1. अध्याय एक नज़र में
हर दिन हम खरीदारी के छोटे-बड़े निर्णय लेते हैं — एक और समोसा लें या नहीं, फल खरीदें या मिठाई, महँगा होने पर कम खरीदें या विकल्प ढूँढें। अर्थशास्त्र में इन निर्णयों का अध्ययन उपभोक्ता व्यवहार (Consumer Behaviour) के अंतर्गत होता है। एक उपभोक्ता (Consumer) वह व्यक्ति है जो अपनी आवश्यकताओं की संतुष्टि के लिए वस्तुओं और सेवाओं का उपयोग करता है।
उपभोक्ता के सामने समस्या यह है कि उसकी आय सीमित है, जबकि वह अनेक वस्तुएँ चाहता है। वह अपनी आय को विभिन्न वस्तुओं पर इस प्रकार खर्च करना चाहता है कि उसे अधिकतम संतुष्टि मिले। इस अध्याय में हम इस समस्या को दो दृष्टिकोणों से समझेंगे — गणनावाचक उपयोगिता विश्लेषण (Cardinal Utility Analysis) और क्रमवाचक उपयोगिता विश्लेषण (Ordinal Utility / Indifference Curve Analysis)। इसके बाद माँग (Demand), माँग के नियम और माँग की कीमत लोच (Price Elasticity of Demand) का अध्ययन करेंगे।
- उपयोगिता, कुल और सीमांत उपयोगिता; ह्रासमान सीमांत उपयोगिता का नियम।
- उपभोक्ता संतुलन — एक और दो वस्तुओं की स्थिति में।
- बजट सेट, बजट रेखा और उसमें परिवर्तन।
- अनधिमान वक्र, MRS और क्रमवाचक दृष्टिकोण से संतुलन।
- माँग, माँग वक्र, माँग का नियम; सामान्य, निम्नस्तरीय, स्थानापन्न, पूरक वस्तुएँ।
- माँग की कीमत लोच: माप, निर्धारक और व्यय से संबंध।
2. उपयोगिता (Utility) : गणनावाचक विश्लेषण
- उपयोगिता: किसी वस्तु की आवश्यकता को संतुष्ट करने की क्षमता। यह व्यक्तिपरक (Subjective) है — एक ही वस्तु से अलग-अलग लोगों को और एक ही व्यक्ति को अलग-अलग समय पर अलग उपयोगिता मिल सकती है।
- कुल उपयोगिता (Total Utility — TU): किसी वस्तु की सभी उपभोग की गई इकाइयों से प्राप्त कुल संतुष्टि।
- सीमांत उपयोगिता (Marginal Utility — MU): किसी वस्तु की एक अतिरिक्त इकाई के उपभोग से कुल उपयोगिता में होने वाला परिवर्तन।
गणनावाचक दृष्टिकोण मानता है कि उपयोगिता को संख्याओं में मापा जा सकता है — इसकी इकाई को "यूटिल" (Util) कहते हैं।
ह्रासमान सीमांत उपयोगिता का नियम (Law of Diminishing Marginal Utility)
जैसे-जैसे कोई उपभोक्ता किसी वस्तु की अधिक इकाइयों का लगातार उपभोग करता है, प्रत्येक अतिरिक्त इकाई से मिलने वाली सीमांत उपयोगिता घटती जाती है। प्यासे व्यक्ति को पानी का पहला गिलास बहुत संतुष्टि देता है, दूसरा उससे कम, और पाँचवें-छठे गिलास तक शायद कोई संतुष्टि नहीं — बल्कि असुविधा।
| इकाइयाँ (गिलास) | TU (यूटिल) | MU (यूटिल) | टिप्पणी |
|---|---|---|---|
| 1 | 12 | 12 | MU घटती है, TU घटती दर से बढ़ती है |
| 2 | 22 | 10 | |
| 3 | 28 | 6 | |
| 4 | 30 | 2 | — |
| 5 | 30 | 0 | MU = 0 पर TU अधिकतम (संतृप्ति बिंदु) |
| 6 | 27 | −3 | MU ऋणात्मक, TU घटती है |
(तालिका के अंक अभ्यास हेतु काल्पनिक हैं।)
- जब MU धनात्मक पर घट रही है → TU घटती दर से बढ़ती है।
- जब MU = 0 → TU अधिकतम।
- जब MU ऋणात्मक → TU घटने लगती है।
3. उपभोक्ता संतुलन : गणनावाचक दृष्टिकोण
उपभोक्ता संतुलन (Consumer's Equilibrium) वह स्थिति है जिसमें उपभोक्ता अपनी दी हुई आय और वस्तुओं की दी हुई कीमतों पर अधिकतम संतुष्टि प्राप्त करता है और उसमें परिवर्तन की कोई प्रवृत्ति नहीं होती।
(क) एक वस्तु की स्थिति
मान लें मुद्रा की सीमांत उपयोगिता (MUm) — एक रुपये से मिलने वाली उपयोगिता — स्थिर है। उपभोक्ता वस्तु की उस मात्रा पर संतुलन में होगा जहाँ:
यदि MUx/Px > MUm, तो वस्तु पर खर्च किए गए एक रुपये से उतना ही रुपया अपने पास रखने से अधिक उपयोगिता मिल रही है — उपभोक्ता अधिक खरीदेगा; MU घटने से समानता आ जाएगी। यदि MUx/Px < MUm, तो वह कम खरीदेगा।
(ख) दो वस्तुओं की स्थिति — सम-सीमांत उपयोगिता का नियम
उपभोक्ता अपनी आय दो वस्तुओं पर इस प्रकार खर्च करता है कि प्रत्येक वस्तु पर खर्च किए गए अंतिम रुपये से समान सीमांत उपयोगिता मिले। यदि MUx/Px > MUy/Py, तो X पर खर्च किया गया रुपया अधिक संतुष्टि दे रहा है — उपभोक्ता Y से X की ओर खर्च खिसकाएगा; इससे MUx घटेगी और MUy बढ़ेगी, जब तक दोनों अनुपात बराबर न हो जाएँ।
Px = ₹4, Py = ₹2। किसी बिंदु पर MUx = 20, MUy = 8 है। क्या उपभोक्ता संतुलन में है?
हल: MUx/Px = 20/4 = 5; MUy/Py = 8/2 = 4। चूँकि 5 > 4, X पर खर्च किया गया अंतिम रुपया अधिक उपयोगिता देता है। उपभोक्ता X अधिक और Y कम खरीदेगा, जब तक दोनों अनुपात बराबर न हों। अभी वह संतुलन में नहीं है।
4. बजट सेट और बजट रेखा
क्रमवाचक दृष्टिकोण में यह नहीं माना जाता कि उपयोगिता को संख्याओं में मापा जा सकता है; केवल यह माना जाता है कि उपभोक्ता विभिन्न बंडलों को वरीयता क्रम (पहला, दूसरा, बराबर) में रख सकता है। इसके दो आधार हैं — उपभोक्ता क्या खरीद सकता है (बजट) और वह क्या पसंद करता है (अधिमान)।
मान लें उपभोक्ता की आय M है, और वह दो वस्तुएँ खरीदता है जिनकी कीमतें p₁ और p₂ हैं। वह कोई भी बंडल (x₁, x₂) खरीद सकता है जिसकी लागत आय से अधिक न हो:
बजट रेखा उन सभी बंडलों को दर्शाती है जिनकी लागत ठीक आय के बराबर है।
- बजट रेखा की ढलान = −p₁/p₂ — यह दर्शाती है कि बाज़ार में वस्तु 2 के रूप में वस्तु 1 की एक इकाई की कीमत कितनी है।
- अक्षों पर कटान: x₁-अक्ष पर M/p₁ (सारी आय वस्तु 1 पर), x₂-अक्ष पर M/p₂।
M = ₹60, p₁ = ₹5, p₂ = ₹4। बजट रेखा का समीकरण, कटान और ढलान ज्ञात कीजिए।
हल: 5x₁ + 4x₂ = 60। x₁-कटान = 60/5 = 12, x₂-कटान = 60/4 = 15। ढलान = −5/4 = −1.25। क्या बंडल (6, 8) खरीदा जा सकता है? लागत = 30 + 32 = 62 > 60 — नहीं।
बजट रेखा में परिवर्तन
| परिवर्तन | बजट रेखा पर प्रभाव |
|---|---|
| आय बढ़ती है (कीमतें स्थिर) | बजट रेखा समानांतर रूप से बाहर खिसकती है (ढलान वही) |
| आय घटती है | समानांतर रूप से अंदर खिसकती है |
| वस्तु 1 की कीमत घटती है (M, p₂ स्थिर) | x₁-अक्ष का कटान बाहर जाता है; रेखा x₂-अक्ष पर टिकी रहकर बाहर घूमती है; ढलान कम (समतल) |
| वस्तु 1 की कीमत बढ़ती है | रेखा x₂-अक्ष पर टिकी रहकर अंदर घूमती है; ढलान अधिक (खड़ी) |
5. अनधिमान वक्र (Indifference Curve)
उपभोक्ता की वरीयताओं के बारे में एक सामान्य मान्यता है — एकदिष्ट अधिमान (Monotonic Preferences): यदि किसी बंडल में कम-से-कम एक वस्तु अधिक है और दूसरी कम नहीं है, तो उपभोक्ता उस बंडल को पसंद करेगा। अर्थात "अधिक अच्छा है"।
- अनधिमान वक्र (IC): दो वस्तुओं के उन सभी बंडलों को मिलाने वाला वक्र जिनसे उपभोक्ता को समान संतुष्टि मिलती है — उपभोक्ता इनके बीच उदासीन (Indifferent) है।
- अनधिमान मानचित्र (Indifference Map): अनधिमान वक्रों का समूह; ऊँचा IC अधिक संतुष्टि दर्शाता है।
- प्रतिस्थापन की सीमांत दर (Marginal Rate of Substitution — MRS): वस्तु 1 की एक अतिरिक्त इकाई के लिए उपभोक्ता वस्तु 2 की जितनी इकाइयाँ त्यागने को तैयार है, ताकि संतुष्टि वही रहे। MRS = |Δx₂/Δx₁| = IC की ढलान।
अनधिमान वक्र की विशेषताएँ
- बाएँ से दाएँ नीचे की ओर ढलान (ऋणात्मक ढलान): एकदिष्ट अधिमान के कारण — एक वस्तु अधिक लेने पर संतुष्टि समान रखने के लिए दूसरी वस्तु कम करनी पड़ेगी।
- मूल बिंदु की ओर उत्तल (Convex): ह्रासमान MRS के कारण — जैसे-जैसे उपभोक्ता के पास वस्तु 1 अधिक और वस्तु 2 कम होती जाती है, वह वस्तु 1 की अतिरिक्त इकाई के लिए वस्तु 2 की कम इकाइयाँ त्यागने को तैयार होता है।
- ऊँचा IC अधिक संतुष्टि: एकदिष्ट अधिमान के कारण।
- दो IC एक-दूसरे को नहीं काटते: यदि काटें तो प्रतिच्छेद बिंदु दोनों पर होगा, जिसका अर्थ होगा कि दोनों वक्र समान संतुष्टि दर्शाते हैं — जबकि ऊँचा वक्र अधिक संतुष्टि दर्शाता है। यह विरोधाभास है।
एक IC पर बंडल: (1 सेब, 12 केले), (2, 8), (3, 5), (4, 3), (5, 2)। MRS = 4, 3, 2, 1 — घटती जाती है। इसलिए IC मूल बिंदु की ओर उत्तल है।
6. उपभोक्ता संतुलन : अनधिमान वक्र विश्लेषण
उपभोक्ता बजट रेखा पर स्थित उस बंडल को चुनता है जो उसे सबसे ऊँचे संभव अनधिमान वक्र पर ले जाए। यह वह बिंदु है जहाँ बजट रेखा किसी IC को स्पर्श करती है:
यदि MRS > p₁/p₂: उपभोक्ता वस्तु 1 की एक इकाई के लिए वस्तु 2 की जितनी इकाइयाँ छोड़ने को तैयार है, वह बाज़ार की माँग से अधिक है — अतः वह वस्तु 1 अधिक खरीदेगा; इससे MRS घटेगी जब तक समानता न आ जाए। यदि MRS < p₁/p₂: वह वस्तु 1 कम खरीदेगा।
7. माँग (Demand)
- माँग: किसी वस्तु की वह मात्रा जिसे उपभोक्ता एक निश्चित समय में, दी हुई कीमत पर खरीदने को तैयार और समर्थ है। केवल इच्छा माँग नहीं है — इच्छा के साथ क्रय-शक्ति और खरीदने की तत्परता भी चाहिए।
- माँग फलन: qₓ = f(Pₓ, Pᵣ, M, रुचि/अधिमान) — वस्तु की अपनी कीमत, संबंधित वस्तुओं की कीमत, आय, और रुचि-अधिमान।
- माँग अनुसूची और माँग वक्र: विभिन्न कीमतों पर माँगी गई मात्राओं की तालिका और उसका आलेख।
माँग का नियम (Law of Demand)
अन्य बातें समान रहने पर (Ceteris Paribus), किसी वस्तु की कीमत और उसकी माँगी गई मात्रा में विपरीत संबंध होता है — कीमत घटने पर माँग बढ़ती है और कीमत बढ़ने पर माँग घटती है। इसलिए माँग वक्र बाएँ से दाएँ नीचे की ओर ढलता है।
माँग वक्र नीचे की ओर क्यों ढलता है?
- प्रतिस्थापन प्रभाव (Substitution Effect): किसी वस्तु की कीमत घटने पर वह अन्य वस्तुओं की तुलना में सस्ती हो जाती है; उपभोक्ता अन्य वस्तुओं के स्थान पर उसे अधिक खरीदता है।
- आय प्रभाव (Income Effect): कीमत घटने से उपभोक्ता की वास्तविक आय (क्रय-शक्ति) बढ़ती है; सामान्य वस्तु की स्थिति में वह अधिक खरीदता है।
- ह्रासमान सीमांत उपयोगिता: MU घटने के कारण उपभोक्ता अतिरिक्त इकाइयाँ केवल कम कीमत पर ही खरीदने को तैयार होता है (MU = P की शर्त)।
वस्तुओं के प्रकार
| प्रकार | अर्थ | उदाहरण |
|---|---|---|
| सामान्य वस्तु (Normal Good) | आय बढ़ने पर माँग बढ़ती है | अच्छे कपड़े, फल, दूध (अधिकांश वस्तुएँ) |
| निम्नस्तरीय वस्तु (Inferior Good) | आय बढ़ने पर माँग घटती है (उपभोक्ता बेहतर विकल्प की ओर जाता है) | मोटा अनाज या घटिया गुणवत्ता का कपड़ा (उपभोक्ता के संदर्भ पर निर्भर) |
| स्थानापन्न (Substitutes) | एक की कीमत बढ़ने पर दूसरे की माँग बढ़ती है | चाय और कॉफ़ी |
| पूरक (Complements) | साथ-साथ उपयोग; एक की कीमत बढ़ने पर दूसरे की माँग घटती है | कार और पेट्रोल, पेन और स्याही |
कोई वस्तु सामान्य है या निम्नस्तरीय — यह वस्तु की अपनी विशेषता नहीं, बल्कि उपभोक्ता की आय के स्तर पर निर्भर करती है। एक ही वस्तु कम आय पर सामान्य और ऊँची आय पर निम्नस्तरीय हो सकती है।
माँग वक्र पर संचलन बनाम माँग वक्र का खिसकना
| माँग वक्र पर संचलन (Movement along) | माँग वक्र का खिसकना (Shift) |
|---|---|
| केवल वस्तु की अपनी कीमत बदलने से | कीमत के अतिरिक्त अन्य कारकों — आय, संबंधित वस्तुओं की कीमत, रुचि — के बदलने से |
| माँग का विस्तार (कीमत घटी) या संकुचन (कीमत बढ़ी) | माँग में वृद्धि (दाईं ओर) या कमी (बाईं ओर) |
| उसी वक्र पर ऊपर-नीचे | नया माँग वक्र |
बाज़ार माँग: किसी कीमत पर बाज़ार के सभी उपभोक्ताओं की व्यक्तिगत माँगों का योग। आरेख में यह व्यक्तिगत माँग वक्रों का क्षैतिज योग है।
8. माँग की कीमत लोच (Price Elasticity of Demand)
माँग की कीमत लोच किसी वस्तु की कीमत में परिवर्तन के प्रति उसकी माँगी गई मात्रा की संवेदनशीलता का माप है।
माँग के नियम के कारण ΔQ और ΔP विपरीत चिह्न के होते हैं, इसलिए ऋण चिह्न लगाकर eD को धनात्मक रूप में व्यक्त करते हैं।
| eD का मान | नाम | अर्थ |
|---|---|---|
| eD = 0 | पूर्णतः बेलोचदार | कीमत बदलने पर भी माँग नहीं बदलती; ऊर्ध्वाधर माँग वक्र |
| 0 < eD < 1 | बेलोचदार (Inelastic) | माँग में प्रतिशत परिवर्तन कीमत के प्रतिशत परिवर्तन से कम |
| eD = 1 | इकाई लोचदार (Unitary) | दोनों प्रतिशत परिवर्तन बराबर; आयताकार अतिपरवलय वक्र |
| eD > 1 | लोचदार (Elastic) | माँग में प्रतिशत परिवर्तन अधिक |
| eD = ∞ | पूर्णतः लोचदार | क्षैतिज माँग वक्र |
किसी वस्तु की कीमत ₹10 से घटकर ₹8 होती है और माँग 100 इकाई से बढ़कर 130 इकाई हो जाती है। eD ज्ञात कीजिए।
हल: माँग में % परिवर्तन = 30/100 × 100 = 30%। कीमत में % परिवर्तन = −2/10 × 100 = −20%। eD = −(30)/(−20) = 1.5 — माँग लोचदार है।
ज्यामितीय विधि (Geometric Method)
सीधी रेखा वाले माँग वक्र पर किसी बिंदु पर लोच = वक्र का निचला भाग ÷ वक्र का ऊपरी भाग (बिंदु से x-अक्ष तक की दूरी ÷ बिंदु से y-अक्ष तक की दूरी)। इसलिए सीधी रेखा के माँग वक्र पर लोच हर बिंदु पर अलग होती है: मध्य बिंदु पर eD = 1, उससे ऊपर eD > 1, नीचे eD < 1; y-अक्ष पर ∞ और x-अक्ष पर 0।
माँग की लोच के निर्धारक
- निकट स्थानापन्नों की उपलब्धता: अधिक स्थानापन्न → अधिक लोचदार।
- वस्तु की प्रकृति: आवश्यकताएँ (नमक, जीवनरक्षक दवाएँ) बेलोचदार; विलासिताएँ लोचदार।
- बजट में हिस्सा: आय का छोटा हिस्सा खर्च होने वाली वस्तुएँ (माचिस) बेलोचदार।
- समय अवधि: दीर्घकाल में उपभोक्ता विकल्प ढूँढ लेते हैं → लोच अधिक।
- आदत: आदत वाली वस्तुओं की माँग बेलोचदार।
लोच और कुल व्यय (Total Expenditure) का संबंध
| लोच | कीमत घटने पर कुल व्यय (P × Q) | कीमत बढ़ने पर कुल व्यय |
|---|---|---|
| eD > 1 | बढ़ता है | घटता है |
| eD = 1 | अपरिवर्तित | अपरिवर्तित |
| eD < 1 | घटता है | बढ़ता है |
ऊपर के उदाहरण में: पहले व्यय = 10 × 100 = ₹1,000; बाद में = 8 × 130 = ₹1,040 — व्यय बढ़ा, जो eD > 1 से मेल खाता है।
9. मास्टर तालिका : प्रमुख सूत्र
| अवधारणा | सूत्र / शर्त |
|---|---|
| सीमांत उपयोगिता | MUₙ = TUₙ − TUₙ₋₁ |
| एक वस्तु संतुलन | MUx / Px = MUm |
| दो वस्तु संतुलन | MUx/Px = MUy/Py = MUm |
| बजट रेखा | p₁x₁ + p₂x₂ = M; ढलान −p₁/p₂ |
| कटान | M/p₁ और M/p₂ |
| MRS | |Δx₂/Δx₁| (IC की ढलान) |
| IC संतुलन | MRS = p₁/p₂ + IC उत्तल |
| कीमत लोच | eD = −(ΔQ/ΔP) × (P/Q) |
| ज्यामितीय लोच | निचला भाग ÷ ऊपरी भाग |
10. मास्टर सारांश तालिका
| विषय | मुख्य बिंदु |
|---|---|
| गणनावाचक विश्लेषण | उपयोगिता मापनीय; DMU नियम; MU = P |
| क्रमवाचक विश्लेषण | केवल वरीयता क्रम; बजट रेखा + IC |
| IC की विशेषताएँ | ऋणात्मक ढलान, उत्तल, ऊँचा = बेहतर, परस्पर नहीं काटते |
| माँग का नियम | कीमत और मात्रा में विपरीत संबंध; प्रतिस्थापन + आय प्रभाव |
| लोच | 0 से ∞; स्थानापन्न, प्रकृति, समय पर निर्भर; व्यय विधि |
11. माइंड मैप
- TU, MU, DMU
- MUx/Px = MUy/Py
- बजट रेखा
- MRS = p₁/p₂
- माँग का नियम
- संचलन बनाम खिसकना
- प्रतिशत, ज्यामितीय
- व्यय संबंध
12. टिप्स और ट्रिक्स
- बजट रेखा प्रश्नों में पहले दोनों कटान (M/p₁, M/p₂) निकालें — बाक़ी सब आसान हो जाता है।
- संतुलन प्रश्न में अनुपात MUx/Px और MUy/Py की तुलना करें — जिसका अनुपात बड़ा है, उसे अधिक खरीदा जाएगा।
- लोच के प्रश्न में व्यय विधि से उत्तर की जाँच करें।
- आय बढ़ने पर "माँग का विस्तार" लिखना — सही शब्द "माँग में वृद्धि" (वक्र खिसकना) है।
- कीमत लोच को माँग वक्र की ढलान के बराबर समझना — लोच ढलान और P/Q दोनों पर निर्भर है।
- सीधी रेखा के माँग वक्र पर सभी बिंदुओं पर समान लोच मानना।
13. महत्वपूर्ण वन-लाइनर
- MU = 0 होने पर TU अधिकतम होती है।
- बजट रेखा की ढलान −p₁/p₂ होती है।
- IC मूल बिंदु की ओर उत्तल होता है क्योंकि MRS घटती है।
- दो अनधिमान वक्र एक-दूसरे को नहीं काटते।
- स्थानापन्न वस्तुओं की माँग अधिक लोचदार होती है।
- इकाई लोच पर कीमत बदलने से कुल व्यय नहीं बदलता।
- बाज़ार माँग वक्र व्यक्तिगत माँग वक्रों का क्षैतिज योग है।
14. परीक्षा-पैटर्न प्रश्न (विस्तृत उत्तर सहित)
जब सीमांत उपयोगिता शून्य होती है, तब कुल उपयोगिता:
- शून्य होती है
- अधिकतम होती है
- घटने लगती है
- ऋणात्मक होती है
उत्तर देखें
MU = 0 पर अतिरिक्त इकाई कुछ नहीं जोड़ती, इसलिए TU अपने उच्चतम स्तर पर होती है (संतृप्ति बिंदु)।
उत्तर: (ख) अधिकतम होती है
चाय और चीनी किस प्रकार की वस्तुएँ हैं?
उत्तर देखें
दोनों साथ-साथ उपयोग होती हैं — पूरक वस्तुएँ।
उत्तर: पूरक वस्तुएँ
M = ₹100, p₁ = ₹10, p₂ = ₹5 हो तो बजट रेखा का x₂-अक्ष पर कटान क्या होगा?
उत्तर देखें
M/p₂ = 100/5 = 20।
उत्तर: 20 इकाई
अनधिमान वक्र मूल बिंदु की ओर उत्तल क्यों होता है?
उत्तर देखें
ह्रासमान MRS के कारण। जैसे-जैसे उपभोक्ता वस्तु 1 की अधिक इकाइयाँ लेता है और उसके पास वस्तु 2 कम रह जाती है, वस्तु 1 की अतिरिक्त इकाई उसके लिए कम मूल्यवान और वस्तु 2 अधिक मूल्यवान हो जाती है; इसलिए वह वस्तु 1 की हर अगली इकाई के लिए वस्तु 2 की कम इकाइयाँ छोड़ने को तैयार होता है।
उत्तर: घटती MRS के कारण
Px = ₹5, Py = ₹4, MUx = 30, MUy = 28। क्या उपभोक्ता संतुलन में है? यदि नहीं, तो वह क्या करेगा? (काल्पनिक आँकड़े)
उत्तर देखें
MUx/Px = 30/5 = 6; MUy/Py = 28/4 = 7। चूँकि 7 > 6, Y पर खर्च किया गया अंतिम रुपया अधिक उपयोगिता देता है। उपभोक्ता Y अधिक और X कम खरीदेगा, जब तक अनुपात बराबर न हों।
उत्तर: संतुलन में नहीं; Y की ओर खर्च खिसकाएगा
माँग वक्र पर संचलन और माँग वक्र के खिसकने में अंतर बताइए।
उत्तर देखें
संचलन: केवल वस्तु की अपनी कीमत बदलने से — उसी वक्र पर विस्तार या संकुचन। खिसकना: आय, संबंधित वस्तुओं की कीमत, रुचि आदि बदलने से — पूरा वक्र दाईं ओर (वृद्धि) या बाईं ओर (कमी)।
उत्तर: अपनी कीमत → संचलन; अन्य कारक → खिसकना
किसी वस्तु की कीमत ₹20 से बढ़कर ₹25 हो जाती है और माँग 200 से घटकर 180 इकाई हो जाती है (काल्पनिक आँकड़े)। eD ज्ञात कीजिए और माँग की प्रकृति बताइए।
उत्तर देखें
माँग में % परिवर्तन = −20/200 × 100 = −10%। कीमत में % परिवर्तन = 5/20 × 100 = 25%। eD = −(−10)/25 = 0.4 — बेलोचदार माँग। जाँच: व्यय 20×200 = ₹4,000 से बढ़कर 25×180 = ₹4,500 — कीमत बढ़ने पर व्यय बढ़ा, जो eD < 1 के अनुरूप है।
उत्तर: eD = 0.4 (बेलोचदार)
यदि केवल वस्तु 1 की कीमत घट जाए, तो बजट रेखा पर क्या प्रभाव होगा?
उत्तर देखें
x₂-अक्ष का कटान (M/p₂) वही रहेगा; x₁-अक्ष का कटान (M/p₁) बढ़ेगा। अतः बजट रेखा x₂-अक्ष पर टिकी रहकर बाहर की ओर घूमेगी और समतल (कम ढलान वाली) हो जाएगी।
उत्तर: x₂-अक्ष पर टिकी रहकर बाहर घूमेगी
सिद्ध कीजिए कि दो अनधिमान वक्र एक-दूसरे को नहीं काट सकते।
उत्तर देखें
मान लें IC₁ और IC₂ बिंदु A पर काटते हैं। IC₁ पर एक अन्य बिंदु B और IC₂ पर बिंदु C लें, जहाँ C में B से दोनों वस्तुएँ अधिक हैं। IC₁ पर होने से A ~ B (समान संतुष्टि); IC₂ पर होने से A ~ C। अतः B ~ C। पर एकदिष्ट अधिमान के अनुसार C, B से अधिक पसंद किया जाना चाहिए (उसमें दोनों वस्तुएँ अधिक हैं)। यह विरोधाभास है, इसलिए दो IC नहीं काट सकते।
उत्तर: काटने पर एकदिष्ट अधिमान की मान्यता का उल्लंघन होता है
अनधिमान वक्र विश्लेषण द्वारा उपभोक्ता संतुलन की शर्तें समझाइए। यदि MRS > p₁/p₂ हो तो क्या होगा?
उत्तर देखें
शर्तें: (1) बजट रेखा IC को स्पर्श करे — MRS = p₁/p₂; (2) संतुलन बिंदु पर IC मूल बिंदु की ओर उत्तल हो। यदि MRS > p₁/p₂: उपभोक्ता वस्तु 1 की एक इकाई के लिए वस्तु 2 की जितनी इकाइयाँ छोड़ने को तैयार है, बाज़ार उससे कम माँगता है — अतः वस्तु 1 अधिक खरीदना लाभदायक है। ऐसा करने से वह ऊँचे IC पर पहुँचता है और MRS घटती है, जब तक MRS = p₁/p₂ न हो जाए।
उत्तर: MRS = p₁/p₂ + उत्तल IC; MRS > p₁/p₂ पर वस्तु 1 अधिक खरीदेगा
एक सीधी रेखा वाले माँग वक्र पर बिंदु P के नीचे का भाग 6 सेमी और ऊपर का भाग 4 सेमी है। P पर लोच ज्ञात कीजिए। यदि कीमत थोड़ी बढ़े, तो कुल व्यय पर क्या प्रभाव होगा?
उत्तर देखें
eD = निचला भाग ÷ ऊपरी भाग = 6/4 = 1.5 — लोचदार। लोचदार माँग में कीमत बढ़ने पर माँग में प्रतिशत गिरावट अधिक होती है, इसलिए कुल व्यय घटेगा।
उत्तर: eD = 1.5; कुल व्यय घटेगा
आय बढ़ने पर किसी वस्तु की माँग घट जाती है। यह किस प्रकार की वस्तु है? क्या यह वस्तु सदैव इसी श्रेणी में रहेगी? माँग वक्र पर प्रभाव भी बताइए।
उत्तर देखें
यह निम्नस्तरीय वस्तु है। यह श्रेणी स्थायी नहीं — यह उपभोक्ता की आय के स्तर पर निर्भर है; बहुत कम आय पर वही वस्तु सामान्य हो सकती है (आय बढ़ने पर उसकी माँग बढ़े), और एक सीमा के बाद निम्नस्तरीय बन सकती है। माँग वक्र पर प्रभाव: आय बढ़ने पर निम्नस्तरीय वस्तु का माँग वक्र बाईं ओर खिसकेगा (माँग में कमी)।
उत्तर: निम्नस्तरीय वस्तु; श्रेणी आय-स्तर पर निर्भर; माँग वक्र बाईं ओर खिसकेगा
15. त्वरित पुनरावृत्ति सारांश
- MU = TUₙ − TUₙ₋₁; DMU नियम; MU = 0 पर TU अधिकतम।
- संतुलन (गणनावाचक): MUx/Px = MUy/Py = MUm।
- बजट रेखा p₁x₁ + p₂x₂ = M; ढलान −p₁/p₂; आय से समानांतर खिसकना, कीमत से घूमना।
- IC: ऋणात्मक ढलान, उत्तल (घटती MRS), परस्पर नहीं काटते; संतुलन MRS = p₁/p₂।
- माँग का नियम: प्रतिस्थापन + आय प्रभाव; सामान्य/निम्नस्तरीय, स्थानापन्न/पूरक।
- eD = −(ΔQ/ΔP)(P/Q); eD > 1 पर कीमत घटने से व्यय बढ़ता है।