1. अध्याय एक नज़र में
अब तक हमने बाज़ार के दो पक्षों का अलग-अलग अध्ययन किया — उपभोक्ता (माँग पक्ष) और फर्म (पूर्ति पक्ष)। उपभोक्ता कम कीमत पर अधिक खरीदना चाहते हैं, जबकि उत्पादक ऊँची कीमत पर अधिक बेचना चाहते हैं। तो फिर बाज़ार में कीमत तय कैसे होती है? इसका उत्तर है — बाज़ार संतुलन (Market Equilibrium), जहाँ माँग और पूर्ति की शक्तियाँ एक-दूसरे को संतुलित करती हैं।
इस अध्याय में हम पूर्ण प्रतिस्पर्धी बाज़ार में संतुलन कीमत और मात्रा का निर्धारण, माँग और पूर्ति में परिवर्तनों का संतुलन पर प्रभाव, फर्मों के स्वतंत्र प्रवेश-निकास की स्थिति, श्रम बाज़ार, तथा सरकार द्वारा कीमतों पर नियंत्रण — उच्चतम कीमत सीमा (Price Ceiling) और न्यूनतम कीमत सीमा (Price Floor) — का अध्ययन करेंगे।
- संतुलन, अधिमाँग और अधिपूर्ति; कीमत का समायोजन।
- संतुलन कीमत और मात्रा की गणना।
- माँग और पूर्ति के खिसकने का प्रभाव — एक साथ परिवर्तन सहित।
- स्वतंत्र प्रवेश-निकास के साथ बाज़ार संतुलन।
- श्रम बाज़ार में मज़दूरी का निर्धारण।
- उच्चतम और न्यूनतम कीमत सीमा के प्रभाव।
2. संतुलन, अधिमाँग और अधिपूर्ति
- संतुलन (Equilibrium): वह स्थिति जहाँ बाज़ार माँग = बाज़ार पूर्ति। इस कीमत पर सभी उपभोक्ताओं और फर्मों की योजनाएँ एक साथ पूरी होती हैं, और परिवर्तन की कोई प्रवृत्ति नहीं रहती।
- संतुलन कीमत (p*) और संतुलन मात्रा (q*): वह कीमत और मात्रा जिस पर qD(p*) = qS(p*)।
- अधिमाँग (Excess Demand): किसी कीमत पर बाज़ार माँग > बाज़ार पूर्ति।
- अधिपूर्ति (Excess Supply): किसी कीमत पर बाज़ार पूर्ति > बाज़ार माँग।
"अदृश्य हाथ" — कीमत का समायोजन
पूर्ण प्रतिस्पर्धी बाज़ार में यदि कीमत संतुलन से भिन्न हो, तो बाज़ार की शक्तियाँ उसे संतुलन की ओर ले आती हैं:
- कीमत संतुलन से अधिक → अधिपूर्ति: विक्रेता अपना माल बेच नहीं पाते; कुछ विक्रेता कम कीमत पर बेचने लगते हैं। कीमत घटने से माँग बढ़ती है और पूर्ति घटती है — अंततः संतुलन।
- कीमत संतुलन से कम → अधिमाँग: कुछ उपभोक्ताओं को वस्तु नहीं मिलती; वे अधिक कीमत देने को तैयार होते हैं। कीमत बढ़ने से माँग घटती है और पूर्ति बढ़ती है — अंततः संतुलन।
अर्थशास्त्री एडम स्मिथ ने बाज़ार की इस स्व-समायोजन प्रक्रिया को "अदृश्य हाथ (Invisible Hand)" कहा था — बिना किसी केंद्रीय योजना के, कीमतें माँग और पूर्ति में तालमेल बिठा देती हैं।
बाज़ार माँग: qD = 200 − p; बाज़ार पूर्ति: qS = 50 + 2p। संतुलन कीमत और मात्रा ज्ञात कीजिए।
हल: संतुलन पर qD = qS: 200 − p = 50 + 2p → 150 = 3p → p* = 50। q* = 200 − 50 = 150 (जाँच: 50 + 2×50 = 150 ✓)।
यदि कीमत ₹60 हो: qD = 140, qS = 170 → अधिपूर्ति 30 → कीमत गिरेगी। यदि कीमत ₹40 हो: qD = 160, qS = 130 → अधिमाँग 30 → कीमत बढ़ेगी।
3. माँग और पूर्ति में परिवर्तन (स्थिर फर्म-संख्या)
जब फर्मों की संख्या स्थिर हो, तो माँग या पूर्ति वक्र के खिसकने से संतुलन कीमत और मात्रा बदल जाती हैं।
| परिवर्तन | संतुलन कीमत | संतुलन मात्रा | उदाहरण कारण |
|---|---|---|---|
| माँग में वृद्धि (D दाईं ओर) | बढ़ती है | बढ़ती है | सामान्य वस्तु के लिए आय में वृद्धि; स्थानापन्न की कीमत बढ़ना |
| माँग में कमी (D बाईं ओर) | घटती है | घटती है | पूरक वस्तु की कीमत बढ़ना; रुचि में प्रतिकूल परिवर्तन |
| पूर्ति में वृद्धि (S दाईं ओर) | घटती है | बढ़ती है | तकनीकी प्रगति; आगत कीमतों में कमी |
| पूर्ति में कमी (S बाईं ओर) | बढ़ती है | घटती है | आगत कीमतें बढ़ना; इकाई कर |
माँग के खिसकने पर कीमत और मात्रा एक ही दिशा में बदलती हैं। पूर्ति के खिसकने पर कीमत और मात्रा विपरीत दिशा में बदलती हैं।
माँग और पूर्ति — दोनों का एक साथ खिसकना
| माँग | पूर्ति | संतुलन कीमत | संतुलन मात्रा |
|---|---|---|---|
| बढ़ती है | बढ़ती है | अनिश्चित (बढ़ सकती है, घट सकती है या वही रह सकती है) | बढ़ती है |
| घटती है | घटती है | अनिश्चित | घटती है |
| बढ़ती है | घटती है | बढ़ती है | अनिश्चित |
| घटती है | बढ़ती है | घटती है | अनिश्चित |
"अनिश्चित" का अर्थ है कि परिणाम इस पर निर्भर करेगा कि कौन-सा परिवर्तन बड़ा है। उदाहरण — यदि माँग और पूर्ति दोनों बढ़ें और माँग में वृद्धि अधिक हो, तो कीमत बढ़ेगी; पूर्ति में वृद्धि अधिक हो, तो कीमत घटेगी; दोनों समान हों, तो कीमत वही रहेगी।
ऊपर के बाज़ार में आय बढ़ने से माँग qD = 230 − p हो जाती है (पूर्ति वही)। नया संतुलन?
हल: 230 − p = 50 + 2p → p = 60, q = 170। कीमत 50 से 60 और मात्रा 150 से 170 — दोनों बढ़ीं, जैसा माँग में वृद्धि पर अपेक्षित है।
4. स्वतंत्र प्रवेश और निकास के साथ संतुलन
दीर्घकाल में पूर्ण प्रतिस्पर्धा में फर्में स्वतंत्र रूप से आ-जा सकती हैं। असामान्य लाभ होने पर नई फर्में आती हैं, और हानि होने पर फर्में बाहर जाती हैं। इसलिए संतुलन में हर फर्म केवल सामान्य लाभ कमाती है:
- संतुलन मात्रा: बाज़ार माँग वक्र से तय होती है — p₀ पर माँगी गई मात्रा q₀ = qD(p₀)।
- फर्मों की संख्या: n₀ = q₀ ÷ (प्रत्येक फर्म द्वारा p₀ पर उत्पादित मात्रा)।
- माँग में परिवर्तन का प्रभाव: कीमत नहीं बदलती (न्यूनतम AC पर ही रहती है); केवल मात्रा और फर्मों की संख्या बदलती है। माँग बढ़ने पर अधिक फर्में आती हैं; घटने पर कुछ बाहर जाती हैं। इस स्थिति में बाज़ार की दीर्घकालीन पूर्ति वक्र, न्यूनतम AC के स्तर पर क्षैतिज मानी जा सकती है।
प्रत्येक फर्म का न्यूनतम AC ₹20 है, जहाँ वह 10 इकाई बनाती है। बाज़ार माँग qD = 700 − 10p। दीर्घकालीन संतुलन कीमत, मात्रा और फर्मों की संख्या ज्ञात कीजिए।
हल: p₀ = 20। q₀ = 700 − 200 = 500। फर्मों की संख्या = 500 ÷ 10 = 50। यदि माँग बढ़कर qD = 900 − 10p हो जाए, तो कीमत अब भी ₹20 रहेगी, मात्रा 700 होगी और फर्मों की संख्या 70 हो जाएगी।
5. श्रम बाज़ार (Labour Market)
वस्तु बाज़ार की तरह श्रम बाज़ार में भी माँग और पूर्ति होती है, पर भूमिकाएँ उलट जाती हैं — यहाँ फर्में श्रम की माँग करती हैं और परिवार (श्रमिक) श्रम की पूर्ति करते हैं। श्रम की कीमत मज़दूरी दर (Wage Rate) है।
श्रम की माँग
एक पूर्ण प्रतिस्पर्धी फर्म एक अतिरिक्त श्रमिक को तब तक रखती है जब तक उससे होने वाली अतिरिक्त आय, उसकी मज़दूरी से अधिक हो। अतिरिक्त श्रमिक से होने वाली आय = श्रम के सीमांत उत्पाद का मूल्य (Value of Marginal Product — VMPL) = वस्तु की कीमत × MPL।
चूँकि ह्रासमान सीमांत उत्पाद के कारण MPL घटता है, VMPL वक्र नीचे की ओर ढलता है — यही फर्म का श्रम माँग वक्र है। कम मज़दूरी पर फर्म अधिक श्रमिक रखेगी।
वस्तु की कीमत ₹5 है। श्रमिक 1, 2, 3, 4 का MP: 40, 32, 24, 16 इकाई। मज़दूरी ₹120 प्रतिदिन है। फर्म कितने श्रमिक रखेगी?
हल: VMP = 5 × MP = 200, 160, 120, 80। तीसरे श्रमिक पर VMP = ₹120 = w। चौथे श्रमिक का VMP (80) मज़दूरी से कम है, इसलिए फर्म 3 श्रमिक रखेगी।
श्रम की पूर्ति
श्रम की पूर्ति, श्रमिक के आराम (Leisure) और काम के बीच चुनाव पर निर्भर करती है। सामान्यतः ऊँची मज़दूरी पर लोग अधिक घंटे काम करने को तैयार होते हैं, इसलिए श्रम पूर्ति वक्र ऊपर की ओर ढलता है। (बहुत ऊँची मज़दूरी पर कुछ लोग अधिक आराम चुन सकते हैं, पर बाज़ार स्तर पर ऊपर की ढलान वाली पूर्ति मानी जाती है।)
श्रम बाज़ार में संतुलन मज़दूरी वहाँ तय होती है जहाँ श्रम की बाज़ार माँग = श्रम की बाज़ार पूर्ति।
6. सरकारी हस्तक्षेप : कीमत सीमाएँ
कभी-कभी सरकार बाज़ार द्वारा तय कीमत को समाज के किसी वर्ग के लिए अनुचित मानकर हस्तक्षेप करती है।
(क) उच्चतम कीमत सीमा (Price Ceiling)
सरकार द्वारा तय की गई वह अधिकतम कीमत जिससे अधिक पर कोई वस्तु नहीं बेची जा सकती। प्रभावी होने के लिए यह संतुलन कीमत से नीचे होनी चाहिए। उद्देश्य — आवश्यक वस्तुओं (जैसे गेहूँ, चावल, मिट्टी का तेल) को गरीबों के लिए सस्ता रखना।
परिणाम:
- उस कीमत पर अधिमाँग (कमी) उत्पन्न होती है — सबको वस्तु नहीं मिलती।
- सरकार को राशनिंग (Rationing) — जैसे राशन कार्ड द्वारा कोटा — लागू करना पड़ता है।
- लंबी कतारें लगती हैं और काला बाज़ार (Black Market) पनप सकता है, जहाँ कुछ लोग वस्तु को सीमा से अधिक कीमत पर बेचते हैं।
- उपभोक्ता को राशन से मिली मात्रा उसकी इच्छा से कम हो सकती है, और विक्रेता गुणवत्ता घटा सकते हैं।
(ख) न्यूनतम कीमत सीमा (Price Floor)
सरकार द्वारा तय की गई वह न्यूनतम कीमत जिससे कम पर वस्तु नहीं बेची जा सकती। प्रभावी होने के लिए यह संतुलन कीमत से ऊपर होनी चाहिए। उदाहरण:
- न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP): किसानों को फसल की न्यूनतम कीमत का आश्वासन।
- न्यूनतम मज़दूरी कानून: श्रमिकों के लिए न्यूनतम मज़दूरी।
परिणाम:
- उस कीमत पर अधिपूर्ति (आधिक्य) उत्पन्न होती है।
- MSP की स्थिति में सरकार को अतिरिक्त उपज खरीदनी पड़ती है — इससे भंडार (बफ़र स्टॉक) बढ़ता है और भंडारण की लागत आती है।
- न्यूनतम मज़दूरी संतुलन मज़दूरी से अधिक हो, तो श्रम की अधिपूर्ति — कुछ श्रमिक बेरोज़गार रह सकते हैं।
qD = 200 − p, qS = 50 + 2p। सरकार ₹60 की न्यूनतम कीमत तय करती है। qD = 140, qS = 170 → अधिपूर्ति = 30 इकाई। यदि सरकार इस कीमत को बनाए रखने के लिए अतिरिक्त मात्रा स्वयं खरीदे, तो उसका व्यय = 30 × 60 = ₹1,800।
उच्चतम सीमा संतुलन कीमत से ऊपर तय हो, या न्यूनतम सीमा संतुलन से नीचे, तो उनका कोई प्रभाव नहीं पड़ता — बाज़ार संतुलन कीमत पर ही चलता रहेगा।
7. वास्तविक जीवन से जुड़े केस अध्ययन
माँग-पूर्ति का यह ढाँचा रोज़मर्रा की कई घटनाओं को समझाने में सहायक है। नीचे कुछ सामान्य स्थितियाँ दी गई हैं (ये अवधारणात्मक उदाहरण हैं, किसी विशेष वर्ष के आँकड़े नहीं):
यदि बेमौसम वर्षा से प्याज़ की फसल को नुकसान हो, तो बाज़ार में प्याज़ की पूर्ति घटती है — पूर्ति वक्र बाईं ओर खिसकता है। प्याज़ एक आवश्यक वस्तु है जिसकी माँग अपेक्षाकृत बेलोचदार है, इसलिए पूर्ति में थोड़ी कमी से भी कीमत में तेज़ वृद्धि होती है, जबकि उपभोग की मात्रा बहुत कम नहीं घटती। ऐसी स्थिति में सरकार भंडार से आपूर्ति बढ़ाकर या आयात करके पूर्ति वक्र को वापस दाईं ओर खिसकाने का प्रयास करती है।
त्योहारों के मौसम में रुचि और परंपरा के कारण मिठाई, कपड़ों और उपहारों की माँग बढ़ती है — माँग वक्र दाईं ओर खिसकता है। परिणामस्वरूप कीमत और बेची गई मात्रा दोनों बढ़ती हैं। त्योहार समाप्त होने पर माँग फिर घटती है और कीमतें सामान्य हो जाती हैं।
समय के साथ मोबाइल फ़ोनों की माँग बहुत बढ़ी, फिर भी उनकी कीमतें घटीं। कारण — तकनीकी प्रगति, बड़े पैमाने पर उत्पादन और अधिक कंपनियों के आने से पूर्ति में वृद्धि, माँग में वृद्धि से कहीं अधिक रही। यह "दोनों वक्रों के एक साथ खिसकने" का उदाहरण है, जिसमें मात्रा तो निश्चित रूप से बढ़ी और कीमत इसलिए घटी क्योंकि पूर्ति का खिसकना बड़ा था।
लोच और संतुलन में परिवर्तन
माँग या पूर्ति के खिसकने पर कीमत में कितना परिवर्तन होगा, यह दूसरे वक्र की लोच पर निर्भर करता है:
- यदि माँग बेलोचदार है, तो पूर्ति के खिसकने से कीमत में बड़ा और मात्रा में छोटा परिवर्तन होता है (जैसे आवश्यक खाद्य पदार्थ)।
- यदि माँग लोचदार है, तो पूर्ति के खिसकने से कीमत में छोटा और मात्रा में बड़ा परिवर्तन होता है।
- इसी प्रकार, यदि पूर्ति बेलोचदार है (जैसे अल्पकाल में जल्दी नष्ट होने वाली वस्तुएँ), तो माँग बढ़ने पर कीमत तेज़ी से बढ़ती है।
यही कारण है कि कृषि उत्पादों की कीमतें प्रायः अधिक अस्थिर रहती हैं — उनकी माँग बेलोचदार है और अल्पकाल में पूर्ति भी मौसम पर निर्भर होने से अनिश्चित रहती है।
8. मास्टर तालिका : प्रमुख सूत्र और नियम
| अवधारणा | सूत्र / नियम |
|---|---|
| संतुलन | qD(p*) = qS(p*) |
| अधिमाँग | qD > qS (p < p*) |
| अधिपूर्ति | qS > qD (p > p*) |
| रैखिक फलन संतुलन | a − bp = c + dp → p* = (a − c)/(b + d) |
| स्वतंत्र प्रवेश संतुलन | p₀ = न्यूनतम AC; n₀ = q₀ / qf |
| श्रम की माँग | w = VMPL = p × MPL |
| उच्चतम कीमत सीमा | p* से नीचे → कमी, राशनिंग, काला बाज़ार |
| न्यूनतम कीमत सीमा | p* से ऊपर → आधिक्य, सरकारी खरीद |
9. मास्टर सारांश तालिका
| परिवर्तन | p* | q* |
|---|---|---|
| D ↑ | ↑ | ↑ |
| D ↓ | ↓ | ↓ |
| S ↑ | ↓ | ↑ |
| S ↓ | ↑ | ↓ |
| D ↑, S ↑ | ? | ↑ |
| D ↑, S ↓ | ↑ | ? |
| D ↑ (स्वतंत्र प्रवेश) | वही | ↑ (फर्में ↑) |
10. माइंड मैप
- qD = qS
- अधिमाँग, अधिपूर्ति
- D, S का खिसकना
- एक साथ परिवर्तन
- p = न्यूनतम AC
- फर्मों की संख्या
- उच्चतम सीमा
- न्यूनतम सीमा, MSP
11. टिप्स और ट्रिक्स
- संख्यात्मक प्रश्न में qD = qS रखें, p निकालें, फिर दोनों फलनों में रखकर q की जाँच करें।
- दोनों वक्र खिसकें तो एक चर "निश्चित" और दूसरा "अनिश्चित" होगा — पहले निश्चित वाला पहचानें।
- उच्चतम सीमा → "कमी"; न्यूनतम सीमा → "आधिक्य" — शब्दों के विपरीत अर्थ से भ्रमित न हों।
- आरेख बनाते समय पुराना और नया संतुलन (E₁, E₂) तथा दोनों कीमतें और मात्राएँ अक्षों पर अवश्य अंकित करें — अंक इन्हीं पर मिलते हैं।
- स्वतंत्र प्रवेश की स्थिति में माँग बढ़ने पर कीमत भी बढ़ा देना — कीमत न्यूनतम AC पर ही रहती है।
- उच्चतम कीमत सीमा को संतुलन से ऊपर दिखाना — तब वह प्रभावहीन है।
- श्रम बाज़ार में माँग और पूर्ति करने वालों को उलट देना।
12. महत्वपूर्ण वन-लाइनर
- संतुलन पर बाज़ार माँग बाज़ार पूर्ति के बराबर होती है।
- संतुलन से ऊँची कीमत पर अधिपूर्ति होती है।
- माँग बढ़ने पर संतुलन कीमत और मात्रा दोनों बढ़ती हैं।
- पूर्ति बढ़ने पर संतुलन कीमत घटती और मात्रा बढ़ती है।
- स्वतंत्र प्रवेश-निकास में संतुलन कीमत न्यूनतम AC के बराबर होती है।
- फर्म वहाँ तक श्रमिक रखती है जहाँ w = VMPL।
- उच्चतम कीमत सीमा से काला बाज़ार पनप सकता है।
- न्यूनतम कीमत सीमा से अधिपूर्ति उत्पन्न होती है, जिसे प्रायः सरकार खरीदती है।
- बेलोचदार माँग वाली वस्तुओं में पूर्ति घटने से कीमत में तेज़ वृद्धि होती है।
13. परीक्षा-पैटर्न प्रश्न (विस्तृत उत्तर सहित)
पूर्ति में वृद्धि होने पर (माँग स्थिर) संतुलन कीमत:
- बढ़ती है
- घटती है
- स्थिर रहती है
- अनिश्चित
उत्तर देखें
पूर्ति वक्र दाईं ओर खिसकने पर पुरानी कीमत पर अधिपूर्ति होती है — कीमत घटती है और मात्रा बढ़ती है।
उत्तर: (ख) घटती है
न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) किस प्रकार का कीमत नियंत्रण है?
उत्तर देखें
न्यूनतम कीमत सीमा (Price Floor) — किसानों को न्यूनतम कीमत का आश्वासन।
उत्तर: न्यूनतम कीमत सीमा
अधिमाँग की स्थिति कब उत्पन्न होती है?
उत्तर देखें
जब बाज़ार कीमत संतुलन कीमत से कम हो — उस कीमत पर माँगी गई मात्रा, पूर्ति की गई मात्रा से अधिक होती है।
उत्तर: कीमत संतुलन से कम होने पर
qD = 120 − 2p और qS = 30 + p (काल्पनिक फलन)। संतुलन कीमत और मात्रा ज्ञात कीजिए।
उत्तर देखें
120 − 2p = 30 + p → 90 = 3p → p* = 30। q* = 30 + 30 = 60 (जाँच: 120 − 60 = 60 ✓)।
उत्तर: p* = 30, q* = 60
संतुलन कीमत से अधिक कीमत पर बाज़ार में क्या होगा? समझाइए।
उत्तर देखें
अधिपूर्ति होगी — विक्रेता अपना पूरा माल नहीं बेच पाएँगे। प्रतिस्पर्धा के कारण कुछ विक्रेता कीमत घटाएँगे; कीमत घटने से माँग बढ़ेगी और पूर्ति घटेगी, जब तक संतुलन कीमत पर माँग = पूर्ति न हो जाए।
उत्तर: अधिपूर्ति → कीमत घटकर संतुलन पर
चाय की कीमत बढ़ने का कॉफ़ी के बाज़ार संतुलन पर क्या प्रभाव होगा?
उत्तर देखें
चाय और कॉफ़ी स्थानापन्न हैं। चाय महँगी होने पर कॉफ़ी की माँग बढ़ेगी — माँग वक्र दाईं ओर खिसकेगा। परिणाम: कॉफ़ी की संतुलन कीमत और मात्रा दोनों बढ़ेंगी।
उत्तर: कॉफ़ी की कीमत और मात्रा दोनों बढ़ेंगी
वस्तु की कीमत ₹10 है। श्रमिक 1 से 5 का MP: 15, 13, 10, 8, 5 (काल्पनिक आँकड़े)। मज़दूरी ₹80 हो, तो फर्म कितने श्रमिक रखेगी?
उत्तर देखें
VMP = 10 × MP = 150, 130, 100, 80, 50। चौथे श्रमिक पर VMP = 80 = w। पाँचवें का VMP (50) < 80। अतः 4 श्रमिक।
उत्तर: 4 श्रमिक
उच्चतम कीमत सीमा के तीन परिणाम बताइए।
उत्तर देखें
(1) अधिमाँग/कमी; (2) राशनिंग और लंबी कतारें; (3) काला बाज़ार — कुछ लोग सीमा से ऊँची कीमत पर बेचते हैं। साथ ही गुणवत्ता में गिरावट भी हो सकती है।
उत्तर: कमी, राशनिंग, काला बाज़ार
यदि किसी वस्तु की माँग और पूर्ति दोनों बढ़ें, तो संतुलन कीमत और मात्रा पर क्या प्रभाव होगा? सभी संभावनाएँ बताइए।
उत्तर देखें
मात्रा निश्चित रूप से बढ़ेगी, क्योंकि दोनों परिवर्तन मात्रा बढ़ाते हैं। कीमत पर प्रभाव अनिश्चित: (क) माँग में वृद्धि > पूर्ति में वृद्धि → कीमत बढ़ेगी; (ख) माँग में वृद्धि < पूर्ति में वृद्धि → कीमत घटेगी; (ग) दोनों समान → कीमत वही रहेगी।
उत्तर: मात्रा बढ़ेगी; कीमत परिवर्तनों के सापेक्ष आकार पर निर्भर
स्वतंत्र प्रवेश-निकास वाले बाज़ार में प्रत्येक फर्म का न्यूनतम AC ₹15 है, जहाँ वह 20 इकाई बनाती है। बाज़ार माँग qD = 1000 − 20p (काल्पनिक)। (क) संतुलन कीमत, मात्रा और फर्मों की संख्या ज्ञात कीजिए। (ख) माँग qD = 1300 − 20p हो जाए तो क्या बदलेगा?
उत्तर देखें
(क) p₀ = 15; q₀ = 1000 − 300 = 700; फर्में = 700/20 = 35। (ख) कीमत ₹15 ही रहेगी; q₀ = 1300 − 300 = 1000; फर्में = 1000/20 = 50 — अर्थात 15 नई फर्में आएँगी।
उत्तर: (क) ₹15, 700, 35 फर्में (ख) कीमत वही, मात्रा 1000, 50 फर्में
qD = 300 − 2p, qS = 60 + 2p (काल्पनिक फलन)। सरकार ₹50 की उच्चतम कीमत सीमा लगाती है। संतुलन और कमी ज्ञात कीजिए। क्या ₹70 की उच्चतम सीमा प्रभावी होगी?
उत्तर देखें
संतुलन: 300 − 2p = 60 + 2p → p* = 60, q* = 180। ₹50 पर: qD = 200, qS = 160 → कमी = 40 इकाई। ₹70 की उच्चतम सीमा संतुलन कीमत (60) से ऊपर है, इसलिए प्रभावहीन होगी — बाज़ार ₹60 पर ही चलेगा।
उत्तर: p* = 60, q* = 180; ₹50 पर कमी 40; ₹70 की सीमा प्रभावहीन
न्यूनतम कीमत सीमा (जैसे MSP) के लाभ और समस्याएँ बताइए।
उत्तर देखें
लाभ: किसानों/उत्पादकों को न्यूनतम आय की सुरक्षा; कीमतों के तेज़ गिरने से संरक्षण; उत्पादन के लिए प्रोत्साहन। समस्याएँ: संतुलन से ऊपर कीमत पर अधिपूर्ति; सरकार को अतिरिक्त उपज खरीदनी पड़ती है — भंडारण लागत, अनाज की बर्बादी का खतरा; उपभोक्ताओं को ऊँची कीमत; कुछ फसलों की ओर अत्यधिक झुकाव से फसल विविधता और भूजल पर प्रभाव। न्यूनतम मज़दूरी की स्थिति में अधिपूर्ति का अर्थ बेरोज़गारी हो सकता है।
उत्तर: उत्पादकों को सुरक्षा, पर अधिपूर्ति, सरकारी व्यय और भंडारण की समस्या
14. त्वरित पुनरावृत्ति सारांश
- संतुलन: qD = qS; ऊँची कीमत → अधिपूर्ति, नीची कीमत → अधिमाँग; "अदृश्य हाथ" से समायोजन।
- D खिसके → p, q एक दिशा में; S खिसके → p, q विपरीत दिशा में।
- दोनों खिसकें → एक चर निश्चित, दूसरा अनिश्चित।
- स्वतंत्र प्रवेश: p = न्यूनतम AC; माँग बदलने पर केवल मात्रा और फर्मों की संख्या बदलती है।
- श्रम बाज़ार: w = VMPL = p × MPL।
- उच्चतम सीमा (p* से नीचे) → कमी, राशनिंग, काला बाज़ार; न्यूनतम सीमा (p* से ऊपर) → आधिक्य, सरकारी खरीद।