1. अध्याय एक नज़र में
पिछले अध्यायों में हमने आर्थिक संवृद्धि, रोज़गार और ग्रामीण विकास का अध्ययन किया। पर एक प्रश्न बार-बार सामने आता है — क्या विकास की कोई कीमत भी होती है? तेज़ औद्योगीकरण, शहरीकरण और बढ़ते उपभोग ने वायु, जल, मिट्टी और जैव-विविधता पर भारी दबाव डाला है। यदि हम आज प्रकृति के संसाधनों का अंधाधुंध उपयोग करेंगे, तो भविष्य की पीढ़ियों के लिए क्या बचेगा?
इस अध्याय में हम पर्यावरण (Environment) के कार्यों, भारत की पर्यावरणीय चुनौतियों, वैश्विक पर्यावरण समस्याओं और धारणीय विकास (Sustainable Development) की अवधारणा तथा उसकी रणनीतियों का अध्ययन करेंगे।
- पर्यावरण का अर्थ और उसके चार प्रमुख कार्य।
- धारण क्षमता और अवशोषी क्षमता; पर्यावरण संकट।
- भारत की प्रमुख पर्यावरणीय समस्याएँ।
- वैश्विक तापन और ओज़ोन क्षय; अंतरराष्ट्रीय समझौते।
- धारणीय विकास का अर्थ और सिद्धांत।
- धारणीय विकास की रणनीतियाँ; चिपको और अप्पिको आंदोलन।
2. पर्यावरण : अर्थ और कार्य
पर्यावरण (Environment) उन सभी जैविक (Biotic) और अजैविक (Abiotic) तत्वों का समग्र रूप है जो एक-दूसरे को प्रभावित करते हैं। जैविक तत्व — सभी सजीव जैसे पक्षी, पशु, पौधे, वन, मछलियाँ। अजैविक तत्व — निर्जीव तत्व जैसे वायु, जल, भूमि, चट्टानें, सूर्य का प्रकाश।
पर्यावरण के चार कार्य
- संसाधनों की आपूर्ति: पर्यावरण नवीकरणीय (Renewable) और अनवीकरणीय (Non-renewable) — दोनों प्रकार के संसाधन देता है।
- नवीकरणीय संसाधन: जिनका उपयोग उनके समाप्त होने की संभावना के बिना किया जा सकता है, क्योंकि उनकी निरंतर पुनःपूर्ति होती रहती है — जैसे वनों के वृक्ष, समुद्र की मछलियाँ (यदि उनका उपयोग पुनःपूर्ति की दर से कम हो)।
- अनवीकरणीय संसाधन: जो उपयोग से समाप्त हो जाते हैं — जैसे जीवाश्म ईंधन (कोयला, पेट्रोलियम)।
- अवशेषों का समावेश (Assimilation of Waste): पर्यावरण उत्पादन और उपभोग से उत्पन्न कचरे को अवशोषित करता है।
- जीवन का पोषण: सूर्य, मिट्टी, जल और वायु के माध्यम से जैविक विविधता और जीवन को बनाए रखता है।
- सौंदर्य-बोध: प्राकृतिक दृश्य, पर्वत, नदियाँ — मनुष्य को सौंदर्य और आनंद का अनुभव देते हैं।
धारण क्षमता और अवशोषी क्षमता
| अवधारणा | अर्थ |
|---|---|
| धारण क्षमता (Carrying Capacity) | पर्यावरण अपने कार्य बिना बाधा के तभी कर सकता है जब संसाधनों का निष्कर्षण उनकी पुनःसृजन दर से अधिक न हो। यह सीमा धारण क्षमता है। |
| अवशोषी क्षमता (Absorptive Capacity) | पर्यावरण की क्षरण (Degradation) को सोखने की योग्यता। जब कचरा इस क्षमता से अधिक हो जाता है, तो प्रदूषण की समस्या उत्पन्न होती है। |
जब संसाधनों का निष्कर्षण उनके पुनःसृजन की दर से अधिक हो जाता है और कचरा पर्यावरण की अवशोषी क्षमता से अधिक हो जाता है, तो पर्यावरण अपना जीवन-पोषण का तीसरा और महत्वपूर्ण कार्य करने में असफल होने लगता है — इसे पर्यावरण संकट कहते हैं। आज विश्व इसी स्थिति का सामना कर रहा है।
संकट क्यों बढ़ा? — माँग और पूर्ति का उलटफेर
प्रारंभिक सभ्यताओं में पर्यावरणीय संसाधनों की पूर्ति माँग से कहीं अधिक थी — जनसंख्या कम थी और उपभोग सीमित। जनसंख्या विस्फोट, औद्योगिक क्रांति और समृद्ध वर्ग के बढ़ते उपभोग के कारण आज स्थिति उलट गई है: पर्यावरणीय संसाधनों और सेवाओं की माँग पूर्ति से अधिक हो गई है। परिणामस्वरूप स्वच्छ हवा और पानी जैसी चीज़ें भी दुर्लभ होती जा रही हैं।
पर्यावरण क्षरण की लागत बहुत ऊँची है। उदाहरण — जल प्रदूषण से जलजनित रोग बढ़ते हैं, जिनके इलाज पर परिवारों और सरकार का भारी व्यय होता है; भूजल के अति-दोहन से गहरे बोरवेल खोदने का खर्च बढ़ता है; प्रदूषित वायु से श्वसन रोग बढ़ते हैं। इस प्रकार पर्यावरण की उपेक्षा का मूल्य अंततः स्वास्थ्य व्यय, उत्पादकता में कमी और जीवन की गुणवत्ता में गिरावट के रूप में चुकाना पड़ता है।
3. भारत की पर्यावरणीय स्थिति
भारत प्राकृतिक संसाधनों से समृद्ध है — उपजाऊ मिट्टी, सैकड़ों नदियाँ और सहायक नदियाँ, हरे-भरे वन, प्रचुर खनिज (लौह अयस्क, कोयला, प्राकृतिक गैस), और विशाल जैव-विविधता। दक्कन पठार की काली मिट्टी कपास की खेती के लिए विशेष रूप से उपयुक्त है। पर विकास की गतिविधियों ने इन संसाधनों पर भारी दबाव डाला है।
प्रमुख पर्यावरणीय समस्याएँ
| समस्या | कारण |
|---|---|
| भूमि क्षरण (Land Degradation) | वन-विनाश, अस्थायी (झूम) खेती, अति-चराई, उर्वरकों और कीटनाशकों का अत्यधिक प्रयोग, अनुचित सिंचाई से जल-भराव और लवणता, अतिक्रमण |
| मृदा अपरदन (Soil Erosion) | वनस्पति आवरण का हटना, वर्षा और हवा द्वारा ऊपरी उपजाऊ मिट्टी का बह जाना |
| जैव-विविधता की हानि | आवास (Habitat) का विनाश, शिकार, प्रदूषण |
| वायु प्रदूषण | वाहनों की बढ़ती संख्या, उद्योग, ताप विद्युत संयंत्र, फसल अवशेष जलाना; शहरी क्षेत्रों में वाहनों का योगदान बड़ा |
| जल प्रदूषण और जल संकट | औद्योगिक अपशिष्ट, सीवेज, कृषि रसायन; भूजल का अति-दोहन |
| ठोस अपशिष्ट प्रबंधन | शहरीकरण, प्लास्टिक का बढ़ता उपयोग, अपर्याप्त पुनर्चक्रण |
दो प्रकार का दबाव: भारत में पर्यावरण पर दबाव दो स्रोतों से आता है — (1) निर्धनता-जनित पर्यावरण क्षरण: गरीब लोग आजीविका के लिए वनों, चरागाहों और मिट्टी पर निर्भर रहते हैं, जिससे इनका क्षरण होता है; (2) समृद्धि-जनित प्रदूषण: तेज़ी से बढ़ते औद्योगिक क्षेत्रक और समृद्ध वर्ग का बढ़ता उपभोग — वाहन, बिजली, उपभोक्ता वस्तुएँ।
संस्थागत प्रयास
- केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB): 1974 में जल (प्रदूषण निवारण और नियंत्रण) अधिनियम के अंतर्गत गठित; राज्यों में राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड। ये जल, वायु और भूमि प्रदूषण से संबंधित जानकारी एकत्र करते हैं, मानक तय करते हैं और उद्योगों के अपशिष्ट की निगरानी करते हैं।
- पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986: पर्यावरण की रक्षा के लिए व्यापक कानूनी ढाँचा।
4. वैश्विक पर्यावरणीय समस्याएँ
(क) वैश्विक तापन (Global Warming)
पृथ्वी और उसके महासागरों के औसत तापमान में धीरे-धीरे होने वाली वृद्धि को वैश्विक तापन कहते हैं। इसका मुख्य कारण मानवीय गतिविधियों से ग्रीनहाउस गैसों (Greenhouse Gases) — जैसे कार्बन डाइऑक्साइड, मीथेन — के उत्सर्जन में वृद्धि है। जीवाश्म ईंधन जलाना और वन-विनाश इसके प्रमुख कारण हैं।
प्रभाव: ध्रुवीय हिम और हिमनदों का पिघलना, समुद्र-तल में वृद्धि, तटीय क्षेत्रों में बाढ़, मौसम के पैटर्न में बदलाव, चरम मौसमी घटनाओं (लू, सूखा, अतिवृष्टि) में वृद्धि, कृषि उत्पादन पर प्रभाव, और कई प्रजातियों के विलुप्त होने का खतरा।
(ख) ओज़ोन क्षय (Ozone Depletion)
समताप मंडल (Stratosphere) की ओज़ोन परत सूर्य की हानिकारक पराबैंगनी (UV) किरणों से पृथ्वी की रक्षा करती है। रेफ्रिजरेटर, एयर कंडीशनर और एरोसोल स्प्रे में प्रयुक्त क्लोरोफ्लोरोकार्बन (CFCs) और अग्निशमन में प्रयुक्त हैलॉन जैसे रसायनों से यह परत पतली होती है। UV किरणों से त्वचा कैंसर, मोतियाबिंद और फसलों तथा समुद्री जीवों को हानि होती है।
प्रमुख अंतरराष्ट्रीय समझौते
| समझौता / घटना | वर्ष | विषय |
|---|---|---|
| मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल | 1987 | ओज़ोन परत को क्षति पहुँचाने वाले पदार्थों (CFCs आदि) के उपयोग पर नियंत्रण |
| पृथ्वी शिखर सम्मेलन, रियो डी जनेरियो | 1992 | पर्यावरण और विकास पर संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन; जलवायु परिवर्तन पर ढाँचा अभिसमय (UNFCCC) |
| क्योटो प्रोटोकॉल | 1997 | विकसित देशों के लिए ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन घटाने के लक्ष्य |
| पेरिस समझौता | 2015 | वैश्विक तापमान वृद्धि को पूर्व-औद्योगिक स्तर से 2°C से काफ़ी नीचे — और 1.5°C तक सीमित रखने के प्रयास — का लक्ष्य |
5. धारणीय विकास (Sustainable Development)
पर्यावरण और अर्थव्यवस्था एक-दूसरे पर निर्भर हैं। पर्यावरण की उपेक्षा कर किया गया विकास लंबे समय तक नहीं चल सकता। इसी विचार से धारणीय विकास की अवधारणा उभरी।
संयुक्त राष्ट्र के पर्यावरण और विकास पर विश्व आयोग (ब्रुंटलैंड आयोग) की 1987 की रिपोर्ट "हमारा साझा भविष्य" (Our Common Future) में दी गई प्रसिद्ध परिभाषा का सार यह है: विकास ऐसा हो जो वर्तमान पीढ़ी की आवश्यकताओं को पूरा करे, पर भावी पीढ़ियों की अपनी आवश्यकताएँ पूरी करने की क्षमता से समझौता न करे।
इस परिभाषा में दो प्रमुख विचार हैं: (1) आवश्यकताएँ — विशेषकर विश्व के गरीबों की मूलभूत आवश्यकताएँ, जिन्हें सर्वोच्च प्राथमिकता मिलनी चाहिए; (2) सीमाएँ — प्रौद्योगिकी और सामाजिक संगठन की स्थिति के कारण पर्यावरण की वर्तमान और भावी आवश्यकताएँ पूरी करने की क्षमता पर लगी सीमाएँ।
अर्थात, धारणीय विकास का उद्देश्य भावी पीढ़ियों के लिए कम-से-कम उतनी ही अच्छी जीवन-गुणवत्ता सुनिश्चित करना है जितनी वर्तमान पीढ़ी को मिली है। हमें आने वाली पीढ़ियों को एक बेहतर, या कम-से-कम उतनी ही अच्छी पृथ्वी सौंपनी चाहिए जितनी हमें मिली।
धारणीय विकास के सिद्धांत (हरमन डेली के विचारों पर आधारित)
- मानव जनसंख्या को उस स्तर तक सीमित रखना जिसे पर्यावरण की धारण क्षमता सँभाल सके।
- प्रौद्योगिकीय प्रगति ऐसी हो जो निवेश-कुशल (Input-efficient) हो, न कि निवेश-उपभोगी।
- नवीकरणीय संसाधनों का निष्कर्षण धारणीय आधार पर हो — निष्कर्षण की दर पुनःसृजन की दर से अधिक न हो।
- अनवीकरणीय संसाधनों के क्षय की दर नवीकरणीय विकल्पों के सृजन की दर से अधिक न हो।
- प्रदूषण से उत्पन्न अक्षमताओं (Inefficiencies) को सुधारा जाए।
6. धारणीय विकास की रणनीतियाँ
| रणनीति | विवरण |
|---|---|
| गैर-पारंपरिक ऊर्जा स्रोत | भारत अपनी बिजली के लिए बड़े पैमाने पर ताप (कोयला) और जल विद्युत संयंत्रों पर निर्भर रहा है, जिनका पर्यावरण पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है — ताप संयंत्र कार्बन डाइऑक्साइड और राख उत्पन्न करते हैं; बड़े बाँध वनों को डुबोते हैं और नदियों के प्राकृतिक प्रवाह को बाधित करते हैं। पवन ऊर्जा और सौर ऊर्जा स्वच्छ विकल्प हैं। |
| ग्रामीण क्षेत्रों में LPG और गोबर गैस | ग्रामीण परिवार प्रायः लकड़ी, उपले और कृषि अवशेष को ईंधन के रूप में जलाते हैं, जिससे वन-विनाश, हरित क्षेत्र में कमी, पशु-अपशिष्ट की बर्बादी और घर के भीतर वायु प्रदूषण होता है। LPG और गोबर गैस (Biogas) स्वच्छ ईंधन हैं — गोबर गैस संयंत्र से निकला अवशेष उत्तम खाद भी है। |
| शहरी क्षेत्रों में CNG | दिल्ली में सार्वजनिक परिवहन में संपीडित प्राकृतिक गैस (CNG) के उपयोग से वायु प्रदूषण घटाने में मदद मिली। |
| पवन शक्ति | जिन क्षेत्रों में तेज़ हवा चलती है, वहाँ पवन चक्कियों से बिजली — प्रारंभिक लागत अधिक, पर चालू लागत कम और प्रदूषण-रहित। |
| सौर शक्ति (फोटोवोल्टिक सेल) | भारत को प्रचुर धूप मिलती है; सौर सेल सूर्य के प्रकाश को सीधे बिजली में बदलते हैं — दूरस्थ क्षेत्रों के लिए विशेष रूप से उपयोगी। |
| लघु जलीय संयंत्र (Mini-hydel Plants) | पहाड़ी क्षेत्रों में छोटी धाराओं पर छोटी टरबाइनें — स्थानीय बिजली, पर्यावरण पर कम प्रभाव, भूमि उपयोग में बड़ा परिवर्तन नहीं। |
| पारंपरिक ज्ञान और व्यवहार | भारत की पारंपरिक कृषि, स्वास्थ्य (आयुर्वेद, औषधीय पौधे), आवास और परिवहन पद्धतियाँ प्रायः पर्यावरण-अनुकूल रही हैं; इन्हें पुनर्जीवित करना उपयोगी है। |
| जैविक कम्पोस्ट खाद | रासायनिक उर्वरकों के स्थान पर कम्पोस्ट; केंचुओं द्वारा जैविक अपशिष्ट को खाद में बदलना (वर्मी-कम्पोस्ट)। |
| जैविक कीट नियंत्रण | नीम आधारित कीटनाशक; पक्षियों, साँपों जैसे प्राकृतिक शिकारियों की भूमिका; मिश्रित फसलें। |
7. पर्यावरण संरक्षण के जन-आंदोलन
| आंदोलन | क्षेत्र | विशेषता |
|---|---|---|
| चिपको आंदोलन (Chipko) | हिमालयी क्षेत्र (वर्तमान उत्तराखंड), 1970 का दशक | ग्रामीणों, विशेषकर महिलाओं ने पेड़ों से चिपककर उन्हें कटने से बचाया — वनों के व्यावसायिक कटान का विरोध |
| अप्पिको आंदोलन (Appiko) | कर्नाटक (पश्चिमी घाट), 1980 का दशक | चिपको से प्रेरित; "अप्पिको" का कन्नड़ में अर्थ है "गले लगाना" — वनों के संरक्षण के साथ पुनर्वनीकरण और संसाधनों के विवेकपूर्ण उपयोग पर बल |
इन आंदोलनों ने दिखाया कि स्थानीय समुदाय पर्यावरण संरक्षण में सबसे प्रभावी भूमिका निभा सकते हैं, क्योंकि उनकी आजीविका सीधे प्राकृतिक संसाधनों से जुड़ी है।
8. केस अध्ययन और हल किए गए प्रश्न
एक गाँव के तालाब में मछलियों की संख्या हर वर्ष प्राकृतिक रूप से लगभग 500 बढ़ती है (काल्पनिक अभ्यास आँकड़े)। यदि गाँव वाले हर वर्ष 400 मछलियाँ पकड़ें, तो क्या होगा? और यदि 800 पकड़ें तो?
हल: 400 पकड़ने पर निष्कर्षण (400) पुनःसृजन (500) से कम है — मछलियों का भंडार बना रहेगा, बल्कि थोड़ा बढ़ेगा; यह धारणीय उपयोग है। 800 पकड़ने पर हर वर्ष भंडार 300 घटेगा; कुछ वर्षों में तालाब खाली हो जाएगा — यह धारण क्षमता का उल्लंघन है, और भविष्य की पीढ़ी को मछलियाँ नहीं मिलेंगी।
एक किसान परिवार लकड़ी और उपले जलाने के स्थान पर गोबर गैस संयंत्र लगाता है। इसके तीन लाभ बताइए।
उत्तर: (1) स्वच्छ ईंधन — घर के भीतर धुआँ नहीं, महिलाओं और बच्चों के स्वास्थ्य में सुधार; (2) लकड़ी की माँग घटने से वनों का संरक्षण; (3) संयंत्र का अवशेष उत्तम जैविक खाद — रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता कम।
9. मास्टर तालिका : प्रमुख शब्दावली और तथ्य
| शब्द / तथ्य | अर्थ / विवरण |
|---|---|
| पर्यावरण | जैविक + अजैविक तत्वों का समग्र रूप |
| पर्यावरण के कार्य | संसाधन, अवशेष समावेश, जीवन पोषण, सौंदर्य |
| धारण क्षमता | निष्कर्षण ≤ पुनःसृजन दर |
| अवशोषी क्षमता | क्षरण को सोखने की योग्यता |
| CPCB | 1974 |
| पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम | 1986 |
| ब्रुंटलैंड रिपोर्ट | 1987; धारणीय विकास की परिभाषा |
| मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल | 1987; ओज़ोन संरक्षण |
| क्योटो / पेरिस | 1997 / 2015; जलवायु परिवर्तन |
| चिपको / अप्पिको | हिमालय / कर्नाटक |
10. मास्टर सारांश तालिका
| विषय | मुख्य बिंदु |
|---|---|
| पर्यावरण संकट | निष्कर्षण > पुनःसृजन, कचरा > अवशोषी क्षमता; माँग > पूर्ति |
| भारत की समस्याएँ | भूमि क्षरण, मृदा अपरदन, वायु-जल प्रदूषण, जैव-विविधता हानि |
| वैश्विक समस्याएँ | वैश्विक तापन (ग्रीनहाउस गैसें), ओज़ोन क्षय (CFCs) |
| धारणीय विकास | वर्तमान आवश्यकताएँ, भावी पीढ़ी की क्षमता सुरक्षित |
| रणनीतियाँ | सौर-पवन-लघु जल, LPG-गोबर गैस, CNG, पारंपरिक ज्ञान, जैविक खाद-कीट नियंत्रण |
11. माइंड मैप
- संसाधन, अवशोषण
- जीवन, सौंदर्य
- भूमि क्षरण, प्रदूषण
- वैश्विक तापन, ओज़ोन
- ब्रुंटलैंड 1987
- डेली के सिद्धांत
- सौर, पवन, गोबर गैस
- चिपको, अप्पिको
12. टिप्स और ट्रिक्स
- पर्यावरण के चार कार्य याद करें: "सं-अ-जी-सौ" — संसाधन, अवशेष, जीवन, सौंदर्य।
- 1987 के दो तथ्य: ब्रुंटलैंड रिपोर्ट और मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल।
- धारणीय विकास के उत्तर में "भावी पीढ़ी" और "धारण क्षमता" शब्द अवश्य लिखें।
- ओज़ोन क्षय को वैश्विक तापन का मुख्य कारण लिखना — दोनों अलग समस्याएँ हैं; वैश्विक तापन का मुख्य कारण ग्रीनहाउस गैसें हैं।
- अप्पिको आंदोलन को उत्तराखंड से जोड़ना — यह कर्नाटक का है।
- सभी जल विद्युत परियोजनाओं को "पूर्णतः पर्यावरण-अनुकूल" मानना — बड़े बाँधों के प्रतिकूल प्रभाव भी हैं।
13. महत्वपूर्ण वन-लाइनर
- पर्यावरण संकट तब आता है जब माँग पूर्ति से अधिक हो जाती है।
- CFCs ओज़ोन परत को क्षति पहुँचाते हैं।
- मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल 1987 में ओज़ोन संरक्षण के लिए हुआ।
- CPCB की स्थापना 1974 में हुई।
- चिपको आंदोलन हिमालयी क्षेत्र से जुड़ा है।
- गोबर गैस संयंत्र ईंधन और खाद दोनों देता है।
- दिल्ली में सार्वजनिक परिवहन में CNG का उपयोग वायु प्रदूषण घटाने के लिए हुआ।
14. परीक्षा-पैटर्न प्रश्न (विस्तृत उत्तर सहित)
ओज़ोन परत के क्षय का मुख्य कारण कौन-सा है?
- कार्बन डाइऑक्साइड
- क्लोरोफ्लोरोकार्बन (CFCs)
- ऑक्सीजन
- जलवाष्प
उत्तर देखें
CFCs (रेफ्रिजरेटर, एयर कंडीशनर, एरोसोल) ओज़ोन अणुओं को तोड़ते हैं। CO₂ वैश्विक तापन से जुड़ी है।
उत्तर: (ख) क्लोरोफ्लोरोकार्बन (CFCs)
धारण क्षमता (Carrying Capacity) से क्या अभिप्राय है?
उत्तर देखें
पर्यावरण अपने कार्य बिना बाधा के तभी कर सकता है जब संसाधनों का निष्कर्षण उनकी पुनःसृजन दर से अधिक न हो — यही सीमा धारण क्षमता है।
उत्तर: निष्कर्षण की वह सीमा जो पुनःसृजन दर से अधिक न हो
अप्पिको आंदोलन किस राज्य से संबंधित है?
उत्तर देखें
कर्नाटक (पश्चिमी घाट) — चिपको आंदोलन से प्रेरित।
उत्तर: कर्नाटक
पर्यावरण के चार कार्य समझाइए।
उत्तर देखें
(1) नवीकरणीय और अनवीकरणीय संसाधनों की आपूर्ति; (2) उत्पादन-उपभोग के अवशेषों का समावेश; (3) सूर्य, मिट्टी, जल, वायु द्वारा जीवन और जैव-विविधता का पोषण; (4) प्राकृतिक सौंदर्य द्वारा जीवन की गुणवत्ता में वृद्धि।
उत्तर: संसाधन आपूर्ति, अवशेष समावेश, जीवन पोषण, सौंदर्य-बोध
आज पर्यावरणीय संसाधनों की माँग पूर्ति से अधिक क्यों हो गई है?
उत्तर देखें
जनसंख्या विस्फोट, औद्योगिक क्रांति और उत्पादन-उपभोग में तेज़ वृद्धि से संसाधनों की माँग बढ़ी; साथ ही अति-दोहन और प्रदूषण से संसाधनों की पूर्ति घटी। प्रारंभिक सभ्यताओं में स्थिति उलटी थी — पूर्ति माँग से अधिक थी।
उत्तर: जनसंख्या और उपभोग से माँग में वृद्धि; अति-दोहन से पूर्ति में कमी
ग्रामीण क्षेत्रों में पारंपरिक ईंधन के स्थान पर गोबर गैस और LPG के प्रयोग के लाभ बताइए।
उत्तर देखें
लकड़ी और उपले जलाने से वन-विनाश, घर के भीतर धुआँ (स्वास्थ्य हानि) और पशु-अपशिष्ट की बर्बादी होती है। गोबर गैस और LPG स्वच्छ ईंधन हैं — वन संरक्षण, बेहतर स्वास्थ्य; गोबर गैस संयंत्र का अवशेष जैविक खाद के रूप में उपयोगी।
उत्तर: स्वच्छ ईंधन, वन संरक्षण, स्वास्थ्य लाभ, जैविक खाद
भारत में भूमि क्षरण के चार कारण बताइए।
उत्तर देखें
वन-विनाश; झूम (अस्थायी) खेती; अति-चराई; उर्वरकों-कीटनाशकों का अत्यधिक प्रयोग; अनुचित सिंचाई से जल-भराव और लवणता; अतिक्रमण (कोई चार)।
उत्तर: वन-विनाश, अति-चराई, रसायनों का अति-प्रयोग, जल-भराव (उदाहरणार्थ)
वैश्विक तापन के कारण और प्रभाव लिखिए।
उत्तर देखें
कारण: जीवाश्म ईंधन जलाने और वन-विनाश से ग्रीनहाउस गैसों (CO₂, मीथेन) में वृद्धि। प्रभाव: हिमनदों का पिघलना, समुद्र-तल में वृद्धि, तटीय बाढ़, मौसम में बदलाव, चरम घटनाएँ, कृषि पर प्रभाव, प्रजातियों का विलोपन।
उत्तर: ग्रीनहाउस गैसें → तापमान वृद्धि → हिम पिघलना, समुद्र-तल वृद्धि, मौसम परिवर्तन
धारणीय विकास की अवधारणा स्पष्ट कीजिए और इसके सिद्धांत बताइए।
उत्तर देखें
ब्रुंटलैंड आयोग (1987) के अनुसार — विकास जो वर्तमान पीढ़ी की आवश्यकताएँ पूरी करे पर भावी पीढ़ियों की क्षमता से समझौता न करे। इसमें गरीबों की मूल आवश्यकताओं को प्राथमिकता और पर्यावरण की सीमाओं की स्वीकृति शामिल है। सिद्धांत (हरमन डेली के विचार): जनसंख्या धारण क्षमता तक सीमित; निवेश-कुशल प्रौद्योगिकी; नवीकरणीय संसाधनों का निष्कर्षण पुनःसृजन दर से कम; अनवीकरणीय संसाधनों का क्षय नवीकरणीय विकल्पों के सृजन की दर से अधिक न हो; प्रदूषण-जनित अक्षमताओं का सुधार।
उत्तर: अंतर-पीढ़ी समानता पर आधारित विकास; पाँच सिद्धांत
भारत में पर्यावरण पर "निर्धनता-जनित" और "समृद्धि-जनित" — दोनों प्रकार का दबाव है। व्याख्या कीजिए।
उत्तर देखें
निर्धनता-जनित: गरीब परिवार ईंधन, चारे और आजीविका के लिए वनों, चरागाहों और भूमि पर निर्भर हैं; विकल्पों के अभाव में वे इनका अति-दोहन करते हैं — वन-विनाश, मृदा अपरदन। समृद्धि-जनित: तेज़ औद्योगीकरण, वाहनों की बढ़ती संख्या, बिजली और उपभोक्ता वस्तुओं की बढ़ती माँग — वायु-जल प्रदूषण, ठोस अपशिष्ट। अतः समाधान भी दोहरा चाहिए: गरीबों को वैकल्पिक आजीविका और स्वच्छ ईंधन, तथा समृद्ध वर्ग और उद्योगों के लिए प्रदूषण नियंत्रण तथा धारणीय उपभोग।
उत्तर: आजीविका-निर्भरता से क्षरण + उपभोग-उद्योग से प्रदूषण; दोहरी रणनीति आवश्यक
एक वन में प्रति वर्ष प्राकृतिक रूप से 1,200 नए वृक्ष तैयार होते हैं (काल्पनिक आँकड़े)। वहाँ 10,000 वृक्ष हैं। यदि प्रति वर्ष 1,700 वृक्ष काटे जाएँ, तो कितने वर्षों में वन लगभग समाप्त हो जाएगा? धारणीय कटान की अधिकतम सीमा क्या है?
उत्तर देखें
शुद्ध वार्षिक कमी = 1700 − 1200 = 500 वृक्ष। 10,000 ÷ 500 = 20 वर्ष (सरल अनुमान, यह मानते हुए कि पुनःसृजन दर स्थिर रहे; वास्तव में वृक्ष घटने पर पुनःसृजन भी घटेगा और वन और जल्दी समाप्त होगा)। धारणीय कटान की अधिकतम सीमा = पुनःसृजन दर = 1,200 वृक्ष प्रति वर्ष।
उत्तर: लगभग 20 वर्ष; धारणीय सीमा 1,200 वृक्ष/वर्ष
धारणीय विकास के लिए गैर-पारंपरिक ऊर्जा स्रोतों का महत्व बताइए। ताप और बड़ी जल विद्युत परियोजनाओं की तुलना में इनके लाभ क्या हैं?
उत्तर देखें
ताप संयंत्र कोयला जलाकर CO₂ और राख उत्पन्न करते हैं — वायु प्रदूषण और वैश्विक तापन; बड़े बाँध वनों को डुबोते हैं, विस्थापन करते हैं और नदियों का प्राकृतिक प्रवाह बाधित करते हैं। गैर-पारंपरिक स्रोत — सौर (फोटोवोल्टिक), पवन, लघु जल संयंत्र, गोबर गैस — नवीकरणीय हैं, प्रदूषण बहुत कम करते हैं, चालू लागत कम है, और दूरस्थ क्षेत्रों में स्थानीय स्तर पर बिजली दे सकते हैं। सीमा: कुछ में प्रारंभिक लागत अधिक और उत्पादन मौसम पर निर्भर। फिर भी दीर्घकाल में ये धारणीय विकास के लिए आवश्यक हैं।
उत्तर: नवीकरणीय, कम प्रदूषण, कम चालू लागत, स्थानीय उपलब्धता
15. त्वरित पुनरावृत्ति सारांश
- पर्यावरण = जैविक + अजैविक; चार कार्य: संसाधन, अवशेष समावेश, जीवन पोषण, सौंदर्य।
- संकट: निष्कर्षण > पुनःसृजन, कचरा > अवशोषी क्षमता; माँग > पूर्ति।
- भारत: भूमि क्षरण, प्रदूषण; CPCB 1974, पर्यावरण संरक्षण अधिनियम 1986।
- वैश्विक: वैश्विक तापन (ग्रीनहाउस गैसें), ओज़ोन क्षय (CFCs); मॉन्ट्रियल 1987, क्योटो 1997, पेरिस 2015।
- धारणीय विकास: ब्रुंटलैंड 1987; भावी पीढ़ी की क्षमता सुरक्षित; डेली के सिद्धांत।
- रणनीतियाँ: सौर, पवन, लघु जल, LPG/गोबर गैस, CNG, पारंपरिक ज्ञान, जैविक खाद; चिपको-अप्पिको।