1. अध्याय एक नज़र में
पाठ्यक्रम: "आपदा और आपदा प्रबंधन।" एक पंक्ति का पाठ्यक्रम, पर हर वर्ष 1-2 प्रश्न — और अब प्रश्न "आपदा के बाद राहत" से हटकर जोखिम न्यूनीकरण, लचीलापन (resilience), सामुदायिक भागीदारी और विकास-आपदा के संबंध पर हैं। GS-1 के भू-भौतिकीय घटनाओं (विज्ञान) और GS-3 के आपदा प्रबंधन (शासन) को साथ पढ़ें।
| वर्ष | प्रश्न |
|---|---|
| 2026 | पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील क्षेत्रों में तीव्र अवसंरचना विकास बनाम आपदा जोखिम न्यूनीकरण; आपदा प्रबंधन में सामुदायिक भागीदारी |
| 2024 | आपदा लचीलापन और सेंडाई फ़्रेमवर्क के लक्ष्य; शहरी बाढ़ |
भारत की आपदा नीति "राहत-केंद्रित" (1990 के दशक तक) से "समग्र जोखिम प्रबंधन" की ओर बढ़ी है — रोकथाम, शमन, तैयारी, प्रतिक्रिया, पुनर्प्राप्ति और "बेहतर पुनर्निर्माण" (Build Back Better)। ओडिशा सुपर चक्रवात (1999), भुज भूकंप (2001) और सुनामी (2004) इस परिवर्तन के मोड़ थे।
2. संस्थागत ढाँचा
- आपदा प्रबंधन अधिनियम 2005: NDMA (अध्यक्ष — प्रधानमंत्री), राष्ट्रीय कार्यकारी समिति, SDMA (मुख्यमंत्री), DDMA (ज़िलाधिकारी), NDRF (राष्ट्रीय आपदा मोचन बल, 2006), NIDM (प्रशिक्षण-अनुसंधान), आपदा मोचन और शमन निधियाँ।
- आपदा प्रबंधन (संशोधन) अधिनियम 2025: NDMA और SDMA को राष्ट्रीय/राज्य योजनाएँ बनाने की प्रत्यक्ष ज़िम्मेदारी; राष्ट्रीय और राज्य स्तर पर आपदा डेटाबेस; राजधानियों और बड़े नगर निगम वाले शहरों में शहरी आपदा प्रबंधन प्राधिकरण; राज्य आपदा मोचन बल (SDRF) को वैधानिक दर्जा।
- नीतियाँ और योजनाएँ: राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन नीति (2009), राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन योजना (2016 — सेंडाई के अनुरूप पहली योजना, 2019 में अद्यतन)।
- वित्त: 15वें वित्त आयोग से राष्ट्रीय और राज्य आपदा जोखिम प्रबंधन निधि — "मोचन" (response) के साथ पहली बार अलग "शमन" (mitigation) निधि।
- पूर्व चेतावनी: IMD (चक्रवात, लू, भारी वर्षा), INCOIS (सुनामी, ऊँची लहरें), CWC (बाढ़ पूर्वानुमान), GSI (भूस्खलन), "सचेत" — सामान्य चेतावनी प्रोटोकॉल (CAP) आधारित मोबाइल अलर्ट।
3. सेंडाई फ़्रेमवर्क (2015-2030)
- चार प्राथमिकताएँ: (1) आपदा जोखिम को समझना; (2) जोखिम प्रबंधन के लिए शासन को सुदृढ़ करना; (3) लचीलेपन के लिए जोखिम न्यूनीकरण में निवेश; (4) प्रभावी प्रतिक्रिया की तैयारी और पुनर्प्राप्ति-पुनर्निर्माण में "बेहतर पुनर्निर्माण"।
- सात वैश्विक लक्ष्य: (a) आपदा मृत्यु दर में कमी; (b) प्रभावित लोगों की संख्या में कमी; (c) प्रत्यक्ष आर्थिक हानि में कमी; (d) महत्वपूर्ण अवसंरचना और बुनियादी सेवाओं (स्वास्थ्य, शिक्षा) की क्षति में कमी; (e) राष्ट्रीय-स्थानीय DRR रणनीतियों वाले देशों की संख्या बढ़ाना (2020 तक); (f) विकासशील देशों के साथ अंतरराष्ट्रीय सहयोग; (g) बहु-आपदा पूर्व चेतावनी प्रणालियों और जोखिम जानकारी तक पहुँच।
- भारत: प्रधानमंत्री का 10-सूत्रीय एजेंडा (2016, नई दिल्ली — एशियाई मंत्रिस्तरीय सम्मेलन); आपदा-रोधी अवसंरचना गठबंधन (CDRI, 2019); G20 (2023) में DRR कार्य समूह; UN की "सबके लिए पूर्व चेतावनी" (2027) पहल का समर्थन।
4. भारत का जोखिम परिदृश्य
| आपदा | संवेदनशील क्षेत्र | हाल के उदाहरण / सबक |
|---|---|---|
| चक्रवात | पूर्वी तट, गुजरात | ओडिशा मॉडल — 1999 से फ़ैलिन (2013), फ़ानी (2019) तक मृत्यु में भारी कमी |
| बाढ़ | गंगा-ब्रह्मपुत्र मैदान, शहरी क्षेत्र | केरल 2018, असम हर वर्ष, शहरी बाढ़ |
| भूस्खलन | हिमालय, पश्चिमी घाट, पूर्वोत्तर | वायनाड (जुलाई 2024); ISRO भूस्खलन एटलस (2023) |
| भूकंप | हिमालय, पूर्वोत्तर, कच्छ | भुज 2001 — भवन संहिता और पुनर्निर्माण मॉडल |
| भूमि धँसाव / निर्माण आपदा | हिमालयी शहर | जोशीमठ (2023), सिल्कयारा सुरंग (2023) |
| लू (heatwave) | उत्तर-पश्चिम, मध्य भारत | अहमदाबाद हीट एक्शन प्लान (2013) |
| हिमनद झील बाढ़ | सिक्किम, हिमाचल, उत्तराखंड | दक्षिण ल्होनक (2023) |

5. विस्तृत विवेचन: आपदा-प्रबंधन चक्र — राहत से जोखिम-न्यूनीकरण तक
भारत में आपदा-प्रबंधन का दृष्टिकोण पिछले दो दशकों में मौलिक रूप से बदला है। 2005 से पहले यह मुख्यतः "राहत-केंद्रित" था: आपदा के बाद भोजन, आश्रय और मुआवज़ा। 1999 के ओडिशा महाचक्रवात, 2001 के भुज भूकंप और 2004 की सुनामी के बाद आपदा प्रबंधन अधिनियम, 2005 आया, जिसने "समग्र, सक्रिय और बहु-आपदा" दृष्टिकोण अपनाया। इसे "आपदा-प्रबंधन चक्र" के माध्यम से समझना सबसे सरल है।
| चरण | उद्देश्य | भारत में उदाहरण |
|---|---|---|
| रोकथाम और शमन (Prevention & Mitigation) | जोखिम को घटाना: संरचनात्मक (तटबंध, भूकंप-रोधी भवन, चक्रवात आश्रय) और ग़ैर-संरचनात्मक (भूमि-उपयोग नियमन, भवन-संहिता, बीमा) उपाय | राष्ट्रीय चक्रवात जोखिम शमन परियोजना; बाढ़-मैदान ज़ोनिंग पर मॉडल विधेयक |
| तैयारी (Preparedness) | चेतावनी, योजना, प्रशिक्षण, अभ्यास, संसाधनों का पूर्व-स्थापन | IMD और INCOIS की प्रारंभिक चेतावनी; सामान्य चेतावनी प्रोटोकॉल (CAP) आधारित मोबाइल अलर्ट; NDRF का पूर्व-तैनाती; "आपदा मित्र" स्वयंसेवक |
| प्रतिक्रिया (Response) | खोज-बचाव, राहत, चिकित्सा, निकासी | NDRF, SDRF, सशस्त्र बल; ओडिशा का "शून्य मृत्यु" लक्ष्य वाला निकासी मॉडल |
| पुनर्प्राप्ति और पुनर्निर्माण (Recovery) | आजीविका, अवसंरचना और मनोसामाजिक पुनर्वास; "Build Back Better" | भुज के बाद गुजरात का पुनर्निर्माण; केरल बाढ़ (2018) के बाद "Rebuild Kerala" पहल |
- राष्ट्रीय और राज्य आपदा प्रतिक्रिया कोष (NDRF/SDRF): वित्त आयोग की सिफ़ारिशों पर; SDRF में सामान्य राज्यों के लिए केंद्र का अंशदान 75% और पूर्वोत्तर व हिमालयी राज्यों के लिए 90%।
- शमन कोष: 15वें वित्त आयोग ने पहली बार राष्ट्रीय और राज्य आपदा शमन कोष (NDMF/SDMF) का प्रावधान किया, ताकि धन केवल राहत में नहीं, जोखिम घटाने में भी लगे।
- चुनौती: मुआवज़े के मानक (प्रति हेक्टेयर फ़सल-हानि, प्रति मकान) वास्तविक हानि से बहुत कम; आपदा घोषित करने में केंद्र-राज्य विवाद; बीमा का कम प्रसार।
दो उभरती आपदाएँ: शहरी बाढ़ और लू
शहरी बाढ़: मुंबई (2005), चेन्नई (2015), बेंगलुरु और दिल्ली की बार-बार की जलभराव घटनाएँ दिखाती हैं कि शहरी बाढ़ अब वार्षिक संकट है। कारण: झीलों और आर्द्रभूमियों पर अतिक्रमण, नालों का अवरोध, कंक्रीट से वर्षा-जल का भूमि में न रिसना, पुरानी जल-निकासी जो नई वर्षा-तीव्रता के लिए डिज़ाइन नहीं। NDMA के शहरी बाढ़ दिशानिर्देश (2010) ने वार्ड-स्तर की योजना, वर्षा-जल निकासी का मानचित्रण और "स्पंज सिटी" जैसी प्राकृतिक अवशोषण-क्षमता की बात कही।
लू (Heatwave): IMD के मानकों के अनुसार मैदानों में अधिकतम तापमान कम से कम 40°C होने और सामान्य से एक निश्चित सीमा तक अधिक होने पर लू घोषित होती है। अहमदाबाद हीट एक्शन प्लान (2013) के बाद कई राज्यों और शहरों ने ऐसी योजनाएँ बनाईं: प्रारंभिक चेतावनी, अस्पतालों की तैयारी, कार्य-घंटों में बदलाव, पेयजल केंद्र, "कूल रूफ़"। चुनौती यह है कि लू को अभी भी आपदा प्रबंधन अधिनियम की अधिसूचित आपदाओं की सूची में शामिल करने पर बहस है, जिससे राहत-कोष के उपयोग में स्पष्टता नहीं। सबसे अधिक जोखिम बाहर काम करने वाले मज़दूरों, बुज़ुर्गों और झुग्गीवासियों को है — यानी लू भी सामाजिक असमानता की आपदा है।
"भारत में शहरी बाढ़ प्राकृतिक आपदा से अधिक नियोजन की विफलता है।" उदाहरणों सहित विवेचना कीजिए और समाधान सुझाइए। (250 शब्द)
मॉडल उत्तर
भूमिका: मुंबई (2005), चेन्नई (2015), हैदराबाद (2020) और बेंगलुरु (2022) जैसी घटनाओं ने दिखाया कि भारतीय शहर कुछ घंटों की भारी वर्षा में ठप हो जाते हैं। वर्षा प्राकृतिक है, पर उसका "आपदा" बनना बहुत हद तक मानवीय नियोजन पर निर्भर है।
नियोजन की विफलता के आयाम:
- जल-निकायों पर अतिक्रमण: झीलें, तालाब और बाढ़-मैदान निर्माण से भरे गए (चेन्नई में आर्द्रभूमियों का सिकुड़ना, बेंगलुरु की झीलों के बीच के नालों पर निर्माण)।
- पुरानी जल-निकासी: दशकों पुराने डिज़ाइन, जो आज की तीव्र वर्षा के लिए अपर्याप्त; ठोस अपशिष्ट से नालों का अवरोध।
- कंक्रीटीकरण: अपारगम्य सतहों से वर्षा-जल का भूमि में न रिसना।
- संस्थागत विखंडन: नगर निगम, विकास प्राधिकरण, जल बोर्ड और राज्य विभागों में समन्वय की कमी।
- जलवायु परिवर्तन से वर्षा की तीव्रता में वृद्धि, जिसे योजनाओं में शामिल नहीं किया गया।
समाधान:
- जल-निकायों और बाढ़-मैदानों का मानचित्रण तथा क़ानूनी संरक्षण; मास्टर प्लान में "नीला-हरा" अवसंरचना।
- वर्षा-जल निकासी का उन्नयन; अपशिष्ट-प्रबंधन से नालों की सफ़ाई।
- "स्पंज सिटी" उपाय: पारगम्य फुटपाथ, वर्षा-जल संचयन, शहरी वन।
- वार्ड-स्तरीय बाढ़-योजना; रीयल-टाइम वर्षा और जल-स्तर निगरानी (जैसे मुंबई और चेन्नई में स्वचालित मौसम केंद्र और बाढ़ चेतावनी प्रणाली)।
- एकीकृत शहरी जल-प्रबंधन प्राधिकरण; NDMA दिशानिर्देशों का क़ानूनी अनुपालन।
निष्कर्ष: शहरी बाढ़ का समाधान अधिक कंक्रीट नहीं, बल्कि पानी को "रास्ता" देने वाला नियोजन है; शहरों को प्रकृति के साथ, न कि उसके विरुद्ध, बनाना होगा।
आपदा-जोखिम न्यूनीकरण में समुदाय-आधारित दृष्टिकोण (Community-Based DRR) का महत्व उदाहरण सहित स्पष्ट कीजिए। (150 शब्द)
मॉडल उत्तर
अवधारणा: आपदा आने पर पहला प्रतिक्रियाकर्ता (first responder) सरकारी दल नहीं, स्थानीय समुदाय होता है। समुदाय-आधारित DRR में जोखिम का आकलन, योजना, चेतावनी और प्रतिक्रिया में स्थानीय लोगों की प्रत्यक्ष भागीदारी होती है। सेंडाई फ़्रेमवर्क भी "पूरे समाज" (whole-of-society) दृष्टिकोण पर बल देता है।
महत्व:
- स्थानीय ज्ञान: नदी के व्यवहार, सुरक्षित स्थानों और कमज़ोर परिवारों की जानकारी।
- "स्वर्णिम घंटे" (golden hour) में त्वरित बचाव।
- चेतावनी का अंतिम छोर तक प्रसार और विश्वसनीयता।
- स्वामित्व-भाव से तैयारी की निरंतरता।
उदाहरण: ओडिशा में चक्रवात आश्रयों का प्रबंधन स्थानीय समितियों द्वारा, और गाँव-स्तरीय स्वयंसेवक दलों द्वारा निकासी; 2004 की सुनामी के समय अंडमान के कुछ आदिवासी समुदायों का पारंपरिक ज्ञान से ऊँचे स्थानों पर जाना (व्यापक रूप से रिपोर्ट किया गया); केरल बाढ़ (2018) में मछुआरों द्वारा बचाव; NDMA की "आपदा मित्र" योजना में सामुदायिक स्वयंसेवकों का प्रशिक्षण।
चुनौतियाँ: प्रशिक्षण की निरंतरता; महिलाओं, दिव्यांगों और वृद्धों की ज़रूरतों का समावेश; स्थानीय निकायों को धन और अधिकार।
निष्कर्ष: पंचायत और नगर-वार्ड स्तर की आपदा-योजनाएँ, स्कूल-सुरक्षा कार्यक्रम और प्रशिक्षित स्वयंसेवक ही "शून्य मृत्यु" लक्ष्य की नींव हैं।
आपदा-पश्चात पुनर्निर्माण में "Build Back Better" (बेहतर पुनर्निर्माण) सिद्धांत का क्या अर्थ है? भारतीय उदाहरणों सहित स्पष्ट कीजिए। (150 शब्द)
मॉडल उत्तर
अर्थ: सेंडाई फ़्रेमवर्क (2015-2030) की चौथी प्राथमिकता "Build Back Better" कहती है कि आपदा के बाद पुनर्निर्माण केवल पुरानी स्थिति बहाल करना नहीं, बल्कि भविष्य के जोखिम को घटाने का अवसर है: सुरक्षित स्थान, आपदा-रोधी डिज़ाइन, बेहतर भूमि-उपयोग, और आजीविका तथा सामाजिक ढाँचे का सुदृढ़ीकरण।
भारतीय उदाहरण:
- भुज (2001): गुजरात राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण का गठन; भूकंप-रोधी तकनीक से मकानों का पुनर्निर्माण; मालिक-संचालित (owner-driven) पुनर्निर्माण, जिसमें परिवारों को तकनीकी सहायता के साथ स्वयं निर्माण का अवसर मिला।
- ओडिशा (1999 के बाद): बहु-उद्देश्यीय चक्रवात आश्रय, तटीय वनीकरण और प्रारंभिक चेतावनी तंत्र।
- केरल (2018 के बाद): "Rebuild Kerala" पहल में नदी-घाटी आधारित नियोजन और संवेदनशील क्षेत्रों में निर्माण-नियमन पर ज़ोर।
चुनौतियाँ: त्वरित राहत के दबाव में गुणवत्ता से समझौता; सुरक्षित स्थान पर पुनर्वास से आजीविका का विच्छेद; धन और तकनीकी क्षमता की कमी।
निष्कर्ष: बेहतर पुनर्निर्माण का केंद्र "ईंट-पत्थर" के साथ "लोग और आजीविका" होने चाहिए; समुदाय की भागीदारी इसकी सफलता की कुंजी है।
6. Master Summary Table
| विषय | मुख्य बिंदु | तथ्य |
|---|---|---|
| क़ानून | NDMA-SDMA-DDMA, NDRF | DM अधिनियम 2005; संशोधन 2025 |
| योजना | सेंडाई-संरेखित | NDMP 2016 (2019 अद्यतन) |
| सेंडाई | 4 प्राथमिकताएँ, 7 लक्ष्य | 2015-2030 |
| अंतरराष्ट्रीय | लचीली अवसंरचना | CDRI 2019; 10-सूत्रीय एजेंडा 2016 |
| वित्त | शमन निधि | 15वाँ वित्त आयोग |
| शहरी बाढ़ | अतिक्रमण, अपर्याप्त जल निकासी | NDMA दिशानिर्देश 2010 |
| समुदाय | प्रथम प्रतिक्रियादाता | आपदा मित्र (2016) |
7. Mind Map
- NDMA, NDRF
- शहरी प्राधिकरण
- सेंडाई
- CDRI
- शमन, तैयारी
- प्रतिक्रिया, पुनर्निर्माण
- जलवायु-जनित
- भू-जनित
- आपदा मित्र
- स्थानीय योजनाएँ
8. महत्वपूर्ण One-liners
- आपदा प्रबंधन अधिनियम: 2005; संशोधन: 2025।
- NDRF: 2006।
- राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन योजना: 2016 (पहली)।
- सेंडाई फ़्रेमवर्क: 2015-2030; 7 लक्ष्य, 4 प्राथमिकताएँ।
- CDRI: 2019 (भारत की पहल, सचिवालय नई दिल्ली)।
- आपदा मित्र योजना: 2016।
- मुंबई की बाढ़: 26 जुलाई 2005 (एक दिन में लगभग 944 मिमी वर्षा)।
- अहमदाबाद हीट एक्शन प्लान: 2013 (दक्षिण एशिया में पहला)।
9. टिप्स एवं ट्रिक्स
- हर आपदा प्रश्न में "चक्र" का ढाँचा (पहले-दौरान-बाद) और कम से कम एक भारतीय सफलता-उदाहरण (ओडिशा, भुज) दें।
- सेंडाई के 7 लक्ष्य और 4 प्राथमिकताएँ याद रखें — लगभग हर उत्तर में फ़िट होते हैं।
- जलवायु परिवर्तन, शहरीकरण और "असुरक्षित विकास" को आपदा जोखिम के गुणक के रूप में लिखें।
आपदा जोखिम = ख़तरा × संवेदनशीलता (exposure + vulnerability) ÷ क्षमता — नीति का लक्ष्य संवेदनशीलता घटाना और क्षमता बढ़ाना है।
10. PYQ-आधारित प्रश्न एवं मॉडल उत्तर
पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील क्षेत्रों में तीव्र अवसंरचना विकास आपदा जोखिम न्यूनीकरण के लक्ष्यों से किस प्रकार टकराता है? संतुलन के उपाय सुझाइए। (250 शब्द)
मॉडल उत्तर
भूमिका: हिमालय, पश्चिमी घाट और तटीय क्षेत्र भू-वैज्ञानिक रूप से युवा या नाज़ुक हैं। वहाँ सड़क, सुरंग, जलविद्युत, पर्यटन और शहरी निर्माण आवश्यक भी है (संपर्क, सुरक्षा, आजीविका), पर बिना सावधानी के यह आपदा जोखिम को कई गुना बढ़ा देता है।
टकराव के रूप: (1) ढलान अस्थिरता — सड़क चौड़ीकरण के लिए पहाड़ों की ऊर्ध्वाधर कटाई, विस्फोट, मलबे का नदियों में डालना — भूस्खलन; (2) सुरंगें और जलविद्युत — जल-प्रवाह और भूजल में व्यवधान; जोशीमठ भूमि धँसाव (2023) पर बहस; सिल्कयारा सुरंग धँसाव (2023); (3) नदी-तट पर निर्माण — केदारनाथ (2013), धराली (2025) में आकस्मिक बाढ़ से क्षति; (4) वन कटाई — मिट्टी की पकड़ घटना; (5) वहन क्षमता से अधिक पर्यटन — हिमाचल 2023 की वर्षा आपदा; (6) पश्चिमी घाट — खनन, उत्खनन और भूमि-उपयोग परिवर्तन; वायनाड भूस्खलन (2024); गाडगिल (2011) और कस्तूरीरंगन (2013) समितियों की पारिस्थितिक संवेदनशील क्षेत्र (ESA) सिफ़ारिशों का अधूरा क्रियान्वयन; (7) तटीय क्षेत्र — CRZ उल्लंघन, मैंग्रोव विनाश।
संतुलन के उपाय: (1) जोखिम-सूचित योजना — भूस्खलन, भूकंप, बाढ़ जोखिम मानचित्र (ISRO भूस्खलन एटलस) को परियोजना-स्थल चयन में अनिवार्य करना; (2) वहन क्षमता अध्ययन — पर्यटन और शहरी विस्तार के लिए; (3) रणनीतिक और संचयी EIA — पूरी घाटी के लिए; (4) इंजीनियरिंग मानक — ढलान स्थिरीकरण, जल निकासी, सुरंग-निर्माण में आपातकालीन निकास, "लचीली अवसंरचना" (CDRI के सिद्धांत); (5) ESA की अधिसूचना और नदी-तट पर निर्माण निषेध क्षेत्र; (6) प्रकृति-आधारित समाधान — वनीकरण, बायो-इंजीनियरिंग; (7) पूर्व चेतावनी और निगरानी (भू-धँसाव, GLOF); (8) स्थानीय समुदाय की भागीदारी और पारंपरिक ज्ञान (पहाड़ी वास्तुकला)।
निष्कर्ष: संवेदनशील क्षेत्रों में प्रश्न "विकास हो या न हो" का नहीं, बल्कि "कैसे और कितना" का है — "जोखिम-सूचित विकास" ही सतत विकास है।
प्रभावी आपदा प्रबंधन में सामुदायिक भागीदारी की भूमिका की उदाहरण सहित चर्चा कीजिए। (250 शब्द)
मॉडल उत्तर
भूमिका: आपदा के पहले कुछ घंटों में बाहरी सहायता पहुँचने से पहले स्थानीय समुदाय ही "प्रथम प्रतिक्रियादाता" होता है। सेंडाई फ़्रेमवर्क भी "पूरे समाज" (whole-of-society) के दृष्टिकोण पर बल देता है।
भूमिका के आयाम: (1) जोखिम की पहचान — स्थानीय ज्ञान (नदी का व्यवहार, भूस्खलन के संकेत, सुरक्षित स्थान); (2) तैयारी — ग्राम आपदा प्रबंधन योजना, मॉक ड्रिल, आपातकालीन किट; (3) पूर्व चेतावनी का अंतिम छोर तक प्रसार — मोबाइल अलर्ट को घर-घर पहुँचाना; (4) खोज और बचाव, प्राथमिक चिकित्सा; (5) राहत वितरण में पारदर्शिता; (6) पुनर्निर्माण — "मालिक-संचालित" (owner-driven) आवास पुनर्निर्माण।
उदाहरण: (1) ओडिशा — चक्रवात आश्रय स्थलों का प्रबंधन ग्राम समितियाँ करती हैं, स्वयंसेवक दल; फ़ैलिन (2013) और फ़ानी (2019) में बड़े पैमाने पर समय पर निकासी; (2) केरल बाढ़ (2018) — मछुआरों ने अपनी नावों से हज़ारों लोगों को बचाया ("केरल की सेना"); (3) भुज (2001) — समुदाय-आधारित पुनर्निर्माण, भूकंप-रोधी तकनीकों का प्रशिक्षण; (4) आपदा मित्र (2016) — आपदा-प्रवण ज़िलों में प्रशिक्षित सामुदायिक स्वयंसेवक; (5) "Tsunami Ready" गाँव (ओडिशा); (6) बिहार-असम में बाढ़ के दौरान स्वयं सहायता समूहों द्वारा सामुदायिक रसोई।
चुनौतियाँ: प्रशिक्षण और संसाधनों की कमी, स्थानीय योजनाओं का काग़ज़ी होना, सबसे संवेदनशील वर्गों (दिव्यांग, वृद्ध, महिलाएँ) की अनदेखी, पंचायतों की सीमित वित्तीय क्षमता।
आगे की राह: पंचायत विकास योजनाओं में DRR, आपदा मित्र का विस्तार और प्रमाणन, विद्यालयों में सुरक्षा शिक्षा, महिलाओं और युवाओं (NCC, NSS) की भूमिका, समावेशी योजना, सामुदायिक रेडियो।
निष्कर्ष: "समुदाय-आधारित आपदा प्रबंधन" लचीलेपन की नींव है — सरकार की क्षमता तभी प्रभावी है जब समुदाय तैयार हो।
आपदा लचीलापन (disaster resilience) से आप क्या समझते हैं? सेंडाई फ़्रेमवर्क के लक्ष्यों और उनकी प्राप्ति में भारत की प्रगति की चर्चा कीजिए। (250 शब्द)
मॉडल उत्तर
लचीलापन: किसी समुदाय या प्रणाली की वह क्षमता जिससे वह आपदा के झटके को सहन करे, उसके अनुरूप ढले, शीघ्र उबरे और पहले से बेहतर स्थिति में लौटे ("Bounce back better")। इसमें संरचनात्मक (मज़बूत भवन), सामाजिक (सुरक्षा जाल), आर्थिक (बीमा, आजीविका विविधता) और संस्थागत (योजना, चेतावनी) आयाम हैं।
सेंडाई फ़्रेमवर्क (2015-2030): चार प्राथमिकताएँ — जोखिम समझना, जोखिम शासन, लचीलेपन में निवेश, तैयारी और बेहतर पुनर्निर्माण; सात लक्ष्य — मृत्यु, प्रभावित लोग, आर्थिक हानि, अवसंरचना क्षति में कमी; राष्ट्रीय-स्थानीय रणनीतियाँ; अंतरराष्ट्रीय सहयोग; बहु-आपदा पूर्व चेतावनी तक पहुँच।
भारत की प्रगति: (1) मृत्यु में कमी — चक्रवातों में मृत्यु दर में नाटकीय गिरावट (ओडिशा, आंध्र, गुजरात — बिपरजॉय 2023); (2) पूर्व चेतावनी — IMD के उन्नत पूर्वानुमान, INCOIS सुनामी केंद्र, CAP-आधारित "सचेत" अलर्ट; (3) रणनीति — NDMP 2016 (सेंडाई-संरेखित), राज्य और ज़िला योजनाएँ; DM संशोधन अधिनियम 2025; (4) शमन निधि — 15वें वित्त आयोग से; (5) अवसंरचना लचीलापन — CDRI (2019); (6) अंतरराष्ट्रीय सहयोग — पड़ोसी देशों में मानवीय सहायता (नेपाल 2015, तुर्की 2023 — "ऑपरेशन दोस्त", म्यांमार 2025 — "ऑपरेशन ब्रह्मा"); (7) हीट एक्शन प्लान।
कमियाँ: (1) आर्थिक हानि लगातार बढ़ रही (शहरीकरण, जलवायु); (2) शहरी बाढ़, लू, भूस्खलन जैसे "धीमे और नए" ख़तरों में तैयारी कमज़ोर; (3) बीमा पैठ कम; (4) भवन संहिताओं का कमज़ोर प्रवर्तन; (5) आपदा हानि डेटा की कमी (अब डेटाबेस का प्रावधान); (6) स्थानीय निकायों की क्षमता।
आगे की राह: जोखिम-सूचित भूमि-उपयोग, पैरामीट्रिक बीमा, भवन संहिता प्रवर्तन, शहरी आपदा प्राधिकरणों का सशक्तीकरण, जलवायु अनुकूलन को विकास योजनाओं में मुख्यधारा बनाना।
निष्कर्ष: भारत ने "जीवन बचाने" में बड़ी सफलता पाई है; अगली चुनौती "आजीविका और संपत्ति बचाने" की है।
भारतीय शहरों में बार-बार होने वाली शहरी बाढ़ के कारणों और समाधान की चर्चा कीजिए। (150 शब्द)
मॉडल उत्तर
उदाहरण: मुंबई (2005), चेन्नई (2015), हैदराबाद (2020), बेंगलुरु (2022), दिल्ली में यमुना बाढ़ (2023) — लगभग हर मानसून में बड़े शहर ठप।
कारण: (1) जल निकायों और बाढ़ मैदानों पर अतिक्रमण — झीलें, नाले, नदी-तट; (2) अभेद्य सतह — कंक्रीट से अंतःस्पंदन कम, अपवाह तेज़; (3) पुरानी और अपर्याप्त जल निकासी — कम वर्षा-तीव्रता के लिए डिज़ाइन; (4) ठोस कचरा और गाद से नालियाँ अवरुद्ध; (5) जलवायु परिवर्तन — कम समय में अत्यधिक वर्षा; (6) तटीय शहरों में ज्वार और समुद्र-स्तर; (7) एजेंसियों में समन्वय की कमी; (8) अनियोजित शहरी विस्तार।
समाधान: (1) NDMA के शहरी बाढ़ दिशानिर्देश (2010) का पालन; (2) जल निकायों और प्राकृतिक नालों की बहाली, अतिक्रमण हटाना; (3) "स्पंज सिटी" — पारगम्य फ़र्श, वर्षा उद्यान, आर्द्रभूमि; (4) वर्षा जल संचयन; (5) जल निकासी का पुनर्डिज़ाइन — जलवायु-संशोधित वर्षा आँकड़ों पर; (6) पूर्व चेतावनी — मुंबई का iFLOWS, चेन्नई की बाढ़ चेतावनी प्रणाली, डॉप्लर रडार; (7) जोखिम-आधारित ज़ोनिंग; (8) DM संशोधन 2025 के तहत शहरी आपदा प्रबंधन प्राधिकरण।
भारत में लू (heatwave) एक "मौन आपदा" क्यों बनती जा रही है? हीट एक्शन प्लान की प्रभावशीलता का मूल्यांकन कीजिए। (250 शब्द)
मॉडल उत्तर
भूमिका: IMD के अनुसार मैदानी क्षेत्रों में अधिकतम तापमान 40°C या अधिक और सामान्य से 4.5°C अधिक होने (या 45°C से ऊपर) पर लू घोषित होती है। जलवायु परिवर्तन से लू की आवृत्ति, तीव्रता और अवधि बढ़ी है, और यह अब मार्च-अप्रैल से ही शुरू हो जाती है।
"मौन आपदा" क्यों: (1) बाढ़-चक्रवात की तरह दृश्य विनाश नहीं — मृत्यु धीरे-धीरे, घरों और कार्यस्थलों पर; (2) मृत्यु का कम पंजीकरण — "लू से मृत्यु" का प्रमाणन कठिन; (3) सबसे अधिक प्रभावित — बाहर काम करने वाले श्रमिक, किसान, वृद्ध, बच्चे, गरीब बस्तियाँ; (4) आर्थिक हानि — श्रम उत्पादकता में गिरावट, फ़सल (गेहूँ — 2022), पशुधन, बिजली की माँग; (5) शहरी ऊष्मा द्वीप प्रभाव; (6) रात का ऊँचा तापमान — शरीर को राहत नहीं; (7) लू आपदा मोचन निधि की अधिसूचित आपदाओं की सूची में नहीं — राज्य केवल "स्थानीय आपदा" प्रावधान से धन ख़र्च कर सकते हैं।
हीट एक्शन प्लान (HAP): अहमदाबाद (2013) — दक्षिण एशिया का पहला; अब NDMA के दिशानिर्देशों के तहत अनेक राज्यों और शहरों में; घटक — पूर्व चेतावनी (रंग-कोड अलर्ट), जन-जागरूकता, अस्पतालों की तैयारी, पेयजल-छाया, कार्य-समय में बदलाव, "कूल रूफ़" (सफ़ेद छतें)।
प्रभावशीलता: अहमदाबाद में HAP के बाद अतिरिक्त मृत्यु में कमी के प्रमाण; पर अधिकांश योजनाएँ — (1) स्थानीय संवेदनशीलता का मानचित्रण नहीं; (2) वित्त की कमी; (3) अनौपचारिक श्रमिकों के लिए क़ानूनी सुरक्षा (कार्य-विराम, पानी) का अभाव; (4) शहरी नियोजन से जुड़ाव कम; (5) निगरानी और मूल्यांकन कमज़ोर।
आगे की राह: लू को अधिसूचित आपदा बनाने पर विचार, "ऊष्मा-सूचकांक" (तापमान + आर्द्रता) आधारित चेतावनी, श्रमिकों के लिए कार्य-घंटे के नियम, हरित आवरण और जल निकायों से शहरी ऊष्मा द्वीप में कमी, ठंडी छतें, स्वास्थ्य निगरानी, ग्रामीण क्षेत्रों तक HAP।
निष्कर्ष: लू जलवायु परिवर्तन का सबसे प्रत्यक्ष "स्वास्थ्य संकट" है — इसे "मौसम" नहीं, "आपदा" मानकर नीति बनानी होगी।
भारत में भूस्खलन जोखिम प्रबंधन की चुनौतियों और उपायों की चर्चा कीजिए। (150 शब्द)
मॉडल उत्तर
संवेदनशीलता: GSI के अनुसार देश का लगभग 12-13% भूभाग भूस्खलन-प्रवण — हिमालय, पश्चिमी घाट, नीलगिरि, पूर्वोत्तर; ISRO का भूस्खलन एटलस (2023)। वायनाड (2024), मालिन (2014), केदारनाथ (2013) जैसी घटनाएँ।
कारण: प्राकृतिक — युवा पहाड़, भूकंप, अत्यधिक वर्षा, कमज़ोर चट्टानें; मानवीय — सड़क कटाई, उत्खनन, वनों की कटाई, अनियंत्रित निर्माण, जल निकासी अवरोध, ढलानों पर खेती का बदलता स्वरूप।
चुनौतियाँ: (1) स्थानीय स्तर के जोखिम मानचित्रों की कमी; (2) पूर्व चेतावनी कठिन — वर्षा-सीमा मॉडल अभी विकसित हो रहे; (3) भवन और ढलान नियमों का कमज़ोर प्रवर्तन; (4) बस्तियों का जोखिम क्षेत्रों में होना; (5) पुनर्वास की सामाजिक कठिनाई।
उपाय: (1) राष्ट्रीय भूस्खलन जोखिम प्रबंधन रणनीति (NDMA, 2019); (2) GSI और राज्यों की क्षेत्रीय भूस्खलन पूर्वानुमान प्रणालियाँ; (3) सूक्ष्म-स्तरीय जोखिम मानचित्रण और ज़ोनिंग; (4) ढलान स्थिरीकरण — रिटेनिंग वॉल, जल निकासी, बायो-इंजीनियरिंग (घास, बाँस); (5) सड़क निर्माण में वैज्ञानिक कटाई और मलबा प्रबंधन; (6) सामुदायिक निगरानी — दरारें, झरनों का बदलाव; (7) जोखिम क्षेत्रों से नियोजित पुनर्वास।
आपदा प्रबंधन (संशोधन) अधिनियम 2025 के प्रमुख प्रावधानों की चर्चा कीजिए। (150 शब्द)
मॉडल उत्तर
पृष्ठभूमि: 2005 का अधिनियम लगभग दो दशकों के अनुभव (कोविड-19 में इसका व्यापक प्रयोग, शहरी आपदाएँ, जलवायु जोखिम) के बाद अद्यतन की आवश्यकता में था।
प्रमुख प्रावधान: (1) योजना निर्माण — राष्ट्रीय और राज्य आपदा प्रबंधन योजनाएँ अब सीधे NDMA और SDMA तैयार करेंगे (पहले कार्यकारी समितियाँ); (2) आपदा डेटाबेस — राष्ट्रीय और राज्य स्तर पर आपदा जोखिम, हानि, निधि आवंटन, तैयारी योजनाओं का डेटाबेस; (3) शहरी आपदा प्रबंधन प्राधिकरण — राज्यों की राजधानियों और नगर निगम वाले बड़े शहरों के लिए (नगर आयुक्त की अध्यक्षता में); (4) राज्य आपदा मोचन बल को वैधानिक आधार; (5) NDMA को आपदाओं के आकलन और न्यूनतम राहत मानकों पर अधिक भूमिका; (6) राष्ट्रीय संकट प्रबंधन समिति और उच्च-स्तरीय समिति को वैधानिक दर्जा।
महत्व: शहरी जोखिमों पर ध्यान, डेटा-आधारित निर्णय, संस्थागत स्पष्टता।
आलोचना: केंद्रीकरण की आशंका (राज्य सूची के विषयों पर), स्थानीय निकायों और पंचायतों की भूमिका अपेक्षाकृत कम, शहरी प्राधिकरणों के लिए वित्त की स्पष्टता का अभाव।
आपदा जोखिम के वित्तपोषण में बीमा और "पैरामीट्रिक बीमा" की भूमिका की चर्चा कीजिए। (150 शब्द)
मॉडल उत्तर
समस्या: भारत में आपदा से होने वाली आर्थिक हानि का बहुत छोटा हिस्सा ही बीमित है ("सुरक्षा अंतराल" — protection gap); अधिकांश बोझ सरकार (राहत निधि) और परिवारों पर, जिससे गरीब परिवार ऋण-जाल और गरीबी में धकेले जाते हैं।
पारंपरिक बीमा: वास्तविक हानि के आकलन के बाद भुगतान — समय लेने वाला, विवादास्पद, छोटे किसानों-परिवारों के लिए जटिल। उदाहरण — PMFBY (फ़सल बीमा)।
पैरामीट्रिक बीमा: भुगतान वास्तविक हानि के बजाय किसी पूर्व-निर्धारित मापनीय सूचकांक (वर्षा की मात्रा, हवा की गति, तापमान, भूकंप की तीव्रता) के एक सीमा पार करने पर स्वतः। लाभ — तीव्र भुगतान (कुछ दिनों में), कम प्रशासनिक लागत, पारदर्शिता। उदाहरण — नागालैंड का वर्षा-आधारित पैरामीट्रिक आपदा बीमा, गुजरात-राजस्थान में महिलाओं के लिए लू-आधारित पैरामीट्रिक बीमा पायलट (SEWA)।
सीमाएँ: "आधार जोखिम" (basis risk) — सूचकांक और वास्तविक हानि में अंतर; मौसम केंद्रों का घना नेटवर्क आवश्यक; जागरूकता।
आगे: राज्य स्तर पर पैरामीट्रिक कवर, जोखिम पूल, आपदा बॉन्ड, पुनर्बीमा (GIC Re), सामाजिक सुरक्षा से जुड़ाव।
निष्कर्ष: जोखिम वित्तपोषण "राहत" को "लचीलेपन" में बदलता है।
भारत में भूकंप जोखिम न्यूनीकरण के लिए किन संरचनात्मक और गैर-संरचनात्मक उपायों की आवश्यकता है? (150 शब्द)
मॉडल उत्तर
पृष्ठभूमि: भारत का बड़ा भूभाग मध्यम से अत्यधिक भूकंपीय जोखिम वाले क्षेत्रों में है — हिमालय, पूर्वोत्तर, कच्छ, अंडमान-निकोबार; बड़े शहरों में घनी, अनियोजित बस्तियाँ जोखिम बढ़ाती हैं। "भूकंप नहीं, कमज़ोर इमारतें जान लेती हैं।"
संरचनात्मक उपाय: (1) BIS भूकंपीय संहिताओं (IS 1893, 4326, 13920) का अनिवार्य पालन और भवन उप-नियमों में समावेश; (2) विद्यालय, अस्पताल, पुल, बाँध जैसी महत्वपूर्ण संरचनाओं का पुनर्संरचन (retrofitting); (3) भूकंप-रोधी तकनीकें — बेस आइसोलेशन, डैम्पर, रिंग बीम; पारंपरिक तकनीकें (कश्मीर की "ढज्जी दीवारी", हिमाचल की "काठ-कुणी"); (4) सूक्ष्म-भूकंपीय क्षेत्रीकरण (microzonation) के आधार पर निर्माण।
गैर-संरचनात्मक उपाय: (1) राजमिस्त्रियों और इंजीनियरों का प्रशिक्षण; (2) भवन अनुमति और निरीक्षण का प्रवर्तन; (3) विद्यालयों में मॉक ड्रिल, जन-जागरूकता; (4) पूर्व चेतावनी प्रणाली के प्रयोग (IIT रुड़की का उत्तराखंड पायलट); (5) आपातकालीन प्रतिक्रिया — NDRF, अस्पतालों की तैयारी; (6) बीमा; (7) भुज (2001) के बाद का गुजरात मॉडल — गुजरात राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण, मालिक-संचालित पुनर्निर्माण।
निष्कर्ष: भूकंप को रोका नहीं जा सकता, पर उससे होने वाली मौतों को "संहिता के पालन" से बड़े पैमाने पर रोका जा सकता है।
11. Quick Revision Summary
- राहत-केंद्रित → समग्र जोखिम प्रबंधन; DM अधिनियम 2005, संशोधन 2025 (शहरी प्राधिकरण, डेटाबेस)।
- सेंडाई: 4 प्राथमिकताएँ, 7 लक्ष्य; भारत — मृत्यु में कमी, CDRI, पूर्व चेतावनी; आर्थिक हानि की चुनौती।
- संवेदनशील क्षेत्रों में विकास: जोखिम-सूचित योजना, वहन क्षमता, ESA, लचीली अवसंरचना।
- समुदाय: प्रथम प्रतिक्रियादाता — ओडिशा, केरल 2018, आपदा मित्र।
- शहरी बाढ़: अतिक्रमण, अभेद्य सतह; स्पंज सिटी, चेतावनी प्रणालियाँ।
- नए ख़तरे: लू (मौन आपदा), भूस्खलन; पैरामीट्रिक बीमा।