1. अध्याय एक नज़र में
आपके मोबाइल फ़ोन के पुर्ज़े शायद किसी दूसरे देश में बने हैं; आपके पेट्रोल का कच्चा तेल आयात किया गया है; और भारत में बनी दवाइयाँ, सॉफ़्टवेयर सेवाएँ और कपड़े विदेशों में बिकते हैं। लाखों भारतीय विदेशों में काम करके घर पैसा भेजते हैं, और विदेशी कंपनियाँ भारत में कारखाने लगाती हैं। ऐसी अर्थव्यवस्था, जो शेष विश्व से जुड़ी हो, खुली अर्थव्यवस्था (Open Economy) कहलाती है।
इस अध्याय में हम समझेंगे कि खुली अर्थव्यवस्था शेष विश्व से किन माध्यमों से जुड़ती है, देश के अंतरराष्ट्रीय लेन-देन का लेखा — भुगतान संतुलन (Balance of Payments) — कैसे बनता है, विदेशी विनिमय दर (Foreign Exchange Rate) कैसे निर्धारित होती है, और विभिन्न विनिमय दर प्रणालियाँ क्या हैं।
- खुली अर्थव्यवस्था के तीन संपर्क: उत्पाद, वित्तीय और साधन बाज़ार।
- भुगतान संतुलन: चालू खाता और पूँजी खाता।
- व्यापार शेष, चालू खाता घाटा; स्वायत्त और समायोजक लेन-देन।
- विदेशी विनिमय बाज़ार; विदेशी मुद्रा की माँग और पूर्ति।
- नम्य, स्थिर और प्रबंधित तिरती विनिमय दर; मूल्यह्रास-मूल्यवृद्धि, अवमूल्यन-पुनर्मूल्यन।
- वास्तविक विनिमय दर और खुली अर्थव्यवस्था में समग्र माँग।
2. खुली अर्थव्यवस्था के संपर्क
| संपर्क | अर्थ | उदाहरण |
|---|---|---|
| उत्पाद बाज़ार संपर्क (Output Market) | वस्तुओं और सेवाओं का व्यापार — निर्यात और आयात; उपभोक्ता और उत्पादक घरेलू और विदेशी वस्तुओं में चुनाव कर सकते हैं | भारत से चावल और सॉफ़्टवेयर सेवाओं का निर्यात; कच्चे तेल का आयात |
| वित्तीय बाज़ार संपर्क (Financial Market) | परिसंपत्तियों का अंतरराष्ट्रीय क्रय-विक्रय — निवेशक घरेलू या विदेशी परिसंपत्तियों में निवेश कर सकते हैं | विदेशी निवेशकों द्वारा भारतीय शेयर खरीदना; भारतीय कंपनी का विदेश में निवेश |
| साधन बाज़ार संपर्क (Factor Market) | उत्पादन के साधनों — विशेषकर श्रम और पूँजी — का देशों के बीच आवागमन | भारतीय श्रमिकों का खाड़ी देशों में काम करना; विदेशी कंपनी द्वारा भारत में कारखाना लगाना |
व्यापार पर प्रशुल्क (Tariff), कोटा और पूँजी नियंत्रण जैसी बाधाएँ होती हैं, फिर भी विश्व की अधिकांश अर्थव्यवस्थाएँ आज काफ़ी हद तक खुली हैं। अंतरराष्ट्रीय लेन-देन के लिए एक सर्व-स्वीकार्य मुद्रा चाहिए — जिसे विदेशी मुद्रा (जैसे अमेरिकी डॉलर) के रूप में उपयोग किया जाता है; इसके मूल्य में विश्वास बनाए रखना आवश्यक है।
3. भुगतान संतुलन (Balance of Payments)
भुगतान संतुलन किसी देश के सामान्य निवासियों और शेष विश्व के बीच एक निश्चित अवधि (सामान्यतः एक वर्ष) में हुए सभी आर्थिक लेन-देनों का व्यवस्थित लेखा है। यह दोहरी प्रविष्टि (Double Entry) प्रणाली पर आधारित है, इसलिए लेखांकन की दृष्टि से कुल मिलाकर यह सदैव संतुलित रहता है।
भुगतान संतुलन के दो मुख्य खाते हैं — चालू खाता (Current Account) और पूँजी खाता (Capital Account)। विदेश से आने वाली प्राप्तियाँ जमा (Credit, +) और विदेश को किए जाने वाले भुगतान नामे (Debit, −) में दर्ज होते हैं।
(क) चालू खाता
इसमें वे लेन-देन दर्ज होते हैं जो देश की परिसंपत्तियों या देयताओं में परिवर्तन नहीं करते — वस्तुओं, सेवाओं, आय और हस्तांतरणों का प्रवाह।
| घटक | विवरण |
|---|---|
| दृश्य व्यापार (Visible Trade) — वस्तुएँ | वस्तुओं का निर्यात और आयात; दोनों का अंतर व्यापार शेष (Balance of Trade) है |
| अदृश्य व्यापार (Invisibles) — सेवाएँ | पर्यटन, परिवहन, बैंकिंग, बीमा, सॉफ़्टवेयर सेवाएँ |
| साधन आय (Income) | विदेश में निवेश पर ब्याज, लाभांश, लाभ; विदेश में अस्थायी रूप से काम करने वालों की मज़दूरी |
| हस्तांतरण (Transfers) | बिना किसी बदले के प्राप्तियाँ-भुगतान — विदेश में बसे लोगों द्वारा परिवार को भेजी गई राशि (Remittances), उपहार, अनुदान |
(ख) पूँजी खाता
इसमें वे लेन-देन दर्ज होते हैं जो देश की परिसंपत्तियों या देयताओं में परिवर्तन करते हैं:
- विदेशी प्रत्यक्ष निवेश (FDI): विदेशी कंपनी द्वारा भारत में कारखाना लगाना या किसी कंपनी पर नियंत्रण के लिए बड़ा हिस्सा खरीदना — दीर्घकालीन और अपेक्षाकृत स्थिर।
- विदेशी पोर्टफ़ोलियो निवेश (FPI): शेयरों और बॉन्डों में निवेश, बिना प्रबंधन नियंत्रण के — अपेक्षाकृत अस्थिर ("तत्पर धन" — Hot Money)।
- बाह्य वाणिज्यिक उधार और ऋण: सरकार और कंपनियों द्वारा विदेश से उधार।
- बैंकिंग पूँजी: अनिवासी भारतीयों की जमाएँ आदि।
जब विदेशी भारत में निवेश करते हैं या भारत को ऋण देते हैं, तो पूँजी का अंतर्प्रवाह (Inflow) होता है — यह जमा प्रविष्टि है। जब भारतीय विदेश में निवेश करते हैं, तो बहिर्प्रवाह (Outflow) — नामे प्रविष्टि।
भुगतान संतुलन में घाटा और अधिशेष
| स्वायत्त लेन-देन (Autonomous) | समायोजक लेन-देन (Accommodating) |
|---|---|
| लाभ या अन्य आर्थिक उद्देश्य से स्वतंत्र रूप से किए गए लेन-देन — भुगतान संतुलन की स्थिति से निरपेक्ष ("रेखा से ऊपर" की मदें) | स्वायत्त लेन-देनों से उत्पन्न अंतर को पाटने के लिए किए गए लेन-देन — मुख्यतः केंद्रीय बैंक द्वारा विदेशी मुद्रा भंडार में परिवर्तन ("रेखा से नीचे" की मदें) |
| उदाहरण: निर्यात-आयात, FDI | उदाहरण: RBI द्वारा भंडार से डॉलर बेचना; IMF से उधार |
यदि स्वायत्त प्राप्तियाँ स्वायत्त भुगतानों से अधिक हों, तो भुगतान संतुलन अधिशेष — विदेशी मुद्रा भंडार बढ़ता है। यदि कम हों, तो भुगतान संतुलन घाटा — भंडार घटता है। सांख्यिकीय विसंगतियों के लिए एक मद "त्रुटियाँ और चूक" (Errors and Omissions) भी रखी जाती है।
वस्तु निर्यात 400; वस्तु आयात 550; निवल सेवाएँ +80; निवल आय −20; निवल हस्तांतरण +60; निवल FDI +40; निवल FPI +15; निवल ऋण −5।
व्यापार शेष = 400 − 550 = −150 (व्यापार घाटा)।
चालू खाता शेष = −150 + 80 − 20 + 60 = −30 (चालू खाता घाटा)।
पूँजी खाता शेष = 40 + 15 − 5 = +50।
समग्र शेष = −30 + 50 = +20 → विदेशी मुद्रा भंडार में 20 की वृद्धि (त्रुटियाँ-चूक शून्य मानकर)।
निर्वचन: वस्तुओं का बड़ा व्यापार घाटा सेवाओं के निर्यात और प्रवासी हस्तांतरणों से काफ़ी हद तक पूरा हो गया; शेष चालू खाता घाटा पूँजी अंतर्प्रवाह से वित्तपोषित हुआ।
4. विदेशी विनिमय बाज़ार और विनिमय दर
विदेशी विनिमय दर (Foreign Exchange Rate) एक मुद्रा की दूसरी मुद्रा के रूप में कीमत है — जैसे एक अमेरिकी डॉलर के बदले कितने रुपये देने होंगे। विदेशी विनिमय बाज़ार वह बाज़ार है जहाँ विभिन्न देशों की मुद्राओं का क्रय-विक्रय होता है।
विदेशी मुद्रा की माँग (Demand for Foreign Exchange)
भारत में लोगों को डॉलर (विदेशी मुद्रा) की आवश्यकता क्यों होती है?
- विदेशों से वस्तुएँ और सेवाएँ आयात करने के लिए।
- विदेश यात्रा, विदेश में पढ़ाई और इलाज के लिए।
- विदेशी परिसंपत्तियाँ (शेयर, भूमि, कंपनियाँ) ख़रीदने के लिए।
- विदेश में उपहार और हस्तांतरण भेजने के लिए।
- विदेशी मुद्रा के मूल्य में वृद्धि की आशा से सट्टे के लिए।
माँग वक्र नीचे की ओर ढलता है: डॉलर की रुपया कीमत (विनिमय दर) गिरने पर आयात सस्ते हो जाते हैं — एक $10 की वस्तु पहले ₹850 की थी, विनिमय दर ₹80/$ होने पर ₹800 की — इसलिए आयात और डॉलर की माँग बढ़ती है।
विदेशी मुद्रा की पूर्ति (Supply of Foreign Exchange)
- भारतीय वस्तुओं-सेवाओं का निर्यात (विदेशी ख़रीदार डॉलर देते हैं)।
- विदेशी पर्यटकों का भारत आना।
- विदेशियों द्वारा भारत में प्रत्यक्ष और पोर्टफ़ोलियो निवेश।
- विदेश में रहने वाले भारतीयों द्वारा भेजा गया धन (प्रेषण — Remittances)।
- सट्टेबाज़ों द्वारा विदेशी मुद्रा बेचना।
पूर्ति वक्र ऊपर की ओर ढलता है: डॉलर की रुपया कीमत बढ़ने पर भारतीय वस्तुएँ विदेशियों के लिए सस्ती हो जाती हैं — ₹800 की वस्तु पहले (₹80/$ पर) $10 की थी, ₹100/$ होने पर $8 की — इसलिए निर्यात और डॉलर की पूर्ति बढ़ती है।
5. नम्य विनिमय दर का निर्धारण
नम्य (Flexible) या तिरती (Floating) विनिमय दर प्रणाली में विनिमय दर बाज़ार में विदेशी मुद्रा की माँग और पूर्ति से स्वतंत्र रूप से निर्धारित होती है — केंद्रीय बैंक हस्तक्षेप नहीं करता।
| शब्द | अर्थ | उदाहरण (काल्पनिक) |
|---|---|---|
| मूल्यह्रास (Depreciation) | नम्य प्रणाली में बाज़ार की शक्तियों द्वारा घरेलू मुद्रा के मूल्य में कमी — एक डॉलर के लिए अधिक रुपये देने पड़ते हैं | ₹80/$ से ₹85/$ — रुपये का मूल्यह्रास, डॉलर की मूल्यवृद्धि |
| मूल्यवृद्धि (Appreciation) | बाज़ार की शक्तियों द्वारा घरेलू मुद्रा के मूल्य में वृद्धि | ₹85/$ से ₹80/$ — रुपये की मूल्यवृद्धि |
विनिमय दर (₹ प्रति $) बढ़ने का अर्थ है रुपये का मूल्य घटना (मूल्यह्रास)। इस उलटे संबंध में सबसे अधिक भूलें होती हैं।
मूल्यह्रास के प्रभाव
- निर्यात सस्ते (विदेशियों के लिए) → निर्यात बढ़ने की प्रवृत्ति।
- आयात महँगे → आयात घटने की प्रवृत्ति; पर आयातित कच्चे तेल जैसी अनिवार्य वस्तुओं के महँगे होने से घरेलू मुद्रास्फीति बढ़ सकती है।
- विदेशी ऋण का रुपये में बोझ बढ़ता है।
6. स्थिर और प्रबंधित तिरती विनिमय दर
स्थिर विनिमय दर (Fixed / Pegged Exchange Rate)
इस प्रणाली में सरकार/केंद्रीय बैंक विनिमय दर को एक निश्चित स्तर पर तय करता है। बाज़ार दर को उसी स्तर पर बनाए रखने के लिए केंद्रीय बैंक विदेशी मुद्रा का क्रय-विक्रय करता है — अधिमाँग होने पर भंडार से डॉलर बेचता है, अधिपूर्ति होने पर डॉलर ख़रीदता है।
- अवमूल्यन (Devaluation): स्थिर प्रणाली में सरकार द्वारा जानबूझकर घरेलू मुद्रा का मूल्य घटाना (भारत ने 1991 में रुपये का अवमूल्यन किया था)।
- पुनर्मूल्यन (Revaluation): सरकार द्वारा घरेलू मुद्रा का मूल्य बढ़ाना।
| आधार | नम्य विनिमय दर | स्थिर विनिमय दर |
|---|---|---|
| निर्धारण | बाज़ार की माँग-पूर्ति से | सरकार/केंद्रीय बैंक द्वारा |
| भंडार की आवश्यकता | बड़े भंडार की आवश्यकता नहीं | दर बनाए रखने के लिए बड़ा भंडार चाहिए |
| लाभ | भुगतान संतुलन का स्वतः समायोजन; मौद्रिक नीति की स्वतंत्रता | स्थिरता और निश्चितता — व्यापार और निवेश में सुविधा |
| दोष | अस्थिरता और अनिश्चितता; सट्टेबाज़ी | भंडार समाप्त होने का ख़तरा; मुद्रा पर सट्टात्मक हमले |
| मूल्य में कमी को कहते हैं | मूल्यह्रास | अवमूल्यन |
प्रबंधित तिरती विनिमय दर (Managed Floating)
यह दोनों का मिश्रण है — विनिमय दर मुख्यतः बाज़ार से तय होती है, पर अत्यधिक उतार-चढ़ाव रोकने के लिए केंद्रीय बैंक विदेशी मुद्रा बाज़ार में हस्तक्षेप करता है। इसे कभी-कभी "मलिन तिरती" (Dirty Floating) भी कहते हैं। भारत में RBI इसी प्रकार की नीति अपनाता है — वह किसी निश्चित दर का लक्ष्य नहीं रखता, पर तेज़ अस्थिरता की स्थिति में डॉलर ख़रीद-बेचकर बाज़ार को शांत करता है।
7. वास्तविक विनिमय दर और खुली अर्थव्यवस्था में समग्र माँग
नाममात्र और वास्तविक विनिमय दर
नाममात्र विनिमय दर (e) केवल मुद्राओं का अनुपात बताती है। पर व्यापार की प्रतिस्पर्धा क्षमता दोनों देशों की कीमतों पर भी निर्भर करती है। इसलिए वास्तविक विनिमय दर (Real Exchange Rate) परिभाषित की जाती है:
यह बताती है कि विदेशी वस्तुएँ घरेलू वस्तुओं की तुलना में कितनी महँगी हैं। वास्तविक विनिमय दर बढ़ने का अर्थ है कि घरेलू वस्तुएँ सापेक्ष रूप से सस्ती हो गईं — निर्यात प्रतिस्पर्धा क्षमता बढ़ी।
e = ₹80/$; विदेशी कीमत सूचकांक Pf = 110; घरेलू कीमत सूचकांक P = 120। वास्तविक विनिमय दर = 80 × 110/120 = 73.33। यदि घरेलू मुद्रास्फीति अधिक हो (P बढ़कर 132) और e वही रहे, तो वास्तविक दर = 80 × 110/132 = 66.67 — घटी; अर्थात भारतीय वस्तुएँ सापेक्ष रूप से महँगी हुईं, भले ही नाममात्र दर स्थिर रही।
खुली अर्थव्यवस्था में समग्र माँग
निर्यात (X) विदेशी आय और वास्तविक विनिमय दर पर निर्भर करता है; आयात (M) घरेलू आय पर निर्भर करता है — आय बढ़ने पर आयात भी बढ़ता है: M = M̄ + mY, जहाँ m = सीमांत आयात प्रवृत्ति (MPM)। आयात एक अतिरिक्त रिसाव है, इसलिए खुली अर्थव्यवस्था का गुणक छोटा होता है:
उदाहरण (काल्पनिक): c = 0.8, m = 0.05 → गुणक = 1/(0.2 + 0.05) = 4, जबकि बंद अर्थव्यवस्था में यह 5 होता। अर्थात खुली अर्थव्यवस्था में बढ़ी हुई माँग का एक भाग आयात के रूप में विदेश चला जाता है।
8. मास्टर तालिका : सूत्र और तथ्य
| अवधारणा | सूत्र / अर्थ |
|---|---|
| व्यापार शेष | वस्तु निर्यात − वस्तु आयात |
| चालू खाता शेष | व्यापार शेष + निवल सेवाएँ + निवल आय + निवल हस्तांतरण |
| समग्र भुगतान संतुलन | चालू खाता + पूँजी खाता + त्रुटियाँ-चूक = भंडार में परिवर्तन |
| विनिमय दर ↑ (₹/$) | रुपये का मूल्यह्रास |
| वास्तविक विनिमय दर | e × Pf / P |
| खुली अर्थव्यवस्था AD | C + I + G + (X − M) |
| आयात फलन | M = M̄ + mY |
| खुली अर्थव्यवस्था गुणक | 1 / (1 − c + m) |
9. मास्टर सारांश तालिका
| विषय | मुख्य बिंदु |
|---|---|
| संपर्क | उत्पाद, वित्तीय, साधन बाज़ार |
| भुगतान संतुलन | चालू खाता (वस्तुएँ, सेवाएँ, आय, हस्तांतरण) + पूँजी खाता (FDI, FPI, ऋण) |
| घाटा/अधिशेष | स्वायत्त लेन-देनों का शेष; समायोजन भंडार से |
| विनिमय दर | माँग (आयात, विदेशी निवेश) और पूर्ति (निर्यात, विदेशी निवेश अंतर्प्रवाह) |
| प्रणालियाँ | नम्य (मूल्यह्रास), स्थिर (अवमूल्यन), प्रबंधित तिरती (भारत) |
10. माइंड मैप
- उत्पाद, वित्तीय
- साधन बाज़ार
- चालू खाता
- पूँजी खाता
- माँग-पूर्ति
- मूल्यह्रास, मूल्यवृद्धि
- नम्य, स्थिर
- प्रबंधित तिरती
11. टिप्स और ट्रिक्स
- चालू या पूँजी खाता? पूछें — "क्या परिसंपत्ति/देयता बदली?" हाँ = पूँजी खाता; नहीं = चालू खाता।
- "बाज़ार करे तो मूल्यह्रास, सरकार करे तो अवमूल्यन।"
- डॉलर की माँग = विदेश को भुगतान के सभी कारण; पूर्ति = विदेश से प्राप्ति के सभी कारण।
- व्यापार शेष और चालू खाता शेष को एक मान लेना — चालू खाते में सेवाएँ, आय और हस्तांतरण भी हैं।
- विदेश से उधार को चालू खाते में लिखना — यह पूँजी खाते में है।
- विनिमय दर बढ़ने को रुपये का "मज़बूत होना" समझना।
12. महत्वपूर्ण वन-लाइनर
- भुगतान संतुलन दोहरी प्रविष्टि प्रणाली पर आधारित है।
- वस्तुओं का व्यापार दृश्य व्यापार कहलाता है।
- प्रवासियों द्वारा भेजा गया धन चालू खाते में हस्तांतरण के रूप में दर्ज होता है।
- FDI और FPI पूँजी खाते की मदें हैं।
- भुगतान संतुलन घाटे में विदेशी मुद्रा भंडार घटता है।
- नम्य प्रणाली में विनिमय दर माँग और पूर्ति से तय होती है।
- भारत में प्रबंधित तिरती विनिमय दर प्रणाली है।
- आयात रिसाव है, इसलिए खुली अर्थव्यवस्था में गुणक छोटा होता है।
13. परीक्षा-पैटर्न प्रश्न (विस्तृत उत्तर सहित)
निम्न में से कौन-सी मद पूँजी खाते में दर्ज होगी?
- सॉफ़्टवेयर सेवाओं का निर्यात
- प्रवासी भारतीयों द्वारा परिवार को भेजा गया धन
- विदेशी कंपनी द्वारा भारत में कारखाना लगाना
- कच्चे तेल का आयात
उत्तर देखें
FDI से देश की देयता (विदेशियों का स्वामित्व) बदलती है — पूँजी खाता। (क) सेवा, (ख) हस्तांतरण, (घ) वस्तु व्यापार — तीनों चालू खाते में।
उत्तर: (ग)
विनिमय दर ₹82/$ से ₹85/$ हो गई। यह रुपये का मूल्यह्रास है या मूल्यवृद्धि?
उत्तर देखें
एक डॉलर के लिए अधिक रुपये देने पड़ रहे हैं — रुपये का मूल्य घटा — मूल्यह्रास।
उत्तर: मूल्यह्रास
व्यापार शेष से क्या अभिप्राय है?
उत्तर देखें
वस्तुओं के निर्यात और वस्तुओं के आयात का अंतर।
उत्तर: वस्तु निर्यात − वस्तु आयात
विदेशी मुद्रा का माँग वक्र नीचे की ओर क्यों ढलता है?
उत्तर देखें
विनिमय दर (₹/$) गिरने पर विदेशी वस्तुएँ रुपये में सस्ती हो जाती हैं, इसलिए आयात बढ़ता है; विदेश यात्रा, पढ़ाई और विदेशी परिसंपत्तियाँ भी सस्ती होती हैं — इन सबके लिए डॉलर की माँग बढ़ती है। अतः विनिमय दर और डॉलर की माँग में विपरीत संबंध है।
उत्तर: कम विनिमय दर पर आयात सस्ते → डॉलर की माँग अधिक
मूल्यह्रास और अवमूल्यन में अंतर बताइए।
उत्तर देखें
मूल्यह्रास: नम्य प्रणाली में बाज़ार की माँग-पूर्ति शक्तियों द्वारा घरेलू मुद्रा के मूल्य में कमी। अवमूल्यन: स्थिर प्रणाली में सरकार/केंद्रीय बैंक द्वारा जानबूझकर घरेलू मुद्रा का मूल्य घटाना।
उत्तर: बाज़ार द्वारा बनाम सरकार द्वारा
स्वायत्त और समायोजक लेन-देन में अंतर उदाहरण सहित बताइए।
उत्तर देखें
स्वायत्त: लाभ या आर्थिक उद्देश्य से स्वतंत्र रूप से किए गए, भुगतान संतुलन की स्थिति से निरपेक्ष — जैसे निर्यात, आयात, FDI। समायोजक: स्वायत्त लेन-देनों से उत्पन्न अंतर पाटने के लिए — जैसे RBI द्वारा भंडार से डॉलर बेचना या IMF से उधार।
उत्तर: स्वतंत्र उद्देश्य बनाम अंतर पाटने हेतु
प्रबंधित तिरती विनिमय दर प्रणाली क्या है? भारत में इसका उपयोग कैसे होता है?
उत्तर देखें
विनिमय दर मुख्यतः बाज़ार की माँग-पूर्ति से तय होती है, पर केंद्रीय बैंक अत्यधिक उतार-चढ़ाव रोकने के लिए विदेशी मुद्रा बाज़ार में हस्तक्षेप करता है। भारत में RBI किसी निश्चित दर का लक्ष्य नहीं रखता, पर रुपये के तेज़ गिरने पर भंडार से डॉलर बेचता है और तेज़ चढ़ने पर डॉलर ख़रीदता है।
उत्तर: बाज़ार-निर्धारित दर + अस्थिरता रोकने हेतु केंद्रीय बैंक का हस्तक्षेप
रुपये के मूल्यह्रास का भारत के निर्यात और आयात पर क्या प्रभाव पड़ेगा?
उत्तर देखें
भारतीय वस्तुएँ विदेशियों के लिए सस्ती होंगी — निर्यात बढ़ने की प्रवृत्ति। विदेशी वस्तुएँ भारतीयों के लिए महँगी होंगी — आयात घटने की प्रवृत्ति। पर अनिवार्य आयात (कच्चा तेल) महँगे होने से घरेलू मुद्रास्फीति बढ़ सकती है, और विदेशी ऋण का रुपये में बोझ बढ़ेगा।
उत्तर: निर्यात ↑, आयात ↓ (पर आयातित मुद्रास्फीति का ख़तरा)
निम्न आँकड़ों (अरब डॉलर; काल्पनिक) से व्यापार शेष, चालू खाता शेष, पूँजी खाता शेष और समग्र शेष ज्ञात कीजिए: वस्तु निर्यात 300; वस्तु आयात 420; सेवा निर्यात 180; सेवा आयात 100; निवल आय −30; निवल हस्तांतरण +70; FDI अंतर्प्रवाह 50; FPI बहिर्प्रवाह 10; विदेशी ऋण प्राप्त 20।
उत्तर देखें
व्यापार शेष = 300 − 420 = −120। निवल सेवाएँ = +80। चालू खाता = −120 + 80 − 30 + 70 = 0 (संतुलित)। पूँजी खाता = 50 − 10 + 20 = +60। समग्र शेष = 0 + 60 = +60 → विदेशी मुद्रा भंडार में 60 की वृद्धि।
उत्तर: व्यापार −120; चालू 0; पूँजी +60; समग्र +60
नम्य विनिमय दर का निर्धारण आरेख सहित समझाइए। विदेशी पर्यटकों के भारत आने में भारी वृद्धि का क्या प्रभाव होगा?
उत्तर देखें
y-अक्ष पर विनिमय दर (₹/$), x-अक्ष पर डॉलर की मात्रा। माँग वक्र नीचे ढलता (कम दर पर आयात सस्ते), पूर्ति वक्र ऊपर उठता (ऊँची दर पर निर्यात सस्ते)। प्रतिच्छेद पर संतुलन दर e*। पर्यटक बढ़ने से डॉलर की पूर्ति बढ़ेगी — पूर्ति वक्र दाईं ओर खिसकेगा — नई संतुलन दर कम होगी, अर्थात रुपये की मूल्यवृद्धि; डॉलर की लेन-देन मात्रा बढ़ेगी।
उत्तर: पूर्ति ↑ → विनिमय दर ↓ → रुपये की मूल्यवृद्धि
नाममात्र विनिमय दर स्थिर (₹80/$) है, पर भारत में कीमतें 10% और अमेरिका में 2% बढ़ती हैं (प्रारंभिक दोनों सूचकांक 100; काल्पनिक)। वास्तविक विनिमय दर पर प्रभाव ज्ञात कीजिए और निर्यात पर इसका अर्थ बताइए।
उत्तर देखें
प्रारंभ: 80 × 100/100 = 80। बाद में: 80 × 102/110 = 74.18। वास्तविक विनिमय दर घटी — भारतीय वस्तुएँ विदेशी वस्तुओं की तुलना में लगभग 7% महँगी हो गईं, भले ही नाममात्र दर नहीं बदली। इससे भारत की निर्यात प्रतिस्पर्धा क्षमता घटेगी और आयात आकर्षक होंगे।
उत्तर: 80 → 74.18; निर्यात प्रतिस्पर्धा घटेगी
नम्य और स्थिर विनिमय दर प्रणालियों के गुण-दोषों की तुलना कीजिए।
उत्तर देखें
नम्य: गुण — भुगतान संतुलन का स्वतः समायोजन, बड़े भंडार की आवश्यकता नहीं, मौद्रिक नीति की स्वतंत्रता; दोष — दरों में अस्थिरता, व्यापार-निवेश में अनिश्चितता, सट्टेबाज़ी। स्थिर: गुण — स्थिरता और निश्चितता, अंतरराष्ट्रीय व्यापार और दीर्घकालीन निवेश में सुविधा, सट्टेबाज़ी पर कुछ अंकुश; दोष — दर बनाए रखने के लिए बड़े भंडार की आवश्यकता, भंडार घटने पर सट्टात्मक हमले, असंतुलन का समायोजन कठिन (अवमूल्यन की आवश्यकता)। व्यवहार में अनेक देश, भारत सहित, प्रबंधित तिरती प्रणाली अपनाते हैं, जो दोनों के लाभ लेने का प्रयास है।
उत्तर: नम्य — लचीली पर अस्थिर; स्थिर — निश्चित पर भंडार-निर्भर; मध्य मार्ग प्रबंधित तिरती
14. त्वरित पुनरावृत्ति सारांश
- खुली अर्थव्यवस्था के संपर्क: उत्पाद, वित्तीय, साधन बाज़ार।
- भुगतान संतुलन: चालू खाता (वस्तुएँ, सेवाएँ, आय, हस्तांतरण) + पूँजी खाता (FDI, FPI, ऋण); समग्र शेष = भंडार परिवर्तन।
- डॉलर की माँग: आयात, विदेश यात्रा, विदेशी निवेश; पूर्ति: निर्यात, पर्यटक, विदेशी निवेश, प्रेषण।
- नम्य दर: माँग = पूर्ति; ₹/$ ↑ = रुपये का मूल्यह्रास।
- स्थिर दर: अवमूल्यन/पुनर्मूल्यन; भारत: प्रबंधित तिरती।
- वास्तविक दर = e × Pf/P; खुली अर्थव्यवस्था गुणक = 1/(1 − c + m)।