UPSC Mains · Political Science & International Relations · Paper I · अध्याय 1

राजनीतिक सिद्धांत एवं राज्य के सिद्धांत

Political Theory and Theories of the State

राजनीतिक सिद्धांत का अर्थ और दृष्टिकोण; उदारवादी, नव-उदारवादी, मार्क्सवादी, बहुलवादी, उत्तर-उपनिवेशवादी और नारीवादी राज्य सिद्धांत।

Paper I 25 मिनट

1. अध्याय एक नज़र में

PSIR Paper I का Section A "Political Theory and Indian Politics" से शुरू होता है और उसका पहला unit है — Political Theory: meaning and approaches। दूसरा unit है — Theories of the State: Liberal, Neo-liberal, Marxist, Pluralist, Post-colonial और Feminist। ये दोनों units हर साल प्रश्नपत्र में दिखते हैं। 2023 में अकेले "approaches" से तीन प्रश्न (normative approach, decline of political theory, Easton का Credo of Relevance) आए और 2024 में Behavioural approach तथा Pluralist theory of State पर 10-10 अंक के प्रश्न पूछे गए।

परीक्षा का ढाँचा (Optional Paper)
  • दो प्रश्नपत्र — Paper I और Paper II; हर पेपर 250 अंक, समय 3 घंटे।
  • हर पेपर में 8 प्रश्न, दो Sections (A और B)। प्रश्न 1 और 5 अनिवार्य — इनमें 150 शब्दों के पाँच-पाँच भाग (10×5 = 50 अंक)।
  • बाकी 6 में से 3 प्रश्न, हर Section से कम से कम एक; हर प्रश्न 50 अंक (आमतौर पर 20 + 15 + 15)।
  • उत्तर का माध्यम हिंदी चुना जा सकता है; तकनीकी शब्द (जैसे legitimacy, hegemony) कोष्ठक में अंग्रेज़ी में लिखना अच्छा रहता है।
इस अध्याय में आप क्या सीखेंगे
  • "राजनीतिक" (political) शब्द के अर्थ और राजनीतिक सिद्धांत की प्रकृति।
  • पारंपरिक, व्यवहारवादी, उत्तर-व्यवहारवादी और तंत्र (systems) उपागम; मानक बनाम अनुभवजन्य बहस।
  • राजनीतिक सिद्धांत का "पतन" (decline) और "पुनरुत्थान" (resurgence)।
  • राज्य के छह सिद्धांत, उनकी तुलना, आलोचना और भारतीय संदर्भ में उपयोग।
राजनीतिक सिद्धांत के दस अध्यायों का चित्र-सार
राजनीतिक सिद्धांत की मूल अवधारणाएँ — स्वतंत्रता, समानता, न्याय, अधिकार, नागरिकता, राष्ट्रवाद, धर्मनिरपेक्षता, शांति और विकास — एक नज़र में। (NCERT आधारित infographic)

2. राजनीतिक सिद्धांत: अर्थ और प्रकृति

राजनीतिक सिद्धांत (Political Theory) वह बौद्धिक प्रयास है जिसमें हम राजनीतिक जीवन के बुनियादी प्रश्नों पर व्यवस्थित ढंग से सोचते हैं — शासन किसे करना चाहिए, आज्ञापालन क्यों करें, न्यायपूर्ण समाज कैसा हो, स्वतंत्रता और समानता में संतुलन कैसे बने। जॉर्ज सबाइन के अनुसार राजनीतिक सिद्धांत "मनुष्य द्वारा अपने समूह-जीवन और संगठन की समस्याओं को सचेत रूप से समझने और सुलझाने का प्रयास" है; वह केवल यह नहीं बताता कि राजनीतिक व्यवहार क्या है, बल्कि यह भी कि उसका अर्थ क्या है और क्या होना चाहिए।

"Political" के चार अर्थ

दृष्टिकोण"राजनीतिक" का अर्थप्रमुख विचारक / उदाहरण
राज्य-केंद्रित (Institutional)राज्य, सरकार और उनकी संस्थाओं से जुड़ा कार्यअरस्तू — "मनुष्य स्वभाव से राजनीतिक प्राणी है"; संसद, न्यायालय
शक्ति-केंद्रित (Power)जहाँ भी शक्ति का प्रयोग और संघर्ष है, वहाँ राजनीति हैलासवेल — "Who gets what, when, how"; फूको — शक्ति हर संबंध में
संघर्ष-समाधान (Conflict resolution)मतभेदों को हिंसा के बिना, बातचीत और समझौते से सुलझानाबर्नार्ड क्रिक — "In Defence of Politics"
मूल्यों का आधिकारिक आवंटनसमाज के लिए मूल्यों (संसाधन, अधिकार, सम्मान) का बाध्यकारी बँटवाराडेविड ईस्टन — "authoritative allocation of values"

नारीवादियों ने "The personal is political" कहकर इस दायरे को घर-परिवार तक बढ़ा दिया — घरेलू हिंसा, श्रम का लैंगिक बँटवारा और प्रजनन के अधिकार भी राजनीति के विषय हैं। हन्ना आरेंट के लिए "राजनीतिक" वह सार्वजनिक क्षेत्र है जहाँ समान नागरिक मिलकर action और speech से नई शुरुआत करते हैं।

राजनीतिक सिद्धांत के तीन कार्य

  1. व्याख्यात्मक (Explanatory) — राजनीतिक घटनाओं के कारण और प्रवृत्तियाँ समझाना; जैसे मतदान व्यवहार।
  2. मानक (Normative) — आदर्श और कसौटी देना; जैसे रॉल्स का न्याय सिद्धांत।
  3. आलोचनात्मक (Critical) — मौजूदा व्यवस्था की छिपी असमानताएँ उजागर करना; जैसे मार्क्सवादी और नारीवादी सिद्धांत।

3. राजनीतिक सिद्धांत के उपागम (Approaches)

(क) पारंपरिक उपागम (Traditional)

  • दार्शनिक (Philosophical) — "क्या होना चाहिए" पर बल; आदर्श राज्य, न्याय, सद्गुण। प्लेटो का Republic, कांट, हेगेल, ग्रीन। निष्कर्ष तर्क से निकाले जाते हैं, अनुभव से नहीं। आलोचना: अमूर्त, अवैज्ञानिक, कभी-कभी सर्वसत्तावाद को सही ठहराने का ख़तरा (कार्ल पॉपर ने प्लेटो को "open society" का शत्रु कहा)।
  • ऐतिहासिक (Historical) — विचारों और संस्थाओं को उनके ऐतिहासिक संदर्भ में समझना। सबाइन, डनिंग। संदर्भवादी (Contextualist) धारा — क्वेंटिन स्किनर: किसी पाठ को समझने के लिए लेखक की मंशा और उस समय की भाषाई परंपरा देखो।
  • संस्थागत-विधिक (Institutional-Legal) — संविधान, क़ानून, संसद, न्यायपालिका का औपचारिक अध्ययन। ब्राइस, फ़ाइनर, लास्की। सीमा: औपचारिक ढाँचे पर ज़ोर, वास्तविक व्यवहार की उपेक्षा। बाद में नव-संस्थावाद (March और Olsen) ने संस्थाओं को "खेल के नियम" मानकर फिर केंद्र में रखा।

(ख) व्यवहारवादी उपागम (Behaviouralism)

द्वितीय विश्व युद्ध के बाद अमेरिका में राजनीति विज्ञान को "प्राकृतिक विज्ञान" जैसा बनाने का आंदोलन। इसकी जड़ें शिकागो स्कूल (चार्ल्स मेरियम, हैरोल्ड लासवेल) में हैं। डेविड ईस्टन ने इसकी आठ "बौद्धिक आधारशिलाएँ" (intellectual foundation stones) बताईं:

#आधारशिलासरल अर्थ
1Regularitiesराजनीतिक व्यवहार में नियमितताएँ खोजी जा सकती हैं
2Verificationसामान्यीकरण की जाँच प्रमाण से हो
3Techniquesआँकड़े जुटाने की वैज्ञानिक तकनीकें — सर्वे, साक्षात्कार
4Quantificationजहाँ संभव हो माप और गणना
5Valuesतथ्य और मूल्य अलग रखें (fact-value dichotomy)
6Systematisationशोध सिद्धांत से जुड़ा और व्यवस्थित हो
7Pure Scienceपहले "शुद्ध" ज्ञान, अनुप्रयोग बाद में
8Integrationअन्य सामाजिक विज्ञानों से जुड़ाव (अंतर-अनुशासनात्मकता)

योगदान: मतदान व्यवहार, राजनीतिक संस्कृति (Almond-Verba), दबाव समूह और अभिजन अध्ययनों से राजनीति का यथार्थ सामने आया। आलोचना: (1) मूल्य-तटस्थता का दावा स्वयं एक मूल्य है — यह यथास्थिति (status quo) का समर्थन करता है; (2) "जो मापा जा सकता है वही अध्ययन" — इसलिए छोटे, तुच्छ प्रश्नों में उलझना (Leo Strauss: "fiddling while Rome burns"); (3) वियतनाम युद्ध, नागरिक अधिकार आंदोलन जैसे बड़े संकटों पर चुप्पी।

(ग) उत्तर-व्यवहारवाद (Post-behaviouralism)

1969 में अमेरिकन पॉलिटिकल साइंस एसोसिएशन के अध्यक्षीय भाषण में ईस्टन ने स्वयं "Credo of Relevance" दिया। इसके दो नारे थे — Relevance (प्रासंगिकता) और Action (कर्म)। मुख्य बातें: तकनीक से अधिक महत्वपूर्ण सार (substance) है; विज्ञान को समाज की समस्याओं से जुड़ना चाहिए; मूल्य अनुसंधान का अभिन्न हिस्सा हैं; बुद्धिजीवी की ज़िम्मेदारी है कि ज्ञान का प्रयोग मानवीय मूल्यों की रक्षा में करे; पेशे (profession) का "राजनीतिकरण" ज़रूरी है। यह व्यवहारवाद का निषेध नहीं बल्कि उसका सुधार (corrective) था — तकनीक बनी रही, पर उद्देश्य बदल गया।

(घ) तंत्र उपागम (Systems Approach) — डेविड ईस्टन

ईस्टन ने राजनीतिक व्यवस्था को एक "खुले तंत्र" के रूप में देखा जो अपने पर्यावरण से Inputs (माँगें और समर्थन) लेता है, उन्हें "conversion process" (सरकार रूपी black box) में बदलता है और Outputs (नीतियाँ, निर्णय) देता है; outputs का असर Feedback के रूप में फिर inputs को प्रभावित करता है। Gabriel Almond ने इसे संरचनात्मक-प्रकार्यात्मक (structural-functional) रूप दिया — input functions (राजनीतिक समाजीकरण, हित-अभिव्यक्ति, हित-समूहन, संचार) और output functions (नियम-निर्माण, नियम-प्रयोग, नियम-निर्णयन)।

पर्यावरण (Environment) — सामाजिक, आर्थिक, अंतरराष्ट्रीय INPUTSमाँगें + समर्थन राजनीतिकव्यवस्था (Black box) OUTPUTSनीतियाँ, निर्णय FEEDBACK (प्रतिपुष्टि)
ईस्टन का तंत्र मॉडल — माँगें और समर्थन व्यवस्था में जाते हैं, नीतियाँ बाहर आती हैं और उनका असर फीडबैक बनकर लौटता है।

आलोचना: यथास्थितिवादी (system maintenance पर ज़ोर), black box के भीतर शक्ति-संघर्ष की उपेक्षा, पश्चिमी लोकतंत्रों से निकले मॉडल को विकासशील देशों पर लागू करने की कठिनाई।

(ङ) मानक बनाम अनुभवजन्य (Normative vs Empirical)

आधारमानक (Normative)अनुभवजन्य (Empirical)
प्रश्नक्या होना चाहिए? (ought)क्या है? (is)
पद्धतितर्क, दार्शनिक चिंतन, नैतिक विवेचनअवलोकन, सर्वे, सांख्यिकी, परीक्षण
उदाहरणप्लेटो, रूसो, रॉल्स, अमर्त्य सेनलासवेल, डाल, आल्मंड-वर्बा
शक्तिदिशा और आदर्श देता हैयथार्थ और प्रमाण देता है
सीमायथार्थ से दूरी का ख़तरामूल्य-शून्यता, यथास्थितिवाद
उत्तर लेखन संकेत

यह बहस "या तो–या" की नहीं है। अच्छा उत्तर लिखता है कि दोनों एक-दूसरे के पूरक हैं — बिना तथ्य के आदर्श अंधे हैं और बिना आदर्श के तथ्य दिशाहीन। रॉल्स और सेन जैसे विचारकों ने अनुभवजन्य आँकड़ों का उपयोग करते हुए मानक सिद्धांत रचा।

4. राजनीतिक सिद्धांत का पतन और पुनरुत्थान

पतन (Decline) की बहस: 1950 के दशक में कई विद्वानों ने घोषणा की कि महान राजनीतिक सिद्धांत की परंपरा समाप्त हो गई है।

  • डेविड ईस्टन (The Political System, 1953) — सिद्धांत इतिहासवाद (historicism) में फँस गया है; वह केवल पुराने विचारकों की व्याख्या करता है, नया सिद्धांत नहीं बनाता।
  • अल्फ़्रेड कॉबन (1953) — लेख "The Decline of Political Theory"; राजनीतिक सिद्धांत प्रासंगिकता खो चुका है।
  • पीटर लासलेट (1956) — "For the moment, anyway, political philosophy is dead."
  • कारण: व्यवहारवाद का प्रभुत्व, तार्किक प्रत्यक्षवाद (मूल्य-कथन "अर्थहीन"), विचारधाराओं के अंत की धारणा (Daniel Bell — The End of Ideology), सर्वसत्तावाद के अनुभव से बड़े सिद्धांतों पर अविश्वास।

पुनरुत्थान (Resurgence): 1970 के बाद राजनीतिक सिद्धांत लौट आया।

  • जॉन रॉल्स की A Theory of Justice (1971) — मानक सिद्धांत का पुनर्जन्म; इसके जवाब में नॉज़िक (Anarchy, State and Utopia, 1974) और समुदायवादी (Sandel, MacIntyre, Taylor, Walzer)।
  • लियो स्ट्रॉस, हन्ना आरेंट, शेल्डन वोलिन — पहले से ही "पतन" की धारणा को चुनौती दे रहे थे; आइज़ायाह बर्लिन ने कहा कि जब तक लोग लक्ष्यों पर असहमत हैं, राजनीतिक सिद्धांत जीवित रहेगा।
  • नई धाराएँ — नारीवाद, पर्यावरणवाद, बहुसंस्कृतिवाद, उत्तर-उपनिवेशवाद, विचारशील (deliberative) लोकतंत्र।
सामान्य ग़लती

"Decline" का अर्थ यह नहीं कि उस दौर में कोई सिद्धांत नहीं लिखा गया। बहस यह थी कि मानक, दार्शनिक परंपरा हाशिये पर चली गई थी। उत्तर में ईस्टन की दोहरी भूमिका ज़रूर लिखें — 1953 में पतन के आलोचक, 1969 में Credo of Relevance के प्रस्तोता।

5. राज्य: अवधारणा और तत्व

राज्य एक राजनीतिक संगठन है जिसके चार तत्व माने जाते हैं — जनसंख्या, निश्चित भूभाग, सरकार और संप्रभुता (1933 का मॉन्टेवीडियो कन्वेंशन भी अंतरराष्ट्रीय विधि में राज्य के लिए स्थायी जनसंख्या, निश्चित क्षेत्र, सरकार और अन्य राज्यों से संबंध बनाने की क्षमता की बात करता है)। मैक्स वेबर की प्रसिद्ध परिभाषा: राज्य वह मानव समुदाय है जो एक निश्चित क्षेत्र में बल के वैध प्रयोग पर एकाधिकार (monopoly of legitimate use of physical force) का सफल दावा करता है। सरकार राज्य का एजेंट है — सरकारें बदलती हैं, राज्य बना रहता है।

राज्य की उत्पत्ति के पुराने सिद्धांत — दैवी उत्पत्ति, शक्ति सिद्धांत, सामाजिक समझौता (हॉब्स, लॉक, रूसो), विकासवादी सिद्धांत। Optional में मुख्य ज़ोर राज्य के स्वरूप और भूमिका वाले आधुनिक सिद्धांतों पर है, जो आगे दिए गए हैं।

6. उदारवादी और नव-उदारवादी सिद्धांत

शास्त्रीय उदारवाद (Classical Liberal)

  • राज्य एक आवश्यक बुराई है — व्यक्ति के जीवन, स्वतंत्रता और संपत्ति (लॉक) की रक्षा के लिए बना। सीमित सरकार, क़ानून का शासन, संविधानवाद।
  • "रात्रि-प्रहरी राज्य" (Night-watchman state) — केवल सुरक्षा, न्याय और अनुबंधों का पालन; बाज़ार में हस्तक्षेप नहीं (एडम स्मिथ का laissez-faire)।
  • राज्य तटस्थ पंच (neutral arbiter) है — सभी हितों के बीच निष्पक्ष।

आधुनिक/कल्याणकारी उदारवाद

  • टी.एच. ग्रीन, हॉबहाउस, जे.एम. कीन्स — स्वतंत्रता के लिए "बाधाएँ हटाना" काफ़ी नहीं, अवसर देना भी ज़रूरी (positive liberty)।
  • कल्याणकारी राज्य — शिक्षा, स्वास्थ्य, सामाजिक सुरक्षा; 1930 के महामंदी के बाद New Deal, ब्रिटेन में बेवरिज रिपोर्ट (1942)।
  • रॉल्स का difference principle — असमानता तभी उचित जब सबसे वंचित को लाभ हो।

नव-उदारवाद (Neo-liberal / Libertarian)

  • हायेक (The Road to Serfdom, 1944) — आर्थिक नियोजन तानाशाही की ओर ले जाता है; बाज़ार "स्वतः स्फूर्त व्यवस्था" (spontaneous order) है।
  • मिल्टन फ़्रीडमैन — मुक्त बाज़ार ही राजनीतिक स्वतंत्रता की शर्त है।
  • रॉबर्ट नॉज़िक — "न्यूनतम राज्य" (minimal state); कराधान से पुनर्वितरण "बेगार" (forced labour) जैसा है; Entitlement theory of justice।
  • व्यवहार में — थैचर-रीगन युग, Washington Consensus, निजीकरण, विनियमन-मुक्ति; भारत में 1991 के बाद के सुधार।
  • आलोचना: असमानता में वृद्धि, सार्वजनिक सेवाओं का क्षरण, 2008 के वित्तीय संकट में "बाज़ार की विफलता"; राज्य वास्तव में घटा नहीं, बल्कि बाज़ार के पक्ष में "पुनर्गठित" (regulatory state) हुआ।

7. मार्क्सवादी सिद्धांत

मार्क्स-एंगेल्स के अनुसार राज्य वर्ग-संघर्ष की उपज है और "पूरे बुर्जुआ वर्ग के सामान्य मामलों का प्रबंध करने वाली समिति" (Communist Manifesto, 1848) है। राज्य आर्थिक आधार (base) पर टिकी अधिरचना (superstructure) का हिस्सा है। सर्वहारा क्रांति के बाद "सर्वहारा का अधिनायकत्व" आएगा और अंततः वर्गहीन समाज में राज्य "मुरझा जाएगा" (withering away — एंगेल्स)।

धाराविचारकमुख्य तर्क
उपकरणवादी (Instrumentalist)राल्फ़ मिलिबैंड — The State in Capitalist Society (1969)राज्य पूँजीपति वर्ग का औज़ार है; राज्य-अभिजन और पूँजीपति एक ही सामाजिक पृष्ठभूमि से आते हैं।
संरचनावादी (Structuralist)निकोस पुलांत्ज़ासराज्य पूँजीवाद की संरचना से बँधा है, व्यक्तियों की मंशा से नहीं; इसलिए उसे "सापेक्ष स्वायत्तता" (relative autonomy) मिलती है — कभी-कभी वह पूँजीपतियों के तात्कालिक हितों के विरुद्ध भी जाता है ताकि व्यवस्था दीर्घकाल तक बनी रहे।
आधिपत्य (Hegemony)एंटोनियो ग्राम्शीशासन केवल बल (coercion) से नहीं, सहमति (consent) से चलता है; State = political society + civil society; "hegemony protected by the armour of coercion"।
विचारधारात्मक तंत्रलुई अल्थूसरRepressive State Apparatus (पुलिस, सेना) और Ideological State Apparatus (स्कूल, परिवार, मीडिया, धर्म)।
Bonapartismमार्क्स — Eighteenth Brumaireजब वर्गों में संतुलन हो तो राज्य अस्थायी रूप से वर्गों से ऊपर उठकर स्वायत्त दिखता है।

Miliband–Poulantzas debate (1969-70, New Left Review) परीक्षा में बहुत उपयोगी है। आलोचना: आर्थिक नियतिवाद, राज्य को केवल वर्ग-उपकरण मानना, कल्याणकारी राज्य और लोकतांत्रिक सुधारों की व्याख्या में कठिनाई, सोवियत अनुभव में राज्य का "मुरझाने" के बजाय और शक्तिशाली होना।

8. बहुलवादी सिद्धांत (Pluralist)

  • मूल विचार: समाज में शक्ति अनेक समूहों — मज़दूर संघ, व्यापार संघ, धार्मिक संगठन, पेशेवर संस्थाएँ — में बँटी है। राज्य इनमें से एक संघ है, सर्वोच्च संप्रभु नहीं।
  • अंग्रेज़ बहुलवादी: एफ़.डब्ल्यू. मैटलैंड, जे.एन. फ़िगिस, जी.डी.एच. कोल, हैरोल्ड लास्की — एकात्मक संप्रभुता (ऑस्टिन) की आलोचना; लास्की: "संप्रभुता की धारणा को त्याग देना राजनीति विज्ञान के लिए स्थायी लाभ होगा।"
  • अमेरिकी अनुभवजन्य बहुलवाद: आर्थर बेंटली, डेविड ट्रूमैन (group theory), रॉबर्ट डाल — Who Governs? (1961, न्यू हेवन अध्ययन): कोई एक अभिजन सब पर हावी नहीं; अलग-अलग मुद्दों पर अलग समूह प्रभावी — "Polyarchy" (बहुतों का शासन)।
  • राज्य की भूमिका — समूहों के बीच पंच या दलाल (broker), नीति = समूहों के दबाव का "संतुलन" (vector sum)।
  • आलोचना: सी. राइट मिल्स (The Power Elite) — अमेरिका में सैन्य-औद्योगिक-राजनीतिक अभिजन का प्रभुत्व; बैकरैक-बारात्ज़ — "non-decision making" (शक्ति का दूसरा चेहरा: मुद्दों को एजेंडा से बाहर रखना); स्टीवन ल्यूक्स — शक्ति का तीसरा आयाम (इच्छाओं को ही गढ़ देना)। बाद में डाल और लिंडब्लॉम ने स्वयं माना कि व्यवसाय की "विशेषाधिकार प्राप्त स्थिति" है — नव-बहुलवाद (neo-pluralism)।

9. उत्तर-उपनिवेशवादी सिद्धांत (Post-colonial)

  • हमज़ा अलवी (1972) — "अति-विकसित राज्य" (overdeveloped state): उपनिवेशवाद ने पाकिस्तान-बांग्लादेश जैसे देशों में ऐसा नौकरशाही-सैन्य तंत्र बनाया जो वहाँ के समाज के अनुपात में बहुत बड़ा था; स्वतंत्रता के बाद यह तंत्र तीन प्रभुत्वशाली वर्गों (देशी पूँजीपति, भू-स्वामी, विदेशी पूँजी) के बीच मध्यस्थ बनकर सापेक्ष स्वायत्त रहा।
  • पार्थ चटर्जी — "राष्ट्र और उसके टुकड़े"; उपनिवेशोत्तर राज्य "civil society" के बजाय "political society" (गरीब, अनौपचारिक बस्तियों वाले लोग) से कल्याणकारी योजनाओं और राजनीतिक मोल-भाव के माध्यम से जुड़ता है।
  • एडवर्ड सईद — Orientalism (1978): पश्चिमी ज्ञान ने पूर्व की छवि गढ़कर शासन को वैध बनाया। गायत्री स्पिवाक — "Can the Subaltern Speak?"; सबाल्टर्न स्टडीज़ (रणजीत गुहा)।
  • फ़्रांज़ फ़ैनन, अशीष नंदी (The Intimate Enemy) — उपनिवेशवाद का मनोवैज्ञानिक प्रभाव।
  • मुख्य निष्कर्ष: तीसरी दुनिया के राज्य को उदारवादी या मार्क्सवादी यूरोपीय श्रेणियों से पूरी तरह नहीं समझा जा सकता। Eurocentrism उत्तर-उपनिवेशवाद का निशाना भी है और उसकी प्रेरक शक्ति भी — इसी से UPSC 2023 का प्रश्न बना।

10. नारीवादी सिद्धांत (Feminist)

  • उदार नारीवाद — राज्य तटस्थ है, समान क़ानून और अवसर (मताधिकार, शिक्षा) से समानता मिलेगी। मैरी वॉल्सटनक्राफ़्ट, जे.एस. मिल (The Subjection of Women, 1869)।
  • रेडिकल नारीवाद — राज्य पितृसत्तात्मक है। कैथरीन मैकिनन: "The state is male" — क़ानून पुरुष दृष्टि से बना है। केट मिलेट (Sexual Politics) — पितृसत्ता सबसे बुनियादी शक्ति-संरचना है।
  • मार्क्सवादी/समाजवादी नारीवाद — पूँजीवाद और पितृसत्ता का गठजोड़ (dual systems); घरेलू अवैतनिक श्रम पूँजी को सस्ता श्रमिक देता है।
  • उत्तर-संरचनावादी/अंतर्विभागीय (Intersectional) — किम्बर्ले क्रेनशॉ; जाति, वर्ग, नस्ल और लिंग साथ मिलकर उत्पीड़न रचते हैं — भारत में दलित नारीवाद।
  • Public–private dichotomy की आलोचना — कैरोल पेटमैन (The Sexual Contract, 1988): सामाजिक समझौते के नीचे एक "यौन समझौता" छिपा है।
  • भारतीय उदाहरण — घरेलू हिंसा अधिनियम 2005, वैवाहिक बलात्कार पर बहस, नारी शक्ति वंदन अधिनियम 2023 (महिला आरक्षण)।

11. Master Summary Table: राज्य के सिद्धांत

सिद्धांतराज्य क्या है?राज्य किसके हित में?प्रमुख विचारकमुख्य आलोचना
उदारवादीव्यक्ति-अधिकारों का रक्षक, तटस्थ पंचसभी नागरिकलॉक, मिल, ग्रीन, रॉल्सतटस्थता का भ्रम; वर्ग और लिंग की अनदेखी
नव-उदारवादीन्यूनतम राज्य, बाज़ार का सहायकव्यक्ति और बाज़ारहायेक, फ़्रीडमैन, नॉज़िकअसमानता, बाज़ार विफलता
मार्क्सवादीवर्ग-शासन का उपकरण / संरचनाशासक (पूँजीपति) वर्गमार्क्स, मिलिबैंड, पुलांत्ज़ास, ग्राम्शीआर्थिक नियतिवाद
बहुलवादीअनेक संघों में एक, समूहों का पंचसमूहों के संतुलन के अनुसारलास्की, डाल, ट्रूमैनशक्ति की असमानता की अनदेखी
उत्तर-उपनिवेशवादीऔपनिवेशिक विरासत वाला "अति-विकसित" राज्यमध्यस्थ अभिजनअलवी, चटर्जी, सईद, स्पिवाकसांस्कृतिक सापेक्षवाद का ख़तरा
नारीवादीपितृसत्तात्मक संस्थापुरुषमैकिनन, पेटमैन, मिलेट"महिला" को एकरूप मानना (अंतर्विभागीयता से सुधार)

12. Mind Map

राजनीतिक सिद्धांत एवं राज्य
अर्थ
  • Political = राज्य / शक्ति / संघर्ष-समाधान / मूल्यों का आवंटन
  • सबाइन, ईस्टन, क्रिक
  • Personal is political
उपागम
  • दार्शनिक, ऐतिहासिक, संस्थागत
  • व्यवहारवाद — 8 आधारशिलाएँ
  • उत्तर-व्यवहारवाद — Relevance + Action
  • तंत्र — Input → Output → Feedback
बहस
  • Normative vs Empirical
  • Decline — ईस्टन, कॉबन, लासलेट
  • Resurgence — रॉल्स 1971
राज्य के सिद्धांत
  • उदार / नव-उदार
  • मार्क्सवादी (उपकरण, संरचना, आधिपत्य)
  • बहुलवादी
  • उत्तर-उपनिवेशवादी, नारीवादी

13. महत्वपूर्ण One-liners

  • "Authoritative allocation of values for a society" — डेविड ईस्टन।
  • "Politics: Who Gets What, When, How" (1936) — हैरोल्ड लासवेल।
  • Credo of Relevance — ईस्टन का 1969 का APSA अध्यक्षीय भाषण; नारे: Relevance और Action।
  • "Political philosophy is dead" (1956) — पीटर लासलेट; "The Decline of Political Theory" (1953) — अल्फ़्रेड कॉबन।
  • राजनीतिक सिद्धांत का पुनरुत्थान — रॉल्स, A Theory of Justice (1971)।
  • Monopoly of legitimate use of physical force — मैक्स वेबर।
  • "Executive of the modern state is but a committee for managing the common affairs of the whole bourgeoisie" — Communist Manifesto।
  • Relative autonomy of the state — पुलांत्ज़ास; Overdeveloped state — हमज़ा अलवी।
  • Polyarchy — रॉबर्ट डाल; Power Elite — सी. राइट मिल्स।
  • Two faces of power (non-decision making) — बैकरैक और बारात्ज़; three-dimensional power — स्टीवन ल्यूक्स।
  • Minimal state — नॉज़िक; Road to Serfdom — हायेक।
  • "The state is male" — कैथरीन मैकिनन; The Sexual Contract — कैरोल पेटमैन।
  • Political society बनाम civil society — पार्थ चटर्जी।
  • Contextualism / इतिहास में विचार — क्वेंटिन स्किनर (कैम्ब्रिज स्कूल)।

14. टिप्स एवं ट्रिक्स (Answer Writing)

150 शब्दों के उत्तर का ढाँचा
  1. भूमिका (2 पंक्तियाँ): परिभाषा + विचारक का नाम (जैसे — "ईस्टन के अनुसार…")।
  2. मुख्य भाग (3-4 बिंदु): विशेषताएँ / तर्क; एक तुलना या तालिका से अंक बढ़ते हैं।
  3. आलोचना (1-2 बिंदु): विरोधी विचारक का नाम लेकर।
  4. निष्कर्ष (1 पंक्ति): संतुलित, समकालीन उदाहरण (भारत) के साथ।
याद रखने की तरकीबें
  • ईस्टन की आठ आधारशिलाएँ — "R-V-T-Q-V-S-P-I": Regularities, Verification, Techniques, Quantification, Values, Systematisation, Pure science, Integration।
  • राज्य के छह सिद्धांत — "उ-न-मा-ब-उ-ना" (उदार, नव-उदार, मार्क्सवादी, बहुलवादी, उत्तर-उपनिवेशवादी, नारीवादी)।
  • शक्ति के तीन चेहरे — "D-B-L": Dahl (निर्णय), Bachrach-Baratz (गैर-निर्णय), Lukes (विचारधारा/इच्छा)।
PYQ ट्रेंड से सीख

UPSC बार-बार एक ही थीम को नए शब्दों में पूछता है — decline of political theory 2018 और 2023 में, normative approach 2020 और 2023 में, resurgence 2019 में। इसलिए हर थीम का 150 और 250 शब्दों वाला ढाँचा तैयार रखें।

15. PYQ-आधारित प्रश्न एवं मॉडल उत्तर

Q1UPSC 2024 · Paper I · 1(b) · 10 अंक

Pluralist theory of State (बहुलवादी राज्य सिद्धांत) पर लगभग 150 शब्दों में लिखिए।

मॉडल उत्तर

भूमिका: बहुलवाद राज्य की एकात्मक संप्रभुता (बोडाँ, ऑस्टिन) के विरुद्ध यह मानता है कि समाज में शक्ति अनेक स्वायत्त समूहों में बँटी है और राज्य उनमें से केवल एक संघ है।

मुख्य तर्क: (1) अंग्रेज़ बहुलवादी — लास्की, फ़िगिस, कोल — चर्च, ट्रेड यूनियन, पेशेवर संघ राज्य जितने ही स्वाभाविक हैं; व्यक्ति की निष्ठा बहुविध है। (2) अमेरिकी अनुभवजन्य बहुलवाद — डाल के न्यू हेवन अध्ययन में अलग-अलग मुद्दों पर अलग-अलग समूह प्रभावी पाए गए, इसलिए शासन "polyarchy" है। (3) राज्य समूहों के बीच पंच/दलाल है और नीति उनके दबावों का संतुलन है।

आलोचना: मिल्स ने "power elite" दिखाया; बैकरैक-बारात्ज़ ने कहा कि शक्ति मुद्दों को एजेंडा से बाहर रखने में भी है; मार्क्सवादियों के अनुसार व्यवसाय की स्थिति "विशेषाधिकार प्राप्त" है — इसे बाद में डाल-लिंडब्लॉम ने नव-बहुलवाद में स्वीकार किया।

निष्कर्ष: बहुलवाद लोकतंत्र में नागरिक समाज की भूमिका समझाता है (भारत में किसान संगठन, उद्योग संघ, NGOs), पर शक्ति-असमानता को कम आँकता है।

Q2UPSC 2023 · Paper I · 1(e) · 10 अंक

Decline of political theory (राजनीतिक सिद्धांत का पतन) पर टिप्पणी कीजिए।

मॉडल उत्तर

भूमिका: 1950 के दशक में यह धारणा फैली कि शास्त्रीय, मानक राजनीतिक सिद्धांत की परंपरा थम गई है।

तर्क: ईस्टन (1953) ने कहा कि सिद्धांत "historicism" में फँसा है — पुराने विचारकों की व्याख्या करता है, नया नहीं रचता; कॉबन (1953) और लासलेट (1956, "political philosophy is dead") ने भी यही कहा। कारण — व्यवहारवाद और तार्किक प्रत्यक्षवाद का प्रभाव (मूल्य-कथन अवैज्ञानिक), Daniel Bell की "end of ideology" धारणा, सर्वसत्तावाद के बाद बड़े सिद्धांतों पर अविश्वास।

प्रतिवाद: लियो स्ट्रॉस, हन्ना आरेंट और बर्लिन ने कहा कि जब तक मानव लक्ष्यों पर असहमति है, राजनीतिक दर्शन जीवित रहेगा। 1971 में रॉल्स की A Theory of Justice ने मानक सिद्धांत को पुनर्जीवित कर दिया; उसके बाद नॉज़िक, समुदायवाद, नारीवाद, बहुसंस्कृतिवाद आए।

निष्कर्ष: "पतन" वास्तव में एक अस्थायी ठहराव था, जिसने अंततः सिद्धांत को अधिक आत्म-जागरूक और प्रासंगिक बनाया — स्वयं ईस्टन ने 1969 में Credo of Relevance दिया।

Q3UPSC 2024 · Paper I · 1(a) · 10 अंक

Behavioral approach to Political Science (राजनीति विज्ञान का व्यवहारवादी उपागम) पर लगभग 150 शब्द लिखिए।

मॉडल उत्तर

भूमिका: व्यवहारवाद द्वितीय विश्व युद्ध के बाद अमेरिका में उभरा वह आंदोलन है जिसने संस्थाओं के बजाय व्यक्ति और समूह के प्रेक्षणीय राजनीतिक व्यवहार को अध्ययन का केंद्र बनाया।

विशेषताएँ: ईस्टन की आठ आधारशिलाएँ — नियमितता, सत्यापन, तकनीक, परिमाणीकरण, मूल्य-मुक्ति, व्यवस्थितीकरण, शुद्ध विज्ञान, एकीकरण। शिकागो स्कूल (मेरियम, लासवेल), मतदान अध्ययन, Almond-Verba का "civic culture" अध्ययन इसके उदाहरण हैं।

योगदान और आलोचना: इसने राजनीति विज्ञान को अनुभवजन्य और अंतर-अनुशासनात्मक बनाया, पर "मूल्य-तटस्थता" ने इसे यथास्थितिवादी और सामाजिक संकटों से कटा हुआ बना दिया (लियो स्ट्रॉस की आलोचना)। इसी से 1969 में उत्तर-व्यवहारवाद आया।

निष्कर्ष: आज भारत में भी CSDS-लोकनीति जैसे सर्वे चुनावी व्यवहार समझने में व्यवहारवादी विधियों का उपयोग करते हैं; अतः इसकी तकनीक आज भी प्रासंगिक है, पर मूल्यों के साथ।

Q4UPSC 2024 · Paper I · 2(a)

"Political" (राजनीतिक) शब्द में निहित अर्थों को उपयुक्त उदाहरणों सहित स्पष्ट कीजिए।

मॉडल उत्तर (रूपरेखा)

भूमिका: "Political" एक विवादित अवधारणा (essentially contested concept) है; उसका दायरा इस पर निर्भर है कि हम उसे संस्था, शक्ति, प्रक्रिया या सार्वजनिक क्षेत्र के रूप में देखते हैं।

अर्थ 1 — राज्य/शासन की कला: अरस्तू की पोलिस, आधुनिक संस्थागत दृष्टि; उदाहरण — संसद में विधेयक पारित होना।

अर्थ 2 — सार्वजनिक मामले: लोक बनाम निजी क्षेत्र; आरेंट के लिए नागरिकों का साझा क्रिया-क्षेत्र; उदाहरण — ग्राम सभा में सामूहिक निर्णय।

अर्थ 3 — समझौता और सहमति: क्रिक — राजनीति हिंसा का विकल्प है; उदाहरण — गठबंधन सरकारों का साझा न्यूनतम कार्यक्रम।

अर्थ 4 — शक्ति: लासवेल, फूको, नारीवाद — शक्ति कक्षा, परिवार, कार्यस्थल में भी है; उदाहरण — "Me Too" आंदोलन, दहेज-विरोधी आंदोलन।

अर्थ 5 — मूल्यों का आवंटन: ईस्टन; उदाहरण — बजट में संसाधनों का बँटवारा, आरक्षण नीति।

निष्कर्ष: "Political" का अर्थ समय के साथ फैलता गया है — राज्य से समाज और समाज से व्यक्तिगत जीवन तक। इससे लोकतंत्र गहरा होता है, पर हर चीज़ के राजनीतिकरण का ख़तरा भी है; संतुलित दृष्टि आवश्यक है।

Q5UPSC 2023 · Paper I · 3(c)

"Eurocentrism (यूरोकेंद्रवाद) उत्तर-उपनिवेशवादी राजनीतिक सिद्धांत का लक्ष्य भी है और प्रेरक शक्ति भी।" विवेचना कीजिए।

मॉडल उत्तर (रूपरेखा)

भूमिका: यूरोकेंद्रवाद वह दृष्टि है जो यूरोपीय अनुभव — आधुनिकता, राष्ट्र-राज्य, तर्कबुद्धि — को सार्वभौमिक मानदंड बनाती है और शेष विश्व को "पिछड़ा" या "अधूरा" समझती है।

लक्ष्य (Target) के रूप में: सईद का Orientalism, स्पिवाक का subaltern, चक्रवर्ती का "Provincializing Europe" — ये सभी यूरोपीय ज्ञान के सार्वभौमिक दावे को चुनौती देते हैं; अलवी दिखाते हैं कि उपनिवेशोत्तर राज्य को यूरोपीय वर्ग-विश्लेषण से नहीं समझा जा सकता।

प्रेरक शक्ति (Motive force) के रूप में: उत्तर-उपनिवेशवाद की पूरी पहचान ही यूरोकेंद्रवाद के प्रतिरोध से बनी है; वह उन्हीं पश्चिमी औज़ारों — मार्क्सवाद, फूको, देरिदा — का उपयोग करता है। इसलिए आलोचक कहते हैं कि वह यूरोप से "बाहर" निकल नहीं पाता।

भारतीय संदर्भ: गांधी का हिंद स्वराज (आधुनिक सभ्यता की आलोचना), सबाल्टर्न स्टडीज़, पार्थ चटर्जी का political society।

निष्कर्ष: यूरोकेंद्रवाद उत्तर-उपनिवेशवादी सिद्धांत का विरोधी भी है और उसका आधार भी; यह विरोधाभास ही उसे आत्म-आलोचनात्मक और बहुलतावादी बनाता है।

Q6अभ्यास प्रश्न · 15 अंक

मार्क्सवादी राज्य सिद्धांत में "सापेक्ष स्वायत्तता" (relative autonomy) की अवधारणा स्पष्ट कीजिए। क्या यह भारतीय राज्य के अध्ययन में उपयोगी है?

मॉडल उत्तर (रूपरेखा)

भूमिका: शास्त्रीय मार्क्सवाद राज्य को शासक वर्ग का उपकरण मानता है; पुलांत्ज़ास ने तर्क दिया कि राज्य पूँजीवादी संरचना से बँधा होते हुए भी अलग-अलग पूँजीपति गुटों से "सापेक्ष रूप से स्वायत्त" रहता है।

मुख्य भाग: (1) उपकरणवाद (मिलिबैंड) बनाम संरचनावाद (पुलांत्ज़ास) की बहस; (2) स्वायत्तता क्यों — ताकि राज्य पूँजीपतियों के आपसी झगड़ों से ऊपर उठकर व्यवस्था के दीर्घकालिक हित (जैसे श्रम क़ानून, कल्याण) सुरक्षित रख सके; (3) मार्क्स का बोनापार्टिज़्म और अलवी का अति-विकसित राज्य इसके विस्तार हैं।

भारतीय राज्य: प्रणब बर्धन (The Political Economy of Development in India) — भारतीय राज्य तीन प्रभुत्वशाली स्वामी वर्गों (औद्योगिक पूँजीपति, धनी किसान, पेशेवर-नौकरशाह) के बीच संतुलन बनाते हुए स्वायत्त रहा; रुडॉल्फ़ दंपती का "weak-strong state"।

निष्कर्ष: यह अवधारणा भारतीय राज्य की कल्याणकारी और विकासवादी भूमिका को समझाने में उपयोगी है, यद्यपि लोकतांत्रिक चुनावी दबाव और जाति-आधारित राजनीति इसकी सीमाएँ भी दिखाते हैं।

16. Quick Revision Summary

परीक्षा से पहले एक बार ज़रूर पढ़ें
  • Political के अर्थ — राज्य (अरस्तू), शक्ति (लासवेल, फूको), संघर्ष-समाधान (क्रिक), मूल्यों का आवंटन (ईस्टन), personal is political (नारीवाद)।
  • उपागम — दार्शनिक, ऐतिहासिक/संदर्भवादी (स्किनर), संस्थागत; व्यवहारवाद (8 आधारशिलाएँ) → उत्तर-व्यवहारवाद (1969, Relevance + Action); तंत्र मॉडल (ईस्टन), संरचनात्मक-प्रकार्यात्मक (आल्मंड)।
  • पतन — ईस्टन 1953, कॉबन 1953, लासलेट 1956; पुनरुत्थान — रॉल्स 1971, नॉज़िक 1974, समुदायवाद।
  • राज्य — वेबर: वैध बल पर एकाधिकार; सिद्धांत — उदार (रात्रि-प्रहरी → कल्याणकारी), नव-उदार (हायेक, नॉज़िक), मार्क्सवादी (मिलिबैंड, पुलांत्ज़ास, ग्राम्शी, अल्थूसर), बहुलवादी (लास्की, डाल), उत्तर-उपनिवेशवादी (अलवी, चटर्जी, सईद), नारीवादी (मैकिनन, पेटमैन)।
  • उत्तर लेखन — परिभाषा + विचारक → तर्क → आलोचना → भारतीय उदाहरण सहित संतुलित निष्कर्ष।