1. अध्याय एक नज़र में
Paper I का पहला खंड उच्चतर व्यष्टि अर्थशास्त्र (Advanced Microeconomics) है। इसमें सिद्धांत और संख्यात्मक, दोनों प्रकार के प्रश्न आते हैं। सिलेबस:
- मूल्य-निर्धारण के मार्शलीय और वालरसीय दृष्टिकोण; बाज़ार स्थायित्व।
- उपभोक्ता व्यवहार: उपयोगिता, अनधिमान वक्र (indifference curve), आय और प्रतिस्थापन प्रभाव, प्रकट अधिमान (revealed preference)।
- उत्पादन: उत्पादन फलन, पैमाने के प्रतिफल, लागत वक्र।
- बाज़ार संरचनाएँ: पूर्ण प्रतियोगिता, एकाधिकार और कीमत-विभेद, एकाधिकारी प्रतियोगिता (चैंबरलिन), अल्पाधिकार (कूर्नो, बर्ट्रेंड, स्टैकेलबर्ग, विकुंचित माँग), खेल सिद्धांत; कर का भार (incidence)।
2025 में माँग का शून्य-घात समघातत्व, निम्न (inferior) वस्तु का मार्शलीय माँग वक्र, उत्पाद-विभेदित द्वयाधिकार का संख्यात्मक, और बिक्री-कर तथा एकाधिकार पर प्रति-इकाई कर के प्रभाव पूछे गए। 2024 में अनुभूत (perceived) और आनुपातिक (proportional) माँग वक्र, मूल्यानुसार बनाम विशिष्ट कर, मार्शलीय और वालरसीय स्थायित्व, और एकाधिकारी प्रतियोगिता का संतुलन आया।
2. मूल्य-निर्धारण: मार्शल और वालरस
| आधार | मार्शल (आंशिक संतुलन) | वालरस (सामान्य संतुलन) |
|---|---|---|
| विश्लेषण | एक बाज़ार, "अन्य बातें समान" | सभी बाज़ार परस्पर निर्भर |
| समायोजन चर | मात्रा: माँग-कीमत > पूर्ति-कीमत हो तो उत्पादक मात्रा बढ़ाते हैं | कीमत: अतिरिक्त माँग हो तो कीमत बढ़ती है (नीलामीकर्ता, tâtonnement) |
| अतिरिक्त | अतिरिक्त माँग-कीमत F(q) = Pd(q) − Ps(q) | अतिरिक्त माँग E(p) = D(p) − S(p) |
| स्थायित्व शर्त | dF/dq < 0 | dE/dp < 0 |
| केंद्र | उत्पादक व्यवहार, दीर्घकाल | क्रेता-विक्रेता, अल्पकाल |
- सामान्य स्थिति (माँग ऋणात्मक, पूर्ति धनात्मक ढलान) में दोनों शर्तें एक साथ पूरी होती हैं।
- वालरस का नियम: सभी बाज़ारों की अतिरिक्त माँगों का मूल्य-भारित योग शून्य; n बाज़ारों में n − 1 स्वतंत्र समीकरण, इसलिए केवल सापेक्ष कीमतें निर्धारित।
- मकड़जाल (Cobweb) मॉडल: पूर्ति पिछली कीमत पर निर्भर; अभिसरण यदि पूर्ति वक्र माँग वक्र से अधिक ढालू (मात्रा-अक्ष के सापेक्ष) हो, यानी |पूर्ति की ढलान dQ/dP| < |माँग की ढलान|।
3. उपभोक्ता व्यवहार
- गणनावाचक उपयोगिता (मार्शल): सम-सीमांत उपयोगिता नियम MUx/Px = MUy/Py = λ; उपभोक्ता अधिशेष; मुद्रा की सीमांत उपयोगिता स्थिर मानी गई।
- क्रमवाचक उपयोगिता (हिक्स-एलेन): अनधिमान वक्र (ऋणात्मक ढलान, मूल-बिंदु की ओर उत्तल, परस्पर न काटें); संतुलन MRSxy = Px/Py।
- शून्य-घात समघातत्व: मार्शलीय माँग x = f(p1, p2, M) सभी कीमतों और आय में शून्य घात की समघात है (कोई "मुद्रा भ्रम" नहीं)। ऑयलर प्रमेय से:
- स्लट्स्की समीकरण (कीमत प्रभाव = प्रतिस्थापन प्रभाव + आय प्रभाव):
- प्रतिस्थापन प्रभाव (∂h/∂p) सदैव ऋणात्मक। सामान्य वस्तु: आय प्रभाव भी उसी दिशा में। निम्न वस्तु: आय प्रभाव विपरीत दिशा में। गिफ़ेन वस्तु: निम्न वस्तु जिसका विपरीत आय प्रभाव प्रतिस्थापन प्रभाव से अधिक, यानी माँग वक्र धनात्मक ढलान वाला।
- हिक्स बनाम स्लट्स्की विभाजन: हिक्स में वास्तविक आय = समान उपयोगिता (मूल अनधिमान वक्र); स्लट्स्की में = मूल बंडल खरीद सकने की क्षमता।
- प्रकट अधिमान (सैमुएलसन, 1938): उपयोगिता फलन के बिना, देखे गए चुनाव से; दुर्बल अभिगृहीत (WARP); प्रतिस्थापन प्रभाव की ऋणात्मकता सिद्ध होती है।
4. उत्पादन और लागत
- उत्पादन फलन: Q = f(L, K); परिवर्ती अनुपात का नियम (अल्पकाल); पैमाने के प्रतिफल (दीर्घकाल)।
- कॉब-डगलस Q = ALαKβ: α + β = 1 स्थिर, > 1 वर्धमान, < 1 ह्रासमान प्रतिफल; प्रतिस्थापन लोच σ = 1।
- CES फलन (ऐरो-चेनरी-मिन्हास-सोलो, 1961): σ = 1/(1 + ρ) अचर।
- न्यूनतम लागत संतुलन: MRTSLK = MPL/MPK = w/r। विस्तार पथ।
- ऑयलर (समाप्ति) प्रमेय: प्रथम घात के समघात फलन में L·MPL + K·MPK = Q, यानी सीमांत उत्पादकता के अनुसार भुगतान से कुल उत्पाद ठीक समाप्त।
- लागत वक्र: U-आकार के AC और MC; MC, AC को उसके न्यूनतम पर काटता है; दीर्घकालीन AC अल्पकालीन वक्रों का अन्वालोप (Viner)।
5. बाज़ार संरचनाएँ
- पूर्ण प्रतियोगिता: P = MR = MC; दीर्घकाल में P = न्यूनतम LAC, सामान्य लाभ।
- एकाधिकार: MR = MC, P > MC; MR = P(1 − 1/|e|), इसलिए एकाधिकारी माँग के लोचदार भाग (|e| > 1) में उत्पादन करता है। लर्नर सूचकांक L = (P − MC)/P = 1/|e|।
- कीमत-विभेद: प्रथम कोटि (पूर्ण), द्वितीय (मात्रा के अनुसार), तृतीय (बाज़ारों में: MR1 = MR2 = MC, कम लोच वाले बाज़ार में ऊँची कीमत)।
- एकाधिकारी प्रतियोगिता (चैंबरलिन, 1933): उत्पाद-विभेदन, अनेक फ़र्में, मुक्त प्रवेश। दो माँग वक्र:
- dd (अनुभूत, perceived): फ़र्म मानती है कि केवल वही कीमत बदलेगी; प्रतिद्वंद्वियों के ग्राहक भी खींचेगी, इसलिए अधिक लोचदार (समतल)।
- DD (आनुपातिक, proportional/share): सभी फ़र्में साथ कीमत बदलें; हर फ़र्म का बाज़ार-हिस्सा स्थिर, केवल बाज़ार का विस्तार, इसलिए कम लोचदार (अधिक ढालू)।
- दीर्घकालीन समूह-संतुलन: dd, LAC को स्पर्श करता है (P = LAC, शून्य असामान्य लाभ) और DD उसी बिंदु से गुज़रता है; स्पर्श LAC के गिरते भाग पर, इसलिए अतिरिक्त क्षमता (excess capacity)।
- अल्पाधिकार:
- कूर्नो (1838): हर फ़र्म दूसरे की मात्रा स्थिर मानती है; प्रतिक्रिया वक्रों का प्रतिच्छेद। रैखिक माँग P = a − bQ, समान MC = c: हर फ़र्म q = (a − c)/(3b)।
- बर्ट्रेंड: कीमत-प्रतियोगिता; समरूप उत्पाद में P = MC (बर्ट्रेंड विरोधाभास)।
- स्टैकेलबर्ग: नेता-अनुयायी; नेता अनुयायी की प्रतिक्रिया ध्यान में रखता है।
- विकुंचित माँग (स्वीज़ी, 1939): प्रतिद्वंद्वी कीमत-कटौती का अनुसरण करते हैं, वृद्धि का नहीं; MR में अंतराल, इसलिए कीमत-दृढ़ता।
- बाज़ार-हिस्सा मॉडल: फ़र्म मानती है कि प्रतिद्वंद्वी का हिस्सा स्थिर रहेगा; तब q2 को q1 के अनुपात में रखकर एक-चर अनुकूलन।
- खेल सिद्धांत: नैश संतुलन (कोई खिलाड़ी एकतरफ़ा बदलकर लाभ नहीं पा सकता); कैदी की दुविधा (प्रभावी रणनीति, सहयोग का अभाव); प्रभावी (dominant) रणनीति; बार-बार खेल में सहयोग संभव।
6. कर का भार और प्रकार
- विशिष्ट (प्रति-इकाई) कर t: पूर्ति वक्र t से ऊपर खिसकता है। रैखिक Qd = a − bP, Qs = −c + dP में उपभोक्ता-कीमत dt/(b + d) बढ़ती है और उत्पादक-कीमत bt/(b + d) घटती है।
- मूल्यानुसार (ad valorem) कर τ: उपभोक्ता-कीमत Pc = (1 + τ)Ps; पूर्ति वक्र घूमता (rotate) है।
- एकाधिकार पर विशिष्ट कर: MR = MC + t; रैखिक माँग और स्थिर MC पर कीमत ठीक t/2 बढ़ती है।
- मूल्यानुसार बनाम विशिष्ट (समान राजस्व): मूल्यानुसार कर में उत्पादन अधिक, कीमत कम और फ़र्म का लाभ अधिक; इसलिए फ़र्म के दृष्टिकोण से (और प्रायः कल्याण की दृष्टि से भी) मूल्यानुसार कर श्रेष्ठ।
7. Master Summary Table
| विषय | मूल सूत्र / परिणाम | याद रखें |
|---|---|---|
| मार्शल स्थायित्व | dF/dq < 0 (माँग-कीमत − पूर्ति-कीमत) | मात्रा-समायोजन |
| वालरस स्थायित्व | dE/dp < 0 (अतिरिक्त माँग) | कीमत-समायोजन |
| समघातत्व | e11 + e12 + e1M = 0 | मुद्रा भ्रम नहीं |
| स्लट्स्की | ∂x/∂p = ∂h/∂p − x ∂x/∂M | गिफ़ेन: IE > SE |
| कॉब-डगलस | Q = ALαKβ; σ = 1 | α + β से प्रतिफल |
| न्यूनतम लागत | MPL/MPK = w/r | विस्तार पथ |
| एकाधिकार | MR = P(1 − 1/|e|); L = 1/|e| | लोचदार भाग |
| तृतीय कोटि विभेद | MR1 = MR2 = MC | कम लोच, ऊँची कीमत |
| चैंबरलिन | dd समतल, DD ढालू; LR: dd, LAC को स्पर्श | अतिरिक्त क्षमता |
| कूर्नो | qi = (a − c)/(3b) | प्रतिक्रिया वक्र |
| कर-भार | उपभोक्ता: d/(b + d); उत्पादक: b/(b + d) | लोचों के व्युत्क्रम अनुपात में |
8. चार्ट: चैंबरलिन के dd और DD वक्र
9. Mind Map
- मार्शल बनाम वालरस
- स्थायित्व, मकड़जाल
- अनधिमान, स्लट्स्की
- गिफ़ेन, प्रकट अधिमान
- कॉब-डगलस, CES
- ऑयलर, लागत
- एकाधिकार, विभेद
- चैंबरलिन, अल्पाधिकार, खेल
- भार का बँटवारा
- मूल्यानुसार बनाम विशिष्ट
10. महत्वपूर्ण One-liners
- मार्शलीय माँग फलन कीमतों और आय में शून्य घात का समघात।
- प्रतिस्थापन प्रभाव सदैव ऋणात्मक।
- हर गिफ़ेन वस्तु निम्न वस्तु है, पर हर निम्न वस्तु गिफ़ेन नहीं।
- एकाधिकारी कभी बेलोचदार भाग में उत्पादन नहीं करता।
- "The Theory of Monopolistic Competition": चैंबरलिन (1933); "Imperfect Competition": जोन रॉबिन्सन (1933)।
- विकुंचित माँग वक्र: स्वीज़ी (1939)।
- कॉब-डगलस फलन की प्रतिस्थापन लोच 1।
- कर-भार उस पक्ष पर अधिक जिसकी लोच कम हो।
11. टिप्स एवं ट्रिक्स
- सिद्धांत के हर उत्तर में आरेख (अनधिमान वक्र, dd-DD, कर-भार) अवश्य बनाएँ; Paper I में आरेख पर अलग अंक मिलते हैं।
- संख्यात्मक प्रश्नों में पहले कर-रहित संतुलन, फिर कर-सहित, और अंत में परिवर्तन तथा भार का बँटवारा लिखें।
- अनुकूलन में द्वितीय-कोटि शर्त (d²π/dq² < 0) अवश्य दिखाएँ।
स्थायित्व: "मार्शल-मात्रा, वालरस-कीमत"। चैंबरलिन: "dd = दुस्साहसी (अकेला, लोचदार), DD = दल (सब साथ, ढालू)"।
"विशिष्ट बिक्री कर 18%" जैसे वाक्य में "विशिष्ट" (प्रति इकाई) और "%" (मूल्यानुसार) परस्पर विरोधी हैं। उत्तर में अपनी व्याख्या स्पष्ट लिखें, फिर गणना करें।
12. PYQ-आधारित प्रश्न एवं हल
दर्शाइए कि मार्शलीय दृष्टिकोण में जब कीमतें और आय समान अनुपात में बढ़ती हैं, तो किसी वस्तु की माँगी गई मात्रा में कोई परिवर्तन नहीं होता।
मॉडल उत्तर
उपभोक्ता max U(x1, x2), बजट p1x1 + p2x2 = M। सभी को λ से गुणा करने पर λp1x1 + λp2x2 = λM, जो मूल बजट रेखा ही है। सुलभ समुच्चय और उपयोगिता-फलन अपरिवर्तित, अतः इष्टतम बंडल वही।
ऑयलर प्रमेय से e11 + e12 + e1M = 0। अर्थ: उपभोक्ता में "मुद्रा भ्रम" नहीं; केवल सापेक्ष कीमतें और वास्तविक आय मायने रखती हैं।
एकाधिकारी प्रतियोगी बाज़ार में अनुभूत माँग वक्र और आनुपातिक माँग वक्र में भेद कीजिए। समझाइए कि आनुपातिक माँग वक्र अनुभूत माँग वक्र से अधिक ढालू क्यों होता है।
मॉडल उत्तर
dd: फ़र्म मानती है कि प्रतिद्वंद्वी कीमत नहीं बदलेंगे; DD: सभी फ़र्में साथ कीमत बदलती हैं, हर फ़र्म का हिस्सा स्थिर (चार्ट)।
DD अधिक ढालू क्यों: अकेले कीमत घटाने पर फ़र्म नए ग्राहकों के साथ प्रतिद्वंद्वियों के ग्राहक भी खींचती है (प्रतिस्थापन प्रभाव बड़ा), इसलिए मात्रा बहुत बढ़ती है। सभी के घटाने पर कोई ग्राहक-स्थानांतरण नहीं, केवल कुल बाज़ार का विस्तार, इसलिए मात्रा कम बढ़ती है; अर्थात DD कम लोचदार।
सिद्ध कीजिए कि समान कर-राजस्व के लिए फ़र्म के दृष्टिकोण से मूल्यानुसार कर विशिष्ट बिक्री कर से श्रेष्ठ है।
मॉडल उत्तर
एकाधिकारी, माँग p(q)। विशिष्ट कर t: MR(q) = MC + t, उत्पादन qs, राजस्व R = tqs।
τ ऐसा लें कि τp(qs) = t (qs पर समान राजस्व)। मूल्यानुसार कर में शर्त (1 − τ)MR = MC। qs पर:
अतः मूल्यानुसार कर में फ़र्म qs से अधिक उत्पादन करेगी; अधिक उत्पादन पर उसी τ से राजस्व और बढ़ता है, इसलिए समान राजस्व के लिए τ और घटाया जा सकता है। परिणाम: मूल्यानुसार कर में उत्पादन अधिक, कीमत कम, और फ़र्म का लाभ अधिक।
आरेख: विशिष्ट कर AR और MR को समांतर नीचे खिसकाता है; मूल्यानुसार कर उन्हें घुमाता है, जिससे ऊँची कीमतों पर कर-भार अधिक और कम कीमतों पर कम पड़ता है।
आय और प्रतिस्थापन प्रभावों का प्रयोग करते हुए दो-वस्तु ढाँचे में निम्न वस्तु के लिए मार्शलीय माँग वक्र व्युत्पन्न कीजिए। क्या यह माँग वक्र सदैव ऋणात्मक ढलान वाला होता है?
मॉडल उत्तर (रूपरेखा)
व्युत्पत्ति: X की कीमत घटने पर बजट रेखा बाहर घूमती है; नया संतुलन। हिक्स विभाजन: क्षतिपूरक बजट रेखा (नई कीमत, मूल अनधिमान वक्र) से प्रतिस्थापन प्रभाव (X बढ़ता है) और शेष आय प्रभाव (निम्न वस्तु होने से X घटता है)।
निष्कर्ष:
- SE > IE: शुद्ध प्रभाव में X बढ़ता है, माँग वक्र ऋणात्मक ढलान (अधिकांश निम्न वस्तुएँ)।
- IE > SE: X घटता है, माँग वक्र धनात्मक ढलान (गिफ़ेन विरोधाभास), जैसे 19वीं सदी के आयरलैंड में आलू (गिफ़ेन का अवलोकन)।
अतः सदैव नहीं; स्लट्स्की समीकरण ∂x/∂p = ∂h/∂p − x ∂x/∂M में ∂x/∂M < 0 और x बड़ा हो तो दूसरा पद पहले पर भारी पड़ सकता है।
उत्पाद-विभेदित द्वयाधिकार में द्वयाधिकारी I का माँग फलन p1 = 200 − 4q1 − 2q2 और लागत फलन c1 = 5q1² है। द्वयाधिकारी II के पास पूरे बाज़ार का 1/3 हिस्सा है। द्वयाधिकारी I का इष्टतम मूल्य, उत्पादन और लाभ, तथा द्वयाधिकारी II का उत्पादन ज्ञात कीजिए।
हल
बाज़ार-हिस्सा मॉडल: q2 = (q1 + q2)/3 ⇒ q2 = q1/2। तब p1 = 200 − 4q1 − q1 = 200 − 5q1।
dπ1/dq1 = 200 − 20q1 = 0 ⇒ q1 = 10 (d²π/dq² = −20 < 0, उच्चिष्ठ)।
p1 = 150; π1 = 1500 − 500 = 1000; q2 = 5।
बाज़ार स्थायित्व के मार्शलीय और वालरसीय दृष्टिकोणों की व्यवहारगत मान्यताएँ लिखिए। दिखाइए कि जब माँग और पूर्ति दोनों वक्र धनात्मक ढलान वाले हों, तो दोनों दृष्टिकोण परस्पर विरोधी हो जाते हैं।
मॉडल उत्तर (रूपरेखा)
मान्यताएँ: खंड 2 की तालिका।
वालरस: dE/dp = D′(p) − S′(p) < 0 ⇔ S′ > D′। मार्शल: dF/dq = 1/D′ − 1/S′ < 0 ⇔ 1/D′ < 1/S′।
D′ > 0 और S′ > 0 होने पर 1/D′ < 1/S′ ⇔ D′ > S′। अतः वालरस स्थायित्व (S′ > D′) होने पर मार्शल अस्थायित्व, और विलोम।
आरेख: (P-Q तल में) पूर्ति माँग से समतल हो तो वालरस-स्थायी पर मार्शल-अस्थायी; पूर्ति अधिक ढालू हो तो विपरीत। ऐसी स्थितियाँ बाह्य मितव्ययिताओं (पूर्ति धनात्मक) और प्रतिष्ठा-वस्तुओं/गिफ़ेन (माँग धनात्मक) में आती हैं।
एकाधिकारी प्रतियोगिता में फ़र्म के अल्पकालीन और दीर्घकालीन संतुलन का वर्णन कीजिए।
मॉडल उत्तर (रूपरेखा)
अल्पकाल: MR = MC (dd के आधार पर); कीमत SAC से ऊपर हो तो असामान्य लाभ, नीचे पर AVC से ऊपर हो तो हानि सहते हुए उत्पादन।
दीर्घकाल: लाभ से नई फ़र्में आती हैं, DD बाईं ओर खिसकता है; dd नीचे आता है जब तक dd, LAC को स्पर्श न करे और DD उसी बिंदु से न गुज़रे। P = LAC, सामान्य लाभ; P > MC; न्यूनतम LAC से कम उत्पादन, यानी अतिरिक्त क्षमता और विक्रय-लागत।
मूल्यांकन: विविधता का लाभ बनाम अक्षमता; चैंबरलिन बनाम रॉबिन्सन।
(i) Qd = −500P + 5000 और Qs = 400P − 400 हैं। 18% बिक्री कर लगाने का संतुलन कीमत और मात्रा पर प्रभाव ज्ञात कीजिए। (ii) एकाधिकार में p = 200 − 8q और c = 25 + 10q; सरकार ₹10 प्रति इकाई कर लगाती है। संतुलन कीमत और मात्रा पर क्या प्रभाव होगा?
हल
(i) कर-रहित: 5000 − 500P = 400P − 400 ⇒ P = 6, Q = 2000।
कर को विक्रेता-कीमत Ps पर 18% मूल्यानुसार मानें (Pc = 1.18Ps): 5000 − 590Ps = 400Ps − 400 ⇒ Ps = 5400/990 ≈ 5.45।
प्रति इकाई कर ≈ 0.98, जिसमें उपभोक्ता 0.44 (4/9) और उत्पादक 0.55 (5/9) वहन करते हैं: अनुपात = पूर्ति-ढलान : माँग-ढलान = 400 : 500।
(ii) MR = 200 − 16q, MC = 10: q = 11.875, p = 105। कर के बाद MC = 20: q = 11.25, p = 110।
कीमत ठीक आधे कर (₹5) से बढ़ी, मात्रा 0.625 घटी; लाभ 1103.1 से घटकर 987.5।
बाज़ार माँग P = 100 − Q और दोनों फ़र्मों की स्थिर MC = 10 है। कूर्नो, बर्ट्रेंड और एकाधिकार (कार्टेल) परिणामों की तुलना कीजिए।
हल
- कूर्नो: हर फ़र्म q = (100 − 10)/3 = 30; Q = 60, P = 40, हर फ़र्म का लाभ 900।
- बर्ट्रेंड: P = MC = 10, Q = 90, लाभ 0।
- कार्टेल: MR = 100 − 2Q = 10 ⇒ Q = 45, P = 55, कुल लाभ 2025 (हर फ़र्म 1012.5)।
कार्टेल में हर फ़र्म को धोखा देने का प्रोत्साहन (कैदी की दुविधा) है, इसलिए कूर्नो संतुलन ही नैश संतुलन।
13. Quick Revision Summary
- मार्शल-वालरस: मात्रा बनाम कीमत समायोजन; दोनों वक्र धनात्मक होने पर विरोधी परिणाम।
- उपभोक्ता: समघातत्व (मुद्रा भ्रम नहीं); स्लट्स्की; निम्न बनाम गिफ़ेन; प्रकट अधिमान।
- उत्पादन: कॉब-डगलस, CES, ऑयलर, लागत वक्र।
- बाज़ार: एकाधिकार और विभेद; चैंबरलिन (dd, DD, अतिरिक्त क्षमता); कूर्नो, बर्ट्रेंड, स्टैकेलबर्ग, स्वीज़ी; नैश।
- कर: भार का बँटवारा; एकाधिकार पर t/2; मूल्यानुसार कर श्रेष्ठ।