1. अध्याय एक नज़र में
हर वर्ष फ़रवरी में जब केंद्रीय वित्त मंत्री संसद में बजट प्रस्तुत करते हैं, तो पूरा देश उसकी चर्चा करता है — आयकर में क्या बदला, किसानों के लिए क्या है, शिक्षा और स्वास्थ्य पर कितना ख़र्च होगा, सरकार कितना उधार लेगी। सरकारी बजट (Government Budget) केवल आय-व्यय का हिसाब नहीं, बल्कि सरकार की आर्थिक नीति का सबसे शक्तिशाली साधन है।
इस अध्याय में हम सरकारी बजट के उद्देश्य, उसके घटक — राजस्व बजट और पूँजीगत बजट — विभिन्न प्रकार की प्राप्तियाँ और व्यय, बजट घाटे के माप (राजस्व, राजकोषीय और प्राथमिक घाटा), तथा राजकोषीय नीति के माध्यम से अर्थव्यवस्था पर बजट के प्रभाव का अध्ययन करेंगे।
- सरकारी बजट का अर्थ और संवैधानिक आधार।
- बजट के उद्देश्य: आबंटन, वितरण, स्थिरीकरण।
- राजस्व प्राप्तियाँ (कर, गैर-कर) और पूँजीगत प्राप्तियाँ।
- राजस्व व्यय और पूँजीगत व्यय।
- राजस्व घाटा, राजकोषीय घाटा, प्राथमिक घाटा।
- राजकोषीय नीति, सरकारी व्यय गुणक और घाटे के प्रभाव।
2. सरकारी बजट का अर्थ
सरकारी बजट किसी वित्तीय वर्ष (भारत में 1 अप्रैल से 31 मार्च) के लिए सरकार की अनुमानित प्राप्तियों और अनुमानित व्यय का वार्षिक विवरण है।
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 112 के अनुसार केंद्र सरकार को प्रत्येक वित्तीय वर्ष के लिए संसद के समक्ष "वार्षिक वित्तीय विवरण" (Annual Financial Statement) प्रस्तुत करना होता है — इसे ही सामान्यतः बजट कहते हैं। राज्यों के लिए इसी प्रकार का प्रावधान अनुच्छेद 202 में है।
बजट के उद्देश्य
| उद्देश्य | अर्थ | उदाहरण |
|---|---|---|
| आबंटन कार्य (Allocation) | ऐसी सार्वजनिक वस्तुओं का प्रावधान जो बाज़ार पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध नहीं कराता | राष्ट्रीय रक्षा, सड़कें, पुलिस, स्ट्रीट लाइट, स्वच्छता |
| वितरण कार्य (Redistribution) | आय और संपत्ति के वितरण में असमानता घटाना — करों और हस्तांतरणों द्वारा | प्रगतिशील आयकर; वृद्धावस्था पेंशन, छात्रवृत्ति, खाद्य सहायिकी |
| स्थिरीकरण कार्य (Stabilisation) | अर्थव्यवस्था में उतार-चढ़ाव को कम करना — मंदी में माँग बढ़ाना, मुद्रास्फीति में घटाना | मंदी में सरकारी व्यय बढ़ाना; महँगाई में व्यय घटाना |
सार्वजनिक वस्तुओं की दो विशेषताएँ हैं: (1) अप्रतिद्वंद्वी (Non-rival): एक व्यक्ति के उपभोग से दूसरे के लिए उपलब्धता कम नहीं होती — जैसे राष्ट्रीय रक्षा या स्ट्रीट लाइट; (2) अपवर्जन असंभव (Non-excludable): भुगतान न करने वालों को लाभ से वंचित करना कठिन। इसलिए लोग बिना भुगतान लाभ उठाना चाहते हैं — इसे मुफ़्तखोर समस्या (Free-rider Problem) कहते हैं। निजी फर्म ऐसी वस्तुओं से शुल्क नहीं वसूल पातीं, इसलिए सरकार करों के माध्यम से इनका प्रावधान करती है।
3. बजट के घटक
बजट को दो भागों में बाँटा जाता है — राजस्व बजट (Revenue Budget) और पूँजीगत बजट (Capital Budget)।
(क) राजस्व प्राप्तियाँ (Revenue Receipts)
वे प्राप्तियाँ जो सरकार के लिए न तो कोई देयता (Liability) उत्पन्न करती हैं और न ही उसकी परिसंपत्तियों (Assets) में कमी करती हैं। ये प्रतिदेय नहीं (Non-redeemable) होतीं — इन्हें लौटाना नहीं पड़ता।
| कर राजस्व (Tax Revenue) | गैर-कर राजस्व (Non-tax Revenue) |
|---|---|
| प्रत्यक्ष कर: जिसका भार उसी व्यक्ति पर पड़ता है जिस पर कर लगाया गया — आयकर, निगम कर (कंपनियों के लाभ पर) | सरकारी ऋणों पर ब्याज प्राप्तियाँ |
| अप्रत्यक्ष कर: जिसका भार दूसरों पर डाला जा सकता है — वस्तु एवं सेवा कर (GST), सीमा शुल्क (Customs Duty), उत्पाद शुल्क | सार्वजनिक उपक्रमों से लाभांश और लाभ |
| — | सरकारी सेवाओं के लिए शुल्क (Fees), जुर्माना, लाइसेंस शुल्क; विदेशों से प्राप्त अनुदान (Grants) |
प्रगतिशील कर (Progressive Tax): आय बढ़ने के साथ कर की दर बढ़ती है — इससे आय की असमानता घटती है (वितरण कार्य)।
(ख) पूँजीगत प्राप्तियाँ (Capital Receipts)
वे प्राप्तियाँ जो सरकार के लिए देयता उत्पन्न करती हैं या परिसंपत्तियों में कमी करती हैं।
- उधार (Borrowings): जनता से (बाज़ार ऋण, बॉन्ड), RBI से, विदेशी सरकारों और संस्थाओं से — देयता उत्पन्न करते हैं।
- ऋणों की वसूली (Recovery of Loans): राज्य सरकारों या सार्वजनिक उपक्रमों को दिए गए ऋणों की वापसी — परिसंपत्ति (प्राप्य ऋण) घटती है।
- विनिवेश (Disinvestment): सार्वजनिक उपक्रमों के शेयर बेचना — परिसंपत्ति घटती है।
- छोटी बचतें: डाकघर बचत, भविष्य निधि आदि — देयता उत्पन्न करती हैं।
(ग) राजस्व व्यय (Revenue Expenditure)
वह व्यय जो न तो कोई परिसंपत्ति बनाता है और न ही किसी देयता में कमी करता है। उदाहरण: सरकारी कर्मचारियों का वेतन और पेंशन, सरकारी ऋणों पर ब्याज भुगतान, सहायिकियाँ (Subsidies), राज्यों को अनुदान, सरकारी विभागों का दैनिक संचालन व्यय।
(घ) पूँजीगत व्यय (Capital Expenditure)
वह व्यय जो परिसंपत्ति बनाता है या देयता घटाता है। उदाहरण: सड़क, पुल, बाँध, अस्पताल, विद्यालय भवनों का निर्माण; मशीनें और भूमि खरीदना; राज्यों और सार्वजनिक उपक्रमों को ऋण देना; पुराने ऋणों की मूल राशि का पुनर्भुगतान।
सरकार द्वारा ऋण पर दिया गया ब्याज राजस्व व्यय है (कोई देयता नहीं घटती), जबकि ऋण की मूल राशि का पुनर्भुगतान पूँजीगत व्यय है (देयता घटती है)। इसी प्रकार सरकार को मिला ब्याज राजस्व प्राप्ति है, जबकि ऋण की मूल राशि की वसूली पूँजीगत प्राप्ति।
4. कर की संरचना और बजट प्रक्रिया
कर की दरों के प्रकार
| प्रकार | अर्थ | प्रभाव |
|---|---|---|
| प्रगतिशील कर (Progressive) | आय बढ़ने के साथ कर की दर भी बढ़ती है | अमीरों पर अधिक भार — आय-असमानता घटती है |
| आनुपातिक कर (Proportional) | सभी आय-स्तरों पर समान दर | सबकी आय का समान प्रतिशत |
| प्रतिगामी कर (Regressive) | आय बढ़ने पर कर का आय में हिस्सा घटता है | गरीबों पर अपेक्षाकृत अधिक भार |
अप्रत्यक्ष कर प्रायः प्रतिगामी प्रभाव रखते हैं — एक गरीब और एक अमीर व्यक्ति साबुन पर समान कर देते हैं, पर गरीब की आय में यह कर का बड़ा हिस्सा होता है। इसीलिए आवश्यक वस्तुओं पर कर की दरें प्रायः कम रखी जाती हैं और विलासिता की वस्तुओं पर अधिक।
भारत में बजट प्रक्रिया (संक्षेप में)
- केंद्रीय बजट वित्त मंत्रालय तैयार करता है और वित्त मंत्री इसे संसद में प्रस्तुत करते हैं; वर्तमान में यह सामान्यतः 1 फ़रवरी को प्रस्तुत किया जाता है, ताकि नए वित्तीय वर्ष (1 अप्रैल) से पहले पारित हो सके।
- बजट पर संसद में चर्चा होती है; व्यय की माँगों पर मतदान होता है, और कर संबंधी प्रस्ताव वित्त विधेयक के माध्यम से पारित होते हैं।
- भारत में संघीय व्यवस्था है — केंद्र और राज्यों के अलग-अलग बजट होते हैं। केंद्र द्वारा एकत्र करों का एक भाग वित्त आयोग की सिफ़ारिशों के आधार पर राज्यों को हस्तांतरित किया जाता है; GST से संबंधित निर्णय GST परिषद में केंद्र और राज्य मिलकर लेते हैं।
- वर्ष समाप्त होने के बाद वास्तविक आय-व्यय के लेखे की जाँच भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) द्वारा की जाती है।
5. बजट घाटे के माप
जब सरकार का व्यय उसकी प्राप्तियों से अधिक हो, तो बजट घाटा (Budget Deficit) होता है। इसके तीन प्रमुख माप हैं:
| घाटा | सूत्र | क्या दर्शाता है |
|---|---|---|
| राजस्व घाटा (Revenue Deficit) | राजस्व व्यय − राजस्व प्राप्तियाँ | सरकार अपने चालू (दैनिक) ख़र्चों के लिए भी उधार ले रही है या परिसंपत्तियाँ बेच रही है — "अनुत्पादक" उधार का संकेत |
| राजकोषीय घाटा (Fiscal Deficit) | कुल व्यय − (राजस्व प्राप्तियाँ + गैर-ऋण पूँजीगत प्राप्तियाँ) = कुल उधार की आवश्यकता | सरकार को कुल कितना उधार लेना पड़ेगा — घाटे का सबसे व्यापक माप |
| प्राथमिक घाटा (Primary Deficit) | राजकोषीय घाटा − ब्याज भुगतान | चालू वर्ष की नीतियों से उत्पन्न उधार की आवश्यकता — पिछले ऋणों के ब्याज को हटाकर |
गैर-ऋण पूँजीगत प्राप्तियाँ = ऋणों की वसूली + विनिवेश आदि (उधार को छोड़कर)।
कर राजस्व = 200; गैर-कर राजस्व = 50; राजस्व व्यय = 300 (इसमें ब्याज भुगतान = 80); पूँजीगत व्यय = 100; ऋणों की वसूली = 10; विनिवेश = 15; उधार = ?
राजस्व प्राप्तियाँ = 200 + 50 = 250। राजस्व घाटा = 300 − 250 = 50।
कुल व्यय = 300 + 100 = 400। गैर-ऋण पूँजीगत प्राप्तियाँ = 10 + 15 = 25। राजकोषीय घाटा = 400 − (250 + 25) = 125 = आवश्यक उधार।
प्राथमिक घाटा = 125 − 80 = 45।
निर्वचन: 125 के उधार में से 50 (40%) केवल राजस्व घाटे — अर्थात चालू ख़र्चों — को पूरा करने में लग रहा है; और 80 पिछले ऋणों पर ब्याज चुकाने के लिए आवश्यक है।
घाटों का अर्थ और प्रभाव
- राजस्व घाटा अधिक होना चिंताजनक है: उधार लेकर चालू ख़र्च चलाने से भविष्य में ब्याज का बोझ बढ़ता है, पर उत्पादक परिसंपत्तियाँ नहीं बनतीं।
- राजकोषीय घाटे का वित्तपोषण: (1) जनता और बैंकों से उधार; (2) RBI से उधार — इससे मुद्रा पूर्ति बढ़ती है और मुद्रास्फीति का ख़तरा होता है (इसे घाटे की वित्त व्यवस्था / मुद्रा मुद्रण कहा जाता था); (3) विदेशी उधार।
- ऋण जाल (Debt Trap): यदि उधार का बड़ा भाग पुराने ऋणों का ब्याज चुकाने में जाए, तो ऋण बढ़ता जाता है।
- निजी निवेश का अपवर्जन (Crowding Out): सरकार बाज़ार से भारी उधार ले, तो ब्याज दरें बढ़ सकती हैं और निजी निवेश के लिए धन कम पड़ सकता है।
- फिर भी घाटा हमेशा बुरा नहीं: यदि उधार सड़क, बिजली, शिक्षा जैसे उत्पादक निवेश पर हो, तो भविष्य में संवृद्धि और राजस्व बढ़ सकता है। मंदी में घाटा बढ़ाकर माँग बढ़ाना उचित नीति हो सकती है।
भारत में घाटे को नियंत्रित करने के लिए राजकोषीय उत्तरदायित्व और बजट प्रबंधन (FRBM) अधिनियम, 2003 पारित किया गया, जिसने सरकार के लिए राजकोषीय और राजस्व घाटे को क्रमशः घटाने के लक्ष्य निर्धारित किए और राजकोषीय पारदर्शिता को बढ़ावा दिया। (लक्ष्यों और समय-सीमाओं में समय-समय पर संशोधन होते रहे हैं।)
6. राजकोषीय नीति और बजट का प्रभाव
राजकोषीय नीति (Fiscal Policy) सरकार की कर और व्यय संबंधी नीति है, जिसके द्वारा वह समग्र माँग, उत्पादन और रोज़गार को प्रभावित करती है। पिछले अध्याय के कीन्सियन मॉडल में सरकार जोड़ने पर:
सरकारी व्यय गुणक = 1/0.2 = 5। सरकार व्यय ₹100 करोड़ बढ़ाए → आय ₹500 करोड़ बढ़ेगी।
कर गुणक = −0.8/0.2 = −4। सरकार कर ₹100 करोड़ घटाए → आय ₹400 करोड़ बढ़ेगी।
व्यय गुणक, कर गुणक से बड़ा है, क्योंकि सरकारी व्यय सीधे पूरी राशि से माँग बढ़ाता है, जबकि कर कटौती से लोगों की आय बढ़ती है और वे उसका केवल c भाग (80%) उपभोग पर ख़र्च करते हैं।
संतुलित बजट गुणक: यदि सरकार व्यय और कर दोनों ₹100 करोड़ बढ़ाए (बजट संतुलित रहे), तो आय में परिवर्तन = 500 − 400 = ₹100 करोड़ — अर्थात संतुलित बजट गुणक = 1।
| स्थिति | राजकोषीय नीति | उपाय |
|---|---|---|
| मंदी / अभावी माँग | विस्तारवादी (Expansionary) | सरकारी व्यय बढ़ाना, कर घटाना — घाटा बढ़ सकता है |
| मुद्रास्फीति / अधिमाँग | संकुचनकारी (Contractionary) | सरकारी व्यय घटाना, कर बढ़ाना |
स्वचालित स्थिरीकारक (Automatic Stabilisers): कुछ बजट मदें बिना किसी नए निर्णय के अर्थव्यवस्था को स्थिर करती हैं। मंदी में आय घटने पर प्रगतिशील आयकर से कर वसूली अपने-आप घटती है और बेरोज़गारी भत्ते जैसे हस्तांतरण बढ़ते हैं — इससे लोगों की प्रयोज्य आय और माँग कम गिरती है। तेज़ी में इसका उलटा होता है।
7. मास्टर तालिका : सूत्र और कसौटियाँ
| अवधारणा | सूत्र / कसौटी |
|---|---|
| राजस्व प्राप्ति | न देयता बने, न परिसंपत्ति घटे |
| पूँजीगत प्राप्ति | देयता बने या परिसंपत्ति घटे |
| राजस्व व्यय | न परिसंपत्ति बने, न देयता घटे |
| पूँजीगत व्यय | परिसंपत्ति बने या देयता घटे |
| राजस्व घाटा | राजस्व व्यय − राजस्व प्राप्तियाँ |
| राजकोषीय घाटा | कुल व्यय − (राजस्व प्राप्तियाँ + गैर-ऋण पूँजीगत प्राप्तियाँ) = उधार |
| प्राथमिक घाटा | राजकोषीय घाटा − ब्याज भुगतान |
| व्यय गुणक | 1/(1 − c) |
| कर गुणक | −c/(1 − c) |
| संतुलित बजट गुणक | 1 |
8. मास्टर सारांश तालिका
| विषय | मुख्य बिंदु |
|---|---|
| बजट | वित्तीय वर्ष की अनुमानित प्राप्तियाँ-व्यय; अनुच्छेद 112 |
| उद्देश्य | आबंटन (सार्वजनिक वस्तुएँ), वितरण, स्थिरीकरण |
| प्राप्तियाँ | राजस्व (कर, गैर-कर); पूँजीगत (उधार, वसूली, विनिवेश) |
| व्यय | राजस्व (वेतन, ब्याज, सहायिकी); पूँजीगत (परिसंपत्तियाँ, ऋण, मूल पुनर्भुगतान) |
| घाटे | राजस्व, राजकोषीय (= उधार), प्राथमिक (− ब्याज); FRBM 2003 |
| राजकोषीय नीति | विस्तारवादी बनाम संकुचनकारी; गुणक |
9. माइंड मैप
- आबंटन, वितरण
- स्थिरीकरण
- राजस्व: कर, गैर-कर
- पूँजीगत: उधार, विनिवेश
- राजस्व: वेतन, ब्याज
- पूँजीगत: परिसंपत्ति
- राजस्व, राजकोषीय, प्राथमिक
- व्यय व कर गुणक
10. टिप्स और ट्रिक्स
- किसी मद के वर्गीकरण के लिए दो प्रश्न पूछें: (1) क्या देयता बनी/घटी? (2) क्या परिसंपत्ति बनी/घटी? किसी का भी "हाँ" = पूँजीगत।
- राजकोषीय घाटा = उधार — यह पहचान संख्यात्मक प्रश्नों में सबसे उपयोगी है।
- प्राथमिक घाटा शून्य होने का अर्थ: सरकार केवल पुराने ऋणों का ब्याज चुकाने के लिए उधार ले रही है।
- ब्याज भुगतान को पूँजीगत व्यय लिखना — यह राजस्व व्यय है।
- विनिवेश को राजस्व प्राप्ति लिखना — यह पूँजीगत प्राप्ति है (परिसंपत्ति घटती है)।
- राजकोषीय घाटे में उधार को प्राप्तियों में जोड़ देना — उधार घटाकर ही घाटा निकलता है।
11. महत्वपूर्ण वन-लाइनर
- भारत में वित्तीय वर्ष 1 अप्रैल से 31 मार्च तक होता है।
- संविधान का अनुच्छेद 112 वार्षिक वित्तीय विवरण से संबंधित है।
- आयकर और निगम कर प्रत्यक्ष कर हैं; GST अप्रत्यक्ष कर है।
- उधार और विनिवेश पूँजीगत प्राप्तियाँ हैं।
- राजकोषीय घाटा सरकार की कुल उधार आवश्यकता दर्शाता है।
- प्राथमिक घाटा = राजकोषीय घाटा − ब्याज भुगतान।
- सार्वजनिक वस्तुएँ अप्रतिद्वंद्वी और अपवर्जन-रहित होती हैं।
- संतुलित बजट गुणक 1 होता है।
- प्रगतिशील कर में आय बढ़ने के साथ कर की दर बढ़ती है, जिससे आय की असमानता घटती है।
- केंद्र द्वारा एकत्र करों का राज्यों में बँटवारा वित्त आयोग की सिफ़ारिशों पर होता है।
- राजस्व घाटा अधिक होने का अर्थ है कि सरकार चालू ख़र्चों के लिए भी उधार ले रही है।
- मंदी में प्रगतिशील आयकर और बेरोज़गारी भत्ते स्वचालित स्थिरीकारक के रूप में काम करते हैं।
- वर्ष के अंत में सरकार के वास्तविक आय-व्यय के लेखों की जाँच नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक करता है।
12. परीक्षा-पैटर्न प्रश्न (विस्तृत उत्तर सहित)
निम्न में से कौन-सी पूँजीगत प्राप्ति है?
- आयकर
- सार्वजनिक उपक्रम से लाभांश
- विनिवेश
- GST
उत्तर देखें
विनिवेश से सरकार की परिसंपत्ति (शेयर) घटती है — पूँजीगत प्राप्ति। आयकर, GST कर राजस्व और लाभांश गैर-कर राजस्व हैं।
उत्तर: (ग) विनिवेश
सरकारी ऋण पर ब्याज भुगतान किस प्रकार का व्यय है?
उत्तर देखें
इससे न कोई परिसंपत्ति बनती है, न देयता घटती है — राजस्व व्यय।
उत्तर: राजस्व व्यय
प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष कर का एक-एक उदाहरण दीजिए।
उत्तर देखें
प्रत्यक्ष: आयकर (या निगम कर)। अप्रत्यक्ष: GST (या सीमा शुल्क)।
उत्तर: आयकर; GST
बजट के तीन उद्देश्य समझाइए।
उत्तर देखें
(1) आबंटन: सार्वजनिक वस्तुओं (रक्षा, सड़क) का प्रावधान, जिन्हें बाज़ार पर्याप्त नहीं देता। (2) वितरण: प्रगतिशील कर और हस्तांतरणों से आय-असमानता घटाना। (3) स्थिरीकरण: मंदी और मुद्रास्फीति में उतार-चढ़ाव कम करना।
उत्तर: आबंटन, वितरण, स्थिरीकरण
राजकोषीय घाटा ₹150 करोड़ और ब्याज भुगतान ₹90 करोड़ है। प्राथमिक घाटा ज्ञात कीजिए और उसका अर्थ बताइए।
उत्तर देखें
प्राथमिक घाटा = 150 − 90 = ₹60 करोड़। अर्थ: ब्याज भुगतान को छोड़कर, चालू वर्ष की नीतियों के कारण सरकार को ₹60 करोड़ उधार लेना पड़ रहा है।
उत्तर: ₹60 करोड़
सार्वजनिक वस्तुएँ क्या हैं? इनका प्रावधान बाज़ार क्यों नहीं करता?
उत्तर देखें
सार्वजनिक वस्तुएँ अप्रतिद्वंद्वी (एक के उपभोग से दूसरे के लिए कम नहीं होती) और अपवर्जन-रहित (भुगतान न करने वालों को रोकना कठिन) होती हैं — जैसे राष्ट्रीय रक्षा, स्ट्रीट लाइट। लोग बिना भुगतान लाभ उठाना चाहते हैं (मुफ़्तखोर समस्या), इसलिए निजी फर्म शुल्क नहीं वसूल पाती और लाभ नहीं कमा सकती — अतः सरकार करों से इनका प्रावधान करती है।
उत्तर: अप्रतिद्वंद्वी व अपवर्जन-रहित; मुफ़्तखोर समस्या के कारण
वर्गीकृत कीजिए (राजस्व/पूँजीगत, प्राप्ति/व्यय): (क) राज्य सरकार को दिया गया ऋण (ख) सरकारी कर्मचारियों का वेतन (ग) RBI से उधार (घ) राज्य से ऋण की वसूली।
उत्तर देखें
(क) पूँजीगत व्यय — परिसंपत्ति (प्राप्य ऋण) बनती है। (ख) राजस्व व्यय। (ग) पूँजीगत प्राप्ति — देयता बनती है। (घ) पूँजीगत प्राप्ति — परिसंपत्ति घटती है।
उत्तर: (क) पूँजीगत व्यय (ख) राजस्व व्यय (ग) पूँजीगत प्राप्ति (घ) पूँजीगत प्राप्ति
राजस्व घाटा अधिक होना अर्थव्यवस्था के लिए चिंताजनक क्यों है?
उत्तर देखें
इसका अर्थ है कि सरकार अपने चालू ख़र्चों (वेतन, ब्याज, सहायिकी) के लिए भी उधार ले रही है या परिसंपत्तियाँ बेच रही है। ऐसे उधार से कोई उत्पादक परिसंपत्ति नहीं बनती जो भविष्य में आय दे, पर ब्याज का बोझ बढ़ता जाता है — इससे ऋण जाल का ख़तरा और भविष्य में विकास व्यय के लिए कम संसाधन।
उत्तर: चालू ख़र्च के लिए उधार — बोझ बढ़ता है, परिसंपत्ति नहीं बनती
निम्न आँकड़ों (₹ करोड़; काल्पनिक) से राजस्व, राजकोषीय और प्राथमिक घाटा ज्ञात कीजिए: कर राजस्व 500; गैर-कर राजस्व 120; राजस्व व्यय 750; ब्याज भुगतान 200; पूँजीगत व्यय 300; ऋणों की वसूली 30; विनिवेश 40।
उत्तर देखें
राजस्व प्राप्तियाँ = 620। राजस्व घाटा = 750 − 620 = 130। कुल व्यय = 1,050; गैर-ऋण पूँजीगत प्राप्तियाँ = 70। राजकोषीय घाटा = 1,050 − (620 + 70) = 360। प्राथमिक घाटा = 360 − 200 = 160।
उत्तर: राजस्व घाटा 130; राजकोषीय 360; प्राथमिक 160
MPC = 0.75 है। (क) सरकारी व्यय ₹200 करोड़ बढ़ाने पर (ख) एकमुश्त कर ₹200 करोड़ घटाने पर (ग) दोनों एक साथ करने पर — आय में परिवर्तन ज्ञात कीजिए।
उत्तर देखें
व्यय गुणक = 1/0.25 = 4; कर गुणक = −0.75/0.25 = −3। (क) ΔY = 200 × 4 = ₹800 करोड़। (ख) ΔT = −200 → ΔY = −3 × (−200) = ₹600 करोड़। (ग) दोनों एक साथ: 800 + 600 = ₹1,400 करोड़ (यह संतुलित बजट नहीं, क्योंकि व्यय बढ़ा और कर घटा — घाटा ₹400 करोड़ बढ़ा)।
उत्तर: (क) ₹800 करोड़ (ख) ₹600 करोड़ (ग) ₹1,400 करोड़
सरकारी व्यय गुणक, कर गुणक से बड़ा क्यों होता है? संतुलित बजट गुणक 1 क्यों होता है?
उत्तर देखें
सरकारी व्यय सीधे पूरी राशि से समग्र माँग बढ़ाता है (पहले चक्र में ΔAD = ΔG)। कर कटौती पहले लोगों की प्रयोज्य आय बढ़ाती है, और वे उसका केवल c भाग उपभोग पर ख़र्च करते हैं (पहले चक्र में ΔAD = c × ΔT), शेष बचत में चला जाता है — इसलिए प्रभाव छोटा है। संतुलित बजट (ΔG = ΔT): ΔY = [1/(1 − c)]ΔG − [c/(1 − c)]ΔT = [(1 − c)/(1 − c)]ΔG = ΔG — अर्थात गुणक 1।
उत्तर: व्यय सीधे पूरी राशि ख़र्च, कर कटौती का केवल c भाग; संतुलित बजट गुणक = 1
"राजकोषीय घाटा सदैव हानिकारक होता है।" क्या आप सहमत हैं? तर्क सहित उत्तर दीजिए।
उत्तर देखें
पूर्णतः सहमत नहीं। हानियाँ: ब्याज का बढ़ता बोझ और ऋण जाल; RBI से उधार पर मुद्रास्फीति; बाज़ार से भारी उधार से ब्याज दरें बढ़कर निजी निवेश का अपवर्जन; भविष्य की पीढ़ियों पर कर का बोझ। पर घाटा लाभदायक भी हो सकता है: (1) यदि उधार उत्पादक पूँजीगत व्यय (सड़क, बिजली, शिक्षा, स्वास्थ्य) पर हो, तो संवृद्धि और भविष्य का राजस्व बढ़ता है; (2) मंदी में घाटा बढ़ाकर समग्र माँग बढ़ाना उत्पादन और रोज़गार बहाल करता है। अतः घाटे का आकार और उसका उपयोग — दोनों महत्वपूर्ण हैं; राजस्व घाटे की तुलना में पूँजीगत व्यय हेतु घाटा कम चिंताजनक है।
उत्तर: सदैव नहीं — उपयोग (उत्पादक बनाम उपभोग) और आर्थिक स्थिति पर निर्भर
13. त्वरित पुनरावृत्ति सारांश
- बजट = वित्तीय वर्ष की अनुमानित प्राप्तियाँ-व्यय (अनुच्छेद 112); उद्देश्य — आबंटन, वितरण, स्थिरीकरण।
- राजस्व प्राप्तियाँ: कर (प्रत्यक्ष, अप्रत्यक्ष) + गैर-कर; पूँजीगत: उधार, ऋण वसूली, विनिवेश।
- राजस्व व्यय: वेतन, ब्याज, सहायिकी; पूँजीगत: परिसंपत्ति निर्माण, ऋण देना, मूल पुनर्भुगतान।
- राजस्व घाटा = RE − RR; राजकोषीय = कुल व्यय − (RR + गैर-ऋण पूँजीगत प्राप्तियाँ) = उधार; प्राथमिक = FD − ब्याज।
- व्यय गुणक 1/(1 − c) > कर गुणक c/(1 − c); संतुलित बजट गुणक 1।
- मंदी में विस्तारवादी, महँगाई में संकुचनकारी राजकोषीय नीति; FRBM 2003।