UPSC Mains · General Studies Paper III · अध्याय 9

आंतरिक सुरक्षा: उग्रवाद, विकास एवं बाहरी तत्व

Internal Security: Extremism, Development and External Actors

विकास और उग्रवाद का संबंध, वामपंथी उग्रवाद, पूर्वोत्तर और जम्मू-कश्मीर; राज्य और गैर-राज्य बाहरी तत्वों की भूमिका।

GS-3 26 मिनट

1. अध्याय एक नज़र में

पाठ्यक्रम: "विकास और फैलते उग्रवाद के बीच संबंध" तथा "आंतरिक सुरक्षा के लिए चुनौती उत्पन्न करने वाले शासन विरोधी तत्वों की भूमिका" और "आंतरिक सुरक्षा को चुनौती देने में बाह्य राज्य और गैर-राज्य कारकों की भूमिका।" भारत की आंतरिक सुरक्षा के चार प्रमुख मोर्चे हैं — जम्मू-कश्मीर, वामपंथी उग्रवाद (LWE), पूर्वोत्तर का उग्रवाद और शहरी/सीमापार आतंकवाद।

वर्षप्रश्न
2026जम्मू-कश्मीर में अलगाववाद — अनुच्छेद 370/35A के निरसन से पहले और बाद; लद्दाख — सीमा क्षेत्र विकास, सेना की नागरिक कार्रवाई और छठी अनुसूची की माँग
2025भारत में आतंकवाद और प्रतिरोधी उपाय; 2026 तक वामपंथी उग्रवाद का उन्मूलन; पूर्वोत्तर की आंतरिक सुरक्षा — पिछले दशक के शांति समझौते
2024नार्को-आतंकवाद
आंतरिक सुरक्षा के उत्तरों का सूत्र

हर उत्तर में तीन स्तंभ: सुरक्षा (security), विकास (development), शासन-अधिकार (governance and rights)। केवल "बल प्रयोग" या केवल "विकास" — दोनों अधूरे उत्तर हैं। संवेदनशील विषयों पर तटस्थ, संवैधानिक भाषा रखें।

2. विकास और उग्रवाद का संबंध

  • विकास की कमी से उग्रवाद: गरीबी, भूमि-अलगाव, विस्थापन, वन अधिकारों का हनन, शासन की अनुपस्थिति, भ्रष्टाचार, सामाजिक अन्याय — असंतोष का आधार जिसे उग्रवादी विचारधाराएँ भुनाती हैं (योजना आयोग की विशेषज्ञ समिति, 2008 — "विकास की चुनौतियाँ उग्रवाद प्रभावित क्षेत्रों में")।
  • विकास से भी उग्रवाद: असंवेदनशील विकास — खनन, बाँध और बड़ी परियोजनाओं से विस्थापन बिना पर्याप्त पुनर्वास और लाभ-साझेदारी।
  • उग्रवाद विकास को रोकता है: सड़क, विद्यालय, मोबाइल टावरों को नष्ट करना, ठेकेदारों से वसूली — "दुष्चक्र"।
  • समाधान: सुरक्षा के साथ समावेशी विकास और अधिकार — FRA 2006, PESA 1996, आकांक्षी ज़िले, सड़क-संपर्क, वित्तीय समावेशन, कौशल।
विकास/शासन की कमी असंतोष, अलगाव उग्रवाद, हिंसा विकास परियोजनाओं का विनाश सुरक्षा (SAMADHAN) समावेशी विकास अधिकार और शासन
उग्रवाद का दुष्चक्र सुरक्षा, विकास और अधिकार-आधारित शासन — तीनों के साथ-साथ प्रयोग से ही टूटता है।

3. जम्मू-कश्मीर

  • पृष्ठभूमि: अनुच्छेद 370 (अस्थायी प्रावधान) — राज्य का अपना संविधान, अधिकांश केंद्रीय क़ानूनों के लिए राज्य की सहमति; अनुच्छेद 35A (1954 के राष्ट्रपति आदेश से) — "स्थायी निवासियों" को संपत्ति, सरकारी नौकरी, छात्रवृत्ति में विशेष अधिकार।
  • उग्रवाद: 1989-90 से पाकिस्तान-समर्थित सशस्त्र अलगाववाद; कश्मीरी पंडितों का पलायन (1990); अलगाववादी राजनीति (हुर्रियत), पत्थरबाज़ी, विदेशी आतंकवादी।
  • 5 अगस्त 2019: अनुच्छेद 370 निष्प्रभावी, 35A समाप्त; दो केंद्रशासित प्रदेश; सर्वोच्च न्यायालय (दिसंबर 2023) ने वैध माना।
  • बाद की स्थिति: पत्थरबाज़ी और हड़तालों का लगभग अंत, स्थानीय भर्ती में कमी, अलगाववादी संगठनों पर प्रतिबंध (UAPA), पर्यटन में रिकॉर्ड वृद्धि, 2024 विधानसभा चुनाव में ऊँचा मतदान; पर — लक्षित हत्याएँ (2021-22), आतंक का जम्मू क्षेत्र (पुंछ-राजौरी, रियासी, कठुआ) की ओर खिसकना, पहलगाम हमला (अप्रैल 2025) और ऑपरेशन सिंदूर (मई 2025), राज्य का दर्जा बहाल करने की माँग।
पारंपरिक और गैर-पारंपरिक सुरक्षा
आतंकवाद, उग्रवाद, साइबर ख़तरे और सीमापार चुनौतियाँ — भारत की सुरक्षा के पारंपरिक और नए आयाम।

4. वामपंथी उग्रवाद (LWE)

  • इतिहास: नक्सलबाड़ी (1967) → आंध्र प्रदेश का पीपुल्स वॉर ग्रुप और बिहार का MCC → CPI (माओवादी) (2004) — "लाल गलियारा"; 2010 के आसपास चरम (दंतेवाड़ा हमला)।
  • रणनीति: राष्ट्रीय नीति और कार्य योजना (2015); SAMADHAN (2017) — स्मार्ट नेतृत्व, आक्रामक रणनीति, प्रेरणा-प्रशिक्षण, कार्रवाई योग्य ख़ुफ़िया, डैशबोर्ड-आधारित KPI, तकनीक, कार्य योजना, वित्त पोषण पर रोक; केंद्रीय बलों के अग्रिम शिविर ("सुरक्षा शून्य" क्षेत्रों में); विकास — LWE क्षेत्रों के लिए सड़क संपर्क परियोजना, मोबाइल टावर, एकलव्य विद्यालय, कौशल केंद्र, विशेष केंद्रीय सहायता।
  • परिणाम: हिंसक घटनाओं, मौतों और प्रभावित ज़िलों की संख्या में 2010 के बाद उल्लेखनीय कमी; 2025 में शीर्ष नेतृत्व पर बड़ी कार्रवाई (महासचिव का मारा जाना) और कई वरिष्ठ नेताओं का आत्मसमर्पण; सरकार ने मार्च 2026 तक LWE के उन्मूलन का लक्ष्य रखा।

5. पूर्वोत्तर

  • कारण: जातीय पहचान, भौगोलिक अलगाव, अवैध प्रवासन, संसाधनों पर संघर्ष, म्यांमार से खुली सीमा (मुक्त आवागमन व्यवस्था), हथियार-मादक पदार्थ तस्करी।
  • पिछले दशक के समझौते: NSCN-IM के साथ रूपरेखा समझौता (2015, अंतिम समाधान लंबित), ब्रू-रियांग पुनर्वास (2020), बोडो समझौता (2020 — बोडोलैंड प्रादेशिक क्षेत्र), कार्बी आंगलोंग (2021), असम के आदिवासी समूह (2022), DNLA (2023), UNLF — मणिपुर घाटी का पहला समूह (2023), ULFA का वार्ता-समर्थक गुट (दिसंबर 2023), त्रिपुरा के NLFT और ATTF (2024); असम-मेघालय (2022) और असम-अरुणाचल (2023) सीमा समझौते।
  • परिणाम: उग्रवादी घटनाओं में बड़ी कमी, हज़ारों कैडरों का आत्मसमर्पण, AFSPA के क्षेत्र में चरणबद्ध कमी; पर मणिपुर में मई 2023 से जातीय हिंसा और फ़रवरी 2025 में राष्ट्रपति शासन — चुनौती बनी हुई।

6. आतंकवाद और नार्को-आतंकवाद

  • क़ानूनी-संस्थागत ढाँचा: UAPA 1967 (2019 संशोधन — व्यक्तियों को "आतंकवादी" घोषित करना), भारतीय न्याय संहिता 2023 (धारा 113 — आतंकवादी कृत्य), NIA (2008, 2019 संशोधन — विदेशों में भारतीयों के विरुद्ध अपराध भी), NATGRID, बहु-एजेंसी केंद्र (MAC), NSG, 26/11 के बाद तटीय सुरक्षा।
  • नार्को-आतंकवाद: मादक पदार्थों की तस्करी से आतंक का वित्तपोषण — "स्वर्ण अर्धचंद्र" (अफ़ग़ानिस्तान-पाकिस्तान-ईरान) और "स्वर्ण त्रिभुज" (म्यांमार-लाओस-थाईलैंड) के बीच भारत; पंजाब में पाकिस्तान से ड्रोन द्वारा हेरोइन-हथियार; गुजरात तट पर बड़ी ज़ब्तियाँ (मुंद्रा, 2021); पूर्वोत्तर में म्यांमार से मेथामफ़ेटामीन; NDPS अधिनियम 1985, NCB, NCORD, "नशा मुक्त भारत अभियान" (2020), MANAS हेल्पलाइन।

7. विस्तृत विवेचन: कट्टरपंथ (Radicalisation) और उसका प्रतिरोध

आंतरिक सुरक्षा के पारंपरिक विमर्श में ध्यान मुख्यतः हथियारबंद समूहों और उनके विरुद्ध सुरक्षा-अभियानों पर रहता है। पर किसी भी उग्रवाद की जड़ उस प्रक्रिया में है जिससे एक सामान्य व्यक्ति हिंसक विचारधारा को स्वीकार करता है। इसी प्रक्रिया को "कट्टरपंथीकरण" कहते हैं। आधुनिक सुरक्षा-नीति "कट्टरपंथ का प्रतिरोध" (counter-radicalisation) और "कट्टरपंथ से वापसी" (de-radicalisation) को उतना ही महत्व देती है जितना सशस्त्र प्रतिरोध को।

कट्टरपंथीकरण के चालकव्याख्या
"धक्का" देने वाले कारक (push factors)बेरोज़गारी, सामाजिक बहिष्कार, भेदभाव की अनुभूति, राज्य द्वारा अन्याय (वास्तविक या कथित), पहचान का संकट
"खींचने" वाले कारक (pull factors)समूह से जुड़ाव और "भाईचारे" का भाव, वैचारिक "उद्देश्य", आर्थिक प्रलोभन, वीरता और प्रतिशोध की कथाएँ
सक्षम करने वाले कारक (enablers)ऑनलाइन प्रचार, एन्क्रिप्टेड मंच, भर्तीकर्ता, हथियारों और धन तक पहुँच
ऑनलाइन कट्टरपंथ: नई चुनौती
  • सोशल मीडिया और एन्क्रिप्टेड संदेश-मंचों पर "स्व-कट्टरपंथीकरण" (self-radicalisation), जिसमें कोई प्रत्यक्ष भर्तीकर्ता नहीं होता — "lone wolf" हमलों का ख़तरा।
  • एल्गोरिद्म द्वारा उग्र सामग्री का प्रवर्धन; गेमिंग मंचों और छोटे समूहों का उपयोग।
  • सीमा-पार से प्रचार और भर्ती; विदेशी आतंकवादी लड़ाकों (foreign terrorist fighters) की घटना।
  • उत्तर: IT अधिनियम की धारा 69A के तहत अवरोधन, प्लेटफ़ॉर्मों से सहयोग, साइबर-गश्त, और सबसे महत्वपूर्ण, "प्रति-आख्यान" (counter-narratives) — विश्वसनीय धार्मिक-सामाजिक नेताओं, पूर्व-उग्रवादियों और युवाओं की अपनी आवाज़ में।

भारत के अनुभव और मॉडल

  • समर्पण और पुनर्वास नीतियाँ: वामपंथी उग्रवाद और पूर्वोत्तर के लिए आत्मसमर्पण-सह-पुनर्वास योजनाएँ — आर्थिक सहायता, कौशल प्रशिक्षण, आवास। सफलता इनके ईमानदार क्रियान्वयन और समाज में स्वीकार्यता पर निर्भर।
  • राज्य-स्तरीय डी-रेडिकलाइज़ेशन कार्यक्रम: कुछ राज्यों की पुलिस ने परिवार, मनोवैज्ञानिकों और धार्मिक विद्वानों की मदद से परामर्श-आधारित कार्यक्रम चलाए (जैसे महाराष्ट्र और केरल में प्रयोग)।
  • जम्मू-कश्मीर में "सदभावना" जैसे सैन्य-नागरिक कार्यक्रम और युवाओं के लिए खेल, शिक्षा, रोज़गार की पहलें।
  • सामुदायिक पुलिसिंग: पुलिस और समुदाय के बीच विश्वास — "मोहल्ला समितियाँ" (जैसे 1992-93 के बाद मुंबई के अनुभव)।
संतुलन का प्रश्न: सुरक्षा बनाम स्वतंत्रता

कट्टरपंथ के विरुद्ध कार्रवाई में यह ख़तरा रहता है कि किसी पूरे समुदाय को संदेह की दृष्टि से देखा जाए, या UAPA जैसे कठोर क़ानूनों का व्यापक प्रयोग असहमति को दबाए। ऐसी कार्रवाई स्वयं "धक्का कारक" बनकर उल्टा परिणाम दे सकती है। इसलिए प्रभावी नीति के तीन सिद्धांत हैं: (1) लक्षित, साक्ष्य-आधारित कार्रवाई; (2) क़ानून का निष्पक्ष और समयबद्ध प्रयोग (UAPA मामलों में कम दोषसिद्धि दर और लंबी विचाराधीन हिरासत पर चिंता को ध्यान में रखते हुए); (3) समुदायों को समस्या नहीं, समाधान का भागीदार बनाना।

P1अभ्यास प्रश्न · UPSC पैटर्न · 15 अंक

"कट्टरपंथ का मुकाबला केवल सुरक्षा बलों से नहीं, समाज के सहयोग से ही संभव है।" भारत के संदर्भ में एक बहुआयामी रणनीति सुझाइए। (250 शब्द)

मॉडल उत्तर

भूमिका: कट्टरपंथीकरण वह प्रक्रिया है जिसमें व्यक्ति हिंसक विचारधारा को अपनाता है। सुरक्षा बल हिंसा को रोक सकते हैं, पर विचार और उसके सामाजिक कारणों से लड़ने के लिए समाज, परिवार, शिक्षा और शासन की भागीदारी आवश्यक है।

बहुआयामी रणनीति:

  • रोकथाम (Prevention): रोज़गार, कौशल और शिक्षा के अवसर; सामाजिक-आर्थिक भेदभाव का निवारण; विद्यालयों में आलोचनात्मक चिंतन, डिजिटल साक्षरता और नागरिक मूल्यों की शिक्षा।
  • प्रति-आख्यान (Counter-narrative): विश्वसनीय धार्मिक-सामाजिक नेताओं, खिलाड़ियों, कलाकारों और पूर्व-उग्रवादियों के माध्यम से वैकल्पिक कथा; स्थानीय भाषाओं में ऑनलाइन सामग्री।
  • प्रारंभिक हस्तक्षेप: परिवार, शिक्षकों और सामुदायिक नेताओं को चेतावनी-संकेत पहचानने का प्रशिक्षण; पुलिस के साथ गोपनीय परामर्श-मंच; हेल्पलाइन।
  • डी-रेडिकलाइज़ेशन और पुनर्वास: मनोवैज्ञानिक परामर्श, जेलों में कट्टरपंथ पर नियंत्रण, पुनर्वास और सामाजिक पुनः-एकीकरण।
  • ऑनलाइन क्षेत्र: प्लेटफ़ॉर्मों से सहयोग, उग्र सामग्री का त्वरित हटाना, साइबर-गश्त, अंतरराष्ट्रीय सहयोग।
  • क़ानूनी-सुरक्षा उपाय: आतंक-वित्तपोषण पर नियंत्रण (NIA, ED, FIU), ख़ुफ़िया-समन्वय (MAC), पर कठोर क़ानूनों का लक्षित और निष्पक्ष प्रयोग।
  • सामुदायिक पुलिसिंग: मोहल्ला समितियाँ, युवा क्लब, खेल-आयोजन; पुलिस में विविधता।

सावधानियाँ: किसी समुदाय का कलंकीकरण न हो; मानवाधिकारों का सम्मान; कार्यक्रमों का स्वतंत्र मूल्यांकन।

निष्कर्ष: कट्टरपंथ के विरुद्ध युद्ध अंततः "दिलो-दिमाग़" का युद्ध है; समावेशी विकास, न्याय और विश्वास ही इसकी सबसे मज़बूत ढाल हैं।

P2अभ्यास प्रश्न · UPSC पैटर्न · 15 अंक

सशस्त्र बल (विशेष शक्तियाँ) अधिनियम (AFSPA) पर बहस के दोनों पक्षों की विवेचना कीजिए। इसके क्रमिक हटाए जाने की प्रवृत्ति का क्या अर्थ है? (250 शब्द)

मॉडल उत्तर

भूमिका: AFSPA, 1958 "अशांत क्षेत्र" घोषित इलाक़ों में सशस्त्र बलों को तलाशी, गिरफ़्तारी और आवश्यक होने पर बल-प्रयोग की विशेष शक्तियाँ देता है, और केंद्र की पूर्व-अनुमति के बिना उन पर अभियोजन नहीं हो सकता।

पक्ष में तर्क:

  • उग्रवाद-ग्रस्त क्षेत्रों में सेना को क़ानूनी संरक्षण और कार्य-स्वतंत्रता, जिसके बिना वह प्रभावी अभियान नहीं चला सकती।
  • सीमा-पार से समर्थित उग्रवाद और कठिन भू-भाग में पुलिस अपर्याप्त।
  • सेना का अपना आंतरिक न्याय-तंत्र और मानवाधिकार प्रकोष्ठ।

विपक्ष में तर्क:

  • मानवाधिकार उल्लंघन के आरोप और अभियोजन-अनुमति की कठिनाई से "दंड-मुक्ति" (impunity) की भावना।
  • लंबे समय तक लागू रहने से स्थानीय जनता में अलगाव, जो स्वयं उग्रवाद को बढ़ावा देता है।
  • जीवन रेड्डी समिति (2005) ने इसे निरस्त कर आवश्यक प्रावधानों को UAPA में शामिल करने की सिफ़ारिश की थी; द्वितीय ARC ने भी इसी दिशा में सुझाव दिया।
  • एक्स्ट्रा-ज्यूडिशियल एक्ज़िक्यूशन विक्टिम फ़ैमिलीज़ एसोसिएशन (2016) में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि AFSPA क्षेत्रों में भी अत्यधिक बल-प्रयोग की जाँच हो सकती है।

क्रमिक हटाए जाने की प्रवृत्ति: त्रिपुरा (2015), मेघालय (2018) से पूरी तरह हटाया गया; 2022 के बाद असम, नागालैंड और मणिपुर के अनेक क्षेत्रों से "अशांत क्षेत्र" की अधिसूचना वापस ली गई। यह सुरक्षा-स्थिति में सुधार, शांति-समझौतों और राज्य पुलिस की बढ़ी क्षमता का संकेत है; हालाँकि मणिपुर (2023 के बाद) जैसी परिस्थितियाँ दिखाती हैं कि स्थिति गतिशील है।

निष्कर्ष: AFSPA एक "असाधारण" उपाय है जिसे स्थायी नहीं बनना चाहिए; समय-समय पर समीक्षा, जवाबदेही के पारदर्शी तंत्र और स्थानीय पुलिस-क्षमता के विकास से ही "सुरक्षा और अधिकार" का संतुलन संभव है।

P3अभ्यास प्रश्न · UPSC पैटर्न · 10 अंक

वामपंथी उग्रवाद से प्रभावित क्षेत्रों में "सुरक्षा और विकास" की दोहरी रणनीति के प्रमुख तत्वों की चर्चा कीजिए। (150 शब्द)

मॉडल उत्तर

पृष्ठभूमि: गृह मंत्रालय के अनुसार पिछले एक दशक में वामपंथी उग्रवाद से प्रभावित ज़िलों की संख्या और हिंसक घटनाओं में भारी कमी आई है। इसका श्रेय 2015 की "राष्ट्रीय नीति और कार्य योजना" और "SAMADHAN" रणनीति को दिया जाता है।

सुरक्षा के तत्व:

  • केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों की तैनाती और राज्य पुलिस का आधुनिकीकरण; विशेष बल (जैसे छत्तीसगढ़ में DRG, आंध्र प्रदेश के ग्रेहाउंड्स मॉडल)।
  • ख़ुफ़िया-तंत्र, ड्रोन और तकनीकी निगरानी; "सुदृढ़ पुलिस स्टेशन"।
  • आतंक-वित्तपोषण पर प्रहार (लेवी-वसूली के नेटवर्क)।
  • आत्मसमर्पण-सह-पुनर्वास नीति।

विकास के तत्व:

  • सड़क और मोबाइल-टावर संपर्क (सड़क आवश्यकता योजना, मोबाइल टावर परियोजनाएँ)।
  • एकलव्य मॉडल आवासीय विद्यालय, कौशल-विकास केंद्र, बैंक शाखाएँ और डाकघर।
  • वन अधिकार अधिनियम और PESA का प्रभावी क्रियान्वयन, लघु वन उपज पर MSP।
  • आकांक्षी ज़िला कार्यक्रम के माध्यम से स्वास्थ्य, शिक्षा और पोषण पर ध्यान।

निष्कर्ष: सुरक्षा "स्थान" बनाती है, विकास उस स्थान को "विश्वास" से भरता है; स्थायी शांति के लिए जनजातीय समुदायों के अधिकार, भागीदारी और गरिमा केंद्र में होने चाहिए।

8. Master Summary Table

मोर्चामूल कारणप्रतिक्रियास्थिति
जम्मू-कश्मीरसीमापार प्रायोजित आतंकवाद, अलगाववाद370 निरसन, UAPA, आतंक-वित्त पर रोकहिंसा कम, पर जम्मू क्षेत्र में नई चुनौती
LWEवंचना, भूमि-वन अधिकारSAMADHAN + विकासभौगोलिक दायरा बहुत सिमटा; मार्च 2026 लक्ष्य
पूर्वोत्तरजातीय पहचान, सीमाशांति समझौते, AFSPA में कमीबड़ी कमी; मणिपुर अपवाद
नार्को-आतंकभौगोलिक स्थितिNDPS, NCB, ड्रोन-रोधीसिंथेटिक ड्रग्स की नई चुनौती
लद्दाखसंवैधानिक सुरक्षा उपायों की माँगवाइब्रेंट विलेज, सद्भावना, संवादछठी अनुसूची/राज्य की माँग जारी

9. Mind Map

आंतरिक सुरक्षा
J&K
  • 370, 35A
  • सीमापार आतंक
LWE
  • SAMADHAN
  • विकास-अधिकार
पूर्वोत्तर
  • शांति समझौते
  • मणिपुर
आतंकवाद
  • UAPA, NIA
  • नार्को-आतंक
सीमांत क्षेत्र
  • लद्दाख
  • वाइब्रेंट विलेज

10. महत्वपूर्ण One-liners

  • नक्सलबाड़ी विद्रोह: 1967; CPI (माओवादी) का गठन: 2004।
  • SAMADHAN रणनीति: 2017।
  • अनुच्छेद 35A: 1954 का राष्ट्रपति आदेश।
  • अनुच्छेद 370 का निरसन: 5 अगस्त 2019; सर्वोच्च न्यायालय: 11 दिसंबर 2023।
  • NIA: 2008; UAPA: 1967 (2019 संशोधन)।
  • बोडो समझौता: जनवरी 2020; ULFA (वार्ता-समर्थक) समझौता: दिसंबर 2023।
  • सीमा क्षेत्र विकास कार्यक्रम (BADP): 1986-87; वाइब्रेंट विलेज कार्यक्रम: 2023।
  • NDPS अधिनियम: 1985।
  • लद्दाख की स्वायत्त पहाड़ी विकास परिषद (लेह): 1995।

11. टिप्स एवं ट्रिक्स

उत्तर लेखन
  • "पहले और बाद" वाले प्रश्नों (370) में तालिका बनाएँ — सुरक्षा, राजनीति, अर्थव्यवस्था, समाज के आयाम।
  • दूसरे ARC (8वीं रिपोर्ट — आतंकवाद से लड़ाई) और पद्मनाभैया समिति (पुलिस सुधार) का उल्लेख उपयोगी।
  • मानवाधिकार, स्थानीय भागीदारी और "दिल और दिमाग जीतना" — हर उत्तर में एक पंक्ति अवश्य।
याद रखने की तरकीब

LWE रणनीति का सूत्र: "सुरक्षा + विकास + अधिकार + संवाद = समाधान"।

12. PYQ-आधारित प्रश्न एवं मॉडल उत्तर

Q1UPSC 2026 · GS-3 · Q19 · 15 अंक

अनुच्छेद 370 और 35A के निरसन से पहले और बाद जम्मू-कश्मीर में अलगाववाद की प्रकृति का विश्लेषण कीजिए। (250 शब्द)

मॉडल उत्तर

निरसन से पहले: (1) संवैधानिक अलगाव — अलग संविधान, केंद्रीय क़ानूनों के लिए राज्य की सहमति; 35A से "स्थायी निवासी" और अन्य भारतीयों में अंतर — जिसे अलगाववादी "अलग पहचान" के प्रमाण के रूप में प्रस्तुत करते थे; (2) सशस्त्र उग्रवाद (1989 से) — पाकिस्तान-प्रायोजित संगठन, स्थानीय भर्ती; (3) राजनीतिक अलगाववाद — हुर्रियत, हड़ताल कैलेंडर, चुनाव बहिष्कार; (4) पत्थरबाज़ी और सड़क पर हिंसा (2008, 2010, 2016); (5) आतंक वित्तपोषण, हवाला; (6) "दोहरी" राजनीतिक भाषा और अविश्वास।

निरसन के बाद: (1) संवैधानिक एकीकरण — सभी केंद्रीय क़ानून लागू, अधिवास नियम, आरक्षण, निवेश के लिए भूमि; (2) अलगाववादी ढाँचे पर कार्रवाई — UAPA के तहत संगठनों पर प्रतिबंध, आतंक-वित्त पर NIA की कार्रवाई; (3) हिंसा में कमी — पत्थरबाज़ी और हड़ताल लगभग समाप्त, स्थानीय भर्ती घटी; (4) लोकतांत्रिक भागीदारी — 2024 विधानसभा चुनाव में ऊँचा मतदान, ज़िला विकास परिषदें; (5) पर्यटन और निवेश में वृद्धि।

बदला हुआ स्वरूप और चुनौतियाँ: (1) आतंक का "संकर" (hybrid) रूप — "अदृश्य" आतंकवादी, लक्षित हत्याएँ (प्रवासी श्रमिक, अल्पसंख्यक); (2) जम्मू क्षेत्र (पुंछ-राजौरी, कठुआ, रियासी) में विदेशी आतंकवादियों के हमले; (3) पहलगाम (2025) जैसे बड़े हमले — पाकिस्तान की भूमिका और ऑपरेशन सिंदूर; (4) ऑनलाइन कट्टरपंथ; (5) राजनीतिक अलगाव की भावना, राज्य के दर्जे की माँग, मानवाधिकार संबंधी चिंताएँ।

आगे की राह: सीमापार घुसपैठ पर सख़्ती, ग्राम रक्षा गार्डों का सशक्तीकरण, युवाओं के लिए रोज़गार, राज्य के दर्जे की समयबद्ध बहाली, निर्वाचित सरकार के साथ समन्वय, कश्मीरी पंडितों की वापसी, संवाद।

निष्कर्ष: निरसन ने अलगाववाद के "संवैधानिक और संगठनात्मक आधार" को कमज़ोर किया है; स्थायी शांति के लिए "भावनात्मक एकीकरण" और लोकतांत्रिक सशक्तीकरण आवश्यक है।

Q2UPSC 2025 · GS-3 · Q9 · 10 अंक

भारत में आतंकवाद के विभिन्न रूपों की चर्चा कीजिए। इससे निपटने के लिए उठाए गए उपायों का मूल्यांकन कीजिए। (150 शब्द)

मॉडल उत्तर

रूप: (1) सीमापार प्रायोजित — जम्मू-कश्मीर, मुंबई 26/11 (2008), पुलवामा (2019), पहलगाम (2025); (2) वामपंथी उग्रवाद — मध्य-पूर्वी भारत; (3) जातीय-अलगाववादी — पूर्वोत्तर; (4) धार्मिक कट्टरपंथ और वैश्विक जिहादी नेटवर्क — ISIS से प्रेरित "मॉड्यूल", ऑनलाइन कट्टरपंथ; (5) नार्को-आतंकवाद — पंजाब, सीमा क्षेत्र; (6) साइबर आतंकवाद और खालिस्तानी तत्वों की विदेशों से गतिविधियाँ।

उपाय: (1) क़ानून — UAPA (2019 संशोधन), भारतीय न्याय संहिता 2023 में आतंकवादी कृत्य की परिभाषा, PMLA; (2) संस्थाएँ — NIA, NATGRID, MAC, NSG के क्षेत्रीय केंद्र; (3) तटीय और सीमा सुरक्षा — 26/11 के बाद तटीय पुलिस थाने, स्मार्ट फ़ेंसिंग; (4) आतंक वित्तपोषण पर रोक — FATF मानक, "No Money for Terror"; (5) सैन्य निवारण — सर्जिकल स्ट्राइक (2016), बालाकोट (2019), ऑपरेशन सिंदूर (2025); (6) अंतरराष्ट्रीय सहयोग — UNSC प्रतिबंध सूची, द्विपक्षीय संयुक्त कार्य समूह।

सीमाएँ: राज्य पुलिस की क्षमता, ख़ुफ़िया समन्वय, UAPA में कम दोषसिद्धि दर और लंबी हिरासत पर मानवाधिकार चिंताएँ, ऑनलाइन कट्टरपंथ का नियंत्रण।

निष्कर्ष: "शून्य सहिष्णुता" के साथ पुलिस आधुनिकीकरण, कट्टरपंथ-रोधी (de-radicalisation) कार्यक्रम और त्वरित न्याय ज़रूरी।

Q3UPSC 2025 · GS-3 · Q10 · 15 अंक

सरकार ने मार्च 2026 तक वामपंथी उग्रवाद के उन्मूलन का लक्ष्य रखा है। इस दिशा में प्रगति और शेष चुनौतियों का परीक्षण कीजिए। (250 शब्द)

मॉडल उत्तर

भूमिका: 2006 में प्रधानमंत्री ने नक्सलवाद को "आंतरिक सुरक्षा की सबसे बड़ी चुनौती" कहा था। CPI (माओवादी) का "लाल गलियारा" कभी 10 से अधिक राज्यों में फैला था। सरकार ने 31 मार्च 2026 तक इसके उन्मूलन का लक्ष्य घोषित किया।

प्रगति के कारण: (1) सुरक्षा — SAMADHAN रणनीति (2017), "सुरक्षा शून्य" क्षेत्रों में केंद्रीय बलों के अग्रिम शिविर, संयुक्त अभियान (छत्तीसगढ़ के बस्तर, महाराष्ट्र का गढ़चिरौली), ख़ुफ़िया और ड्रोन तकनीक, 2025 में शीर्ष नेतृत्व पर निर्णायक कार्रवाई; (2) आत्मसमर्पण और पुनर्वास नीतियाँ — वरिष्ठ कैडरों सहित बड़ी संख्या में आत्मसमर्पण; (3) विकास — LWE क्षेत्रों में सड़कें, मोबाइल टावर, बैंक शाखाएँ, डाकघर, एकलव्य विद्यालय, कौशल केंद्र; आकांक्षी ज़िले; (4) अधिकार — वन अधिकार पट्टे, PESA; (5) वित्तपोषण पर रोक — NIA और ED की कार्रवाई; (6) राज्यों की विशेष इकाइयाँ (आंध्र-तेलंगाना का ग्रेहाउंड्स मॉडल)।

परिणाम: हिंसक घटनाओं और मौतों में 2010 के चरम की तुलना में भारी कमी; प्रभावित ज़िलों की संख्या में तेज़ गिरावट — दायरा मुख्यतः छत्तीसगढ़ और उसके सीमावर्ती क्षेत्रों तक सिमटा।

शेष चुनौतियाँ: (1) अबूझमाड़ जैसे दुर्गम वन क्षेत्र, अंतर-राज्यीय सीमाएँ; (2) IED का ख़तरा; (3) स्थानीय समर्थन के मूल कारण — भूमि, विस्थापन, शासन की कमी — यदि अनसुलझे रहे तो पुनरुत्थान का जोखिम; (4) अभियानों में मानवाधिकार और आदिवासियों की गिरफ़्तारियों पर चिंताएँ; (5) आत्मसमर्पित कैडरों का पुनर्वास; (6) "सुरक्षा के बाद विकास" की निरंतरता।

आगे की राह: "समाप्ति के बाद" की योजना — ग्राम सभा-आधारित विकास, PESA-FRA का पूर्ण क्रियान्वयन, खनन लाभ का स्थानीय साझा (DMF), स्थानीय युवाओं की पुलिस में भर्ती, विश्वास-निर्माण।

निष्कर्ष: सशस्त्र उग्रवाद को हराया जा सकता है, पर स्थायी शांति "विश्वास और न्याय" से ही आती है।

Q4UPSC 2025 · GS-3 · Q19 · 15 अंक

पिछले एक दशक में हुए शांति समझौतों ने पूर्वोत्तर की आंतरिक सुरक्षा को किस प्रकार प्रभावित किया है? (250 शब्द)

मॉडल उत्तर

भूमिका: पूर्वोत्तर दशकों तक अनेक जातीय-अलगाववादी उग्रवादी समूहों का क्षेत्र रहा — नगा, असमिया (ULFA), बोडो, मणिपुरी घाटी के समूह, त्रिपुरा के जनजातीय समूह। पिछले दशक में "संवाद-आधारित" दृष्टिकोण ने बड़ा परिवर्तन किया।

प्रमुख समझौते: (1) NSCN-IM के साथ रूपरेखा समझौता (2015) — अंतिम समाधान लंबित (अलग ध्वज-संविधान की माँग); (2) ब्रू-रियांग शरणार्थी समझौता (2020) — त्रिपुरा में पुनर्वास; (3) बोडो समझौता (जनवरी 2020) — बोडोलैंड प्रादेशिक क्षेत्र को अधिक शक्तियाँ, हज़ारों कैडरों का आत्मसमर्पण; (4) कार्बी आंगलोंग (2021); (5) असम के आदिवासी समूह (2022); (6) DNLA — दिमासा (2023); (7) UNLF (नवंबर 2023) — मणिपुर घाटी का पहला समूह; (8) ULFA का वार्ता-समर्थक गुट (दिसंबर 2023); (9) त्रिपुरा के NLFT और ATTF (2024); (10) अंतर-राज्यीय सीमा समझौते — असम-मेघालय (2022), असम-अरुणाचल (2023)।

सुरक्षा पर प्रभाव: (1) उग्रवादी घटनाओं, नागरिकों और सुरक्षाकर्मियों की मौतों में बड़ी कमी; (2) हज़ारों कैडरों का आत्मसमर्पण और हथियार जमा; (3) AFSPA के दायरे में चरणबद्ध कमी (त्रिपुरा 2015, मेघालय 2018, असम-नागालैंड-मणिपुर के बड़े भागों से 2022 से); (4) विकास और निवेश का वातावरण — एक्ट ईस्ट नीति, अवसंरचना।

शेष चुनौतियाँ: (1) मणिपुर — मई 2023 से मैतेई-कुकी जातीय हिंसा, हथियारों की लूट, फ़रवरी 2025 में राष्ट्रपति शासन; (2) नगा समाधान लंबित; (3) ULFA (स्वतंत्र) का म्यांमार में सक्रिय रहना; (4) म्यांमार में गृहयुद्ध — शरणार्थी, हथियार, ड्रग्स; मुक्त आवागमन व्यवस्था पर पुनर्विचार और सीमा बाड़; (5) समझौतों के क्रियान्वयन में देरी — "छोड़े गए" गुटों का नए समूह बनाना; (6) अंतर-जातीय प्रतिस्पर्धा।

निष्कर्ष: शांति समझौतों ने पूर्वोत्तर को "उग्रवाद" से "विकास" की ओर मोड़ा है; स्थायित्व समझौतों के ईमानदार क्रियान्वयन, समावेशी पहचान-राजनीति और म्यांमार सीमा प्रबंधन पर निर्भर है।

Q5UPSC 2026 · GS-3 · Q10 · 15 अंक

लद्दाख के संदर्भ में सीमा क्षेत्र विकास कार्यक्रम, सेना की नागरिक कार्रवाई और छठी अनुसूची की माँग का सुरक्षा के दृष्टिकोण से परीक्षण कीजिए। (250 शब्द)

मॉडल उत्तर

भूमिका: लद्दाख चीन (LAC) और पाकिस्तान (नियंत्रण रेखा, सियाचिन) दोनों से लगा भारत का सबसे संवेदनशील सीमांत क्षेत्र है — गलवान (2020) के बाद इसका महत्व और बढ़ा। 2019 में यह बिना विधानसभा वाला केंद्रशासित प्रदेश बना।

सीमा क्षेत्र विकास: (1) BADP (1986-87 से) — सीमावर्ती गाँवों में सड़क, विद्यालय, स्वास्थ्य, पेयजल; (2) वाइब्रेंट विलेज कार्यक्रम (2023) — उत्तरी सीमा के गाँवों में आजीविका, पर्यटन, संपर्क, ताकि पलायन रुके और गाँव "सीमा के प्रहरी" बनें; (3) सड़क-सुरंगें (BRO), 4G संपर्क, सौर ऊर्जा। सुरक्षा महत्व: आबाद सीमा गाँव ख़ुफ़िया, रसद और संप्रभुता के दावे के लिए आवश्यक — "ख़ाली सीमा" विरोधी के लिए अवसर।

सेना की नागरिक कार्रवाई: ऑपरेशन सद्भावना — विद्यालय, छात्रावास, स्वास्थ्य शिविर, कौशल प्रशिक्षण, महिला सशक्तीकरण; चरवाहों के साथ सहयोग — घुसपैठ की प्रारंभिक सूचना (कारगिल 1999 में चरवाहों की भूमिका); स्थानीय युवाओं की लद्दाख स्काउट्स में भर्ती। महत्व: "दिल और दिमाग" जीतना, सेना-जनता विश्वास।

छठी अनुसूची की माँग: जनसंख्या का बड़ा बहुमत (लगभग 80%) अनुसूचित जनजाति; लेह शीर्ष निकाय और कारगिल लोकतांत्रिक गठबंधन की माँगें — छठी अनुसूची (भूमि, संस्कृति, संसाधनों की सुरक्षा), राज्य का दर्जा, अलग लोक सेवा आयोग, दो लोकसभा सीटें; राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग ने 2019 में छठी अनुसूची की सिफ़ारिश की थी; सरकार के साथ उच्चाधिकार समिति की वार्ता, आरक्षण और अधिवास से जुड़े कुछ उपाय; सितंबर 2025 में लेह में आंदोलन हिंसक हुआ और जनहानि हुई।

सुरक्षा दृष्टि से विश्लेषण: (1) स्थानीय असंतोष संवेदनशील सीमा क्षेत्र में दीर्घकालिक जोखिम — विरोधी के दुष्प्रचार का अवसर; (2) पारिस्थितिक नाज़ुकता और भूमि का बाहरी उपयोग स्थानीय चिंता का मूल; (3) छठी अनुसूची की स्वायत्तता और सीमा पर रक्षा अवसंरचना की आवश्यकता के बीच संतुलन (भूमि अधिग्रहण, परियोजनाएँ); (4) लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व का अभाव (विधानसभा नहीं) — संवाद ही समाधान।

आगे की राह: पहाड़ी विकास परिषदों (LAHDC लेह-कारगिल) का सशक्तीकरण, भूमि-रोज़गार-संस्कृति की संवैधानिक/वैधानिक सुरक्षा, पर्यावरण-संवेदनशील विकास, निरंतर संवाद।

निष्कर्ष: लद्दाख में सबसे मज़बूत सुरक्षा कवच "संतुष्ट और सहभागी नागरिक" हैं — विकास और संवैधानिक संरक्षण सुरक्षा के पूरक हैं।

Q6UPSC 2024 · GS-3 · Q9 · 10 अंक

नार्को-आतंकवाद भारत की आंतरिक सुरक्षा के लिए गंभीर ख़तरा क्यों है? इससे निपटने के उपाय बताइए। (150 शब्द)

मॉडल उत्तर

अर्थ: मादक पदार्थों के उत्पादन-तस्करी से आतंकवादी या उग्रवादी गतिविधियों का वित्तपोषण, और कभी-कभी समाज को कमज़ोर करने के लिए ड्रग्स का जानबूझकर प्रसार।

भारत के लिए गंभीरता: (1) भौगोलिक स्थिति — पश्चिम में "स्वर्ण अर्धचंद्र" और पूर्व में "स्वर्ण त्रिभुज"; (2) पंजाब — पाकिस्तान से ड्रोन द्वारा हेरोइन और हथियार, युवाओं में नशा; (3) समुद्री मार्ग — गुजरात तट (मुंद्रा, 2021) पर बड़ी ज़ब्तियाँ; (4) पूर्वोत्तर — म्यांमार से मेथामफ़ेटामीन, हथियार; (5) जम्मू-कश्मीर — ड्रग्स से आतंक वित्त; (6) हवाला, क्रिप्टो, डार्क-वेब — नए वित्तीय मार्ग; (7) सामाजिक क्षति — स्वास्थ्य, अपराध, उत्पादकता।

उपाय: (1) NDPS अधिनियम 1985, NCB, राज्य ANTF; (2) NCORD — एजेंसियों का समन्वय; (3) ड्रोन-रोधी तकनीक, स्मार्ट सीमा प्रबंधन; (4) तटीय निगरानी, बंदरगाहों पर स्कैनर; (5) वित्तीय जाँच — PMLA, FIU; (6) अंतरराष्ट्रीय सहयोग — UNODC, द्विपक्षीय समझौते; (7) माँग में कमी — नशा मुक्त भारत अभियान (2020), MANAS हेल्पलाइन, पुनर्वास केंद्र; (8) सिंथेटिक ड्रग्स और उनके रासायनिक पूर्व-पदार्थों (precursors) पर नियंत्रण।

निष्कर्ष: नार्को-आतंकवाद "सुरक्षा और स्वास्थ्य" दोनों संकट है — आपूर्ति पर प्रहार के साथ माँग घटाना आवश्यक।

Q7अभ्यास प्रश्न · UPSC पैटर्न · 15 अंक

सशस्त्र बल (विशेष शक्तियाँ) अधिनियम (AFSPA) के औचित्य और आलोचनाओं का परीक्षण कीजिए। इसके दायरे में हाल की कमी का क्या अर्थ है? (250 शब्द)

मॉडल उत्तर

प्रावधान: AFSPA 1958 (और जम्मू-कश्मीर के लिए 1990) के अंतर्गत "अशांत क्षेत्र" घोषित होने पर सशस्त्र बलों को — चेतावनी के बाद बल प्रयोग (मृत्यु तक), बिना वारंट गिरफ़्तारी, तलाशी, और केंद्र की पूर्व अनुमति के बिना अभियोजन से सुरक्षा।

औचित्य: (1) उग्रवाद प्रभावित क्षेत्रों में सेना को नागरिक प्रशासन की सहायता हेतु क़ानूनी सुरक्षा; (2) त्वरित कार्रवाई की आवश्यकता; (3) सैनिकों को दुर्भावनापूर्ण मुक़दमों से बचाना; (4) सर्वोच्च न्यायालय ने नागा पीपुल्स मूवमेंट (1998) में इसे वैध माना, पर दिशानिर्देशों के साथ।

आलोचना: (1) मानवाधिकार उल्लंघन और फ़र्ज़ी मुठभेड़ के आरोप — EEVFAM मामले (2016) में न्यायालय ने कहा कि "अत्यधिक बल" की जाँच होगी, AFSPA पूर्ण उन्मुक्ति नहीं; (2) अभियोजन स्वीकृति शायद ही मिलती है — जवाबदेही का अभाव; (3) दशकों तक लागू रहने से "स्थायी आपातकाल" और अलगाव की भावना; (4) जीवन रेड्डी समिति (2005) ने इसे निरस्त कर प्रावधानों को UAPA में शामिल करने की सिफ़ारिश की; द्वितीय ARC ने भी समर्थन किया; (5) इरोम शर्मिला का लंबा अनशन — विरोध का प्रतीक।

हाल की कमी का अर्थ: त्रिपुरा (2015), मेघालय (2018) से हटाया गया; 2022 से असम, नागालैंड और मणिपुर के बड़े भागों से "अशांत क्षेत्र" घोषणा हटाई गई — यह (1) सुरक्षा स्थिति में सुधार, (2) शांति समझौतों की सफलता, (3) नागरिक प्रशासन और पुलिस पर भरोसे का संकेत है; पर मणिपुर की हिंसा के बाद कुछ क्षेत्रों में पुनः विस्तार भी हुआ — यानी यह गतिशील उपकरण है।

आगे की राह: नियमित समीक्षा और समयबद्ध घोषणा, पारदर्शी जाँच तंत्र, अभियोजन स्वीकृति पर समयबद्ध निर्णय, राज्य पुलिस का सशक्तीकरण ताकि सेना की भूमिका न्यूनतम रहे।

निष्कर्ष: AFSPA "अंतिम उपाय" है — लक्ष्य ऐसी स्थिति बनाना है जहाँ इसकी आवश्यकता ही न रहे।

Q8अभ्यास प्रश्न · UPSC पैटर्न · 10 अंक

ऑनलाइन कट्टरपंथ (online radicalisation) आंतरिक सुरक्षा के लिए नई चुनौती क्यों है? कट्टरपंथ-रोधी उपाय सुझाइए। (150 शब्द)

मॉडल उत्तर

चुनौती: (1) सोशल मीडिया, एन्क्रिप्टेड मैसेजिंग और गेमिंग मंचों पर दुष्प्रचार, भर्ती और प्रशिक्षण; (2) "अकेले भेड़िये" (lone wolf) हमलावर — पहचान कठिन; (3) एल्गोरिद्म द्वारा "इको-चैंबर" — चरम विचारों का सुदृढ़ीकरण; (4) डीपफ़ेक और AI-जनित सामग्री से घृणा फैलाना; (5) सीमापार हैंडलर — भौगोलिक दूरी का अर्थ नहीं; (6) युवा और बेरोज़गार सबसे संवेदनशील; भारत में ISIS से प्रेरित अनेक "मॉड्यूल" ऑनलाइन बने।

कट्टरपंथ-रोधी उपाय: (1) रोकथाम — विद्यालयों-विश्वविद्यालयों में डिजिटल साक्षरता और आलोचनात्मक सोच, समुदाय और धार्मिक नेताओं की भागीदारी, "प्रति-आख्यान" (counter-narrative) अभियान; (2) पहचान और हस्तक्षेप — परिवारों और परामर्शदाताओं के साथ "डी-रेडिकलाइज़ेशन" कार्यक्रम (महाराष्ट्र और केरल पुलिस के प्रयोग); (3) प्लेटफ़ॉर्म जवाबदेही — IT नियम 2021 के अंतर्गत आतंकी सामग्री हटाना, धारा 69A; (4) ख़ुफ़िया और साइबर गश्त; (5) पुनर्वास — आत्मसमर्पण और पुनर्संस्कार; (6) रोज़गार और सामाजिक समावेशन — मूल कारणों पर ध्यान।

सावधानी: अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और निजता का सम्मान; किसी समुदाय को कलंकित न करना।

निष्कर्ष: विचारों की लड़ाई केवल बल से नहीं, बेहतर विचार और विश्वास से जीती जाती है।

13. Quick Revision Summary

एक नज़र में
  • विकास-उग्रवाद: दुष्चक्र; समाधान = सुरक्षा + विकास + अधिकार।
  • J&K: 370/35A निरसन से संवैधानिक-संगठनात्मक अलगाववाद कमज़ोर; संकर आतंक और जम्मू क्षेत्र की नई चुनौती।
  • LWE: SAMADHAN, अग्रिम शिविर, विकास; दायरा बहुत सिमटा; मार्च 2026 लक्ष्य; मूल कारणों का समाधान।
  • पूर्वोत्तर: दशक के शांति समझौते, AFSPA में कमी; मणिपुर और म्यांमार सीमा चुनौती।
  • लद्दाख: वाइब्रेंट विलेज, सद्भावना, छठी अनुसूची की माँग — संवाद और संरक्षण।
  • आतंकवाद, नार्को-आतंकवाद, ऑनलाइन कट्टरपंथ: UAPA, NIA, NDPS, माँग में कमी, प्रति-आख्यान।