Class 11 Economics · Chapter 1 · भारतीय अर्थव्यवस्था का विकास

स्वतंत्रता की पूर्व संध्या पर भारतीय अर्थव्यवस्था

औपनिवेशिक शासन में कृषि, उद्योग, विदेशी व्यापार, जनांकिकी, व्यावसायिक संरचना और आधारिक संरचना।

NCERT भारतीय अर्थव्यवस्था का विकास + अर्थशास्त्र में सांख्यिकीCBSE Class 11 18 min read

1. अध्याय एक नज़र में

15 अगस्त 1947 को भारत को राजनीतिक स्वतंत्रता मिली, लेकिन उसे विरासत में एक ऐसी अर्थव्यवस्था मिली जो लगभग दो सौ वर्षों के ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन (Colonial Rule) से गहराई तक प्रभावित थी। एक समय भारत अपने हस्तशिल्प — सूती और रेशमी वस्त्र, धातु के बर्तन, कीमती पत्थरों के आभूषण — के लिए पूरी दुनिया में प्रसिद्ध था। लेकिन स्वतंत्रता के समय देश की अधिकांश जनता गरीब थी, खेती पिछड़ी हुई थी, उद्योग बहुत कम थे और साक्षरता तथा स्वास्थ्य की स्थिति दयनीय थी।

इस अध्याय में हम समझेंगे कि औपनिवेशिक शासन ने भारत की अर्थव्यवस्था के हर क्षेत्र — कृषि, उद्योग, विदेशी व्यापार, जनसंख्या, व्यावसायिक संरचना और आधारिक संरचना (Infrastructure) — को किस प्रकार प्रभावित किया। यह समझ आवश्यक है, क्योंकि स्वतंत्र भारत की आर्थिक नीतियाँ — पंचवर्षीय योजनाएँ, भूमि सुधार, सार्वजनिक क्षेत्र का विस्तार — इसी विरासत को बदलने के लिए बनाई गई थीं।

इस अध्याय में आप सीखेंगे
  • औपनिवेशिक शासन के अंतर्गत निम्न स्तरीय आर्थिक विकास और राष्ट्रीय आय के अनुमान।
  • कृषि क्षेत्रक (Agricultural Sector) की गतिहीनता के कारण — ज़मींदारी व्यवस्था, कृषि का वाणिज्यीकरण।
  • औद्योगिक क्षेत्रक (Industrial Sector): हस्तशिल्प का पतन (De-industrialisation) और आधुनिक उद्योगों की धीमी शुरुआत।
  • विदेशी व्यापार (Foreign Trade) का स्वरूप और धन का निष्कासन (Drain of Wealth)।
  • जनांकिकीय परिस्थिति (Demographic Condition) और व्यावसायिक संरचना (Occupational Structure)।
  • आधारिक संरचना — रेलवे, सड़कें, बंदरगाह, डाक-तार — और उनका वास्तविक उद्देश्य।

2. औपनिवेशिक शासन में निम्न स्तरीय आर्थिक विकास

ब्रिटिश सरकार की आर्थिक नीतियों का मुख्य उद्देश्य भारत का आर्थिक विकास करना नहीं, बल्कि ब्रिटेन के तेज़ी से बढ़ते औद्योगिक आधार के हितों की रक्षा और संवर्धन करना था। इन नीतियों ने भारत को दो भूमिकाओं में सीमित कर दिया:

  • ब्रिटेन के उद्योगों के लिए कच्चे माल का आपूर्तिकर्ता (Supplier of Raw Materials);
  • ब्रिटेन में बने तैयार माल (Finished Goods) का बाज़ार (Market)।

परिणामस्वरूप भारत की अर्थव्यवस्था की संरचना ही बदल गई। ब्रिटिश सरकार ने भारत की राष्ट्रीय आय (National Income) और प्रति व्यक्ति आय (Per Capita Income) को मापने का कोई गंभीर प्रयास नहीं किया। कुछ व्यक्तिगत प्रयास अवश्य हुए — दादाभाई नौरोजी, विलियम डिग्बी, फ़िंडले शिराज़, वी.के.आर.वी. राव और आर.सी. देसाई जैसे अर्थशास्त्रियों और विद्वानों ने अनुमान लगाए। इनमें वी.के.आर.वी. राव के अनुमानों को औपनिवेशिक काल के लिए विशेष महत्वपूर्ण माना जाता है।

अधिकांश अध्ययनों से निष्कर्ष निकलता है कि बीसवीं सदी के पूर्वार्ध में देश के कुल वास्तविक उत्पादन (Aggregate Real Output) की वृद्धि दर 2 प्रतिशत से भी कम रही, और प्रति व्यक्ति उत्पादन की वृद्धि लगभग आधा प्रतिशत प्रति वर्ष ही रही। इतनी धीमी वृद्धि में जनसंख्या बढ़ने के साथ आम आदमी के जीवन स्तर में कोई उल्लेखनीय सुधार संभव नहीं था।

3. कृषि क्षेत्रक

औपनिवेशिक शासन के दौरान भारत मूलतः एक कृषि-प्रधान अर्थव्यवस्था था। देश की लगभग 85 प्रतिशत जनसंख्या गाँवों में रहती थी और उसकी आजीविका प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से कृषि पर निर्भर थी। फिर भी कृषि क्षेत्रक में गतिहीनता (Stagnation) बनी रही और कई बार उसका ह्रास भी हुआ। कुल कृषि उत्पादन में जो थोड़ी-बहुत वृद्धि हुई, वह मुख्यतः खेती के क्षेत्रफल के विस्तार से हुई, प्रति हेक्टेयर उत्पादकता (Productivity) बढ़ने से नहीं।

कृषि की गतिहीनता के कारण

कारणव्याख्या
भू-राजस्व व्यवस्थाएँ (Land Settlement Systems)विशेषकर बंगाल प्रेसीडेंसी में लागू ज़मींदारी व्यवस्था (Permanent Settlement, 1793) में खेती से होने वाला लाभ किसानों के बजाय ज़मींदारों को मिलता था। ज़मींदार केवल लगान वसूलने में रुचि रखते थे, कृषि सुधार में नहीं।
कठोर लगान वसूलीराजस्व की निश्चित राशि निश्चित तिथि तक जमा करनी होती थी, अन्यथा ज़मींदारी का अधिकार छिन जाता था। इसलिए ज़मींदार किसानों का शोषण करते थे, जिससे किसानों की दशा बिगड़ती गई।
तकनीक का निम्न स्तरपुराने औज़ार, उर्वरकों (Fertilisers) का बहुत कम प्रयोग, उन्नत बीजों का अभाव।
सिंचाई सुविधाओं का अभावकुछ नहरें बनीं, पर अधिकांश खेती मानसून पर निर्भर रही।
कृषि का वाणिज्यीकरण (Commercialisation of Agriculture)कुछ क्षेत्रों में नकदी फसलों (Cash Crops) — जैसे नील, कपास, पटसन (जूट) — की ओर झुकाव हुआ, पर इनका लाभ किसानों को नहीं, ब्रिटिश उद्योगों और व्यापारियों को मिला; खाद्यान्न उत्पादन प्रभावित हुआ।
देश का विभाजन (1947)पटसन उत्पादक बड़ा क्षेत्र पूर्वी पाकिस्तान (आज बांग्लादेश) में चला गया, जबकि अधिकांश पटसन मिलें भारत में रह गईं; इसी प्रकार सिंचित गेहूँ और कपास उत्पादक क्षेत्रों का बड़ा भाग पश्चिमी पाकिस्तान में चला गया।
ध्यान दें — नील की खेती

ब्रिटिश शासन में कई किसानों को नील (Indigo) उगाने के लिए विवश किया गया, क्योंकि ब्रिटेन के वस्त्र उद्योग को रंग की आवश्यकता थी। इससे खाद्यान्न की खेती घटी और किसान कर्ज़ में डूबे। बिहार का चंपारण सत्याग्रह (1917), जिसका नेतृत्व महात्मा गांधी ने किया, इसी शोषण के विरुद्ध था।

4. औद्योगिक क्षेत्रक

कृषि की तरह औपनिवेशिक काल में भारत एक मज़बूत औद्योगिक आधार भी विकसित नहीं कर पाया। इस काल की दो प्रमुख प्रवृत्तियाँ थीं:

(क) हस्तशिल्प उद्योगों का पतन — विऔद्योगीकरण (De-industrialisation)

विश्व प्रसिद्ध भारतीय हस्तशिल्प उद्योग धीरे-धीरे नष्ट हो गए। इसके पीछे औपनिवेशिक सरकार के दोहरे उद्देश्य थे:

  1. भारत को ब्रिटेन के आधुनिक उद्योगों के लिए कच्चे माल का निर्यातक बनाना;
  2. ब्रिटेन के तैयार माल के लिए भारत को एक विशाल बाज़ार में बदलना।

ब्रिटेन में मशीनों से बना सस्ता कपड़ा भारत में बिना किसी रोक-टोक के आने लगा, जबकि भारतीय वस्तुओं के निर्यात पर भारी शुल्क लगाए गए। परिणामस्वरूप भारत के कारीगर बेरोज़गार हो गए। उनके पास कोई वैकल्पिक रोज़गार नहीं था, इसलिए वे खेती की ओर लौटे, जिससे कृषि पर जनसंख्या का दबाव और बढ़ा।

(ख) आधुनिक उद्योगों की धीमी शुरुआत

  • उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्ध में आधुनिक उद्योग स्थापित होने लगे, पर उनकी प्रगति बहुत धीमी रही।
  • प्रारंभ में सूती वस्त्र मिलें मुख्यतः भारतीयों द्वारा देश के पश्चिमी भागों — महाराष्ट्र और गुजरात — में स्थापित की गईं।
  • पटसन (जूट) मिलें मुख्यतः विदेशियों द्वारा बंगाल में स्थापित की गईं।
  • बीसवीं सदी के आरंभ में लोहा और इस्पात उद्योग शुरू हुआ — टाटा आयरन एंड स्टील कंपनी (TISCO) की स्थापना 1907 में हुई।
  • द्वितीय विश्व युद्ध के बाद चीनी, सीमेंट, कागज़ आदि कुछ उद्योग विकसित हुए।
औद्योगिक विकास की कमियाँ
  • पूँजीगत वस्तु उद्योग (Capital Goods Industry) — यानी मशीनें और औज़ार बनाने वाले उद्योग — लगभग नहीं थे, जो भविष्य के औद्योगीकरण के लिए अनिवार्य हैं।
  • नए उद्योगों की वृद्धि दर बहुत कम थी और सकल घरेलू उत्पाद (GDP) में उनका योगदान बहुत छोटा था।
  • सार्वजनिक क्षेत्रक (Public Sector) का दायरा बहुत सीमित था — मुख्यतः रेलवे, विद्युत उत्पादन, संचार, बंदरगाह और कुछ विभागीय उपक्रम।

5. विदेशी व्यापार

भारत प्राचीन काल से एक महत्वपूर्ण व्यापारिक देश रहा है। लेकिन औपनिवेशिक सरकार की वस्तु उत्पादन, व्यापार और सीमा शुल्क (Tariff) की प्रतिबंधकारी नीतियों ने भारत के विदेशी व्यापार की संरचना, स्वरूप और आकार को बुरी तरह प्रभावित किया।

पहलूऔपनिवेशिक काल की स्थिति
निर्यात (Exports)प्राथमिक उत्पाद — कच्चा रेशम, कपास, ऊन, चीनी, नील, पटसन आदि
आयात (Imports)ब्रिटेन में बनी उपभोक्ता वस्तुएँ — सूती, रेशमी, ऊनी वस्त्र — और हल्की मशीनें (Capital Goods)
व्यापार पर नियंत्रणब्रिटेन का लगभग एकाधिकार (Monopoly); भारत के निर्यात-आयात का आधे से अधिक भाग ब्रिटेन तक सीमित
व्यापार संतुलनभारत का निर्यात आयात से अधिक — निर्यात अधिशेष (Export Surplus)

बाकी व्यापार चीन, श्रीलंका (सीलोन) और ईरान (फारस) जैसे देशों के साथ होता था। स्वेज़ नहर (1869) के खुलने से ब्रिटेन और भारत के बीच परिवहन लागत और समय दोनों घटे, जिससे ब्रिटेन का भारत के व्यापार पर नियंत्रण और मज़बूत हुआ।

निर्यात अधिशेष और धन का निष्कासन (Drain of Wealth)

सामान्य स्थिति में निर्यात अधिशेष से देश में सोना-चाँदी या विदेशी मुद्रा आनी चाहिए थी। लेकिन भारत का यह अधिशेष देश के काम नहीं आया। इसका उपयोग ब्रिटेन में औपनिवेशिक सरकार द्वारा स्थापित कार्यालयों के खर्च, ब्रिटिश सरकार के युद्धों के खर्च तथा अदृश्य मदों (Invisible Items) — जैसे सेवाओं के भुगतान — के आयात पर किया गया। इस प्रकार भारत की संपत्ति का लगातार बाहर जाना "धन का निष्कासन" कहलाया, जिस पर दादाभाई नौरोजी ने विशेष रूप से ध्यान दिलाया।

6. जनांकिकीय परिस्थिति

ब्रिटिश भारत की जनसंख्या के विस्तृत आँकड़े सबसे पहले 1881 की जनगणना (Census) में एकत्र किए गए। उस समय भारत की जनसंख्या की वृद्धि असमान थी। 1921 से पहले भारत जनांकिकीय संक्रमण (Demographic Transition) की पहली अवस्था में था; 1921 के बाद दूसरी अवस्था आरंभ हुई। इसीलिए 1921 को "महाविभाजन वर्ष" (Year of Great Divide) कहा जाता है — इसके बाद जनसंख्या लगातार बढ़ने लगी।

सूचक (Indicator)औपनिवेशिक काल / स्वतंत्रता के आसपास
कुल साक्षरता दर (Literacy Rate)16 प्रतिशत से भी कम
महिला साक्षरता दरलगभग 7 प्रतिशत
शिशु मृत्यु दर (Infant Mortality Rate)प्रति 1000 जीवित जन्मों पर लगभग 218
जीवन प्रत्याशा (Life Expectancy)लगभग 32 वर्ष

इन आँकड़ों के साथ-साथ जन-स्वास्थ्य सुविधाएँ आम जनता को उपलब्ध नहीं थीं, और जहाँ उपलब्ध थीं, वहाँ अपर्याप्त थीं। जल और वायु से फैलने वाली बीमारियों का प्रकोप था और ये बीमारियाँ बड़ी संख्या में लोगों की जान लेती थीं। व्यापक गरीबी (Poverty) के कारण स्थिति और खराब थी।

साक्षरता (%)<16 महिला साक्षरता (%)~7 जीवन प्रत्याशा (वर्ष)~32 पैमाना: 1 इकाई = 6 पिक्सेल
स्वतंत्रता के आसपास के कुछ सामाजिक संकेतक — विकास की चुनौतियाँ कितनी बड़ी थीं।

7. व्यावसायिक संरचना

व्यावसायिक संरचना (Occupational Structure) का अर्थ है — विभिन्न उद्योगों और क्षेत्रकों में कार्यबल (Workforce) का वितरण। औपनिवेशिक काल में यह संरचना लगभग स्थिर रही:

क्षेत्रककार्यबल का अनुमानित हिस्सा
कृषि (Agriculture)लगभग 70–75 प्रतिशत
विनिर्माण (Manufacturing)लगभग 10 प्रतिशत
सेवाएँ (Services)लगभग 15–20 प्रतिशत
कृषि~70–75%
विनिर्माण~10%
सेवाएँ~15–20%

एक उल्लेखनीय तथ्य क्षेत्रीय विषमता (Regional Variation) का था। तत्कालीन मद्रास प्रेसीडेंसी के कुछ भागों, बंबई और बंगाल में कार्यबल की कृषि पर निर्भरता घटी और विनिर्माण तथा सेवाओं का हिस्सा बढ़ा। वहीं उड़ीसा, राजस्थान और पंजाब जैसे राज्यों में कृषि में लगे कार्यबल का अनुपात बढ़ा।

8. आधारिक संरचना

औपनिवेशिक शासन में रेलवे, बंदरगाह, जल परिवहन, डाक और तार (Posts and Telegraphs) जैसी आधारिक संरचना का विकास हुआ। लेकिन इसका मुख्य उद्देश्य जनता को सुविधाएँ देना नहीं, बल्कि औपनिवेशिक हितों की पूर्ति था।

  • सड़कें: मुख्य रूप से सेना की आवाजाही और कच्चे माल को रेलवे स्टेशनों या बंदरगाहों तक पहुँचाने के लिए बनाई गईं। ग्रामीण क्षेत्रों तक सभी मौसम में चलने वाली सड़कें बहुत कम थीं, जिससे वर्षा ऋतु और प्राकृतिक आपदाओं में गाँवों का संपर्क टूट जाता था।
  • रेलवे: भारत में रेल सेवा 1850 के दशक में शुरू हुई (पहली यात्री रेल 1853 में बंबई और ठाणे के बीच)। रेलवे ने लोगों को लंबी दूरी की यात्रा करने और भौगोलिक-सांस्कृतिक बाधाएँ तोड़ने में मदद की तथा कृषि के वाणिज्यीकरण को बढ़ावा दिया। लेकिन इससे भारत के निर्यात को ब्रिटेन के हित में बढ़ावा मिला और गाँवों की आत्मनिर्भरता टूटी।
  • जल परिवहन: आंतरिक जलमार्ग विकसित करने के प्रयास हुए, पर कई मामलों में वे अलाभकारी सिद्ध हुए (जैसे ओडिशा तट की नहर, जो रेलवे से प्रतिस्पर्धा में टिक नहीं सकी)।
  • डाक-तार: विद्युत तार व्यवस्था का मुख्य उद्देश्य कानून और व्यवस्था बनाए रखना था; डाक सेवाएँ उपयोगी होते हुए भी अपर्याप्त थीं।
भारत ब्रिटेन कच्चा माल (कपास, पटसन, नील) तैयार माल (वस्त्र, मशीनें) निर्यात अधिशेष → धन का निष्कासन
औपनिवेशिक व्यापार का स्वरूप: भारत कच्चा माल देने वाला और तैयार माल खरीदने वाला बना दिया गया।

9. क्या औपनिवेशिक शासन के कुछ सकारात्मक प्रभाव भी थे?

निष्पक्ष विश्लेषण के लिए यह भी मानना होगा कि कुछ परिवर्तन — भले ही अनचाहे रूप में — आगे चलकर उपयोगी सिद्ध हुए: रेलवे नेटवर्क, बंदरगाह, डाक-तार, आधुनिक बैंकिंग की शुरुआत, और राष्ट्रीय एकता की भावना को मज़बूत करने वाले संचार साधन। फिर भी इनका निर्माण भारत के विकास के लिए नहीं, ब्रिटिश हितों के लिए हुआ था, और इनकी कीमत भारत ने भारी शोषण के रूप में चुकाई।

10. स्वतंत्रता के समय की चुनौतियाँ — निष्कर्ष

स्वतंत्रता के समय भारत की अर्थव्यवस्था की विशेषताएँ संक्षेप में इस प्रकार थीं: गतिहीन और पिछड़ी कृषि; खाद्यान्न की कमी; हस्तशिल्प का पतन और कमज़ोर आधुनिक उद्योग; पूँजीगत वस्तु उद्योग का अभाव; ब्रिटेन पर निर्भर विदेशी व्यापार; व्यापक गरीबी, बेरोज़गारी, निरक्षरता और खराब स्वास्थ्य; और सीमित आधारिक संरचना। स्वतंत्र भारत के नीति-निर्माताओं के सामने इन सबको बदलने की विशाल चुनौती थी, जिसके लिए योजनाबद्ध विकास (Planned Development) का मार्ग चुना गया — जिसका अध्ययन आप अगले अध्याय में करेंगे।

11. केस अध्ययन और हल किए गए प्रश्न

केस 1 — कारीगर की कहानी

बंगाल के एक बुनकर परिवार की आय उन्नीसवीं सदी में कैसे बदली होगी?

उत्तर: ब्रिटेन से मशीन-निर्मित सस्ता कपड़ा आने से बुनकर का हाथ से बना कपड़ा महँगा और कम प्रतिस्पर्धी हो गया; निर्यात पर शुल्क ने विदेशी बाज़ार भी छीन लिए। परिवार का पारंपरिक रोज़गार खत्म हुआ और उसे खेतिहर मज़दूरी करनी पड़ी — यह विऔद्योगीकरण का प्रत्यक्ष उदाहरण है।

केस 2 — निर्यात अधिशेष का रहस्य

यदि भारत का निर्यात आयात से अधिक था, तो देश समृद्ध क्यों नहीं हुआ?

उत्तर: क्योंकि अधिशेष का उपयोग भारत में निवेश के लिए नहीं, बल्कि ब्रिटिश प्रशासनिक खर्च, युद्धों के खर्च और अदृश्य मदों के भुगतान के लिए हुआ। धन देश से बाहर चला गया।

12. मास्टर तालिका : प्रमुख शब्दावली और तथ्य

शब्द / तथ्यअर्थ / विवरण
औपनिवेशिक अर्थव्यवस्थाउपनिवेश (भारत) शासक देश (ब्रिटेन) के हित में संचालित
विऔद्योगीकरण (De-industrialisation)पारंपरिक हस्तशिल्प उद्योगों का पतन
ज़मींदारी व्यवस्थास्थायी बंदोबस्त (1793); लगान ज़मींदार के माध्यम से
कृषि का वाणिज्यीकरणबाज़ार में बिक्री के लिए नकदी फसलों की खेती
धन का निष्कासन (Drain of Wealth)भारत की संपत्ति का ब्रिटेन की ओर प्रवाह (दादाभाई नौरोजी)
महाविभाजन वर्ष1921 — इसके बाद जनसंख्या में सतत वृद्धि
पहली जनगणना1881
TISCO1907 में स्थापित
स्वेज़ नहर1869 में खुली
व्यावसायिक संरचनाकृषि ~70–75%, विनिर्माण ~10%, सेवाएँ ~15–20%

13. मास्टर सारांश तालिका

क्षेत्रमुख्य स्थितिमुख्य कारण
राष्ट्रीय आयवृद्धि दर <2%; प्रति व्यक्ति ~0.5%औपनिवेशिक शोषण
कृषिगतिहीनता, कम उत्पादकताज़मींदारी, कम तकनीक, सिंचाई का अभाव
उद्योगहस्तशिल्प का पतन; कमज़ोर आधुनिक उद्योगब्रिटिश नीति, पूँजीगत उद्योग का अभाव
विदेशी व्यापारकच्चा माल निर्यात, तैयार माल आयातब्रिटेन का एकाधिकार
जनांकिकीकम साक्षरता, ऊँची मृत्यु दरगरीबी, स्वास्थ्य सुविधाओं का अभाव
आधारिक संरचनारेलवे, सड़कें, बंदरगाहऔपनिवेशिक हितों के लिए

14. माइंड मैप

स्वतंत्रता की पूर्व संध्या पर भारतीय अर्थव्यवस्था
कृषि
  • ज़मींदारी, गतिहीनता
  • वाणिज्यीकरण
उद्योग
  • विऔद्योगीकरण
  • TISCO 1907
व्यापार
  • कच्चा माल बाहर
  • धन का निष्कासन
समाज
  • 1921 महाविभाजन
  • साक्षरता <16%

15. टिप्स और ट्रिक्स

स्मार्ट तरीके
  • हर क्षेत्रक के उत्तर में "ब्रिटिश उद्देश्य" जोड़ें — कच्चा माल लेना और तैयार माल बेचना।
  • वर्ष याद रखें: 1793 (स्थायी बंदोबस्त), 1853 (पहली रेल), 1869 (स्वेज़), 1881 (जनगणना), 1907 (TISCO), 1921 (महाविभाजन)।
  • "निर्यात अधिशेष होते हुए भी गरीबी" वाले प्रश्न में धन का निष्कासन अवश्य लिखें।
आम गलतियाँ
  • यह लिखना कि रेलवे भारत के विकास के लिए बनाई गई — मुख्य उद्देश्य औपनिवेशिक था।
  • पटसन मिलें भारतीयों द्वारा बंगाल में — गलत; पटसन मिलें मुख्यतः विदेशियों ने स्थापित कीं।
  • 1921 को जनसंख्या घटने का वर्ष समझना — इसके बाद जनसंख्या लगातार बढ़ी।

16. महत्वपूर्ण वन-लाइनर

  • औपनिवेशिक शासन में भारत ब्रिटेन के लिए कच्चे माल का स्रोत और तैयार माल का बाज़ार बना।
  • वी.के.आर.वी. राव के राष्ट्रीय आय अनुमान औपनिवेशिक काल में महत्वपूर्ण माने जाते हैं।
  • लगभग 85% जनसंख्या गाँवों में रहती थी।
  • स्थायी बंदोबस्त (ज़मींदारी) बंगाल में 1793 में लागू हुआ।
  • सूती वस्त्र मिलें पश्चिम भारत में भारतीयों ने, पटसन मिलें बंगाल में विदेशियों ने लगाईं।
  • TISCO की स्थापना 1907 में हुई।
  • भारत के व्यापार का आधे से अधिक भाग ब्रिटेन के साथ था।
  • 1921 को "महाविभाजन वर्ष" कहते हैं।
  • स्वतंत्रता के समय जीवन प्रत्याशा लगभग 32 वर्ष थी।

17. परीक्षा-पैटर्न प्रश्न (विस्तृत उत्तर सहित)

प्र1आसान

भारत में पहली जनगणना किस वर्ष हुई?

  1. 1851
  2. 1881
  3. 1901
  4. 1921
उत्तर देखें

ब्रिटिश भारत की जनसंख्या के विस्तृत आँकड़े पहली बार 1881 की जनगणना में एकत्र किए गए। 1921 महाविभाजन वर्ष है, पहली जनगणना नहीं।

उत्तर: (ख) 1881

प्र2आसान

टाटा आयरन एंड स्टील कंपनी (TISCO) की स्थापना कब हुई?

उत्तर देखें

1907 में; यह भारत में आधुनिक इस्पात उद्योग की शुरुआत थी।

उत्तर: 1907

प्र3आसान

व्यावसायिक संरचना से क्या अभिप्राय है?

उत्तर देखें

विभिन्न क्षेत्रकों — कृषि, विनिर्माण और सेवाएँ — में कार्यबल का वितरण।

उत्तर: क्षेत्रकों में कार्यबल का वितरण

प्र4मध्यम

औपनिवेशिक काल में कृषि की गतिहीनता के मुख्य कारण बताइए।

उत्तर देखें

(1) ज़मींदारी व्यवस्था — लाभ ज़मींदारों को, किसानों को नहीं; (2) कठोर लगान वसूली; (3) निम्न तकनीक और उर्वरकों का कम प्रयोग; (4) सिंचाई का अभाव; (5) नकदी फसलों पर ज़ोर, जिसका लाभ ब्रिटिश उद्योगों को मिला; (6) विभाजन से उपजाऊ क्षेत्रों का पाकिस्तान में जाना।

उत्तर: ज़मींदारी, निम्न तकनीक, सिंचाई का अभाव, वाणिज्यीकरण

प्र5मध्यम

विऔद्योगीकरण (De-industrialisation) के पीछे ब्रिटिश सरकार के दोहरे उद्देश्य क्या थे?

उत्तर देखें

(1) भारत को ब्रिटेन के उद्योगों के लिए कच्चे माल का निर्यातक बनाना; (2) भारत को ब्रिटेन के तैयार माल का बड़ा बाज़ार बनाना। इन उद्देश्यों से भारतीय हस्तशिल्प नष्ट हुए।

उत्तर: कच्चा माल लेना और तैयार माल बेचना

प्र6मध्यम

1921 को "महाविभाजन वर्ष" क्यों कहा जाता है?

उत्तर देखें

1921 से पहले भारत जनांकिकीय संक्रमण की पहली अवस्था में था, जिसमें जन्म और मृत्यु दोनों ऊँचे थे और जनसंख्या में वृद्धि अनियमित थी। 1921 के बाद मृत्यु दर घटने लगी और जनसंख्या लगातार बढ़ने लगी — दूसरी अवस्था शुरू हुई।

उत्तर: इसके बाद जनसंख्या में सतत वृद्धि की अवस्था शुरू हुई

प्र7मध्यम

औपनिवेशिक काल में भारत के विदेशी व्यापार की संरचना का वर्णन कीजिए।

उत्तर देखें

भारत कच्चे माल (कच्चा रेशम, कपास, ऊन, चीनी, नील, पटसन) का निर्यातक और ब्रिटेन में बनी उपभोक्ता वस्तुओं व हल्की मशीनों का आयातक बना। व्यापार पर ब्रिटेन का एकाधिकार था और आधे से अधिक व्यापार ब्रिटेन के साथ होता था। स्वेज़ नहर (1869) ने इस नियंत्रण को और मज़बूत किया।

उत्तर: कच्चा माल निर्यात, तैयार माल आयात, ब्रिटेन का एकाधिकार

प्र8मध्यम

स्वतंत्रता के समय भारत के सार्वजनिक क्षेत्रक का कार्यक्षेत्र क्या था?

उत्तर देखें

सार्वजनिक क्षेत्रक बहुत सीमित था — मुख्यतः रेलवे, विद्युत उत्पादन, संचार, बंदरगाह और कुछ विभागीय उपक्रम।

उत्तर: रेलवे, बिजली, संचार, बंदरगाह तक सीमित

प्र9कठिन

"भारत का निर्यात अधिशेष देश की समृद्धि का कारण नहीं बन सका।" विवेचना कीजिए।

उत्तर देखें

निर्यात अधिशेष से सामान्यतः विदेशी मुद्रा या सोना-चाँदी आता है, जिसका उपयोग विकास में हो सकता है। लेकिन भारत के अधिशेष का उपयोग ब्रिटेन में स्थित औपनिवेशिक कार्यालयों के खर्च, ब्रिटिश युद्धों के खर्च और अदृश्य मदों (सेवाओं) के भुगतान में हुआ। इस प्रकार संपत्ति भारत से बाहर चली गई — इसे धन का निष्कासन कहा गया। परिणामस्वरूप भारत में न निवेश बढ़ा, न आय। साथ ही निर्यात के लिए नकदी फसलों पर ज़ोर से खाद्यान्न सुरक्षा भी कमज़ोर हुई।

उत्तर: अधिशेष धन के निष्कासन में चला गया, देश में निवेश नहीं हुआ

प्र10कठिन

औपनिवेशिक काल में भारत में विकसित आधारिक संरचना के उद्देश्य और प्रभावों का आलोचनात्मक मूल्यांकन कीजिए।

उत्तर देखें

उद्देश्य: सेना की आवाजाही, कच्चे माल को बंदरगाहों तक पहुँचाना, ब्रिटिश माल को आंतरिक बाज़ारों तक ले जाना और प्रशासन/कानून-व्यवस्था बनाए रखना। प्रभाव: रेलवे से यात्रा आसान हुई, भौगोलिक-सांस्कृतिक बाधाएँ टूटीं और कृषि का वाणिज्यीकरण हुआ; पर इससे गाँवों की आत्मनिर्भरता टूटी और निर्यात ब्रिटिश हित में बढ़ा। ग्रामीण सड़कें बहुत कम थीं; कुछ जलमार्ग अलाभकारी रहे। अतः आधारिक संरचना से कुछ स्थायी लाभ तो हुए, पर उनका मूल उद्देश्य भारत का विकास नहीं था।

उत्तर: औपनिवेशिक हितों के लिए बनी; कुछ अनचाहे लाभ भी हुए

प्र11कठिन

औपनिवेशिक काल में व्यावसायिक संरचना में क्षेत्रीय विषमता को स्पष्ट कीजिए।

उत्तर देखें

पूरे देश में कृषि पर लगभग 70–75% कार्यबल निर्भर था, पर क्षेत्रवार अंतर थे। मद्रास प्रेसीडेंसी के कुछ भागों, बंबई और बंगाल में औद्योगिक-वाणिज्यिक गतिविधियों के कारण कृषि पर निर्भरता घटी और विनिर्माण व सेवाओं का हिस्सा बढ़ा। उड़ीसा, राजस्थान और पंजाब में कृषि पर निर्भर कार्यबल का अनुपात बढ़ा। इससे क्षेत्रीय असमानता बढ़ी।

उत्तर: कुछ प्रांतों में कृषि-निर्भरता घटी, कुछ में बढ़ी

प्र12कठिन

स्वतंत्रता के समय भारत के सामने कौन-सी प्रमुख आर्थिक चुनौतियाँ थीं? स्वतंत्र भारत की नीतियाँ इनसे कैसे जुड़ी थीं?

उत्तर देखें

चुनौतियाँ: गतिहीन कृषि और खाद्यान्न की कमी, हस्तशिल्प का पतन व कमज़ोर उद्योग, पूँजीगत वस्तु उद्योग का अभाव, ब्रिटेन पर निर्भर व्यापार, व्यापक गरीबी, बेरोज़गारी, निरक्षरता और खराब स्वास्थ्य, सीमित आधारिक संरचना। इनके उत्तर में स्वतंत्र भारत ने भूमि सुधार, हरित क्रांति, भारी उद्योगों और सार्वजनिक क्षेत्रक का विस्तार, आयात प्रतिस्थापन और शिक्षा-स्वास्थ्य में निवेश के साथ योजनाबद्ध विकास का मार्ग अपनाया।

उत्तर: पिछड़ी कृषि, कमज़ोर उद्योग, गरीबी — जिनका समाधान योजनाबद्ध विकास से खोजा गया

18. त्वरित पुनरावृत्ति सारांश

2 मिनट में दोहराएँ
  • ब्रिटिश नीतियाँ ब्रिटेन के उद्योगों के हित में थीं; भारत कच्चे माल का स्रोत और तैयार माल का बाज़ार बना।
  • राष्ट्रीय उत्पादन वृद्धि <2%, प्रति व्यक्ति ~0.5% प्रति वर्ष; वी.के.आर.वी. राव के अनुमान प्रमुख।
  • कृषि: ज़मींदारी, कम तकनीक, सिंचाई का अभाव, वाणिज्यीकरण, विभाजन का प्रभाव।
  • उद्योग: विऔद्योगीकरण; सूती (पश्चिम), पटसन (बंगाल), TISCO 1907; पूँजीगत उद्योग का अभाव।
  • व्यापार: ब्रिटेन का एकाधिकार; निर्यात अधिशेष → धन का निष्कासन।
  • जनांकिकी: 1881 जनगणना, 1921 महाविभाजन; साक्षरता <16%, जीवन प्रत्याशा ~32 वर्ष।
  • व्यावसायिक संरचना: कृषि ~70–75%; आधारिक संरचना औपनिवेशिक हितों के लिए।