1. अध्याय एक नज़र में
यह अध्याय Paper I के "मुद्रा, बैंकिंग और वित्त" तथा "लोक वित्त" खंडों को समेटता है। सिलेबस:
- मुद्रा की माँग और पूर्ति: मुद्रा का परिमाण सिद्धांत (फ़िशर, कैम्ब्रिज), फ्रीडमैन का पुनर्कथन, बॉमोल-टोबिन; मुद्रा गुणक, उच्च-शक्ति मुद्रा; मुद्रा की तटस्थता।
- बैंकिंग: साख-सृजन, केंद्रीय बैंक के कार्य और मौद्रिक नीति के उपकरण, ट्रेज़री बिल; वित्तीय बाज़ार और नियमन।
- मुद्रास्फीति: माँग-जनित, लागत-जनित, फिलिप्स वक्र।
- लोक वित्त: सार्वजनिक व्यय (वैगनर, पीकॉक-वाइज़मैन), कराधान और कर-भार, सार्वजनिक ऋण, राजकोषीय नीति।
2025 में क्लासिकल द्विभाजन बनाम मुद्रा-तटस्थता, फ़िशर और कैम्ब्रिज में वेग, उधार से वित्तपोषित सार्वजनिक व्यय, सार्वजनिक व्यय की वृद्धि पर रोक, और मुद्रा गुणक आए। 2024 में ट्रेज़री बिल से मुद्रा-पूर्ति नियंत्रण, साख-सृजन और फ़िशर बनाम कैम्ब्रिज पूछे गए।
2. मुद्रा का परिमाण सिद्धांत
| आधार | फ़िशर (लेन-देन रूप, 1911) | कैम्ब्रिज (नकद-शेष रूप: मार्शल, पिगू) |
|---|---|---|
| समीकरण | MV = PT | M = kPY |
| मुद्रा का कार्य | विनिमय का माध्यम (मुद्रा "प्रवाह") | मूल्य का संचय (मुद्रा "स्टॉक", रखी जाती है) |
| केंद्रीय चर | वेग V: एक इकाई कितनी बार हाथ बदलती है; संस्थागत कारकों (भुगतान आदतें, बैंकिंग) से तय, अल्पकाल में स्थिर | k: आय का वह अनुपात जो लोग नकद रखना चाहते हैं; व्यक्तिगत पसंद, ब्याज और अपेक्षाओं से प्रभावित |
| संबंध | k = 1/V; किंतु व्याख्या भिन्न: फ़िशर का V यांत्रिक, कैम्ब्रिज का k व्यवहारवादी (माँग-पक्ष) | |
| T बनाम Y | सभी लेन-देन (मध्यवर्ती सहित) | केवल अंतिम उत्पादन (राष्ट्रीय आय) |
| श्रेष्ठता | सरल, मुद्रा-पूर्ति पर बल | मुद्रा की माँग का सिद्धांत, कीन्स के तरलता अधिमान का पूर्वज; अल्पकालीन उतार-चढ़ाव समझाता है |
- सामान्य आलोचना: V और Y स्थिर नहीं; कीमत-स्तर से मुद्रा की ओर उल्टा कारण-संबंध संभव; मुद्रा के मूल्य-संचय और ब्याज से संबंध की उपेक्षा (फ़िशर में); पूर्ण रोज़गार की मान्यता।
- फ्रीडमैन का पुनर्कथन (1956): मुद्रा एक परिसंपत्ति; M/P = f(Yp, rb, re, πe, w, u)। माँग फलन स्थिर, इसलिए मुद्रा-पूर्ति में परिवर्तन मौद्रिक आय में अनुमानित परिवर्तन लाते हैं।
- बॉमोल (1952)-टोबिन (1956): लेन-देन माँग भी ब्याज पर निर्भर; वर्गमूल नियम M = √(bY/2i)। टोबिन (1958) का पोर्टफ़ोलियो सिद्धांत: जोखिम-विमुखता से सट्टा माँग।
3. मुद्रा की तटस्थता और क्लासिकल द्विभाजन
- तटस्थता: मुद्रा-पूर्ति में परिवर्तन केवल नाममात्र चरों (P, W, नाममात्र ब्याज) को बदलता है, वास्तविक चरों (Y, N, वास्तविक ब्याज) को नहीं।
- अति-तटस्थता (super-neutrality): मुद्रा-वृद्धि की दर भी वास्तविक चरों को नहीं बदलती (टोबिन प्रभाव इसका खंडन करता है: ऊँची मुद्रास्फीति लोगों को मुद्रा से पूँजी की ओर धकेलती है)।
- द्विभाजन बनाम तटस्थता का भेद: द्विभाजन एक मॉडल-संरचना है (वास्तविक और मौद्रिक क्षेत्र अलग-अलग हल होते हैं); तटस्थता उस संरचना का परिणाम (प्रस्ताव) है। द्विभाजन हो तो तटस्थता आती है, पर तटस्थता वास्तविक-शेष प्रभाव वाले एकीकृत मॉडल (पैटिंकिन) में भी दीर्घकाल में सिद्ध हो सकती है, यानी तटस्थता के लिए द्विभाजन आवश्यक नहीं।
4. मुद्रा-पूर्ति, मुद्रा गुणक और साख-सृजन
- उच्च-शक्ति मुद्रा (आरक्षित मुद्रा) H = जनता के पास मुद्रा C + बैंकों के आरक्षित R (+ RBI के पास अन्य जमाएँ)।
- भारत में मुद्रा के माप: M0 (आरक्षित मुद्रा); M1 = जनता के पास मुद्रा + माँग जमाएँ + RBI के पास अन्य जमाएँ (संकीर्ण मुद्रा); M3 = M1 + बैंकों की सावधि जमाएँ (व्यापक मुद्रा)।
- निर्धारक: (i) r: CRR (RBI द्वारा) और बैंकों के अतिरिक्त आरक्षित; r बढ़े तो m घटे। (ii) c: जनता की नकदी-आदत, बैंकिंग की पहुँच, डिजिटल भुगतान; c बढ़े तो m घटे। (iii) H: RBI की शुद्ध विदेशी परिसंपत्तियाँ, सरकार को ऋण, बैंकों को ऋण।
- साख-सृजन (सरल जमा गुणक): प्रारंभिक जमा ΔD पर बैंक-प्रणाली कुल ΔD/r जमा सृजित करती है। उदाहरण: r = 10% पर ₹100 से ₹1000 जमा।
- सीमाएँ: नकदी-रिसाव (c > 0), अतिरिक्त आरक्षित, ऋण की माँग का अभाव (मंदी में), संपार्श्विक की कमी, RBI की नीति, बैंकों का पूँजी-पर्याप्तता अनुपात (बासेल)।
- अंतर्जात मुद्रा विचार: आधुनिक व्यवहार में बैंक पहले ऋण देते हैं (ऋण जमा बनाते हैं), फिर आरक्षित जुटाते हैं; केंद्रीय बैंक मात्रा नहीं बल्कि ब्याज दर (रेपो) तय करता है और आरक्षित को उसके अनुरूप उपलब्ध कराता है।
5. केंद्रीय बैंक और मौद्रिक नीति
| उपकरण | प्रकार | भारत में |
|---|---|---|
| नीति दर (रेपो), स्थायी जमा सुविधा (SDF), MSF | परिमाणात्मक | तरलता समायोजन सुविधा (LAF) का गलियारा; SDF (2022 से) गलियारे का तल, MSF शीर्ष |
| CRR, SLR | परिमाणात्मक | CRR: RBI के पास नकद; SLR: तरल परिसंपत्तियाँ (मुख्यतः सरकारी प्रतिभूतियाँ) |
| खुले बाज़ार की क्रियाएँ (OMO) | परिमाणात्मक | सरकारी प्रतिभूतियों की खरीद (तरलता डालना)/बिक्री |
| ट्रेज़री बिल | अल्पकालीन सरकारी ऋण-पत्र | 91, 182 और 364 दिन; छूट (discount) पर जारी |
| चयनात्मक उपाय | गुणात्मक | मार्जिन आवश्यकता, जोखिम-भार, प्राथमिकता क्षेत्र ऋण, नैतिक दबाव |
- ट्रेज़री बिल से मुद्रा-पूर्ति नियंत्रण: (i) अधिक T-बिल बेचने से बैंकों और जनता का पैसा सरकार/RBI के पास जाता है, आरक्षित घटते हैं, गुणक-प्रक्रिया उल्टी; (ii) T-बिल प्रतिफल अल्पकालीन ब्याज का मानदंड, इससे बाज़ार दरों पर प्रभाव; (iii) बाज़ार स्थिरीकरण योजना (MSS, 2004) के अंतर्गत RBI ने विदेशी मुद्रा अंतर्वाह से बढ़ी तरलता सोखने हेतु T-बिल/प्रतिभूतियाँ जारी कीं; (iv) "तदर्थ" T-बिलों द्वारा घाटे के स्वचालित मुद्रीकरण की प्रथा 1997 से समाप्त (अब अर्थोपाय अग्रिम, WMA)।
- लचीला मुद्रास्फीति लक्ष्यीकरण: RBI अधिनियम संशोधन (2016) से; CPI मुद्रास्फीति लक्ष्य 4% ± 2%; छह-सदस्यीय मौद्रिक नीति समिति (MPC) रेपो दर तय करती है।
- मौद्रिक संचरण के चैनल: ब्याज दर, साख, विनिमय दर, परिसंपत्ति कीमतें, अपेक्षाएँ। भारत में संचरण सुधारने हेतु MCLR (2016) और फिर बाह्य बेंचमार्क-आधारित ऋण दर (2019)।
6. मुद्रास्फीति और फिलिप्स वक्र
- माँग-जनित: समग्र माँग पूर्ण-रोज़गार उत्पादन से अधिक (कीन्स का स्फीतिक अंतराल); मुद्रावादी: अतिरिक्त मुद्रा।
- लागत-जनित: मज़दूरी-कीमत चक्र, तेल-आघात, मार्क-अप; संरचनावादी (लैटिन अमेरिका, भारत में कृषि-आपूर्ति बाधाएँ)।
- फिलिप्स वक्र (1958): मज़दूरी-मुद्रास्फीति और बेरोज़गारी में व्युत्क्रम संबंध। फ्रीडमैन-फेल्प्स: अपेक्षा-संवर्धित वक्र π = πe − β(u − un); दीर्घकाल में ऊर्ध्वाधर, प्राकृतिक दर un (NAIRU) पर। विवेकशील अपेक्षाओं में अल्पकाल में भी ऊर्ध्वाधर (पूर्वानुमेय नीति के लिए)।
- स्टैगफ़्लेशन (1970 के दशक): ऊँची मुद्रास्फीति + ऊँची बेरोज़गारी, मूल फिलिप्स वक्र का खंडन।
- लागतें: जूता-घिसाई लागत, मेन्यू लागत, अप्रत्याशित पुनर्वितरण (ऋणी को लाभ, स्थिर-आय वालों को हानि), अनिश्चितता से निवेश में कमी।
7. लोक वित्त
- सार्वजनिक व्यय की वृद्धि:
- वैगनर का नियम (बढ़ती राज्य गतिविधि): औद्योगीकरण के साथ सार्वजनिक व्यय राष्ट्रीय आय से तेज़ बढ़ता है (प्रशासन, कल्याण, अवसंरचना)।
- पीकॉक-वाइज़मैन (1961) विस्थापन प्रभाव: युद्ध/संकट में व्यय उछलता है और संकट के बाद भी नीचे नहीं आता (कर-सहनशीलता की सीमा बढ़ जाती है); निरीक्षण और एकाग्रता प्रभाव।
- सार्वजनिक व्यय की वृद्धि क्यों सीमित करें: राजकोषीय घाटा और ऋण-स्थिरता; निजी निवेश का निष्कासन; मुद्रास्फीति; अदक्षता और किराया-माँग; भावी पीढ़ियों पर भार; बाह्य संतुलन पर दबाव।
- नियंत्रण कैसे: राजकोषीय नियम (FRBM अधिनियम 2003 और संशोधन), परिणाम-आधारित बजट (outcome budget), शून्य-आधारित बजटन, सब्सिडी का लक्ष्यीकरण (प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण), व्यय-समीक्षा, सार्वजनिक-निजी भागीदारी, संसदीय नियंत्रण (CAG, लोक लेखा समिति)।
- उधार से वित्तपोषित व्यय का राष्ट्रीय आय पर प्रभाव: (i) कीन्सीय: बेरोज़गारी में गुणक से आय बढ़ती है; (ii) IS-LM: ब्याज बढ़ने से आंशिक निष्कासन; (iii) पूर्ण रोज़गार/क्लासिकल: पूर्ण निष्कासन; (iv) रिकार्डियन तुल्यता (बैरो): विवेकशील परिवार भविष्य के करों के लिए बचत बढ़ाते हैं, इसलिए प्रभाव शून्य; (v) केंद्रीय बैंक से उधार (मुद्रीकरण) हो तो मुद्रा-पूर्ति बढ़ने से अधिक विस्तारकारी पर मुद्रास्फीतिक।
- कराधान के सिद्धांत: लाभ सिद्धांत (लिंडाल) बनाम भुगतान-क्षमता सिद्धांत (समान त्याग: निरपेक्ष, आनुपातिक, सीमांत); लैफ़र वक्र (बहुत ऊँची कर-दर पर राजस्व घटता है); कर-भार और अधिभार (excess burden ∝ लोच × t²)।
- सार्वजनिक ऋण: आंतरिक बनाम बाह्य; भार का प्रश्न (लर्नर: आंतरिक ऋण "हम स्वयं पर" बनाम बुकानन); ऋण-स्थिरता शर्त: ब्याज दर < वृद्धि दर (r < g) हो तो ऋण-GDP अनुपात स्थिर रह सकता है।
8. Master Summary Table
| विषय | सूत्र/परिणाम | नाम |
|---|---|---|
| लेन-देन समीकरण | MV = PT | फ़िशर, 1911 |
| नकद-शेष | M = kPY; k = 1/V | मार्शल, पिगू |
| पुनर्कथन | स्थिर मुद्रा-माँग फलन | फ्रीडमैन, 1956 |
| वर्गमूल नियम | M = √(bY/2i) | बॉमोल-टोबिन |
| मुद्रा गुणक | m = (1 + c)/(c + r) | H से M |
| सरल जमा गुणक | 1/r | साख-सृजन |
| मुद्रास्फीति लक्ष्य | CPI 4% ± 2% | RBI, 2016 |
| अपेक्षा-संवर्धित PC | π = πe − β(u − un) | फ्रीडमैन-फेल्प्स |
| व्यय-वृद्धि | बढ़ती राज्य गतिविधि; विस्थापन प्रभाव | वैगनर; पीकॉक-वाइज़मैन |
| ऋण तटस्थता | ऋण = भावी कर | रिकार्डो-बैरो |
| ऋण स्थिरता | r < g | डोमर |
9. चार्ट: उच्च-शक्ति मुद्रा से मुद्रा-पूर्ति
10. Mind Map
- फ़िशर, कैम्ब्रिज
- फ्रीडमैन, बॉमोल-टोबिन
- H, गुणक, साख-सृजन
- M1, M3
- रेपो, CRR, OMO, T-बिल
- मुद्रास्फीति लक्ष्यीकरण
- माँग, लागत, संरचना
- फिलिप्स, NAIRU
- वैगनर, पीकॉक-वाइज़मैन
- कर, ऋण, रिकार्डियन तुल्यता
11. महत्वपूर्ण One-liners
- कैम्ब्रिज का k फ़िशर के V का व्युत्क्रम है।
- CRR बढ़ाने से मुद्रा गुणक घटता है।
- भारत में मौद्रिक नीति समिति के 6 सदस्य; लक्ष्य CPI 4% ± 2%।
- T-बिल अवधियाँ: 91, 182, 364 दिन।
- "मुद्रास्फीति सदैव और सर्वत्र मौद्रिक परिघटना है": मिल्टन फ्रीडमैन।
- वैगनर का नियम: बढ़ती राज्य गतिविधि का नियम।
- रिकार्डियन तुल्यता का आधुनिक रूप: रॉबर्ट बैरो (1974)।
- तदर्थ T-बिलों से स्वचालित मुद्रीकरण 1997 में समाप्त।
12. टिप्स एवं ट्रिक्स
- फ़िशर बनाम कैम्ब्रिज में तुलना-तालिका सर्वोत्तम; "प्रवाह बनाम स्टॉक" और "पूर्ति बनाम माँग पक्ष" शब्द अवश्य लिखें।
- मुद्रा गुणक के प्रश्न में सूत्र की व्युत्पत्ति (M = C + D, H = C + R) दिखाएँ, फिर निर्धारक।
- लोक वित्त प्रश्नों में भारतीय उदाहरण: FRBM लक्ष्य, DBT, वित्त आयोग, GST परिषद।
गुणक सूत्र: "ऊपर एक जोड़ो, नीचे r जोड़ो": (c + 1)/(c + r)। फिलिप्स: "छोटा काल ढलान, लंबा काल खड़ा"।
द्विभाजन और तटस्थता को पर्यायवाची लिखना। 2025 का प्रश्न ठीक इसी भेद पर था: द्विभाजन मॉडल की संरचना है, तटस्थता उसका निष्कर्ष।
13. PYQ-आधारित प्रश्न एवं हल
क्लासिकल द्विभाजन और मुद्रा की तटस्थता में भेद कीजिए।
मॉडल उत्तर
द्विभाजन: अर्थव्यवस्था दो अलग खंडों में: वास्तविक खंड (श्रम बाज़ार, उत्पादन फलन, बचत-निवेश) से Y, N, W/P, r; मौद्रिक खंड (MV = PY) से P। मुद्रा वास्तविक खंड के समीकरणों में नहीं आती।
तटस्थता: यह प्रस्ताव कि M में परिवर्तन वास्तविक चरों को नहीं बदलता, केवल नाममात्र चरों को आनुपातिक रूप से बदलता है।
भेद: द्विभाजन संरचना (कारण), तटस्थता परिणाम। द्विभाजन ⇒ तटस्थता, पर उल्टा आवश्यक नहीं: पैटिंकिन के एकीकृत मॉडल में वास्तविक शेष प्रभाव से द्विभाजन टूटता है, फिर भी दीर्घकालीन संतुलन में मुद्रा तटस्थ रहती है। अल्पकाल में (कीन्स, नव-कीन्सवादी) दोनों नहीं टिकते।
फ़िशर और कैम्ब्रिज समीकरणों में मुद्रा के वेग की अवधारणा की तुलना कीजिए।
मॉडल उत्तर
फ़िशर: VT = PT/M, लेन-देन वेग; भुगतान-अवधि, बैंकिंग आदतें, जनसंख्या घनत्व जैसे संस्थागत और तकनीकी कारकों से निर्धारित; अल्पकाल में स्थिर और "यांत्रिक"।
कैम्ब्रिज: वेग का स्थान k लेता है (आय वेग VY = 1/k)। k लोगों का निर्णय है: कितनी क्रय-शक्ति नकद रखें; ब्याज, अपेक्षित मुद्रास्फीति, संपदा, सुविधा पर निर्भर। अतः वेग व्यवहारगत और परिवर्तनशील।
निष्कर्ष: कैम्ब्रिज ने वेग को मुद्रा की माँग के रूप में पुनर्परिभाषित किया, जिससे कीन्स और फ्रीडमैन का मार्ग खुला। भारत में डिजिटल भुगतान (UPI) से लेन-देन की गति बढ़ना फ़िशर-दृष्टि का, और ब्याज बढ़ने पर नकद-शेष घटना कैम्ब्रिज-दृष्टि का उदाहरण है।
मुद्रा-पूर्ति के नियंत्रण में ट्रेज़री बिलों की भूमिका की व्याख्या कीजिए।
मॉडल उत्तर
खंड 5 के बिंदु: T-बिल की बिक्री/खरीद से आरक्षित पर प्रभाव (OMO का अल्पकालीन रूप), अल्पकालीन ब्याज का मानदंड, MSS में तरलता-अवशोषण, और तदर्थ T-बिलों के अंत से घाटे के स्वचालित मुद्रीकरण पर रोक। साथ में: T-बिल उच्च तरलता और शून्य साख-जोखिम वाले, इसलिए बैंक SLR और तरलता-प्रबंधन में उपयोग करते हैं; इससे मुद्रा बाज़ार गहरा होता है और मौद्रिक संचरण सुधरता है।
(i) उधार से वित्तपोषित सार्वजनिक व्यय का राष्ट्रीय आय पर प्रभाव समझाइए। (ii) सार्वजनिक व्यय की वृद्धि को क्यों सीमित किया जाना चाहिए, और इसे कैसे नियंत्रित किया जा सकता है?
मॉडल उत्तर (रूपरेखा)
(i) खंड 7 के पाँच दृष्टिकोण: कीन्सीय गुणक, IS-LM आंशिक निष्कासन, क्लासिकल पूर्ण निष्कासन, रिकार्डियन तुल्यता, मुद्रीकरण। उधार का स्रोत (जनता, बैंक, केंद्रीय बैंक, विदेश) और व्यय का प्रकार (पूँजीगत व्यय का गुणक राजस्व व्यय से अधिक) निर्णायक। भारत में सार्वजनिक पूँजीगत व्यय पर बल (2020 के बाद) इसी तर्क से।
(ii) सीमित करने के कारण और नियंत्रण के उपाय: खंड 7। FRBM समीक्षा समिति (एन.के. सिंह, 2017) ने ऋण-GDP को मुख्य लक्ष्य (सामान्य सरकार के लिए 60%) सुझाया। निष्कर्ष: सीमा व्यय की गुणवत्ता पर हो, केवल मात्रा पर नहीं।
मुद्रा गुणक क्या है? इसके निर्धारक बताइए। बैंकिंग प्रणाली मुद्रा-पूर्ति को कैसे नियंत्रित करती है?
मॉडल उत्तर (रूपरेखा)
व्युत्पत्ति: M = C + D, H = C + R; c = C/D, r = R/D। M/H = (C + D)/(C + R) = (c + 1)/(c + r)।
उदाहरण: c = 0.2, r = 0.1 ⇒ m = 1.2/0.3 = 4; H = ₹100 करोड़ से M = ₹400 करोड़।
निर्धारक: खंड 4 (r, c, H के स्रोत)।
बैंकिंग प्रणाली का नियंत्रण: वाणिज्यिक बैंक साख-सृजन से (ऋण देने की इच्छा, अतिरिक्त आरक्षित); RBI CRR, रेपो/SDF, OMO, T-बिल से H और r को नियंत्रित करता है; व्यवहार में RBI ब्याज-गलियारे से तरलता को नीति दर के अनुरूप रखता है।
व्यावसायिक बैंकों द्वारा साख-सृजन की प्रक्रिया और साख गुणक समझाइए। इसकी सीमाएँ क्या हैं?
मॉडल उत्तर (रूपरेखा)
प्रक्रिया (r = 10%): बैंक A में ₹1000 जमा; ₹100 आरक्षित, ₹900 ऋण; ऋण बैंक B में जमा होकर ₹810 का नया ऋण; ... कुल जमा = 1000/(0.1) = ₹10,000, कुल ऋण ₹9000।
साख गुणक = 1/r; नकदी-रिसाव सहित (1 + c)/(c + r)।
सीमाएँ: खंड 4 की सूची। भारत में: ऊँचा मुद्रा-जमा अनुपात (विमुद्रीकरण के बाद अस्थायी गिरावट और फिर वृद्धि), पूँजी-पर्याप्तता मानक, NPA संकट (2015-18) के दौरान बैंकों की ऋण देने में अनिच्छा।
मुद्रा के परिमाण सिद्धांत के फ़िशर और कैम्ब्रिज रूपों की तुलना कीजिए। इनकी आलोचना और वर्तमान प्रासंगिकता बताइए।
मॉडल उत्तर (रूपरेखा)
तुलना: खंड 2 की तालिका।
आलोचना: V/k की स्थिरता संदिग्ध (वित्तीय नवप्रवर्तन); पूर्ण रोज़गार की मान्यता; कीमत-स्तर पर एकपक्षीय बल, सापेक्ष कीमतें उपेक्षित; मुद्रा-पूर्ति अंतर्जात हो सकती है; कीन्स: ब्याज के माध्यम से मुद्रा का आय पर प्रभाव छूटा।
प्रासंगिकता: दीर्घकाल में मुद्रा-वृद्धि और मुद्रास्फीति का संबंध (अति-मुद्रास्फीति के उदाहरण); 1980-90 के दशक में मौद्रिक लक्ष्यीकरण; भारत में चक्रवर्ती समिति (1985) का M3-आधारित लचीला मौद्रिक लक्ष्यीकरण। मुद्रा-माँग अस्थिर होने से अब मुद्रास्फीति लक्ष्यीकरण (ब्याज-आधारित) अपनाया गया।
14. Quick Revision Summary
- परिमाण सिद्धांत: MV = PT बनाम M = kPY; k = 1/V; फ्रीडमैन का स्थिर माँग फलन; बॉमोल-टोबिन वर्गमूल नियम।
- तटस्थता: द्विभाजन (संरचना) बनाम तटस्थता (परिणाम); पैटिंकिन; अति-तटस्थता और टोबिन प्रभाव।
- मुद्रा-पूर्ति: m = (1 + c)/(c + r); साख-सृजन 1/r; सीमाएँ; अंतर्जात मुद्रा।
- RBI: रेपो, SDF, MSF, CRR, SLR, OMO, T-बिल; 4% ± 2% लक्ष्य, MPC।
- मुद्रास्फीति: माँग, लागत, संरचना; फिलिप्स वक्र और NAIRU; स्टैगफ़्लेशन।
- लोक वित्त: वैगनर, पीकॉक-वाइज़मैन; उधार-वित्तपोषित व्यय के प्रभाव; व्यय-नियंत्रण; रिकार्डियन तुल्यता; r < g।