1. अध्याय एक नज़र में
पिछले अध्याय में हमने देखा कि फर्म आगतों से निर्गत कैसे बनाती है और उत्पादन की लागत कैसे बदलती है। पर एक प्रश्न बाक़ी है — फर्म कितना उत्पादन करेगी? इसका उत्तर लागत के साथ-साथ इस पर भी निर्भर करता है कि फर्म अपना उत्पादन किस कीमत पर और किस प्रकार के बाज़ार में बेचती है।
इस अध्याय में हम सबसे सरल बाज़ार संरचना — पूर्ण प्रतिस्पर्धा (Perfect Competition) — का अध्ययन करेंगे। हम समझेंगे कि ऐसे बाज़ार में फर्म का आगम (Revenue) कैसा होता है, वह लाभ अधिकतम करने के लिए कितना उत्पादन करती है, उसका पूर्ति वक्र (Supply Curve) कैसे बनता है, पूर्ति को कौन-से कारक प्रभावित करते हैं, और पूर्ति की कीमत लोच (Price Elasticity of Supply) क्या है।
- पूर्ण प्रतिस्पर्धा की विशेषताएँ; फर्म कीमत स्वीकारक क्यों है।
- कुल आगम, औसत आगम और सीमांत आगम।
- लाभ अधिकतमीकरण की शर्तें — अल्पकाल और दीर्घकाल।
- सामान्य लाभ, लाभ-अलाभ बिंदु और उत्पादन बंद करने का बिंदु।
- फर्म और बाज़ार का पूर्ति वक्र; पूर्ति के निर्धारक।
- पूर्ति की कीमत लोच और उसका ज्यामितीय माप।
2. पूर्ण प्रतिस्पर्धा की विशेषताएँ
- क्रेताओं और विक्रेताओं की बहुत बड़ी संख्या: हर फर्म बाज़ार की कुल पूर्ति का इतना छोटा भाग बेचती है कि वह अकेले कीमत को प्रभावित नहीं कर सकती; इसी प्रकार कोई एक क्रेता भी कीमत प्रभावित नहीं कर सकता।
- समरूप उत्पाद (Homogeneous Product): सभी फर्मों का उत्पाद एक जैसा है — क्रेता के लिए किसी भी फर्म से खरीदना समान है।
- फर्मों का स्वतंत्र प्रवेश और निकास (Free Entry and Exit): कोई कानूनी या अन्य बाधा नहीं; लाभ दिखे तो नई फर्में आ सकती हैं, हानि हो तो फर्में बाज़ार छोड़ सकती हैं।
- पूर्ण जानकारी (Perfect Information): सभी क्रेताओं और विक्रेताओं को बाज़ार कीमत और उत्पाद की पूरी जानकारी है।
इन विशेषताओं के कारण पूर्ण प्रतिस्पर्धी फर्म बाज़ार कीमत को स्वीकार करती है — वह कीमत तय नहीं करती। बाज़ार कीमत उद्योग की कुल माँग और कुल पूर्ति से तय होती है। यदि फर्म बाज़ार कीमत से थोड़ा भी अधिक मूल्य माँगे, तो उसका एक भी क्रेता नहीं रहेगा (क्योंकि उत्पाद समरूप है और क्रेता को पूरी जानकारी है); और बाज़ार कीमत पर वह जितना चाहे उतना बेच सकती है, इसलिए कम कीमत रखने का कोई कारण नहीं।
पूर्ण प्रतिस्पर्धा वास्तविक जीवन में शायद ही कभी पूरी तरह मिलती है, पर कुछ कृषि उत्पादों के बाज़ार इसके निकट माने जाते हैं — जैसे किसी बड़ी मंडी में एक ही किस्म का गेहूँ बेचने वाले अनेक किसान। यह मॉडल अन्य बाज़ारों को समझने के लिए आधार का काम करता है।
3. आगम (Revenue)
| अवधारणा | अर्थ | सूत्र |
|---|---|---|
| कुल आगम (TR) | उत्पादन की बिक्री से प्राप्त कुल राशि | TR = p × q |
| औसत आगम (AR) | प्रति इकाई आगम | AR = TR ÷ q = p |
| सीमांत आगम (MR) | एक अतिरिक्त इकाई बेचने से कुल आगम में वृद्धि | MRₙ = TRₙ − TRₙ₋₁ |
पूर्ण प्रतिस्पर्धा में कीमत स्थिर है, इसलिए हर अतिरिक्त इकाई से ठीक p के बराबर आगम मिलता है:
- TR वक्र: मूल बिंदु से निकलने वाली सीधी रेखा, जिसकी ढलान = p।
- AR = MR वक्र: बाज़ार कीमत के स्तर पर क्षैतिज रेखा — इसे फर्म का माँग वक्र भी कहते हैं, जो पूर्णतः लोचदार है।
बाज़ार कीमत ₹10 है। फर्म 1, 2, 3, 4 इकाई बेचती है तो TR = 10, 20, 30, 40; AR = 10, 10, 10, 10; MR = 10, 10, 10, 10। TR रेखा की ढलान 10 है।
4. लाभ अधिकतमीकरण (Profit Maximisation)
फर्म उस निर्गत (q₀) का चुनाव करती है जिस पर लाभ अधिकतम हो। पूर्ण प्रतिस्पर्धी फर्म के लिए अल्पकाल में धनात्मक उत्पादन पर लाभ अधिकतमीकरण की तीन शर्तें हैं:
- p = MC: बाज़ार कीमत, सीमांत लागत के बराबर हो।
- MC बढ़ रही हो: q₀ पर MC वक्र ऊपर की ओर ढलान वाला (non-decreasing) हो।
- p ≥ AVC: कीमत कम-से-कम न्यूनतम औसत परिवर्ती लागत के बराबर हो।
शर्त 1 — p = MC क्यों?
यदि p > MC: एक और इकाई बनाने पर आगम में वृद्धि (p) लागत में वृद्धि (MC) से अधिक है — लाभ बढ़ेगा, इसलिए उत्पादन बढ़ाना चाहिए। यदि p < MC: अंतिम इकाई से लागत अधिक बढ़ रही है — उत्पादन घटाने से लाभ बढ़ेगा। अतः लाभ अधिकतम वहीं होगा जहाँ p = MC।
शर्त 2 — MC बढ़ती हुई क्यों?
MC वक्र U-आकार का है, इसलिए p रेखा उसे दो बिंदुओं पर काट सकती है — एक जहाँ MC घट रही है, दूसरा जहाँ बढ़ रही है। घटती MC वाले बिंदु पर उत्पादन थोड़ा बढ़ाने से MC, p से कम हो जाएगी — लाभ और बढ़ेगा। इसलिए वह बिंदु अधिकतम लाभ का नहीं है; संतुलन बढ़ती MC वाले बिंदु पर होता है।
शर्त 3 — p ≥ AVC क्यों?
अल्पकाल में उत्पादन बंद करने पर भी स्थिर लागत (TFC) तो देनी ही पड़ेगी। यदि p < AVC, तो फर्म अपनी परिवर्ती लागत भी नहीं निकाल पा रही — उत्पादन करने पर हानि TFC से भी अधिक होगी। ऐसे में उत्पादन बंद करना बेहतर है (हानि केवल TFC)। यदि p ≥ AVC, तो उत्पादन जारी रखने पर कम-से-कम परिवर्ती लागत निकल जाती है और स्थिर लागत का कुछ भाग भी।
दीर्घकाल की शर्तें
दीर्घकाल में कोई स्थिर लागत नहीं होती, इसलिए तीसरी शर्त बदल जाती है: p ≥ LRAC (न्यूनतम दीर्घकालीन औसत लागत)। साथ ही p = LRMC और LRMC बढ़ती हुई।
5. सामान्य लाभ, लाभ-अलाभ बिंदु और बंद करने का बिंदु
| अवधारणा | अर्थ |
|---|---|
| सामान्य लाभ (Normal Profit) | वह न्यूनतम लाभ जो फर्म को उसी व्यवसाय में बनाए रखने के लिए आवश्यक है; यह फर्म की अवसर लागत है और कुल लागत में शामिल माना जाता है। जब TR = TC, तो फर्म केवल सामान्य लाभ कमा रही होती है। |
| असामान्य / अतिरिक्त लाभ (Super-normal Profit) | सामान्य लाभ से ऊपर का लाभ — जब TR > TC (p > AC)। |
| लाभ-अलाभ बिंदु (Break-even Point) | वह बिंदु जहाँ p = न्यूनतम AC; फर्म केवल सामान्य लाभ कमाती है — न अतिरिक्त लाभ, न हानि। यह MC और AC के प्रतिच्छेद पर होता है। |
| उत्पादन बंद करने का बिंदु (Shut-down Point) | अल्पकाल में: p = न्यूनतम AVC। इससे कम कीमत पर फर्म उत्पादन बंद कर देगी। दीर्घकाल में: p = न्यूनतम LRAC। |
किसी फर्म की TFC = ₹200 है। एक निश्चित निर्गत पर उसका AVC ₹15 है और बाज़ार कीमत ₹18 है, AC ₹22 है। क्या फर्म को अल्पकाल में उत्पादन जारी रखना चाहिए?
हल: p (18) < AC (22), इसलिए फर्म हानि में है। पर p (18) > AVC (15), इसलिए उत्पादन करने पर वह परिवर्ती लागत निकालने के बाद प्रति इकाई ₹3 स्थिर लागत की ओर भी चुका रही है। उत्पादन बंद करने पर हानि पूरी TFC (₹200) होती। अतः अल्पकाल में उत्पादन जारी रखना चाहिए। दीर्घकाल में यदि p < LRAC बना रहा, तो फर्म बाज़ार छोड़ देगी।
दीर्घकाल में केवल सामान्य लाभ क्यों?
स्वतंत्र प्रवेश-निकास के कारण: यदि फर्में असामान्य लाभ कमा रही हैं, तो नई फर्में बाज़ार में आएँगी; बाज़ार पूर्ति बढ़ेगी और कीमत गिरेगी, जब तक असामान्य लाभ समाप्त न हो जाए। यदि फर्में हानि में हैं, तो कुछ फर्में बाज़ार छोड़ेंगी; पूर्ति घटेगी और कीमत बढ़ेगी। अंततः दीर्घकालीन संतुलन में p = न्यूनतम LRAC — सभी फर्में केवल सामान्य लाभ कमाती हैं।
6. पूर्ति वक्र (Supply Curve)
किसी फर्म का पूर्ति वक्र विभिन्न कीमतों पर उस निर्गत के स्तरों को दर्शाता है जिनका उत्पादन फर्म लाभ अधिकतम करने के लिए करना चाहेगी, अन्य बातें समान रहने पर।
- अल्पकालीन पूर्ति वक्र: न्यूनतम AVC बिंदु से ऊपर का MC वक्र का बढ़ता हुआ भाग। न्यूनतम AVC से कम कीमत पर पूर्ति शून्य।
- दीर्घकालीन पूर्ति वक्र: न्यूनतम LRAC बिंदु से ऊपर का LRMC वक्र का बढ़ता हुआ भाग।
- बाज़ार पूर्ति वक्र: सभी फर्मों के पूर्ति वक्रों का क्षैतिज योग — किसी कीमत पर सभी फर्मों की पूर्ति जोड़ें।
पूर्ति का नियम
अन्य बातें समान रहने पर, किसी वस्तु की कीमत और उसकी पूर्ति की गई मात्रा में प्रत्यक्ष (सीधा) संबंध होता है — कीमत बढ़ने पर पूर्ति बढ़ती है। इसका कारण बढ़ती MC है: अधिक उत्पादन तभी लाभदायक है जब कीमत बढ़ी हुई MC को पूरा करे।
किसी फर्म का न्यूनतम AVC ₹6 है। उसका बढ़ता हुआ MC: q = 3 पर ₹6, q = 4 पर ₹8, q = 5 पर ₹10, q = 6 पर ₹13। तब उसकी पूर्ति अनुसूची होगी — कीमत ₹6 से कम पर 0; ₹6 पर 3; ₹8 पर 4; ₹10 पर 5; ₹13 पर 6 इकाई। अर्थात हर कीमत पर फर्म वह मात्रा देती है जहाँ p = MC — यही पूर्ति वक्र का MC वक्र से संबंध है। यदि बाज़ार में ऐसी ही 100 समान फर्में हों, तो ₹10 पर बाज़ार पूर्ति 100 × 5 = 500 इकाई होगी।
पूर्ति वक्र के खिसकने के कारण (पूर्ति के निर्धारक)
| कारक | प्रभाव |
|---|---|
| तकनीकी प्रगति | MC घटती है → पूर्ति वक्र दाईं ओर (पूर्ति में वृद्धि) |
| आगतों की कीमत बढ़ना (जैसे मज़दूरी, कच्चा माल) | MC बढ़ती है → पूर्ति वक्र बाईं ओर (पूर्ति में कमी) |
| इकाई कर (Unit Tax) लगना | प्रति इकाई लागत बढ़ती है → MC वक्र कर की राशि जितना ऊपर → पूर्ति वक्र बाईं ओर |
| उत्पादन पर सब्सिडी | लागत घटती है → पूर्ति वक्र दाईं ओर |
| बाज़ार में फर्मों की संख्या बढ़ना | बाज़ार पूर्ति वक्र दाईं ओर |
वस्तु की अपनी कीमत बदलने से पूर्ति वक्र पर संचलन होता है — पूर्ति का विस्तार (कीमत बढ़ी) या संकुचन (कीमत घटी)। अन्य कारकों के बदलने से पूरा पूर्ति वक्र खिसकता है — पूर्ति में वृद्धि या कमी।
7. पूर्ति की कीमत लोच (Price Elasticity of Supply)
पूर्ति के नियम के कारण कीमत और मात्रा एक ही दिशा में बदलती हैं, इसलिए eS सामान्यतः धनात्मक होती है।
कीमत ₹20 से बढ़कर ₹25 होती है और पूर्ति 400 से बढ़कर 600 इकाई हो जाती है। eS ज्ञात कीजिए।
हल: पूर्ति में % परिवर्तन = 200/400 × 100 = 50%। कीमत में % परिवर्तन = 5/20 × 100 = 25%। eS = 50/25 = 2 — लोचदार पूर्ति।
ज्यामितीय विधि (सीधी रेखा वाले पूर्ति वक्र के लिए)
| पूर्ति वक्र (आगे बढ़ाने पर) | लोच |
|---|---|
| मूल बिंदु से होकर जाता है | eS = 1 (वक्र पर हर बिंदु पर, ढलान कोई भी हो) |
| कीमत अक्ष (y-अक्ष) को धनात्मक भाग में काटता है | eS > 1 |
| मात्रा अक्ष (x-अक्ष) को धनात्मक भाग में काटता है | eS < 1 |
| ऊर्ध्वाधर रेखा | eS = 0 (पूर्णतः बेलोचदार) |
| क्षैतिज रेखा | eS = ∞ (पूर्णतः लोचदार) |
पूर्ति की लोच इस पर निर्भर करती है कि उत्पादन कितनी जल्दी और किस लागत पर बढ़ाया जा सकता है। दीर्घकाल में पूर्ति अधिक लोचदार होती है, क्योंकि फर्में संयंत्र का आकार बदल सकती हैं और नई फर्में बाज़ार में आ सकती हैं। जल्दी नष्ट होने वाली वस्तुओं (सब्ज़ियाँ, फल) की अल्पकालीन पूर्ति प्रायः बेलोचदार होती है।
8. तालिका द्वारा लाभ अधिकतमीकरण : दो विधियाँ
लाभ अधिकतम निर्गत दो विधियों से ज्ञात किया जा सकता है — (1) TR−TC विधि: जहाँ TR और TC का अंतर सबसे अधिक हो; (2) MR−MC विधि: जहाँ MR = MC हो और उसके बाद MC > MR हो। दोनों विधियों से एक ही उत्तर मिलना चाहिए।
| q | p = MR | TR | TC | लाभ (TR − TC) | MC |
|---|---|---|---|---|---|
| 0 | 10 | 0 | 8 | −8 | — |
| 1 | 10 | 10 | 15 | −5 | 7 |
| 2 | 10 | 20 | 20 | 0 | 5 |
| 3 | 10 | 30 | 26 | 4 | 6 |
| 4 | 10 | 40 | 34 | 6 | 8 |
| 5 | 10 | 50 | 44 | 6 | 10 |
| 6 | 10 | 60 | 57 | 3 | 13 |
(अभ्यास हेतु काल्पनिक आँकड़े; TFC = ₹8)
TR−TC विधि: लाभ q = 4 और q = 5 पर समान (₹6) और अधिकतम है। MR−MC विधि: q = 5 पर MR = MC = 10, और उसके बाद (q = 6) MC = 13 > MR — इसलिए संतुलन निर्गत 5 इकाई है। (q = 5 पर अतिरिक्त इकाई से लाभ न बढ़ता है न घटता है — MR = MC; परीक्षा में MR = MC वाला बिंदु ही संतुलन के रूप में लिखा जाता है।)
q = 0 पर हानि ₹8 है, जो TFC के बराबर है। यदि किसी कीमत पर फर्म की सर्वोत्तम स्थिति में भी हानि TFC से अधिक होती, तो वह उत्पादन बंद कर देती। यह p ≥ AVC वाली शर्त का ही तालिका-रूप है।
9. मास्टर तालिका : प्रमुख सूत्र और शर्तें
| अवधारणा | सूत्र / शर्त |
|---|---|
| कुल आगम | TR = p × q |
| औसत और सीमांत आगम | AR = TR/q; MR = ΔTR |
| पूर्ण प्रतिस्पर्धा | p = AR = MR |
| लाभ | π = TR − TC |
| अल्पकाल संतुलन | p = MC, MC बढ़ती, p ≥ न्यूनतम AVC |
| दीर्घकाल संतुलन | p = LRMC, LRMC बढ़ती, p ≥ न्यूनतम LRAC |
| लाभ-अलाभ बिंदु | p = न्यूनतम AC |
| बंद करने का बिंदु (अल्पकाल) | p = न्यूनतम AVC |
| पूर्ति की लोच | eS = (ΔQ/ΔP) × (P/Q) |
10. मास्टर सारांश तालिका
| विषय | मुख्य बिंदु |
|---|---|
| बाज़ार संरचना | अनेक फर्में, समरूप उत्पाद, स्वतंत्र प्रवेश-निकास, पूर्ण जानकारी |
| फर्म का व्यवहार | कीमत स्वीकारक; क्षैतिज AR = MR |
| संतुलन | p = MC (बढ़ती) — अल्पकाल p ≥ AVC, दीर्घकाल p ≥ LRAC |
| पूर्ति वक्र | न्यूनतम AVC (अल्पकाल) / न्यूनतम LRAC (दीर्घकाल) से ऊपर का MC |
| पूर्ति लोच | मूल बिंदु से रेखा = 1; y-अक्ष कटान > 1; x-अक्ष कटान < 1 |
11. माइंड मैप
- कीमत स्वीकारक
- p = AR = MR
- p = MC, MC बढ़ती
- p ≥ AVC / LRAC
- MC का भाग
- निर्धारक, खिसकना
- प्रतिशत विधि
- ज्यामितीय विधि
12. टिप्स और ट्रिक्स
- संतुलन प्रश्न में तीन बार जाँचें: p = MC? MC बढ़ रही? p ≥ AVC?
- "अल्पकाल = AVC, दीर्घकाल = AC" — बंद करने के बिंदु के लिए।
- पूर्ति लोच का ज्यामितीय प्रश्न: रेखा को बढ़ाकर देखें कि वह कहाँ मिलती है — मूल बिंदु, y-अक्ष या x-अक्ष।
- सामान्य लाभ को "शून्य लाभ" समझकर लागत से बाहर रखना — यह लागत में शामिल है।
- पूरे MC वक्र को पूर्ति वक्र मान लेना — केवल न्यूनतम AVC से ऊपर का भाग।
- हानि होते ही "उत्पादन बंद" लिखना — अल्पकाल में p ≥ AVC हो तो उत्पादन जारी रहता है।
13. महत्वपूर्ण वन-लाइनर
- पूर्ण प्रतिस्पर्धी फर्म का माँग वक्र पूर्णतः लोचदार (क्षैतिज) होता है।
- पूर्ण प्रतिस्पर्धा में TR वक्र मूल बिंदु से निकलने वाली सीधी रेखा है।
- लाभ-अलाभ बिंदु पर p = न्यूनतम AC।
- अल्पकाल में बंद करने का बिंदु p = न्यूनतम AVC है।
- दीर्घकाल में पूर्ण प्रतिस्पर्धी फर्में केवल सामान्य लाभ कमाती हैं।
- इकाई कर लगने से पूर्ति वक्र बाईं ओर खिसकता है।
- मूल बिंदु से गुज़रने वाले सीधे पूर्ति वक्र की लोच 1 होती है।
- दीर्घकाल में पूर्ति अल्पकाल की तुलना में अधिक लोचदार होती है।
14. परीक्षा-पैटर्न प्रश्न (विस्तृत उत्तर सहित)
पूर्ण प्रतिस्पर्धा में फर्म का औसत आगम वक्र होता है:
- नीचे की ओर ढलान वाला
- क्षैतिज
- ऊर्ध्वाधर
- ऊपर की ओर ढलान वाला
उत्तर देखें
फर्म कीमत स्वीकारक है, इसलिए हर मात्रा पर AR = p — क्षैतिज रेखा।
उत्तर: (ख) क्षैतिज
लाभ-अलाभ बिंदु से क्या अभिप्राय है?
उत्तर देखें
वह बिंदु जहाँ कीमत न्यूनतम औसत लागत के बराबर होती है; फर्म केवल सामान्य लाभ कमाती है — न अतिरिक्त लाभ, न हानि।
उत्तर: p = न्यूनतम AC का बिंदु
बाज़ार पूर्ति वक्र कैसे प्राप्त किया जाता है?
उत्तर देखें
सभी फर्मों के व्यक्तिगत पूर्ति वक्रों के क्षैतिज योग से — प्रत्येक कीमत पर सभी फर्मों की पूर्ति जोड़कर।
उत्तर: व्यक्तिगत पूर्ति वक्रों का क्षैतिज योग
पूर्ण प्रतिस्पर्धी फर्म कीमत स्वीकारक क्यों होती है?
उत्तर देखें
फर्मों की संख्या बहुत अधिक है और हर फर्म बाज़ार पूर्ति का बहुत छोटा भाग बेचती है; उत्पाद समरूप है; क्रेताओं को पूर्ण जानकारी है। इसलिए बाज़ार कीमत से अधिक माँगने पर फर्म के सभी क्रेता चले जाएँगे, और बाज़ार कीमत पर वह जितना चाहे बेच सकती है — इसलिए वह बाज़ार कीमत स्वीकार करती है।
उत्तर: अनेक फर्में + समरूप उत्पाद + पूर्ण जानकारी
कीमत ₹12 है। MC अनुसूची: 15, 10, 8, 10, 12, 16 (q = 1 से 6; काल्पनिक आँकड़े)। फर्म कितना उत्पादन करेगी? (मान लें इस स्तर पर p ≥ AVC)
उत्तर देखें
p = MC = 12 केवल q = 5 पर है, और वहाँ MC बढ़ रही है (10 → 12 → 16)। अतः फर्म 5 इकाई उत्पादन करेगी।
उत्तर: 5 इकाई
तकनीकी प्रगति और आगत कीमत में वृद्धि का पूर्ति वक्र पर क्या प्रभाव होगा?
उत्तर देखें
तकनीकी प्रगति से प्रति इकाई लागत (MC) घटती है — हर कीमत पर अधिक पूर्ति — वक्र दाईं ओर खिसकता है। आगत कीमत बढ़ने से MC बढ़ती है — वक्र बाईं ओर खिसकता है।
उत्तर: तकनीकी प्रगति → दाईं ओर; आगत कीमत वृद्धि → बाईं ओर
किसी वस्तु की कीमत ₹40 से घटकर ₹32 होने पर पूर्ति 500 से घटकर 450 इकाई हो जाती है (काल्पनिक आँकड़े)। eS ज्ञात कीजिए।
उत्तर देखें
पूर्ति में % परिवर्तन = −50/500 × 100 = −10%। कीमत में % परिवर्तन = −8/40 × 100 = −20%। eS = −10/−20 = 0.5 — बेलोचदार पूर्ति।
उत्तर: eS = 0.5
एक सीधी रेखा वाला पूर्ति वक्र आगे बढ़ाने पर मात्रा अक्ष को धनात्मक भाग में काटता है। इसकी लोच के बारे में क्या कहा जा सकता है?
उत्तर देखें
ऐसे पूर्ति वक्र पर हर बिंदु पर eS < 1 होती है — पूर्ति बेलोचदार है।
उत्तर: eS < 1
अल्पकाल में लाभ अधिकतमीकरण की तीनों शर्तों की व्याख्या कीजिए।
उत्तर देखें
(1) p = MC: p > MC पर उत्पादन बढ़ाना लाभदायक, p < MC पर घटाना — अतः संतुलन p = MC पर। (2) MC बढ़ती: घटती MC वाले बिंदु पर उत्पादन बढ़ाने से MC, p से कम होगी और लाभ बढ़ेगा, इसलिए वह अधिकतम लाभ बिंदु नहीं। (3) p ≥ न्यूनतम AVC: यदि p < AVC, तो उत्पादन करने पर हानि TFC से अधिक होगी; बंद करने पर हानि केवल TFC — इसलिए फर्म उत्पादन बंद करेगी।
उत्तर: p = MC, MC बढ़ती, p ≥ न्यूनतम AVC
दीर्घकाल में पूर्ण प्रतिस्पर्धी फर्में केवल सामान्य लाभ ही क्यों कमाती हैं?
उत्तर देखें
स्वतंत्र प्रवेश-निकास के कारण। असामान्य लाभ होने पर नई फर्में आती हैं — बाज़ार पूर्ति बढ़ती है, कीमत घटती है, जब तक लाभ सामान्य न हो जाए। हानि होने पर कुछ फर्में बाहर जाती हैं — पूर्ति घटती है, कीमत बढ़ती है, जब तक हानि समाप्त न हो। अंततः p = न्यूनतम LRAC पर संतुलन — केवल सामान्य लाभ।
उत्तर: स्वतंत्र प्रवेश-निकास से p = न्यूनतम LRAC
एक फर्म के लिए: कीमत ₹30, उत्पादन 100 इकाई, AC = ₹34, AVC = ₹27, TFC = ₹700 (काल्पनिक आँकड़े)। (क) फर्म का लाभ/हानि ज्ञात कीजिए। (ख) क्या उसे अल्पकाल में उत्पादन जारी रखना चाहिए?
उत्तर देखें
(क) TR = 30 × 100 = ₹3,000; TC = 34 × 100 = ₹3,400; हानि = ₹400। (ख) बंद करने पर हानि = TFC = ₹700। उत्पादन जारी रखने पर हानि केवल ₹400 है (क्योंकि p = 30 > AVC = 27)। अतः अल्पकाल में उत्पादन जारी रखना चाहिए। (जाँच: TC = TVC + TFC = 2,700 + 700 = 3,400 ✓)
उत्तर: हानि ₹400; उत्पादन जारी रखे (₹700 की हानि से बेहतर)
किसी वस्तु पर प्रति इकाई ₹5 का कर लगाया जाता है। फर्म के MC वक्र और पूर्ति वक्र पर क्या प्रभाव होगा? आरेख की सहायता से समझाइए।
उत्तर देखें
इकाई कर से हर इकाई की उत्पादन लागत ₹5 बढ़ जाती है, इसलिए MC (और AVC) वक्र ₹5 की ऊर्ध्वाधर दूरी से ऊपर खिसकते हैं। चूँकि फर्म का पूर्ति वक्र, न्यूनतम AVC से ऊपर का MC वक्र है, पूर्ति वक्र भी ऊपर/बाईं ओर खिसकेगा — हर कीमत पर पूर्ति कम होगी। साथ ही बंद करने वाली न्यूनतम कीमत भी ₹5 बढ़ जाएगी। (आरेख: मूल पूर्ति वक्र S₁ और उसके ठीक ₹5 ऊपर समानांतर S₂।)
उत्तर: MC ₹5 ऊपर; पूर्ति वक्र बाईं/ऊपर खिसकेगा
15. त्वरित पुनरावृत्ति सारांश
- पूर्ण प्रतिस्पर्धा: अनेक फर्में, समरूप उत्पाद, स्वतंत्र प्रवेश-निकास, पूर्ण जानकारी → कीमत स्वीकारक।
- p = AR = MR; TR मूल बिंदु से सीधी रेखा।
- संतुलन: p = MC, MC बढ़ती, p ≥ न्यूनतम AVC (अल्पकाल) / LRAC (दीर्घकाल)।
- लाभ-अलाभ बिंदु = न्यूनतम AC; बंद करने का बिंदु = न्यूनतम AVC।
- पूर्ति वक्र = न्यूनतम AVC से ऊपर का MC; बाज़ार पूर्ति = क्षैतिज योग।
- eS = (ΔQ/ΔP)(P/Q); मूल बिंदु से रेखा = 1, y-अक्ष कटान > 1, x-अक्ष कटान < 1।