1. अध्याय एक नज़र में
Paper II का भाग 5-8 — भारत की जनजातीय स्थिति: जनसंख्या और वितरण, जैविक-भाषाई-सामाजिक विशेषताएँ, समस्याएँ (भूमि-अलगाव, ऋणग्रस्तता, कुपोषण, स्वास्थ्य), नृजातीयता और राजनीतिक आंदोलन, तथा भारतीय मानवशास्त्रियों (एस.सी. रॉय, घुर्ये, एल्विन, बी.के. रॉय बर्मन, पी.के. भौमिक) का योगदान। 2023 में जनजातियों का क्षेत्रीय वितरण, घुर्ये का "पिछड़े हिंदू" मत, एस.सी. रॉय, लोकतांत्रिक संस्थाओं का प्रभाव और नृजातीय पहचान; 2024 में झारखंड की कारीगर जनजातियाँ, अपातानी कृषि, लोढ़ा और पी.के. भौमिक, नृजातीय-राष्ट्रवाद, जनजातीय बच्चों में नाटापन और भारत की जनांकिकीय चुनौतियाँ पूछी गईं।
- जनजाति की परिभाषा, जनसंख्या, वितरण और वर्गीकरण।
- प्रमुख जनजातियाँ — क्षेत्रवार संस्थागत विशेषताएँ; अपातानी, झारखंड के कारीगर।
- जनजाति-जाति सातत्य; घुर्ये-एल्विन बहस; भारतीय मानवशास्त्रियों का योगदान।
- समस्याएँ — स्वास्थ्य, पोषण, शिक्षा, जनांकिकी।
- लोकतांत्रिक संस्थाएँ, नृजातीय पहचान, संघर्ष और नृजातीय-राष्ट्रवाद।
2. जनजाति: परिभाषा और जनसंख्या
- संवैधानिक — "अनुसूचित जनजाति" की कोई परिभाषा नहीं; अनुच्छेद 366(25) — अनुच्छेद 342 के अंतर्गत राष्ट्रपति द्वारा अधिसूचित समुदाय; सूची में परिवर्तन केवल संसद द्वारा।
- लोकुर समिति (1965) के मानदंड — (1) आदिम लक्षण, (2) विशिष्ट संस्कृति, (3) भौगोलिक अलगाव, (4) बाहरी संपर्क में संकोच, (5) पिछड़ापन। आलोचना — "आदिम" शब्द अपमानजनक, कई मानदंड अब अप्रासंगिक; 2014 में ज़ाक्सा समिति (वर्जिनियस ज़ाक्सा) ने समीक्षा की।
- मानवशास्त्रीय परिभाषाएँ — डी.एन. मजूमदार: "परिवारों या परिवार-समूहों का संग्रह जिसका एक सामान्य नाम, सामान्य क्षेत्र, सामान्य भाषा हो, जो विवाह, व्यवसाय में निषेधों का पालन करता हो और जिसने पारस्परिक दायित्वों की एक विकसित व्यवस्था बनाई हो"; आंद्रे बेते — भारत में "जनजाति" एक प्रशासनिक श्रेणी अधिक, विश्लेषणात्मक कम।
- जनगणना 2011 — ST जनसंख्या 10.43 करोड़ (8.6%); लगभग 705 अधिसूचित समुदाय; 89.97% ग्रामीण; लिंगानुपात 990 (राष्ट्रीय 943); साक्षरता 59% (राष्ट्रीय 73%)।
- संख्या में सर्वाधिक — मध्य प्रदेश (1.53 करोड़), फिर महाराष्ट्र, ओडिशा, राजस्थान, गुजरात, झारखंड, छत्तीसगढ़; प्रतिशत में सर्वाधिक — लक्षद्वीप (94.8%), मिज़ोरम (94.4%), नागालैंड (86.5%), मेघालय (86.1%); कोई अधिसूचित ST नहीं — पंजाब, हरियाणा, दिल्ली, चंडीगढ़, पुडुचेरी।
- सबसे बड़ी जनजातियाँ — भील (~1.7 करोड़), गोंड (~1.3 करोड़), संथाल, मीणा, उराँव, मुंडा, नायकड़ा/नायक।
3. क्षेत्रीय वितरण और संस्थागत विशेषताएँ (UPSC 2023)
| क्षेत्र | राज्य | प्रमुख जनजातियाँ | विशिष्ट संस्थागत लक्षण |
|---|---|---|---|
| उत्तर-पूर्वी हिमालयी | असम, अरुणाचल, नागालैंड, मणिपुर, मिज़ोरम, मेघालय, त्रिपुरा, सिक्किम; हिमाचल-उत्तराखंड-लद्दाख | नागा, मिज़ो, खासी, गारो, बोडो, अपातानी, आदि, न्यिशी; भूटिया, लेप्चा; गद्दी, किन्नौरा, थारू, जौनसारी | तिब्बती-बर्मी भाषाएँ; युवागृह (नागा "मोरुंग", आदि "मोशुप/रसेंग"); मातृवंशी खासी-गारो; ग्राम परिषदें, मुखियातंत्र; झूम; ईसाई धर्म का व्यापक प्रसार; छठी अनुसूची; भ्रातृक बहुपति विवाह (जौनसार-बावर, किन्नौर) |
| मध्य (सबसे बड़ा — ST जनसंख्या का आधे से अधिक) | झारखंड, ओडिशा, छत्तीसगढ़, म.प्र., पश्चिम बंगाल, बिहार, आंध्र-तेलंगाना का उत्तरी भाग | गोंड, संथाल, मुंडा, उराँव, हो, खड़िया, बैगा, कोंध, सवरा, भूमिज, बिरहोर, असुर, मारिया, मुरिया | ऑस्ट्रो-एशियाटिक (मुंडा) और द्रविड़ (गोंडी, कुडुख) भाषाएँ; पड़हा, माँझी-परगना, मानकी-मुंडा स्वशासन; युवागृह — मुरिया "घोटुल", उराँव "धुमकुड़िया", मुंडा "गितिओड़ा"; सरना धर्म; खनिज क्षेत्र — विस्थापन; कई जनजातीय आंदोलन (संथाल हूल, उलगुलान); पाँचवीं अनुसूची |
| पश्चिमी | राजस्थान, गुजरात, महाराष्ट्र, दादरा-नगर हवेली | भील, मीणा, गरासिया, सहरिया, वारली, कोली, डुबला, कोकना, कातकरी | भारोपीय भाषाएँ (भीली); हिंदू धर्म से गहरा संपर्क; कृषि और मज़दूरी; "गोल-गधेड़ो", "भगोरिया" उत्सव; वारली चित्रकला; मीणा — आर्थिक-शैक्षिक रूप से उन्नत |
| दक्षिणी | कर्नाटक, केरल, तमिलनाडु, आंध्र-तेलंगाना का दक्षिणी भाग | टोडा, कोटा, कुरुंबा, इरुला, बडगा (नीलगिरि); चेंचू, यानादी; कादर, पनियन, मुथुवन; सोलिगा, जेनु कुरुबा, कोया | द्रविड़ भाषाएँ; शिकार-संग्रह (चेंचू, कादर), पशुपालन (टोडा — भैंस, पवित्र दुग्धशाला), बहुपति विवाह (टोडा), नीलगिरि की अंतर-जनजातीय पारस्परिक अर्थव्यवस्था; बंधुआ श्रम (पनियन); वन-आधारित जीविका |
| द्वीपीय | अंडमान-निकोबार, लक्षद्वीप | ग्रेट अंडमानी, ओंगे, जारवा, सेंटिनली (नेग्रिटो); निकोबारी, शोम्पेन (मंगोलॉइड); लक्षद्वीप के मुस्लिम जनजातीय समुदाय | शिकार-संग्रह, सीमित संपर्क; विशेष संरक्षण — ANPATR 1956; "eyes-on, hands-off" नीति (सेंटिनली); निकोबारी — नारियल अर्थव्यवस्था, सामूहिक "तुहेत" परिवार; लक्षद्वीप — मातृवंशी, इस्लाम |
वर्गीकरण के अन्य आधार — आर्थिक (एल.पी. विद्यार्थी) — शिकारी-संग्राहक, झूम कृषक, स्थायी कृषक, कारीगर, पशुपालक, औद्योगिक/बागान श्रमिक; भाषाई — चार परिवार; सांस्कृतिक संपर्क (वेरियर एल्विन, बी.एस. गुहा) — (1) अलग-थलग, (2) आंशिक संपर्क, (3) हिंदूकृत/आत्मसात्; प्रजातीय — गुहा।
4. जनजाति-जाति सातत्य और घुर्ये-एल्विन बहस
- सातत्य (Continuum) — एफ़.जी. बेली (Tribe, Caste and Nation, 1960 — कोंध): जनजाति (खंडीय, भूमि पर सामूहिक अधिकार) और जाति (श्रेणीबद्ध, आश्रित) एक सातत्य के दो छोर; सुरजीत सिन्हा — भूमिज का राजपूतीकरण; एन.के. बोस — "हिंदू पद्धति से जनजातीय आत्मसात्करण" (Hindu method of tribal absorption, 1941)।
जी.एस. घुर्ये — "जनजातियाँ पिछड़े हिंदू हैं" (UPSC 2023)
- कृति — The Aborigines — "So-called" — and Their Future (1943); पुनः The Scheduled Tribes (1959)।
- तर्क — (1) जनजातियाँ हिंदू समाज का अपूर्ण रूप से एकीकृत भाग हैं — "पिछड़े हिंदू"; (2) अनेक जनजातियाँ हिंदू देवी-देवताओं, त्योहारों, जाति-जैसे नियमों को अपना चुकी हैं; (3) "आदिवासी" (aborigine) शब्द औपनिवेशिक "फूट डालो" नीति का हिस्सा; (4) समाधान — आत्मसात्करण (assimilation) — शिक्षा, हिंदू समाज में एकीकरण; (5) ईसाई मिशनरियों और अलगाव-नीति का विरोध।
- वेरियर एल्विन का विपरीत मत — The Baiga (1939), "Loss of Nerve" (1941): जनजातीय संस्कृति की रक्षा के लिए "राष्ट्रीय उद्यान" (national park) जैसा संरक्षण — अलगाव (isolation); बाद में A Philosophy for NEFA (1957) — एकीकरण का समर्थन।
- नेहरू का पंचशील (एल्विन की पुस्तक A Philosophy for NEFA के 1959 के द्वितीय संस्करण की प्रस्तावना) — (1) जनजातियों का विकास उनकी अपनी प्रतिभा के अनुसार, कुछ भी थोपा न जाए; (2) भूमि-वन अधिकारों का सम्मान; (3) अपने लोगों को प्रशासन और विकास का प्रशिक्षण; (4) अति-प्रशासन और योजनाओं की बहुलता से बचें; (5) परिणाम का आकलन व्यय से नहीं, मानवीय चरित्र की गुणवत्ता से।
- घुर्ये के मत की आलोचना — (1) जनजातियों की स्वायत्त पहचान, भाषा और धर्म (सरना, डोनी-पोलो, सेंग खासी) की उपेक्षा; (2) पूर्वोत्तर की ईसाई और गैर-हिंदू जनजातियों पर लागू नहीं; (3) "पिछड़ा" शब्द मूल्य-निर्णय और विकासवादी पूर्वाग्रह; (4) आत्मसात्करण से भूमि-अलगाव और शोषण (साहूकार, ठेकेदार) — जो वास्तविक हिंदू संपर्क के परिणाम थे; (5) आज "आदिवासी" पहचान का पुनरुत्थान, सरना धर्म कोड की माँग; (6) पर शक्ति — एकीकरण और राष्ट्रीय एकता पर बल; सातत्य की वास्तविकता (भील, गोंड)।
5. भारतीय मानवशास्त्रियों का योगदान
शरत चंद्र रॉय (1871-1942) (UPSC 2023)
- परिचय — राँची में वकील; छोटानागपुर की जनजातियों के अधिकारों के लिए क़ानूनी लड़ाई के दौरान नृवंशवर्णन की ओर; "भारतीय नृवंशवर्णन के जनक"।
- प्रमुख कृतियाँ — The Mundas and Their Country (1912), The Oraons of Chota Nagpur (1915), The Birhors (1925), Oraon Religion and Customs (1928), The Hill Bhuiyas of Orissa (1935), The Kharias (1937, पुत्र आर.सी. रॉय के साथ)।
- संस्थागत योगदान — "Man in India" पत्रिका (1921) — भारत की प्रथम मानवशास्त्रीय पत्रिकाओं में; भारतीय विज्ञान कांग्रेस में मानवशास्त्र अनुभाग।
- दृष्टि और पद्धति — (1) लंबा, प्रत्यक्ष क्षेत्रकार्य और स्थानीय भाषा; (2) इतिहास, लोककथा, धर्म, भूमि-व्यवस्था का समग्र वर्णन; (3) जनजातियों के भूमि-अधिकारों (खुंटकट्टी) का दस्तावेज़ीकरण — छोटानागपुर काश्तकारी अधिनियम (1908) के संदर्भ में; (4) "मानवशास्त्र को राष्ट्रीय और मानवीय" बनाना — "Indian anthropology" का विचार; (5) "सांस्कृतिक संपर्क" से जनजातियों पर प्रभाव का अध्ययन; (6) बाद में "जनजातीय संस्कृति के पुनर्जीवन" और "समन्वय" पर बल।
- आलोचना — विकासवादी-प्रसारवादी झुकाव (आर्य-पूर्व मूल की अटकलें), सैद्धांतिक ढाँचे की कमी; पर आज भी मुंडा-उराँव अध्ययन के लिए आधार-ग्रंथ।
अन्य मानवशास्त्री
| मानवशास्त्री | योगदान |
|---|---|
| एल.के. अनंतकृष्ण अय्यर | The Cochin Tribes and Castes (1909-12); कलकत्ता विश्वविद्यालय में मानवशास्त्र विभाग (1920) के प्रथम अध्यक्ष |
| डी.एन. मजूमदार | हो जनजाति ("बोंगावाद"), Races and Cultures of India; लखनऊ स्कूल; "The Eastern Anthropologist" पत्रिका |
| एन.के. बोस | "Hindu method of tribal absorption"; जुआंग; ASI निदेशक |
| इरावती कर्वे | नातेदारी संगठन; भील-कातकरी अध्ययन |
| बी.के. रॉय बर्मन | जनजातीय विकास, "Tribal Movements", जनगणना 1961 के जनजातीय अध्ययन; भूमि-वन अधिकारों पर नीति-दस्तावेज़ |
| सच्चिदानंद | Culture Change in Tribal Bihar; जनजातीय अभिजात वर्ग का उदय |
| के.एस. सिंह | "People of India" परियोजना (ASI, 1985-92 — 4,635 समुदाय); Tribal Movements in India; बिरसा मुंडा पर (Dust-Storm and the Hanging Mist, 1966) |
| पी.के. भौमिक | लोढ़ा; क्रियात्मक/अनुप्रयुक्त मानवशास्त्र — नीचे |
पी.के. भौमिक और लोढ़ा जनजाति (UPSC 2024)
- लोढ़ा — पश्चिम बंगाल (पश्चिम/पूर्व मेदिनीपुर, झाड़ग्राम) और ओडिशा; ब्रिटिश आपराधिक जनजाति अधिनियम 1871 के अंतर्गत "आपराधिक जनजाति" घोषित; 1952 में विमुक्त (denotified), पर "आदतन अपराधी अधिनियम" और सामाजिक कलंक जारी; पश्चिम बंगाल में PVTG; मूलतः वनोपज-संग्राहक, शिकारी, कंद-मूल पर निर्भर; वन-अधिकार छिनने से भूमिहीनता और ग़रीबी।
- भौमिक का योगदान — (1) The Lodhas of West Bengal (1963) — विस्तृत नृवंशवर्णन; (2) "आपराधिकता" को जन्मजात नहीं, सामाजिक-आर्थिक वंचना और औपनिवेशिक नीति का परिणाम बताया; (3) क्रियात्मक मानवशास्त्र (action anthropology) — समुदाय के साथ प्रत्यक्ष कार्य करते हुए पुनर्वास, बस्तियाँ, विद्यालय-छात्रावास, कृषि और कौशल प्रशिक्षण, स्वास्थ्य कार्यक्रम; (4) प्रशासन और पुलिस के दृष्टिकोण में परिवर्तन हेतु वकालत — कलंक-मुक्ति; (5) लोढ़ा युवाओं की शिक्षा — समुदाय से प्रथम स्नातक; (6) अन्य विमुक्त जनजातियों के लिए मॉडल।
- समकालीन संदर्भ — इदाते आयोग (2017) — विमुक्त, घुमंतू और अर्ध-घुमंतू जनजातियों (DNT) पर; SEED योजना (2022) — DNT के आर्थिक सशक्तिकरण हेतु; 2008 की रेणके आयोग रिपोर्ट।
6. विशिष्ट जनजातीय अध्ययन
अपातानी की कृषि पद्धतियाँ (UPSC 2024)
- स्थान — ज़ीरो घाटी, लोअर सुबनसिरी ज़िला, अरुणाचल प्रदेश (~1,500 मीटर ऊँचाई); क्रिस्टोफ़ वॉन फ़्यूरर-हाइमेनडॉर्फ़ — The Apa Tanis and Their Neighbours (1962)।
- गीली धान-मत्स्य खेती (paddy-cum-fish) — सीढ़ीनुमा/समतल खेतों में धान के साथ मछली पालन (कॉमन कार्प); खेतों के मेड़ों (bunds) पर मड़ुआ/फिंगर मिलेट; न हल-बैल, न मशीन — पूरी तरह मानव श्रम और सामूहिक श्रम-दल (पट्टांग); बिना रासायनिक खाद — जैविक अपशिष्ट, धान-भूसा, पशु-मल से उर्वरता।
- सिंचाई — केले (Kele) नदी और पहाड़ी धाराओं से नहरों, बाँस-नलियों का जटिल जाल; जल का सामुदायिक प्रबंधन।
- वन-प्रबंधन — बाँस और देवदार/चीड़ के निजी और कुल-स्वामित्व वाले उपवन; पारंपरिक वन-संरक्षण नियम।
- सामाजिक संगठन — कुल-आधारित भूमि-स्वामित्व, ग्राम परिषद "बुलियांग"; त्योहार — द्री (Dree — फ़सल-समृद्धि के लिए, जुलाई), म्योको (Myoko — मार्च), इनमें कृषि-अनुष्ठान।
- महत्व — उच्च उत्पादकता वाली सतत कृषि का उदाहरण; जल-ऊर्जा-श्रम का कुशल उपयोग; ज़ीरो घाटी यूनेस्को की अस्थायी विश्व धरोहर सूची (2014) में; FAO जैसे संगठनों द्वारा पारंपरिक कृषि विरासत के रूप में चर्चा; "जलवायु-अनुकूल" कृषि का मॉडल।
- चुनौतियाँ — शहरीकरण, युवाओं का पलायन, बाज़ार से नक़दी फ़सलें (कीवी), खेतों का निर्माण-भूमि में परिवर्तन।
झारखंड की कारीगर जनजातियाँ (UPSC 2024)
| जनजाति | शिल्प |
|---|---|
| असुर (PVTG) | पारंपरिक लौह-प्रगलन (भट्ठियों में अयस्क से लोहा); आज बॉक्साइट खनन से प्रभावित; "असुर मोबाइल रेडियो" जैसी भाषा-संरक्षण पहल |
| लोहरा / करमाली | लोहारी — कृषि उपकरण, हथियार |
| महली | बाँस शिल्प — टोकरी, सूप, चटाई |
| तुरी | बाँस शिल्प, ढोल-वादन |
| चिक बड़ाइक | बुनकर — पारंपरिक वस्त्र |
| मल्हार | ढोकरा (lost-wax धातु ढलाई) |
| बिरहोर (PVTG) | रस्सी-निर्माण (मोहलाइन/चोप लता से), शहद-संग्रह |
| संथाल, मुंडा (स्त्रियाँ) | पत्ता-प्लेट, चित्रकला; हज़ारीबाग की सोहराय-खोवर भित्तिचित्र (GI टैग, 2020); पैटकर चित्रकला (अमाडुबी) |
समस्याएँ — कच्चे माल (बाँस, लकड़ी) पर वन-प्रतिबंध, कारख़ाना-निर्मित सस्ती वस्तुओं से प्रतिस्पर्धा, बिचौलिये, बाज़ार और डिज़ाइन तक पहुँच का अभाव, युवाओं की अरुचि; उपाय — TRIFED, झारक्राफ़्ट, GI टैग, PM विश्वकर्मा योजना (2023), ई-कॉमर्स, SHG।
7. जनजातीय समस्याएँ: स्वास्थ्य, पोषण और जनांकिकी
जनजातीय बच्चों में नाटापन और दुबलापन के कारण (UPSC 2024)
- स्थिति — NFHS-5 (2019-21) के अनुसार अनुसूचित जनजाति के 5 वर्ष से कम आयु के बच्चों में नाटापन लगभग 41% (राष्ट्रीय 35.5%) और दुबलापन/कम वज़न भी राष्ट्रीय औसत से अधिक; एनीमिया अत्यधिक।
- प्रत्यक्ष कारण — अपर्याप्त आहार (प्रोटीन, सूक्ष्म-पोषक), बार-बार संक्रमण (दस्त, मलेरिया, श्वसन रोग), कम जन्म-वज़न, किशोरी माताएँ, माँ का कुपोषण और एनीमिया।
- अंतर्निहित कारण — (1) वन-अधिकारों का क्षरण — कंद-मूल, फल, शिकार, मछली जैसे पारंपरिक पोषक स्रोतों तक पहुँच का नुक़सान; (2) भूमि-अलगाव और विस्थापन (खनन, बाँध); (3) मोटे अनाज से PDS चावल की ओर आहार-संक्रमण; (4) मौसमी भुखमरी ("lean season" — मेलघाट, बारां की सहरिया); (5) स्वच्छ जल और स्वच्छता की कमी; (6) स्वास्थ्य सेवाओं की दूरी, ASHA/आँगनवाड़ी की कमी; (7) मौसमी प्रवासन — बच्चों की देखभाल में बाधा; (8) शिक्षा और जागरूकता का अभाव, कुछ खाद्य-निषेध; (9) सिकल सेल रोग का बोझ।
- उपाय — पोषण अभियान, PM-पोषण, ICDS का जनजातीय अनुकूलन, मोटे अनाज (श्री अन्न) को PDS/मध्याह्न भोजन में, समुदाय-आधारित SAM प्रबंधन (CMAM), FRA के अंतर्गत सामुदायिक वन संसाधन अधिकार, स्थानीय भाषा में पोषण-शिक्षा, राष्ट्रीय सिकल सेल एनीमिया उन्मूलन मिशन (2023), PM-JANMAN (2023, PVTG)।
भारत की बदलती जनसंख्या: अगले 50 वर्षों की चुनौतियाँ (UPSC 2024)
- वर्तमान रुझान — कुल प्रजनन दर (TFR) 2.0 (NFHS-5) — प्रतिस्थापन स्तर से नीचे; 2023 में भारत विश्व का सबसे अधिक जनसंख्या वाला देश (UN); संयुक्त राष्ट्र (World Population Prospects 2024) के अनुसार भारत की जनसंख्या लगभग 2060 के दशक के प्रारंभ में ~1.7 अरब पर चरम और फिर गिरावट।
- चुनौतियाँ — (1) वृद्धावस्था — 60+ जनसंख्या 2050 तक लगभग 20% (India Ageing Report 2023, UNFPA) — पेंशन, स्वास्थ्य, देखभाल; (2) जनांकिकीय लाभांश की खिड़की (लगभग 2040 के दशक तक) — रोज़गार, कौशल, स्त्री श्रम-भागीदारी का उपयोग न होने पर "जनांकिकीय आपदा"; (3) क्षेत्रीय असंतुलन — दक्षिणी राज्यों में TFR ~1.5-1.7, बिहार ~3.0 — परिसीमन, संघीय वित्त, आंतरिक प्रवासन; (4) लिंगानुपात — जन्म-लिंगानुपात 929 (NFHS-5); (5) शहरीकरण — 2050 तक लगभग आधी जनसंख्या शहरी; (6) स्वास्थ्य संक्रमण — NCD का बोझ; (7) जलवायु परिवर्तन और संसाधन दबाव; (8) प्रवासन — आंतरिक और अंतर्राष्ट्रीय।
- जनजातीय-मानवशास्त्रीय आयाम — कुछ PVTG की जनसंख्या बहुत कम या घटती (ग्रेट अंडमानी, ओंगे); जनजातियों में उच्च शिशु-मृत्यु दर और कम जीवन-प्रत्याशा; विस्थापन और प्रवासन से जनसंख्या-संरचना में परिवर्तन; पूर्वोत्तर में "बाहरी" जनसंख्या को लेकर तनाव (इनर लाइन परमिट, NRC); सांस्कृतिक रूप से संवेदनशील परिवार-नियोजन।
8. लोकतांत्रिक संस्थाएँ, नृजातीयता और आंदोलन
आधुनिक लोकतांत्रिक संस्थाओं का जनजातीय समाजों पर प्रभाव (UPSC 2023)
- संस्थाएँ — सार्वभौमिक मताधिकार, विधानसभा-लोकसभा में आरक्षण (अनु. 330, 332), पंचायती राज (73वाँ संशोधन) और PESA 1996, छठी अनुसूची की स्वायत्त ज़िला परिषदें, राजनीतिक दल।
- सकारात्मक प्रभाव — (1) राजनीतिक चेतना और प्रतिनिधित्व — जनजातीय मुख्यमंत्री, केंद्रीय मंत्री, राष्ट्रपति (द्रौपदी मुर्मू, 2022 — प्रथम जनजातीय राष्ट्रपति); (2) स्त्रियों की भागीदारी (पंचायतों में 50% आरक्षण वाले राज्य); (3) विकास-निधियों पर नियंत्रण; (4) अधिकार-चेतना — FRA दावे, ग्राम सभा निर्णय (नियमगिरि, 2013)।
- नकारात्मक/जटिल प्रभाव — (1) पारंपरिक संस्थाओं से टकराव — झारखंड में संथाल माँझी-परगना और मुंडा-मानकी बनाम निर्वाचित पंचायतें (झारखंड में 1978 के बाद पहले पंचायत चुनाव 2010 में); (2) गुटबाज़ी और दलीय राजनीति से ग्राम-एकता का क्षरण; (3) जनजातीय अभिजात वर्ग का उदय — लाभ कुछ परिवारों तक (सच्चिदानंद); (4) लैंगिक प्रश्न — नागालैंड में नगर निकायों में 33% महिला आरक्षण पर 2017 में हिंसक विरोध (अनु. 371A के प्रथागत क़ानून का तर्क), अंततः 2024 में आरक्षण सहित चुनाव; मेघालय के दरबार श्नोंग में स्त्रियों का बहिष्कार; (5) पहचान-राजनीति — ST दर्जे की माँग, अंतर-जनजातीय प्रतिस्पर्धा; (6) PESA का कमज़ोर क्रियान्वयन — कई राज्यों ने देर से नियम बनाए।
- नृवंशवर्णनात्मक उदाहरण — एफ़.जी. बेली (Politics and Social Change: Orissa in 1959, 1963) — कोंध और ओड़िया ग्रामों में "बिचौलिये" (brokers) का उदय; मिज़ोरम का ग्राम परिषद और MNF का संक्रमण; नागा ग्राम परिषदें (नागालैंड ग्राम परिषद अधिनियम 1978) — परंपरा और लोकतंत्र का संगम।
नृजातीय पहचान बनाम नृजातीयता; जनजातीय क्षेत्रों में संघर्ष (UPSC 2023)
- नृजातीयता (Ethnicity) — एक समूह की साझा संस्कृति, भाषा, वंश, इतिहास की वस्तुगत विशेषताओं का समुच्चय; नृजातीय पहचान (Ethnic identity) — व्यक्ति/समूह द्वारा इन विशेषताओं की व्यक्तिपरक चेतना और स्व-परिभाषा, "हम" बनाम "वे" — जो परिस्थिति के अनुसार सक्रिय/निष्क्रिय होती है (बार्थ — सीमाएँ)।
- सैद्धांतिक दृष्टियाँ — आदिमवादी (Primordialist) — गीर्ट्ज़, शिल्स: "दिए हुए" जन्मजात बंधन; साधनवादी (Instrumentalist) — पॉल ब्रास, अब्नर कोहेन: अभिजात वर्ग द्वारा संसाधनों के लिए लामबंदी; निर्माणवादी (Constructivist) — बेनेडिक्ट एंडरसन (Imagined Communities, 1983), बार्थ।
- जनजातीय क्षेत्रों में संघर्ष के कारक — (1) भूमि और संसाधन पर प्रतिस्पर्धा; (2) प्रवासन — "बाहरी" बनाम "मूलनिवासी" (असम आंदोलन 1979-85, त्रिपुरा में जनसांख्यिकीय परिवर्तन); (3) राजनीतिक स्वायत्तता की माँग — अलग राज्य/क्षेत्रीय परिषद; (4) ST दर्जे और आरक्षण पर विवाद — मणिपुर (मई 2023 से कुकी-ज़ो और मैतेई के बीच हिंसा — मैतेई के ST दर्जे पर उच्च न्यायालय आदेश के बाद); (5) अंतर-जनजातीय विवाद — नागा-कुकी (1990 का दशक), बोडो-आदिवासी (संथाल), कार्बी-दिमासा; (6) सीमाएँ और औपनिवेशिक विरासत; (7) उग्रवाद और हथियारों का प्रवाह, सीमा-पार नेटवर्क; (8) विकास-परियोजनाओं से विस्थापन; (9) धर्मांतरण और धार्मिक पहचान; (10) भाषा और शिक्षा-माध्यम।
- समाधान — छठी अनुसूची और स्वायत्त परिषदें, शांति समझौते (मिज़ो 1986, बोडो 2003 और BTR 2020, कार्बी आंगलोंग 2021, ब्रू-रियांग पुनर्वास 2020), संवाद, समावेशी विकास, ILP।
नृजातीय-राष्ट्रवाद का पुनरुत्थान (UPSC 2024)
- अर्थ — राष्ट्र को साझा नृजातीयता (वंश, भाषा, धर्म, संस्कृति) के आधार पर परिभाषित करना, और उस समूह के लिए राजनीतिक स्वायत्तता/राज्य की माँग — "नागरिक राष्ट्रवाद" (civic nationalism) से भिन्न।
- वैश्विक — शीत युद्ध के बाद (यूगोस्लाविया, रवांडा), यूरोप में पहचान-आधारित दक्षिणपंथ, कुर्द, कैटलन, स्कॉटिश आंदोलन; प्रवासी समुदायों की "लंबी दूरी का राष्ट्रवाद" (बेनेडिक्ट एंडरसन)।
- भारत में — नागा (NSCN — "नागालिम"), मिज़ो (1966 विद्रोह → 1986 समझौता), बोडो, गोरखालैंड, झारखंड आंदोलन (राज्य 2000), कुकी-ज़ो की अलग प्रशासन की माँग, "आदिवासी" पहचान का अखिल-भारतीय उभार।
- मानवशास्त्रीय दृष्टि — (1) वैश्वीकरण और असमानता के बीच पहचान की सुरक्षा की खोज (अप्पादुरै — Fear of Small Numbers); (2) स्मृति, मिथक और इतिहास का पुनर्निर्माण (एरिक हॉब्सबॉम — "invented traditions"); (3) संसाधन और सत्ता के लिए अभिजात लामबंदी (साधनवाद); (4) डिजिटल मीडिया से कल्पित समुदाय का विस्तार; (5) राज्य की नीतियाँ — वर्गीकरण, जनगणना, आरक्षण नृजातीय सीमाओं को कठोर बनाते हैं; (6) आलोचना — बहुलता, आंतरिक भिन्नता और संकर पहचानों की उपेक्षा, हिंसा और बहिष्करण का ख़तरा।
9. Master Summary Table
| विषय | मुख्य तथ्य | याद रखें |
|---|---|---|
| परिभाषा | अनु. 342, 366(25); लोकुर 1965 (5 मानदंड) | ज़ाक्सा समिति 2014 |
| जनसंख्या 2011 | 10.43 करोड़, 8.6%, ~705 समुदाय | MP सर्वाधिक; लक्षद्वीप/मिज़ोरम प्रतिशत |
| क्षेत्र | उत्तर-पूर्व, मध्य (सबसे बड़ा), पश्चिमी, दक्षिणी, द्वीपीय | युवागृह, स्वशासन |
| सातत्य | बेली 1960, सिन्हा, बोस | राजपूतीकरण |
| घुर्ये बनाम एल्विन | पिछड़े हिंदू (1943) बनाम राष्ट्रीय उद्यान (1939-41) | नेहरू का पंचशील |
| एस.सी. रॉय | मुंडा 1912, उराँव 1915, बिरहोर 1925; Man in India 1921 | भारतीय नृवंशवर्णन के जनक |
| भौमिक | लोढ़ा 1963; क्रियात्मक मानवशास्त्र | CTA 1871 → विमुक्त 1952 |
| अपातानी | धान-मत्स्य, बिना हल-बैल, बाँस-चीड़ उपवन | हाइमेनडॉर्फ़ 1962; यूनेस्को अस्थायी सूची 2014 |
| झारखंड कारीगर | असुर, लोहरा, महली, तुरी, मल्हार, बिरहोर | सोहराय-खोवर GI 2020 |
| पोषण | ST नाटापन ~41% | PM-JANMAN, सिकल सेल मिशन |
| नृजातीयता | आदिमवादी, साधनवादी, निर्माणवादी | बार्थ, एंडरसन, ब्रास |
10. चार्ट: जनजातीय भारत के पाँच क्षेत्र
11. Mind Map
- अनु. 342, लोकुर
- 8.6%, 705 समुदाय
- 5 क्षेत्र
- संस्थागत लक्षण
- एस.सी. रॉय, घुर्ये, एल्विन
- बोस, सिन्हा, बेली
- भौमिक, के.एस. सिंह
- कुपोषण, सिकल सेल
- भूमि-अलगाव
- जनांकिकी
- PESA, पारंपरिक परिषदें
- नृजातीय संघर्ष
- नृजातीय-राष्ट्रवाद
12. महत्वपूर्ण One-liners
- ST जनसंख्या (2011) — 10.43 करोड़, 8.6%; लिंगानुपात 990।
- लोकुर समिति — 1965; ज़ाक्सा समिति — 2014।
- "The Aborigines — So-called — and Their Future" (1943) — जी.एस. घुर्ये।
- "The Baiga" (1939), "A Philosophy for NEFA" (1957) — वेरियर एल्विन।
- "The Mundas and Their Country" (1912), "Man in India" (1921) — शरत चंद्र रॉय।
- "Tribe, Caste and Nation" (1960) — एफ़.जी. बेली; "Hindu method of tribal absorption" — एन.के. बोस।
- "The Lodhas of West Bengal" (1963) — पी.के. भौमिक।
- "The Apa Tanis and Their Neighbours" (1962) — फ़्यूरर-हाइमेनडॉर्फ़।
- "People of India" परियोजना — के.एस. सिंह (ASI)।
- प्रथम जनजातीय राष्ट्रपति — द्रौपदी मुर्मू (2022)।
13. टिप्स एवं ट्रिक्स
- हर उत्तर में भारत का मानचित्र (जनजातीय क्षेत्र) — विशेषकर "वितरण" वाले प्रश्नों में।
- कम से कम दो नृवंशवर्णन + एक नीति/क़ानून (PESA, FRA, छठी अनुसूची) + एक नवीनतम आँकड़ा (NFHS-5, जनगणना 2011)।
- विचारकों के प्रश्नों में — जीवन-परिचय (2 पंक्ति) → कृतियाँ → अवधारणाएँ → पद्धति → मूल्यांकन।
लोकुर के 5 मानदंड — "आदिम-विशिष्ट-अलग-संकोची-पिछड़ा"; एस.सी. रॉय की कृतियाँ क्रम से — "मुंडा (1912) → उराँव (1915) → बिरहोर (1925) → भुइयाँ (1935) → खड़िया (1937)"।
14. PYQ-आधारित प्रश्न एवं मॉडल उत्तर
भारत के विभिन्न भौगोलिक क्षेत्रों में जनजातियों के वितरण की विवेचना कीजिए। इन क्षेत्रों के जनजातीय समाजों की विशिष्ट संस्थागत विशेषताएँ पहचानिए।
मॉडल उत्तर (रूपरेखा)
भूमिका: 2011 में ST जनसंख्या 10.43 करोड़ (8.6%), ~705 समुदाय; वितरण असमान — मध्य भारत में सर्वाधिक संख्या, पूर्वोत्तर में सर्वाधिक प्रतिशत।
क्षेत्र और विशेषताएँ (तालिका/मानचित्र): (1) उत्तर-पूर्व/हिमालयी — तिब्बती-बर्मी भाषाएँ, युवागृह (मोरुंग), मातृवंशी खासी-गारो, ग्राम परिषदें, झूम, ईसाई धर्म, छठी अनुसूची; हिमालयी बहुपति विवाह; (2) मध्य — मुंडा और द्रविड़ भाषाएँ, पड़हा/माँझी-परगना/मानकी-मुंडा, घोटुल-धुमकुड़िया, सरना, खनन-विस्थापन, आंदोलन, पाँचवीं अनुसूची; (3) पश्चिमी — भीली, हिंदू संपर्क, भगोरिया, वारली कला, कृषि-मज़दूरी; (4) दक्षिणी — द्रविड़, शिकार-संग्रह (चेंचू, कादर), टोडा पशुपालन और बहुपति विवाह, नीलगिरि की अंतर-जनजातीय पारस्परिकता; (5) द्वीपीय — नेग्रिटो शिकारी-संग्राहक, सीमित संपर्क, ANPATR 1956, निकोबारी "तुहेत"।
सामान्य प्रवृत्तियाँ: परिवर्तन — शिक्षा, धर्मांतरण, बाज़ार; समस्याएँ — भूमि-अलगाव, कुपोषण; पहचान-राजनीति।
निष्कर्ष: भारत की जनजातियाँ एक समरूप श्रेणी नहीं — क्षेत्रीय पारिस्थितिकी, इतिहास और संपर्क ने उनकी संस्थाओं को विविध रूप दिया है; अतः नीति भी क्षेत्र-विशिष्ट होनी चाहिए।
"जनजातियाँ पिछड़े हिंदू हैं।" जी.एस. घुर्ये के योगदान के संदर्भ में आलोचनात्मक टिप्पणी कीजिए।
मॉडल उत्तर (रूपरेखा)
भूमिका: घुर्ये (1893-1983), "भारतीय समाजशास्त्र के जनक", ने The Aborigines — So-called — and Their Future (1943) में जनजातियों को "पिछड़े हिंदू" कहा।
तर्क: हिंदू धर्म से निरंतर संपर्क — देवी-देवता, त्योहार, जाति-नियम; जनजाति और हिंदू निम्न जातियों में स्पष्ट सीमा नहीं; "आदिवासी" शब्द औपनिवेशिक विभाजनकारी; आत्मसात्करण द्वारा राष्ट्रीय एकीकरण; मिशनरियों और एल्विन की अलगाव-नीति का विरोध।
शक्ति: जनजाति-जाति सातत्य की वास्तविकता (भील, गोंड, भूमिज); राष्ट्रीय एकता; औपनिवेशिक श्रेणियों की आलोचना।
आलोचना: (1) पूर्वोत्तर, अंडमान और ईसाई जनजातियों पर अनुपयुक्त; (2) स्वतंत्र धर्मों (सरना, डोनी-पोलो) और भाषाओं की उपेक्षा; (3) "पिछड़ा" मूल्य-निर्णय; (4) हिंदू संपर्क से ही शोषण (साहूकार, भूमि-अलगाव) — आत्मसात्करण का दुष्प्रभाव; (5) ब्राह्मणवादी दृष्टि (Indological bias); (6) आज आदिवासी पहचान का पुनरुत्थान।
तुलना: एल्विन (अलगाव → एकीकरण), नेहरू का पंचशील — मध्य मार्ग (एकीकरण, आत्मसात्करण नहीं)।
निष्कर्ष: घुर्ये का मत ऐतिहासिक-सांस्कृतिक संपर्क की सच्चाई दर्शाता है, पर जनजातीय स्वायत्तता और विविधता की उपेक्षा करता है; भारतीय संविधान ने "एकीकरण" का मार्ग अपनाया।
भारतीय मानवशास्त्र में एस.सी. रॉय के योगदान का आलोचनात्मक मूल्यांकन कीजिए।
मॉडल उत्तर (रूपरेखा)
परिचय: शरत चंद्र रॉय (1871-1942) — राँची के वकील; जनजातियों के भूमि-मुक़दमों से नृवंशवर्णन की ओर; "भारतीय नृवंशवर्णन के जनक"।
कृतियाँ: मुंडा (1912), उराँव (1915), बिरहोर (1925), उराँव धर्म (1928), पहाड़ी भुइयाँ (1935), खड़िया (1937)।
योगदान: (1) प्रत्यक्ष क्षेत्रकार्य, स्थानीय भाषा; (2) समग्र नृवंशवर्णन — इतिहास, अर्थव्यवस्था, धर्म, लोककथा; (3) खुंटकट्टी भूमि-व्यवस्था और जनजातीय अधिकारों का दस्तावेज़ीकरण; (4) "Man in India" (1921) — भारतीय मानवशास्त्र का मंच; (5) अनुप्रयुक्त दृष्टि — प्रशासन को जनजातीय संस्कृति समझाना; (6) "भारतीय" मानवशास्त्र की अवधारणा — औपनिवेशिक ज्ञान के समानांतर स्वदेशी आवाज़।
आलोचना: विकासवादी-प्रसारवादी अनुमान, सैद्धांतिक ढाँचे और तुलनात्मक विश्लेषण का अभाव, कुछ रूमानी दृष्टि; पर तथ्यात्मक समृद्धि अद्वितीय।
निष्कर्ष: रॉय ने भारतीय मानवशास्त्र को अनुभवजन्य, जन-केंद्रित और राष्ट्रीय आधार दिया — उनके ग्रंथ आज भी छोटानागपुर की जनजातियों के अध्ययन का प्रारंभ-बिंदु हैं।
समकालीन जनजातीय समाजों पर आधुनिक लोकतांत्रिक संस्थाओं के प्रभाव का आलोचनात्मक परीक्षण कीजिए। उपयुक्त नृवंशवर्णनात्मक उदाहरण दीजिए।
मॉडल उत्तर (रूपरेखा)
भूमिका: स्वतंत्रता के बाद जनजातियों को मताधिकार, विधायी आरक्षण, पंचायती राज, PESA और स्वायत्त परिषदें मिलीं।
सकारात्मक: राजनीतिक प्रतिनिधित्व (राष्ट्रपति मुर्मू), अधिकार-चेतना (नियमगिरि ग्राम सभा), विकास-निधियों पर नियंत्रण, स्त्री-नेतृत्व।
नकारात्मक/जटिल: पारंपरिक संस्थाओं से टकराव (झारखंड — माँझी-परगना बनाम पंचायत, 2010 के चुनाव), गुटबाज़ी, जनजातीय अभिजात वर्ग (सच्चिदानंद), दलों द्वारा पहचान-राजनीति, लैंगिक प्रश्न (नागालैंड 2017 विरोध; मेघालय दरबार), PESA का कमज़ोर क्रियान्वयन।
नृवंशवर्णन: बेली (ओडिशा 1959 — बिचौलियों का उदय); मिज़ोरम और नागालैंड की ग्राम परिषदें (परंपरा-लोकतंत्र का संगम); बस्तर में ग्राम सभा बनाम माओवादी प्रभाव।
निष्कर्ष: लोकतांत्रिक संस्थाओं ने जनजातियों को आवाज़ दी, पर तभी सफल हैं जब वे पारंपरिक स्वशासन को सम्मिलित करें — PESA इसी "संवाद" का संवैधानिक रूप है।
नृजातीय पहचान और नृजातीयता में अंतर करते हुए जनजातीय क्षेत्रों में नृजातीय संघर्ष के लिए उत्तरदायी कारकों की विवेचना कीजिए।
मॉडल उत्तर (रूपरेखा)
अंतर: नृजातीयता — साझा भाषा, वंश, संस्कृति, इतिहास की वस्तुगत विशेषताएँ; नृजातीय पहचान — इनकी व्यक्तिपरक चेतना और "हम-वे" की सीमा (बार्थ), परिस्थितिजन्य और राजनीतिक रूप से सक्रिय।
सैद्धांतिक दृष्टि: आदिमवाद, साधनवाद, निर्माणवाद।
संघर्ष के कारक: (1) भूमि-संसाधन; (2) प्रवासन और जनसांख्यिकीय परिवर्तन (असम, त्रिपुरा); (3) स्वायत्तता की माँग (बोडोलैंड); (4) ST दर्जा और आरक्षण (मणिपुर 2023); (5) अंतर-जनजातीय विवाद (नागा-कुकी, कार्बी-दिमासा); (6) औपनिवेशिक सीमाएँ; (7) उग्रवाद और सीमा-पार नेटवर्क; (8) विस्थापन; (9) धर्म और भाषा; (10) राजनीतिक अभिजात लामबंदी और सोशल मीडिया।
समाधान: छठी अनुसूची, शांति समझौते (मिज़ो 1986, BTR 2020, कार्बी 2021), ILP, समावेशी विकास, अंतर-समुदाय संवाद।
निष्कर्ष: नृजातीय पहचान स्वयं संघर्ष का कारण नहीं — संसाधनों और सत्ता की असमानता से जुड़कर ही वह संघर्ष में बदलती है।
लोढ़ा जनजाति की स्थिति को अपराध-मुक्त करने में पी.के. भौमिक के योगदान की विवेचना कीजिए।
मॉडल उत्तर (रूपरेखा)
पृष्ठभूमि: लोढ़ा (प. बंगाल, ओडिशा) — CTA 1871 में "आपराधिक जनजाति"; 1952 में विमुक्त, पर कलंक, पुलिस-उत्पीड़न, भूमिहीनता और ग़रीबी जारी; PVTG।
भौमिक का योगदान: (1) The Lodhas of West Bengal (1963) — "आपराधिकता" की सामाजिक-आर्थिक और औपनिवेशिक जड़ें; (2) क्रियात्मक मानवशास्त्र — समुदाय के साथ प्रत्यक्ष कार्य करते हुए पुनर्वास, कृषि-भूमि, आवास, विद्यालय-छात्रावास; (3) प्रशासन और पुलिस के साथ संवाद — कलंक-मुक्ति; (4) शिक्षा से नई पीढ़ी का उदय; (5) अनुप्रयुक्त मानवशास्त्र के लिए प्रशिक्षण और लेखन; (6) अन्य DNT के लिए मॉडल।
सीमाएँ: परिवर्तन सीमित क्षेत्र तक; आज भी लोढ़ा में कुपोषण और भेदभाव (1992 में लोढ़ा समुदाय की प्रथम स्नातक स्त्री चुनी कोटाल की उत्पीड़न के बाद आत्महत्या) — संरचनात्मक सुधार की आवश्यकता।
समकालीन: रेणके आयोग (2008), इदाते आयोग (2017), SEED योजना (2022) — DNT के लिए।
निष्कर्ष: भौमिक ने दिखाया कि मानवशास्त्र केवल अध्ययन नहीं, सामाजिक न्याय का साधन भी हो सकता है।
अपातानी की कृषि पद्धतियाँ — टिप्पणी लिखिए।
मॉडल उत्तर
परिचय: ज़ीरो घाटी (अरुणाचल प्रदेश) की अपातानी जनजाति; हाइमेनडॉर्फ़ (1962) का अध्ययन।
पद्धतियाँ: स्थायी गीली धान खेती के साथ मछली पालन (धान-मत्स्य), मेड़ों पर मड़ुआ; हल-बैल और मशीन का प्रयोग नहीं — मानव श्रम और सामूहिक श्रम-दल; केले नदी से सिंचाई-नहरें; जैविक खाद; बाँस-चीड़ के कुल-उपवन; कुल-आधारित भूमि-स्वामित्व; द्री और म्योको जैसे कृषि-त्योहार।
महत्व: उच्च उत्पादकता वाली सतत, पारिस्थितिक कृषि का उदाहरण; यूनेस्को अस्थायी सूची (2014); जलवायु-अनुकूल मॉडल।
चुनौतियाँ: शहरीकरण, युवाओं का पलायन, भूमि-उपयोग परिवर्तन, नक़दी फ़सलें।
जनजातीय बच्चों में नाटापन और दुबलापन के कारण — टिप्पणी लिखिए।
मॉडल उत्तर
स्थिति: NFHS-5 — ST बच्चों में नाटापन लगभग 41% (राष्ट्रीय 35.5%); दुबलापन भी अधिक।
कारण: (1) अपर्याप्त और असंतुलित आहार; (2) बार-बार संक्रमण, मलेरिया; (3) माँ का कुपोषण, एनीमिया, कम जन्म-वज़न, कम आयु में विवाह; (4) वन-आधारित पारंपरिक खाद्य स्रोतों का क्षरण; (5) भूमि-अलगाव, विस्थापन; (6) मोटे अनाज से चावल की ओर आहार-संक्रमण; (7) मौसमी भुखमरी और प्रवासन; (8) स्वच्छता-जल की कमी; (9) दूरस्थ स्वास्थ्य सेवाएँ; (10) सिकल सेल रोग।
उपाय: ICDS-पोषण का जनजातीय अनुकूलन, श्री अन्न, CMAM, FRA सामुदायिक अधिकार, PM-JANMAN, सिकल सेल मिशन।
मानवशास्त्रीय दृष्टि से नृजातीय-राष्ट्रवाद के पुनरुत्थान को स्पष्ट कीजिए।
मॉडल उत्तर (रूपरेखा)
अर्थ: राष्ट्र की परिभाषा साझा नृजातीयता से; नागरिक राष्ट्रवाद से भिन्न।
पुनरुत्थान के उदाहरण: वैश्विक — बाल्कन, कुर्द, यूरोप में पहचान-राजनीति; भारत — नागा, मिज़ो, बोडो, गोरखालैंड, कुकी-ज़ो, अखिल-भारतीय आदिवासी पहचान।
मानवशास्त्रीय व्याख्याएँ: (1) आदिमवाद — गहरे भावनात्मक बंधन (गीर्ट्ज़); (2) साधनवाद — अभिजात लामबंदी, संसाधन (ब्रास); (3) निर्माणवाद — कल्पित समुदाय (एंडरसन), आविष्कृत परंपराएँ (हॉब्सबॉम), सीमाएँ (बार्थ); (4) वैश्वीकरण और "छोटी संख्याओं का भय" (अप्पादुरै); (5) राज्य-वर्गीकरण (जनगणना, आरक्षण) से सीमाओं का कठोरीकरण; (6) डिजिटल मीडिया।
प्रभाव: सांस्कृतिक पुनर्जागरण और अधिकार-चेतना बनाम हिंसा, बहिष्करण, अल्पसंख्यकों पर दबाव।
निष्कर्ष: नृजातीय-राष्ट्रवाद आधुनिकता का "अवशेष" नहीं, उसका उत्पाद है; बहुसांस्कृतिक संघवाद और समावेशी नागरिकता ही इसका संतुलित उत्तर है।
15. Quick Revision Summary
- परिभाषा — अनु. 342, 366(25); लोकुर (1965), ज़ाक्सा (2014); मजूमदार, बेते।
- जनसंख्या — 10.43 करोड़, 8.6%, ~705; MP सर्वाधिक संख्या; लक्षद्वीप-मिज़ोरम सर्वाधिक प्रतिशत; 5 राज्य/UT में ST नहीं।
- वितरण — 5 क्षेत्र और उनकी संस्थाएँ (युवागृह, स्वशासन, धर्म, अर्थव्यवस्था)।
- बहस — घुर्ये (पिछड़े हिंदू) बनाम एल्विन (राष्ट्रीय उद्यान) → नेहरू का पंचशील; सातत्य (बेली, सिन्हा, बोस)।
- मानवशास्त्री — एस.सी. रॉय, अय्यर, मजूमदार, बोस, कर्वे, रॉय बर्मन, सच्चिदानंद, के.एस. सिंह, भौमिक (लोढ़ा)।
- अध्ययन — अपातानी कृषि; झारखंड के कारीगर।
- समस्याएँ — कुपोषण (~41% नाटापन), सिकल सेल; जनांकिकीय चुनौतियाँ (TFR 2.0, वृद्धावस्था, क्षेत्रीय असंतुलन)।
- राजनीति — लोकतांत्रिक संस्थाओं का प्रभाव; नृजातीयता बनाम नृजातीय पहचान; संघर्ष के कारक; नृजातीय-राष्ट्रवाद।