1. अध्याय एक नज़र में
समष्टि अर्थशास्त्र (Macroeconomics) Paper I का सबसे अधिक अंक देने वाला खंड है; हर वर्ष एक पूरा प्रश्न (Q3) इसी से आता है। सिलेबस:
- रोज़गार, आय और ब्याज निर्धारण के दृष्टिकोण: क्लासिकल, कीन्स (IS-LM), नव-क्लासिकल संश्लेषण, नव-क्लासिकल (new classical) और नव-कीन्सवादी।
- ब्याज दर निर्धारण के सिद्धांत और ब्याज दरों की संरचना (term structure)।
- सहायक विषय: उपभोग फलन के सिद्धांत, निवेश (MEC, त्वरक), गुणक।
2025 में IS वक्र की ऋणात्मक ढलान, तरलता जाल और LM के क्षैतिज/ऊर्ध्वाधर भागों में नीति-प्रभावशीलता, क्लासिकल की तुलना में उधारदेय कोष सिद्धांत की श्रेष्ठता, और क्लासिकल पूर्ण-रोज़गार सिद्धांत की विफलता से कीन्स का अल्प-रोज़गार संतुलन पूछे गए। 2024 में क्लासिकल द्विभाजन, उधारदेय कोष की मान्यताएँ, अल्प-रोज़गार संतुलन, IS-LM संख्यात्मक और ब्याज के क्लासिकल सिद्धांत की आलोचना आई।
2. क्लासिकल मॉडल
- से का नियम (Say's Law): "पूर्ति अपनी माँग स्वयं उत्पन्न करती है"; उत्पादन से उत्पन्न आय पूरी खर्च होती है (बचत ब्याज-तंत्र से निवेश में बदल जाती है), इसलिए सामान्य अति-उत्पादन असंभव।
- श्रम बाज़ार: श्रम की माँग Nd = f(W/P) (सीमांत उत्पादकता), पूर्ति Ns = g(W/P); लचीली मुद्रा-मज़दूरी से वास्तविक मज़दूरी समायोजित होकर पूर्ण रोज़गार। बेरोज़गारी केवल घर्षणात्मक या स्वैच्छिक।
- उत्पादन: पूर्ण रोज़गार Nf और उत्पादन फलन से Yf निर्धारित; समग्र पूर्ति वक्र ऊर्ध्वाधर।
- ब्याज (वास्तविक सिद्धांत): बचत (मितव्ययिता) और निवेश (पूँजी की उत्पादकता) के प्रतिच्छेद से; ब्याज बचत का पुरस्कार।
- कीमत-स्तर: मुद्रा का परिमाण सिद्धांत MV = PY; Y और V स्थिर, इसलिए P ∝ M।
- क्लासिकल द्विभाजन: वास्तविक चर (Y, N, W/P, r) वास्तविक कारकों से; मौद्रिक चर (P, W) मुद्रा से। मुद्रा "आवरण" (veil) मात्र, यानी तटस्थ।
3. कीन्स: प्रभावी माँग और अल्प-रोज़गार संतुलन
"The General Theory of Employment, Interest and Money" (1936) ने क्लासिकल मॉडल को महामंदी की व्याख्या में असमर्थ बताया।
- प्रभावी माँग: रोज़गार समग्र माँग (C + I + G) से तय, जहाँ समग्र माँग फलन और समग्र पूर्ति फलन मिलते हैं। यह बिंदु पूर्ण रोज़गार से नीचे हो सकता है।
- मौलिक मनोवैज्ञानिक नियम: आय बढ़ने पर उपभोग बढ़ता है, पर कम अनुपात में: 0 < MPC < 1।
- गुणक:
- निवेश: पूँजी की सीमांत क्षमता (MEC) > ब्याज दर होने तक; MEC अपेक्षाओं ("पशु प्रवृत्ति", animal spirits) पर निर्भर, इसलिए अस्थिर।
- बचत-निवेश: दोनों अलग लोगों द्वारा अलग कारणों से; समानता आय-परिवर्तन से आती है, ब्याज से नहीं। मितव्ययिता का विरोधाभास: सब अधिक बचाने का प्रयास करें तो आय घटती है और कुल बचत नहीं बढ़ती।
- मुद्रा-मज़दूरी दृढ़ता: श्रमिक मुद्रा-मज़दूरी की कटौती का विरोध करते हैं ("मुद्रा भ्रम"); और यदि कटे भी तो आय और माँग घटने से रोज़गार नहीं बढ़ता।
- अल्प-रोज़गार संतुलन: ऐसा संतुलन जहाँ अनैच्छिक बेरोज़गारी हो फिर भी कोई स्वतः सुधार-शक्ति न हो। कारण: (i) तरलता जाल में ब्याज और नहीं घटता; (ii) निवेश ब्याज के प्रति बेलोचदार; (iii) मज़दूरी-कटौती माँग घटाती है। समाधान: सरकारी व्यय (राजकोषीय नीति)।
4. IS-LM मॉडल (हिक्स 1937, हैन्सन)
- IS वक्र (वस्तु बाज़ार संतुलन, I(r) = S(Y)): ब्याज घटे तो निवेश बढ़ता है, गुणक से आय बढ़ती है जब तक नई बचत नए निवेश के बराबर न हो; इसलिए ऋणात्मक ढलान।
- IS समतल: बड़ा गुणक (ऊँचा c) या ब्याज-संवेदी निवेश (बड़ा b)। b = 0 हो तो IS ऊर्ध्वाधर।
- LM वक्र (मुद्रा बाज़ार संतुलन, M/P = L(Y, r) = kY − hr): आय बढ़ने से लेन-देन माँग बढ़ती है; स्थिर मुद्रा-पूर्ति पर सट्टा माँग घटाने के लिए ब्याज बढ़ना ज़रूरी; इसलिए धनात्मक ढलान, ढलान = k/h।
- तीन भाग: (i) कीन्सीय/तरलता जाल भाग (h → ∞): LM क्षैतिज, बहुत निम्न ब्याज पर सब मुद्रा रखना चाहते हैं; (ii) मध्यवर्ती; (iii) क्लासिकल भाग (h = 0): LM ऊर्ध्वाधर, मुद्रा केवल लेन-देन के लिए।
| स्थिति | राजकोषीय नीति (IS दाएँ) | मौद्रिक नीति (LM दाएँ) |
|---|---|---|
| LM क्षैतिज (तरलता जाल) | पूर्ण प्रभावी: ब्याज नहीं बढ़ता, कोई निष्कासन (crowding out) नहीं, पूरा गुणक प्रभाव | अप्रभावी: अतिरिक्त मुद्रा निष्क्रिय शेष में चली जाती है, ब्याज नहीं घटता |
| LM ऊर्ध्वाधर (क्लासिकल) | अप्रभावी: केवल ब्याज बढ़ता है, पूर्ण निष्कासन | पूर्ण प्रभावी: सारी मुद्रा लेन-देन में, आय में अधिकतम वृद्धि |
| IS ऊर्ध्वाधर (निवेश ब्याज-बेलोचदार) | पूर्ण प्रभावी | अप्रभावी |
| मध्यवर्ती | आंशिक प्रभावी (आंशिक निष्कासन) | आंशिक प्रभावी |
- नव-क्लासिकल संश्लेषण: IS-LM + दृढ़ मज़दूरी; अल्पकाल में कीन्स, दीर्घकाल में क्लासिकल परिणाम (सैमुएलसन, मोडिग्लियानी)।
- पिगू प्रभाव (वास्तविक शेष प्रभाव): कीमतें गिरने से मुद्रा-शेष का वास्तविक मूल्य M/P बढ़ता है, धन-प्रभाव से उपभोग बढ़ता है और IS दाएँ खिसकता है; तरलता जाल में भी पूर्ण रोज़गार संभव। सीमा: अपस्फीति से ऋण-भार बढ़ता है (फ़िशर का ऋण-अपस्फीति), अपेक्षाएँ बिगड़ती हैं; व्यवहार में प्रभाव धीमा और दुर्बल।
- कीन्स प्रभाव: कीमतें गिरने से वास्तविक मुद्रा-पूर्ति बढ़ती है, LM दाएँ खिसकता है; तरलता जाल में निष्प्रभावी।
5. बाद के विचार-संप्रदाय
| संप्रदाय | मुख्य विचारक | मूल विचार | नीति निष्कर्ष |
|---|---|---|---|
| मुद्रावाद | मिल्टन फ्रीडमैन | मुद्रा-माँग स्थिर; "मुद्रास्फीति सदैव और सर्वत्र मौद्रिक परिघटना"; प्राकृतिक बेरोज़गारी दर; अनुकूली अपेक्षाएँ | स्थिर मुद्रा-वृद्धि नियम (k% नियम); विवेकाधीन नीति अस्थिरता बढ़ाती है |
| नव-क्लासिकल | लूकस, सार्जेंट, वॉलेस, बैरो | विवेकशील अपेक्षाएँ, निरंतर बाज़ार-समाशोधन | नीति-अप्रभाविता प्रस्ताव: पूर्वानुमेय नीति वास्तविक चरों को नहीं बदलती; लूकस आलोचना; रिकार्डियन तुल्यता |
| वास्तविक व्यापार चक्र | किडलैंड, प्रेस्कॉट | चक्र तकनीकी (आपूर्ति) आघातों से, इष्टतम प्रतिक्रिया | स्थिरीकरण अनावश्यक |
| नव-कीन्सवादी | मैनकिव, अकरलॉफ़, स्टिग्लिट्ज़ | विवेकशील अपेक्षाएँ पर दृढ़ कीमतें/मज़दूरी (मेन्यू लागत, अतिव्यापी अनुबंध, दक्षता मज़दूरी) | अल्पकाल में माँग-प्रबंधन प्रभावी |
6. ब्याज दर के सिद्धांत
- क्लासिकल (वास्तविक) सिद्धांत: S(r) = I(r)। आलोचना: (i) बचत आय पर भी निर्भर, आय स्थिर मानना गलत; (ii) मुद्रा और जमाखोरी (hoarding) की उपेक्षा; (iii) बैंक-ऋण निर्माण की उपेक्षा; (iv) अनिर्धार्य: आय ज्ञात न हो तो बचत वक्र ज्ञात नहीं, और आय ब्याज पर निर्भर (कीन्स की आलोचना)।
- उधारदेय कोष (नव-क्लासिकल) सिद्धांत (विकसेल, ओहलिन, रॉबर्टसन): ब्याज उधारदेय कोष की माँग और पूर्ति से।
- पूर्ति: बचत S + शुद्ध बैंक-ऋण ΔM + विसंचय (dishoarding) DH + विनिवेश।
- माँग: निवेश I + संचय (hoarding) H + उपभोग-ऋण।
- मान्यताएँ: पूर्ण रोज़गार नहीं ज़रूरी पर आय स्तर दिया हुआ; प्रवाह-विश्लेषण (अवधि-विश्लेषण, रॉबर्टसन); बचतकर्ता ब्याज के प्रति संवेदनशील; मौद्रिक और वास्तविक दोनों कारक।
- श्रेष्ठता: मौद्रिक कारकों (बैंक-ऋण, संचय) को जोड़ता है, अधिक यथार्थवादी; व्यावहारिक रूप से बाज़ार में दिखने वाले कोषों का विश्लेषण। सीमा: फिर भी आय-निर्धारण के बिना अनिर्धार्य।
- कीन्स का तरलता अधिमान सिद्धांत: ब्याज तरलता त्यागने का पुरस्कार; मुद्रा की माँग: लेन-देन, एहतियाती (आय पर निर्भर) और सट्टा (ब्याज पर, बॉन्ड-कीमत अपेक्षाओं से)। ब्याज = Ms और L के प्रतिच्छेद पर। आलोचना: यह भी अनिर्धार्य (आय ज्ञात हुए बिना L1 अज्ञात)।
- हिक्स-हैन्सन समाधान: IS-LM से ब्याज और आय का एक साथ निर्धारण, यानी अनिर्धार्यता का अंत।
- ब्याज दरों की संरचना (प्रतिफल वक्र): (i) अपेक्षा सिद्धांत: दीर्घकालीन दर भावी अल्पकालीन दरों का औसत; (ii) तरलता अधिमान/प्रीमियम: दीर्घकालीन दर में जोखिम प्रीमियम, इसलिए प्रतिफल वक्र सामान्यतः ऊपर उठता; (iii) विभाजित बाज़ार सिद्धांत। उल्टा (inverted) प्रतिफल वक्र प्रायः मंदी का संकेत।
7. उपभोग और निवेश के सिद्धांत
| सिद्धांत | विचारक | उपभोग किस पर निर्भर | विशेष निष्कर्ष |
|---|---|---|---|
| निरपेक्ष आय | कीन्स | वर्तमान आय | APC आय बढ़ने के साथ घटती है |
| सापेक्ष आय | ड्यूज़नबेरी (1949) | दूसरों की तुलना में आय; पिछली सर्वोच्च आय | प्रदर्शन प्रभाव, "रैचेट प्रभाव" |
| स्थायी आय | फ्रीडमैन (1957) | स्थायी (प्रत्याशित दीर्घकालीन) आय | अस्थायी आय अधिकांशतः बचत में जाती है |
| जीवन-चक्र | एंडो-मोडिग्लियानी | पूरे जीवन की आय और संपदा | काम के वर्षों में बचत, सेवानिवृत्ति में विबचत |
- कुज़नेट्स के दीर्घकालीन आँकड़ों में APC स्थिर पर अल्पकालीन में घटती: यही "उपभोग पहेली", जिसे सापेक्ष, स्थायी और जीवन-चक्र सिद्धांत सुलझाते हैं।
- त्वरक सिद्धांत: प्रेरित निवेश I = v·ΔY (v = पूँजी-उत्पाद अनुपात)। सैमुएलसन का गुणक-त्वरक अंतःक्रिया मॉडल व्यापार चक्र समझाता है।
- टोबिन का q: q = पूँजी का बाज़ार मूल्य/प्रतिस्थापन लागत; q > 1 तो निवेश लाभकारी।
8. Master Summary Table
| अवधारणा | सूत्र/परिणाम | याद रखें |
|---|---|---|
| गुणक | k = 1/(1 − c); कर सहित 1/[1 − c(1 − t)] | संतुलित बजट गुणक = 1 |
| IS ढलान | −(1 − c)/b | ऋणात्मक |
| LM ढलान | k/h | धनात्मक; h → ∞ क्षैतिज |
| तरलता जाल | LM क्षैतिज | राजकोषीय पूर्ण प्रभावी |
| क्लासिकल LM | LM ऊर्ध्वाधर | मौद्रिक पूर्ण प्रभावी |
| क्लासिकल ब्याज | S(r) = I(r) | अनिर्धार्य |
| उधारदेय कोष | S + ΔM + DH = I + H | मौद्रिक + वास्तविक |
| तरलता अधिमान | M = L1(Y) + L2(r) | तीन प्रयोजन |
| पिगू प्रभाव | P घटे तो M/P बढ़े, C बढ़े | IS दाएँ |
| नीति-अप्रभाविता | पूर्वानुमेय नीति निष्प्रभावी | सार्जेंट-वॉलेस |
9. चार्ट: LM के तीन भाग और नीति-प्रभावशीलता
10. Mind Map
- से का नियम, लचीली मज़दूरी
- MV = PY, द्विभाजन
- प्रभावी माँग, गुणक
- अल्प-रोज़गार संतुलन
- ढलानें, तीन भाग
- पिगू और कीन्स प्रभाव
- क्लासिकल, उधारदेय कोष
- तरलता अधिमान, प्रतिफल वक्र
- मुद्रावाद, नव-क्लासिकल
- RBC, नव-कीन्सवादी
11. महत्वपूर्ण One-liners
- IS-LM मॉडल: जे.आर. हिक्स (1937), "Mr. Keynes and the Classics"।
- तरलता जाल में मौद्रिक नीति अप्रभावी, राजकोषीय पूर्ण प्रभावी।
- कीन्स के अनुसार बचत-निवेश की समानता आय-परिवर्तन से आती है।
- उधारदेय कोष सिद्धांत: विकसेल, ओहलिन, रॉबर्टसन।
- पिगू प्रभाव = वास्तविक शेष प्रभाव; IS वक्र को खिसकाता है।
- लूकस आलोचना: नीति बदलने पर अनुमानित व्यवहार-मापदंड भी बदल जाते हैं।
- संतुलित बजट गुणक (हावेलमो) = 1।
- स्थायी आय परिकल्पना: फ्रीडमैन (1957)।
12. टिप्स एवं ट्रिक्स
- हर IS-LM उत्तर में आरेख: प्रारंभिक संतुलन E0, खिसकाव, नया संतुलन E1, और निष्कासन की मात्रा चिह्नित करें।
- संख्यात्मक प्रश्न में पहले IS और LM को Y = f(r) रूप में लिखें, फिर हल; अंत में परिवर्तन की व्याख्या (कितना निष्कासन, कितना गुणक)।
- सिद्धांत-तुलना वाले प्रश्नों (क्लासिकल बनाम कीन्स) में तालिका बनाएँ: मान्यता, श्रम बाज़ार, ब्याज, मुद्रा, नीति।
"क्षैतिज LM = कीन्स का कमरा" (राजकोषीय चलती है); "ऊर्ध्वाधर LM = क्लासिकल की कोठरी" (मुद्रा चलती है)। IS समतल = निवेश ब्याज-संवेदी = मौद्रिक नीति शक्तिशाली।
पिगू प्रभाव IS को खिसकाता है (उपभोग से), कीन्स प्रभाव LM को (वास्तविक मुद्रा-पूर्ति से)। दोनों को उलटना आम गलती है।
13. PYQ-आधारित प्रश्न एवं हल
IS वक्र की ढलान से आप क्या समझते हैं? यह ऋणात्मक ढलान वाला क्यों होता है?
मॉडल उत्तर
IS वक्र ब्याज और आय के वे संयोजन दिखाता है जिन पर वस्तु बाज़ार संतुलन में है (I = S)। ढलान बताती है कि ब्याज में परिवर्तन होने पर संतुलन बनाए रखने के लिए आय कितनी बदलनी चाहिए।
Y = c(Y − T) + I0 − br + G से r = (A − (1 − c)Y)/b, अतः dr/dY = −(1 − c)/b < 0।
ऋणात्मक क्यों: ब्याज घटने पर निवेश बढ़ता है (MEC से), गुणक से आय कई गुना बढ़ती है, अर्थात कम r के साथ ऊँचा Y। समतल: ऊँचा MPC, ब्याज-संवेदी निवेश; ढालू: ब्याज-बेलोचदार निवेश (मंदी में निराशावादी अपेक्षाएँ)।
क्लासिकल द्विभाजन की आलोचनात्मक व्याख्या कीजिए।
मॉडल उत्तर
अर्थ: खंड 2: वास्तविक और मौद्रिक क्षेत्रों का पृथक्करण; मुद्रा केवल निरपेक्ष कीमत-स्तर तय करती है (तटस्थता)।
आलोचना:
- पैटिंकिन: मुद्रा-शेष वस्तु-माँग में (वास्तविक शेष प्रभाव) आते हैं, अतः द्विभाजन तार्किक रूप से असंगत; मुद्रा और मूल्य सिद्धांत का एकीकरण चाहिए।
- कीन्स: मुद्रा ब्याज के माध्यम से निवेश और आय को प्रभावित करती है; अल्पकाल में मुद्रा गैर-तटस्थ।
- फ्रीडमैन: अल्पकाल में गैर-तटस्थ, दीर्घकाल में तटस्थ।
समकालीन दृष्टि: दीर्घकालीन तटस्थता पर सहमति; अल्पकाल में दृढ़ कीमतों के कारण मौद्रिक नीति वास्तविक उत्पादन को प्रभावित करती है (RBI की ब्याज-नीति का आधार)।
नव-क्लासिकल उधारदेय कोष सिद्धांत की मान्यताएँ लिखिए।
मॉडल उत्तर
- ब्याज उधारदेय कोष की माँग और पूर्ति से निर्धारित; ब्याज एक "मौद्रिक" और "वास्तविक" दोनों परिघटना।
- आय का स्तर दिया हुआ (आंशिक संतुलन)।
- बचत, विसंचय और बैंक-ऋण ब्याज के प्रति धनात्मक; निवेश और संचय ऋणात्मक।
- प्रवाह-विश्लेषण: एक अवधि की बचत (पिछली आय से) इस अवधि के कोष का भाग (रॉबर्टसन)।
- पूर्ण प्रतियोगी साख बाज़ार, लचीली ब्याज दर।
संतुलन: S + ΔM + DH = I + H। सीमा: आय ज्ञात हुए बिना बचत वक्र अनिर्धार्य; इसका समाधान IS-LM में।
तरलता जाल की व्याख्या कीजिए। दर्शाइए कि राजकोषीय नीति LM वक्र के क्षैतिज भाग में पूर्णतः प्रभावी और मौद्रिक नीति ऊर्ध्वाधर भाग में पूर्णतः प्रभावी होती है।
मॉडल उत्तर (रूपरेखा)
तरलता जाल: अत्यंत निम्न ब्याज पर सब मानते हैं कि ब्याज आगे बढ़ेगा (बॉन्ड-कीमतें गिरेंगी), इसलिए बॉन्ड कोई नहीं रखता; सट्टा माँग पूर्ण लोचदार, LM क्षैतिज। उदाहरण: जापान (1990 का दशक), 2008 के बाद विकसित देश (शून्य निम्न सीमा)।
क्षैतिज भाग: G बढ़ाने से IS दाएँ, ब्याज नहीं बढ़ता, निवेश का निष्कासन नहीं, इसलिए ΔY = पूरा गुणक × ΔG। M बढ़ाने से LM का क्षैतिज भाग नहीं हिलता, अतः ΔY = 0।
ऊर्ध्वाधर भाग (h = 0, M/P = kY): Y = M/(kP), केवल मुद्रा-पूर्ति से निर्धारित। G बढ़ाने से केवल r बढ़ता है, निवेश उतना ही घटता है (पूर्ण निष्कासन); M बढ़ाने से ΔY = ΔM/k, पूर्ण प्रभावी।
आरेख: चार्ट (खंड 9)। निष्कर्ष: नीति-प्रभावशीलता LM और IS की ढलानों पर निर्भर; यही कीन्सवादी-मुद्रावादी विवाद का मूल।
"उधारदेय कोष सिद्धांत ब्याज के क्लासिकल सिद्धांत से श्रेष्ठ है।" विवेचना कीजिए।
मॉडल उत्तर (रूपरेखा)
श्रेष्ठता के बिंदु:
- क्लासिकल केवल वास्तविक बचत को कोष मानता है; उधारदेय कोष बैंक-ऋण (ΔM) और विसंचय को भी जोड़ता है।
- संचय (मुद्रा रखने की इच्छा) को माँग पक्ष में लाकर मुद्रा की भूमिका स्वीकार करता है, कीन्स के तरलता विचार के निकट।
- व्यावहारिक: वास्तविक बाज़ारों में ब्याज इन्हीं कोषों से तय होता दिखता है।
- दोनों पक्ष (वास्तविक और मौद्रिक) जोड़कर कीन्स और क्लासिकल के बीच सेतु।
सीमाएँ: आय स्थिर मानता है, इसलिए कीन्स की अनिर्धार्यता आलोचना इस पर भी लागू; स्टॉक (मुद्रा) और प्रवाह (बचत) का मिश्रण; पूर्ण रोज़गार की मान्यता का प्रभाव।
निष्कर्ष: श्रेष्ठ पर अपूर्ण; हिक्स-हैन्सन ने IS-LM में दिखाया कि उधारदेय कोष और तरलता अधिमान दोनों आय निर्धारण के साथ मिलकर ही पूर्ण होते हैं।
क्लासिकल पूर्ण-रोज़गार सिद्धांत की विफलता ने कीन्स के अल्प-रोज़गार संतुलन सिद्धांत को जन्म दिया। व्याख्या कीजिए।
मॉडल उत्तर (रूपरेखा)
क्लासिकल दावा: से का नियम, लचीली मज़दूरी और ब्याज से स्वतः पूर्ण रोज़गार (खंड 2)।
विफलता: 1929-33 महामंदी में अमेरिका में बेरोज़गारी लगभग एक-चौथाई तक पहुँची और वर्षों तक बनी रही; मज़दूरी-कटौती से सुधार नहीं हुआ।
कीन्स का खंडन: (i) से का नियम: बचत का हिस्सा जमाखोरी में जा सकता है; (ii) मज़दूरी-कटौती से लागत के साथ आय और माँग भी घटती है; (iii) ब्याज बचत-निवेश को सदा बराबर नहीं करता (तरलता जाल, बेलोचदार निवेश)।
अल्प-रोज़गार संतुलन: प्रभावी माँग से निर्धारित संतुलन पूर्ण रोज़गार से नीचे स्थिर रह सकता है; बाज़ार में स्वतः सुधार-शक्ति नहीं। नीति: सरकारी व्यय, सार्वजनिक निर्माण; भारत में MGNREGA जैसी योजनाएँ इस तर्क का प्रयोग।
उत्तर के अंत में पिगू प्रभाव की चुनौती और नव-कीन्सवादी पुनर्व्याख्या का उल्लेख करें।
अल्प-रोज़गार संतुलन की अवधारणा स्पष्ट कीजिए। अर्थव्यवस्था स्वतः पूर्ण रोज़गार की ओर क्यों नहीं बढ़ती?
मॉडल उत्तर (रूपरेखा)
अवधारणा: Q6 के अनुसार। स्वतः समायोजन क्यों नहीं:
- मज़दूरी-दृढ़ता: अनुबंध, यूनियन, न्यूनतम मज़दूरी, दक्षता मज़दूरी।
- ब्याज-तंत्र की विफलता: तरलता जाल; निवेश की ब्याज-बेलोच।
- कीमत-गिरावट का प्रतिकूल प्रभाव: ऋण-अपस्फीति, गिरती अपेक्षाएँ; पिगू प्रभाव दुर्बल।
- समन्वय विफलता: हर फ़र्म माँग देखकर उत्पादन करती है; सामूहिक माँग-अभाव का कोई अकेला समाधान नहीं।
एक अर्थव्यवस्था में S = −40 + 0.5(Y − T) + 0.25r, T = 20 + 0.2Y, I = 20 − 0.25r, मुद्रा की माँग L = 0.4Y − 0.5r और मुद्रा-पूर्ति M = 40 है। संतुलन आय और ब्याज दर ज्ञात कीजिए। मुद्रा-पूर्ति 60 होने पर इन पर क्या प्रभाव होगा?
हल
IS (S = I): −40 + 0.5(0.8Y − 20) + 0.25r = 20 − 0.25r ⇒ 0.4Y + 0.5r = 70 ⇒ Y = 175 − 1.25r।
LM (L = M): 0.4Y − 0.5r = 40 ⇒ Y = 100 + 1.25r।
M = 60: Y = 150 + 1.25r; 175 − 1.25r = 150 + 1.25r ⇒ r = 10, Y = 162.5।
जाँच: Y = 137.5 पर S = −40 + 0.5(110 − 20) + 7.5 = 12.5 = I (20 − 7.5) ✓; Y = 162.5 पर S = −40 + 0.5(130 − 20) + 2.5 = 17.5 = I (20 − 2.5) ✓।
व्याख्या: मुद्रा-पूर्ति 20 बढ़ने से LM दाएँ खिसका, ब्याज 30 से घटकर 10 हुआ, निवेश 12.5 से बढ़कर 17.5 हुआ और आय 25 बढ़ी। ब्याज-संवेदी निवेश (IS अपेक्षाकृत समतल) के कारण मौद्रिक नीति यहाँ प्रभावी है।
ब्याज के क्लासिकल सिद्धांत की आलोचनात्मक जाँच कीजिए।
मॉडल उत्तर (रूपरेखा)
सिद्धांत: ब्याज बचत (मितव्ययिता, समय-अधिमान) की पूर्ति और निवेश (पूँजी की सीमांत उत्पादकता) की माँग के संतुलन से; आरेख S(r), I(r)।
आलोचना (खंड 6): आय-प्रभाव की उपेक्षा, अनिर्धार्यता, मुद्रा/संचय/बैंक-ऋण की उपेक्षा, पूर्ण रोज़गार की मान्यता, बचत का ब्याज-बेलोच होना (लक्ष्य-बचत: ऊँचा ब्याज होने पर कम बचत से भी लक्ष्य पूरा), निवेश अपेक्षाओं पर अधिक निर्भर।
योगदान: दीर्घकाल में वास्तविक कारकों (उत्पादकता, समय-अधिमान) की भूमिका आज भी स्वीकृत (प्राकृतिक ब्याज दर, विकसेल)।
14. Quick Revision Summary
- क्लासिकल: से का नियम, लचीली मज़दूरी, ऊर्ध्वाधर AS, MV = PY, द्विभाजन।
- कीन्स: प्रभावी माँग, गुणक, MEC, मितव्ययिता का विरोधाभास, अल्प-रोज़गार संतुलन।
- IS-LM: ढलानें −(1 − c)/b और k/h; तरलता जाल बनाम क्लासिकल भाग; निष्कासन; पिगू (IS) और कीन्स (LM) प्रभाव।
- ब्याज: क्लासिकल, उधारदेय कोष (S + ΔM + DH = I + H), तरलता अधिमान; अनिर्धार्यता और IS-LM समाधान; प्रतिफल वक्र।
- आधुनिक: मुद्रावाद, नव-क्लासिकल (विवेकशील अपेक्षाएँ, लूकस), RBC, नव-कीन्सवादी; उपभोग के चार सिद्धांत।