1. अध्याय एक नज़र में
1991 में भारत एक गंभीर आर्थिक संकट में घिर गया। देश के पास विदेशी मुद्रा भंडार (Foreign Exchange Reserves) इतना कम रह गया था कि वह कुछ ही हफ़्तों के आयात का भुगतान कर सकता था। पेट्रोलियम जैसी आवश्यक वस्तुओं का आयात रुकने का खतरा था और विदेशी ऋण चुकाने में कठिनाई आ रही थी। इस संकट से निकलने के लिए सरकार ने जुलाई 1991 में नई आर्थिक नीति (New Economic Policy — NEP) की घोषणा की, जिसके तीन स्तंभ थे — उदारीकरण (Liberalisation), निजीकरण (Privatisation) और वैश्वीकरण (Globalisation) — जिन्हें संक्षेप में LPG कहा जाता है।
इस अध्याय में हम संकट के कारण, सुधारों के विभिन्न उपाय — औद्योगिक, वित्तीय, कर, विदेशी विनिमय और व्यापार सुधार — विनिवेश (Disinvestment), विश्व व्यापार संगठन (WTO) की भूमिका, और सुधारों के बाद की भारतीय अर्थव्यवस्था की उपलब्धियों तथा आलोचनाओं का अध्ययन करेंगे।
- 1991 के आर्थिक संकट की पृष्ठभूमि और कारण।
- स्थिरीकरण (Stabilisation) और संरचनात्मक सुधार (Structural Reform) उपाय।
- उदारीकरण: उद्योग, वित्त, कर, विदेशी विनिमय और व्यापार में सुधार।
- निजीकरण और विनिवेश; नवरत्न, महारत्न, मिनीरत्न।
- वैश्वीकरण, बाह्य प्रापण (Outsourcing) और WTO।
- सुधारकालीन भारतीय अर्थव्यवस्था का मूल्यांकन; विमुद्रीकरण और GST।
2. पृष्ठभूमि : 1991 का संकट
1991 का संकट अचानक नहीं आया था। इसकी जड़ें 1980 के दशक की नीतियों और कमज़ोर आर्थिक प्रबंधन में थीं:
- राजकोषीय असंतुलन: सरकार की आय की तुलना में व्यय बहुत अधिक था। सामाजिक क्षेत्रकों और सब्सिडी पर खर्च बढ़ता गया, पर उसके अनुरूप राजस्व नहीं बढ़ा। सरकार को घाटा पूरा करने के लिए बैंकों, जनता और अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थाओं से उधार लेना पड़ा।
- विदेशी मुद्रा की कमी: आयात तेज़ी से बढ़ा, पर निर्यात उतना नहीं बढ़ा। विदेशी मुद्रा, जो अधिकतर उधार ली गई थी, उपभोग की वस्तुओं पर खर्च हो गई।
- मुद्रास्फीति (Inflation): आवश्यक वस्तुओं की कीमतें तेज़ी से बढ़ीं।
- बाहरी झटके: 1990–91 में खाड़ी युद्ध के कारण पेट्रोलियम की कीमतें बढ़ीं, जिससे आयात बिल और बढ़ गया।
स्थिति इतनी गंभीर हो गई कि विदेशी मुद्रा भंडार दो सप्ताह के आयात के लिए भी पर्याप्त नहीं था। भारत ने अंतरराष्ट्रीय पुनर्निर्माण एवं विकास बैंक — जिसे सामान्यतः विश्व बैंक (World Bank) कहते हैं — और अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) से संपर्क किया और लगभग 7 अरब डॉलर का ऋण प्राप्त किया। ऋण के साथ यह शर्त भी जुड़ी थी कि भारत अपनी अर्थव्यवस्था को उदार बनाएगा, निजी क्षेत्रक पर प्रतिबंध हटाएगा, सरकार की भूमिका कई क्षेत्रों में घटाएगा और विदेशी व्यापार पर बाधाएँ कम करेगा।
- स्थिरीकरण उपाय (Stabilisation Measures): अल्पकालिक उपाय — भुगतान संतुलन की गड़बड़ी को ठीक करना, पर्याप्त विदेशी मुद्रा भंडार बनाए रखना और बढ़ती कीमतों को नियंत्रित करना।
- संरचनात्मक सुधार उपाय (Structural Reform Measures): दीर्घकालिक उपाय — अर्थव्यवस्था की कार्यकुशलता बढ़ाना और विभिन्न क्षेत्रकों की कठोरताएँ हटाकर अंतरराष्ट्रीय प्रतिस्पर्धा क्षमता बढ़ाना।
3. उदारीकरण (Liberalisation)
उदारीकरण का अर्थ है — उन नियमों और प्रतिबंधों को हटाना या ढीला करना जो अर्थव्यवस्था की वृद्धि में बाधक बन गए थे। 1980 के दशक में भी कुछ सुधार हुए थे, पर 1991 के सुधार कहीं अधिक व्यापक थे।
(क) औद्योगिक क्षेत्रक का विनियमीकरण (Deregulation)
- औद्योगिक लाइसेंस प्रणाली लगभग समाप्त कर दी गई; केवल कुछ उत्पाद — जैसे शराब, सिगरेट, खतरनाक रसायन, औद्योगिक विस्फोटक, इलेक्ट्रॉनिक-एयरोस्पेस और औषधियाँ — लाइसेंस के दायरे में रहे।
- सार्वजनिक क्षेत्रक के लिए आरक्षित उद्योग घटाकर मुख्यतः रक्षा उपकरण, परमाणु ऊर्जा उत्पादन और रेल परिवहन तक सीमित कर दिए गए।
- लघु उद्योगों के लिए आरक्षित कई वस्तुएँ अनारक्षित की गईं।
- कई उद्योगों में कीमतें बाज़ार द्वारा तय होने लगीं।
(ख) वित्तीय क्षेत्रक सुधार (Financial Sector Reforms)
वित्तीय क्षेत्रक में व्यावसायिक बैंक, निवेश बैंक, शेयर बाज़ार और विदेशी विनिमय बाज़ार शामिल हैं। भारत में इसका नियमन भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) करता है।
- सुधारों का उद्देश्य RBI की भूमिका को नियंत्रक (Regulator) से सुविधा प्रदाता (Facilitator) में बदलना था, ताकि वित्तीय क्षेत्रक कई मामलों में स्वयं निर्णय ले सके।
- निजी क्षेत्रक के बैंकों — भारतीय और विदेशी — की स्थापना की अनुमति दी गई।
- बैंकों में विदेशी निवेश की सीमा बढ़ाई गई।
- विदेशी संस्थागत निवेशकों (Foreign Institutional Investors — FII), जैसे मर्चेंट बैंकर, म्यूचुअल फ़ंड और पेंशन फ़ंड, को भारतीय वित्तीय बाज़ारों में निवेश की अनुमति मिली।
- फिर भी कुछ प्रमुख निर्णय — जैसे बैंकों द्वारा नई शाखाएँ खोलने से संबंधित नियम — RBI की निगरानी में रहे।
(ग) कर सुधार (Tax Reforms)
कर सुधार सरकार की कराधान और सार्वजनिक व्यय नीति — अर्थात राजकोषीय नीति (Fiscal Policy) — से संबंधित हैं। कर दो प्रकार के होते हैं — प्रत्यक्ष कर (Direct Tax), जैसे आयकर और निगम कर, और अप्रत्यक्ष कर (Indirect Tax), जैसे वस्तुओं पर लगने वाले कर।
- व्यक्तिगत आयकर की दरें घटाई गईं, क्योंकि ऊँची दरें कर-चोरी का बड़ा कारण मानी जाती थीं। मध्यम कर दरों से बचत बढ़ती है और लोग स्वेच्छा से आय घोषित करते हैं।
- निगम कर (Corporation Tax) की दरें भी धीरे-धीरे घटाई गईं।
- अप्रत्यक्ष करों में सुधार कर साझा राष्ट्रीय बाज़ार बनाने के प्रयास हुए। इसी क्रम में जुलाई 2017 में वस्तु एवं सेवा कर (Goods and Services Tax — GST) लागू हुआ, जिसने केंद्र और राज्यों के अनेक अप्रत्यक्ष करों को मिलाकर "एक राष्ट्र, एक कर" की दिशा में कदम बढ़ाया।
- करदाताओं के लिए प्रक्रियाएँ सरल बनाई गईं।
(घ) विदेशी विनिमय सुधार (Foreign Exchange Reforms)
1991 में भुगतान संतुलन के संकट से निपटने के लिए विदेशी मुद्राओं के सापेक्ष रुपये का अवमूल्यन (Devaluation) किया गया, जिससे देश में विदेशी मुद्रा का प्रवाह बढ़ा। साथ ही विदेशी विनिमय बाज़ार में रुपये के मूल्य के निर्धारण को सरकारी नियंत्रण से मुक्त करने की प्रक्रिया शुरू हुई — अब बाज़ार की माँग और पूर्ति के आधार पर विनिमय दर तय होने लगी।
(ङ) व्यापार और निवेश नीति सुधार
- आयातों पर परिमाणात्मक प्रतिबंध (Quantitative Restrictions) — जैसे कोटा — धीरे-धीरे हटाए गए; अप्रैल 2001 तक विनिर्मित उपभोक्ता वस्तुओं और कृषि उत्पादों से भी ये हटा लिए गए।
- प्रशुल्क (Tariff) दरें घटाई गईं।
- आयात लाइसेंस प्रक्रिया समाप्त की गई, केवल खतरनाक और पर्यावरण की दृष्टि से संवेदनशील उद्योगों को छोड़कर।
- निर्यात शुल्क (Export Duties) हटाए गए ताकि भारतीय वस्तुएँ अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में प्रतिस्पर्धी बन सकें।
4. निजीकरण (Privatisation)
निजीकरण का अर्थ है — सरकारी स्वामित्व वाले उद्यमों के स्वामित्व या प्रबंधन को निजी क्षेत्रक को सौंपना। यह दो प्रकार से हो सकता है: (1) सार्वजनिक उपक्रम के स्वामित्व और प्रबंधन से सरकार का हटना, या (2) सार्वजनिक उपक्रम का सीधे निजी कंपनी को बेच दिया जाना।
सार्वजनिक उपक्रमों के शेयरों का एक भाग जनता को बेचना विनिवेश (Disinvestment) कहलाता है।
उद्देश्य: सरकार के अनुसार विनिवेश का मुख्य उद्देश्य वित्तीय अनुशासन (Financial Discipline) में सुधार और आधुनिकीकरण को बढ़ावा देना था; यह अपेक्षा थी कि निजी पूँजी और प्रबंधन क्षमता सार्वजनिक उपक्रमों के निष्पादन में सुधार लाएगी। सरकार यह भी चाहती थी कि विनिवेश से प्राप्त राशि का उपयोग अन्य कल्याणकारी कार्यों में हो।
सार्वजनिक उपक्रमों को स्वायत्तता — रत्न श्रेणियाँ
कुशलता बढ़ाने और प्रबंधन में व्यावसायिकता लाने के लिए सरकार ने कुछ लाभदायक सार्वजनिक उपक्रमों को महारत्न, नवरत्न और मिनीरत्न का दर्जा दिया। इन्हें निर्णय लेने में अधिक स्वायत्तता (Autonomy) दी गई, जिससे वे बाज़ार में अधिक कुशलता से काम कर सकें और वैश्विक स्तर पर विस्तार कर सकें। उदाहरण के लिए, इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन और स्टील अथॉरिटी ऑफ़ इंडिया जैसे बड़े उपक्रम महारत्न श्रेणी में रहे हैं।
5. वैश्वीकरण (Globalisation)
वैश्वीकरण का अर्थ है — देश की अर्थव्यवस्था का विश्व अर्थव्यवस्था के साथ एकीकरण (Integration)। इसके माध्यम से विश्व के देशों के बीच वस्तुओं, सेवाओं, पूँजी, प्रौद्योगिकी और विचारों का प्रवाह बढ़ता है, और विश्व एक "वैश्विक गाँव" (Global Village) की तरह जुड़ता जाता है।
बाह्य प्रापण (Outsourcing)
बाह्य प्रापण का अर्थ है — किसी कंपनी द्वारा कुछ सेवाएँ, जो पहले वह स्वयं करती थी, किसी बाहरी स्रोत (प्रायः दूसरे देश) से नियमित रूप से प्राप्त करना। जैसे — कॉल सेंटर, लेखांकन, बिलिंग, डेटा एंट्री, कानूनी सलाह, चिकित्सा प्रतिलेखन (Medical Transcription), शिक्षण और अनुसंधान। सूचना प्रौद्योगिकी (IT) की क्रांति के कारण ये सेवाएँ दूर बैठकर कम लागत पर दी जा सकती हैं। कम मज़दूरी पर उपलब्ध कुशल, अंग्रेज़ी-भाषी कार्यबल के कारण भारत बाह्य प्रापण का एक प्रमुख गंतव्य बना।
विश्व व्यापार संगठन (WTO)
- WTO की स्थापना 1995 में प्रशुल्क एवं व्यापार पर सामान्य समझौता (General Agreement on Trade and Tariffs — GATT) के उत्तराधिकारी के रूप में हुई। GATT की स्थापना 1948 में हुई थी।
- WTO का उद्देश्य एक नियम-आधारित व्यापार व्यवस्था स्थापित करना है, जिसमें कोई देश मनमाने ढंग से व्यापार पर प्रतिबंध न लगा सके।
- यह वस्तुओं के साथ-साथ सेवाओं के व्यापार और बौद्धिक संपदा अधिकारों (Intellectual Property Rights) से संबंधित नियम भी बनाता है।
- भारत WTO का संस्थापक सदस्य है। कुछ विद्वानों का मत है कि WTO में विकसित देशों का प्रभाव अधिक है, जबकि विकासशील देशों को अपने बाज़ार खोलने के लिए विवश किया जाता है और विकसित देश अपने किसानों को भारी सहायता देते रहते हैं।
6. सुधारकालीन भारतीय अर्थव्यवस्था : एक समीक्षा
| सकारात्मक परिणाम | आलोचनाएँ / चिंताएँ |
|---|---|
| GDP की संवृद्धि दर में वृद्धि; सेवा क्षेत्रक का तीव्र विस्तार | संवृद्धि का बड़ा भाग सेवा क्षेत्रक से आया; कृषि और उद्योग अपेक्षाकृत पीछे रहे |
| विदेशी प्रत्यक्ष निवेश (FDI) और विदेशी संस्थागत निवेश (FII) में बढ़ोतरी | सुधारों से पर्याप्त रोज़गार सृजन नहीं हुआ — "रोज़गारविहीन संवृद्धि" (Jobless Growth) की चिंता |
| विदेशी मुद्रा भंडार में भारी वृद्धि; भारत विश्व के बड़े भंडार वाले देशों में शामिल | कृषि में सार्वजनिक निवेश, विशेषकर आधारिक संरचना (सिंचाई, बिजली, सड़क, अनुसंधान), घटा |
| ऑटो पार्ट्स, इंजीनियरिंग, IT, वस्त्र जैसे क्षेत्रों में निर्यात बढ़ा | उर्वरक सहायिकी में कटौती से उत्पादन लागत बढ़ने और आयात शुल्क घटने से किसानों पर प्रतिस्पर्धा का दबाव |
| उपभोक्ताओं को अधिक विकल्प और बेहतर गुणवत्ता | निर्यात-उन्मुख नीति से खाद्यान्न के बजाय नकदी फसलों की ओर झुकाव, जिससे खाद्य कीमतों पर दबाव |
| दूरसंचार, बैंकिंग जैसे क्षेत्रों में प्रतिस्पर्धा से सेवाएँ सस्ती और बेहतर | सस्ते आयात से कई घरेलू उद्योगों, विशेषकर लघु उद्योगों, को नुकसान |
| — | विनिवेश में कई बार परिसंपत्तियों का मूल्य कम आँका गया; प्राप्त राशि का उपयोग अक्सर राजकोषीय घाटा कम करने में हुआ |
| — | कर दरों में कमी से राजस्व पर प्रभाव, जिससे सामाजिक क्षेत्रक पर व्यय सीमित हुआ |
7. हाल के दो बड़े आर्थिक कदम
| कदम | वर्ष | उद्देश्य |
|---|---|---|
| विमुद्रीकरण (Demonetisation) | नवंबर 2016 | उच्च मूल्य के करेंसी नोट (₹500 और ₹1000) वैध मुद्रा नहीं रहे; उद्देश्य — काले धन, भ्रष्टाचार और जाली नोटों पर अंकुश तथा डिजिटल भुगतान को बढ़ावा |
| वस्तु एवं सेवा कर (GST) | जुलाई 2017 | अनेक अप्रत्यक्ष करों के स्थान पर एकीकृत कर; साझा राष्ट्रीय बाज़ार, कर-अनुपालन में सुधार |
इन दोनों कदमों के लाभों और लागतों पर अर्थशास्त्रियों में बहस होती रही है — एक ओर औपचारिकीकरण (Formalisation) और डिजिटल लेन-देन बढ़े, दूसरी ओर अल्पकाल में अनौपचारिक क्षेत्रक और छोटे व्यापारियों को कठिनाइयों का सामना करना पड़ा।
8. केस अध्ययन और हल किए गए प्रश्न
1991 के बाद मोबाइल फ़ोन सेवाएँ तेज़ी से क्यों फैलीं?
उत्तर: उदारीकरण से निजी और विदेशी कंपनियों को प्रवेश मिला; प्रतिस्पर्धा बढ़ी, कीमतें घटीं और सेवा की गुणवत्ता सुधरी। पहले सरकारी एकाधिकार में कनेक्शन के लिए लंबी प्रतीक्षा करनी पड़ती थी।
आयात शुल्क घटने के बाद सस्ते आयातित खिलौनों से एक छोटे भारतीय निर्माता पर क्या असर पड़ा होगा?
उत्तर: उसकी बिक्री और लाभ घटे; उसे या तो लागत घटाकर, नए डिज़ाइन और बेहतर गुणवत्ता से प्रतिस्पर्धा करनी होगी, या व्यापार बंद करना पड़ सकता है। यह वैश्वीकरण के असमान प्रभाव का उदाहरण है।
9. 1991 से पहले और बाद : एक तुलना
| पहलू | 1991 से पहले (लाइसेंस-परमिट व्यवस्था) | 1991 के बाद (LPG) |
|---|---|---|
| उद्योग प्रारंभ करना | अधिकांश उद्योगों के लिए सरकारी लाइसेंस अनिवार्य | कुछ उत्पादों को छोड़कर लाइसेंस की आवश्यकता नहीं |
| सार्वजनिक क्षेत्रक | "शीर्ष स्थान" (Commanding Heights) पर; अनेक उद्योग आरक्षित | आरक्षण सीमित; विनिवेश और स्वायत्तता |
| आयात | कोटा और ऊँचे प्रशुल्क — आयात प्रतिस्थापन | कोटा हटे, प्रशुल्क घटे — प्रतिस्पर्धा |
| विदेशी निवेश | अत्यंत सीमित | अनेक क्षेत्रकों में FDI और FII की अनुमति |
| विनिमय दर | सरकार द्वारा निर्धारित | मुख्यतः बाज़ार द्वारा निर्धारित |
| RBI की भूमिका | नियंत्रक (Regulator) | सुविधा प्रदाता (Facilitator) |
सुधारों का उद्देश्य राज्य की भूमिका को समाप्त करना नहीं था, बल्कि उसे बदलना था — उत्पादन से हटकर सरकार नियमन, आधारिक संरचना, शिक्षा, स्वास्थ्य और सामाजिक सुरक्षा पर अधिक ध्यान दे सकती है। परीक्षा में "सुधार = सरकार की भूमिका का पुनर्निर्धारण" वाला दृष्टिकोण संतुलित उत्तर देने में सहायक होता है।
10. मास्टर तालिका : प्रमुख शब्दावली और तथ्य
| शब्द / तथ्य | अर्थ / विवरण |
|---|---|
| नई आर्थिक नीति | जुलाई 1991; LPG |
| स्थिरीकरण उपाय | अल्पकालिक: भुगतान संतुलन, विदेशी मुद्रा, मुद्रास्फीति |
| संरचनात्मक सुधार | दीर्घकालिक: कुशलता और प्रतिस्पर्धा क्षमता |
| उदारीकरण | अनावश्यक नियंत्रण और प्रतिबंध हटाना |
| विनिवेश | सार्वजनिक उपक्रमों के शेयरों का एक भाग जनता को बेचना |
| वैश्वीकरण | देश की अर्थव्यवस्था का विश्व अर्थव्यवस्था से एकीकरण |
| बाह्य प्रापण | सेवाएँ बाहरी स्रोत से प्राप्त करना |
| WTO | 1995; GATT (1948) का उत्तराधिकारी |
| अवमूल्यन | सरकार द्वारा विदेशी मुद्रा के सापेक्ष रुपये का मूल्य घटाना |
| GST | जुलाई 2017; एकीकृत अप्रत्यक्ष कर |
| विमुद्रीकरण | नवंबर 2016; ₹500 और ₹1000 के पुराने नोट अवैध |
11. मास्टर सारांश तालिका
| सुधार क्षेत्र | मुख्य उपाय | उद्देश्य |
|---|---|---|
| उद्योग | लाइसेंस समाप्त, आरक्षण घटा | प्रतिस्पर्धा और निवेश |
| वित्त | निजी बैंक, FII, RBI सुविधा प्रदाता | कुशल वित्तीय बाज़ार |
| कर | दरें घटीं, GST | अनुपालन और साझा बाज़ार |
| विदेशी विनिमय | अवमूल्यन, बाज़ार-आधारित दर | विदेशी मुद्रा प्रवाह |
| व्यापार | कोटा हटाए, प्रशुल्क घटे | अंतरराष्ट्रीय प्रतिस्पर्धा |
| निजीकरण | विनिवेश, रत्न दर्जा | कुशलता, संसाधन जुटाना |
12. माइंड मैप
- राजकोषीय घाटा
- विदेशी मुद्रा की कमी
- उद्योग, वित्त, कर
- विनिमय, व्यापार
- विनिवेश
- महारत्न, नवरत्न
- बाह्य प्रापण
- WTO 1995
13. टिप्स और ट्रिक्स
- "स्थिरीकरण = अल्पकाल, संरचनात्मक = दीर्घकाल" — इस जोड़े को याद रखें।
- उदारीकरण के पाँच क्षेत्र: उद्योग, वित्त, कर, विदेशी विनिमय, व्यापार।
- मूल्यांकन प्रश्नों में कृषि, उद्योग, रोज़गार और विनिवेश — चारों पर आलोचना लिखें।
- विनिवेश और निजीकरण को पूरी तरह एक मानना — विनिवेश निजीकरण का एक तरीका है।
- WTO की स्थापना 1948 लिखना — 1948 में GATT बना; WTO 1995 में।
- अवमूल्यन (सरकार द्वारा) और मूल्यह्रास (बाज़ार द्वारा) को एक समझना।
14. महत्वपूर्ण वन-लाइनर
- 1991 में भारत भुगतान संतुलन के गंभीर संकट में था।
- भारत ने विश्व बैंक और IMF से लगभग 7 अरब डॉलर का ऋण लिया।
- सुधारों के बाद सार्वजनिक क्षेत्रक के लिए आरक्षण मुख्यतः रक्षा, परमाणु ऊर्जा और रेल परिवहन तक सीमित हुआ।
- RBI की भूमिका नियंत्रक से सुविधा प्रदाता की ओर बदली।
- WTO 1995 में GATT के स्थान पर बना।
- भारत बाह्य प्रापण का प्रमुख गंतव्य बना।
- GST जुलाई 2017 में लागू हुआ।
15. परीक्षा-पैटर्न प्रश्न (विस्तृत उत्तर सहित)
WTO की स्थापना किस वर्ष हुई?
- 1948
- 1991
- 1995
- 2001
उत्तर देखें
WTO 1995 में GATT के उत्तराधिकारी के रूप में बना। 1948 GATT का वर्ष है।
उत्तर: (ग) 1995
विनिवेश से क्या अभिप्राय है?
उत्तर देखें
सार्वजनिक क्षेत्रक के उपक्रमों के शेयरों का एक भाग जनता या निजी निवेशकों को बेचना।
उत्तर: सार्वजनिक उपक्रमों के शेयरों की बिक्री
बाह्य प्रापण (Outsourcing) के दो उदाहरण दीजिए।
उत्तर देखें
कॉल सेंटर सेवाएँ, लेखांकन और बिलिंग, डेटा एंट्री, चिकित्सा प्रतिलेखन (कोई दो)।
उत्तर: कॉल सेंटर, लेखांकन (उदाहरणार्थ)
स्थिरीकरण और संरचनात्मक सुधार उपायों में अंतर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर देखें
स्थिरीकरण उपाय अल्पकालिक होते हैं — भुगतान संतुलन ठीक करना, विदेशी मुद्रा भंडार बनाए रखना, मुद्रास्फीति नियंत्रित करना। संरचनात्मक सुधार दीर्घकालिक होते हैं — अर्थव्यवस्था की कुशलता और अंतरराष्ट्रीय प्रतिस्पर्धा क्षमता बढ़ाने के लिए विभिन्न क्षेत्रकों की कठोरताएँ हटाना।
उत्तर: अल्पकालिक संकट-प्रबंधन बनाम दीर्घकालिक कुशलता सुधार
वित्तीय क्षेत्रक सुधारों के प्रमुख उपाय बताइए।
उत्तर देखें
RBI की भूमिका नियंत्रक से सुविधा प्रदाता में बदली; निजी और विदेशी बैंकों को अनुमति; बैंकों में विदेशी निवेश सीमा बढ़ी; FII (मर्चेंट बैंकर, म्यूचुअल फ़ंड, पेंशन फ़ंड) को निवेश की अनुमति; बैंकों को कुछ मामलों में स्वायत्तता — पर प्रमुख निर्णयों पर RBI की निगरानी बनी रही।
उत्तर: RBI सुविधा प्रदाता, निजी बैंक, FII, विदेशी निवेश सीमा में वृद्धि
1991 में रुपये का अवमूल्यन क्यों किया गया?
उत्तर देखें
भुगतान संतुलन के संकट से निपटने के लिए। अवमूल्यन से भारतीय वस्तुएँ विदेशों में सस्ती हुईं (निर्यात बढ़ा) और आयात महँगे हुए, जिससे विदेशी मुद्रा का प्रवाह बढ़ा।
उत्तर: निर्यात बढ़ाने और विदेशी मुद्रा प्रवाह सुधारने के लिए
सार्वजनिक उपक्रमों को महारत्न/नवरत्न का दर्जा क्यों दिया गया?
उत्तर देखें
कुशलता बढ़ाने, प्रबंधन में व्यावसायिकता लाने और प्रतिस्पर्धी बनाने के लिए। इन्हें वित्तीय और प्रबंधकीय निर्णयों में अधिक स्वायत्तता दी गई, जिससे वे बाज़ार में बेहतर प्रदर्शन कर सकें और विस्तार कर सकें।
उत्तर: अधिक स्वायत्तता देकर कुशलता और प्रतिस्पर्धा बढ़ाने के लिए
भारत बाह्य प्रापण का प्रमुख गंतव्य क्यों बना?
उत्तर देखें
कम मज़दूरी पर उपलब्ध कुशल और शिक्षित कार्यबल, अंग्रेज़ी भाषा का ज्ञान, IT और दूरसंचार में प्रगति, और उदार नीतियाँ।
उत्तर: सस्ता कुशल श्रम, अंग्रेज़ी ज्ञान, IT प्रगति
1991 के आर्थिक संकट के कारणों की विवेचना कीजिए।
उत्तर देखें
(1) सरकार का व्यय आय से बहुत अधिक — राजकोषीय घाटा; घाटा पूरा करने के लिए भारी उधार। (2) आयात तेज़ी से बढ़ा, निर्यात नहीं — विदेशी मुद्रा संकट; उधार ली गई विदेशी मुद्रा उपभोग पर खर्च। (3) मुद्रास्फीति। (4) खाड़ी युद्ध से पेट्रोलियम कीमतों में वृद्धि। परिणामस्वरूप विदेशी मुद्रा भंडार दो सप्ताह के आयात के लिए भी पर्याप्त नहीं रहा और भारत को विश्व बैंक तथा IMF से ऋण लेना पड़ा।
उत्तर: राजकोषीय घाटा, भुगतान संतुलन संकट, मुद्रास्फीति, बाहरी झटके
सुधारों का कृषि क्षेत्रक पर क्या प्रभाव पड़ा? आलोचनात्मक विवेचना कीजिए।
उत्तर देखें
सुधारों से कृषि को अपेक्षित लाभ नहीं मिला: कृषि आधारिक संरचना (सिंचाई, बिजली, सड़क, बाज़ार, अनुसंधान) में सार्वजनिक निवेश घटा; उर्वरक सहायिकी में कटौती से लागत बढ़ी; आयात शुल्क घटने और न्यूनतम समर्थन मूल्य में अनिश्चितता से किसानों पर अंतरराष्ट्रीय प्रतिस्पर्धा का दबाव बढ़ा; निर्यात-उन्मुख नीति से नकदी फसलों की ओर झुकाव हुआ, जिससे खाद्यान्नों की कीमतों पर दबाव आया। अतः कृषि की संवृद्धि दर धीमी रही।
उत्तर: सार्वजनिक निवेश में कमी, लागत में वृद्धि, प्रतिस्पर्धा का दबाव
WTO के उद्देश्यों और उसकी आलोचनाओं को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर देखें
उद्देश्य: नियम-आधारित व्यापार व्यवस्था; प्रशुल्क और गैर-प्रशुल्क बाधाएँ घटाना; वस्तुओं, सेवाओं और बौद्धिक संपदा से संबंधित व्यापार को सुगम बनाना; उत्पादन और व्यापार बढ़ाकर संसाधनों का अधिकतम उपयोग। आलोचना: विकसित देशों का अधिक प्रभाव; विकासशील देशों पर बाज़ार खोलने का दबाव, जबकि विकसित देश अपने किसानों को भारी सहायता देते रहते हैं; छोटे उत्पादकों के लिए असमान प्रतिस्पर्धा।
उत्तर: मुक्त और नियम-आधारित व्यापार, पर नियमों के असमान लाभ की आलोचना
"सुधारों से संवृद्धि तो बढ़ी, पर रोज़गार उसी अनुपात में नहीं बढ़ा।" इस कथन का मूल्यांकन कीजिए।
उत्तर देखें
सुधारों के बाद GDP संवृद्धि दर बढ़ी, पर इसका बड़ा भाग सेवा क्षेत्रक — विशेषकर IT, वित्त, दूरसंचार — से आया, जो अपेक्षाकृत कम रोज़गार देते हैं और कुशल श्रम माँगते हैं। विनिर्माण, जो बड़ी संख्या में अर्ध-कुशल श्रमिकों को रोज़गार दे सकता था, अपेक्षित गति से नहीं बढ़ा; सस्ते आयात से कई लघु उद्योग बंद हुए। इसलिए "रोज़गारविहीन संवृद्धि" की चिंता उठी। समाधान: श्रम-गहन विनिर्माण, कौशल विकास और कृषि में निवेश।
उत्तर: कथन काफ़ी हद तक सही — सेवा-प्रधान संवृद्धि ने पर्याप्त रोज़गार नहीं दिया
16. त्वरित पुनरावृत्ति सारांश
- 1991: राजकोषीय घाटा + भुगतान संतुलन संकट → विश्व बैंक/IMF से ऋण → नई आर्थिक नीति।
- स्थिरीकरण (अल्पकाल) और संरचनात्मक सुधार (दीर्घकाल)।
- उदारीकरण: उद्योग, वित्त, कर (GST 2017), विदेशी विनिमय (अवमूल्यन), व्यापार (कोटा/प्रशुल्क में कमी)।
- निजीकरण: विनिवेश; महारत्न-नवरत्न-मिनीरत्न को स्वायत्तता।
- वैश्वीकरण: बाह्य प्रापण, WTO (1995)।
- मूल्यांकन: संवृद्धि, निवेश, विदेशी मुद्रा भंडार में सुधार; कृषि, रोज़गार और लघु उद्योग पर चिंताएँ।