1. अध्याय एक नज़र में
Paper II का भाग 7-9 — जनजातीय नीतियाँ, विकास और संवैधानिक संरक्षण तथा मानवशास्त्र का अनुप्रयोग — सबसे "समसामयिक" भाग है। 2024 में PVTG के कल्याण उपाय, PESA और स्त्री-भागीदारी, 1878-2006 की वन-नीतियाँ, बिरसा मुंडा, ILO अभिसमय 169, छठी अनुसूची, जलवायु परिवर्तन, खनन के प्रभाव, कोविड-19 के बाद समग्र स्वास्थ्य और AI-आनुवंशिक शोध की नैतिकता पूछी गई; 2023 में औपनिवेशिक और उत्तर-औपनिवेशिक जनजातीय नीतियाँ, बाँध-विस्थापन और स्त्रियाँ, अनुसूचित क्षेत्र तथा PVTG की समस्याएँ।
- जनजातीय नीति का इतिहास — औपनिवेशिक और स्वतंत्रता के बाद।
- संवैधानिक संरक्षण — पाँचवीं और छठी अनुसूची, PESA, NCST, अंतर्राष्ट्रीय मानक (ILO 169, UNDRIP)।
- भूमि और वन — वन-नीतियाँ, वन अधिकार अधिनियम।
- PVTG — पहचान, समस्याएँ, PM-JANMAN।
- विकास परियोजनाएँ — बाँध, खनन, विस्थापन, पुनर्वास; जलवायु परिवर्तन।
- जनजातीय आंदोलन — बिरसा मुंडा; स्वास्थ्य; नैतिकता और मानवशास्त्र का अनुप्रयोग।
2. जनजातीय नीतियों का बदलता स्वरूप (UPSC 2023)
औपनिवेशिक काल
| नीति / क़ानून | वर्ष | प्रभाव |
|---|---|---|
| स्थायी बंदोबस्त; ज़मींदारी और साहूकार का प्रवेश | 1793 | सामुदायिक भूमि का निजीकरण; "दिकू" (बाहरी) शोषण → संथाल हूल (1855) |
| विल्किंसन नियम (कोल्हान) | 1837 | हो क्षेत्र में मानकी-मुंडा व्यवस्था द्वारा अप्रत्यक्ष शासन |
| भारतीय वन अधिनियम | 1865, 1878, 1927 | वनों पर राज्य का एकाधिकार; जनजातीय अधिकार "रियायत" बने |
| आपराधिक जनजाति अधिनियम | 1871 | अनेक घुमंतू समुदायों पर "जन्मजात अपराधी" का कलंक |
| बंगाल पूर्वी सीमांत विनियम — "इनर लाइन" | 1873 | पूर्वोत्तर के पहाड़ी क्षेत्रों में बाहरी प्रवेश पर प्रतिबंध (ILP आज भी) |
| अनुसूचित ज़िला अधिनियम | 1874 | जनजातीय क्षेत्रों में सामान्य क़ानूनों का सीमित विस्तार |
| छोटानागपुर काश्तकारी अधिनियम | 1908 | बिरसा आंदोलन के बाद — खुंटकट्टी अधिकार, जनजातीय भूमि-हस्तांतरण पर रोक |
| भारत शासन अधिनियम — "Excluded" और "Partially Excluded Areas" | 1919, 1935 | प्रांतीय विधानमंडल के अधिकार से बाहर, गवर्नर के अधीन — अलगाव नीति |
औपनिवेशिक नीति का सार — (1) राजस्व और वन-संसाधनों का दोहन; (2) "शांति-व्यवस्था" के लिए अलगाव और अप्रत्यक्ष शासन; (3) मिशनरी शिक्षा; (4) विद्रोहों के बाद सुरक्षात्मक क़ानून — "दमन + संरक्षण" की दोहरी नीति; (5) नृवंशवर्णन (रिज़ले, डाल्टन, हटन) का प्रशासनिक उपयोग।
स्वतंत्रता के बाद
- दृष्टि — अलगाव (एल्विन का प्रारंभिक मत) और आत्मसात्करण (घुर्ये) के बीच एकीकरण — नेहरू का पंचशील।
- संविधान — अनु. 15(4), 16(4), 46, 244 (पाँचवीं और छठी अनुसूची), 275(1) (अनुदान), 330, 332 (आरक्षण), 338A (NCST — 89वाँ संशोधन 2003), 339, 342।
- योजनाएँ और संस्थाएँ — बहुउद्देशीय जनजातीय विकास खंड (1954), ढेबर आयोग (1960-61), जनजातीय उप-योजना (TSP) — पाँचवीं पंचवर्षीय योजना (1974-75): ITDP/ITDA, MADA, क्लस्टर; जनजातीय कार्य मंत्रालय (1999); राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग (2004); अब TSP का नाम अनुसूचित जनजाति घटक / DAPST (Development Action Plan for STs)।
- अधिकार-आधारित क़ानून — PESA (1996), वन अधिकार अधिनियम (2006), भूमि अर्जन में उचित प्रतिकर (LARR) अधिनियम (2013 — ग्राम सभा सहमति, SIA)।
- प्रमुख न्यायिक निर्णय — समता (1997) — अनुसूचित क्षेत्रों में जनजातीय भूमि निजी कंपनियों को खनन हेतु पट्टे पर नहीं; ओडिशा खनन निगम (नियमगिरि, 2013) — ग्राम सभा को धार्मिक-सांस्कृतिक अधिकारों पर निर्णय का अधिकार।
- हाल की पहलें — एकलव्य मॉडल आवासीय विद्यालय, वन धन योजना (2018), PM-JANMAN (2023), धरती आबा जनजातीय ग्राम उत्कर्ष अभियान (2024 — लगभग 63,000 गाँव), जनजातीय गौरव दिवस (15 नवंबर, 2021 से)।
- मूल्यांकन — "बदलते भूभाग" — कल्याणकारी (welfare) → विकासात्मक (development) → अधिकार-आधारित (rights) → सशक्तिकरण और "गरिमा" दृष्टि; पर ज़ाक्सा समिति (2014) के अनुसार विस्थापन, भूमि-अलगाव, PESA-FRA का कमज़ोर क्रियान्वयन और स्वास्थ्य-शिक्षा की खाई बनी हुई।
3. संवैधानिक संरक्षण: पाँचवीं और छठी अनुसूची
अनुसूचित क्षेत्र — पाँचवीं अनुसूची (UPSC 2023)
- आधार — अनुच्छेद 244(1); राष्ट्रपति द्वारा "अनुसूचित क्षेत्र" घोषित (राज्यपाल से परामर्श के बाद); राज्य — 10 (आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, छत्तीसगढ़, गुजरात, हिमाचल प्रदेश, झारखंड, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, ओडिशा, राजस्थान)।
- मानदंड — जनजातीय जनसंख्या की प्रधानता, क्षेत्र की सघनता और उचित आकार, अविकसित प्रकृति, आर्थिक स्तर में स्पष्ट विषमता।
- राज्यपाल की विशेष शक्तियाँ — संसद/विधानमंडल के किसी क़ानून को अनुसूचित क्षेत्र में लागू न करने या संशोधन के साथ लागू करने का निर्देश; शांति और सुशासन के लिए विनियम — भूमि-हस्तांतरण पर रोक, भूमि-आवंटन, साहूकारी का नियमन (जैसे आंध्र प्रदेश अनुसूचित क्षेत्र भूमि हस्तांतरण विनियम 1959 — "1/70 विनियम"); राष्ट्रपति को वार्षिक रिपोर्ट।
- जनजाति सलाहकार परिषद (TAC) — अधिकतम 20 सदस्य, जिनमें तीन-चौथाई विधानसभा के ST सदस्य।
- समस्याएँ — राज्यपाल की शक्तियों का लगभग अप्रयोग, TAC की निष्क्रियता, कई जनजातीय बहुल गाँव अनुसूचित क्षेत्र से बाहर, PESA नियमों में देरी।
छठी अनुसूची की स्थिति (UPSC 2024)
- आधार — अनुच्छेद 244(2) और 275(1); असम, मेघालय, त्रिपुरा, मिज़ोरम के जनजातीय क्षेत्र; बोरदोलोई उप-समिति (संविधान सभा) की सिफ़ारिश।
- स्वायत्त ज़िला परिषदें (ADC) — कुल 10: असम — बोडोलैंड क्षेत्रीय परिषद, कार्बी आंगलोंग, दीमा हसाओ (उत्तरी कछार पहाड़ी); मेघालय — खासी, जयंतिया, गारो पहाड़ी; त्रिपुरा — TTAADC; मिज़ोरम — चकमा, लाई, मारा।
- संरचना और शक्तियाँ — अधिकतम 30 सदस्य (26 निर्वाचित, 4 राज्यपाल द्वारा नामित; BTC में 46); भूमि, वन (आरक्षित को छोड़कर), झूम, ग्राम प्रशासन, उत्तराधिकार, विवाह-तलाक़, सामाजिक प्रथाओं पर क़ानून; ग्राम परिषदें और न्यायालय (प्रथागत क़ानून); भू-राजस्व, कर, गैर-जनजातीय साहूकारी-व्यापार का नियमन; राज्यपाल के अनुमोदन से।
- वर्तमान स्थिति और मुद्दे — (1) वित्तीय निर्भरता — राज्य सरकार पर; (2) राज्य विधानमंडल और ADC के क्षेत्राधिकार में टकराव; (3) ADC के भीतर गैर-प्रमुख जनजातियों और गैर-जनजातियों का प्रतिनिधित्व; (4) स्त्रियों का कम प्रतिनिधित्व (प्रथागत संस्थाएँ); (5) पंचायती राज का अभाव — ग्राम-स्तर पर लोकतंत्र की कमी; (6) संविधान (125वाँ संशोधन) विधेयक, 2019 — ADC को अधिक शक्तियाँ, वित्त आयोग, ग्राम/नगर परिषदें, स्त्री आरक्षण — लंबित; (7) नई माँगें — लद्दाख (2019 से — 2025 के आंदोलन सहित), मणिपुर के पहाड़ी क्षेत्र, असम के अन्य समुदाय; (8) शांति समझौतों द्वारा विस्तार (BTR 2020)।
PESA और स्त्रियों की राजनीतिक भागीदारी (UPSC 2024)
- पृष्ठभूमि — 73वाँ संशोधन (1992) अनुसूचित क्षेत्रों पर स्वतः लागू नहीं (अनु. 243M); भूरिया समिति (1994-95) की सिफ़ारिश पर पंचायत (अनुसूचित क्षेत्रों पर विस्तार) अधिनियम, 1996।
- ग्राम सभा की शक्तियाँ — परंपरा, प्रथा, सांस्कृतिक पहचान, सामुदायिक संसाधन और विवाद-निपटान के प्रथागत ढंग की रक्षा; विकास योजनाओं की स्वीकृति और लाभार्थियों का चयन; भूमि-अधिग्रहण से पूर्व परामर्श; लघु वनोपज का स्वामित्व; लघु खनिजों के पट्टे की अनुशंसा; लघु जल-निकायों का प्रबंधन; मद्य-निषेध/नियमन; साहूकारी का नियंत्रण; ग्राम-बाज़ार का प्रबंधन; भूमि-हस्तांतरण रोकना।
- स्त्रियाँ — PESA में अध्यक्ष पद ST के लिए आरक्षित और कुल सीटों में कम से कम आधी ST के लिए; स्त्रियों के लिए कम से कम एक-तिहाई आरक्षण (73वें संशोधन से; कई राज्यों — झारखंड, मध्य प्रदेश, ओडिशा, छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र — में 50%)।
- सशक्तिकरण के प्रभाव — (1) जनजातीय स्त्रियाँ मुखिया/सरपंच के रूप में — जल, स्वास्थ्य, शराबबंदी, आँगनवाड़ी जैसे मुद्दे प्राथमिकता में; (2) ग्राम सभा में शराब-विरोधी और भूमि-रक्षा आंदोलनों का नेतृत्व; (3) SHG से जुड़कर आर्थिक और राजनीतिक आत्मविश्वास; (4) FRA दावों में स्त्रियों के नाम (संयुक्त पट्टे)।
- बाधाएँ — "मुखिया-पति/सरपंच-पति" प्रवृत्ति, पारंपरिक परिषदों में स्त्रियों का बहिष्कार (मानकी-मुंडा, माँझी पद पुरुष-वंशानुगत), निरक्षरता, घरेलू बोझ, हिंसा, ग्राम सभा की बैठकों में कम उपस्थिति; राज्यों द्वारा PESA नियमों में देरी (झारखंड में नियम लंबे समय तक लंबित रहे)।
ILO अभिसमय 169 (1989) (UPSC 2024)
- नाम — Indigenous and Tribal Peoples Convention, 1989 (No. 169); 1991 से प्रभावी।
- पूर्ववर्ती — ILO अभिसमय 107 (1957) — "एकीकरणवादी/आत्मसात्करणवादी" दृष्टि; भारत ने 1958 में 107 का अनुसमर्थन किया था।
- 169 के मुख्य सिद्धांत — (1) स्व-पहचान (self-identification) — मूल मानदंड; (2) अपनी संस्थाओं, संस्कृति और जीवन-शैली को बनाए रखने का अधिकार — "आत्मसात्करण" का परित्याग; (3) उन्हें प्रभावित करने वाले विधायी/प्रशासनिक उपायों पर परामर्श और भागीदारी (सद्भावपूर्ण, पूर्व परामर्श); (4) पारंपरिक भूमि और संसाधनों पर अधिकार; (5) प्रथागत क़ानून का सम्मान; (6) रोज़गार, स्वास्थ्य, शिक्षा में भेदभाव-निषेध; (7) विस्थापन केवल अपवादस्वरूप, स्वतंत्र और सूचित सहमति से।
- क्या भारत हस्ताक्षरकर्ता है? — नहीं। भारत ने अभिसमय 169 का अनुसमर्थन नहीं किया है (अनुसमर्थन करने वाले लगभग 24 देश, अधिकांश लैटिन अमेरिका के; एशिया में केवल नेपाल)। भारत अभी भी 107 से औपचारिक रूप से बँधा है। कारण — "सभी भारतीय मूलनिवासी हैं" का सरकारी मत, "indigenous" श्रेणी पर आपत्ति, भूमि-संसाधनों पर संप्रभु नियंत्रण की चिंता।
- संबंधित — UNDRIP (2007) — भारत ने पक्ष में मतदान किया, पर उसी आपत्ति के साथ।
4. वन-नीतियाँ, भूमि-अलगाव और अधिकार (UPSC 2024)
| नीति/क़ानून | मुख्य प्रावधान | जनजातियों पर प्रभाव |
|---|---|---|
| भारतीय वन अधिनियम 1878 | आरक्षित, संरक्षित, ग्राम वन; राज्य का स्वामित्व | पारंपरिक अधिकार "विशेषाधिकार/रियायत" में बदले; झूम पर रोक; वनोपज संग्रह अपराध |
| वन नीति 1894 | राजस्व और "सार्वजनिक हित" प्राथमिक; कृषि विस्तार को वरीयता | वनों की कटाई (रेलवे, सागौन), समुदायों का बहिष्कार |
| भारतीय वन अधिनियम 1927 | 1878 का समेकित रूप; वन-अपराध, पारगमन शुल्क | आज भी लागू; वन विभाग-जनजाति संघर्ष का आधार |
| राष्ट्रीय वन नीति 1952 | 33% वनावरण लक्ष्य; "राष्ट्रीय हित" में वन | स्थानीय अधिकार और गौण; औद्योगिक दोहन |
| वन्यजीव संरक्षण अधिनियम 1972 | राष्ट्रीय उद्यान, अभयारण्य | "fortress conservation" — विस्थापन |
| वन संरक्षण अधिनियम 1980 | गैर-वन उपयोग हेतु केंद्र की अनुमति | विकास परियोजनाओं पर नियंत्रण, पर जनजातीय बस्तियों के विकास में भी बाधा; 2023 संशोधन — "वन (संरक्षण एवं संवर्धन) अधिनियम" — कुछ भूमि को दायरे से बाहर करने पर चिंता |
| राष्ट्रीय वन नीति 1988 | पारिस्थितिक संतुलन प्राथमिक; जनजातियों के अधिकारों और भागीदारी का उल्लेख | संयुक्त वन प्रबंधन (JFM, 1990) — सहभागिता, पर नियंत्रण विभाग का |
| PESA 1996 | लघु वनोपज का स्वामित्व ग्राम सभा को | सशक्तिकरण की संभावना; क्रियान्वयन कमज़ोर |
| वन अधिकार अधिनियम (FRA) 2006 | "ऐतिहासिक अन्याय" की स्वीकृति; व्यक्तिगत (अधिकतम 4 हेक्टेयर), सामुदायिक, सामुदायिक वन संसाधन (CFR) अधिकार; कट-ऑफ़ 13 दिसंबर 2005; अन्य पारंपरिक वनवासियों के लिए 75 वर्ष (तीन पीढ़ी); ग्राम सभा — दावा-सत्यापन की प्रथम इकाई; PVTG के लिए "आवास" (habitat) अधिकार | भूमि-स्वामित्व और गरिमा; मेंढा-लेखा (गढ़चिरौली) — बाँस पर CFR अधिकार; पर बड़ी संख्या में दावे अस्वीकृत, CFR का कम कार्यान्वयन; फ़रवरी 2019 में सर्वोच्च न्यायालय का बेदख़ली आदेश (बाद में स्थगित) |
समग्र प्रभाव — भूमि-अलगाव और अधिकार-वंचना — (1) औपनिवेशिक-उत्तर-औपनिवेशिक दोनों कालों में वन "राज्य की संपत्ति" बने और जनजातियाँ "अतिक्रमणकारी"; (2) संरक्षित क्षेत्रों और परियोजनाओं से विस्थापन; (3) वनोपज पर बिचौलियों का नियंत्रण; (4) झूम का अपराधीकरण; (5) प्रतिरोध — जंगल सत्याग्रह, चिपको, झारखंड वन आंदोलन; (6) FRA "सुधारात्मक न्याय" का प्रतीक, पर नौकरशाही-प्रतिरोध और संरक्षण-विकास की प्राथमिकताएँ बाधा।
5. विशेष रूप से कमज़ोर जनजातीय समूह (PVTG)
- इतिहास — ढेबर आयोग (1960-61) ने जनजातियों में भी असमानता पहचानी; पाँचवीं पंचवर्षीय योजना (1973-75) में "आदिम जनजातीय समूह (PTG)" श्रेणी; 2006 में नाम बदलकर PVTG।
- मानदंड — (1) पूर्व-कृषि स्तर की तकनीक, (2) स्थिर या घटती जनसंख्या, (3) अत्यंत कम साक्षरता, (4) जीविका-स्तर की अर्थव्यवस्था।
- संख्या — 75 समूह, 18 राज्यों और अंडमान-निकोबार में; सर्वाधिक ओडिशा (13); उदाहरण — असुर, बिरहोर, पहाड़िया (झारखंड), बोंडा, डोंगरिया कोंध, जुआंग, लांजिया सौरा (ओडिशा), बैगा, सहरिया, भारिया (म.प्र.), कातकरी, कोलाम, माड़िया गोंड (महाराष्ट्र), चेंचू (आंध्र-तेलंगाना), टोडा, कोटा, कुरुंबा, इरुला (तमिलनाडु), कादर, चोलानायकन (केरल), जारवा, ओंगे, सेंटिनली, ग्रेट अंडमानी, शोम्पेन (अंडमान-निकोबार), लोढ़ा (प. बंगाल)।
"PTG" नाम त्रुटिपूर्ण क्यों था? (UPSC 2024)
- "आदिम" (primitive) शब्द विकासवादी पूर्वाग्रह वाला और अपमानजनक — मानो उनकी संस्कृति "निचली अवस्था" में रुकी हो (टायलर-मॉर्गन के एकरेखीय क्रम की छाया)।
- उनकी वास्तविक समस्या "आदिमता" नहीं, "भेद्यता" (vulnerability) है — जनसंख्या-ह्रास, स्वास्थ्य संकट, संसाधन-वंचना, विस्थापन — जो ऐतिहासिक-राजनीतिक कारणों से उत्पन्न।
- उनकी परिष्कृत पारिस्थितिक ज्ञान-प्रणालियाँ (जैसे जारवा का वन-ज्ञान, डोंगरिया कोंध की बहु-फ़सली खेती) "आदिम" नहीं हैं।
- सांस्कृतिक सापेक्षवाद और मानवाधिकार-दृष्टि — कोई संस्कृति "कम विकसित" नहीं, अतः 2006 का नाम-परिवर्तन मानवशास्त्रीय दृष्टि का स्वीकार।
PVTG की समस्याएँ और विशेष कार्यक्रमों की चुनौतियाँ (UPSC 2023)
- समस्याएँ — (1) जनसंख्या-ह्रास — कुछ समूहों की संख्या बहुत कम (ग्रेट अंडमानी, ओंगे); (2) स्वास्थ्य — कुपोषण, एनीमिया, मलेरिया, क्षय रोग, सिकल सेल, उच्च शिशु-मातृ मृत्यु; बाहरी संपर्क से नए रोग (जारवा — 1999 और 2006 में खसरा प्रकोप); (3) आजीविका — शिकार-संग्रह पर प्रतिबंध, वनोपज का गिरता मूल्य, भूमिहीनता; (4) विस्थापन — संरक्षित क्षेत्र (बैगा — कान्हा), खनन (डोंगरिया कोंध — नियमगिरि), परियोजनाएँ (शोम्पेन — ग्रेट निकोबार परियोजना पर चिंता); (5) शिक्षा — भाषा-अवरोध, विद्यालयों की दूरी; (6) पहचान और कलंक (लोढ़ा, सहरिया); (7) बाहरी शोषण — पर्यटन ("मानव सफ़ारी" — जारवा, अंडमान ट्रंक रोड), बिचौलिये, शराब।
- कार्यक्रम-निर्माण की चुनौतियाँ — (1) विविधता — 75 समूहों की भिन्न आवश्यकताएँ, "one size fits all" अनुपयुक्त; (2) अलगाव बनाम एकीकरण की दुविधा — विशेषकर अंडमान के समूहों के लिए (सेंटिनली — "eyes-on, hands-off"); (3) डेटा का अभाव — PVTG-विशिष्ट जनगणना/स्वास्थ्य आँकड़े कम; (4) दूरस्थता और बिखरी बस्तियाँ — सेवा-वितरण महँगा; (5) सांस्कृतिक संवेदनशीलता — आवास, आहार, स्वास्थ्य-योजनाएँ उनकी जीवन-शैली के प्रतिकूल; (6) सहभागिता — समुदाय की राय के बिना ऊपर से थोपी योजनाएँ; (7) विभागीय समन्वय और निधि-उपयोग; (8) "आवास अधिकार" (habitat rights) — FRA के अंतर्गत बहुत कम मान्यता (बैगा — डिंडोरी, 2015-16 में प्रथम)।
PVTG के लिए हाल के कल्याण उपाय (UPSC 2024)
- PM-JANMAN (प्रधानमंत्री जनजाति आदिवासी न्याय महा अभियान) — 15 नवंबर 2023 (जनजातीय गौरव दिवस) को आरंभ; लगभग ₹24,000 करोड़; 9 मंत्रालयों द्वारा 11 महत्वपूर्ण हस्तक्षेप — पक्के मकान (PMAY-G), सड़क संपर्क, नल-जल, बिजली (सौर सहित), मोबाइल चिकित्सा इकाइयाँ, छात्रावास, आँगनवाड़ी, बहुउद्देशीय केंद्र, वन धन विकास केंद्र, मोबाइल टावर, व्यावसायिक शिक्षा; आधार, जन धन, आयुष्मान कार्ड, राशन कार्ड जैसे दस्तावेज़ों की संतृप्ति (saturation) हेतु शिविर।
- PVTG विकास योजना (2008 से "संरक्षण-सह-विकास" — CCD योजनाएँ); राष्ट्रीय सिकल सेल एनीमिया उन्मूलन मिशन (2023); एकलव्य विद्यालय; धरती आबा जनजातीय ग्राम उत्कर्ष अभियान (2024)।
- मूल्यांकन — बुनियादी ढाँचे और दस्तावेज़-संतृप्ति पर ज़ोर स्वागतयोग्य; पर भूमि-वन अधिकार, सांस्कृतिक संरक्षण, भाषा-आधारित शिक्षा और समुदाय-नेतृत्व पर कम ध्यान; "पक्के मकान" और सड़कें हमेशा उनकी प्राथमिकता नहीं — सहभागी नियोजन आवश्यक।
6. विकास परियोजनाएँ और उनके प्रभाव
विस्थापन: आँकड़े और ढाँचा
- वाल्टर फ़र्नांडिस का अनुमान — 1947-2004 के बीच विकास परियोजनाओं से लगभग 6 करोड़ लोग विस्थापित/प्रभावित, जिनमें लगभग 40% जनजातीय (जबकि जनसंख्या में हिस्सा ~8%); अधिकांश का पुनर्वास नहीं।
- माइकल सर्निया का IRR मॉडल (Impoverishment Risks and Reconstruction, 1990 का दशक) — विस्थापन के 8 जोखिम: भूमिहीनता, बेरोज़गारी, बेघरी, हाशियाकरण, खाद्य असुरक्षा, बढ़ी रुग्णता-मृत्यु, सामुदायिक संसाधनों तक पहुँच का नुक़सान, सामाजिक विघटन।
- क़ानून — LARR अधिनियम 2013 — सामाजिक प्रभाव आकलन (SIA), अनुसूचित क्षेत्रों में ग्राम सभा की सहमति, पुनर्वास-पुनर्स्थापन पैकेज; राष्ट्रीय पुनर्वास नीति 2007।
बाँध-विस्थापन का स्त्रियों पर प्रभाव (UPSC 2023)
- प्रमुख परियोजनाएँ — हीराकुद (ओडिशा, 1957), भाखड़ा, सरदार सरोवर (नर्मदा — नर्मदा बचाओ आंदोलन, मेधा पाटकर, 1985 से), टिहरी, पोलावरम (कोया, कोंडा रेड्डी), इंदिरा सागर; कोयल-कारो (झारखंड — जन-प्रतिरोध से रुकी; 2001 का तपकरा गोलीकांड)।
- स्त्रियों पर विशिष्ट प्रभाव — (1) सामुदायिक संसाधनों का नुक़सान — ईंधन, चारा, जल, लघु वनोपज, औषधीय पौधे — जो स्त्रियों की आय और घरेलू अर्थव्यवस्था का आधार थे; (2) प्रतिकर "परिवार के मुखिया" (पुरुष) को — स्त्रियों (विशेषकर विधवाओं, अविवाहित बेटियों) का बहिष्कार; नक़द प्रतिकर शराब और उपभोग में व्यय; (3) आर्थिक स्वायत्तता का नुक़सान — स्वतंत्र किसान/संग्राहक से दिहाड़ी मज़दूर या आश्रित गृहिणी; (4) सामाजिक नेटवर्क का विघटन — मायके-ससुराल, सहेलियाँ, पारस्परिक सहायता; (5) स्वास्थ्य — कुपोषण, मानसिक तनाव, पुनर्वास कॉलोनियों में असुरक्षित प्रसव; (6) घरेलू हिंसा और मद्यपान में वृद्धि; (7) तस्करी और यौन शोषण का ख़तरा; (8) सांस्कृतिक-धार्मिक हानि — पवित्र स्थल, पूर्वज-स्थल (ससनदिरी) डूबना; (9) शिक्षा — लड़कियों का विद्यालय छूटना।
- नृवंशवर्णनात्मक उदाहरण — सरदार सरोवर के भील-भिलाला विस्थापित (अमिता बाविस्कर — In the Belly of the River, 1995); हीराकुद के विस्थापित; प्रतिरोध में स्त्रियों का नेतृत्व — NBA में "जल समर्पण" सत्याग्रह, कोयल-कारो में स्त्रियाँ।
- समाधान — स्त्रियों के नाम संयुक्त/स्वतंत्र भूमि-आवंटन, लिंग-संवेदी SIA, आजीविका-आधारित पुनर्वास, सामुदायिक पुनर्वास (गाँव साथ बसाना)।
खनन का जनजातीय समुदायों पर प्रभाव (UPSC 2024)
- संदर्भ — भारत के अधिकांश खनिज भंडार (कोयला, लौह-अयस्क, बॉक्साइट, अभ्रक) झारखंड, ओडिशा, छत्तीसगढ़, म.प्र. की जनजातीय पट्टी में — "संसाधन अभिशाप" (resource curse)।
- आर्थिक प्रभाव — भूमि और वन-आधारित आजीविका का नुक़सान; अकुशल/अनुबंध मज़दूरी, रोज़गार में स्थानीय लोगों की कम हिस्सेदारी; बाहरी लोगों के आगमन से भूमि-मूल्य और बाज़ार पर उनका नियंत्रण; राजस्व का बहिर्गमन।
- सामाजिक प्रभाव — विस्थापन, संयुक्त परिवार-समुदाय विघटन, शराब और देह-व्यापार, बाहरी जनसंख्या से जनसांख्यिकीय परिवर्तन, संस्कृति और भाषा का क्षरण, पवित्र भूदृश्य (नियमगिरि — नियम राजा) का अपवित्रीकरण।
- स्वास्थ्य-पर्यावरणीय प्रभाव — वायु-जल प्रदूषण, सिलिकोसिस, क्षय रोग, फ़्लोराइड/भारी धातुएँ; झरिया की भूमिगत आग; जल-स्रोतों का सूखना।
- विकासात्मक-राजनीतिक प्रभाव — कुछ सड़कें, विद्यालय, अस्पताल; पर असमान विकास; प्रतिरोध और राज्य-दमन; वामपंथी उग्रवाद को उर्वर भूमि (योजना आयोग की विशेषज्ञ समिति, 2008 — "Development Challenges in Extremist Affected Areas")।
- नीतिगत उपाय — समता निर्णय (1997), नियमगिरि (2013), ज़िला खनिज फ़ाउंडेशन (DMF) — खान और खनिज (संशोधन) अधिनियम 2015; PMKKKY (2015); PESA-FRA के अंतर्गत ग्राम सभा सहमति; खनन-पश्चात पुनर्स्थापन; सामुदायिक स्वामित्व वाले मॉडल (समता निर्णय का "सहकारी खनन" सुझाव)।
- उदाहरण — नियमगिरि (डोंगरिया कोंध — 12 ग्राम सभाओं ने वेदांता परियोजना अस्वीकार की, 2013), हसदेव अरण्य (छत्तीसगढ़ — कोयला खनन विरोध), झारखंड के कोयला क्षेत्र, बैलाडीला (बस्तर — लौह अयस्क)।
जलवायु परिवर्तन और जनजातियाँ (UPSC 2024)
- विरोधाभास — जनजातियाँ प्राकृतिक संसाधनों की संरक्षक (पवित्र उपवन, सतत कृषि, कम कार्बन-पदचिह्न) हैं, पर जलवायु संकट और "हरित विकास" — दोनों का सबसे अधिक बोझ उन्हीं पर।
- प्रभाव — (1) अनियमित मानसून, सूखा-बाढ़ — वर्षा-आधारित कृषि और झूम-चक्र पर असर; (2) लघु वनोपज (महुआ, तेंदू, साल-बीज) के फूलने-फलने के समय में परिवर्तन, उत्पादन में कमी; (3) वनाग्नि में वृद्धि; (4) हिमालयी जनजातियों पर हिमनद-पिघलन, भूस्खलन, जल-स्रोत सूखना; (5) अंडमान-लक्षद्वीप के समुदायों पर समुद्र-स्तर वृद्धि, प्रवाल-क्षरण, चक्रवात; (6) स्वास्थ्य — गर्मी की लहरें, मलेरिया-डेंगू का प्रसार, कुपोषण; (7) प्रवासन और श्रम-शोषण; (8) "हरित परियोजनाओं" (प्रतिपूरक वनीकरण — CAMPA, बड़े सौर/जल-विद्युत, कार्बन-ऑफ़सेट) से भूमि-अधिग्रहण — "climate injustice"।
- अनुकूलन में पारंपरिक ज्ञान — मोटे अनाज और बीज-विविधता, अपातानी जल-प्रबंधन, खासी जीवित-जड़ पुल, जनजातीय मौसम-पूर्वानुमान ज्ञान, समुदाय-आधारित वन-प्रबंधन (CFR — मेंढा-लेखा)।
- नीति — राष्ट्रीय जलवायु परिवर्तन कार्य योजना (NAPCC, 2008) — राष्ट्रीय हरित भारत मिशन; राज्य कार्य योजनाएँ; मिशन LiFE (2022); FRA-आधारित सामुदायिक वन संरक्षण को जलवायु-नीति से जोड़ना; जलवायु-वित्त में जनजातीय भागीदारी।
7. जनजातीय आंदोलन और बिरसा मुंडा
| आंदोलन | वर्ष | क्षेत्र/नेता |
|---|---|---|
| पहाड़िया विद्रोह | 1770-80 का दशक | राजमहल पहाड़ियाँ — तिलका माँझी (1784-85) |
| कोल विद्रोह | 1831-32 | छोटानागपुर — बुद्धो भगत |
| संथाल हूल | 1855-56 | सिद्धो-कान्हू, चाँद-भैरव, फूलो-झानो |
| सरदारी लड़ाई (मुल्की लड़ाई) | 1858-95 | छोटानागपुर — भूमि-अधिकार हेतु |
| बिरसा उलगुलान | 1895-1900 | मुंडा क्षेत्र — बिरसा मुंडा |
| ताना भगत आंदोलन | 1914 से | उराँव — जात्रा भगत; बाद में गांधीवादी |
| रम्पा विद्रोह | 1922-24 | आंध्र — अल्लूरी सीताराम राजू |
| नागा आंदोलन | 1920 का दशक से | रानी गाइदिन्ल्यू (हेराका), ए.ज़ेड. फ़िज़ो |
| झारखंड आंदोलन | 1930 का दशक से | जयपाल सिंह मुंडा; राज्य 2000 |
के.एस. सिंह का वर्गीकरण — (1) कृषि-संबंधी (भूमि), (2) वन-आधारित, (3) नृजातीय-राजनीतिक (स्वायत्तता), (4) सांस्कृतिक-धार्मिक (सुधार/पुनरुत्थान); सुरजीत सिन्हा — "सहस्राब्दवादी" (millenarian) आंदोलन।
बिरसा मुंडा: जीवन और प्रभाव (UPSC 2024)
- जन्म — 15 नवंबर 1875, उलिहातु (खूँटी, झारखंड); निर्धन मुंडा परिवार; चाईबासा के मिशनरी विद्यालय में शिक्षा, ईसाई धर्म अपनाया — फिर छोड़ा; वैष्णव साधु आनंद पांडे के संपर्क में आकर शाकाहार, जनेऊ, पवित्रता के विचार।
- धार्मिक सुधारक — "बिरसाइत" पंथ — एकेश्वरवाद (सिंगबोंगा), मद्य-निषेध, बलि-निषेध, स्वच्छता, अंधविश्वास और जादू-टोने का विरोध; स्वयं को ईश्वर का दूत घोषित — "धरती आबा" (पृथ्वी के पिता)।
- राजनीतिक संघर्ष — "दिकू" (ज़मींदार, ठेकेदार, साहूकार), ब्रिटिश सत्ता और मिशनरियों के विरुद्ध; खुंटकट्टी भूमि-अधिकारों की पुनर्स्थापना, बेगार का अंत; लक्ष्य — "अबुआ दिशुम, अबुआ राज" (हमारा देश, हमारा राज); 1895 में गिरफ़्तारी और दो वर्ष कारावास; 1899 के क्रिसमस से उलगुलान (महाविद्रोह) — थानों, चर्चों पर आक्रमण; जनवरी 1900 में डोंबारी बुरु पहाड़ी पर ब्रिटिश सेना से संघर्ष (अनेक मुंडा स्त्री-पुरुष मारे गए)।
- मृत्यु — फ़रवरी 1900 में गिरफ़्तार; 9 जून 1900 को राँची जेल में मृत्यु (25 वर्ष की आयु)।
- प्रभाव — (1) छोटानागपुर काश्तकारी अधिनियम 1908 — जनजातीय भूमि-हस्तांतरण पर रोक, खुंटकट्टी अधिकारों की मान्यता; (2) बेगार-प्रथा पर अंकुश; (3) जनजातीय पहचान, आत्मसम्मान और राजनीतिक चेतना का प्रतीक — झारखंड आंदोलन की प्रेरणा; (4) बिरसाइत पंथ आज भी जीवित; (5) झारखंड राज्य का गठन उनकी जयंती (15 नवंबर 2000) पर; (6) जनजातीय गौरव दिवस (2021 से 15 नवंबर); 2025 में 150वीं जयंती; संसद भवन में चित्र; (7) सामाजिक सुधार — मद्य-निषेध, स्वच्छता की परंपरा; (8) के.एस. सिंह — "Dust-Storm and the Hanging Mist" (1966) में अध्ययन, महाश्वेता देवी — "अरण्येर अधिकार" (1977)।
8. स्वास्थ्य, नैतिकता और मानवशास्त्र का अनुप्रयोग
कोविड-19 के बाद हाशिये के वर्गों के लिए समग्र स्वास्थ्य (UPSC 2024)
- समग्र स्वास्थ्य — WHO (1948): "केवल रोग की अनुपस्थिति नहीं, बल्कि पूर्ण शारीरिक, मानसिक और सामाजिक कल्याण"; मानवशास्त्र — चिकित्सा बहुलवाद (आधुनिक, आयुष, लोक-चिकित्सक), "illness" (अनुभव) बनाम "disease" (जैविक) — आर्थर क्लाइनमैन; स्वास्थ्य के सामाजिक निर्धारक।
- कोविड-19 से सबक — (1) असमान प्रभाव — प्रवासी मज़दूरों का पलायन (मार्च-मई 2020), खाद्य असुरक्षा, आजीविका-हानि; (2) जनजातीय क्षेत्रों में स्वास्थ्य ढाँचे की कमी; (3) टीका-संकोच — अफ़वाहें, अविश्वास, भाषा-अवरोध — जिसे स्थानीय नेताओं, पारंपरिक चिकित्सकों और स्थानीय भाषा के संदेशों से दूर किया गया; (4) डिजिटल विभाजन — CoWIN पंजीकरण, ऑनलाइन शिक्षा; (5) मानसिक स्वास्थ्य संकट; (6) सामुदायिक लचीलापन — कई जनजातीय गाँवों ने स्व-संगरोध (ग्राम सभा निर्णय), पारंपरिक खाद्य-भंडार और पारस्परिक सहायता से सामना किया; (7) ASHA और आँगनवाड़ी कार्यकर्ताओं की निर्णायक भूमिका।
- मौजूदा प्रतिमान और उनकी आलोचना — (1) जैव-चिकित्सीय (biomedical) प्रतिमान — अस्पताल-केंद्रित, सांस्कृतिक संदर्भ की उपेक्षा; (2) आयुष्मान भारत (PM-JAY और आयुष्मान आरोग्य मंदिर) — बीमा-आधारित पहुँच, पर दूरस्थ क्षेत्रों में अस्पतालों का अभाव; (3) समुदाय-आधारित मॉडल — SEARCH (गढ़चिरौली — अभय और रानी बंग), जन स्वास्थ्य सहयोग (छत्तीसगढ़), ASHA; (4) जनजातीय स्वास्थ्य पर विशेषज्ञ समिति (अभय बंग, 2018) — जनजातीय स्वास्थ्य के लिए अलग रणनीति, बजट, जनजातीय स्वास्थ्य परिषद की सिफ़ारिश।
- आगे का मार्ग — स्वास्थ्य को पोषण, जल, आजीविका, भूमि-वन अधिकार और मानसिक कल्याण से जोड़ना; पारंपरिक चिकित्सकों का प्रशिक्षण और समावेश; स्थानीय भाषा; डेटा-संग्रह; "One Health" (मानव-पशु-पर्यावरण)।
AI और आनुवंशिक शोध के युग में नैतिक चिंताएँ (UPSC 2024)
| क्षेत्र | नैतिक चिंताएँ |
|---|---|
| जैविक मानवशास्त्र / आनुवंशिकी | (1) सूचित सहमति — जटिल शोध को समझाना, "व्यापक सहमति" (broad consent) की समस्या; (2) नमूनों का द्वितीयक उपयोग — Havasupai मामला (अमेरिका, 2004-2010 — मधुमेह शोध के नमूनों का प्रवासन और अंतःप्रजनन पर उपयोग); (3) डेटा स्वामित्व और संप्रभुता — स्वदेशी समुदायों का अपने आनुवंशिक डेटा पर अधिकार (CARE सिद्धांत, 2019 — Collective benefit, Authority to control, Responsibility, Ethics); (4) लाभ-साझेदारी; (5) प्रजातीय निर्धारणवाद की वापसी का ख़तरा; (6) प्राचीन DNA — पूर्वज-अवशेषों का सम्मान, राजनीतिक दुरुपयोग; (7) जीन-संपादन (CRISPR) और "designer babies" |
| सामाजिक-सांस्कृतिक मानवशास्त्र / AI | (1) एल्गोरिदमिक पूर्वाग्रह — प्रशिक्षण-डेटा में हाशिये के समुदायों का कम/विकृत प्रतिनिधित्व; (2) निगरानी — चेहरा-पहचान, सामाजिक मीडिया डेटा से समुदायों की प्रोफ़ाइलिंग; (3) गोपनीयता — ऑनलाइन नृवंशवर्णन में पहचान उजागर होना; (4) सांस्कृतिक विनियोग — AI द्वारा जनजातीय कला, संगीत, भाषा की नक़ल; (5) डीपफ़ेक और ग़लत सूचना; (6) शोध में AI-जनित विश्लेषण की विश्वसनीयता और लेखकत्व; (7) डिजिटल विभाजन — AI-आधारित सेवाओं से वंचना |
| नियामक ढाँचा | ICMR राष्ट्रीय नैतिक दिशानिर्देश (2017), ICMR — स्वास्थ्य में AI के नैतिक दिशानिर्देश (2023), डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण अधिनियम (2023), जैव-विविधता अधिनियम (2002) — पहुँच और लाभ-साझेदारी, जीनोम इंडिया परियोजना की डेटा-नीति; अमेरिकी मानवशास्त्र संघ (AAA) का नैतिक कोड |
9. Master Summary Table
| विषय | मुख्य तथ्य | याद रखें |
|---|---|---|
| औपनिवेशिक नीति | वन अधिनियम 1878, CTA 1871, इनर लाइन 1873, CNT 1908, 1935 Excluded Areas | दमन + संरक्षण |
| उत्तर-औपनिवेशिक | पंचशील, TSP 1974-75, MoTA 1999, NCST 2004 | कल्याण → अधिकार |
| पाँचवीं अनुसूची | अनु. 244(1); 10 राज्य; राज्यपाल, TAC | समता 1997 |
| छठी अनुसूची | अनु. 244(2); 4 राज्य; 10 ADC | 125वाँ संशोधन विधेयक 2019 |
| PESA | 1996, भूरिया समिति; ग्राम सभा सर्वोच्च | लघु वनोपज स्वामित्व |
| FRA | 2006; 4 हेक्टेयर; CFR; कट-ऑफ़ 13.12.2005 | मेंढा-लेखा |
| ILO | 107 (1957, भारत ने अनुसमर्थित) → 169 (1989, भारत नहीं) | स्व-पहचान, परामर्श |
| PVTG | ढेबर 1960-61; PTG 1975; PVTG 2006; 75 समूह | PM-JANMAN 2023 |
| विस्थापन | ~6 करोड़ (फ़र्नांडिस), 40% जनजातीय; सर्निया IRR | LARR 2013 |
| खनन | संसाधन अभिशाप; DMF 2015 | नियमगिरि 2013 |
| बिरसा मुंडा | 1875-1900; उलगुलान; धरती आबा | CNT 1908; गौरव दिवस 15 नवंबर |
| स्वास्थ्य | चिकित्सा बहुलवाद; अभय बंग समिति 2018 | कोविड — सामुदायिक लचीलापन |
| नैतिकता | Havasupai; CARE सिद्धांत; DPDP 2023 | सहमति, डेटा संप्रभुता |
10. चार्ट: जनजातीय नीति का विकास-क्रम
11. Mind Map
- औपनिवेशिक क़ानून
- पंचशील, TSP
- अधिकार-आधारित
- 5वीं, 6ठी अनुसूची
- PESA, NCST
- ILO 169, UNDRIP
- 1878 से 2006
- FRA, CFR
- 75 समूह
- "PTG" की आलोचना
- PM-JANMAN
- बाँध, खनन
- जलवायु
- बिरसा, स्वास्थ्य, नैतिकता
12. महत्वपूर्ण One-liners
- भारतीय वन अधिनियम — 1865, 1878, 1927; राष्ट्रीय वन नीतियाँ — 1894, 1952, 1988।
- वन अधिकार अधिनियम — 2006; कट-ऑफ़ तिथि 13 दिसंबर 2005; व्यक्तिगत सीमा 4 हेक्टेयर।
- PESA — 1996 (भूरिया समिति); 10 पाँचवीं अनुसूची राज्य।
- छठी अनुसूची — असम, मेघालय, त्रिपुरा, मिज़ोरम; 10 ADC।
- समता निर्णय — 1997; नियमगिरि निर्णय — 2013।
- ILO 107 — 1957 (भारत ने 1958 में अनुसमर्थन किया); ILO 169 — 1989 (भारत ने अनुसमर्थन नहीं किया)।
- PTG → PVTG नाम-परिवर्तन — 2006; कुल 75; सर्वाधिक ओडिशा (13)।
- PM-JANMAN — 15 नवंबर 2023; 11 हस्तक्षेप, 9 मंत्रालय।
- बिरसा मुंडा — जन्म 15 नवंबर 1875 (उलिहातु), मृत्यु 9 जून 1900 (राँची जेल)।
- जनजातीय स्वास्थ्य विशेषज्ञ समिति — अभय बंग (रिपोर्ट 2018)।
13. टिप्स एवं ट्रिक्स
- ढाँचा — संवैधानिक/क़ानूनी प्रावधान → क्रियान्वयन → मानवशास्त्रीय मूल्यांकन (क्षेत्र-उदाहरण) → सुझाव।
- हर उत्तर में कम से कम एक न्यायिक निर्णय (समता, नियमगिरि) और एक नवीनतम योजना (PM-JANMAN, धरती आबा) जोड़ें।
- स्त्री, पर्यावरण और स्वास्थ्य — तीन "cross-cutting" दृष्टियाँ उत्तर को समृद्ध बनाती हैं।
PVTG के 4 मानदंड — "पूर्व-कृषि तकनीक, घटती जनसंख्या, कम साक्षरता, जीविका अर्थव्यवस्था"; छठी अनुसूची राज्य — "AMTM" (Assam, Meghalaya, Tripura, Mizoram)।
- भारत ने ILO 169 पर हस्ताक्षर/अनुसमर्थन नहीं किया है — यह कई उत्तरों में ग़लत लिखा जाता है।
- PESA पाँचवीं अनुसूची क्षेत्रों के लिए है, छठी अनुसूची के लिए नहीं।
14. PYQ-आधारित प्रश्न एवं मॉडल उत्तर
1878 से 2006 तक की वन-नीतियों के जनजातीय समुदायों के भूमि-अलगाव और अधिकार-वंचना पर प्रभाव का परीक्षण कीजिए।
मॉडल उत्तर (रूपरेखा)
भूमिका: जनजातियों का जीवन वन से अविभाज्य है; औपनिवेशिक काल से वन-नीतियों ने वन को "राज्य की संपत्ति" और जनजातियों को "अतिक्रमणकारी" बना दिया।
औपनिवेशिक चरण: 1878 अधिनियम — आरक्षित/संरक्षित वन, अधिकार "रियायत"; 1894 नीति — राजस्व-प्राथमिकता; 1927 अधिनियम — वन-अपराध; झूम पर रोक, बेगार, वनोपज पर कर → विद्रोह (बिरसा, रम्पा)।
स्वतंत्रता के बाद: 1952 नीति — "राष्ट्रीय हित"; 1972 वन्यजीव अधिनियम — संरक्षित क्षेत्रों से विस्थापन; 1980 FCA — केंद्रीकृत नियंत्रण; 1988 नीति — अधिकारों की स्वीकृति, JFM — सीमित सहभागिता।
सुधारात्मक चरण: PESA 1996 (लघु वनोपज स्वामित्व), FRA 2006 — "ऐतिहासिक अन्याय" की स्वीकृति; व्यक्तिगत, सामुदायिक, CFR, आवास अधिकार; ग्राम सभा की भूमिका।
प्रभाव: भूमिहीनता, वनोपज पर बिचौलियों का नियंत्रण, सांस्कृतिक-पवित्र भूदृश्य का नुक़सान, विस्थापन, विभाग-समुदाय संघर्ष; FRA के बाद भी दावों की अस्वीकृति, CFR का कम क्रियान्वयन, 2019 बेदख़ली आदेश विवाद, 2023 के FCA संशोधन पर चिंताएँ।
उदाहरण: मेंढा-लेखा (CFR सफलता), बैगा आवास अधिकार, सिमलीपाल-कान्हा से विस्थापन।
निष्कर्ष: 1878-2006 की यात्रा "दोहन से अधिकार" की है, पर क़ानूनी अधिकारों को वास्तविक स्वामित्व में बदलना अभी शेष है — "समुदाय-आधारित संरक्षण" ही आगे का मार्ग।
विशेष रूप से कमज़ोर जनजातीय समूहों (PVTG) के लिए सरकार द्वारा आरंभ किए गए हाल के कल्याण उपायों की आलोचनात्मक विवेचना कीजिए। PVTG को त्रुटिपूर्ण रूप से "आदिम जनजातीय समूह" (PTG) क्यों कहा जाता था, टिप्पणी कीजिए।
मॉडल उत्तर (रूपरेखा)
भूमिका: ढेबर आयोग (1960-61) के बाद 1975 में PTG श्रेणी, 2006 में नाम PVTG; 75 समूह; मानदंड — पूर्व-कृषि तकनीक, घटती जनसंख्या, कम साक्षरता, जीविका-अर्थव्यवस्था।
हाल के उपाय: PM-JANMAN (2023) — 11 हस्तक्षेप (आवास, सड़क, जल, बिजली, मोबाइल चिकित्सा, छात्रावास, आँगनवाड़ी, वन धन, मोबाइल टावर, व्यावसायिक प्रशिक्षण) और दस्तावेज़-संतृप्ति; CCD योजनाएँ; सिकल सेल मिशन; एकलव्य विद्यालय; धरती आबा अभियान।
आलोचनात्मक मूल्यांकन: सकारात्मक — मिशन-मोड, अभिसरण, समय-सीमा; सीमाएँ — बुनियादी ढाँचा-केंद्रित, भूमि-वन (FRA आवास अधिकार) पर कम ध्यान; सांस्कृतिक रूप से अनुपयुक्त आवास/आहार; अलग-थलग समूहों (अंडमान) पर संपर्क के ख़तरे; डेटा और निगरानी की कमी; समुदाय की सहभागिता कम; ग्रेट निकोबार जैसी परियोजनाओं से विरोधाभास।
"PTG" त्रुटिपूर्ण क्यों: "आदिम" शब्द विकासवादी, अपमानजनक; समस्या "आदिमता" नहीं, "भेद्यता" (ऐतिहासिक वंचना); उनकी ज्ञान-प्रणालियाँ परिष्कृत; सांस्कृतिक सापेक्षवाद — 2006 का नाम-परिवर्तन मानवशास्त्रीय दृष्टि का स्वीकार।
निष्कर्ष: PVTG कल्याण को "सुविधाओं की संतृप्ति" से आगे बढ़ाकर "अधिकार, संस्कृति और स्वायत्तता" के ढाँचे में ढालना आवश्यक है — नेहरू के पंचशील की भावना यही है।
PESA अधिनियम स्थानीय स्वशासन को किस प्रकार सशक्त बना रहा है और स्त्रियों की राजनीतिक भागीदारी को कैसे प्रभावित कर रहा है?
मॉडल उत्तर (रूपरेखा)
भूमिका: भूरिया समिति की सिफ़ारिश पर 1996 में PESA — पाँचवीं अनुसूची के 10 राज्यों में ग्राम सभा को केंद्रीय भूमिका।
स्वशासन का सशक्तिकरण: परंपरा और प्रथागत विवाद-निपटान की रक्षा; विकास योजनाओं और लाभार्थियों का अनुमोदन; भूमि-अधिग्रहण पूर्व परामर्श; लघु वनोपज, लघु जल-निकाय, लघु खनिज; मद्य, साहूकारी, बाज़ार पर नियंत्रण; भूमि-हस्तांतरण रोकना। उदाहरण — नियमगिरि ग्राम सभाएँ (2013), महाराष्ट्र में PESA-FRA के अंतर्गत तेंदू-बाँस की सामुदायिक बिक्री।
स्त्रियों पर प्रभाव: एक-तिहाई (कई राज्यों में 50%) आरक्षण; जनजातीय स्त्रियाँ सरपंच/मुखिया; शराब-विरोध, जल, स्वास्थ्य, आँगनवाड़ी मुद्दों को प्राथमिकता; SHG के माध्यम से नेतृत्व; FRA में संयुक्त पट्टे।
बाधाएँ: "सरपंच-पति", पारंपरिक परिषदों में स्त्रियों का बहिष्कार, निरक्षरता, घरेलू बोझ, हिंसा; राज्यों द्वारा नियमों में देरी (कई राज्यों ने 2010 के बाद नियम बनाए; झारखंड में लंबे समय तक लंबित); नौकरशाही प्रभुत्व।
निष्कर्ष: PESA "ग्राम गणराज्य" की संवैधानिक अभिव्यक्ति है; स्त्रियों की वास्तविक भागीदारी के लिए क्षमता-निर्माण, पारंपरिक संस्थाओं में सुधार और नियमों का पूर्ण क्रियान्वयन आवश्यक है।
जनजातीय कार्यकर्ता और स्वतंत्रता सेनानी बिरसा मुंडा की जीवन-गाथा पर निबंध लिखिए। उनके बलिदान का जनजातीय समाज पर क्या प्रभाव पड़ा?
मॉडल उत्तर (रूपरेखा)
जीवन: जन्म 15 नवंबर 1875, उलिहातु; मिशनरी शिक्षा, ईसाई धर्म से मोहभंग; वैष्णव प्रभाव; बिरसाइत पंथ — एकेश्वरवाद, मद्य-बलि निषेध, स्वच्छता; "धरती आबा"।
संघर्ष: दिकू, ब्रिटिश, मिशनरी-विरोध; खुंटकट्टी और बेगार; "अबुआ राज"; 1895 कारावास; 1899-1900 उलगुलान — डोंबारी बुरु संघर्ष; 9 जून 1900 को राँची जेल में मृत्यु।
प्रभाव: CNT अधिनियम 1908; बेगार पर अंकुश; जनजातीय आत्मसम्मान और राजनीतिक चेतना — झारखंड आंदोलन; झारखंड राज्य 15 नवंबर 2000; जनजातीय गौरव दिवस (2021 से); 150वीं जयंती (2025); बिरसाइत परंपरा; साहित्य (महाश्वेता देवी), इतिहास-लेखन (के.एस. सिंह)।
मानवशास्त्रीय दृष्टि: सहस्राब्दवादी/पुनरुत्थान आंदोलन (वॉलेस, सुरजीत सिन्हा) — धार्मिक सुधार और राजनीतिक विद्रोह का संगम; संस्कृतीकरण के तत्व (जनेऊ, शाकाहार) और आदिवासी पहचान दोनों।
निष्कर्ष: मात्र 25 वर्ष के जीवन में बिरसा ने जनजातीय भूमि-अधिकारों को क़ानूनी मान्यता दिलाई और "आदिवासी अस्मिता" को राष्ट्रीय स्वतंत्रता-संग्राम से जोड़ा।
औपनिवेशिक और उत्तर-औपनिवेशिक कालों में भारत की जनजातीय नीतियों के बदलते भूभाग को स्पष्ट कीजिए।
मॉडल उत्तर (रूपरेखा)
औपनिवेशिक: दोहन — स्थायी बंदोबस्त, वन अधिनियम (1865, 1878, 1927); नियंत्रण — CTA 1871, इनर लाइन 1873, अनुसूचित ज़िला 1874; विद्रोहों के बाद संरक्षण — विल्किंसन नियम, CNT 1908; अलगाव — 1919/1935 के Excluded Areas; मिशनरी शिक्षा; प्रशासनिक नृवंशवर्णन।
उत्तर-औपनिवेशिक: (1) एकीकरण — पंचशील; संविधान (5वीं-6ठी अनुसूची, आरक्षण); (2) नियोजित विकास — बहुउद्देशीय खंड (1954), ढेबर आयोग, TSP (1974-75), ITDA, PTG; (3) संस्थागत — MoTA 1999, NCST 2004; (4) अधिकार-आधारित — PESA 1996, FRA 2006, LARR 2013; समता, नियमगिरि; (5) संतृप्ति-गरिमा — PM-JANMAN, धरती आबा, जनजातीय गौरव दिवस।
निरंतरताएँ: विकास के नाम पर विस्थापन, संसाधन-दोहन, वन विभाग की प्रधानता, क्रियान्वयन की कमी (ज़ाक्सा समिति)।
निष्कर्ष: नीति "अलगाव और दोहन" से "अधिकार और भागीदारी" की ओर बढ़ी है; पर वास्तविक परिवर्तन तब होगा जब जनजातियाँ नीति की "वस्तु" नहीं, "निर्माता" बनें।
जल-विद्युत नदी-बाँध परियोजनाओं के कारण जनजातीय समुदायों के विस्थापन ने स्थानीय संदर्भ में स्त्रियों को कैसे प्रभावित किया है? उपयुक्त नृवंशवर्णनात्मक उदाहरणों सहित आलोचनात्मक परीक्षण कीजिए।
मॉडल उत्तर (रूपरेखा)
भूमिका: बड़े बाँधों से विस्थापितों में जनजातियों का अनुपात असमान रूप से अधिक (फ़र्नांडिस — ~40%); सर्निया का IRR मॉडल।
स्त्रियों पर प्रभाव: सामुदायिक संसाधनों (ईंधन, चारा, जल, वनोपज) का नुक़सान; प्रतिकर पुरुष "मुखिया" को; आर्थिक स्वायत्तता से आश्रितता; सामाजिक नेटवर्क विघटन; स्वास्थ्य और कुपोषण; शराब और घरेलू हिंसा; तस्करी-शोषण; पवित्र स्थलों का डूबना; लड़कियों की शिक्षा।
नृवंशवर्णन: सरदार सरोवर के भील-भिलाला (अमिता बाविस्कर, 1995); हीराकुद; पोलावरम के कोया; कोयल-कारो में स्त्रियों का प्रतिरोध; NBA में स्त्रियों का नेतृत्व।
आलोचनात्मक पक्ष: "विकास बनाम विस्थापन" बहस; पुनर्वास नीतियों का लिंग-अंधापन; LARR 2013 में सुधार, पर क्रियान्वयन कमज़ोर।
निष्कर्ष: लिंग-संवेदी SIA, स्त्रियों के नाम भूमि, आजीविका-आधारित पुनर्वास और निर्णय में भागीदारी के बिना विकास "न्यायपूर्ण" नहीं हो सकता।
स्वदेशी और जनजातीय लोगों पर ILO के अभिसमय संख्या 169 (1989) का वर्णन कीजिए। क्या भारत इसका हस्ताक्षरकर्ता है?
मॉडल उत्तर
अभिसमय: Indigenous and Tribal Peoples Convention 1989 (1991 से प्रभावी); 1957 के "एकीकरणवादी" अभिसमय 107 का स्थान लिया।
मुख्य प्रावधान: स्व-पहचान; संस्थाओं-संस्कृति के संरक्षण का अधिकार; प्रभावित करने वाले उपायों पर सद्भावपूर्ण पूर्व परामर्श और भागीदारी; पारंपरिक भूमि-संसाधन अधिकार; प्रथागत क़ानून का सम्मान; विस्थापन केवल अपवाद और स्वतंत्र-सूचित सहमति से; रोज़गार, स्वास्थ्य, शिक्षा में समानता।
भारत: भारत ने 169 का अनुसमर्थन नहीं किया है; 1958 में 107 का अनुसमर्थन किया था। कारण — "सभी भारतीय मूलनिवासी" का मत, संसाधनों पर संप्रभुता; पर PESA और FRA में इसके कई सिद्धांत (परामर्श, सामुदायिक अधिकार) परिलक्षित होते हैं; UNDRIP (2007) का समर्थन किया।
छठी अनुसूची क्षेत्रों की स्थिति — टिप्पणी लिखिए।
मॉडल उत्तर
प्रावधान: अनु. 244(2), 275(1); असम, मेघालय, त्रिपुरा, मिज़ोरम; 10 ADC; अधिकतम 30 सदस्य (BTC 46); भूमि, वन, झूम, ग्राम प्रशासन, उत्तराधिकार, विवाह, प्रथाओं पर क़ानून; ग्राम न्यायालय; कर और साहूकारी नियमन।
उपलब्धियाँ: प्रथागत संस्थाओं और भूमि का संरक्षण; शांति समझौतों का माध्यम (BTR 2020); सांस्कृतिक स्वायत्तता।
समस्याएँ: वित्तीय निर्भरता, राज्य से क्षेत्राधिकार-टकराव, स्त्रियों और अल्पसंख्यक जनजातियों का कम प्रतिनिधित्व, ग्राम-लोकतंत्र का अभाव, भ्रष्टाचार।
वर्तमान: 125वाँ संशोधन विधेयक 2019 (लंबित) — अधिक शक्तियाँ, वित्त आयोग, स्त्री आरक्षण; लद्दाख, मणिपुर पहाड़ी क्षेत्रों से समावेशन की माँग।
खनन के विशेष संदर्भ में जनजातीय समुदायों पर आर्थिक, सामाजिक और विकासात्मक प्रभावों की विवेचना कीजिए।
मॉडल उत्तर (रूपरेखा)
संदर्भ: खनिज-समृद्ध जनजातीय पट्टी (झारखंड, ओडिशा, छत्तीसगढ़) — "संसाधन अभिशाप"।
आर्थिक: भूमि-वन आजीविका का नुक़सान, अकुशल अनुबंध श्रम, बाहरी लोगों का बाज़ार पर नियंत्रण, राजस्व का बहिर्गमन; कुछ रोज़गार और आय।
सामाजिक: विस्थापन, समुदाय-विघटन, शराब, यौन शोषण, जनसांख्यिकीय परिवर्तन, संस्कृति-भाषा क्षरण, पवित्र भूदृश्य का विनाश; स्वास्थ्य — सिलिकोसिस, TB, प्रदूषण।
विकासात्मक: सड़क-विद्यालय-अस्पताल, पर असमान; DMF निधि का प्रायः शहरी ढाँचे पर व्यय; प्रतिरोध और उग्रवाद (2008 विशेषज्ञ समिति)।
नीति/न्याय: समता (1997), नियमगिरि (2013), DMF और PMKKKY (2015), PESA-FRA में ग्राम सभा सहमति; खनन-पश्चात पुनर्स्थापन।
उदाहरण: नियमगिरि, हसदेव अरण्य, झरिया, बैलाडीला।
निष्कर्ष: खनन से "समावेशी विकास" तभी संभव है जब समुदाय की सहमति, लाभ-साझेदारी (समुदाय-स्वामित्व मॉडल) और पर्यावरणीय न्याय सुनिश्चित हों।
प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षक जनजातीय लोग हैं, फिर भी वे सबसे अधिक वंचित हैं। आलोचनात्मक परीक्षण कीजिए कि जलवायु परिवर्तन भविष्य में उनके अस्तित्व को कैसे प्रभावित करेगा।
मॉडल उत्तर (रूपरेखा)
विरोधाभास: पवित्र उपवन, सतत कृषि (अपातानी), कम कार्बन-पदचिह्न — फिर भी भूमि-वन अधिकारों से वंचना, विस्थापन और ग़रीबी।
जलवायु प्रभाव: अनियमित मानसून और कृषि-संकट; वनोपज चक्र में परिवर्तन; वनाग्नि; हिमालय में हिमनद-पिघलन और भूस्खलन; द्वीपों पर समुद्र-स्तर वृद्धि; गर्मी, वेक्टर-जनित रोग, कुपोषण; प्रवासन; "हरित परियोजनाओं" से भूमि-अधिग्रहण (जलवायु अन्याय)।
भविष्य के जोखिम: खाद्य-जल असुरक्षा, सांस्कृतिक-ज्ञान क्षरण, PVTG का अस्तित्व-संकट, संघर्ष।
लचीलापन और ज्ञान: बीज-विविधता, मोटे अनाज, जल-प्रबंधन, CFR (मेंढा-लेखा), खासी जीवित-जड़ पुल।
नीति: NAPCC, हरित भारत मिशन, मिशन LiFE; FRA को जलवायु-नीति से जोड़ना; जलवायु-वित्त और निर्णय में जनजातीय भागीदारी; पारंपरिक ज्ञान का संरक्षण (जैव-विविधता अधिनियम)।
निष्कर्ष: जलवायु संकट का समाधान जनजातियों के "विरुद्ध" नहीं, उनके "साथ" होना चाहिए — उनके अधिकार सुरक्षित करना ही सबसे प्रभावी जलवायु-नीति है।
AI और आनुवंशिक शोध में हाल की प्रगति के कारण जैविक और सामाजिक-सांस्कृतिक मानवशास्त्र में कौन-सी नैतिक चिंताएँ उत्पन्न हुई हैं?
मॉडल उत्तर (रूपरेखा)
भूमिका: जीनोमिक्स, प्राचीन DNA, बिग डेटा और AI ने मानवशास्त्रीय शोध को नई संभावनाएँ दीं, पर "हानि न करें" और "सूचित सहमति" जैसे मूल सिद्धांतों को नई चुनौतियाँ भी।
जैविक मानवशास्त्र: सूचित सहमति की जटिलता, नमूनों का द्वितीयक उपयोग (Havasupai), डेटा संप्रभुता (CARE सिद्धांत), लाभ-साझेदारी, प्रजातीय निर्धारणवाद का पुनरुत्थान, प्राचीन DNA का राजनीतिक दुरुपयोग, CRISPR और यूजेनिक्स।
सामाजिक-सांस्कृतिक मानवशास्त्र: एल्गोरिदमिक पूर्वाग्रह, निगरानी और प्रोफ़ाइलिंग, ऑनलाइन नृवंशवर्णन में गोपनीयता, AI द्वारा सांस्कृतिक विनियोग, डीपफ़ेक, AI-जनित विश्लेषण की विश्वसनीयता, डिजिटल विभाजन।
भारतीय संदर्भ: जीनोम इंडिया परियोजना, जनजातीय नमूनों का संग्रह, आधार और DPDP अधिनियम 2023, ICMR दिशानिर्देश (2017, 2023), जैव-विविधता अधिनियम — पहुँच और लाभ-साझेदारी।
समाधान: सामुदायिक सहमति, सहभागी शोध, डेटा-स्वामित्व समझौते, नैतिक समितियों का सशक्तिकरण, पारदर्शी AI, AAA जैसे नैतिक कोड।
निष्कर्ष: तकनीकी प्रगति के साथ मानवशास्त्र को "समुदाय-केंद्रित नैतिकता" को और मज़बूत करना होगा — अन्यथा नई तकनीकें पुराने उपनिवेशवादी शोषण का नया रूप बन सकती हैं।
अनुसूचित क्षेत्र — टिप्पणी लिखिए।
मॉडल उत्तर
प्रावधान: अनु. 244(1), पाँचवीं अनुसूची; राष्ट्रपति द्वारा घोषणा; 10 राज्य।
मानदंड: जनजातीय जनसंख्या की प्रधानता, सघनता, अविकसितता, आर्थिक विषमता।
शासन: राज्यपाल की विशेष शक्तियाँ — क़ानूनों को संशोधित/अलागू करना, भूमि-हस्तांतरण और साहूकारी पर विनियम; TAC (20 सदस्य, 3/4 ST विधायक); राष्ट्रपति को वार्षिक रिपोर्ट; PESA 1996; समता निर्णय (1997)।
मुद्दे: राज्यपाल की शक्तियों का अल्प प्रयोग, TAC की निष्क्रियता, अनेक जनजातीय गाँवों का बाहर रह जाना, PESA का कमज़ोर क्रियान्वयन; सुझाव — ज़ाक्सा समिति (2014) के अनुसार क्षेत्रों का पुनर्निर्धारण और राज्यपाल की सक्रिय भूमिका।
15. Quick Revision Summary
- नीति — औपनिवेशिक (1793, 1837, 1871, 1873, 1874, 1878, 1908, 1935); उत्तर-औपनिवेशिक (पंचशील, TSP, MoTA, NCST, PESA, FRA, LARR, PM-JANMAN, धरती आबा)।
- संविधान — पाँचवीं अनुसूची (10 राज्य, राज्यपाल, TAC), छठी अनुसूची (4 राज्य, 10 ADC, 125वाँ विधेयक), PESA और स्त्रियाँ, ILO 107/169, UNDRIP।
- वन — 1878 → 2006; FRA (4 हेक्टेयर, CFR, आवास अधिकार); 2019 बेदख़ली विवाद; FCA 2023।
- PVTG — ढेबर, 1975, 2006, 75 समूह; "PTG" की आलोचना; समस्याएँ और कार्यक्रम-चुनौतियाँ; PM-JANMAN।
- विकास — विस्थापन (फ़र्नांडिस, सर्निया), बाँध और स्त्रियाँ (बाविस्कर), खनन (समता, नियमगिरि, DMF), जलवायु परिवर्तन।
- आंदोलन — तिलका माँझी से झारखंड आंदोलन; बिरसा मुंडा (1875-1900, उलगुलान, CNT 1908)।
- स्वास्थ्य और नैतिकता — कोविड के सबक, चिकित्सा बहुलवाद, अभय बंग समिति; AI-आनुवंशिकी नैतिकता (Havasupai, CARE, DPDP 2023)।