UPSC Mains · Philosophy · Paper I · अध्याय 5

न्याय-वैशेषिक, सांख्य एवं योग

Nyaya-Vaisesika, Samkhya and Yoga

प्रमाण, पदार्थ, असत्कार्यवाद, ईश्वर-सिद्धि; सांख्य का सत्कार्यवाद, प्रकृति-पुरुष, विकास; योग के अष्टांग, चित्त और कैवल्य।

Paper I 19 मिनट

1. अध्याय एक नज़र में

छह आस्तिक दर्शनों में चार यहाँ हैं। ये दो जोड़ियों में पढ़े जाते हैं:

  • न्याय-वैशेषिक: न्याय (गौतम, "न्यायसूत्र") प्रमाण-शास्त्र देता है, और वैशेषिक (कणाद, "वैशेषिकसूत्र") पदार्थ-शास्त्र। विषय: प्रत्यक्ष की परिभाषा, प्रमाण और प्रमाणफल, असत्कार्यवाद (आरंभवाद), आत्मा के लिंग, अभाव के प्रकार, परमाणुवाद।
  • सांख्य-योग: सांख्य (कपिल; ईश्वरकृष्ण की "सांख्यकारिका") तत्त्वमीमांसा देता है, और योग (पतंजलि, "योगसूत्र") साधना-पद्धति। विषय: सत्कार्यवाद, प्रकृति-पुरुष, 25 तत्त्वों का विकास, चित्त, वृत्ति, क्लेश, समाधि, ईश्वर और कैवल्य।

2025 में न्याय और बौद्धों का प्रमाण-प्रमाणफल विवाद, न्याय-वैशेषिक का कारणता-सिद्धांत, गौतम की प्रत्यक्ष-परिभाषा, और योग में ईश्वर तथा कैवल्य पूछे गए। 2024 में आत्मा के छह लिंग, "वायु में ताप नहीं" बनाम "वायु अग्नि नहीं" (अभाव), सांख्यकारिका का प्रकृति-विकास, और योग का मोक्ष-शास्त्र आया।

2. न्याय: प्रमाण-शास्त्र

  • प्रमा और प्रमाण: यथार्थ अनुभव "प्रमा" है ("यथार्थानुभवः प्रमा"), और प्रमा का विशिष्ट कारण (करण) "प्रमाण" है।
  • चार प्रमाण: प्रत्यक्ष, अनुमान, उपमान, शब्द।
  • सोलह पदार्थ: प्रमाण, प्रमेय, संशय, प्रयोजन, दृष्टांत, सिद्धांत, अवयव, तर्क, निर्णय, वाद, जल्प, वितंडा, हेत्वाभास, छल, जाति, निग्रहस्थान। इनका सम्यक् ज्ञान मोक्ष (अपवर्ग) का साधन है।
  • नव्य-न्याय: गंगेश उपाध्याय ("तत्त्वचिंतामणि", 14वीं शताब्दी), जो तकनीकी भाषा (अवच्छेदक, प्रतियोगी) के लिए प्रसिद्ध है।

2.1 गौतम की प्रत्यक्ष-परिभाषा (UPSC 2025)

न्यायसूत्र 1.1.4

"इंद्रियार्थसन्निकर्षोत्पन्नं ज्ञानम् अव्यपदेश्यम् अव्यभिचारि व्यवसायात्मकं प्रत्यक्षम्।"

  • इंद्रिय-अर्थ-सन्निकर्ष-उत्पन्न: इंद्रिय और विषय के संपर्क से उत्पन्न। इससे अनुमान, उपमान और शब्द अलग हो जाते हैं, क्योंकि वे पूर्व-ज्ञान से उत्पन्न होते हैं।
  • ज्ञानम्: यह ज्ञान है, केवल संपर्क (भौतिक घटना) नहीं; इससे सुख-दुःख जैसे गुण भी अलग हो जाते हैं।
  • अव्यपदेश्य (शब्दातीत): शब्द के माध्यम से न उत्पन्न। कोई शब्द सुनकर "यह गाय है" जानना प्रत्यक्ष नहीं है। वाचस्पति मिश्र के अनुसार यह निर्विकल्पक प्रत्यक्ष की ओर संकेत करता है।
  • अव्यभिचारि (अभ्रांत): यथार्थ हो। इससे भ्रम (मृगमरीचिका में जल) अलग होता है।
  • व्यवसायात्मक (निश्चयात्मक): निश्चित हो। इससे संशय ("यह खंभा है या मनुष्य?") अलग होता है। वाचस्पति के अनुसार यह सविकल्पक प्रत्यक्ष की ओर संकेत करता है।
  • सन्निकर्ष के छह प्रकार (लौकिक प्रत्यक्ष):
    • संयोग: आँख और घड़ा।
    • संयुक्त-समवाय: घड़े का रंग।
    • संयुक्त-समवेत-समवाय: रंग में रंगत्व (सामान्य)।
    • समवाय: कान (आकाश) में शब्द।
    • समवेत-समवाय: शब्द में शब्दत्व।
    • विशेषणता: अभाव का प्रत्यक्ष ("भूतल पर घड़ा नहीं")।
  • अलौकिक प्रत्यक्ष (नव्य-न्याय): सामान्य-लक्षण (एक धुएँ में सभी धुओं का ज्ञान, जो व्याप्ति का आधार है), ज्ञान-लक्षण ("चंदन सुगंधित दिखता है"), और योगज (योगियों का)।
  • गंगेश की परिभाषा: "ज्ञानाकरणकं ज्ञानं प्रत्यक्षम्", यानी जिस ज्ञान का करण कोई अन्य ज्ञान न हो। ईश्वर के प्रत्यक्ष को भी समेटने के लिए सन्निकर्ष हटाया गया।
  • आलोचना: बौद्ध (दिङ्नाग): प्रत्यक्ष केवल "कल्पनापोढ" (विकल्प-रहित) है; सविकल्पक में कल्पना मिल जाती है, इसलिए वह प्रत्यक्ष नहीं। वेदांत: अंतःकरण-वृत्ति का विषयाकार होना।

2.2 प्रमाण और प्रमाणफल: न्याय-बौद्ध विवाद (UPSC 2025)

आधारन्यायबौद्ध (दिङ्नाग, धर्मकीर्ति)
संबंधप्रमाण (करण) और फल (प्रमा) भिन्नप्रमाण और फल एक ही ज्ञान
उदाहरणकुल्हाड़ी (करण) और कटना (फल) अलगएक ही ज्ञान का विषयाकार होना प्रमाण, उसका स्व-संवेदन फल
क्रमसन्निकर्ष या निर्विकल्पक प्रमाण, सविकल्पक फल; उससे हान-उपादान-उपेक्षा बुद्धिक्षणिक ज्ञान में कोई वास्तविक क्रम नहीं
ज्ञातास्थायी आत्मा (प्रमाता) आवश्यककोई स्थायी कर्ता नहीं; कर्ता-करण-फल का भेद केवल व्यवहार (व्यवस्था)
तत्त्वमीमांसीय आधारयथार्थवाद; ज्ञान आत्मा का गुणक्षणिकवाद, स्व-संवित्ति; सारूप्य (ज्ञान का विषय-सदृश आकार)
  • न्याय की आपत्ति: एक ही वस्तु एक ही समय करण और फल दोनों नहीं हो सकती; यह क्रिया-संरचना का उल्लंघन है।
  • बौद्ध उत्तर: यह संरचना भाषा का आरोपण है। "दीपक स्वयं को और घड़े को प्रकाशित करता है" की तरह ज्ञान स्वयं-प्रकाशक है।
  • महत्व: यह विवाद यथार्थवाद बनाम प्रत्ययवाद (ज्ञान का आकार कहाँ से?) और आत्मवाद बनाम अनात्मवाद का मूल प्रश्न है।

2.3 आत्मा के अस्तित्व के छह लिंग (UPSC 2024)

न्यायसूत्र 1.1.10

"इच्छा-द्वेष-प्रयत्न-सुख-दुःख-ज्ञानानि आत्मनो लिंगम्", यानी इच्छा, द्वेष, प्रयत्न, सुख, दुःख और ज्ञान आत्मा के अनुमापक चिह्न हैं।

  • तर्क का सामान्य रूप: ये छह "गुण" हैं, और गुण किसी द्रव्य में ही रह सकते हैं। ये शरीर, इंद्रिय या मन के गुण नहीं हो सकते (शरीर बदलता है, इंद्रियाँ अनेक हैं, मन अणु है)। अतः इनका आश्रय एक अलग, स्थायी द्रव्य, यानी आत्मा है।
  • प्रत्येक लिंग:
    • इच्छा: किसी वस्तु को देखकर इच्छा तभी होती है जब याद हो कि "ऐसी वस्तु से पहले सुख मिला था"। देखने वाला, याद करने वाला और चाहने वाला एक ही होना चाहिए; क्षणिक विज्ञान-धारा यह नहीं कर सकती।
    • द्वेष: दुःख देने वाली वस्तु की स्मृति से उत्पन्न विमुखता; यह भी स्थायी अनुभवकर्ता चाहती है।
    • प्रयत्न: इच्छा या द्वेष से प्रेरित क्रिया; वही कर्ता जो इच्छा करता है, वही प्रयत्न करता है।
    • सुख और दुःख: इनका अनुभव "मैं सुखी हूँ" के रूप में एक भोक्ता की ओर संकेत करता है; कर्म-फल के भोग के लिए भी स्थायी भोक्ता चाहिए।
    • ज्ञान: संशय के बाद निश्चय, और "जो मैंने देखा था, उसी को अब छू रहा हूँ" जैसी प्रत्यभिज्ञा (recognition) विभिन्न इंद्रियों के ज्ञान को एक ज्ञाता में जोड़ती है।
  • न्याय का आत्मा-सिद्धांत: आत्मा नित्य, विभु (सर्वव्यापी) और अनेक है। चेतना उसका "आगंतुक गुण" है (शरीर-मन-इंद्रिय के संयोग से उत्पन्न); मोक्ष में आत्मा चेतना-रहित हो जाती है।
  • आलोचना: बौद्ध: स्मृति और प्रत्यभिज्ञा "संतान" से संभव। वेदांत: चेतना आत्मा का स्वरूप है, गुण नहीं; चेतना-रहित मोक्ष "पत्थर जैसा" है (एक प्रसिद्ध व्यंग्योक्ति: "वैशेषिक मुक्ति से तो वृंदावन में सियार बनना बेहतर")।

3. वैशेषिक: पदार्थ, कारणता और अभाव

  • सात पदार्थ: द्रव्य, गुण, कर्म, सामान्य, विशेष, समवाय, और अभाव (बाद में जोड़ा गया)।
  • नौ द्रव्य: पृथ्वी, जल, तेज, वायु, आकाश, काल, दिक्, आत्मा, मन।
  • 24 गुण (रूप, रस, गंध, स्पर्श, संख्या, बुद्धि, सुख, दुःख आदि) और 5 कर्म (उत्क्षेपण, अवक्षेपण, आकुंचन, प्रसारण, गमन)।
  • विशेष: नित्य द्रव्यों (परमाणुओं) को एक-दूसरे से अलग करने वाला अंतिम भेदक; इसी से दर्शन का नाम "वैशेषिक" पड़ा।
  • समवाय: अविभाज्य, नित्य संबंध (अवयव-अवयवी, गुण-गुणी, जाति-व्यक्ति)।
  • परमाणुवाद: दो परमाणु मिलकर द्व्यणुक, तीन द्व्यणुक मिलकर त्र्यणुक (प्रथम दृश्य कण)। ईश्वर परमाणुओं की गति का निमित्त कारण है, अदृष्ट (कर्म-शक्ति) के अनुसार।

3.1 न्याय-वैशेषिक का कारणता-सिद्धांत (UPSC 2025)

  • कारण की परिभाषा: "नियत-पूर्ववृत्ति अनन्यथासिद्ध", यानी जो कार्य से पहले सदा उपस्थित हो और जो अन्यथासिद्ध (अप्रासंगिक) न हो।
  • पाँच अन्यथासिद्ध: जैसे धागों का रंग (कपड़े के लिए), कुम्हार का पिता, और मिट्टी ढोने वाला गधा। ये पहले उपस्थित रहते हैं पर कारण नहीं।
  • तीन प्रकार के कारण:
    • समवायी कारण (उपादान): जिसमें कार्य समवाय-संबंध से रहे, जैसे कपड़े के धागे।
    • असमवायी कारण: समवायी कारण में रहने वाला गुण या कर्म, जैसे धागों का संयोग।
    • निमित्त कारण: शेष सहायक, जैसे बुनकर, करघा।
  • असत्कार्यवाद (आरंभवाद): कार्य उत्पत्ति से पहले कारण में नहीं रहता; वह एक "नई रचना" (आरंभ) है। कपड़ा धागों से भिन्न एक नया अवयवी है।
  • तर्क:
    • यदि कार्य पहले से विद्यमान था, तो कारण-व्यापार (बुनना) व्यर्थ होता।
    • कार्य और कारण के नाम, आकार और कार्य भिन्न हैं: घड़ा पानी रखता है, मिट्टी नहीं।
    • हम "उत्पत्ति" और "प्राग्भाव" (पहले न होना) का अनुभव करते हैं।
  • आलोचना: सांख्य: यदि कार्य असत् है, तो "खरगोश का सींग" भी उत्पन्न हो सकता; और मिट्टी से ही घड़ा क्यों, रेत से क्यों नहीं? अद्वैत: कार्य कारण का "विवर्त" है।

3.2 अभाव के प्रकार और "वायु" के दो वाक्य (UPSC 2024)

अभावअर्थउदाहरण
प्राग्भावउत्पत्ति से पहले का अभाव (अनादि, सांत)बनने से पहले घड़ा नहीं
प्रध्वंसाभावनाश के बाद का अभाव (सादि, अनंत)टूटने के बाद घड़ा नहीं
अत्यंताभावत्रैकालिक अभाव, किसी संबंध कावायु में रूप नहीं
अन्योन्याभावभेद, यानी तादात्म्य का अभावघड़ा कपड़ा नहीं है

पहले तीन "संसर्गाभाव" (किसी संबंध का अभाव) हैं, और चौथा "अन्योन्याभाव" (भेद) है।

  • "वायु में उष्णता नहीं है": वायु का स्पर्श "अनुष्णाशीत" (न गर्म, न ठंडा) है; उष्ण स्पर्श तेज (अग्नि) का गुण है। यहाँ उष्ण स्पर्श का वायु में समवाय-संबंध से अभाव कहा गया है। यह अत्यंताभाव (संसर्गाभाव) है, जिसका प्रतियोगी "उष्णता" है और प्रतियोगिता का अवच्छेदक संबंध "समवाय"।
  • "वायु अग्नि नहीं है": यहाँ वायु और अग्नि के तादात्म्य का निषेध है, यानी दोनों भिन्न हैं। यह अन्योन्याभाव है, जिसका प्रतियोगी "अग्नि" है और अवच्छेदक संबंध "तादात्म्य"।
  • निष्कर्ष: दोनों वाक्य एक ही प्रकार के अभाव की बात नहीं करते। एक संबंध (गुण के रहने) का अभाव है, दूसरा पहचान का अभाव। इसीलिए नव्य-न्याय में "प्रतियोगिता-अवच्छेदक संबंध" का स्पष्ट उल्लेख आवश्यक है।
  • अभाव का ज्ञान: न्याय-वैशेषिक के अनुसार अभाव प्रत्यक्ष (विशेषणता सन्निकर्ष) से जाना जाता है; भाट्ट मीमांसा और अद्वैत के अनुसार अलग प्रमाण "अनुपलब्धि" से।

4. सांख्य दर्शन

4.1 सत्कार्यवाद

  • सिद्धांत: कार्य उत्पत्ति से पहले कारण में अव्यक्त रूप से विद्यमान रहता है; उत्पत्ति केवल अभिव्यक्ति है (परिणामवाद)।
  • पाँच तर्क (सांख्यकारिका 9):
    • असदकरणात्: असत् को सत् नहीं बनाया जा सकता (रेत से तेल नहीं)।
    • उपादानग्रहणात्: विशेष कार्य के लिए विशेष उपादान लिया जाता है (दही के लिए दूध)।
    • सर्वसंभवाभावात्: हर चीज़ से हर चीज़ नहीं बनती।
    • शक्तस्य शक्यकरणात्: समर्थ कारण ही संभव कार्य उत्पन्न करता है।
    • कारणभावात्: कार्य कारण का ही स्वरूप है (कपड़ा धागों से भिन्न नहीं)।

4.2 प्रकृति और पुरुष

  • प्रकृति: जड़, एक, त्रिगुणात्मक (सत्त्व: प्रकाश, सुख; रजस्: गति, दुःख; तमस्: जड़ता, मोह), अव्यक्त, सबका मूल कारण। साम्यावस्था में गुण संतुलित रहते हैं।
  • प्रकृति के अस्तित्व के प्रमाण (कारिका 15): सीमित वस्तुओं का कारण चाहिए; सबमें समान गुण-संरचना; कार्य-कारण की शक्ति; और प्रलय में सब एक में लीन।
  • पुरुष: शुद्ध चेतना, निष्क्रिय, साक्षी, असंग।
  • पुरुष के अस्तित्व के प्रमाण (कारिका 17):
    • संघातपरार्थत्वात्: संघात (संयुक्त वस्तुएँ, जैसे शय्या) किसी अन्य के लिए होते हैं।
    • त्रिगुणादिविपर्ययात्: त्रिगुणी जगत से भिन्न कोई त्रिगुण-रहित चेतना चाहिए।
    • अधिष्ठानात्: जड़ प्रकृति को चेतन नियंता चाहिए (रथ का सारथी)।
    • भोक्तृभावात्: सुख-दुःख का भोक्ता।
    • कैवल्यार्थं प्रवृत्तेः: मुक्ति के प्रयास से।
  • पुरुष-बहुत्व (कारिका 18): जन्म-मरण और इंद्रियों का अलग-अलग नियमन, अलग-अलग प्रवृत्ति, और गुणों का भिन्न अनुपात।

4.3 सांख्यकारिका के अनुसार प्रकृति का विकास (UPSC 2024)

  • आरंभ: पुरुष और प्रकृति का संयोग, जैसे लँगड़े (पुरुष, देख सकता पर चल नहीं सकता) और अंधे (प्रकृति, चल सकती पर देख नहीं सकती) का सहयोग (कारिका 21)। इससे गुणों की साम्यावस्था टूटती है (गुण-क्षोभ)।
  • क्रम:
    • प्रकृति से महत् (बुद्धि)।
    • महत् से अहंकार।
    • सात्त्विक अहंकार से मन, 5 ज्ञानेंद्रियाँ, 5 कर्मेंद्रियाँ।
    • तामस अहंकार (भूतादि) से 5 तन्मात्राएँ (शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गंध)।
    • तन्मात्राओं से 5 महाभूत (आकाश, वायु, तेज, जल, पृथ्वी)।
    • राजस अहंकार दोनों दिशाओं को गति देता है।
  • कुल 25 तत्त्व: प्रकृति (केवल कारण), 7 प्रकृति-विकृति (महत्, अहंकार, 5 तन्मात्राएँ), 16 विकृति (मन, 10 इंद्रियाँ, 5 महाभूत), और पुरुष (न कारण, न कार्य)।
  • प्रयोजन: विकास पुरुष के "भोग" और "अपवर्ग" (मुक्ति) के लिए है।
    • बछड़े के लिए अचेतन दूध का स्वतः बहना (कारिका 57)।
    • नर्तकी का दर्शकों को नृत्य दिखाकर रुक जाना (कारिका 59)।

4.4 बुद्धि, महत् और अहंकार का भेद (UPSC 2024)

तत्त्वस्वरूपकार्य
महत्प्रकृति का पहला विकार; ब्रह्मांडीय पक्ष ("महान" तत्त्व, जिसमें पूरा भावी जगत बीज रूप में)ब्रह्मांडीय बुद्धि, सृष्टि का आधार
बुद्धिवही तत्त्व, व्यक्तिगत-मनोवैज्ञानिक पक्ष में"अध्यवसायो बुद्धिः" (कारिका 23), यानी निश्चय; सात्त्विक रूप: धर्म, ज्ञान, वैराग्य, ऐश्वर्य
अहंकारबुद्धि से उत्पन्न; "मैं" का भाव"अभिमानोऽहंकारः" (कारिका 24), यानी "मैं कर्ता हूँ, यह मेरा है"; आगे के विकास का द्वार

सार: महत् और बुद्धि एक ही तत्त्व के दो नाम हैं: ब्रह्मांडीय दृष्टि से "महत्", व्यक्तिगत दृष्टि से "बुद्धि"। अहंकार अलग, परवर्ती तत्त्व है। बुद्धि में पुरुष का प्रतिबिंब पड़ने से जड़ बुद्धि चेतन-सी लगती है।

4.5 सांख्य की आलोचना

  • अचेतन प्रकृति प्रयोजन (पुरुष के लिए) से कैसे काम करती है? (शंकर: बिना चेतन नियंता के प्रयोजन असंभव)।
  • असंग पुरुष और प्रकृति का "संयोग" कैसे? बंधन वास्तविक है या आभास?
  • शंकर ने सांख्य को "प्रधान मल्ल" (मुख्य प्रतिद्वंद्वी) कहा (देखें अगला अध्याय)।

5. योग दर्शन

  • परिभाषा: "योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः" (योगसूत्र 1.2), यानी चित्त की वृत्तियों का निरोध।
  • चित्त: बुद्धि, अहंकार और मन का समूह; सात्त्विक होने से पुरुष का प्रतिबिंब ग्रहण करता है।
  • पाँच वृत्तियाँ: प्रमाण, विपर्यय (भ्रम), विकल्प (शब्द-जनित कल्पना), निद्रा, स्मृति।
  • चित्त की पाँच भूमियाँ: क्षिप्त, मूढ़, विक्षिप्त, एकाग्र, निरुद्ध; अंतिम दो योग के योग्य।
  • पाँच क्लेश: अविद्या (मूल), अस्मिता, राग, द्वेष, अभिनिवेश (मृत्यु-भय)।
  • अष्टांग योग: यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान, समाधि।
  • समाधि: संप्रज्ञात (वितर्क, विचार, आनंद, अस्मिता सहित) और असंप्रज्ञात (सब वृत्तियाँ निरुद्ध, केवल संस्कार-शेष)।
  • अभ्यास और वैराग्य (1.12): निरोध के दो साधन।

5.1 योग का मोक्ष-शास्त्र: चित्त में आत्मा का प्रतिबिंब (UPSC 2024)

  • बंधन की व्याख्या:
    • पुरुष शुद्ध और अपरिवर्तनशील है; चित्त परिवर्तनशील है।
    • सात्त्विक चित्त में पुरुष का प्रतिबिंब पड़ता है, जैसे जल में चंद्रमा का।
    • विवेक के अभाव में पुरुष स्वयं को वृत्तियों के समान मान लेता है: "वृत्तिसारूप्यम् इतरत्र" (1.4)। जल हिले तो चंद्रमा हिलता-सा लगता है; चित्त दुखी हो तो "मैं दुखी हूँ"।
    • यही "संयोग" (द्रष्टा-दृश्य का), और इसका कारण अविद्या है (2.17, 2.24)।
  • मुक्ति:
    • वृत्तियाँ शांत होने पर "तदा द्रष्टुः स्वरूपेऽवस्थानम्" (1.3), यानी द्रष्टा अपने स्वरूप में स्थित होता है।
    • "विवेकख्याति" (पुरुष और चित्त के भेद का अविच्छिन्न ज्ञान) से अविद्या का नाश (2.26)।
    • कैवल्य: पुरुष का प्रकृति से पूर्ण अलगाव; "पुरुषार्थशून्यानां गुणानां प्रतिप्रसवः कैवल्यं" (4.34), यानी गुण अपने मूल में लौट जाते हैं।
  • मूल्यांकन:
    • शक्ति: मनोवैज्ञानिक रूप से समृद्ध; बंधन को "पहचान की भूल" के रूप में समझाना आधुनिक मनोविज्ञान से मेल खाता है।
    • कठिनाई: यदि पुरुष कभी वास्तव में बँधा ही नहीं, तो मुक्ति किसकी? सांख्य-योग स्वयं मानते हैं कि बंधन और मुक्ति वस्तुतः प्रकृति के हैं (सांख्यकारिका 62)।

5.2 योग में ईश्वर का स्वरूप और कैवल्य में भूमिका (UPSC 2025)

  • परिभाषा: "क्लेश-कर्म-विपाक-आशयैः अपरामृष्टः पुरुषविशेषः ईश्वरः" (1.24), यानी जो क्लेश, कर्म, कर्मफल और संस्कारों से अछूता हो, वह विशेष पुरुष ईश्वर है।
  • लक्षण:
    • उसमें सर्वज्ञता का बीज निरतिशय (सर्वोच्च) है (1.25)।
    • वह "पूर्वेषामपि गुरुः" (प्राचीन ऋषियों का भी गुरु) है, काल से अबाधित (1.26)।
    • उसका वाचक "प्रणव" (ॐ) है (1.27); ॐ का जप और उसके अर्थ की भावना (1.28)।
    • वह जगत का स्रष्टा नहीं; सृष्टि प्रकृति से होती है।
    • वह कभी बँधा नहीं था, जबकि मुक्त पुरुष पहले बँधे थे।
  • कैवल्य में भूमिका:
    • ईश्वर-प्रणिधान (ईश्वर के प्रति समर्पण) समाधि का एक वैकल्पिक, तीव्र साधन है (1.23), और नियम तथा क्रियायोग का भाग भी (2.1, 2.32)।
    • "समाधिसिद्धिरीश्वरप्रणिधानात्" (2.45): ईश्वर-प्रणिधान से समाधि की सिद्धि।
    • ईश्वर ध्यान का आदर्श विषय (शुद्ध पुरुष का आदर्श) और बाधाओं (व्याधि, संशय, प्रमाद आदि अंतराय) के निवारण में सहायक है (1.29-30)।
    • भाष्यकार (व्यास, वाचस्पति): ईश्वर अपनी करुणा से प्रकृति और पुरुष के संयोग-वियोग की बाधाएँ दूर करता है।
  • आलोचनात्मक मूल्यांकन:
    • ईश्वर कैवल्य का अनिवार्य कारण नहीं; विवेकख्याति ही मुक्ति का सीधा साधन है। इसलिए कुछ विद्वान योग के ईश्वर को "बाद में जोड़ा गया" या "व्यावहारिक" मानते हैं।
    • सांख्य (निरीश्वर) और योग (सेश्वर) का भेद यहीं है।
    • दूसरी ओर, भक्ति-परंपरा (भगवद्गीता) से योग का जुड़ाव इसी ईश्वर-प्रणिधान से हुआ।

6. Master Summary Table

विषयन्याय-वैशेषिकसांख्य-योग
कारणताअसत्कार्यवाद (आरंभवाद); तीन कारणसत्कार्यवाद (परिणामवाद); पाँच तर्क
तत्त्व7 पदार्थ, 9 द्रव्य, परमाणु25 तत्त्व; प्रकृति और पुरुष
आत्माअनेक, विभु; चेतना आगंतुक गुणअनेक पुरुष; चेतना स्वरूप
ईश्वरजगत का निमित्त कारण (अनुमान से सिद्ध)सांख्य: नहीं; योग: विशेष पुरुष, गुरु
प्रमाणचार; प्रत्यक्ष-परिभाषा 1.1.4तीन: प्रत्यक्ष, अनुमान, शब्द
मुक्तिअपवर्ग: दुःख की आत्यंतिक निवृत्ति; चेतना-रहितकैवल्य: विवेकख्याति; पुरुष का स्वरूप में अवस्थान

7. चार्ट: सांख्य के अनुसार प्रकृति का विकास

पुरुष (साक्षी) प्रकृति (त्रिगुण) महत् / बुद्धि अहंकार सात्त्विक: मन + 5 ज्ञानेंद्रिय + 5 कर्मेंद्रिय तामस (भूतादि): 5 तन्मात्राएँ 5 महाभूत (आकाश ... पृथ्वी) संयोग (लँगड़ा-अंधा) राजस अहंकार दोनों शाखाओं को गति देता है; कुल 25 तत्त्व
सांख्य का विकास-क्रम: पुरुष के सान्निध्य से प्रकृति में गुण-क्षोभ, फिर महत्, अहंकार और उसकी दो शाखाएँ। पुरुष स्वयं न कारण है, न कार्य।

8. Mind Map

न्याय-वैशेषिक, सांख्य एवं योग
न्याय प्रमाण
  • प्रत्यक्ष 1.1.4, सन्निकर्ष
  • प्रमाण-फल विवाद
न्याय आत्मा
  • छह लिंग
  • आगंतुक चेतना
वैशेषिक
  • 7 पदार्थ, परमाणु
  • आरंभवाद, चार अभाव
सांख्य
  • सत्कार्यवाद, पुरुष-प्रकृति
  • 25 तत्त्व, महत्-अहंकार
योग
  • चित्त, वृत्ति, क्लेश, अष्टांग
  • ईश्वर, कैवल्य

9. महत्वपूर्ण One-liners

  • प्रत्यक्ष की परिभाषा: न्यायसूत्र 1.1.4।
  • "ज्ञानाकरणकं ज्ञानं प्रत्यक्षम्": गंगेश।
  • आत्मा के छह लिंग: न्यायसूत्र 1.1.10।
  • अभाव का प्रत्यक्ष किस सन्निकर्ष से: विशेषणता।
  • भेद (तादात्म्य का अभाव): अन्योन्याभाव।
  • कपड़े के लिए धागों का संयोग: असमवायी कारण।
  • सत्कार्यवाद के पाँच तर्क: सांख्यकारिका 9।
  • "अध्यवसायो बुद्धिः": सांख्यकारिका 23।
  • प्रकृति-पुरुष संयोग का दृष्टांत: लँगड़ा और अंधा (कारिका 21)।
  • "योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः": योगसूत्र 1.2।
  • ईश्वर का वाचक: प्रणव (ॐ), योगसूत्र 1.27।

10. टिप्स एवं ट्रिक्स

उत्तर-लेखन
  • सूत्र या कारिका का मूल संस्कृत पाठ लिखकर उसका पद-विश्लेषण करें; यह न्याय और सांख्य के प्रश्नों में सबसे प्रभावी है।
  • सांख्य-विकास के प्रश्न में विकास-चार्ट अवश्य बनाएँ।
  • अभाव के प्रश्नों में "प्रतियोगी" और "अवच्छेदक संबंध" शब्दों का प्रयोग करें।
याद रखने की तरकीब

छह लिंग: "इ-द्वे-प्र-सु-दु-ज्ञा"। पाँच क्लेश: "अ-अ-रा-द्वे-अ" (अविद्या, अस्मिता, राग, द्वेष, अभिनिवेश)। 25 तत्त्व = 1 + 7 + 16 + 1।

सामान्य भूल

न्याय में चेतना आत्मा का स्वरूप नहीं, आगंतुक गुण है; सांख्य-योग और अद्वैत में चेतना आत्मा का स्वरूप है। इस भेद को उलटें नहीं।

11. PYQ-आधारित प्रश्न एवं मॉडल उत्तर

Q1UPSC 2025 · Paper I · 5(b) · 10 अंक

प्रमाण और प्रमाणफल की धारणा के संदर्भ में नैयायिकों और बौद्धों के बीच विवाद का विवरण दीजिए।

मॉडल उत्तर

न्याय: करण और फल भिन्न; कुल्हाड़ी; हान-उपादान बुद्धि; स्थायी प्रमाता।

बौद्ध: एक ही ज्ञान; सारूप्य और स्व-संवित्ति; भेद केवल व्यवस्था।

मूल: यथार्थवाद बनाम अनात्मवाद।

Q2UPSC 2025 · Paper I · 5(e) · 10 अंक

न्याय-वैशेषिक के कारणता-सिद्धांत की व्याख्या कीजिए।

मॉडल उत्तर

परिभाषा: नियत-पूर्ववृत्ति, अनन्यथासिद्ध; अन्यथासिद्ध के उदाहरण।

तीन कारण (कपड़े का उदाहरण); असत्कार्यवाद और तर्क।

सांख्य की आलोचना।

Q3UPSC 2024 · Paper I · 5(b) · 10 अंक

आत्मा के अस्तित्व को सिद्ध करने के लिए नैयायिकों द्वारा दिए गए छह कारणों की व्याख्या कीजिए।

मॉडल उत्तर

सूत्र 1.1.10; गुण-द्रव्य तर्क।

प्रत्येक लिंग: स्मृति और एकता की आवश्यकता।

आलोचना: बौद्ध संतान; वेदांत।

Q4UPSC 2024 · Paper I · 5(c) · 10 अंक

वैशेषिकों के अनुसार क्या "वायु में उष्णता नहीं है" और "वायु अग्नि नहीं है" एक ही प्रकार के अभाव की ओर संकेत करते हैं? विवेचना कीजिए।

मॉडल उत्तर

अभाव के चार प्रकार (तालिका)।

पहला: अत्यंताभाव, समवाय-संबंध; दूसरा: अन्योन्याभाव, तादात्म्य।

निष्कर्ष: भिन्न प्रकार।

Q5UPSC 2025 · Paper I · 6(a)

गौतम की प्रत्यक्ष की परिभाषा का विस्तृत विवरण प्रस्तुत कीजिए।

मॉडल उत्तर (रूपरेखा)

सूत्र 1.1.4 का पद-विश्लेषण; किसे बाहर करता है।

निर्विकल्पक-सविकल्पक; छह सन्निकर्ष; अलौकिक प्रत्यक्ष।

गंगेश का संशोधन; बौद्ध आलोचना।

Q6UPSC 2024 · Paper I · 7(a)

सांख्यकारिका में प्रतिपादित प्रकृति के विकास का विवरण प्रस्तुत कीजिए। इस संदर्भ में बुद्धि, महत् और अहंकार के अंतर की भी व्याख्या कीजिए।

मॉडल उत्तर (रूपरेखा)

सत्कार्यवाद आधार; संयोग; गुण-क्षोभ।

क्रम (चार्ट), 25 तत्त्व; प्रयोजन (दूध, नर्तकी)।

तालिका: महत् = बुद्धि (दो पक्ष), अहंकार अलग।

Q7UPSC 2024 · Paper I · 7(b)

"जब तक चित्त में परिवर्तन और विकार हैं, आत्मा उसमें प्रतिबिंबित होती है, और विवेक-ज्ञान के अभाव में स्वयं को उनसे एकरूप मान लेती है।" इस कथन के आलोक में योग के मोक्ष-शास्त्र का मूल्यांकन कीजिए।

मॉडल उत्तर (रूपरेखा)

बंधन: प्रतिबिंब, वृत्तिसारूप्य (1.4), अविद्या।

मुक्ति: निरोध, स्वरूपावस्थान (1.3), विवेकख्याति, कैवल्य (4.34)।

मूल्यांकन: मनोवैज्ञानिक शक्ति; "बंधन किसका" की कठिनाई।

Q8UPSC 2025 · Paper I · 7(b)

योग दर्शन में ईश्वर के स्वरूप और कैवल्य में उसकी भूमिका की व्याख्या कीजिए।

मॉडल उत्तर (रूपरेखा)

परिभाषा 1.24 और लक्षण (1.25-27)।

भूमिका: ईश्वर-प्रणिधान (1.23, 2.45), अंतराय-निवारण, ध्यान का विषय।

मूल्यांकन: अनिवार्य नहीं; सांख्य से भेद; भक्ति से जुड़ाव।

Q9अभ्यास प्रश्न · 15 अंक

सत्कार्यवाद और असत्कार्यवाद की तुलना कीजिए। कौन-सा सिद्धांत परिवर्तन की बेहतर व्याख्या करता है?

मॉडल उत्तर (रूपरेखा)

सांख्य के पाँच तर्क बनाम न्याय के तीन तर्क।

परस्पर आलोचना; अद्वैत का विवर्तवाद।

निष्कर्ष: निरंतरता बनाम नवीनता का संतुलन।

12. Quick Revision Summary

परीक्षा से पहले एक बार ज़रूर पढ़ें
  • न्याय: चार प्रमाण; प्रत्यक्ष 1.1.4 (पाँच पद); छह सन्निकर्ष; प्रमाण-फल भिन्न; छह लिंग से आत्मा।
  • वैशेषिक: 7 पदार्थ; परमाणु; तीन कारण; आरंभवाद; चार अभाव (वायु के दो वाक्य भिन्न)।
  • सांख्य: सत्कार्यवाद; त्रिगुण; पुरुष-प्रमाण; विकास, 25 तत्त्व; महत् = बुद्धि, अहंकार अलग।
  • योग: चित्तवृत्तिनिरोध; प्रतिबिंब और वृत्तिसारूप्य; विवेकख्याति; ईश्वर विशेष पुरुष, प्रणिधान सहायक।