Class 11 Economics · Chapter 6 · भारतीय अर्थव्यवस्था का विकास

रोज़गार : संवृद्धि, अनौपचारीकरण एवं अन्य मुद्दे

श्रमिक और रोज़गार, श्रमबल भागीदारी, स्वनियोजित और भाड़े के श्रमिक, अनौपचारीकरण, बेरोज़गारी और सरकार।

NCERT भारतीय अर्थव्यवस्था का विकास + अर्थशास्त्र में सांख्यिकीCBSE Class 11 18 min read

1. अध्याय एक नज़र में

लोग काम क्यों करते हैं? सबसे सीधा उत्तर है — आजीविका कमाने के लिए। पर काम केवल आय का साधन नहीं है; इससे व्यक्ति को आत्मसम्मान, सामाजिक पहचान और राष्ट्र के उत्पादन में योगदान करने का अवसर भी मिलता है। जब कोई व्यक्ति कोई उत्पादक कार्य करता है, तो वह सकल घरेलू उत्पाद (GDP) में योगदान देता है। इसलिए रोज़गार (Employment) अर्थशास्त्र के सबसे महत्वपूर्ण विषयों में से एक है।

इस अध्याय में हम समझेंगे कि श्रमिक (Worker) कौन है, भारत में लोग किस प्रकार के रोज़गार में लगे हैं, विभिन्न क्षेत्रकों में रोज़गार का वितरण कैसे बदला है, रोज़गार का अनौपचारीकरण (Informalisation) क्या है, बेरोज़गारी के प्रकार कौन-से हैं, और सरकार ने रोज़गार सृजन के लिए क्या कदम उठाए हैं।

इस अध्याय में आप सीखेंगे
  • श्रमिक, श्रमबल और कार्यबल का अर्थ; श्रमिक-जनसंख्या अनुपात।
  • स्वनियोजित, नियमित वेतनभोगी और अनियत (Casual) श्रमिक।
  • क्षेत्रकों के अनुसार रोज़गार का वितरण और उसमें परिवर्तन।
  • रोज़गारविहीन संवृद्धि, अनियतीकरण और अनौपचारीकरण।
  • औपचारिक और अनौपचारिक क्षेत्रक का अंतर।
  • बेरोज़गारी के प्रकार और सरकारी नीतियाँ।

2. श्रमिक और रोज़गार : मूल अवधारणाएँ

परिभाषाएँ
  • श्रमिक (Worker): वह व्यक्ति जो किसी आर्थिक गतिविधि (Economic Activity) में लगा है — अर्थात ऐसी गतिविधि जो GDP में योगदान देती है। जो लोग कुछ समय के लिए बीमारी, चोट या खराब मौसम के कारण काम पर नहीं जा पाते, वे भी श्रमिक माने जाते हैं। मुख्य श्रमिकों की सहायता करने वाले लोग भी श्रमिक हैं।
  • श्रमबल (Labour Force): वे सभी लोग जो काम कर रहे हैं और वे लोग जो काम करने के इच्छुक हैं तथा काम ढूँढ रहे हैं।
  • कार्यबल (Workforce): केवल वे लोग जो वास्तव में काम कर रहे हैं।
  • बेरोज़गार (Unemployed): श्रमबल − कार्यबल — अर्थात जो काम करना चाहते हैं, पर उन्हें काम नहीं मिला।
श्रमिक-जनसंख्या अनुपात (Worker-Population Ratio) = (कुल श्रमिक ÷ कुल जनसंख्या) × 100

यह अनुपात बताता है कि देश की जनसंख्या का कितना प्रतिशत भाग वस्तुओं और सेवाओं के उत्पादन में सक्रिय रूप से लगा है। यदि यह अनुपात अधिक है, तो इसका अर्थ है कि अधिक लोग आर्थिक गतिविधियों में संलग्न हैं।

भारत में श्रमिक-जनसंख्या अनुपात के कुछ सामान्य पैटर्न

  • ग्रामीण बनाम शहरी: ग्रामीण क्षेत्रों में यह अनुपात प्रायः शहरी क्षेत्रों से अधिक रहता है। ग्रामीण लोगों के पास सीमित संसाधन होते हैं, वे पढ़ाई के लिए अधिक समय तक विद्यालय-कॉलेज में नहीं रह पाते और जल्दी काम शुरू कर देते हैं। शहरी क्षेत्रों में अधिक लोग शिक्षा प्राप्त कर रहे होते हैं, और शहरों में उपलब्ध विविध रोज़गार के लिए उपयुक्त योग्यता चाहिए।
  • पुरुष बनाम महिला: महिलाओं का अनुपात पुरुषों से कम है। इसका एक कारण यह है कि घर के भीतर महिलाओं द्वारा किए गए अनेक कार्य — खाना बनाना, बच्चों और बुज़ुर्गों की देखभाल, पानी और ईंधन लाना — आर्थिक गतिविधि के रूप में गिने नहीं जाते, जबकि ये भी उत्पादक कार्य हैं।
  • ग्रामीण महिलाएँ बनाम शहरी महिलाएँ: ग्रामीण महिलाओं की भागीदारी प्रायः शहरी महिलाओं से अधिक होती है, क्योंकि ग्रामीण परिवारों की कम आय के कारण महिलाएँ खेतों और पशुपालन में काम करती हैं।
उदाहरण (अभ्यास हेतु काल्पनिक आँकड़े)

किसी गाँव की जनसंख्या 2,000 है, जिसमें 860 लोग काम कर रहे हैं और 90 लोग काम ढूँढ रहे हैं। श्रमिक-जनसंख्या अनुपात और श्रमबल ज्ञात कीजिए।

हल: श्रमिक-जनसंख्या अनुपात = 860 ÷ 2000 × 100 = 43%। श्रमबल = 860 + 90 = 950। बेरोज़गारी दर = 90 ÷ 950 × 100 ≈ 9.5%।

3. रोज़गार की स्थिति : स्वनियोजित और भाड़े के श्रमिक

रोज़गार की स्थिति (Status of Employment) के आधार पर श्रमिकों को तीन वर्गों में बाँटा जाता है:

श्रेणीअर्थउदाहरण
स्वनियोजित (Self-employed)अपने स्वयं के उद्यम का स्वामी और संचालक; अपनी आजीविका के लिए स्वयं काम करता हैकिसान जो अपनी ज़मीन पर खेती करता है, दुकानदार, दर्ज़ी, स्वतंत्र पेशेवर
नियमित वेतनभोगी (Regular Salaried)किसी नियोक्ता के लिए नियमित रूप से काम करता है और बदले में नियमित वेतन पाता है; प्रायः सामाजिक सुरक्षा लाभशिक्षक, बैंक कर्मचारी, कारखाने का स्थायी कर्मचारी
अनियत दिहाड़ी मज़दूर (Casual Wage Labourer)दूसरों के खेतों या उद्यमों में काम के बदले दैनिक मज़दूरी; रोज़गार अनिश्चित, कोई सामाजिक सुरक्षा नहींनिर्माण स्थल पर मज़दूर, खेतिहर मज़दूर, सिर पर बोझ ढोने वाले

स्वनियोजित श्रमिक अपने ही उद्यम के स्वामी होते हैं, जबकि नियमित वेतनभोगी और अनियत मज़दूर — दोनों को सामूहिक रूप से भाड़े के श्रमिक (Hired Workers) कहा जाता है, क्योंकि वे दूसरों के लिए काम करते हैं।

भारत में श्रमिकों का सबसे बड़ा भाग स्वनियोजित है। ग्रामीण क्षेत्रों में स्वनियोजित और अनियत श्रमिकों का अनुपात अधिक है, क्योंकि अधिकांश लोग खेती से जुड़े हैं। शहरी क्षेत्रों में नियमित वेतनभोगी रोज़गार का हिस्सा अपेक्षाकृत अधिक है, क्योंकि वहाँ उद्योग, कार्यालय और सेवाएँ केंद्रित हैं। महिलाओं में स्वनियोजन का अनुपात प्रायः और भी अधिक रहता है, जबकि नियमित वेतनभोगी रोज़गार में उनकी भागीदारी कम है — इसका एक कारण यह है कि ऐसे रोज़गार के लिए उच्च कौशल और शिक्षा की आवश्यकता होती है।

4. विभिन्न क्षेत्रकों में रोज़गार

आर्थिक गतिविधियों को सामान्यतः तीन क्षेत्रकों में बाँटा जाता है:

  • प्राथमिक क्षेत्रक (Primary Sector): कृषि, पशुपालन, वानिकी, मत्स्यपालन, खनन और उत्खनन।
  • द्वितीयक क्षेत्रक (Secondary Sector): विनिर्माण (Manufacturing), निर्माण (Construction), बिजली-गैस-जल आपूर्ति।
  • तृतीयक / सेवा क्षेत्रक (Tertiary Sector): व्यापार, परिवहन, भंडारण, संचार, बैंकिंग, बीमा, शिक्षा, स्वास्थ्य और अन्य सेवाएँ।

भारत में आज भी कार्यबल का सबसे बड़ा भाग प्राथमिक क्षेत्रक में लगा है, विशेषकर ग्रामीण क्षेत्रों में। शहरी क्षेत्रों में अधिकांश लोग सेवा क्षेत्रक में काम करते हैं। समय के साथ एक स्पष्ट प्रवृत्ति दिखती है: कृषि पर निर्भर कार्यबल का अनुपात धीरे-धीरे घट रहा है, और द्वितीयक तथा सेवा क्षेत्रकों का हिस्सा बढ़ रहा है।

अधिक कम पहले की स्थिति बाद की स्थिति प्राथमिक द्वितीयक सेवा
प्रतीकात्मक चित्र (वास्तविक आँकड़े नहीं): समय के साथ कार्यबल का प्राथमिक से द्वितीयक और सेवा क्षेत्रकों की ओर खिसकना।
विरोधाभास

GDP में कृषि का हिस्सा तेज़ी से घटा है, पर कृषि पर निर्भर कार्यबल का हिस्सा उतनी तेज़ी से नहीं घटा। इसका अर्थ है कि कृषि में बहुत अधिक लोग लगे हैं जिनकी उत्पादकता कम है — यही प्रच्छन्न बेरोज़गारी (Disguised Unemployment) की समस्या का संकेत है।

5. संवृद्धि और रोज़गार : रोज़गारविहीन संवृद्धि

सामान्यतः यह अपेक्षा की जाती है कि जब GDP बढ़ेगा, तो रोज़गार भी उसी अनुपात में बढ़ेगा। पर भारत के अनुभव में कई अवधियों में GDP की संवृद्धि दर रोज़गार की संवृद्धि दर से काफ़ी अधिक रही है।

रोज़गारविहीन संवृद्धि (Jobless Growth)

ऐसी स्थिति जिसमें अर्थव्यवस्था अधिक वस्तुओं और सेवाओं का उत्पादन तो करती है, पर उसी अनुपात में रोज़गार के अवसर उत्पन्न नहीं होते। इसके कारण हैं — पूँजी-गहन (Capital-intensive) तकनीक का बढ़ता उपयोग, स्वचालन (Automation), और उन क्षेत्रकों में संवृद्धि जो कम श्रमिकों से अधिक उत्पादन करते हैं (जैसे सॉफ्टवेयर, वित्तीय सेवाएँ)।

अवधारणा को अंकों से समझें (अभ्यास हेतु काल्पनिक आँकड़े)

मान लीजिए किसी अर्थव्यवस्था में GDP 7% वार्षिक दर से और रोज़गार 2% वार्षिक दर से बढ़ रहा है। तब प्रति श्रमिक उत्पादन लगभग 7 − 2 = 5% प्रतिवर्ष बढ़ रहा है। उत्पादकता का बढ़ना अच्छा है, पर यदि श्रमबल 2.5% की दर से बढ़ रहा हो, तो हर वर्ष काम ढूँढने वालों की संख्या रोज़गार के नए अवसरों से अधिक होगी — और बेरोज़गारी बढ़ेगी।

6. अनियतीकरण और अनौपचारीकरण

अनियतीकरण (Casualisation)

जब कार्यबल में स्वनियोजित और नियमित वेतनभोगी श्रमिकों का हिस्सा घटता है और अनियत दिहाड़ी मज़दूरों का हिस्सा बढ़ता है, तो इस प्रक्रिया को कार्यबल का अनियतीकरण कहते हैं। इससे श्रमिक अधिक असुरक्षित हो जाते हैं — उनकी आय अनिश्चित होती है और उन्हें सामाजिक सुरक्षा नहीं मिलती।

औपचारिक और अनौपचारिक क्षेत्रक

आधारऔपचारिक / संगठित क्षेत्रक (Formal Sector)अनौपचारिक / असंगठित क्षेत्रक (Informal Sector)
इकाइयाँसभी सार्वजनिक क्षेत्रक के प्रतिष्ठान और वे निजी प्रतिष्ठान जो 10 या अधिक भाड़े के श्रमिकों को रोज़गार देते हैंशेष सभी उद्यम — किसान, खेतिहर मज़दूर, छोटे उद्यमों के मालिक और उनके कर्मचारी, स्वनियोजित लोग जो किसी को काम पर नहीं रखते
सामाजिक सुरक्षाभविष्य निधि, ग्रेच्युटी, पेंशन, चिकित्सा लाभ, सवेतन अवकाशसामान्यतः कोई सामाजिक सुरक्षा नहीं
नियमनश्रम कानूनों द्वारा संरक्षित; मज़दूर संघ (Trade Unions) बना सकते हैंश्रम कानूनों का संरक्षण बहुत कम; संगठित होना कठिन
नौकरी की सुरक्षाअधिक; बिना कारण निकाला जाना कठिनबहुत कम; कभी भी काम से हटाया जा सकता है
आयनियमित और अपेक्षाकृत अधिकअनियमित और प्रायः कम

भारत में कार्यबल का बहुत बड़ा भाग अनौपचारिक क्षेत्रक में काम करता है; औपचारिक क्षेत्रक में काम करने वालों का हिस्सा अपेक्षाकृत छोटा है। औपचारिक क्षेत्रक में भी महिलाओं की भागीदारी कम है।

अनौपचारीकरण (Informalisation)

जब औपचारिक क्षेत्रक में रोज़गार उत्पन्न होना धीमा हो जाता है, या औपचारिक क्षेत्रक के श्रमिक भी अनौपचारिक शर्तों पर — ठेके (Contract) पर, बिना सामाजिक सुरक्षा के — रखे जाने लगते हैं, तो इसे रोज़गार का अनौपचारीकरण कहते हैं। 1990 के बाद से कई औपचारिक उद्यमों ने लागत घटाने के लिए स्थायी कर्मचारियों के स्थान पर ठेका श्रमिकों को रखना बढ़ाया। इससे उत्पादन लचीला हुआ, पर श्रमिकों की सुरक्षा घटी।

अनौपचारिक श्रमिकों के लिए उपाय
  • अनौपचारिक उद्यमों का आधुनिकीकरण और उन्हें साख, कच्चे माल तथा विपणन की सुविधा।
  • अनौपचारिक श्रमिकों के लिए सामाजिक सुरक्षा उपाय — जैसे असंगठित श्रमिकों के पंजीकरण और बीमा-पेंशन योजनाएँ।
  • कौशल प्रशिक्षण, ताकि श्रमिक बेहतर रोज़गार पा सकें।

7. बेरोज़गारी (Unemployment)

परिभाषा

बेरोज़गारी वह स्थिति है जब कोई व्यक्ति प्रचलित मज़दूरी दर पर काम करने के लिए इच्छुक और योग्य है, काम ढूँढ रहा है, पर उसे काम नहीं मिलता। केवल काम न करना बेरोज़गारी नहीं है — जो व्यक्ति काम करना ही नहीं चाहता, वह बेरोज़गार नहीं माना जाता।

बेरोज़गारी के आँकड़ों के स्रोत

भारत में रोज़गार-बेरोज़गारी की जानकारी मुख्यतः तीन स्रोतों से मिलती है: (1) जनगणना (Census) की रिपोर्टें; (2) राष्ट्रीय प्रतिदर्श सर्वेक्षण कार्यालय (NSSO) के रोज़गार-बेरोज़गारी सर्वेक्षण, जिनके स्थान पर अब आवधिक श्रमबल सर्वेक्षण (Periodic Labour Force Survey — PLFS) होता है; और (3) रोज़गार कार्यालयों (Employment Exchanges) में पंजीकरण के आँकड़े।

बेरोज़गारी के प्रकार

प्रकारअर्थउदाहरण
खुली बेरोज़गारी (Open Unemployment)व्यक्ति काम करने को तैयार है पर उसे बिल्कुल काम नहीं मिलता; प्रायः भूमिहीन मज़दूर और अकुशल श्रमिकशहर के चौक पर काम की प्रतीक्षा करते मज़दूर जिन्हें काम नहीं मिलता
प्रच्छन्न बेरोज़गारी (Disguised Unemployment)किसी काम में आवश्यकता से अधिक लोग लगे हैं; अतिरिक्त लोगों को हटा दें तो कुल उत्पादन नहीं घटेगा — उनकी सीमांत उत्पादकता लगभग शून्यएक छोटे खेत पर जहाँ 4 लोगों का काम है, परिवार के 7 सदस्य काम करते हैं
मौसमी बेरोज़गारी (Seasonal Unemployment)वर्ष के कुछ महीनों में ही काम मिलता है; शेष समय बेरोज़गारीबुआई और कटाई के बीच तथा कटाई के बाद खेतिहर मज़दूर बेकार
शिक्षित बेरोज़गारी (Educated Unemployment)शिक्षित युवाओं को उनकी योग्यता के अनुरूप काम न मिलनास्नातक युवक जिसे उपयुक्त नौकरी नहीं मिलती
प्रच्छन्न बेरोज़गारी — संख्या से समझें (काल्पनिक उदाहरण)

एक परिवार के खेत पर 4 लोग काम करें तो उत्पादन 40 क्विंटल होता है। परिवार के 7 सदस्य काम करें तब भी उत्पादन 40 क्विंटल ही रहता है। अतः 3 लोग प्रच्छन्न रूप से बेरोज़गार हैं — वे काम करते दिखते हैं, पर उत्पादन में उनका योगदान शून्य है। यदि ये 3 लोग किसी पास के कारखाने या निर्माण कार्य में लग जाएँ, तो खेत का उत्पादन नहीं घटेगा और परिवार की कुल आय बढ़ जाएगी।

8. सरकार और रोज़गार सृजन

सरकार रोज़गार सृजन के लिए दो प्रकार से प्रयास करती है:

  • प्रत्यक्ष (Direct): सरकारी विभागों और सार्वजनिक उपक्रमों में लोगों को नियुक्त करना।
  • अप्रत्यक्ष (Indirect): जब सरकारी उपक्रम उत्पादन बढ़ाते हैं, तो उनसे कच्चा माल लेने वाली और उन्हें सामान बेचने वाली निजी इकाइयों का उत्पादन भी बढ़ता है, जिससे पूरी अर्थव्यवस्था में रोज़गार बढ़ता है। उदाहरण — एक सरकारी इस्पात संयंत्र के विस्तार से उसे कोयला देने वाली और उससे इस्पात खरीदकर सामान बनाने वाली इकाइयों में भी रोज़गार बढ़ेगा।

रोज़गार सृजन कार्यक्रम

सरकार के अनेक कार्यक्रम रोज़गार के साथ-साथ निर्धनता उन्मूलन का भी उद्देश्य रखते हैं। इनके माध्यम से लोगों को रोज़गार, स्वरोज़गार के लिए साख, और ग्रामीण आधारिक संरचना (प्राथमिक स्वास्थ्य, शिक्षा, पेयजल, आवास, सड़क) प्रदान की जाती है। प्रमुख उदाहरण:

  • महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोज़गार गारंटी अधिनियम (MGNREGA), 2005: ग्रामीण परिवारों को एक वित्तीय वर्ष में कम-से-कम 100 दिन के अकुशल शारीरिक कार्य की कानूनी गारंटी। यदि माँगने के 15 दिनों के भीतर काम नहीं मिलता, तो बेरोज़गारी भत्ते का प्रावधान है।
  • प्रधानमंत्री रोज़गार सृजन कार्यक्रम (PMEGP): सूक्ष्म उद्यम स्थापित करने के लिए ऋण से जुड़ी सहायता — स्वरोज़गार को बढ़ावा।
  • कौशल विकास पहलें: युवाओं को उद्योग की आवश्यकताओं के अनुरूप प्रशिक्षण, ताकि उनकी रोज़गार-योग्यता (Employability) बढ़े।

9. मास्टर तालिका : प्रमुख शब्दावली और सूत्र

शब्द / सूत्रअर्थ / विवरण
श्रमिक-जनसंख्या अनुपात(श्रमिक ÷ कुल जनसंख्या) × 100
श्रमबलकार्यरत + काम ढूँढने वाले
कार्यबलकेवल कार्यरत लोग
बेरोज़गारों की संख्याश्रमबल − कार्यबल
बेरोज़गारी दर(बेरोज़गार ÷ श्रमबल) × 100
भाड़े के श्रमिकनियमित वेतनभोगी + अनियत मज़दूर
औपचारिक क्षेत्रकसभी सार्वजनिक + 10 या अधिक भाड़े के श्रमिकों वाले निजी प्रतिष्ठान
प्रच्छन्न बेरोज़गारीसीमांत उत्पादकता लगभग शून्य
MGNREGA2005; 100 दिन रोज़गार गारंटी

10. मास्टर सारांश तालिका

विषयमुख्य बिंदु
रोज़गार की स्थितिस्वनियोजित (सबसे बड़ा भाग), नियमित वेतनभोगी, अनियत
क्षेत्रक वितरणप्राथमिक का हिस्सा अधिक पर घटता; द्वितीयक-सेवा बढ़ते
प्रवृत्तियाँरोज़गारविहीन संवृद्धि, अनियतीकरण, अनौपचारीकरण
बेरोज़गारी के प्रकारखुली, प्रच्छन्न, मौसमी, शिक्षित
सरकारी भूमिकाप्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रोज़गार; MGNREGA, PMEGP, कौशल विकास

11. माइंड मैप

रोज़गार
अवधारणाएँ
  • श्रमिक, श्रमबल, कार्यबल
  • श्रमिक-जनसंख्या अनुपात
स्थिति
  • स्वनियोजित
  • नियमित, अनियत
प्रवृत्तियाँ
  • रोज़गारविहीन संवृद्धि
  • अनौपचारीकरण
बेरोज़गारी
  • खुली, प्रच्छन्न
  • मौसमी, शिक्षित

12. टिप्स और ट्रिक्स

स्मार्ट तरीके
  • श्रमबल ⊃ कार्यबल: "श्रमबल में बेरोज़गार भी शामिल हैं" — इसे कभी न भूलें।
  • औपचारिक क्षेत्रक की पहचान का अंक: 10 या अधिक भाड़े के श्रमिक।
  • प्रच्छन्न बेरोज़गारी का प्रश्न हो तो "सीमांत उत्पादकता शून्य" अवश्य लिखें।
आम गलतियाँ
  • बेरोज़गारी दर की गणना में कुल जनसंख्या से भाग देना — सही आधार श्रमबल है।
  • घरेलू कार्य करने वाली महिलाओं को "बेरोज़गार" लिखना — वे सांख्यिकीय रूप से श्रमबल से बाहर गिनी जाती हैं, बेरोज़गार नहीं।
  • नियमित वेतनभोगी को "स्वनियोजित" समझना।

13. महत्वपूर्ण वन-लाइनर

  • भारत में श्रमिकों का सबसे बड़ा भाग स्वनियोजित है।
  • ग्रामीण क्षेत्रों में श्रमिक-जनसंख्या अनुपात शहरी क्षेत्रों से अधिक है।
  • औपचारिक क्षेत्रक के श्रमिकों को सामाजिक सुरक्षा लाभ मिलते हैं।
  • प्रच्छन्न बेरोज़गारी मुख्यतः कृषि क्षेत्रक में पाई जाती है।
  • रोज़गार के आँकड़े जनगणना, NSSO/PLFS और रोज़गार कार्यालयों से मिलते हैं।
  • MGNREGA 100 दिन के रोज़गार की कानूनी गारंटी देता है।

14. परीक्षा-पैटर्न प्रश्न (विस्तृत उत्तर सहित)

प्र1आसान

औपचारिक क्षेत्रक के निजी प्रतिष्ठान में कम-से-कम कितने भाड़े के श्रमिक होते हैं?

  1. 5
  2. 10
  3. 20
  4. 50
उत्तर देखें

10 या अधिक भाड़े के श्रमिकों वाले निजी प्रतिष्ठान औपचारिक क्षेत्रक में गिने जाते हैं।

उत्तर: (ख) 10

प्र2आसान

श्रमबल और कार्यबल में क्या अंतर है?

उत्तर देखें

श्रमबल = कार्यरत लोग + काम ढूँढने वाले लोग; कार्यबल = केवल कार्यरत लोग। दोनों का अंतर बेरोज़गारों की संख्या है।

उत्तर: श्रमबल में बेरोज़गार भी शामिल हैं

प्र3आसान

एक दुकानदार जो अपनी दुकान स्वयं चलाता है, किस श्रेणी का श्रमिक है?

उत्तर देखें

वह अपने उद्यम का स्वामी और संचालक है, इसलिए स्वनियोजित।

उत्तर: स्वनियोजित

प्र4मध्यम

ग्रामीण क्षेत्रों में श्रमिक-जनसंख्या अनुपात शहरी क्षेत्रों से अधिक क्यों होता है?

उत्तर देखें

ग्रामीण लोगों के पास सीमित संसाधन होते हैं; कम आय के कारण वे लंबे समय तक पढ़ाई नहीं कर पाते और जल्दी काम शुरू कर देते हैं; महिलाएँ भी खेती और पशुपालन में काम करती हैं। शहरों में अधिक लोग शिक्षा में संलग्न रहते हैं और रोज़गार के लिए विशेष योग्यता चाहिए।

उत्तर: कम आय, कम शिक्षा-अवधि, परिवार के अधिक सदस्यों का काम करना

प्र5मध्यम

किसी क्षेत्र में 3,000 लोगों का श्रमबल है, जिनमें से 2,760 कार्यरत हैं। बेरोज़गारी दर ज्ञात कीजिए। (काल्पनिक आँकड़े)

उत्तर देखें

बेरोज़गार = 3000 − 2760 = 240। बेरोज़गारी दर = 240 ÷ 3000 × 100 = 8%।

उत्तर: 8%

प्र6मध्यम

अनियतीकरण से क्या अभिप्राय है? इसका श्रमिकों पर क्या प्रभाव पड़ता है?

उत्तर देखें

कार्यबल में स्वनियोजित और नियमित वेतनभोगी श्रमिकों का हिस्सा घटना और अनियत दिहाड़ी मज़दूरों का हिस्सा बढ़ना। प्रभाव: आय अनिश्चित, सामाजिक सुरक्षा का अभाव, नौकरी की असुरक्षा, जीवन-स्तर पर प्रतिकूल प्रभाव।

उत्तर: अनियत मज़दूरों का बढ़ता हिस्सा — असुरक्षा में वृद्धि

प्र7मध्यम

मौसमी और प्रच्छन्न बेरोज़गारी में अंतर उदाहरण सहित स्पष्ट कीजिए।

उत्तर देखें

मौसमी: वर्ष के कुछ महीनों में ही काम मिलता है — जैसे कटाई के बाद खेतिहर मज़दूर बेकार। प्रच्छन्न: आवश्यकता से अधिक लोग काम में लगे हैं, अतिरिक्त लोगों की सीमांत उत्पादकता शून्य — जैसे 4 लोगों के काम वाले खेत पर 7 सदस्य। मौसमी में व्यक्ति कुछ समय बिल्कुल बेकार रहता है; प्रच्छन्न में वह काम करता दिखता है, पर उसका योगदान शून्य होता है।

उत्तर: मौसमी = समय-आधारित बेकारी; प्रच्छन्न = छिपी बेकारी, शून्य सीमांत उत्पादकता

प्र8मध्यम

सरकार प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से रोज़गार कैसे सृजित करती है?

उत्तर देखें

प्रत्यक्ष: सरकारी विभागों और सार्वजनिक उपक्रमों में नियुक्ति। अप्रत्यक्ष: सार्वजनिक उपक्रमों का उत्पादन बढ़ने से उनसे जुड़ी निजी इकाइयों (आपूर्तिकर्ता और खरीदार) का उत्पादन और रोज़गार भी बढ़ता है।

उत्तर: प्रत्यक्ष नियुक्ति + गुणक-प्रभाव से अप्रत्यक्ष रोज़गार

प्र9कठिन

"रोज़गारविहीन संवृद्धि" की अवधारणा स्पष्ट कीजिए। भारत में इसके कारण बताइए।

उत्तर देखें

जब GDP की संवृद्धि दर रोज़गार की संवृद्धि दर से काफ़ी अधिक हो — अर्थात अधिक उत्पादन, पर उसी अनुपात में रोज़गार नहीं। कारण: पूँजी-गहन तकनीक और स्वचालन; संवृद्धि का बड़ा भाग सेवा क्षेत्रक (IT, वित्त) से, जो कम श्रमिकों से अधिक उत्पादन करता है; श्रम-गहन विनिर्माण का अपेक्षित विस्तार न होना; सस्ते आयात से लघु उद्योगों पर दबाव। परिणाम: श्रमबल की वृद्धि दर से कम रोज़गार वृद्धि — बेरोज़गारी और अनौपचारिक रोज़गार में वृद्धि।

उत्तर: पूँजी-गहन, सेवा-प्रधान संवृद्धि के कारण रोज़गार का धीमा विस्तार

प्र10कठिन

औपचारिक और अनौपचारिक क्षेत्रक में अंतर बताइए। अनौपचारीकरण के कारण और परिणाम क्या हैं?

उत्तर देखें

अंतर: औपचारिक — सार्वजनिक प्रतिष्ठान + 10 या अधिक भाड़े के श्रमिकों वाले निजी प्रतिष्ठान, सामाजिक सुरक्षा, श्रम कानूनों का संरक्षण, मज़दूर संघ, नौकरी की सुरक्षा। अनौपचारिक — शेष सभी, कोई सामाजिक सुरक्षा नहीं, कम संरक्षण, अनियमित आय। अनौपचारीकरण के कारण: औपचारिक क्षेत्रक में धीमा रोज़गार सृजन; लागत घटाने के लिए ठेका श्रमिकों का बढ़ता उपयोग; वैश्विक प्रतिस्पर्धा। परिणाम: श्रमिकों की असुरक्षा, कम आय, सामाजिक सुरक्षा का अभाव; उद्यमों के लिए लचीलापन।

उत्तर: सुरक्षा और संरक्षण का अंतर; अनौपचारीकरण से असुरक्षा बढ़ी

प्र11कठिन

एक खेत पर 5 लोग काम करें तो उत्पादन 50 क्विंटल होता है; 6 लोग हों तो 52 क्विंटल; 8 लोग हों तो भी 52 क्विंटल (काल्पनिक आँकड़े)। प्रच्छन्न बेरोज़गारी की पहचान कीजिए और समझाइए।

उत्तर देखें

5 से 6 लोग होने पर उत्पादन 2 क्विंटल बढ़ता है — छठे व्यक्ति की सीमांत उत्पादकता 2 क्विंटल है। 6 से 8 लोग होने पर उत्पादन नहीं बढ़ता — सातवें और आठवें व्यक्ति की सीमांत उत्पादकता शून्य है। अतः 8 लोगों में से 2 प्रच्छन्न रूप से बेरोज़गार हैं। इन्हें अन्य कार्यों में लगाया जाए, तो खेत का उत्पादन घटे बिना कुल आय बढ़ेगी।

उत्तर: 2 व्यक्ति प्रच्छन्न बेरोज़गार (सीमांत उत्पादकता शून्य)

प्र12कठिन

भारत में महिलाओं की श्रमबल भागीदारी कम क्यों दिखती है? क्या यह वास्तविक स्थिति दर्शाती है?

उत्तर देखें

कारण: घर के भीतर किए गए अनेक उत्पादक कार्य (खाना बनाना, बच्चों-बुज़ुर्गों की देखभाल, पानी-ईंधन लाना) आर्थिक गतिविधि के रूप में नहीं गिने जाते; सामाजिक मान्यताएँ और गतिशीलता पर प्रतिबंध; सुरक्षित और उपयुक्त रोज़गार के अवसरों की कमी; नियमित रोज़गार के लिए आवश्यक शिक्षा-कौशल में अंतर। यह वास्तविक स्थिति पूरी तरह नहीं दर्शाती — महिलाओं का अवैतनिक कार्य उत्पादक है, पर आँकड़ों में "अदृश्य" रहता है। इसलिए महिलाओं का वास्तविक आर्थिक योगदान आधिकारिक आँकड़ों से अधिक है।

उत्तर: अवैतनिक घरेलू कार्य की गणना न होना + सामाजिक-आर्थिक बाधाएँ; आँकड़े योगदान को कम आँकते हैं

15. त्वरित पुनरावृत्ति सारांश

2 मिनट में दोहराएँ
  • श्रमिक = GDP में योगदान देने वाला; श्रमबल = कार्यरत + काम ढूँढने वाले।
  • श्रमिक-जनसंख्या अनुपात = श्रमिक ÷ जनसंख्या × 100; ग्रामीण > शहरी, पुरुष > महिला।
  • स्वनियोजित सबसे बड़ा वर्ग; भाड़े के श्रमिक = नियमित + अनियत।
  • प्राथमिक क्षेत्रक का हिस्सा अधिक पर घट रहा; रोज़गारविहीन संवृद्धि की चिंता।
  • अनियतीकरण और अनौपचारीकरण से असुरक्षा बढ़ी; औपचारिक = 10+ श्रमिक।
  • बेरोज़गारी: खुली, प्रच्छन्न, मौसमी, शिक्षित; MGNREGA 2005 — 100 दिन।