1. अध्याय एक नज़र में
भूगोल Paper I का भाग 1 — भू-आकृति विज्ञान (Geomorphology) — पृथ्वी की उत्पत्ति, आंतरिक संरचना, महाद्वीपीय विस्थापन और प्लेट विवर्तनिकी, पर्वत-निर्माण, ज्वालामुखी और भूकंप, भू-आकृतिक चक्र, अपक्षय-अपरदन, ढलान विकास, अपरदन कालक्रम (denudation chronology) और अनुप्रयुक्त भू-आकृति विज्ञान को समेटता है। 2025 में हिमानी झील विस्फोट बाढ़ (GLOF), सोलिफ़्लक्शन, नप्पे (nappes), अपरदन कालक्रम, "हिमालय अभी भी ऊपर उठ रहा है" और अवरोधक द्वीप पूछे गए; 2024 में कटी हुई स्कंध (truncated spurs), पर्वत-निर्माण के नवीन विचार और याज़ू धारा।

2. पृथ्वी की आंतरिक संरचना
- प्रमाण के स्रोत — प्रत्यक्ष (खदानें, गहरे वेधन — कोला सुपरडीप बोरहोल ~12.2 किमी, ज्वालामुखी लावा) और अप्रत्यक्ष (भूकंपीय तरंगें, गुरुत्व, चुंबकत्व, उल्कापिंड, तापमान-दाब-घनत्व वृद्धि)।
- भूकंपीय तरंगें — P (प्राथमिक) — अनुदैर्ध्य, ठोस-तरल-गैस सभी में; S (द्वितीयक) — अनुप्रस्थ, केवल ठोस में; सतही (L, R) — सबसे विनाशकारी। S-तरंग छाया क्षेत्र (भूकंप-केंद्र से लगभग 105° से आगे) → बाहरी क्रोड तरल; P-तरंग छाया क्षेत्र (~105°-145°)।
| परत | गहराई (लगभग) | विशेषता | असंबद्धता |
|---|---|---|---|
| भूपर्पटी (Crust) | महासागरीय 5-10 किमी; महाद्वीपीय औसत ~35 किमी (पर्वतों के नीचे 70 किमी तक) | SIAL (ऊपरी, ग्रेनाइटी) और SIMA (निचली, बेसाल्टी) | कोनराड (SIAL-SIMA) |
| प्रावार (Mantle) | ~2,900 किमी तक | दुर्बलतामंडल (asthenosphere, 100-400 किमी) — आंशिक पिघला, मैग्मा का स्रोत | मोहो (क्रस्ट-मेंटल, 1909) |
| बाहरी क्रोड | 2,900-5,150 किमी | तरल लोहा-निकल; भू-चुंबकत्व (डायनमो) | गुटेनबर्ग (मेंटल-क्रोड) |
| आंतरिक क्रोड | 5,150-6,371 किमी | ठोस (अत्यधिक दाब); NIFE | लेहमैन (1936) |

3. महाद्वीपीय विस्थापन से प्लेट विवर्तनिकी तक
- अल्फ़्रेड वेगनर (Die Entstehung der Kontinente und Ozeane, 1915; विचार 1912) — पैंजिया महाद्वीप और पैंथालासा महासागर; ~20 करोड़ वर्ष पूर्व विभाजन — लॉरेशिया और गोंडवानालैंड; प्रमाण — "जिग-सॉ फ़िट" (अफ़्रीका-दक्षिण अमेरिका), जीवाश्म (Mesosaurus, Glossopteris), चट्टानों और पर्वत-शृंखलाओं की समानता, पुरा-जलवायु (हिमनद-निक्षेप भारत-अफ़्रीका-ऑस्ट्रेलिया में), प्लेसर सोना (घाना-ब्राज़ील); दुर्बलता — गति के लिए बल (ध्रुव-पलायन बल, ज्वारीय बल) अपर्याप्त।
- आर्थर होम्स (1928-30) — मेंटल में संवहन धाराएँ गति का कारण।
- सागर-नितल प्रसरण — हैरी हेस (1960-62) — मध्य-महासागरीय कटक पर नया क्रस्ट, गर्तों में विनाश; प्रमाण — वाइन-मैथ्यूज़ (1963) — कटक के दोनों ओर सममित पुराचुंबकीय पट्टियाँ; कटक से दूर चट्टानों और अवसादों की आयु बढ़ना; महासागरीय क्रस्ट 20 करोड़ वर्ष से पुराना नहीं।
- प्लेट विवर्तनिकी (1967-68 — मैकेंज़ी, मॉर्गन, ले पिचों) — स्थलमंडल 7 बड़ी और अनेक छोटी प्लेटों में विभक्त, दुर्बलतामंडल पर गतिशील; प्रेरक बल — मेंटल संवहन, "स्लैब पुल" (सबसे प्रमुख), "रिज पुश"।
| सीमा | प्रकार | स्थलरूप | उदाहरण |
|---|---|---|---|
| अपसारी (Divergent) | रचनात्मक | मध्य-महासागरीय कटक, दरार घाटी | मध्य-अटलांटिक कटक, पूर्वी अफ़्रीकी दरार, आइसलैंड |
| अभिसारी (Convergent) | विनाशात्मक — महासागर-महाद्वीप | गर्त, वलित पर्वत, ज्वालामुखी | एंडीज़, पेरू-चिली गर्त |
| महासागर-महासागर | द्वीप-चाप, गर्त | जापान, मारियाना गर्त, इंडोनेशिया | |
| महाद्वीप-महाद्वीप | विशाल वलित पर्वत (कोई गहरा अधोगमन नहीं) | हिमालय, आल्प्स | |
| रूपांतर (Transform) | संरक्षी | भ्रंश, भूकंप | सैन एंड्रियास भ्रंश |
4. पर्वत-निर्माण (UPSC 2024) और नप्पे (UPSC 2025)
पर्वत-निर्माण के सिद्धांत — पुराने से नवीन
- भू-अभिनति सिद्धांत — जेम्स हॉल (1859), जेम्स डाना (1873 — "geosyncline" शब्द); कोबर (Der Bau der Erde, 1921) — दो दृढ़ भू-खंड (क्रेटोजेन/अग्रप्रदेश) के बीच भू-अभिनति (ओरोजेन) में अवसाद-संचय → दोनों भू-खंडों के एक-दूसरे की ओर खिसकने से अवसाद वलित होकर दो सीमांत शृंखलाएँ (Randketten) और बीच में "ज़्विशेनगेबिर्गे" (मध्य-पिंड — जैसे तिब्बत पठार); चरण — पर्वत-जनन (lithogenesis), पर्वत-निर्माण (orogenesis), उत्थान/अनाच्छादन (gliptogenesis)।
- जेफ़्रीज़ — तापीय संकुचन; डेली — फिसलन (sliding) सिद्धांत; होम्स — संवहन धारा।
- नवीन विचार — प्लेट विवर्तनिकी आधारित पर्वत-निर्माण — (1) अधोगमन से कॉर्डिलेरा-प्रकार (एंडीज़) — मैग्मा, ज्वालामुखी, अभिवृद्धि-पच्चर (accretionary wedge); (2) महाद्वीपीय टक्कर से हिमालय-प्रकार — क्रस्ट का मोटा होना (~70 किमी), थ्रस्टिंग, नप्पे; (3) द्वीप-चाप अभिवृद्धि — "अभिवृद्ध भू-खंड" (accreted terranes — उत्तरी अमेरिका का पश्चिमी तट); (4) गुरुत्वीय पतन (orogenic collapse) — तिब्बत में पूर्व-पश्चिम विस्तार; (5) जलवायु-विवर्तनिकी अंतःक्रिया — मानसूनी अपरदन से उत्थान में वृद्धि ("चैनल फ़्लो" मॉडल); (6) "विल्सन चक्र" (टूज़ो विल्सन, 1966) — महासागर का खुलना-बंद होना और पर्वतों का चक्रीय निर्माण।
उत्पत्ति के आधार पर विश्व के पर्वतों का वर्गीकरण
| प्रकार | उत्पत्ति | उदाहरण |
|---|---|---|
| वलित (Fold) — नवीन (अल्पाइन) | संपीडन, प्लेट अभिसरण; तृतीयक काल | हिमालय, आल्प्स, एंडीज़, रॉकीज़, एटलस |
| वलित — प्राचीन (कैलेडोनियन, हर्सीनियन) | पुराने पर्वत-निर्माण, अपरदित | अरावली (प्री-कैम्ब्रियन), अप्लेशियन, यूराल |
| भ्रंशोत्थ / ब्लॉक (Block/Horst) | तनाव या संपीडन से भ्रंश; ऊपर उठा खंड (हॉर्स्ट), बीच में धँसी घाटी (ग्राबेन) | वॉस्जेस और ब्लैक फ़ॉरेस्ट (बीच में राइन घाटी); सिएरा नेवादा |
| ज्वालामुखी (Volcanic/Accumulation) | लावा और पायरोक्लास्ट का संचय | किलिमंजारो, फ़ूजी, मौना लोआ, बैरन द्वीप |
| गुंबदाकार (Dome) | मैग्मा का ऊपर धकेलना (लैकोलिथ) | ब्लैक हिल्स (USA) |
| अवशिष्ट (Residual) | लंबे अपरदन के बाद बचे भाग | पूर्वी घाट, नीलगिरि के कुछ भाग, अरावली |
नप्पे (Nappes)
- अर्थ — चट्टानों का बड़ा, चादरनुमा पिंड जो निम्न-कोण थ्रस्ट या शयान वलन (recumbent fold) के माध्यम से अपने मूल स्थान से कई किलोमीटर (कभी-कभी 100 किमी से अधिक) आगे धकेल दिया गया हो — मूल स्थान "जड़" (root zone), आगे का भाग "फ़्रंट"; अपरदन से नीचे की युवा चट्टानें दिखें तो "विंडो" (fenster) और नप्पे का अलग बचा टुकड़ा "क्लिपे" (klippe)।
- निर्माण की भूगर्भीय-विवर्तनिक प्रक्रियाएँ — (1) तीव्र क्षैतिज संपीडन (महाद्वीपीय टक्कर); (2) वलन की प्रगति — सममित → असममित → प्रतिवलित (overturned) → शयान वलन → थ्रस्ट-भ्रंश से टूटकर आगे खिसकना; (3) निम्न-कोण थ्रस्टिंग और "क्रस्टल स्टैकिंग" (परतों का एक के ऊपर एक जमना); (4) गुरुत्वीय फिसलन — उत्थित क्षेत्र से ढलान पर; (5) नमनीय (ductile) प्रवाह — उच्च ताप-दाब पर; (6) दुर्बल परतें (शैल, नमक, जिप्सम) "स्नेहक" का काम करती हैं।
- उदाहरण — आल्प्स (हेल्वेटिक, पेनिनिक, ऑस्ट्रोएल्पाइन नप्पे — "नप्पे सिद्धांत" का जन्मस्थान, 19वीं सदी के अंत में), हिमालय — लघु हिमालय के नप्पे (अल्मोड़ा नप्पे, काठमांडू नप्पे), मुख्य केंद्रीय थ्रस्ट (MCT) के ऊपर खिसके क्रिस्टलीय पिंड, स्कॉटलैंड का मोइन थ्रस्ट।
- महत्व — पर्वत-निर्माण में क्रस्ट का अत्यधिक छोटा होना (shortening) और मोटा होना; खनिज और जल-विज्ञान; भूकंपीय संवेदनशीलता।
"हिमालय अभी भी ऊपर उठ रहा है" (UPSC 2025)
- पृष्ठभूमि — भारतीय प्लेट की यूरेशियन प्लेट से टक्कर लगभग 5 करोड़ वर्ष पूर्व (अनुमान 4-5.5 करोड़ वर्ष); भारतीय प्लेट आज भी लगभग 4-5 सेमी प्रति वर्ष उत्तर-पूर्व की ओर गतिशील।
- प्रक्रियाएँ — (1) निरंतर अभिसरण और संपीडन — भारत-यूरेशिया के बीच प्रति वर्ष कुछ सेंटीमीटर का "छोटा होना" (shortening) — इसका एक भाग हिमालयी थ्रस्टों पर; (2) थ्रस्ट-भ्रंश तंत्र — मुख्य केंद्रीय थ्रस्ट (MCT), मुख्य सीमांत थ्रस्ट (MBT), मुख्य अग्र थ्रस्ट (MFT) — थ्रस्टिंग दक्षिण की ओर "प्रवास" कर रही है (शिवालिक सबसे नवीन); (3) क्रस्ट का मोटा होना और समस्थैतिक (isostatic) उत्थान; (4) अपरदन-जनित समस्थैतिक प्रत्युत्तर — तीव्र मानसूनी-हिमनदीय अपरदन से भार घटने पर क्रस्ट ऊपर उठता है; (5) नदी-अपहरण का प्रभाव — 2024 के एक अध्ययन (Nature Geoscience) के अनुसार अरुण नदी द्वारा कोसी तंत्र के अपहरण से हुए अतिरिक्त अपरदन ने एवरेस्ट को पिछले लगभग 89,000 वर्षों में अतिरिक्त 15-50 मीटर उठाया; (6) भूकंपीय चक्र — भूकंपों में अचानक विस्थापन (नेपाल 2015, Mw 7.8)।
- प्रमाण — GPS मापन (कुछ मिलीमीटर प्रति वर्ष उत्थान), नदी वेदिकाएँ और गहरी घाटियाँ (सिंधु, सतलज, अरुण — पूर्ववर्ती/antecedent नदियाँ), उच्च भूकंपीयता (ज़ोन V), उत्थित समुद्री जीवाश्म (एवरेस्ट शिखर पर समुद्री चूना पत्थर), भू-स्खलन; एवरेस्ट की ऊँचाई 8,848.86 मीटर (नेपाल-चीन संयुक्त घोषणा, 2020)।
- निहितार्थ — भूकंप-संकट, भू-स्खलन, जलविद्युत-परियोजनाओं का जोखिम (जोशीमठ धँसाव, जनवरी 2023), नदी-मार्ग परिवर्तन; आरेख — प्लेट टक्कर का अनुप्रस्थ काट, थ्रस्ट-तंत्र।
5. ज्वालामुखी और भूकंप
- ज्वालामुखी — प्रकार: शील्ड (मौना लोआ — बेसाल्टी, तरल लावा), मिश्रित/स्ट्रेटो (फ़ूजी, वेसुवियस — विस्फोटक), सिंडर कोन, काल्डेरा, लावा पठार (दक्कन ट्रैप — क्रेटेशियस-पैलियोजीन, ~6.6 करोड़ वर्ष); वितरण — प्रशांत "अग्नि वलय" (~75% सक्रिय ज्वालामुखी), मध्य-अटलांटिक, हॉटस्पॉट (हवाई, रीयूनियन — दक्कन ट्रैप का स्रोत); भारत — बैरन द्वीप (सक्रिय), नारकोंडम।
- भूकंप — केंद्र (focus/hypocentre), अधिकेंद्र (epicentre); मापन — रिक्टर (1935), आघूर्ण परिमाण (Mw), मरकैली तीव्रता; भारत का भूकंपीय क्षेत्रीकरण (BIS — ज़ोन II से V; हिमालय और पूर्वोत्तर सर्वाधिक जोखिम वाले क्षेत्रों में); प्रमुख भूकंप — भुज (2001), सिक्किम (2011), नेपाल (2015), तुर्किये-सीरिया (2023)।
6. अपक्षय, बृहत् संचलन और सोलिफ़्लक्शन
- अपक्षय — भौतिक (तुषार-वेजिंग, अपपत्रण/exfoliation, लवण क्रिस्टलीकरण), रासायनिक (ऑक्सीकरण, कार्बोनेशन, जलयोजन, जल-अपघटन, विलयन), जैविक; जलवायु-नियंत्रण (पेल्टियर आरेख)।
- बृहत् संचलन (mass wasting) — तीव्र (भू-स्खलन, मलबा-प्रवाह, शिलापात — वायनाड, 30 जुलाई 2024) और मंद (मृदा-सर्पण/creep, सोलिफ़्लक्शन)।
सोलिफ़्लक्शन और उसके प्रभाव (UPSC 2025)
- अर्थ — जल-संतृप्त सक्रिय मृदा-परत का ढलान पर धीमा प्रवाह — विशेषकर परिहिमनदीय (periglacial) क्षेत्रों में, जहाँ नीचे स्थायी तुषार (permafrost) अभेद्य परत बनाता है और ग्रीष्म में ऊपरी परत पिघलकर जल-संतृप्त हो जाती है (इसे जेलिफ़्लक्शन भी कहते हैं); गति — प्रति वर्ष कुछ सेमी से एक मीटर तक; आर्द्र उष्णकटिबंध में भी (बिना हिम के) संभव।
- स्थलरूप — सोलिफ़्लक्शन जिह्वाएँ (lobes), वेदिकाएँ, चादरें; ढलान का चिकना होना।
- प्रभाव — (1) अवसंरचना — सड़कें, पाइपलाइन (अलास्का), भवन, बिजली के खंभे झुकना/टूटना; लद्दाख-लाहौल-स्पीति की सड़कें; (2) ढलान-अस्थिरता — भू-स्खलन के लिए पूर्व-शर्त; (3) कृषि-चराई भूमि का क्षरण; (4) जलवायु परिवर्तन से स्थायी तुषार के पिघलने से सोलिफ़्लक्शन बढ़ना, कार्बन-मीथेन उत्सर्जन; (5) नदियों में अवसाद-भार में वृद्धि; (6) भू-आकृतिक विकास — ढलानों का सपाट होना, "क्रायोप्लेनेशन"।
- प्रबंधन — जल-निकासी, वनस्पति-आवरण, इंजीनियरिंग (पाइल-नींव), भू-तकनीकी निगरानी।
7. भू-आकृतिक चक्र, ढलान विकास और अपरदन कालक्रम
| विचारक | मॉडल | मुख्य विचार | आलोचना |
|---|---|---|---|
| डब्ल्यू.एम. डेविस (1899) | सामान्य अपरदन चक्र | "संरचना, प्रक्रम, अवस्था"; तीव्र उत्थान → युवा, प्रौढ़, जीर्ण → समप्राय मैदान (peneplain), मोनाडनॉक; ढलान का "क्षय" (decline) | तीव्र उत्थान और फिर स्थिरता अवास्तविक; समय पर अति-बल; गुणात्मक |
| वाल्टर पेंक (1924) | आकारिक विश्लेषण | उत्थान और अपरदन साथ-साथ; उत्थान-दर से ढलान का रूप — उत्तल (waxing), सरल (uniform), अवतल (waning); प्राइमारम्फ़ से एंड्रम्फ़; ढलान का "प्रतिस्थापन" | जटिल, जर्मन भाषा, मरणोपरांत प्रकाशन |
| एल.सी. किंग (1948, 1953) | पेडीप्लेनेशन | अर्ध-शुष्क क्षेत्रों में ढलानों का समानांतर पश्चगमन → पेडीप्लेन, इन्सेलबर्ग (दक्षिण अफ़्रीका) | सभी जलवायु पर लागू नहीं |
| जॉन हैक (1960) | गतिक संतुलन | अपरदन और उत्थान के बीच संतुलन — स्थलरूप "समय-स्वतंत्र" (अवस्था नहीं) | दीर्घकालिक विकास की उपेक्षा |

अपरदन कालक्रम (Denudation Chronology) (UPSC 2025)
- अर्थ — किसी क्षेत्र के अपरदनात्मक इतिहास का क्रमिक पुनर्निर्माण — अपरदन-सतहों (पेनेप्लेन, पेडीप्लेन), नदी-वेदिकाओं, निक-पॉइंट, वायु-अंतराल (wind gaps), नदी-अपहरण और निक्षेपों के आधार पर यह जानना कि भू-दृश्य किन चरणों में, किस क्रम में और किस आधार-तल (base level) परिवर्तन से विकसित हुआ।
- प्रमुख अध्ययन — डेविस और "बहुचक्रीय" (polycyclic) भू-दृश्य; वूल्ड्रिज और लिंटन (Structure, Surface and Drainage in South-East England, 1939); भारत — छोटानागपुर पठार की तीन अपरदन सतहें (उच्चतम "पाट" भूमि ~900-1,100 मीटर, राँची सतह ~600-700 मीटर, निचली सतह ~300 मीटर) — क्रमिक उत्थान-अपरदन; पश्चिमी घाट और दक्कन की अपरदन सतहें; हिमालयी नदियों की वेदिकाएँ।
- भू-दृश्य के क्रमिक विकास को समझने में महत्व — (1) बहुचक्रीय भू-दृश्य — एक ही क्षेत्र में अनेक अपरदन चक्रों के अवशेष; (2) उत्थान-अवतलन का इतिहास — विवर्तनिक घटनाओं की तिथि; (3) आधार-तल और समुद्र-तल परिवर्तन — पुनर्युवन (rejuvenation), निक-पॉइंट, जलप्रपात (राँची के हुंडरू, जोन्हा जलप्रपात — पठारी किनारे); (4) जलवायु परिवर्तन — शुष्क-आर्द्र चरणों के प्रभाव; (5) अपवाह-विकास — अध्यारोपित (superimposed) और पूर्ववर्ती अपवाह; (6) अनुप्रयोग — खनिज-अन्वेषण (प्लेसर, लैटेराइट-बॉक्साइट पुराने अपरदन-सतहों पर — छोटानागपुर, अमरकंटक), भू-जल, बाँध-स्थल चयन।
- सीमाएँ — डेविसियन मान्यताओं पर निर्भरता; तिथि-निर्धारण की कठिनाई (अब कॉस्मोजेनिक न्यूक्लाइड, OSL से सुधार); "सपाट सतह" की व्याख्या में व्यक्तिपरकता; प्रक्रिया-आधारित भू-आकृति विज्ञान (1950 के बाद) से महत्व घटा, पर "विवर्तनिक भू-आकृति विज्ञान" में पुनरुत्थान।
8. विशिष्ट स्थलरूप
कटी हुई स्कंध (Truncated Spurs) (UPSC 2024)
- अर्थ — हिमनद द्वारा काटकर सपाट/खड़े किए गए पर्वत-स्कंध (spurs) — नदी-घाटी के "अंतर्ग्रथित स्कंध" (interlocking spurs) जब हिमनद घाटी से गुज़रता है तो वह उन्हें काट देता है।
- कहाँ और कैसे — हिमनदित पर्वतीय घाटियों में (आल्प्स — लॉटरब्रुनेन घाटी, स्विट्ज़रलैंड; योसेमाइट; हिमालय — गंगोत्री, लाहौल); प्रक्रिया — (1) पूर्व-हिमनदीय V-आकार की नदी-घाटी में अंतर्ग्रथित स्कंध; (2) विशाल हिमनद की मोटाई, भार और सीधा प्रवाह — वह मोड़ों का अनुसरण नहीं करता; (3) अपघर्षण (abrasion) और उत्पाटन (plucking) से स्कंध के सिरे कट जाते हैं; (4) परिणाम — सीधी, चौड़ी U-आकार घाटी, खड़ी दीवारें, कटे स्कंध के त्रिकोणीय फलक (facets); साथ में लटकती घाटियाँ (hanging valleys) और उनसे गिरते जलप्रपात।
- महत्व — पूर्व हिमनदीकरण का प्रमाण; पर्यटन; भू-स्खलन और शिलापात का जोखिम।
याज़ू धारा (Yazoo Stream) (UPSC 2024)
- अर्थ — वह सहायक नदी जो मुख्य नदी के प्राकृतिक तटबंधों (natural levees) के कारण उसमें सीधे नहीं मिल पाती और लंबी दूरी तक उसके समानांतर बहती है — नाम मिसिसिपी की सहायक याज़ू नदी (मिसिसिपी राज्य, USA) से।
- निर्माण — बाढ़ के समय मुख्य नदी अपने किनारों पर मोटा अवसाद जमाकर ऊँचे तटबंध बनाती है; तटबंधों के पीछे बाढ़-मैदान नीचा और दलदली (पृष्ठ-दलदल — backswamp); सहायक नदी इस निचले क्षेत्र में बहती रहती है और नीचे की ओर किसी उपयुक्त बिंदु पर मिलती है।
- याज़ू बेसिन में बार-बार बाढ़ के कारण — (1) निचली, समतल स्थलाकृति और कम ढाल; (2) मुख्य नदी के ऊँचे जल-स्तर से "बैकवॉटर" प्रभाव — सहायक नदी का पानी निकल नहीं पाता; (3) पृष्ठ-दलदल की मिट्टी में कम अंतःस्यंदन; (4) तटबंधों का टूटना; (5) मानव-निर्मित तटबंधों से जल-निकासी में बाधा; (6) भारी वर्षा।
- उदाहरण — याज़ू (मिसिसिपी डेल्टा का "याज़ू बेसिन" — 1927 और 2019 की बाढ़); अन्य बड़े जलोढ़ मैदानों (गंगा-ब्रह्मपुत्र, ह्वांग हो, नील डेल्टा) में भी समान स्थितियाँ — भारत में उत्तर बिहार के मैदान में प्राकृतिक तटबंधों और जल-जमाव वाले "चौर" क्षेत्र बार-बार बाढ़ झेलते हैं।
हिमानी झील विस्फोट बाढ़ (GLOF) (UPSC 2025)
- अर्थ — हिमनदों के पिघलने से बनी झीलों (प्रायः हिमोढ़/मोरेन-बाँधित या बर्फ़-बाँधित) का बाँध अचानक टूटने से भारी जल और मलबे का प्रवाह।
- कारण — (1) जलवायु परिवर्तन — हिमनदों का पीछे हटना, झीलों का आकार और संख्या बढ़ना; (2) हिम/शिला-स्खलन का झील में गिरना → विस्थापन-तरंग (displacement wave) → बाँध पर से बहना; (3) भूकंप; (4) अत्यधिक वर्षा/बादल फटना; (5) मोरेन-बाँध में रिसाव और आंतरिक अपरदन (piping); (6) मोरेन में दबी बर्फ़ (ice-core) का पिघलना; (7) झील के ऊपरी भाग में अन्य झील का फटना (शृंखला-प्रभाव)।
- भारतीय उदाहरण — दक्षिण ल्होनक झील, सिक्किम (4 अक्टूबर 2023) — GLOF से तीस्ता में बाढ़, चुंगथांग में तीस्ता-III जलविद्युत बाँध नष्ट; केदारनाथ (2013) — चोराबाड़ी झील का फटना; चमोली (फ़रवरी 2021) — शिला-हिम स्खलन जनित मलबा-प्रवाह।
- प्रबंधन — NDMA के GLOF दिशानिर्देश (2020), झीलों की सूची और उपग्रह-निगरानी, पूर्व-चेतावनी प्रणाली, झील का नियंत्रित निकास (siphoning, चैनल-कटाई), जोखिम-आधारित भूमि-उपयोग, जलविद्युत परियोजनाओं का पुनर्मूल्यांकन।
अवरोधक द्वीप (Barrier Islands) (UPSC 2025)
- अर्थ — तट के समानांतर, लंबे, संकरे, बालुकामय द्वीप जो मुख्य भूमि से लैगून द्वारा अलग होते हैं।
- निर्माण के सिद्धांत — (1) अपतटीय रोधिका का उद्भव (de Beaumont) — तरंगों द्वारा अपतट पर बालू-रोधिका का जमना और ऊपर उठना; (2) स्पिट का लंबा होना और टूटना (गिल्बर्ट) — तटीय अपवाह (longshore drift) से बढ़ा स्पिट तूफ़ान में टूटकर द्वीप; (3) तटीय कटक का जलमग्न होना (मैकगी) — हिमयुग के बाद समुद्र-तल वृद्धि से तटीय बालू-टीलों के पीछे का क्षेत्र डूबना; अधिकांश वर्तमान अवरोधक द्वीप होलोसीन समुद्र-तल वृद्धि (~18,000 वर्ष से) से जुड़े।
- उदाहरण — USA का पूर्वी और खाड़ी तट (आउटर बैंक्स, पाद्रे द्वीप), नीदरलैंड-जर्मनी के फ़्रिसियन द्वीप; भारत — श्रीहरिकोटा (पुलिकट झील को अलग करता अवरोधक द्वीप), चिल्का का बालुकामय अवरोध, केरल तट के अवरोध और कयाल/लैगून (वेम्बनाड)।
- महत्व — तट को तूफ़ान और तरंगों से प्राकृतिक सुरक्षा; लैगून, मैंग्रोव, लवणीय दलदल — जैव-विविधता और मत्स्य; पर्यटन; बंदरगाह; पर समुद्र-तल वृद्धि और विकास से "स्थलांतरण" (rollover) और क्षरण का ख़तरा।

9. अनुप्रयुक्त भू-आकृति विज्ञान
- भू-आकृतिक संकट — भू-स्खलन (वायनाड 2024, किन्नौर), धँसाव (जोशीमठ 2023), तटीय क्षरण, नदी-मार्ग परिवर्तन (कोसी — "बिहार का शोक"), GLOF।
- उपयोग — इंजीनियरिंग (सड़क-सुरंग-बाँध), नगरीय नियोजन, खनिज अन्वेषण, भू-जल, आपदा-जोखिम मानचित्रण, सुदूर संवेदन और GIS।
- मानव भू-आकृतिक कारक — "मानवजनित युग" (Anthropocene) — खनन, बाँध, नगरीकरण से अपरदन-निक्षेप दरों में परिवर्तन।

10. Master Summary Table
| विषय | मुख्य तथ्य / विचारक | याद रखें |
|---|---|---|
| आंतरिक संरचना | मोहो (1909), गुटेनबर्ग, लेहमैन (1936); S-तरंग छाया | बाहरी क्रोड तरल |
| विस्थापन | वेगनर 1915; होम्स 1928-30 | पैंजिया, ग्लोसोप्टेरिस |
| प्रसरण-प्लेट | हेस 1960-62; वाइन-मैथ्यूज़ 1963; 1967-68 | स्लैब पुल प्रमुख बल |
| पर्वत-निर्माण | कोबर 1921; विल्सन चक्र 1966 | 6 उत्पत्ति-प्रकार |
| नप्पे | शयान वलन + निम्न-कोण थ्रस्ट; विंडो, क्लिपे | आल्प्स, अल्मोड़ा नप्पे |
| हिमालय उत्थान | ~5 करोड़ वर्ष टक्कर; MCT-MBT-MFT; अरुण अपहरण (2024 अध्ययन) | 8,848.86 मी (2020) |
| चक्र और ढलान | डेविस 1899; पेंक 1924; किंग 1948-53; हैक 1960 | क्षय, प्रतिस्थापन, समानांतर पश्चगमन |
| अपरदन कालक्रम | वूल्ड्रिज-लिंटन 1939; छोटानागपुर की 3 सतहें | बहुचक्रीय भू-दृश्य |
| स्थलरूप | कटे स्कंध, याज़ू, GLOF (दक्षिण ल्होनक 2023), अवरोधक द्वीप (श्रीहरिकोटा) | सोलिफ़्लक्शन — परिहिमनदीय |
11. चार्ट: हिमालय का निर्माण और थ्रस्ट-तंत्र (अनुप्रस्थ काट)
12. Mind Map
- परतें, असंबद्धताएँ
- भूकंपीय तरंगें
- वेगनर, हेस
- प्लेट सीमाएँ
- पर्वत-निर्माण, नप्पे
- अपक्षय
- बृहत् संचलन
- सोलिफ़्लक्शन
- डेविस, पेंक, किंग, हैक
- अपरदन कालक्रम
- कटे स्कंध, याज़ू
- GLOF, अवरोधक द्वीप
- अनुप्रयुक्त
13. महत्वपूर्ण One-liners
- महाद्वीपीय विस्थापन — अल्फ़्रेड वेगनर (1912/1915); संवहन धारा — आर्थर होम्स।
- सागर-नितल प्रसरण — हैरी हेस (1960-62); पुराचुंबकीय पट्टियाँ — वाइन-मैथ्यूज़ (1963)।
- "geosyncline" शब्द — जेम्स डाना (1873); "Der Bau der Erde" (1921) — कोबर।
- विल्सन चक्र — जे. टूज़ो विल्सन (1966)।
- सामान्य अपरदन चक्र — डेविस (1899); ढलान के तीन रूप — पेंक (1924); पेडीप्लेनेशन — एल.सी. किंग।
- गतिक संतुलन — जॉन हैक (1960)।
- आंतरिक क्रोड की खोज — इंगे लेहमैन (1936)।
- दक्षिण ल्होनक GLOF — 4 अक्टूबर 2023, सिक्किम।
- एवरेस्ट की नवीनतम ऊँचाई — 8,848.86 मीटर (2020)।
- याज़ू धारा का नाम — मिसिसिपी की सहायक याज़ू नदी।
14. टिप्स एवं ट्रिक्स
- भूगोल में 70-80% उत्तरों में आरेख अपेक्षित — ब्लॉक आरेख, अनुप्रस्थ काट, प्रवाह-चार्ट।
- हर सिद्धांत के साथ भारतीय उदाहरण — छोटानागपुर (अपरदन सतह), सिक्किम (GLOF), श्रीहरिकोटा (अवरोधक द्वीप)।
- Q1 के छोटे प्रश्न "शब्दावली परीक्षा" होते हैं — truncated spur, Yazoo, solifluction, nappe जैसे शब्दों की सूची बनाएँ।
असंबद्धताएँ ऊपर से नीचे — "को-मो-गु-ले" (कोनराड, मोहो, गुटेनबर्ग, लेहमैन); हिमालयी थ्रस्ट उत्तर से दक्षिण — "C-B-F" (Central, Boundary, Frontal)।
15. PYQ-आधारित प्रश्न एवं मॉडल उत्तर
"हिमालय अभी भी ऊपर उठ रहा है।" उपयुक्त रेखाचित्रों और आरेखों सहित इस कथन का विस्तार कीजिए और इसमें सम्मिलित प्रक्रियाओं का वर्णन कीजिए।
मॉडल उत्तर (रूपरेखा)
भूमिका: हिमालय विश्व की सबसे नवीन वलित पर्वत-शृंखला — भारत-यूरेशिया टक्कर (~5 करोड़ वर्ष पूर्व) का परिणाम; आज भी विवर्तनिक रूप से सक्रिय।
प्रक्रियाएँ: (1) भारतीय प्लेट की निरंतर उत्तर-पूर्वी गति (~4-5 सेमी/वर्ष) और संपीडन; (2) थ्रस्ट-तंत्र (MCT, MBT, MFT) — दक्षिण की ओर प्रवास; (3) क्रस्ट का मोटा होना और समस्थैतिक उत्थान; (4) अपरदन-जनित समस्थैतिक प्रत्युत्तर; (5) नदी-अपहरण (अरुण-कोसी, 2024 अध्ययन — एवरेस्ट का अतिरिक्त उत्थान); (6) भूकंपीय विस्थापन (नेपाल 2015)।
प्रमाण: GPS (मिमी/वर्ष उत्थान), पूर्ववर्ती नदियों की गहरी घाटियाँ, नदी वेदिकाएँ, उच्च भूकंपीयता, उत्थित समुद्री जीवाश्म।
आरेख: (1) प्लेट-टक्कर अनुप्रस्थ काट; (2) थ्रस्ट-तंत्र; (3) समस्थैतिक प्रत्युत्तर का सरल चित्र।
निहितार्थ: भूकंप, भू-स्खलन, GLOF, अवसंरचना-जोखिम (जोशीमठ 2023)।
निष्कर्ष: हिमालय "पूर्ण" पर्वत नहीं, "निर्माणाधीन" पर्वत है — विवर्तनिकी, अपरदन और जलवायु की अंतःक्रिया इसके उत्थान को जारी रखे हुए है।
पर्वत-निर्माण प्रक्रिया पर नवीन विचारों का परीक्षण कीजिए और उत्पत्ति के आधार पर विश्व के पर्वतों का विभाजन कीजिए।
मॉडल उत्तर (रूपरेखा)
पुराने सिद्धांत (संक्षेप): भू-अभिनति (हॉल, डाना, कोबर), तापीय संकुचन (जेफ़्रीज़), फिसलन (डेली), संवहन (होम्स)।
नवीन विचार: प्लेट विवर्तनिकी — अधोगमन (एंडीज़), महाद्वीपीय टक्कर (हिमालय), द्वीप-चाप अभिवृद्धि (अभिवृद्ध भू-खंड), गुरुत्वीय पतन (तिब्बत), जलवायु-विवर्तनिकी अंतःक्रिया (चैनल फ़्लो), विल्सन चक्र।
उत्पत्ति-आधारित वर्गीकरण (तालिका): वलित (नवीन और प्राचीन), ब्लॉक/हॉर्स्ट, ज्वालामुखी, गुंबदाकार, अवशिष्ट — विश्व और भारतीय उदाहरण।
आरेख: तीनों अभिसारी सीमाओं के अनुप्रस्थ काट; हॉर्स्ट-ग्राबेन।
निष्कर्ष: प्लेट विवर्तनिकी ने पर्वत-निर्माण की एकीकृत व्याख्या दी, जिसे जलवायु और अपरदन की भूमिका ने और समृद्ध किया है।
अपरदन कालक्रम भू-दृश्य और स्थलरूपों के क्रमिक विकास को समझने में कैसे सहायक है? स्पष्ट कीजिए।
मॉडल उत्तर (रूपरेखा)
अर्थ: अपरदन-सतहों, वेदिकाओं, निक-पॉइंट, वायु-अंतराल, अपहरण और निक्षेपों से अपरदनात्मक इतिहास का क्रमिक पुनर्निर्माण।
सैद्धांतिक आधार: डेविस का चक्र और बहुचक्रीय भू-दृश्य; वूल्ड्रिज-लिंटन (1939)।
महत्व: बहुचक्रीय भू-दृश्य की पहचान; उत्थान-अवतलन का इतिहास; आधार-तल परिवर्तन और पुनर्युवन (जलप्रपात); जलवायु-परिवर्तन; अपवाह-विकास (अध्यारोपित, पूर्ववर्ती); अनुप्रयोग — खनिज (बॉक्साइट-लैटेराइट), भू-जल, बाँध-स्थल।
भारतीय उदाहरण: छोटानागपुर की तीन सतहें (पाट, राँची, निचली) और राँची के जलप्रपात; दक्कन-पश्चिमी घाट की सतहें।
सीमाएँ: डेविसियन मान्यताएँ, तिथि-निर्धारण की कठिनाई (अब कॉस्मोजेनिक न्यूक्लाइड), व्यक्तिपरकता।
निष्कर्ष: अपरदन कालक्रम भू-दृश्य का "इतिहास-लेखन" है — आधुनिक तिथि-तकनीकों से यह पुनः महत्वपूर्ण हो गया है (आरेख: बहु-सतहीय पठार का अनुप्रस्थ काट)।
पर्वतीय पट्टियों में नप्पे के निर्माण के लिए कौन-सी भूगर्भीय और विवर्तनिक प्रक्रियाएँ उत्तरदायी हैं?
मॉडल उत्तर
नप्पे: निम्न-कोण थ्रस्ट/शयान वलन से कई किमी आगे खिसका चट्टान-पिंड; जड़ क्षेत्र, विंडो, क्लिपे।
प्रक्रियाएँ: तीव्र क्षैतिज संपीडन (महाद्वीपीय टक्कर); वलन की प्रगति (सममित → प्रतिवलित → शयान → थ्रस्ट); क्रस्टल स्टैकिंग; गुरुत्वीय फिसलन; नमनीय प्रवाह; दुर्बल परतें स्नेहक।
उदाहरण: आल्प्स (हेल्वेटिक, पेनिनिक), हिमालय (अल्मोड़ा, काठमांडू नप्पे), मोइन थ्रस्ट।
आरेख: शयान वलन से नप्पे और विंडो-क्लिपे।
हिमानी झील विस्फोट बाढ़ के कारणों की व्याख्या कीजिए।
मॉडल उत्तर
GLOF: मोरेन/बर्फ़-बाँधित हिमनदीय झील का अचानक फटना।
कारण: जलवायु परिवर्तन से झीलों का विस्तार; हिम-शिला स्खलन से विस्थापन-तरंग; भूकंप; अत्यधिक वर्षा; मोरेन-बाँध में रिसाव-पाइपिंग; दबी बर्फ़ का पिघलना; शृंखला-प्रभाव।
उदाहरण: दक्षिण ल्होनक (2023 — तीस्ता-III बाँध नष्ट), केदारनाथ (2013 — चोराबाड़ी)।
प्रबंधन: NDMA दिशानिर्देश (2020), उपग्रह-निगरानी, पूर्व-चेतावनी, नियंत्रित निकास।
याज़ू धारा क्या है? याज़ू बेसिन बार-बार बाढ़ के क्षेत्र क्यों होते हैं? विश्व के विभिन्न भागों से याज़ू धाराओं और क्षेत्रों के उदाहरण दीजिए।
मॉडल उत्तर (रूपरेखा)
परिभाषा: प्राकृतिक तटबंधों के कारण मुख्य नदी के समानांतर बहने वाली सहायक धारा — मिसिसिपी की याज़ू नदी से नाम।
निर्माण: बाढ़ में तटबंध-निर्माण → पीछे निचला पृष्ठ-दलदल → सहायक का समानांतर प्रवाह (आरेख: अनुप्रस्थ काट)।
बार-बार बाढ़ के कारण: निचली-समतल स्थलाकृति, बैकवॉटर प्रभाव, कम अंतःस्यंदन, तटबंध टूटना, मानवनिर्मित तटबंधों से निकासी-बाधा, भारी वर्षा।
उदाहरण: याज़ू बेसिन, मिसिसिपी (1927, 2019 बाढ़); बड़े जलोढ़ मैदानों — गंगा-ब्रह्मपुत्र, ह्वांग हो, नील डेल्टा — में समान स्थितियाँ; उत्तर बिहार के जल-जमाव वाले "चौर" क्षेत्र।
निष्कर्ष: याज़ू बेसिन दिखाते हैं कि बाढ़-जोखिम केवल वर्षा नहीं, नदी-भू-आकृति से भी तय होता है — बाढ़-नियोजन में भू-आकृतिक मानचित्रण आवश्यक।
"कटी हुई स्कंध" क्या हैं? ये कहाँ और कैसे बनती हैं?
मॉडल उत्तर
अर्थ: हिमनद द्वारा काटे गए पर्वत-स्कंध — V-घाटी के अंतर्ग्रथित स्कंध के कटे सिरे।
कहाँ: हिमनदित पर्वतीय घाटियाँ — लॉटरब्रुनेन (आल्प्स), योसेमाइट, हिमालय (गंगोत्री, लाहौल)।
कैसे: विशाल हिमनद का सीधा प्रवाह, अपघर्षण-उत्पाटन से सिरे कटना → U-घाटी, त्रिकोणीय फलक, लटकती घाटियाँ और जलप्रपात (आरेख: पहले और बाद)।
अवरोधक द्वीपों के निर्माण की प्रक्रिया का वर्णन कीजिए और उनके महत्व की व्याख्या कीजिए।
मॉडल उत्तर (रूपरेखा)
अर्थ: तट के समानांतर, लैगून से अलग बालुकामय द्वीप।
निर्माण: अपतटीय रोधिका का उद्भव (de Beaumont); स्पिट का लंबा होना और टूटना (गिल्बर्ट); तटीय कटक का जलमग्न होना (मैकगी); होलोसीन समुद्र-तल वृद्धि की भूमिका (आरेख: तीनों प्रक्रियाएँ)।
उदाहरण: आउटर बैंक्स, पाद्रे द्वीप, फ़्रिसियन द्वीप; भारत — श्रीहरिकोटा (पुलिकट), चिल्का अवरोध, केरल के कयाल।
महत्व: तटीय सुरक्षा, लैगून-मैंग्रोव पारिस्थितिकी, मत्स्य, पर्यटन, बंदरगाह, अंतरिक्ष केंद्र (श्रीहरिकोटा)।
संकट: समुद्र-तल वृद्धि, तूफ़ान, विकास से क्षरण — "रोलओवर"।
निष्कर्ष: अवरोधक द्वीप गतिशील प्राकृतिक ढाल हैं — उनका संरक्षण तटीय लचीलेपन के लिए अनिवार्य।
सोलिफ़्लक्शन क्या है? इसके प्रभाव क्या हैं?
मॉडल उत्तर
अर्थ: जल-संतृप्त सक्रिय परत का ढलान पर धीमा प्रवाह — परिहिमनदीय क्षेत्रों में स्थायी तुषार के ऊपर (जेलिफ़्लक्शन); जिह्वाएँ, वेदिकाएँ।
प्रभाव: अवसंरचना की क्षति (सड़क, पाइपलाइन — लद्दाख, अलास्का); ढलान-अस्थिरता; चराई-भूमि क्षरण; जलवायु परिवर्तन से वृद्धि और ग्रीनहाउस उत्सर्जन; नदियों में अवसाद; ढलानों का सपाट होना।
प्रबंधन: जल-निकासी, वनस्पति, पाइल-नींव, निगरानी।
16. Quick Revision Summary
- आंतरिक संरचना — 4 परतें, 4 असंबद्धताएँ, P-S तरंगें और छाया क्षेत्र।
- विवर्तनिकी — वेगनर (प्रमाण, दुर्बलता), होम्स, हेस, वाइन-मैथ्यूज़, प्लेट सीमाएँ।
- पर्वत — कोबर से प्लेट विवर्तनिकी; 6 उत्पत्ति-प्रकार; नप्पे; हिमालय का उत्थान।
- प्रक्रम — अपक्षय, बृहत् संचलन, सोलिफ़्लक्शन।
- चक्र — डेविस, पेंक, किंग, हैक; अपरदन कालक्रम (छोटानागपुर)।
- स्थलरूप — कटे स्कंध, याज़ू, GLOF, अवरोधक द्वीप; अनुप्रयुक्त भू-आकृति विज्ञान।