्थ: "आदर्श भाषा की ओर नहीं, बल्कि अनुभवजन्य रूप से भाषाओं के वास्तविक प्रयोग की ओर देखना चाहिए।"
    • Tractatus ने माना कि भाषा का एक छिपा सार है (तार्किक रूप), जो तथ्यों से अर्थ पाता है।
    • Investigations: "शतरंज" की तरह शब्द का अर्थ उसके नियम-बद्ध प्रयोग में है। "खेल" शब्द के लिए कोई साझा लक्षण नहीं, केवल परस्पर व्याप्त समानताओं का जाल है।
    • "स्लैब!" जैसे राजमिस्त्री के भाषा-खेल का उदाहरण: एक शब्द पूरा आदेश है।
  • निरंतरता: दोनों चरणों में दर्शन का काम सिद्धांत बनाना नहीं, बल्कि भाषा के दुरुपयोग से उत्पन्न भ्रम को दूर करना है।

4.2 निजी भाषा तर्क (Private Language Argument) (UPSC 2024)

  • निजी भाषा का अर्थ (§243): ऐसी भाषा जिसके शब्द केवल वक्ता के निजी अनुभवों (संवेदनाओं) की ओर संकेत करें, और जिसे सिद्धांततः कोई दूसरा न समझ सके।
  • डायरी का दृष्टांत (§258): मैं एक संवेदना को "S" नाम देता हूँ और हर बार उसके होने पर डायरी में "S" लिखता हूँ। पर अगली बार "S" का सही प्रयोग किसे कहेंगे?
    • सही होने की कोई स्वतंत्र कसौटी नहीं है। "जो मुझे सही लगेगा, वही सही होगा; और इसका अर्थ है कि यहाँ 'सही' के बारे में बात ही नहीं की जा सकती।"
    • नियम-पालन (rule-following) के लिए सार्वजनिक कसौटी चाहिए; "निजी रूप से" नियम का पालन करना संभव नहीं (§202)।
  • डिब्बे में भृंग (Beetle in a Box, §293): सबके डिब्बे में "भृंग" है, पर कोई दूसरे का डिब्बा नहीं देख सकता। तब "भृंग" शब्द का अर्थ डिब्बे की वस्तु से नहीं, सार्वजनिक प्रयोग से तय होता है; डिब्बे की वस्तु "निरस्त" हो जाती है।
  • परिणाम:
    • देकार्त की निजी, अंतर्दर्शी चेतना की प्राथमिकता को चुनौती; अर्थ सार्वजनिक है।
    • "पीड़ा" जैसे शब्द आदिम व्यवहार (रोना) का स्थान लेते हैं: "आंतरिक प्रक्रिया को बाहरी कसौटियाँ चाहिए" (§580)।
    • अन्य मनों की समस्या का पुनर्विचार।
  • आलोचना: क्रिपके (1982) की "संशयवादी व्याख्या"; व्यवहारवाद का आरोप (विट्गेंस्टीन स्वयं इसे अस्वीकार करते हैं: "मैं संवेदना का निषेध नहीं कर रहा")।

5. तार्किक प्रत्यक्षवाद और सत्यापन सिद्धांत

  • वियना मंडल (1920-30 का दशक): मोरिट्ज़ श्लिक, रुडोल्फ़ कार्नेप, ओटो न्यूरैथ। अंग्रेज़ी में प्रसार: ए.जे. एयर, "Language, Truth and Logic" (1936)।
  • सत्यापन सिद्धांत (UPSC 2025): कोई वाक्य तथ्यात्मक रूप से अर्थपूर्ण तभी है जब वह या तो (क) विश्लेषणात्मक हो (तर्क और गणित), या (ख) अनुभव से सत्यापनीय हो। अन्यथा वह "निरर्थक" (nonsense) है, जैसे तत्त्वमीमांसा, धर्मशास्त्र और नीतिशास्त्र के वाक्य।
  • श्लिक: "किसी वाक्य का अर्थ उसके सत्यापन की विधि है।"
  • सबल और दुर्बल अर्थ (एयर):
    • सबल (Strong): वाक्य का सत्य अनुभव से निर्णायक रूप से स्थापित हो सके।
    • दुर्बल (Weak): अनुभव उसे केवल संभाव्य बना सके; कोई अवलोकन उसके सत्य या असत्य के निर्धारण से प्रासंगिक हो।
    • एयर ने दुर्बल अर्थ अपनाया, क्योंकि सबल अर्थ में "सभी मनुष्य मरणशील हैं" जैसे सार्वभौमिक वैज्ञानिक नियम और अतीत के बारे में वाक्य भी निरर्थक हो जाते।
    • सत्यापन "व्यवहार में" (in practice) बनाम "सिद्धांततः" (in principle) भी अलग किया गया: "चाँद के दूसरी ओर पहाड़ हैं" उस समय सिद्धांततः सत्यापनीय था।
  • आलोचना:
    • सत्यापन सिद्धांत स्वयं न विश्लेषणात्मक है, न सत्यापनीय, इसलिए अपने ही मानदंड पर निरर्थक।
    • दुर्बल रूप बहुत उदार है; एयर के दूसरे संस्करण (1946) का संशोधन भी चर्च (1949) ने तोड़ दिया।
    • पॉपर: सार्थकता नहीं, विज्ञान की कसौटी है "मिथ्यापनीयता" (falsifiability)।
    • क्वाइन: वाक्य अकेले नहीं, पूरे सिद्धांत के रूप में अनुभव का सामना करते हैं।
"सभी वस्तुएँ या तो लाल हैं या लाल नहीं हैं" बनाम "यह पृष्ठ सफ़ेद है" (UPSC 2024)
  • पहला वाक्य: बहिष्कृत मध्य के नियम (p ∨ ¬p) का उदाहरण; विश्लेषणात्मक, पुनरुक्ति (tautology)। उसका सत्य केवल शब्दों के अर्थ और तार्किक रूप से तय होता है; कोई अनुभव उसका खंडन नहीं कर सकता।
  • दूसरा वाक्य: संश्लेषणात्मक, अनुभवजन्य; देखकर सत्यापित या असत्यापित किया जा सकता है।
  • प्रत्यक्षवादी उत्तर: दोनों अर्थपूर्ण हैं, पर एक ही प्रकार से नहीं। पहला "जगत के बारे में कुछ नहीं कहता" (factual content शून्य), वह केवल हमारे प्रतीकों के प्रयोग का नियम दिखाता है। दूसरा तथ्य का दावा करता है।
  • क्वाइन का प्रश्न: क्या यह भेद इतना पक्का है? क्वांटम तर्क में बहिष्कृत मध्य पर भी प्रश्न उठे हैं।

6. क्वाइन: "अनुभववाद के दो सिद्धांत-दोष" (1951) (UPSC 2024, 2025)

  • पहला दोष: विश्लेषणात्मक-संश्लेषणात्मक भेद।
    • "विश्लेषणात्मक" को "समानार्थकता" (synonymy) से समझाया जाता है: "अविवाहित पुरुष" = "कुँवारा"।
    • पर समानार्थकता को परिभाषा, परस्पर-प्रतिस्थापनीयता (interchangeability) या अर्थ-नियमों से समझाने पर हर बार "विश्लेषणात्मक" या "अनिवार्यता" का प्रत्यय फिर से आ जाता है। यह वृत्ताकार है।
    • निष्कर्ष: यह भेद "अनुभववादियों का एक अनुभवहीन सिद्धांत-दोष, आस्था का एक तत्त्वमीमांसीय सूत्र" है।
  • दूसरा दोष: न्यूनीकरणवाद (Reductionism). यह मान्यता कि हर सार्थक वाक्य अकेले इंद्रिय-अनुभवों की भाषा में अनूदित किया जा सकता है और अलग से पुष्ट या खंडित हो सकता है।
  • दोनों का संबंध: यदि हर वाक्य अलग से पुष्ट होता, तो जिस वाक्य की पुष्टि "किसी भी स्थिति में" हो जाए, वही विश्लेषणात्मक होता। इसलिए दोनों दोष "मूल में एक" हैं।
  • समग्रतावाद (Holism) और विश्वास का जाल:
    • "हमारा तथाकथित पूरा ज्ञान एक मानव-निर्मित ताना-बाना है जो केवल किनारों पर अनुभव से टकराता है।"
    • वाक्य अकेले नहीं, बल्कि "एक निकाय के रूप में" अनुभव के न्यायालय का सामना करते हैं (Duhem-Quine थीसिस)।
    • किनारे पर अवलोकन-वाक्य हैं; केंद्र में तर्क और गणित।
  • "किसी भी वाक्य को सत्य माना जा सकता है, बशर्ते अन्यत्र समायोजन करें" (UPSC 2025):
    • विरोधी अनुभव आने पर हम चुन सकते हैं कि जाल में कौन-सा वाक्य बदलें। किनारे के अवलोकन-वाक्य को भी "भ्रम" कहकर बचाया जा सकता है, यदि अन्य वाक्यों में पर्याप्त परिवर्तन करें।
    • उलटे, कोई वाक्य संशोधन से अछूता नहीं, तर्क के नियम भी नहीं (बहिष्कृत मध्य पर क्वांटम यांत्रिकी का उदाहरण)। जैसे केप्लर ने टॉलमी को, आइंस्टीन ने न्यूटन को और डार्विन ने अरस्तू को बदला।
    • संशोधन का चुनाव व्यावहारिक है: "न्यूनतम विक्षोभ" (conservatism) और सरलता।
  • परिणाम: विज्ञान और तत्त्वमीमांसा के बीच सीमा धुंधली; व्यवहारवाद (pragmatism); बाद में "प्रकृतीकृत ज्ञानमीमांसा" (Naturalised Epistemology, 1969)।
  • आलोचना: ग्राइस और स्ट्रॉसन ("In Defense of a Dogma", 1956): किसी भेद को परिभाषित न कर पाना उसके अस्तित्व को नकारना नहीं है; सामान्य वक्ता इस भेद का सफल प्रयोग करते हैं।

7. पी.एफ. स्ट्रॉसन: आधारभूत विशेष और व्यक्ति

  • "Individuals" (1959): "वर्णनात्मक तत्त्वमीमांसा" (Descriptive Metaphysics), जो हमारे वास्तविक विचार-ढाँचे का वर्णन करती है, उसे सुधारने का दावा नहीं करती (Revisionary Metaphysics के विपरीत)।
  • आधारभूत विशेष (Basic Particulars): भौतिक पिंड, क्योंकि केवल वही देश-काल के एकीकृत ढाँचे में पुनः पहचाने (re-identified) जा सकते हैं। घटनाएँ, प्रक्रियाएँ आदि उन पर निर्भर हैं।
  • व्यक्ति (Persons) एक आदिम प्रत्यय: ऐसी इकाई जिस पर दोनों प्रकार के विधेय लागू होते हैं: M-विधेय ("70 किलो का है") और P-विधेय ("दुखी है", "सोच रहा है")।
  • अनुभववाद की आलोचना: अपनी चेतना पर विधेय लगाने के लिए पहले दूसरों पर भी उन्हें लगा सकना आवश्यक है; अतः "मैं" और "अन्य" का प्रत्यय साथ-साथ आता है। यह देकार्त के द्वैतवाद और ह्यूम के "गट्ठर सिद्धांत" दोनों का उत्तर है।

8. एडमंड हुसर्ल (1859-1938): घटनाक्रियावाद

  • नारा: "स्वयं वस्तुओं की ओर लौटो!" (Zu den Sachen selbst)।
  • उद्देश्य: दर्शन को "कठोर विज्ञान" बनाना, बिना किसी पूर्वधारणा के, चेतना में जो प्रकट होता है उसके शुद्ध वर्णन से।
  • प्रमुख अवधारणाएँ:
    • अभिप्रायता (Intentionality, ब्रेंटानो से): हर चेतना "किसी की" चेतना है।
    • Epoché (कोष्ठकीकरण): "प्राकृतिक दृष्टि" (जगत के अस्तित्व की मान्यता) को निलंबित करना; उसे नकारना नहीं, केवल "कोष्ठक में रखना"।
    • घटनाक्रियात्मक अपचयन: ध्यान को वस्तु से वस्तु के प्रकट होने के ढंग की ओर मोड़ना।
    • सारभूत अपचयन (Eidetic Reduction): "मुक्त कल्पनात्मक परिवर्तन" (free imaginative variation) द्वारा वह अपरिवर्तनीय तत्व खोजना जिसके बिना वस्तु वह वस्तु न रहे; यही उसका सार (eidos) है।
    • Noesis-Noema: चेतना की क्रिया (noesis) और उस क्रिया में अभिप्रेत वस्तु-अर्थ (noema)।
    • जीवन-जगत (Lebenswelt): वैज्ञानिक अमूर्तीकरण से पहले का प्रत्यक्ष जिया हुआ जगत ("Crisis", 1936)।

8.1 सार चेतना और सत्ता के बीच निरंतरता कैसे दिखाते हैं? (UPSC 2024)

  • सार-दर्शन (Wesensschau): सार किसी अमूर्त अनुमान से नहीं, बल्कि चेतना में प्रत्यक्ष अंतःप्रज्ञा में प्रकट होते हैं। अतः सार चेतना के "भीतर" दिए हुए भी हैं और वस्तु की "सत्ता" की संरचना भी।
  • अभिप्रायता का सेतु: चेतना और वस्तु दो अलग द्वीप नहीं; चेतना सदा वस्तु की ओर उन्मुख है और वस्तु सदा किसी चेतना के लिए प्रकट होती है।
  • Noesis-noema का सहसंबंध: एक ही सार दोनों पक्षों में है: "देखने" की क्रिया का सार और "देखी गई वस्तु" का सार परस्पर-निर्भर हैं।
  • संघटन (Constitution): वस्तु का अर्थ और उसकी पहचान पारमार्थिक चेतना की क्रियाओं में संघटित होती है।
  • परिणाम: देकार्त और कांट का "आंतरिक मन बनाम बाह्य जगत" या "phenomena बनाम noumena" का अंतराल दूर हो जाता है।
  • आलोचना: यह अंततः प्रत्ययवाद की ओर झुकता है (हुसर्ल के "Ideas I" के बाद उनके शिष्यों की आपत्ति); हाइडेगर: शुद्ध चेतना नहीं, "जगत-में-होना" मूल है।

8.2 हुसर्ल और देकार्त के "मैं सोचता हूँ" में अंतर (UPSC 2025)

आधारदेकार्तहुसर्ल ("Cartesian Meditations", 1931)
सूत्रEgo cogito (मैं सोचता हूँ)Ego cogito cogitatum (मैं सोचता हूँ "कुछ")
पद्धतिसंदेह, यानी अस्वीकार करनाEpoché, यानी केवल निलंबन
"मैं" का स्वरूपचिंतनशील द्रव्य (res cogitans), जगत का एक टुकड़ापारमार्थिक अहं; द्रव्य नहीं, अर्थ का स्रोत
चेतनाबंद आंतरिक क्षेत्रसदा अभिप्रायात्मक, वस्तु की ओर उन्मुख
आगे का मार्गनिगमन: Cogito से ईश्वर, फिर जगतवर्णन: जगत का अर्थ चेतना में कैसे संघटित होता है
अन्य व्यक्तिगौण समस्याअंतर-व्यक्तिपरकता (Intersubjectivity) पाँचवें मेडिटेशन का केंद्र
  • हुसर्ल का निर्णय: देकार्त "पारमार्थिक मोड़" (transcendental turn) की दहलीज़ तक आकर लौट गए; उन्होंने अहं को जगत का एक हिस्सा (द्रव्य) बना दिया।
  • आलोचनात्मक टिप्पणी: हुसर्ल का पारमार्थिक अहं भी एकांत-आत्मवाद (solipsism) के आरोप से पूरी तरह मुक्त नहीं; इसके उत्तर में अंतर-व्यक्तिपरकता का विश्लेषण आया।

9. अस्तित्ववाद

9.1 कीर्केगार्ड (1813-1855): "सत्य आत्मनिष्ठता है" (UPSC 2024)

  • स्रोत: "Concluding Unscientific Postscript" (1846)।
  • वस्तुनिष्ठ बनाम आत्मनिष्ठ सत्य:
    • वस्तुनिष्ठ चिंतन: "क्या" (what) पर ध्यान, यानी कथन का विषय से मेल। यह गणित और इतिहास के लिए ठीक है।
    • आत्मनिष्ठ चिंतन: "कैसे" (how) पर ध्यान, यानी व्यक्ति उस सत्य से किस प्रकार संबंधित है।
  • परिभाषा: "सत्य एक वस्तुनिष्ठ अनिश्चितता है, जिसे सर्वाधिक तीव्र आंतरिकता (passionate inwardness) से आत्मसात करने की प्रक्रिया में दृढ़ता से पकड़ा जाता है।"
  • दृष्टांत: एक मूर्तिपूजक जो पूरे मन से प्रार्थना करता है, वह सच्चे ईश्वर से औपचारिक प्रार्थना करने वाले ईसाई से अधिक "सत्य में" है।
  • संदर्भ: हेगेल की "प्रणाली" के विरुद्ध, जिसमें व्यक्ति खो जाता है; "भीड़ असत्य है।"
  • जीवन की तीन अवस्थाएँ: सौंदर्यपरक (सुख), नैतिक (कर्तव्य), धार्मिक ("आस्था की छलांग"; अब्राहम और "नैतिक का धार्मिक निलंबन")।
  • आलोचना:
    • सापेक्षवाद और कट्टरता का ख़तरा: तीव्रता सत्य की कसौटी कैसे?
    • उत्तर: कीर्केगार्ड नैतिक-धार्मिक सत्य की बात करते हैं, तथ्यात्मक सत्य की नहीं; और "वस्तुनिष्ठ अनिश्चितता" विनम्रता भी लाती है।

9.2 सार्त्र (1905-1980): स्वतः-सत् और स्वार्थ-सत् (UPSC 2025)

आधारस्वतः-सत् (Being-in-itself, en-soi)स्वार्थ-सत् (Being-for-itself, pour-soi)
क्या हैजड़ वस्तुएँ, जैसे पत्थर, मेज़मानव चेतना
सूत्र"वह है, जो वह है""वह है जो वह नहीं है, और वह नहीं है जो वह है"
लक्षणपूर्ण, ठोस, अपारदर्शी, अप्रेरित, आकस्मिकअभाव, शून्यता (néant), सदा भविष्य की ओर प्रक्षेपित
स्वतंत्रतानहीं"स्वतंत्र होने के लिए अभिशप्त"
चेतनानहींपूर्व-चिंतनशील आत्म-चेतना
  • शून्यता का स्रोत: चेतना जगत में निषेध लाती है। कैफ़े में मित्र "पियरे" के न होने का अनुभव, यानी "अनुपस्थिति" का प्रत्यक्ष।
  • ईश्वर की असंभवता: मनुष्य "स्वतः-सत् और स्वार्थ-सत्" का संयोग (ईश्वर) बनना चाहता है, जो स्व-विरोधी है; इसलिए "मनुष्य एक व्यर्थ आवेग है"।
  • कुनिष्ठा (Bad Faith, mauvaise foi): अपनी स्वतंत्रता से भागकर स्वयं को वस्तु मानना। उदाहरण: वह वेटर जो "केवल वेटर" होने का अभिनय करता है।
  • "दूसरे के लिए सत्" (Being-for-others): दूसरे की दृष्टि (the look) हमें वस्तु बना देती है; "नर्क दूसरे लोग हैं" (नाटक "No Exit")।

9.3 "अस्तित्व सार से पहले है" (UPSC 2024)

  • स्रोत: सार्त्र का व्याख्यान "Existentialism is a Humanism" (1945, प्रकाशन 1946)।
  • कागज़ काटने के चाकू का दृष्टांत: कारीगर पहले चाकू का प्रयोजन और स्वरूप (सार) सोचता है, फिर उसे बनाता है। यानी वस्तु के लिए सार अस्तित्व से पहले है।
  • मनुष्य के लिए उल्टा: यदि कोई ईश्वर (कारीगर) नहीं है, तो मानव-स्वभाव पहले से निर्धारित नहीं। "मनुष्य पहले अस्तित्व में आता है, स्वयं से मिलता है, जगत में उभरता है, और बाद में स्वयं को परिभाषित करता है।"
  • अस्तित्व और स्वतंत्रता का संबंध:
    • स्वतंत्रता: मनुष्य वही है जो वह स्वयं को बनाता है; उसका सार उसके चुनावों और कर्मों का योग है।
    • उत्तरदायित्व: स्वयं को चुनते हुए मैं "पूरी मानवता के लिए" चुनता हूँ; इसलिए चिंता (anguish)।
    • परित्यक्तता (Abandonment): कोई बहाना या बाहरी मूल्य नहीं; सार्त्र के शिष्य का दृष्टांत, जिसे माँ के पास रहने और युद्ध में जाने के बीच चुनना था।
    • निराशा (Despair): हम केवल अपने नियंत्रण में आने वाली संभावनाओं पर भरोसा कर सकते हैं।
  • अन्य अस्तित्ववादी: कीर्केगार्ड (आस्तिक), हाइडेगर ("अस्तित्व" को Dasein के अर्थ में, पर "मानववाद" शब्द को अस्वीकार किया, "Letter on Humanism" 1947), और कामू (असंगतता)।
  • आलोचना: क्या स्थिति (शरीर, समाज, वर्ग) से पूर्णतः स्वतंत्र चुनाव संभव है? मार्क्सवादी आलोचना और सार्त्र का बाद का संशोधन ("Critique of Dialectical Reason", 1960)।

9.4 हाइडेगर (1889-1976): जगत-में-होना और कालिकता

  • ग्रंथ: "Being and Time" (1927)। प्रश्न: "सत्ता का अर्थ क्या है?"
  • Dasein ("वहाँ-होना"): मानव अस्तित्व, एकमात्र सत्ता जिसके लिए उसकी अपनी सत्ता एक प्रश्न है।
  • जगत-में-होना (Being-in-the-world): एक एकीकृत संरचना; मनुष्य जगत में जल की तरह गिलास में नहीं, बल्कि "बसा हुआ" और "संलग्न" है।
    • वस्तुएँ पहले "हस्तगत उपकरण" (ready-to-hand, हथौड़ा) के रूप में मिलती हैं; टूटने पर ही "उपस्थित वस्तु" (present-at-hand) बनती हैं।
  • क्षिप्तता (Thrownness), पतन (Falling into "they"), चिंता (Care, Sorge)।
  • मृत्यु की ओर होना (Being-towards-death): अपनी मृत्यु की संभावना को स्वीकार करना ही प्रामाणिक (authentic) अस्तित्व की ओर ले जाता है।
  • कालिकता (Temporality): चिंता की संरचना कालिक है: भविष्य (प्रक्षेपण), अतीत (क्षिप्तता), वर्तमान (संलग्नता)। प्रामाणिक काल भविष्य से शुरू होता है।

10. Master Summary Table

दार्शनिकग्रंथमूल धारणायाद रखें
मूरRefutation 1903; Defence 1925कर्म-विषय भेद; सामान्य बुद्धिनीला-हरा; "यह एक हाथ है"
रसेलOn Denoting 1905वर्णन-सिद्धांत; अपूर्ण प्रतीक; तार्किक परमाणुवादफ़्रांस का राजा; स्वर्ण-पर्वत
विट्गेंस्टीनTractatus 1921; PI 1953चित्र-सिद्धांत; अर्थ प्रयोग हैभृंग; डायरी "S"; पारिवारिक सादृश्य
तार्किक प्रत्यक्षवादएयर, LTL 1936सत्यापन (सबल, दुर्बल)स्व-खंडन आपत्ति
क्वाइनTwo Dogmas 1951समग्रतावाद; विश्वास का जाल"किनारों पर अनुभव"
स्ट्रॉसनIndividuals 1959आधारभूत विशेष; व्यक्तिM और P विधेय
हुसर्लIdeas 1913; CM 1931अभिप्रायता, epoché, सारego cogito cogitatum
कीर्केगार्डPostscript 1846सत्य आत्मनिष्ठता हैतीन अवस्थाएँ
सार्त्रBeing and Nothingness 1943en-soi, pour-soi; अस्तित्व सार से पहलेवेटर; कागज़ का चाकू
हाइडेगरBeing and Time 1927Dasein, जगत-में-होना, कालिकताहथौड़ा; मृत्यु की ओर होना

11. चार्ट: क्वाइन का "विश्वास का जाल"

तर्क औरगणित सैद्धांतिक विज्ञान अवलोकन-वाक्य (किनारा) अनुभव अनुभव अनुभव केंद्र की ओर जाने पर संशोधन कठिन, पर असंभव नहीं
क्वाइन का समग्रतावाद: अनुभव केवल किनारों पर ज्ञान के ताने-बाने से टकराता है। विरोधी अनुभव आने पर हम जाल में कहीं भी समायोजन कर सकते हैं; केंद्र (तर्क और गणित) भी अंततः संशोधनीय है।

12. Mind Map

विश्लेषण, घटनाक्रियावाद एवं अस्तित्ववाद
मूर और रसेल
  • प्रत्ययवाद-खंडन, सामान्य बुद्धि
  • वर्णन-सिद्धांत, परमाणुवाद
विट्गेंस्टीन
  • चित्र से प्रयोग तक
  • निजी भाषा तर्क
प्रत्यक्षवाद और क्वाइन
  • सत्यापन सिद्धांत
  • दो दोष, समग्रतावाद
हुसर्ल
  • अभिप्रायता, epoché
  • सार, बनाम देकार्त
अस्तित्ववाद
  • कीर्केगार्ड, सार्त्र
  • हाइडेगर: Dasein

13. महत्वपूर्ण One-liners

  • चेतना "पारदर्शी" (diaphanous) है: मूर (1903)।
  • "फ़्रांस का वर्तमान राजा गंजा है" का विश्लेषण: रसेल, "On Denoting" (1905)।
  • वर्णन-सिद्धांत की आलोचना "पूर्वधारणा" के आधार पर: स्ट्रॉसन, "On Referring" (1950)।
  • "अर्थ प्रयोग है": उत्तर विट्गेंस्टीन (PI §43)।
  • "डिब्बे में भृंग": निजी भाषा तर्क (PI §293)।
  • सत्यापन के सबल और दुर्बल अर्थ: ए.जे. एयर।
  • "अनुभववाद के दो सिद्धांत-दोष": क्वाइन (1951)।
  • M-विधेय और P-विधेय: स्ट्रॉसन, "Individuals"।
  • "स्वयं वस्तुओं की ओर लौटो": हुसर्ल।
  • "सत्य आत्मनिष्ठता है": कीर्केगार्ड (1846)।
  • "मनुष्य स्वतंत्र होने के लिए अभिशप्त है": सार्त्र।
  • "हस्तगत" (ready-to-hand) हथौड़ा: हाइडेगर।

14. टिप्स एवं ट्रिक्स

उत्तर-लेखन
  • प्रश्न में दिया उद्धरण (जैसे "blue is one object...") उत्तर की पहली पंक्ति में पहचानें: किसका है, किस ग्रंथ से है।
  • रसेल के प्रश्नों में प्रतीकात्मक रूप (∃x...) लिखें; इससे अंक बढ़ते हैं।
  • हुसर्ल-देकार्त, पूर्व-उत्तर विट्गेंस्टीन, en-soi बनाम pour-soi जैसे प्रश्नों में तालिका सबसे प्रभावी है।
  • अस्तित्ववाद के उत्तरों में एक जीवंत दृष्टांत (वेटर, कागज़ का चाकू, शिष्य) अवश्य दें।
याद रखने की तरकीब

क्वाइन के दो दोष: "वि-सं भेद" और "न्यूनीकरण"; दोनों "मूल में एक"। सार्त्र के सूत्र: en-soi = "है सो है"; pour-soi = "है नहीं, नहीं है"।

सामान्य भूल

रसेल के अनुसार "स्वर्ण-पर्वत ऊँचा है" असत्य है, निरर्थक नहीं। "सत्यता-मूल्य का अभाव" स्ट्रॉसन का मत है, रसेल का नहीं।

15. PYQ-आधारित प्रश्न एवं मॉडल उत्तर

Q1UPSC 2025 · Paper I · 1(c) · 10 अंक

सार्त्र द्वारा प्रस्तुत स्वार्थ-सत् (being-for-itself) और स्वतः-सत् (being-in-itself) के बीच अंतर स्पष्ट कीजिए।

मॉडल उत्तर

तालिका: वस्तु बनाम चेतना; सूत्र; लक्षण; स्वतंत्रता।

शून्यता का स्रोत (पियरे); ईश्वर की असंभवता; कुनिष्ठा।

Q2UPSC 2025 · Paper I · 1(d) · 10 अंक

"स्वर्ण-पर्वत बहुत ऊँचा है।" रसेल के वर्णन-सिद्धांत के संदर्भ में इस कथन की विवेचना कीजिए।

मॉडल उत्तर

समस्या और माइनॉन्ग का उत्तर।

विश्लेषण: तीन घटक; प्रतीकात्मक रूप; वाक्य असत्य।

प्राथमिक-द्वितीयक प्रयोग; स्ट्रॉसन की आलोचना।

Q3UPSC 2024 · Paper I · 1(c) · 10 अंक

मूर यह सिद्ध करने के लिए कौन-से तर्क देते हैं कि कुछ सत्यवाक्य हैं जिनका ज्ञान सामान्य बुद्धि का विषय है? आलोचनात्मक विवेचना कीजिए।

मॉडल उत्तर

सत्यवाक्यों के उदाहरण।

तर्क: निश्चितता, आत्म-खंडन, सत्य बनाम विश्लेषण; "यह एक हाथ है"।

आलोचना: प्रश्न-याचना; विट्गेंस्टीन के hinge propositions।

Q4UPSC 2024 · Paper I · 1(d) · 10 अंक

उत्तर विट्गेंस्टीन क्यों मानते हैं कि ऐसी भाषा नहीं हो सकती जिसे केवल एक ही व्यक्ति बोल सके, यानी तत्त्वतः निजी भाषा? विवेचना कीजिए।

मॉडल उत्तर

परिभाषा (§243)।

डायरी "S": सही होने की कसौटी नहीं; नियम-पालन सार्वजनिक।

भृंग; परिणाम: अर्थ सार्वजनिक।

Q5UPSC 2024 · Paper I · 1(e) · 10 अंक

कीर्केगार्ड सत्य को आत्मनिष्ठता के रूप में किस प्रकार परिभाषित करते हैं? आलोचनात्मक विवेचना कीजिए।

मॉडल उत्तर

"क्या" बनाम "कैसे"; परिभाषा; मूर्तिपूजक का दृष्टांत।

संदर्भ: हेगेल की प्रणाली के विरुद्ध।

आलोचना और उसका उत्तर।

Q6UPSC 2025 · Paper I · 3(a)

"हमें ऐसी आदर्श भाषा की ओर नहीं देखना चाहिए जो तथ्यों से अर्थ पाती है और जिसकी तार्किक संरचना सटीक है, बल्कि अनुभवजन्य रूप से भाषाओं के वास्तविक प्रयोग की ओर।" इस कथन के संदर्भ में भाषा और अर्थ पर विट्गेंस्टीन के पूर्व विचारों से उत्तर विचारों तक के संक्रमण की व्याख्या कीजिए।

मॉडल उत्तर (रूपरेखा)

Tractatus: चित्र-सिद्धांत, परमाणु तथ्य, कहना-दिखाना।

Investigations: अर्थ प्रयोग; भाषा-खेल; पारिवारिक सादृश्य; "स्लैब"।

तालिका और निरंतरता: दर्शन चिकित्सा।

Q7UPSC 2025 · Paper I · 3(b)

तार्किक प्रत्यक्षवादियों द्वारा प्रतिपादित अर्थ के सत्यापन सिद्धांत की व्याख्या कीजिए। इस संदर्भ में "सत्यापनीय" शब्द के "सबल" और "दुर्बल" अर्थ में भी अंतर कीजिए।

मॉडल उत्तर (रूपरेखा)

वियना मंडल, एयर; सिद्धांत का कथन; श्लिक।

सबल बनाम दुर्बल; व्यवहार में बनाम सिद्धांततः।

आलोचना: स्व-खंडन, चर्च, पॉपर, क्वाइन।

Q8UPSC 2025 · Paper I · 3(c)

"नीला संवेदना का एक विषय है और हरा दूसरा, और चेतना, जो दोनों संवेदनाओं में समान है, दोनों से भिन्न है।" इस कथन के संदर्भ में मूर द्वारा प्रत्ययवाद के खंडन का विवरण प्रस्तुत कीजिए।

मॉडल उत्तर (रूपरेखा)

लक्ष्य: Esse est percipi।

पहला तर्क: विश्लेषणात्मक या संश्लेषणात्मक।

दूसरा तर्क: कर्म-विषय भेद; पारदर्शिता; बाह्य जगत।

मूल्यांकन।

Q9UPSC 2025 · Paper I · 4(a)

हुसर्ल का "मैं सोचता हूँ" का विवरण देकार्त के विवरण से कैसे भिन्न है? आलोचनात्मक विवेचना कीजिए।

मॉडल उत्तर (रूपरेखा)

तालिका: सूत्र, पद्धति, "मैं" का स्वरूप, चेतना, आगे का मार्ग, अन्य व्यक्ति।

पारमार्थिक मोड़; एकांत-आत्मवाद का आरोप।

Q10UPSC 2025 · Paper I · 4(b)

"हम अपनी पूरी प्रणाली के किसी भी वाक्य के सत्य को, किसी भी अनुभव के सामने, तब तक बनाए रख सकते हैं जब तक हम अन्यत्र समायोजन करने के लिए तैयार हैं।" क्वाइन के "Two Dogmas of Empiricism" के आलोक में इस कथन की विवेचना कीजिए।

मॉडल उत्तर (रूपरेखा)

दो दोष और उनका संबंध।

समग्रतावाद: जाल (चार्ट); Duhem-Quine; संशोधन का चुनाव।

उलटा पक्ष: कोई वाक्य अछूता नहीं। आलोचना: ग्राइस-स्ट्रॉसन।

Q11UPSC 2024 · Paper I · 3(a)

रसेल की अपूर्ण प्रतीकों की धारणा की व्याख्या कीजिए। यह भी बताइए कि यह धारणा तार्किक परमाणुवाद के सिद्धांत तक कैसे ले जाती है।

मॉडल उत्तर (रूपरेखा)

अपूर्ण प्रतीक: संदर्भगत परिभाषा; वर्णन और वर्ग।

तार्किक नाम; परिचय-ज्ञान।

परमाणुवाद: विश्लेषण से परमाणु वाक्य, तथ्य, सत्यता-फलन, isomorphism।

Q12UPSC 2024 · Paper I · 3(b)

तार्किक प्रत्यक्षवादियों के अनुसार क्या "सभी वस्तुएँ या तो लाल हैं या लाल नहीं हैं" वाक्य उसी प्रकार अर्थपूर्ण है जैसे "यह पृष्ठ सफ़ेद है"? तर्क सहित विवेचना कीजिए।

मॉडल उत्तर (रूपरेखा)

दो प्रकार की सार्थकता: विश्लेषणात्मक पुनरुक्ति बनाम अनुभवजन्य।

उत्तर: दोनों अर्थपूर्ण, पर भिन्न प्रकार से।

क्वाइन की चुनौती।

Q13UPSC 2024 · Paper I · 4(a)

अस्तित्ववादी विचारकों के नारे "अस्तित्व सार से पहले है" का क्या अर्थ है? उनके अनुसार मानव अस्तित्व मानव स्वतंत्रता से कैसे संबंधित है? विवेचना कीजिए।

मॉडल उत्तर (रूपरेखा)

स्रोत; कागज़ के चाकू का दृष्टांत।

स्वतंत्रता: उत्तरदायित्व, चिंता, परित्यक्तता, निराशा; शिष्य का उदाहरण।

अन्य अस्तित्ववादी और आलोचना।

Q14UPSC 2024 · Paper I · 4(b)

हुसर्ल क्यों सोचते हैं कि सार चेतना और सत्ता के बीच एक प्रकार की निरंतरता प्रदर्शित करते हैं? विवेचना कीजिए।

मॉडल उत्तर (रूपरेखा)

अवधारणाएँ: अभिप्रायता, epoché, सारभूत अपचयन।

निरंतरता: सार-दर्शन, सेतु, noesis-noema, संघटन।

आलोचना: प्रत्ययवाद; हाइडेगर।

Q15UPSC 2024 · Paper I · 4(c)

क्वाइन अपने लेख "Two Dogmas of Empiricism" में जिन दो सिद्धांत-दोषों का उल्लेख करते हैं, उनके स्वरूप की व्याख्या कीजिए।

मॉडल उत्तर (रूपरेखा)

पहला: विश्लेषणात्मक-संश्लेषणात्मक; समानार्थकता का वृत्त।

दूसरा: न्यूनीकरणवाद।

संबंध और समग्रतावाद का विकल्प।

Q16अभ्यास प्रश्न · 15 अंक

हाइडेगर की "जगत-में-होना" और "कालिकता" की धारणाओं की व्याख्या कीजिए। ये देकार्त की चेतना-केंद्रित दृष्टि से किस प्रकार भिन्न हैं?

मॉडल उत्तर (रूपरेखा)

Dasein; हस्तगत और उपस्थित (हथौड़ा)।

चिंता की संरचना: भविष्य, अतीत, वर्तमान; मृत्यु की ओर होना।

देकार्त से भेद: जगत पहले से संलग्न; विषय-वस्तु द्वैत का निरसन।

16. Quick Revision Summary

परीक्षा से पहले एक बार ज़रूर पढ़ें
  • मूर: esse est percipi की द्विअर्थकता; कर्म-विषय; सामान्य बुद्धि; हाथ का प्रमाण।
  • रसेल: वर्णन = अपूर्ण प्रतीक; स्वर्ण-पर्वत वाक्य असत्य; परमाणु तथ्य।
  • विट्गेंस्टीन: चित्र से प्रयोग; भाषा-खेल; निजी भाषा असंभव।
  • प्रत्यक्षवाद: सत्यापन; सबल-दुर्बल; पुनरुक्ति बनाम अनुभवजन्य।
  • क्वाइन: दो दोष; जाल; कोई वाक्य संशोधन से परे नहीं।
  • हुसर्ल: अभिप्रायता; epoché; सार; cogito cogitatum।
  • अस्तित्ववाद: सत्य आत्मनिष्ठता; en-soi और pour-soi; अस्तित्व सार से पहले; Dasein और कालिकता।