Class 11 Economics · Chapter 2 · भारतीय अर्थव्यवस्था का विकास

भारतीय अर्थव्यवस्था (1950-1990)

पंचवर्षीय योजनाओं के लक्ष्य, कृषि में भूमि सुधार और हरित क्रांति, उद्योग नीति और आयात प्रतिस्थापन।

NCERT भारतीय अर्थव्यवस्था का विकास + अर्थशास्त्र में सांख्यिकीCBSE Class 11 19 min read

1. अध्याय एक नज़र में

स्वतंत्रता के बाद भारत के नेताओं के सामने सबसे बड़ा प्रश्न था — देश के लिए कौन-सी आर्थिक प्रणाली (Economic System) अपनाई जाए? क्या सब कुछ बाज़ार पर छोड़ दिया जाए, जैसा पूँजीवादी देशों में होता है, या सरकार उत्पादन और वितरण का नियंत्रण अपने हाथ में ले, जैसा समाजवादी देशों में था? भारत ने बीच का रास्ता चुना — मिश्रित अर्थव्यवस्था (Mixed Economy), जिसमें सार्वजनिक और निजी दोनों क्षेत्रकों की भूमिका हो, और विकास को पंचवर्षीय योजनाओं (Five Year Plans) के माध्यम से दिशा दी जाए।

यह अध्याय 1950 से 1990 तक के चार दशकों का अध्ययन करता है — योजनाओं के लक्ष्य, कृषि में भूमि सुधार और हरित क्रांति, उद्योगों में सार्वजनिक क्षेत्रक की प्रमुख भूमिका, औद्योगिक लाइसेंस नीति, लघु उद्योगों का संरक्षण, और आयात प्रतिस्थापन (Import Substitution) की व्यापार नीति। साथ ही यह भी देखेंगे कि इन नीतियों की उपलब्धियाँ क्या थीं और किन कमियों के कारण 1991 में बड़े आर्थिक सुधार आवश्यक हो गए।

इस अध्याय में आप सीखेंगे
  • पूँजीवादी, समाजवादी और मिश्रित अर्थव्यवस्था की विशेषताएँ।
  • योजना आयोग, योजना का अर्थ और पंचवर्षीय योजनाओं के चार लक्ष्य।
  • भूमि सुधार, हरित क्रांति और कृषि सहायिकी (Subsidy) पर बहस।
  • औद्योगिक नीति प्रस्ताव 1956, सार्वजनिक क्षेत्रक, लाइसेंस नीति और लघु उद्योग।
  • आयात प्रतिस्थापन की व्यापार नीति और उसका प्रभाव।
  • 1950–1990 की नीतियों का मूल्यांकन।

2. आर्थिक प्रणालियाँ और भारत का चुनाव

हर समाज को तीन केंद्रीय प्रश्नों के उत्तर देने होते हैं: क्या उत्पादन करें, कैसे उत्पादन करें और किसके लिए उत्पादन करें। इन प्रश्नों के उत्तर देने के ढंग के आधार पर आर्थिक प्रणालियों के तीन रूप हैं:

आधारपूँजीवादी (Capitalist)समाजवादी (Socialist)मिश्रित (Mixed)
निर्णय कौन लेता है?बाज़ार की शक्तियाँ — माँग और पूर्तिसरकारसरकार और बाज़ार दोनों
संसाधनों का स्वामित्वनिजीसरकारी (सामूहिक)निजी और सरकारी दोनों
वितरण का आधारक्रय शक्ति (Purchasing Power)आवश्यकताबाज़ार के साथ कल्याणकारी हस्तक्षेप
कमज़ोरीगरीबों की उपेक्षा, असमानताप्रोत्साहन की कमी, अकुशलतादोनों की कुछ कमियाँ आ सकती हैं

प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू सहित अधिकांश नेता समाजवाद के आदर्शों से प्रभावित थे, पर वे पूर्व सोवियत संघ जैसा कठोर नियंत्रित तंत्र नहीं चाहते थे, जहाँ उत्पादन के सभी साधन सरकार के अधीन थे और लोकतांत्रिक अधिकार सीमित थे। इसलिए भारत ने समाजवादी झुकाव वाली मिश्रित अर्थव्यवस्था अपनाई — जहाँ सरकार भारी उद्योगों और आधारिक संरचना में अग्रणी भूमिका निभाए, और निजी क्षेत्रक योजना के ढाँचे के भीतर काम करे।

3. योजना का अर्थ और योजना आयोग

योजना (Planning) का अर्थ

योजना इस बात की व्याख्या है कि किसी देश के संसाधनों का उपयोग किस प्रकार किया जाए। इसमें कुछ सामान्य लक्ष्य और उन्हें निश्चित अवधि में प्राप्त करने के लिए विशिष्ट उद्देश्य तय किए जाते हैं। भारत में योजनाएँ पाँच वर्ष की होती थीं — इसलिए पंचवर्षीय योजनाएँ।

  • योजना आयोग (Planning Commission) की स्थापना 1950 में हुई और प्रधानमंत्री इसके अध्यक्ष होते थे।
  • पहली पंचवर्षीय योजना 1951–56 में लागू हुई।
  • दूसरी योजना (1956–61) की रूपरेखा प्रसिद्ध सांख्यिकीविद् प्रशांत चंद्र महालनोबिस के विचारों पर आधारित थी, जिन्होंने भारी उद्योगों पर ज़ोर दिया। उन्हें भारतीय योजना का एक प्रमुख वास्तुकार माना जाता है; उन्होंने भारतीय सांख्यिकी संस्थान (ISI), कोलकाता की स्थापना भी की।
  • दीर्घकालीन योजना की अवधि लगभग बीस वर्ष की "परिप्रेक्ष्य योजना" (Perspective Plan) के रूप में भी सोची जाती थी, जिसके भीतर पंचवर्षीय योजनाएँ बनती थीं।
  • वर्ष 2015 में योजना आयोग का स्थान नीति आयोग (NITI Aayog) ने ले लिया।

4. पंचवर्षीय योजनाओं के लक्ष्य

योजनाओं के चार प्रमुख लक्ष्य थे — संवृद्धि, आधुनिकीकरण, आत्मनिर्भरता और समानता। हर योजना में इन चारों को समान महत्व नहीं मिल पाता था, क्योंकि संसाधन सीमित थे और कई बार लक्ष्य आपस में टकराते थे।

लक्ष्यअर्थउदाहरण / टिप्पणी
संवृद्धि (Growth)देश में वस्तुओं और सेवाओं के उत्पादन की क्षमता में वृद्धि — सकल घरेलू उत्पाद (GDP) में निरंतर वृद्धिअधिक पूँजी, बेहतर परिवहन, बैंकिंग, कुशल श्रम
आधुनिकीकरण (Modernisation)नई प्रौद्योगिकी (Technology) अपनाना और सामाजिक दृष्टिकोण में परिवर्तननए बीज, मशीनें; महिलाओं को समान अधिकार और कार्य में भागीदारी
आत्मनिर्भरता (Self-reliance)उन वस्तुओं के आयात से बचना जिन्हें देश में बनाया जा सकता है, विशेषकर खाद्यान्नविदेशी निर्भरता से राजनीतिक स्वतंत्रता पर खतरा
समानता (Equity)संवृद्धि का लाभ गरीबों तक पहुँचे; आय और संपत्ति की असमानता घटेभोजन, आवास, शिक्षा, स्वास्थ्य सबके लिए
GDP की संरचना पर ध्यान

GDP तीन क्षेत्रकों से बनता है — कृषि, उद्योग और सेवा। विकसित देशों में आम तौर पर सेवा क्षेत्रक का योगदान सबसे अधिक होता है। 1950 में भारत के GDP में कृषि का योगदान सबसे अधिक था। योजनाओं का एक उद्देश्य इस संरचना को बदलकर उद्योग और सेवाओं का हिस्सा बढ़ाना था।

लक्ष्यों में टकराव (Conflict of Goals)

आधुनिक तकनीक (मशीनें) अपनाने से उत्पादकता बढ़ती है (संवृद्धि और आधुनिकीकरण), पर कई बार कम श्रमिकों की आवश्यकता होती है, जिससे रोज़गार घट सकता है (समानता पर प्रभाव)। इसलिए नीति-निर्माताओं को संतुलन बनाना पड़ता है।

5. कृषि : भूमि सुधार

औपनिवेशिक शासन के दौरान कृषि में न संवृद्धि हुई, न समानता। भूमि का स्वामित्व कुछ ज़मींदारों और जागीरदारों के हाथ में था, जबकि वास्तविक खेती करने वाले काश्तकार (Tenants) शोषित थे। नीति-निर्माताओं ने भूमि सुधार (Land Reforms) पर विशेष ध्यान दिया, ताकि भूमि का स्वामित्व वास्तविक जोतने वाले को मिले — "जोतने वाले को भूमि" (Land to the Tiller)।

सुधारउद्देश्यपरिणाम
बिचौलियों (Intermediaries) का उन्मूलनज़मींदारी प्रथा समाप्त कर काश्तकारों को सीधे राज्य से जोड़नालगभग दो करोड़ काश्तकार सीधे सरकार के संपर्क में आए; पर कई ज़मींदारों ने कानून की खामियों का लाभ उठाकर ज़मीनें बचाईं
भू-सीमा निर्धारण (Land Ceiling)किसी व्यक्ति के पास अधिकतम भूमि की सीमा तय कर अतिरिक्त भूमि भूमिहीनों में बाँटनाकई राज्यों में बड़े भूस्वामियों ने कानूनी चुनौतियों और भूमि को रिश्तेदारों के नाम करने जैसे तरीकों से इसे विफल किया
काश्तकारी सुधार (Tenancy Reforms)लगान का नियमन, काश्तकारों को पट्टे की सुरक्षा, स्वामित्व का अधिकारकेरल और पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में अपेक्षाकृत सफल, जहाँ सरकारें "जोतने वाले को भूमि" के प्रति प्रतिबद्ध थीं

स्वामित्व मिलने से किसान खेती में सुधार और निवेश के लिए प्रोत्साहित होते हैं, क्योंकि लाभ उन्हीं को मिलता है। लेकिन कुल मिलाकर भूमि सुधार देश के अधिकांश भागों में अपेक्षित सफलता नहीं पा सके।

6. हरित क्रांति (Green Revolution)

स्वतंत्रता के समय देश की लगभग 75 प्रतिशत जनसंख्या कृषि पर निर्भर थी, पर उत्पादकता बहुत कम थी और खाद्यान्नों का आयात करना पड़ता था। कृषि मानसून पर निर्भर थी। इस स्थिति को बदलने में हरित क्रांति की बड़ी भूमिका रही।

हरित क्रांति का अर्थ

उच्च उत्पादकता वाली किस्मों (High Yielding Varieties — HYV) के बीजों के प्रयोग से खाद्यान्नों, विशेषकर गेहूँ और चावल, के उत्पादन में हुई बड़ी वृद्धि को हरित क्रांति कहा जाता है। HYV बीजों के साथ उर्वरक, कीटनाशक और नियमित सिंचाई की पर्याप्त मात्रा भी आवश्यक थी।

  • पहला चरण (लगभग 1960 के दशक के मध्य से 1970 के दशक के मध्य तक): HYV बीजों का प्रयोग मुख्यतः पंजाब, आंध्र प्रदेश और तमिलनाडु जैसे समृद्ध राज्यों तक सीमित रहा; सबसे अधिक लाभ गेहूँ उगाने वाले क्षेत्रों को मिला।
  • दूसरा चरण (1970 के दशक के मध्य से 1980 के दशक के मध्य तक): HYV तकनीक अधिक राज्यों और अधिक फसलों तक फैली।
  • परिणाम: भारत खाद्यान्नों में आत्मनिर्भर बना और आयात पर निर्भरता घटी।

विपणित अधिशेष (Marketed Surplus)

किसान अपने उत्पादन का जो भाग बाज़ार में बेचता है, उसे विपणित अधिशेष कहते हैं। हरित क्रांति से छोटे और बड़े, दोनों प्रकार के किसानों ने अच्छा अधिशेष बेचा। इससे खाद्यान्नों की कीमतें उपभोग की अन्य वस्तुओं की तुलना में घटीं, जिसका लाभ निम्न आय वर्ग को मिला, क्योंकि वे अपनी आय का बड़ा भाग भोजन पर खर्च करते हैं। सरकार भी पर्याप्त खाद्यान्न खरीदकर बफ़र स्टॉक (Buffer Stock) बना सकी, जिसका उपयोग कमी के समय किया जाता है।

हरित क्रांति के जोखिम और सरकार की भूमिका

आशंकासरकार का कदम
केवल बड़े किसान लाभ उठाएँगे, असमानता बढ़ेगीछोटे किसानों को कम ब्याज पर ऋण और उर्वरक-बीजों पर सहायिकी, ताकि वे भी HYV अपना सकें
कीटों के आक्रमण से HYV फसलें नष्ट हो सकती हैंअनुसंधान संस्थानों द्वारा किसानों को परामर्श और सेवाएँ

कृषि सहायिकी (Subsidy) पर बहस

पक्ष में: नई तकनीक अपनाने के लिए, विशेषकर छोटे किसानों को, सहायिकी आवश्यक है; अधिकांश किसान बहुत गरीब हैं और सहायिकी के बिना आगत नहीं खरीद सकते; सहायिकी हटाने से अमीर-गरीब किसानों की असमानता बढ़ेगी।

विपक्ष में: तकनीक के लाभदायक सिद्ध होने के बाद सहायिकी हटाई जानी चाहिए; उर्वरक सहायिकी का बड़ा लाभ उर्वरक उद्योग और समृद्ध क्षेत्रों के बड़े किसानों को मिलता है; सहायिकी से संसाधनों का अपव्यय (जैसे उर्वरकों और भूजल का अत्यधिक प्रयोग) होता है और सरकार पर बोझ बढ़ता है।

एक विरोधाभास

1950–1990 के बीच कृषि उत्पादन बढ़ा, फिर भी 1990 तक देश की लगभग 65 प्रतिशत जनसंख्या कृषि में लगी रही। अर्थात GDP में कृषि का हिस्सा घटा, पर कृषि पर निर्भर जनसंख्या का अनुपात उतना नहीं घटा — उद्योग और सेवा क्षेत्रक कृषि से निकले श्रमिकों को पर्याप्त रोज़गार नहीं दे पाए।

7. उद्योग और सार्वजनिक क्षेत्रक

स्वतंत्रता के समय भारतीय उद्योगपतियों के पास बड़े उद्योगों में निवेश करने के लिए पर्याप्त पूँजी नहीं थी, और बाज़ार भी इतना बड़ा नहीं था कि बड़ी परियोजनाएँ लाभकारी हों। इसलिए सरकार ने औद्योगिक क्षेत्रक, विशेषकर भारी और आधारभूत उद्योगों, के विकास में अग्रणी भूमिका निभाई।

औद्योगिक नीति प्रस्ताव, 1956 (Industrial Policy Resolution, 1956)

इस प्रस्ताव ने उद्योगों को तीन वर्गों में बाँटा:

  1. पहला वर्ग: वे उद्योग जिन पर केवल राज्य का एकाधिकार होगा (जैसे रक्षा उपकरण, परमाणु ऊर्जा, रेलवे)।
  2. दूसरा वर्ग: वे उद्योग जिनमें राज्य नई इकाइयाँ स्थापित करेगा, पर निजी क्षेत्रक भी सहयोग कर सकता है।
  3. तीसरा वर्ग: शेष उद्योग, जो मुख्यतः निजी क्षेत्रक के अधीन रहेंगे।

निजी क्षेत्रक पर औद्योगिक लाइसेंस (Industrial Licensing) के माध्यम से नियंत्रण रखा गया — कोई नया उद्योग लगाने या उत्पादन बढ़ाने के लिए सरकार से लाइसेंस लेना आवश्यक था।

  • क्षेत्रीय समानता: पिछड़े क्षेत्रों में उद्योग लगाने पर लाइसेंस आसानी से दिया जाता था और कर-छूट, सस्ती बिजली जैसी सुविधाएँ मिलती थीं।
  • उत्पादन पर नियंत्रण: लाइसेंस यह भी तय करता था कि किन वस्तुओं का कितना उत्पादन हो, ताकि उत्पादन अर्थव्यवस्था की आवश्यकताओं के अनुरूप रहे।

लघु उद्योग (Small Scale Industry)

1955 में कर्वे समिति (ग्राम और लघु उद्योग समिति) ने ग्रामीण विकास के लिए लघु उद्योगों के उपयोग की संभावना पर ध्यान दिलाया। लघु उद्योग की परिभाषा किसी इकाई की परिसंपत्तियों (Assets) में अधिकतम निवेश की सीमा के आधार पर की जाती थी, और यह सीमा समय-समय पर बदली गई।

  • लघु उद्योग श्रम-गहन (Labour Intensive) होते हैं, इसलिए अधिक रोज़गार देते हैं।
  • इन्हें बड़ी कंपनियों की प्रतिस्पर्धा से बचाने के लिए कुछ वस्तुओं का उत्पादन लघु उद्योगों के लिए आरक्षित किया गया।
  • उन्हें कम उत्पाद शुल्क (Excise Duty) और कम ब्याज पर ऋण जैसी सुविधाएँ दी गईं।

8. व्यापार नीति : आयात प्रतिस्थापन

पहली सात योजनाओं में व्यापार नीति की विशेषता थी — अंतर्मुखी व्यापार नीति (Inward Looking Trade Strategy), जिसे तकनीकी रूप से आयात प्रतिस्थापन (Import Substitution) कहा जाता है। इसका अर्थ है — आयात की जाने वाली वस्तुओं के स्थान पर देश में ही उनका उत्पादन करना। उदाहरण के लिए, विदेश से वाहन आयात करने के बजाय भारत में ही वाहन बनाने वाले उद्योगों को प्रोत्साहित करना।

उपायअर्थ
प्रशुल्क (Tariff)आयातित वस्तुओं पर कर, जिससे वे महँगी हो जाती हैं
कोटा (Quota)आयात की जा सकने वाली वस्तुओं की मात्रा की सीमा

इस नीति का तर्क यह था कि घरेलू उद्योग, जो अभी विकास की प्रारंभिक अवस्था में हैं, विकसित देशों की प्रतिस्पर्धा में टिक नहीं पाएँगे; यदि उन्हें संरक्षण दिया जाए तो वे समय के साथ प्रतिस्पर्धा करना सीख लेंगे। साथ ही विलासिता की वस्तुओं के आयात पर विदेशी मुद्रा के अपव्यय से बचना भी उद्देश्य था।

विदेशी वस्तुएँ प्रशुल्क + कोटा घरेलू उद्योग(संरक्षित उत्पादन) आयात प्रतिस्थापन
आयात प्रतिस्थापन में प्रशुल्क और कोटा की "दीवार" घरेलू उद्योगों को विदेशी प्रतिस्पर्धा से बचाती है।

9. औद्योगिक विकास पर नीतियों का प्रभाव — मूल्यांकन

उपलब्धियाँकमियाँ
GDP में उद्योग का हिस्सा बढ़ा; औद्योगिक क्षेत्रक का प्रभावशाली विस्तार हुआकई सार्वजनिक उपक्रम घाटे में चले और संसाधनों पर बोझ बने
उद्योग केवल सूती और पटसन वस्त्रों तक सीमित न रहकर विविध हुए — इलेक्ट्रॉनिक्स, रसायन, मशीनरी आदिलाइसेंस नीति से "लाइसेंस-परमिट राज" बना; बड़े उद्योगपति लाइसेंस पाकर प्रतिस्पर्धियों को रोकते थे
लघु उद्योगों के प्रोत्साहन से उन लोगों को अवसर मिला जिनके पास बड़ी पूँजी नहीं थीसंरक्षण के कारण घरेलू उद्योग प्रतिस्पर्धा से बचे रहे, गुणवत्ता सुधारने का दबाव कम रहा
आयात प्रतिस्थापन ने घरेलू उद्योग को विदेशी प्रतिस्पर्धा से बचायासार्वजनिक क्षेत्रक उन क्षेत्रों में भी बना रहा जहाँ निजी क्षेत्रक बेहतर कर सकता था (जैसे होटल, टेलीकॉम सेवाएँ)

इसी पृष्ठभूमि में यह धारणा मज़बूत हुई कि अब नियंत्रणों को ढीला करने और प्रतिस्पर्धा बढ़ाने की आवश्यकता है। 1991 में यही बदलाव नई आर्थिक नीति के रूप में आया, जिसका अध्ययन आप अगले अध्याय में करेंगे।

10. केस अध्ययन और हल किए गए प्रश्न

केस 1 — टेलीफ़ोन कनेक्शन की प्रतीक्षा

1980 के दशक में कई शहरों में नया टेलीफ़ोन कनेक्शन पाने के लिए वर्षों प्रतीक्षा करनी पड़ती थी। अर्थशास्त्र की दृष्टि से इसका कारण क्या था?

उत्तर: यह सेवा मुख्यतः सरकारी एकाधिकार में थी; प्रतिस्पर्धा के अभाव में आपूर्ति माँग के अनुरूप नहीं बढ़ी। बाद में निजी कंपनियों के आने से आपूर्ति तेज़ी से बढ़ी — यह सार्वजनिक क्षेत्रक के अनावश्यक विस्तार की आलोचना का एक उदाहरण है।

केस 2 — छोटे किसान और हरित क्रांति

एक छोटे किसान के लिए HYV बीज अपनाने में क्या कठिनाइयाँ थीं, और सरकार ने उन्हें कैसे दूर किया?

उत्तर: HYV बीज, उर्वरक, कीटनाशक और सिंचाई महँगे थे और फसल विफल होने का जोखिम था। सरकार ने कम ब्याज पर ऋण, आगतों पर सहायिकी और अनुसंधान संस्थानों द्वारा परामर्श की व्यवस्था की, जिससे छोटे किसान भी लाभ उठा सके।

11. मास्टर तालिका : प्रमुख शब्दावली और तथ्य

शब्द / तथ्यअर्थ / विवरण
मिश्रित अर्थव्यवस्थासरकार और बाज़ार दोनों की भूमिका
योजना आयोग1950; अध्यक्ष — प्रधानमंत्री; 2015 में नीति आयोग
पहली योजना1951–56
योजनाओं के लक्ष्यसंवृद्धि, आधुनिकीकरण, आत्मनिर्भरता, समानता
भूमि सुधारबिचौलियों का उन्मूलन, भू-सीमा, काश्तकारी सुधार
हरित क्रांतिHYV बीज + उर्वरक + सिंचाई → उत्पादन में भारी वृद्धि
विपणित अधिशेषउत्पादन का वह भाग जो किसान बाज़ार में बेचता है
बफ़र स्टॉककमी के समय उपयोग के लिए सरकार द्वारा रखा खाद्यान्न भंडार
IPR 1956उद्योगों का तीन वर्गों में विभाजन; लाइसेंस प्रणाली
कर्वे समिति1955; लघु/ग्राम उद्योगों द्वारा ग्रामीण विकास
आयात प्रतिस्थापनआयात के स्थान पर घरेलू उत्पादन; प्रशुल्क और कोटा

12. मास्टर सारांश तालिका

क्षेत्रनीतिसफलताकमी
कृषिभूमि सुधार, हरित क्रांति, सहायिकीखाद्यान्न में आत्मनिर्भरता, बफ़र स्टॉकभूमि सुधार अधूरे; क्षेत्रीय असमानता
उद्योगसार्वजनिक क्षेत्रक, लाइसेंस, लघु उद्योग संरक्षणविविध औद्योगिक आधारअकुशलता, लाइसेंस राज
व्यापारआयात प्रतिस्थापनघरेलू उद्योग का संरक्षणप्रतिस्पर्धा और गुणवत्ता की कमी

13. माइंड मैप

भारतीय अर्थव्यवस्था 1950–1990
योजना
  • योजना आयोग 1950
  • 4 लक्ष्य
कृषि
  • भूमि सुधार
  • हरित क्रांति
उद्योग
  • IPR 1956
  • लाइसेंस, लघु उद्योग
व्यापार
  • आयात प्रतिस्थापन
  • प्रशुल्क, कोटा

14. टिप्स और ट्रिक्स

स्मार्ट तरीके
  • चार लक्ष्य याद रखें: "सं-आ-आ-स" — संवृद्धि, आधुनिकीकरण, आत्मनिर्भरता, समानता।
  • सहायिकी वाले प्रश्न में दोनों पक्ष लिखें और अंत में संतुलित निष्कर्ष दें।
  • मूल्यांकन वाले प्रश्नों में "उपलब्धि + कमी" की तालिका बनाकर उत्तर लिखें।
आम गलतियाँ
  • हरित क्रांति को सभी फसलों और सभी राज्यों में एक साथ फैला हुआ बताना — शुरुआत में यह गेहूँ और कुछ राज्यों तक सीमित थी।
  • आयात प्रतिस्थापन को निर्यात प्रोत्साहन समझना।
  • भूमि सुधारों को पूर्ण सफल बताना — अधिकांश राज्यों में वे अधूरे रहे।

15. महत्वपूर्ण वन-लाइनर

  • भारत ने समाजवादी झुकाव वाली मिश्रित अर्थव्यवस्था अपनाई।
  • योजना आयोग 1950 में बना; पहली योजना 1951–56।
  • दूसरी योजना महालनोबिस के विचारों पर आधारित थी और भारी उद्योगों पर केंद्रित थी।
  • "जोतने वाले को भूमि" भूमि सुधारों का मूल विचार था।
  • HYV बीजों से हरित क्रांति आई और भारत खाद्यान्न में आत्मनिर्भर बना।
  • औद्योगिक नीति प्रस्ताव 1956 ने उद्योगों को तीन वर्गों में बाँटा।
  • प्रशुल्क और कोटा आयात प्रतिस्थापन के उपकरण थे।

16. परीक्षा-पैटर्न प्रश्न (विस्तृत उत्तर सहित)

प्र1आसान

योजना आयोग की स्थापना कब हुई?

  1. 1947
  2. 1950
  3. 1951
  4. 1956
उत्तर देखें

योजना आयोग 1950 में बना; पहली पंचवर्षीय योजना 1951 में शुरू हुई।

उत्तर: (ख) 1950

प्र2आसान

पंचवर्षीय योजनाओं के चार लक्ष्य लिखिए।

उत्तर देखें

संवृद्धि, आधुनिकीकरण, आत्मनिर्भरता और समानता।

उत्तर: संवृद्धि, आधुनिकीकरण, आत्मनिर्भरता, समानता

प्र3आसान

विपणित अधिशेष क्या है?

उत्तर देखें

किसान द्वारा उत्पादित फसल का वह भाग जो वह बाज़ार में बेचता है।

उत्तर: बाज़ार में बेचा गया उत्पादन का भाग

प्र4मध्यम

आधुनिकीकरण को योजना का लक्ष्य क्यों माना गया? इसमें सामाजिक दृष्टिकोण का क्या स्थान है?

उत्तर देखें

उत्पादन बढ़ाने के लिए नई तकनीक (जैसे नए बीज, मशीनें) अपनाना आवश्यक है। पर आधुनिकीकरण केवल तकनीकी नहीं है; इसमें सामाजिक दृष्टिकोण का बदलना भी शामिल है — जैसे महिलाओं को समान अधिकार और कार्यस्थल पर भागीदारी। आधुनिक समाज महिलाओं की प्रतिभा का उपयोग कर अधिक समृद्ध बनता है।

उत्तर: नई तकनीक + प्रगतिशील सामाजिक दृष्टिकोण (जैसे महिला समानता)

प्र5मध्यम

भूमि सुधार देश के अधिकांश भागों में सफल क्यों नहीं हुए?

उत्तर देखें

बड़े भूस्वामियों ने कानूनों की खामियों का लाभ उठाया, भूमि को रिश्तेदारों और नौकरों के नाम कर दिया, न्यायालयों में चुनौतियाँ दीं, और कई राज्यों में राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी रही। केवल केरल और पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में प्रतिबद्ध सरकारों के कारण उल्लेखनीय सफलता मिली।

उत्तर: कानूनी खामियाँ, भूस्वामियों का विरोध, राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी

प्र6मध्यम

हरित क्रांति से गरीबों को कैसे लाभ हुआ?

उत्तर देखें

उत्पादन और विपणित अधिशेष बढ़ने से खाद्यान्नों की सापेक्ष कीमतें घटीं; गरीब अपनी आय का बड़ा भाग भोजन पर खर्च करते हैं, इसलिए उन्हें लाभ हुआ। सरकार बफ़र स्टॉक बनाकर कमी के समय सस्ता अनाज उपलब्ध करा सकी।

उत्तर: खाद्यान्न सस्ते हुए और बफ़र स्टॉक से खाद्य सुरक्षा बढ़ी

प्र7मध्यम

लघु उद्योगों को संरक्षण क्यों दिया गया?

उत्तर देखें

लघु उद्योग श्रम-गहन होते हैं और अधिक रोज़गार देते हैं; ये बड़ी कंपनियों से प्रतिस्पर्धा नहीं कर सकते। इसलिए कुछ वस्तुओं का उत्पादन उनके लिए आरक्षित किया गया और कम उत्पाद शुल्क व सस्ते ऋण जैसी सुविधाएँ दी गईं।

उत्तर: रोज़गार सृजन और बड़ी कंपनियों से बचाव के लिए

प्र8मध्यम

आयात प्रतिस्थापन से क्या अभिप्राय है? इसके दो उपकरण बताइए।

उत्तर देखें

आयात की जाने वाली वस्तुओं का घरेलू उत्पादन करके उनके आयात को कम करना। उपकरण: प्रशुल्क (आयात पर कर) और कोटा (आयात मात्रा की सीमा)।

उत्तर: घरेलू उत्पादन से आयात का स्थान लेना; प्रशुल्क और कोटा

प्र9कठिन

कृषि सहायिकी के पक्ष और विपक्ष में तर्क दीजिए। आपका निष्कर्ष क्या है?

उत्तर देखें

पक्ष: छोटे और गरीब किसानों को नई तकनीक अपनाने में सहायता; सहायिकी हटाने से असमानता बढ़ेगी। विपक्ष: तकनीक लाभकारी सिद्ध होने के बाद सहायिकी अनावश्यक; बड़ा लाभ उर्वरक उद्योग और समृद्ध किसानों को; संसाधनों का अपव्यय (उर्वरक, भूजल); सरकारी बजट पर बोझ। निष्कर्ष: सहायिकी पूरी तरह हटाने के बजाय उसे लक्षित (Targeted) बनाया जाए ताकि वास्तविक ज़रूरतमंद छोटे किसानों तक पहुँचे।

उत्तर: लक्षित सहायिकी संतुलित समाधान है

प्र10कठिन

"1950–1990 के बीच GDP में कृषि का हिस्सा घटा, पर कृषि पर निर्भर जनसंख्या का अनुपात उतना नहीं घटा।" इसका अर्थ और कारण स्पष्ट कीजिए।

उत्तर देखें

अर्थ: अर्थव्यवस्था की संरचना में परिवर्तन उत्पादन के स्तर पर तो हुआ, पर रोज़गार के स्तर पर नहीं। कारण: उद्योग और सेवा क्षेत्रक, विशेषकर पूँजी-गहन भारी उद्योग, पर्याप्त रोज़गार नहीं दे पाए; इसलिए कृषि से अतिरिक्त श्रमिक बाहर नहीं निकल सके और कृषि में प्रच्छन्न बेरोज़गारी बनी रही।

उत्तर: अन्य क्षेत्रक पर्याप्त रोज़गार नहीं दे सके

प्र11कठिन

स्वतंत्रता के बाद सार्वजनिक क्षेत्रक को उद्योगों में अग्रणी भूमिका क्यों दी गई? क्या यह निर्णय उचित था?

उत्तर देखें

कारण: निजी उद्योगपतियों के पास बड़े उद्योगों के लिए पूँजी नहीं थी; बाज़ार छोटा था; भारी उद्योग और आधारिक संरचना राष्ट्रीय विकास के लिए आवश्यक थे; समाजवादी लक्ष्य — आर्थिक शक्ति का केंद्रीकरण रोकना। मूल्यांकन: प्रारंभिक दशकों में यह निर्णय उचित था, क्योंकि इससे इस्पात, बिजली, भारी मशीनरी जैसे आधारभूत उद्योग खड़े हुए; पर बाद में अनेक उपक्रम अकुशल और घाटे में रहे, और सार्वजनिक क्षेत्रक उन क्षेत्रों में भी बना रहा जहाँ इसकी आवश्यकता नहीं थी।

उत्तर: प्रारंभ में उचित; बाद में सुधार की आवश्यकता

प्र12कठिन

लाइसेंस प्रणाली के उद्देश्य और उसके दुष्परिणामों की विवेचना कीजिए।

उत्तर देखें

उद्देश्य: पिछड़े क्षेत्रों में उद्योग लगाकर क्षेत्रीय समानता लाना और उत्पादन को योजना की प्राथमिकताओं के अनुरूप रखना। दुष्परिणाम: लंबी प्रक्रिया और भ्रष्टाचार ("लाइसेंस-परमिट राज"); बड़े उद्योगपति लाइसेंस लेकर नए प्रतिस्पर्धियों को रोकते थे; प्रतिस्पर्धा और नवाचार घटे; उपभोक्ताओं को कम गुणवत्ता की वस्तुएँ ऊँची कीमत पर मिलीं।

उत्तर: उद्देश्य अच्छे थे, पर परिणामस्वरूप अकुशलता और लाइसेंस राज पैदा हुआ

17. त्वरित पुनरावृत्ति सारांश

2 मिनट में दोहराएँ
  • भारत ने समाजवादी झुकाव वाली मिश्रित अर्थव्यवस्था और योजनाबद्ध विकास अपनाया (योजना आयोग 1950)।
  • लक्ष्य: संवृद्धि, आधुनिकीकरण, आत्मनिर्भरता, समानता — जो कभी-कभी टकराते हैं।
  • कृषि: भूमि सुधार (आंशिक सफलता), हरित क्रांति (HYV), विपणित अधिशेष, बफ़र स्टॉक, सहायिकी बहस।
  • उद्योग: IPR 1956, सार्वजनिक क्षेत्रक, लाइसेंस, लघु उद्योग आरक्षण (कर्वे समिति 1955)।
  • व्यापार: आयात प्रतिस्थापन — प्रशुल्क और कोटा।
  • उपलब्धियाँ बड़ी, पर अकुशलता और लाइसेंस राज ने 1991 के सुधारों की ज़मीन तैयार की।