UPSC Mains · Geography · Paper II · अध्याय 10

भारत: प्रादेशिक विकास, राजनीतिक पहलू एवं समकालीन मुद्दे

India: Regional Development, Political Aspects and Contemporary Issues

पंचवर्षीय योजनाओं में प्रादेशिक नियोजन, पिछड़े क्षेत्र, बहु-स्तरीय नियोजन; संघवाद, सीमा विवाद, नदी जल विवाद; पर्यावरणीय संकट और आपदा प्रबंधन।

Paper II 30 मिनट

1. अध्याय एक नज़र में

Paper II के अंतिम तीन खंड इस अध्याय में शामिल हैं:

  • प्रादेशिक विकास और नियोजन: भारत में प्रादेशिक नियोजन का अनुभव, पंचवर्षीय योजनाएँ, समन्वित ग्रामीण विकास कार्यक्रम, पंचायती राज और विकेंद्रीकृत नियोजन, कमान क्षेत्र विकास, जलागम प्रबंधन, और पिछड़े, मरुस्थलीय, सूखा-प्रवण, पहाड़ी और जनजातीय क्षेत्रों का विकास; बहुस्तरीय नियोजन; द्वीप क्षेत्रों का प्रादेशिक नियोजन।
  • राजनीतिक पक्ष: भारतीय संघवाद का भौगोलिक आधार, राज्यों का पुनर्गठन, नए राज्यों का उदय, प्रादेशिक चेतना और अंतर-राज्य मुद्दे, भारत की अंतरराष्ट्रीय सीमा और उससे जुड़े मुद्दे, सीमापार आतंकवाद, विश्व मामलों में भारत की भूमिका, और दक्षिण एशिया तथा हिंद महासागर की भू-राजनीति।
  • समकालीन मुद्दे: पर्यावरणीय संकट, प्रदूषण, भूमि-उपयोग में परिवर्तन, EIA, मरुस्थलीकरण, प्रादेशिक विषमता, सतत विकास, नदी-जोड़ और वैश्वीकरण।

2025 में प्रादेशिक चेतना और अंतर-राज्य विवाद, पूर्वोत्तर के भू-राजनीतिक और भू-सांस्कृतिक पक्ष, मरुस्थलीकरण, नीली अर्थव्यवस्था, हरित वास्तुकला, द्वीप नियोजन और अंतरराष्ट्रीय सीमाएँ पूछे गए। 2024 में पूर्वोत्तर का सामरिक महत्व, प्रादेशिक विषमता, प्रवास, जनजातीय क्षेत्र विकास, जल-विवाद, सूखा-प्रवण क्षेत्र, शिखर-सम्मेलनों में भारत, और 73वाँ संशोधन आए।

भूगोल: भारत में विकास और नियोजन इन्फ़ोग्राफ़िक
भारत में नियोजन और विकास: प्रादेशिक नियोजन, लक्ष्य-क्षेत्र कार्यक्रम, पंचायती राज और सतत विकास (NCERT आधारित infographic)।

2. भारत में प्रादेशिक नियोजन का अनुभव

  • पंचवर्षीय योजनाएँ (1951-2017):
    • प्रारंभ में "क्षेत्रीय" (sectoral) नियोजन था। तीसरी योजना (1961-66) में "संतुलित प्रादेशिक विकास" को उद्देश्य बनाया गया।
    • चौथी और पाँचवीं योजना से लक्ष्य-क्षेत्र (target area) कार्यक्रम शुरू हुए: सूखा-प्रवण क्षेत्र कार्यक्रम (DPAP, 1973), पहाड़ी क्षेत्र विकास, कमान क्षेत्र विकास (CAD, 1974-75), जनजातीय उप-योजना (TSP, 1974-75) और मरुस्थल विकास कार्यक्रम (DDP, 1977-78)।
    • लक्ष्य-समूह कार्यक्रम भी आए: समन्वित ग्रामीण विकास कार्यक्रम (IRDP, 1978-80)।
    • 2015 में योजना आयोग के स्थान पर NITI Aayog बना ("सहकारी संघवाद")।
  • बहुस्तरीय नियोजन: राष्ट्रीय, राज्य, ज़िला, खंड और ग्राम पंचायत स्तर। दांतवाला समिति (1978) ने खंड-स्तरीय नियोजन की संस्तुति की और हनुमंत राव समिति (1984) ने ज़िला-स्तरीय नियोजन की।
  • नदी-घाटी नियोजन: दामोदर घाटी निगम (1948, अमेरिका के TVA के मॉडल पर) बहुउद्देश्यीय नियोजन का पहला प्रयोग था, पर इसके परिणाम मिले-जुले रहे।
  • कमान क्षेत्र विकास: सिंचाई क्षमता और वास्तविक उपयोग के अंतर को भरने के लिए खेत-नालियाँ, भूमि-समतलीकरण, बाराबंदी और जल-भराव तथा लवणता का प्रबंधन। उदाहरण: इंदिरा गांधी नहर कमान क्षेत्र (राजस्थान), जहाँ जल-भराव की समस्या भी उभरी।

73वाँ संविधान संशोधन और विकेंद्रीकृत नियोजन (UPSC 2024)

  • प्रावधान: 73वाँ संशोधन अधिनियम 1992 है, जो 24 अप्रैल 1993 से लागू हुआ (इसीलिए यह "राष्ट्रीय पंचायती राज दिवस" है)। इसने संविधान में भाग IX (अनुच्छेद 243-243O) और ग्यारहवीं अनुसूची (29 विषय) जोड़ी। मुख्य प्रावधान: त्रि-स्तरीय पंचायतें; ग्राम सभा; हर पाँच वर्ष में चुनाव (राज्य निर्वाचन आयोग); SC और ST के लिए आरक्षण; कम से कम एक-तिहाई सीटें स्त्रियों के लिए (कई राज्यों में 50%, बिहार में 2006 से 50%); राज्य वित्त आयोग। ज़िला योजना समिति (243ZD) 74वें संशोधन से आई।
  • भौगोलिक महत्व: स्थानीय आवश्यकताओं और संसाधनों के अनुसार "नीचे से ऊपर" नियोजन; "स्थान-विशिष्ट" (place-based) विकास; और स्त्रियों तथा वंचितों का प्रतिनिधित्व।
  • सफल उदाहरण: केरल का "जन योजना अभियान" (People's Plan Campaign, 1996), जिसमें राज्य योजना का 35-40% भाग स्थानीय निकायों को दिया गया; ग्राम पंचायत विकास योजना (GPDP, 2015 से); और ई-ग्रामस्वराज।
  • सीमाएँ: "3F" यानी कार्य (functions), कोष (funds) और कर्मचारी (functionaries) का अपूर्ण हस्तांतरण; राज्यों में असमानता; "सरपंच पति" की प्रथा; ग्राम सभाओं की कमज़ोरी; और स्थानीय निकायों की राजस्व-क्षमता का कम होना।
  • मूल्यांकन: 30 वर्षों में लगभग 31 लाख निर्वाचित प्रतिनिधि (जिनमें लगभग 46% स्त्रियाँ) लोकतंत्र की जड़ों तक पहुँचे, पर "वास्तविक विकेंद्रीकरण" अभी अधूरा है।

3. पिछड़े, सूखा-प्रवण, मरुस्थलीय, पहाड़ी और जनजातीय क्षेत्रों का विकास

सूखा-प्रवण क्षेत्र (UPSC 2024)

  • सीमांकन: सिंचाई आयोग (1972) के अनुसार वे क्षेत्र जहाँ 20% से अधिक वर्षों में वर्षा सामान्य से 25% से कम होती है, या जहाँ सिंचाई 30% से कम है।
  • प्रमुख क्षेत्र: राजस्थान और गुजरात (कच्छ, सौराष्ट्र); दक्कन का वृष्टि-छाया क्षेत्र (मराठवाड़ा, विदर्भ के भाग, उत्तरी कर्नाटक, रायलसीमा, तेलंगाना); बुंदेलखंड; पलामू (झारखंड); और तमिलनाडु के भीतरी भाग।
  • कार्यक्रम: DPAP (1973-74), DDP (1977-78) और IWDP (1989), जिन्हें 2009 में IWMP में मिलाया गया और फिर WDC-PMKSY में। इनके घटक हैं: जलागम, वनीकरण, चरागाह-विकास, शुष्क खेती और पशुपालन।
  • मूल्यांकन: रालेगण सिद्धि और हिवरे बाज़ार जैसी सफलताएँ मिलीं, पर आलोचना यह है कि ये कार्यक्रम ऊपर से नीचे चले, सामुदायिक सहभागिता कम रही, और नलकूपों से भू-जल का अति-दोहन बढ़ा (मराठवाड़ा में गन्ने की खेती)।

जनजातीय क्षेत्र विकास (UPSC 2024)

  • नीतिगत विकास: नेहरू का "पंचशील" (वेरियर एल्विन की प्रस्तावना, 1959), जिसका अर्थ था एकीकरण बिना आत्मसात के। पाँचवीं योजना में जनजातीय उप-योजना (TSP) और ITDP/ITDA आए, जिसका अर्थ था क्षेत्र-आधारित विकास और बजट में अलग प्रावधान। इसका वर्तमान रूप ST के लिए विकास कार्य योजना (DAPST) है।
  • संवैधानिक और वैधानिक ढाँचा: पाँचवीं अनुसूची (10 राज्यों के अनुसूचित क्षेत्र; जनजातीय सलाहकार परिषद), छठी अनुसूची (असम, मेघालय, त्रिपुरा और मिज़ोरम की स्वायत्त ज़िला परिषदें), PESA (1996) और वन अधिकार अधिनियम (2006)।
  • नई पहल: एकलव्य आदर्श आवासीय विद्यालय, PM-JANMAN (2023, 75 PVTG के लिए), धरती आबा जनजातीय ग्राम उत्कर्ष अभियान (2024), और वन धन केंद्र (लघु वनोपज)।
  • भौगोलिक समस्याएँ: खनन और बाँधों से विस्थापन (सरदार सरोवर, पोलावरम), वन-अधिकारों से वंचना, दुर्गमता, कुपोषण, स्वास्थ्य संकट (सिकल सेल रोग), भूमि-हस्तांतरण, और वामपंथी उग्रवाद से प्रभावित क्षेत्र (बस्तर)।
  • दृष्टि: "सांस्कृतिक पहचान के साथ विकास"; ग्राम सभा की सहमति (नियमगिरि, 2013); और सामुदायिक वन संसाधन अधिकार (महाराष्ट्र का मेंढा-लेखा गाँव)।
  • पहाड़ी क्षेत्र: पहाड़ी क्षेत्र विकास कार्यक्रम (HADP), पश्चिमी घाट विकास कार्यक्रम, पूर्वोत्तर परिषद (1971) और DoNER मंत्रालय।

द्वीप क्षेत्रों का प्रादेशिक नियोजन (UPSC 2025)

  • द्वीप समूह: अंडमान-निकोबार (लगभग 836 द्वीप) और लक्षद्वीप (36 द्वीप)।
  • विशिष्ट चुनौतियाँ: पृथक्करण, सीमित भूमि और मीठा जल, नाज़ुक पारिस्थितिकी (प्रवाल, मैंग्रोव, वर्षावन), सुनामी, भूकंप और चक्रवात का जोखिम (2004), समुद्र-तल वृद्धि, PVTG (जारवा, शोम्पेन, ओंगे, सेंटिनली), सामरिक संवेदनशीलता, और मुख्य भूमि पर निर्भरता।
  • संस्थागत ढाँचा: गृह मंत्री की अध्यक्षता में द्वीप विकास एजेंसी (IDA, 2017) द्वारा "द्वीपों का समग्र विकास" और NITI Aayog की अध्ययन-रिपोर्टें।
  • प्रमुख परियोजना: ग्रेट निकोबार समग्र विकास परियोजना, जिसमें गैलाथिया खाड़ी में अंतरराष्ट्रीय ट्रांसशिपमेंट बंदरगाह, हवाई अड्डा, टाउनशिप और बिजली संयंत्र शामिल हैं। इसका सामरिक तर्क मलक्का जलडमरूमध्य के निकट स्थिति है। चिंताएँ हैं: वर्षावन की कटाई, लेदरबैक कछुओं के नीड़न-स्थल, शोम्पेन PVTG के अधिकार, भूकंपीय जोखिम, और प्रतिपूरक वनीकरण का हरियाणा में किया जाना। लक्षद्वीप के प्रस्तावित विनियमों (2021) पर भी स्थानीय विरोध हुआ।
  • नियोजन के सिद्धांत: वहन-क्षमता आधारित नियोजन; "द्वीप-विशिष्ट" नीतियाँ; नवीकरणीय ऊर्जा (डीज़ल पर निर्भरता घटाना); अलवणीकरण (कवरत्ती का निम्न-ताप तापीय अलवणीकरण संयंत्र, यानी LTTD); पारिस्थितिक पर्यटन; मत्स्य-आधारित नीली अर्थव्यवस्था; आपदा-प्रतिरोधी अवसंरचना (CDRI); स्थानीय और जनजातीय सहमति; और समुद्री स्थानिक नियोजन (Marine Spatial Planning; पुडुचेरी और लक्षद्वीप में भारत-नॉर्वे का प्रायोगिक कार्य)।

4. प्रादेशिक विषमता और प्रवास

भारत में प्रादेशिक विषमताएँ (UPSC 2024)

  • आयाम:
    • प्रति व्यक्ति NSDP: गोवा, सिक्किम और दिल्ली में सबसे अधिक; बिहार में सबसे कम, जहाँ यह राष्ट्रीय औसत के लगभग एक-तिहाई के आसपास है।
    • बहुआयामी ग़रीबी: NITI Aayog के राष्ट्रीय MPI (2023) के अनुसार 2015-16 में 24.85% से घटकर 2019-21 में 14.96%। बिहार में सबसे अधिक (लगभग 34%) और केरल में सबसे कम।
    • मानव विकास और औद्योगीकरण: दक्षिण और पश्चिम बनाम उत्तर-मध्य और पूर्व।
    • अंतर-राज्य के भीतर विषमता: विदर्भ बनाम पश्चिमी महाराष्ट्र, उत्तरी बनाम दक्षिणी कर्नाटक, और पश्चिमी बनाम पूर्वी उत्तर प्रदेश।
  • कारण: भौगोलिक (पहाड़, बाढ़, सूखा), ऐतिहासिक (औपनिवेशिक बंदरगाह-नगर; बंगाल का स्थायी बंदोबस्त), नीतिगत ("माल-भाड़ा समानीकरण नीति" 1952-1993, जिसने खनिज-समृद्ध पूर्वी राज्यों का स्थानिक लाभ छीन लिया), हरित क्रांति का चयनात्मक प्रसार, 1991 के बाद निजी निवेश का पहले से विकसित क्षेत्रों में सकेंद्रण, शासन और क़ानून-व्यवस्था, और मानव पूँजी।
  • परिणाम: प्रवास, प्रादेशिक असंतोष और अलग राज्य की माँगें, वामपंथी उग्रवाद, और राजकोषीय संघवाद में तनाव (वित्त आयोग के "दक्षता बनाम समता" मानदंड, जिस पर दक्षिणी राज्यों की आपत्तियाँ हैं)।
  • उपाय: वित्त आयोग के हस्तांतरण (15वें आयोग ने 41% का हिस्सा तय किया), आकांक्षी ज़िले (2018) और आकांक्षी ब्लॉक (2023), विशेष पैकेज, औद्योगिक गलियारे, "पूर्वोदय", पूर्वोत्तर के लिए PM-DevINE (2022), और मानव पूँजी में निवेश।

भारत में प्रवास (UPSC 2024)

  • आँकड़े: जनगणना 2011 के अनुसार अंतिम निवास-स्थान के आधार पर लगभग 45.6 करोड़ प्रवासी थे (जनसंख्या का लगभग 37%)। स्त्रियों के प्रवास का मुख्य कारण विवाह और पुरुषों का काम है। आर्थिक सर्वेक्षण 2016-17 ने रेल-यात्री आँकड़ों के आधार पर 2011-16 के दौरान प्रति वर्ष औसतन लगभग 90 लाख अंतर-राज्य प्रवास का अनुमान लगाया।
  • प्रतिरूप: ग्राम से ग्राम (सबसे बड़ी धारा, विशेषकर स्त्रियाँ), ग्राम से नगर (रोज़गार), मौसमी प्रवास (ईंट-भट्ठे, गन्ना-कटाई, निर्माण)। उद्गम राज्य: बिहार, उत्तर प्रदेश, झारखंड, ओडिशा, राजस्थान। गंतव्य: महाराष्ट्र, दिल्ली, गुजरात, पंजाब, कर्नाटक, केरल (जहाँ "अतिथि श्रमिक" आते हैं)। अंतरराष्ट्रीय प्रवास: केरल और खाड़ी देश।
  • कारण: प्रादेशिक विषमता, कृषि-संकट, नगरीय रोज़गार, शिक्षा, और आपदाएँ (बिहार की बाढ़)।
  • परिणाम: प्रेषित धन (बिहार के ग्रामीण क्षेत्रों में उपभोग का आधार), श्रमिकों की असुरक्षा (कोविड-19 का "उलटा प्रवास"), नगरीय झुग्गियाँ, "मूलनिवासी" आरक्षण की राजनीति (हरियाणा का 2020 का निजी नौकरियों में 75% आरक्षण क़ानून, जिसे उच्च न्यायालय ने 2023 में रद्द किया), और मूल क्षेत्रों में "स्त्री-प्रधान परिवार"।
  • नीति: ई-श्रम पोर्टल, "एक राष्ट्र एक राशन कार्ड", PMAY-U के अंतर्गत किफ़ायती किराया आवास परिसर (ARHC), और अंतर-राज्य प्रवासी कामगार अधिनियम (1979), जिसे अब श्रम संहिता में समाहित किया गया है।

5. संघवाद, राज्य पुनर्गठन और प्रादेशिक चेतना

  • संघवाद का भौगोलिक आधार: विशाल आकार, भाषायी, धार्मिक और जनजातीय विविधता, और ऐतिहासिक-सांस्कृतिक प्रदेश। भारत को "राज्यों का संघ" (अनुच्छेद 1) कहा गया है, यानी "अविनाशी संघ और विनाशी राज्य" (अनुच्छेद 3 के अंतर्गत संसद राज्यों की सीमाएँ बदल सकती है)।
  • राज्य पुनर्गठन: 1953 में आंध्र राज्य बना (पोट्टी श्रीरामुलु के अनशन के बाद)। फ़ज़ल अली की अध्यक्षता वाले राज्य पुनर्गठन आयोग (1953-55) के बाद राज्य पुनर्गठन अधिनियम 1956 से भाषायी आधार पर पुनर्गठन हुआ। 1960 में बॉम्बे से महाराष्ट्र और गुजरात बने; 1966 में पंजाब से हरियाणा; 1963 से 1987 के बीच पूर्वोत्तर के राज्य; 2000 में छत्तीसगढ़, उत्तराखंड और झारखंड; 2014 में तेलंगाना; और 2019 में जम्मू-कश्मीर तथा लद्दाख संघ राज्य क्षेत्र बने। वर्तमान में 28 राज्य और 8 संघ राज्य क्षेत्र हैं।
  • नए राज्यों के आधार: भाषा, जनजातीय पहचान (झारखंड), पहाड़ी पहचान और प्रशासनिक दूरी (उत्तराखंड), विकास-असंतुलन (तेलंगाना), और प्रशासनिक दक्षता (छोटे राज्यों पर बहस)।

प्रादेशिक चेतना और अंतर-राज्य विवाद (UPSC 2025)

  • प्रादेशिक चेतना: किसी प्रदेश के लोगों में साझी भाषा, संस्कृति, इतिहास, आर्थिक हितों या उपेक्षा की भावना से उत्पन्न सामूहिक पहचान।
  • सकारात्मक रूप: सांस्कृतिक संरक्षण, विकास की माँग, और संघवाद को सुदृढ़ करना।
  • नकारात्मक रूप: "धरती-पुत्र" (sons of the soil) की धारणा (1966 से शिवसेना), पृथकतावाद, और अंतर-राज्य संघर्ष।
  • प्रादेशिक आंदोलनों के उदाहरण: गोरखालैंड, विदर्भ, बोडोलैंड (2020 के समझौते से BTR), तेलंगाना (सफल), बुंदेलखंड और मिथिला।
  • अंतर-राज्य सीमा विवाद: बेलगावी (महाराष्ट्र-कर्नाटक; महाजन आयोग 1966); असम-मिज़ोरम (जुलाई 2021 की हिंसा); असम-मेघालय (मार्च 2022 का समझौता, 12 में से 6 विवादित क्षेत्रों पर); असम-अरुणाचल (अप्रैल 2023 का समझौता); और असम-नागालैंड। इनकी जड़ें औपनिवेशिक सीमांकन में हैं, जिसने जनजातीय भूमि-संबंधों की अनदेखी की, और असम से नए राज्यों का अलग होना।
  • नदी-जल विवाद: नीचे देखें।
  • समाधान-तंत्र: अंतर-राज्य परिषद (अनुच्छेद 263; 1990), क्षेत्रीय परिषदें (1956), द्विपक्षीय वार्ता, सर्वोच्च न्यायालय (अनुच्छेद 131), और "सहकारी संघवाद"।

अंतर-राज्य नदी-जल विवाद (UPSC 2024)

नदीराज्यस्थिति
कावेरीकर्नाटक, तमिलनाडु, केरल, पुडुचेरीन्यायाधिकरण का निर्णय 2007; सर्वोच्च न्यायालय का फ़रवरी 2018 का निर्णय (कर्नाटक द्वारा तमिलनाडु को 177.25 TMC); कावेरी जल प्रबंधन प्राधिकरण
कृष्णामहाराष्ट्र, कर्नाटक, तेलंगाना, आंध्र प्रदेशन्यायाधिकरण II; तेलंगाना बनने के बाद नए विवाद
महादयी (मांडवी)गोवा, कर्नाटक, महाराष्ट्रन्यायाधिकरण का निर्णय 2018; कलसा-बंडूरी परियोजना पर विवाद
रावी-ब्यास, SYL नहरपंजाब, हरियाणा, राजस्थानसतलुज-यमुना लिंक नहर अधूरी है; सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशों के बावजूद गतिरोध बना हुआ है
गोदावरी, नर्मदाअनेक राज्यनर्मदा न्यायाधिकरण 1979 (सरदार सरोवर); गोदावरी पर पोलावरम परियोजना
  • संवैधानिक और वैधानिक ढाँचा: अनुच्छेद 262 और अंतर-राज्य नदी जल विवाद अधिनियम 1956 (2002 में संशोधित)। जल राज्य सूची का विषय (प्रविष्टि 17) है, पर वह संघ सूची की प्रविष्टि 56 के अधीन है।
  • भौगोलिक कारण: मानसून पर निर्भरता और वर्षा में उतार-चढ़ाव; ऊपरी और निचले तटवर्ती राज्यों के हित; नदी-बेसिन और राजनीतिक सीमाओं का मेल न होना; बढ़ती माँग (सिंचाई और नगर); और सूखे के वर्षों में "संकट-साझेदारी" का सूत्र न होना।
  • समस्याएँ: न्यायाधिकरणों में अत्यधिक देरी (दशकों तक), निर्णयों का पालन न होना, और राजनीतिकरण।
  • समाधान: नदी-बेसिन संगठन (नदी बोर्ड अधिनियम 1956 का पुनर्जीवन), एकल स्थायी न्यायाधिकरण (2019 का प्रस्तावित संशोधन), डेटा में पारदर्शिता (जल-संसाधन सूचना प्रणाली), माँग-प्रबंधन (सूक्ष्म-सिंचाई), और "संकट-साझेदारी" के सूत्र।

6. अंतरराष्ट्रीय सीमाएँ, पूर्वोत्तर और भू-राजनीति

भारत की अंतरराष्ट्रीय सीमाएँ और उनसे जुड़े मुद्दे (UPSC 2025)

देशसीमा की लंबाई (लगभग)प्रमुख मुद्दे
बांग्लादेश4,096 किमी (सबसे लंबी)भूमि सीमा समझौता 2015 (111 भारतीय और 51 बांग्लादेशी परिक्षेत्रों का आदान-प्रदान); अवैध प्रवास; तीस्ता जल-विवाद; नदी-मार्गों वाली खुली सीमा
चीन3,488 किमीLAC; अक्साई चिन; अरुणाचल पर चीन का दावा; गलवान (जून 2020); डोकलाम (2017); मैकमहोन रेखा (शिमला, 1914); अक्टूबर 2024 का गश्त-समझौता
पाकिस्तान3,323 किमीLoC (शिमला समझौता 1972); सियाचिन; सर क्रीक; सीमापार आतंकवाद; रैडक्लिफ़ रेखा (1947)
नेपाल1,751 किमीखुली सीमा (1950 की संधि); कालापानी, लिपुलेख और लिम्पियाधुरा (नेपाल का 2020 का नया मानचित्र); सुस्ता
म्यांमार1,643 किमीमुक्त आवागमन व्यवस्था (FMR) को समाप्त करने और बाड़ लगाने का निर्णय (2024); उग्रवाद; मादक पदार्थ; मणिपुर
भूटान699 किमीशांतिपूर्ण सीमा; डोकलाम त्रि-संधि का सामरिक महत्व
अफ़ग़ानिस्तान106 किमीPoK (वाखान गलियारे) से
  • समुद्री सीमाएँ: श्रीलंका (कच्चातीवु द्वीप 1974 के समझौते से श्रीलंका को दिया गया; मछुआरों का विवाद), मालदीव, बांग्लादेश (2014 में स्थायी मध्यस्थता न्यायालय का निर्णय), इंडोनेशिया, थाईलैंड और म्यांमार।
  • सीमा-प्रबंधन: बाड़बंदी, BSF और ITBP आदि, "वाइब्रेंट विलेजेज़ प्रोग्राम" (2023; उत्तरी सीमा के गाँव), सीमा क्षेत्र विकास कार्यक्रम, सड़कें (BRO; सेला सुरंग 2024), एकीकृत जाँच चौकियाँ, और भूमि बंदरगाह प्राधिकरण।
  • सीमापार आतंकवाद: जम्मू-कश्मीर (पहलगाम, अप्रैल 2025; इसके बाद मई 2025 में "ऑपरेशन सिंदूर"), पंजाब में ड्रोन से तस्करी, और पूर्वोत्तर में उग्रवादी शिविर। उत्तर: व्यापक एकीकृत सीमा प्रबंधन प्रणाली (CIBMS) और ड्रोन-रोधी तकनीक।
भूगोल: सतत विकास इन्फ़ोग्राफ़िक
सतत विकास: अवधारणा, लक्ष्य (SDG), पर्यावरणीय मुद्दे और भारत के प्रयास (NCERT आधारित infographic)।

पूर्वोत्तर: सामरिक, भू-राजनीतिक और भू-सांस्कृतिक पक्ष (UPSC 2024, 2025)

  • सामरिक महत्व:
    • पूर्वोत्तर की लगभग 98% सीमा अंतरराष्ट्रीय है (चीन, भूटान, म्यांमार, बांग्लादेश)।
    • सिलीगुड़ी गलियारा ("मुर्गे की गर्दन", लगभग 20-22 किमी चौड़ा) ही इसे शेष भारत से जोड़ता है, जो इसकी सबसे बड़ी सामरिक कमज़ोरी है।
    • अरुणाचल पर चीन का दावा और तवांग का महत्व।
    • डोकलाम का चुंबी घाटी से निकटता।
    • ब्रह्मपुत्र (यारलुंग सांगपो) पर चीन की बाँध-परियोजनाएँ (मेडोग, 2024 में स्वीकृत)।
  • भू-राजनीतिक अवसर: "एक्ट ईस्ट" नीति (2014) के अंतर्गत यह दक्षिण-पूर्व एशिया का द्वार है: कलादान बहु-मॉडल परियोजना (म्यांमार के सित्त्वे बंदरगाह से मिज़ोरम), भारत-म्यांमार-थाईलैंड त्रिपक्षीय राजमार्ग, BBIN, BIMSTEC, बांग्लादेश के चटगाँव और मोंगला बंदरगाहों के उपयोग का समझौता, और अगरतला-अखौरा रेल लिंक (2023)।
  • भू-सांस्कृतिक पक्ष:
    • 200 से अधिक जनजातियाँ और भाषाएँ (तिब्बती-बर्मी, ऑस्ट्रो-एशियाई और भारोपीय भाषाएँ)।
    • दक्षिण-पूर्व एशिया (ताई-अहोम, बौद्ध) और तिब्बत (मोनपा) से ऐतिहासिक-सांस्कृतिक संबंध।
    • ईसाई-बहुल राज्य।
    • मातृवंशीय खासी और गारो समाज।
    • सांस्कृतिक पहचान और "मुख्य भूमि" से भावनात्मक दूरी; नस्लीय भेदभाव की घटनाएँ (बेज़बरुआ समिति, 2014)।
  • भू-राजनीतिक बनाम भू-सांस्कृतिक दृष्टि: भू-राजनीतिक दृष्टि पूर्वोत्तर को "सुरक्षा-सीमांत" और "रणनीतिक गलियारा" मानती है, जिससे AFSPA, सैन्यीकरण और ऊपर से नीचे की परियोजनाएँ आती हैं। भू-सांस्कृतिक दृष्टि उसे विविध पहचानों का "सांस्कृतिक सेतु" मानती है, जिसमें स्वायत्तता (छठी अनुसूची), सांस्कृतिक संवेदनशीलता और स्थानीय सहभागिता पर बल है। संघर्षों (नागा प्रश्न, मणिपुर 2023) का समाधान दोनों दृष्टियों के संतुलन में है।
  • विकास: DoNER मंत्रालय, PM-DevINE, उड़ान, रेल से राजधानियों को जोड़ना, बोगीबील पुल (2018), AFSPA के क्षेत्र में कमी (2022 से), और शांति समझौते (बोडो 2020, कार्बी 2021, ब्रू-रियांग 2020)।

विश्व मामलों और शिखर-सम्मेलनों में भारत की भूमिका (UPSC 2024)

  • G20 अध्यक्षता (2023): "वसुधैव कुटुम्बकम्: एक पृथ्वी, एक परिवार, एक भविष्य"। नई दिल्ली घोषणा-पत्र पर सहमति बनी; अफ़्रीकी संघ को स्थायी सदस्यता मिली; वैश्विक जैव-ईंधन गठबंधन बना; भारत-मध्य पूर्व-यूरोप आर्थिक गलियारे (IMEC) की घोषणा हुई; और "ग्लोबल साउथ की आवाज़" शिखर-सम्मेलन हुए।
  • जलवायु: COP26 (ग्लासगो, 2021) में "पंचामृत" (2070 तक नेट-ज़ीरो, 2030 तक 500 GW गैर-जीवाश्म क्षमता, ऊर्जा आवश्यकता का 50% नवीकरणीय स्रोतों से, एक अरब टन उत्सर्जन में कमी, और 45% उत्सर्जन-तीव्रता में कमी); मिशन LiFE; अंतरराष्ट्रीय सौर गठबंधन (2015); आपदा-प्रतिरोधी अवसंरचना गठबंधन (CDRI, 2019); और COP28 में "ग्रीन क्रेडिट" पहल।
  • अन्य मंच: BRICS (विस्तार 2024), SCO (भारत की अध्यक्षता 2023), QUAD, I2U2, BIMSTEC, IORA, संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्यता की दावेदारी, और WTO में खाद्य-सुरक्षा भंडार के मुद्दे पर रुख।
  • भौगोलिक आधार: हिंद महासागर में केंद्रीय स्थिति, विशाल जनसंख्या और बाज़ार, लोकतंत्र, प्रवासी समुदाय, और "रणनीतिक स्वायत्तता"।
  • हिंद महासागर की भू-राजनीति: SAGAR (2015) और MAHASAGAR (मार्च 2025, मॉरीशस) दृष्टि; चीन की "मोतियों की माला" (ग्वादर, हंबनटोटा, क्याउकफ्यू); और भारत के सहयोग (मॉरीशस का अगालेगा द्वीप, ओमान का दुक़्म, ईरान का चाबहार)।

7. समकालीन मुद्दे: मरुस्थलीकरण, नीली अर्थव्यवस्था, हरित वास्तुकला

मरुस्थलीकरण (UPSC 2025)

  • परिभाषा: UNCCD (1994) के अनुसार "शुष्क, अर्ध-शुष्क और शुष्क उप-आर्द्र क्षेत्रों में जलवायु-परिवर्तन और मानवीय गतिविधियों सहित विभिन्न कारकों से होने वाला भूमि-क्षरण।"
  • भारत: ISRO-SAC के मरुस्थलीकरण एवं भूमि-क्षरण एटलस (2021) के अनुसार 2018-19 में लगभग 97.85 मिलियन हेक्टेयर (कुल भौगोलिक क्षेत्र का लगभग 29.7%) क्षरित था। सबसे अधिक क्षेत्र राजस्थान, महाराष्ट्र, गुजरात और लद्दाख में है। प्रक्रियाएँ: जल-अपरदन (सबसे बड़ी), वनस्पति-क्षरण, पवन-अपरदन, लवणीकरण और जल-भराव।
  • कारण: अति-चराई, वनोन्मूलन, अवैज्ञानिक सिंचाई (इंदिरा गांधी नहर क्षेत्र में लवणता), खनन (अरावली), झूम का छोटा होता चक्र, जलवायु परिवर्तन, और जनसंख्या-दबाव।
  • परिणाम: उत्पादकता में गिरावट, खाद्य असुरक्षा, प्रवास, धूल-भरी आँधियाँ (दिल्ली), जैव-विविधता हानि, और ग़रीबी।
  • उपाय: भारत ने 2019 में नई दिल्ली में UNCCD COP14 की मेज़बानी की और 2030 तक 2.6 करोड़ हेक्टेयर क्षरित भूमि के पुनर्स्थापन का लक्ष्य रखा। अन्य उपाय: अरावली ग्रीन वॉल परियोजना (2025), जलागम (WDC-PMKSY), ग्रीन इंडिया मिशन, CAZRI (जोधपुर) की तकनीकें (आश्रय-पट्टियाँ, बालू-टिब्बों का स्थिरीकरण), चरागाह-विकास, जैविक खेती, और "भूमि-क्षरण तटस्थता" (LDN)।

नीली अर्थव्यवस्था (UPSC 2025)

  • अवधारणा: गुंटर पाउली की कृति "The Blue Economy" (2010) से यह विचार लोकप्रिय हुआ। विश्व बैंक के अनुसार यह "आर्थिक वृद्धि, आजीविका और रोज़गार के लिए महासागरीय संसाधनों का सतत उपयोग, साथ में महासागरीय पारिस्थितिकी तंत्र का स्वास्थ्य बनाए रखना" है।
  • भारत की संभावना: लगभग 11,000 किमी से अधिक की संशोधित तट-रेखा (2024 के पुनर्मापन के बाद), लगभग 20 लाख वर्ग किमी का EEZ, 12 प्रमुख बंदरगाह, लगभग 1,300 द्वीप, और करोड़ों तटीय निवासी।
  • घटक: मत्स्य और जलीय कृषि (PMMSY), समुद्री परिवहन और बंदरगाह (सागरमाला), तटीय पर्यटन, अपतटीय ऊर्जा (अपतटीय पवन: गुजरात और तमिलनाडु; तेल-गैस), गहन-समुद्री खनिज (डीप ओशन मिशन), समुद्री जैव-प्रौद्योगिकी, समुद्री शैवाल (तमिलनाडु में समुद्री शैवाल पार्क), और अलवणीकरण।
  • नीतियाँ: नीली अर्थव्यवस्था पर मसौदा नीति ढाँचा (पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय, 2021), डीप ओशन मिशन (2021), SAGAR, IORA की नीली अर्थव्यवस्था प्राथमिकताएँ, और भारत-नॉर्वे समुद्री स्थानिक नियोजन।
  • चुनौतियाँ: अति-मत्स्यन, समुद्री प्रदूषण (प्लास्टिक; 2021 में श्रीलंका तट पर X-Press Pearl जहाज़ दुर्घटना), तटीय अपरदन, जलवायु परिवर्तन (समुद्री ताप-लहरें), छोटे मछुआरों की उपेक्षा, और समुद्री सुरक्षा (समुद्री डकैती, अवैध मत्स्यन)।
  • निष्कर्ष: नीली अर्थव्यवस्था की सफलता "नीली" (वृद्धि) और "हरी" (सततता), दोनों रंगों के संतुलन पर निर्भर है।

हरित वास्तुकला (UPSC 2025)

  • अवधारणा: भवनों का ऐसा डिज़ाइन, निर्माण और संचालन जो ऊर्जा, जल और सामग्री का दक्ष उपयोग करे, उत्सर्जन और अपशिष्ट घटाए, और रहने वालों के स्वास्थ्य तथा आराम को बढ़ाए। भवन क्षेत्र वैश्विक ऊर्जा-संबंधी उत्सर्जन का बड़ा हिस्सा (लगभग एक-तिहाई के आसपास) है।
  • सिद्धांत: स्थल-अभिविन्यास (सूर्य-पथ, पवन), निष्क्रिय शीतलन (जाली, आँगन, मोटी दीवारें, पवन-मीनारें), प्राकृतिक प्रकाश, इन्सुलेशन, स्थानीय और पुनर्चक्रित सामग्री (मिट्टी, बाँस, फ़्लाई ऐश ईंटें), वर्षा-जल संचयन, अपशिष्ट जल का पुनर्चक्रण, छत पर सौर पैनल, और हरित छतें।
  • भारतीय परंपरा: राजस्थान की हवेलियाँ और जालियाँ, केरल का "नालुकेट्टु", लॉरी बेकर की कम लागत वाली ईंट-वास्तुकला (केरल), और लद्दाख के मिट्टी के घर।
  • मानक और रेटिंग: GRIHA (TERI और MNRE, 2007), IGBC (CII, 2001), LEED; ऊर्जा संरक्षण भवन संहिता (ECBC, 2007) और आवासीय भवनों के लिए इको-निवास संहिता (2018)। उदाहरण: हैदराबाद का CII-सोहराबजी गोदरेज ग्रीन बिज़नेस सेंटर (भारत का पहला LEED प्लैटिनम भवन) और दिल्ली का इंदिरा पर्यावरण भवन (नेट-ज़ीरो ऊर्जा)।
  • भौगोलिक प्रासंगिकता: जलवायु-क्षेत्र के अनुसार डिज़ाइन (गर्म-शुष्क, गर्म-आर्द्र, समशीतोष्ण, ठंडा); नगरीय ताप-द्वीप में कमी; जल-संकट; और भारत के तेज़ नगरीकरण में भविष्य के अधिकांश भवन अभी बनने बाक़ी हैं, जो "लॉक-इन" से बचने का अवसर है।
  • बाधाएँ: प्रारंभिक लागत, जागरूकता की कमी, भवन-संहिताओं का कमज़ोर पालन, और कुशल श्रम।
  • पर्यावरणीय संकट: भू-स्खलन (वायनाड, जुलाई 2024), भूकंप (भारत का बड़ा भाग भूकंपीय क्षेत्र III, IV और V में), सुनामी, बाढ़ और सूखा। ढाँचा: आपदा प्रबंधन अधिनियम 2005 (2025 में संशोधित), NDMA, और सेंडाई फ़्रेमवर्क।
  • EIA: 1994 की अधिसूचना, 2006 की अधिसूचना, और 2020 का मसौदा (विवादित); इसके चरण हैं स्क्रीनिंग, स्कोपिंग, जन-सुनवाई और मूल्यांकन।
  • नदी-जोड़: राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य योजना (1980) में 30 लिंक (16 प्रायद्वीपीय और 14 हिमालयी); पहली परियोजना केन-बेतवा है।
  • वैश्वीकरण और भारतीय अर्थव्यवस्था: 1991 के बाद IT और सेवा-संकुल (बेंगलुरु), SEZ, प्रादेशिक विषमता में वृद्धि, और कृषि पर प्रभाव।

8. Master Summary Table

विषयमुख्य तथ्ययाद रखें
73वाँ संशोधन1992; 24 अप्रैल 1993 से लागू; भाग IX; 29 विषयकेरल जन योजना 1996; GPDP
लक्ष्य-क्षेत्र कार्यक्रमDPAP 1973, CAD 1974-75, TSP 1974-75, DDP 1977-78IWMP 2009
द्वीपIDA 2017; ग्रेट निकोबार परियोजनाशोम्पेन; कवरत्ती का LTTD
विषमताMPI: 24.85% से 14.96%माल-भाड़ा समानीकरण (1952-93)
प्रवास45.6 करोड़ (2011)प्रति वर्ष लगभग 90 लाख अंतर-राज्य (आर्थिक सर्वेक्षण)
पुनर्गठनSRC 1953-55; अधिनियम 195628 राज्य, 8 संघ राज्य क्षेत्र
जल-विवादअनुच्छेद 262; 1956 का अधिनियमकावेरी 2018: 177.25 TMC
सीमाएँबांग्लादेश 4,096 किमी (सबसे लंबी)LBA 2015; FMR 2024
पूर्वोत्तर98% अंतरराष्ट्रीय सीमा; सिलीगुड़ी गलियाराकलादान; एक्ट ईस्ट 2014
मरुस्थलीकरण97.85 Mha (29.7%)COP14 (2019); 2.6 करोड़ हेक्टेयर लक्ष्य
नीली अर्थव्यवस्थापाउली 2010; मसौदा 2021SAGAR 2015, MAHASAGAR 2025
हरित वास्तुकलाGRIHA 2007, IGBC 2001, ECBC 2007लॉरी बेकर; इंदिरा पर्यावरण भवन

9. चार्ट: भारत की स्थल-सीमाओं की लंबाई

बांग्लादेश4,096 चीन3,488 पाकिस्तान3,323 नेपाल1,751 म्यांमार1,643 भूटान699 अफ़ग़ानिस्तान106 लंबाई किमी में (लगभग); कुल लगभग 15,100 किमी
भारत की स्थल-सीमाएँ: बांग्लादेश के साथ सबसे लंबी और अफ़ग़ानिस्तान (PoK के माध्यम से) के साथ सबसे छोटी सीमा है (गृह मंत्रालय के सीमा-प्रबंधन आँकड़ों पर आधारित, लगभग मान)।

10. Mind Map

भारत: प्रादेशिक, राजनीतिक, समकालीन मुद्दे
नियोजन
  • योजनाएँ, लक्ष्य-क्षेत्र कार्यक्रम
  • 73वाँ संशोधन, द्वीप
पिछड़े क्षेत्र
  • सूखा-प्रवण, जनजातीय
  • विषमता, प्रवास
संघवाद
  • पुनर्गठन, नए राज्य
  • प्रादेशिक चेतना, जल-विवाद
सीमाएँ
  • पड़ोसी देश, पूर्वोत्तर
  • शिखर-सम्मेलन, हिंद महासागर
समकालीन
  • मरुस्थलीकरण, नीली अर्थव्यवस्था
  • हरित वास्तुकला, EIA, नदी-जोड़

11. महत्वपूर्ण One-liners

  • राष्ट्रीय पंचायती राज दिवस: 24 अप्रैल।
  • राज्य पुनर्गठन आयोग के अध्यक्ष: फ़ज़ल अली।
  • भारत की सबसे लंबी स्थल-सीमा: बांग्लादेश (लगभग 4,096 किमी)।
  • मैकमहोन रेखा: शिमला सम्मेलन (1914)।
  • सिलीगुड़ी गलियारे की चौड़ाई: लगभग 20-22 किमी।
  • अंतर-राज्य नदी-जल विवाद: अनुच्छेद 262।
  • द्वीप विकास एजेंसी: 2017 (अध्यक्ष: गृह मंत्री)।
  • UNCCD COP14 की मेज़बानी: नई दिल्ली (2019)।
  • GRIHA रेटिंग: TERI और MNRE (2007)।
  • हिंद महासागर दृष्टि: SAGAR (2015), MAHASAGAR (2025)।

12. टिप्स एवं ट्रिक्स

समकालीन और राजनीतिक प्रश्न
  • इन प्रश्नों में भौगोलिक आधार (स्थिति, संसाधन, पर्यावरण) को केंद्र में रखें। यह भूगोल का उत्तर है, केवल राजनीति विज्ञान का नहीं।
  • सीमा और पूर्वोत्तर के प्रश्नों में भारत का मानचित्र (सीमाएँ, विवादित क्षेत्र, गलियारे) अनिवार्य रूप से बनाएँ।
  • हाल की घटनाएँ (गलवान, FMR, ग्रेट निकोबार, MAHASAGAR, वायनाड) तिथि सहित लिखें; पुरानी जानकारी से अंक कटते हैं।
याद रखने की तरकीब

स्थल-सीमाएँ घटते क्रम में: "बां-ची-पा-ने-म्या-भू-अ"। 73वें संशोधन के "3F": कार्य, कोष, कर्मचारी।

13. PYQ-आधारित प्रश्न एवं मॉडल उत्तर

Q1UPSC 2025 · Paper II · 4(a)

भारत में प्रादेशिक चेतना के उदय और अंतर-राज्य विवादों के भौगोलिक आधार की विवेचना कीजिए।

मॉडल उत्तर (रूपरेखा)

प्रादेशिक चेतना: भाषा, संस्कृति, इतिहास, उपेक्षा; सकारात्मक और नकारात्मक रूप।

उदाहरण: तेलंगाना, गोरखालैंड, विदर्भ, बोडोलैंड; धरती-पुत्र की धारणा।

सीमा-विवाद: बेलगावी, असम-मिज़ोरम, असम-मेघालय, असम-अरुणाचल; औपनिवेशिक सीमांकन।

जल-विवाद: कावेरी, कृष्णा, महादयी, SYL।

समाधान: अंतर-राज्य परिषद, क्षेत्रीय परिषदें, द्विपक्षीय समझौते, अनुच्छेद 131 और 262।

निष्कर्ष: प्रादेशिक चेतना संघवाद के लिए ख़तरा नहीं, बल्कि उसकी विविधता की अभिव्यक्ति है, बशर्ते संवाद-तंत्र सशक्त हों।

Q2UPSC 2025 · Paper II · 8(c)

भारत की अंतरराष्ट्रीय सीमाओं से जुड़े प्रमुख मुद्दों की विवेचना कीजिए।

मॉडल उत्तर (रूपरेखा)

विस्तार: 7 देश, लगभग 15,100 किमी; मानचित्र और ऊपर का चार्ट।

देशवार मुद्दे: चीन (LAC, गलवान, अरुणाचल), पाकिस्तान (LoC, सर क्रीक, आतंकवाद), बांग्लादेश (LBA 2015, प्रवास, तीस्ता), नेपाल (कालापानी), म्यांमार (FMR, उग्रवाद), भूटान (डोकलाम)।

समुद्री सीमाएँ: कच्चातीवु, मछुआरे।

प्रबंधन: बाड़बंदी, वाइब्रेंट विलेजेज़, BRO, CIBMS, एकीकृत जाँच चौकियाँ।

निष्कर्ष: सीमाएँ "दीवार" के साथ-साथ "पुल" भी बनें, यानी सुरक्षा और संपर्क दोनों।

Q3UPSC 2025 · Paper II · 7(b)

भारत में मरुस्थलीकरण के कारणों, विस्तार और उसे रोकने के उपायों की विवेचना कीजिए।

मॉडल उत्तर (रूपरेखा)

परिभाषा: UNCCD 1994।

विस्तार: ISRO-SAC एटलस 2021 (97.85 Mha, 29.7%); प्रमुख राज्य; प्रक्रियाएँ; मानचित्र सहित।

कारण: अति-चराई, वनोन्मूलन, लवणता, खनन, जलवायु परिवर्तन।

परिणाम: उत्पादकता, प्रवास, धूल-आँधी, ग़रीबी।

उपाय: COP14 और 2.6 करोड़ हेक्टेयर लक्ष्य, अरावली ग्रीन वॉल, जलागम, CAZRI की तकनीकें, LDN।

निष्कर्ष: मरुस्थलीकरण को रोकना खाद्य, जल और जलवायु सुरक्षा का साझा उत्तर है।

Q4UPSC 2025 · Paper II · 7(c)

भारत के लिए नीली अर्थव्यवस्था की संभावनाओं और चुनौतियों की विवेचना कीजिए।

मॉडल उत्तर (रूपरेखा)

अवधारणा: पाउली; विश्व बैंक की परिभाषा।

संभावना: तट-रेखा, EEZ, बंदरगाह, द्वीप।

घटक: मत्स्य, बंदरगाह, पर्यटन, अपतटीय ऊर्जा, गहन-समुद्री खनिज, समुद्री शैवाल।

नीतियाँ: मसौदा नीति 2021, डीप ओशन मिशन, SAGAR, MAHASAGAR।

चुनौतियाँ: अति-मत्स्यन, प्रदूषण, अपरदन, ताप-लहरें, छोटे मछुआरे, सुरक्षा।

निष्कर्ष: "नीली" और "हरी" का संतुलन।

Q5UPSC 2025 · Paper II · 8(a)

सतत नगरीय विकास में हरित वास्तुकला की भूमिका की विवेचना कीजिए।

मॉडल उत्तर (रूपरेखा)

अवधारणा: ऊर्जा, जल और सामग्री का दक्ष उपयोग; भवन क्षेत्र के उत्सर्जन।

सिद्धांत: अभिविन्यास, निष्क्रिय शीतलन, प्रकाश, इन्सुलेशन, स्थानीय सामग्री, जल, सौर ऊर्जा।

परंपरा: जालियाँ, नालुकेट्टु, लॉरी बेकर।

मानक: GRIHA, IGBC, LEED, ECBC, इको-निवास संहिता; उदाहरण।

भौगोलिक प्रासंगिकता: जलवायु-क्षेत्र, ताप-द्वीप, जल-संकट, लॉक-इन से बचाव।

बाधाएँ और निष्कर्ष: लागत, पालन; "हरित भवन, स्वस्थ नगर"।

Q6UPSC 2025 · Paper II · 8(b)

भारत के द्वीप क्षेत्रों के लिए प्रादेशिक नियोजन की आवश्यकताओं और चुनौतियों की विवेचना कीजिए।

मॉडल उत्तर (रूपरेखा)

द्वीप: अंडमान-निकोबार और लक्षद्वीप; विशेषताएँ।

चुनौतियाँ: पृथक्करण, जल, नाज़ुक पारिस्थितिकी, आपदाएँ, समुद्र-तल वृद्धि, PVTG, सामरिक संवेदनशीलता।

ढाँचा: IDA 2017; ग्रेट निकोबार परियोजना और उससे जुड़ी चिंताएँ।

नियोजन के सिद्धांत: वहन-क्षमता, नवीकरणीय ऊर्जा, अलवणीकरण (LTTD), पारिस्थितिक पर्यटन, नीली अर्थव्यवस्था, CDRI, सहमति, समुद्री स्थानिक नियोजन।

निष्कर्ष: द्वीपों का विकास "मुख्य भूमि की प्रतिलिपि" नहीं, बल्कि "द्वीप-विशिष्ट" होना चाहिए।

Q7UPSC 2024 · Paper II · 3(a)

भारत में आर्थिक विकास की प्रादेशिक विषमताओं के कारणों और उन्हें कम करने के उपायों की विवेचना कीजिए।

मॉडल उत्तर (रूपरेखा)

आयाम: NSDP, MPI (24.85% से 14.96%), HDI; अंतर-राज्य के भीतर विषमता; मानचित्र।

कारण: भौगोलिक, ऐतिहासिक, माल-भाड़ा समानीकरण, हरित क्रांति, निवेश, शासन, मानव पूँजी।

परिणाम: प्रवास, असंतोष, उग्रवाद, राजकोषीय तनाव।

उपाय: वित्त आयोग, आकांक्षी ज़िले और ब्लॉक, गलियारे, पूर्वोदय, PM-DevINE।

सिद्धांत: मिर्डल और विलियमसन।

निष्कर्ष: "संतुलित विकास" भारतीय संघ की एकता की शर्त है।

Q8UPSC 2024 · Paper II · 4(c)

भारत में अंतर-राज्य नदी-जल विवादों के भौगोलिक कारणों और समाधान के उपायों की विवेचना कीजिए।

मॉडल उत्तर (रूपरेखा)

प्रमुख विवाद: तालिका (कावेरी, कृष्णा, महादयी, SYL, नर्मदा)।

ढाँचा: अनुच्छेद 262, 1956 का अधिनियम (2002), राज्य सूची की प्रविष्टि 17 और संघ सूची की प्रविष्टि 56।

भौगोलिक कारण: मानसून, ऊपरी और निचले तटवर्ती राज्य, बेसिन बनाम सीमा, माँग, संकट-साझेदारी का अभाव।

समस्याएँ: देरी, पालन न होना, राजनीति।

समाधान: नदी-बेसिन संगठन, स्थायी न्यायाधिकरण, डेटा, माँग-प्रबंधन, संकट-सूत्र।

निष्कर्ष: "जल पर अधिकार" के स्थान पर "जल की साझी ज़िम्मेदारी"।

Q9UPSC 2024 · Paper II · 4(b)

भारत में जनजातीय क्षेत्र विकास की रणनीतियों का आलोचनात्मक मूल्यांकन कीजिए।

मॉडल उत्तर (रूपरेखा)

नीतिगत विकास: पंचशील, TSP, ITDA, DAPST।

ढाँचा: पाँचवीं और छठी अनुसूची, PESA, FRA।

नई पहल: EMRS, PM-JANMAN, धरती आबा अभियान, वन धन।

समस्याएँ: विस्थापन, अधिकार, दुर्गमता, स्वास्थ्य, उग्रवाद।

सफल उदाहरण: नियमगिरि, मेंढा-लेखा।

निष्कर्ष: "पहचान के साथ विकास" और ग्राम सभा की सहमति।

Q10UPSC 2024 · Paper II · 7(b)

विकेंद्रीकृत नियोजन में 73वें संविधान संशोधन की भूमिका का मूल्यांकन कीजिए।

मॉडल उत्तर (रूपरेखा)

प्रावधान: भाग IX, ग्यारहवीं अनुसूची, त्रि-स्तरीय ढाँचा, ग्राम सभा, आरक्षण, राज्य निर्वाचन आयोग और राज्य वित्त आयोग, ज़िला योजना समिति।

महत्व: नीचे से ऊपर नियोजन, स्थान-आधारित विकास, प्रतिनिधित्व।

उदाहरण: केरल 1996, GPDP, ई-ग्रामस्वराज।

सीमाएँ: 3F, असमानता, सरपंच पति, ग्राम सभा, राजस्व।

निष्कर्ष: संविधान ने ढाँचा दिया; अब "वास्तविक हस्तांतरण" आवश्यक है।

Q11UPSC 2024 · Paper II · 7(a)

हाल के अंतरराष्ट्रीय शिखर-सम्मेलनों में भारत की भूमिका की विवेचना कीजिए।

मॉडल उत्तर (रूपरेखा)

G20 2023: नई दिल्ली घोषणा-पत्र, अफ़्रीकी संघ, जैव-ईंधन गठबंधन, IMEC, ग्लोबल साउथ।

जलवायु: पंचामृत, LiFE, ISA, CDRI, ग्रीन क्रेडिट।

अन्य मंच: BRICS, SCO, QUAD, BIMSTEC, IORA, संयुक्त राष्ट्र।

भौगोलिक आधार: हिंद महासागर में स्थिति, जनसंख्या, बाज़ार, प्रवासी समुदाय।

निष्कर्ष: भारत "सेतु-शक्ति" के रूप में उभर रहा है, यानी विकसित और विकासशील देशों के बीच की कड़ी।

Q12UPSC 2024 · Paper II · 4(a)

भारत में आंतरिक प्रवास के प्रतिरूपों, कारणों और परिणामों की विवेचना कीजिए।

मॉडल उत्तर (रूपरेखा)

आँकड़े: 45.6 करोड़ (2011); प्रति वर्ष लगभग 90 लाख अंतर-राज्य प्रवास।

प्रतिरूप: ग्राम से ग्राम, ग्राम से नगर, मौसमी; उद्गम और गंतव्य राज्य; मानचित्र।

कारण: विषमता, कृषि-संकट, रोज़गार, आपदाएँ।

परिणाम: प्रेषण, असुरक्षा (कोविड), झुग्गियाँ, मूलनिवासी राजनीति, स्त्री-प्रधान परिवार।

नीति: ई-श्रम, ONORC, ARHC, श्रम संहिता।

निष्कर्ष: प्रवास विकास का "लक्षण" भी है और "साधन" भी; प्रवासी श्रमिकों के अधिकार सुनिश्चित करना आवश्यक है।

Q13UPSC 2024 · Paper II · 1(d) · 10 अंक

पूर्वोत्तर भारत के सामरिक महत्व पर टिप्पणी कीजिए।

मॉडल उत्तर

सीमाएँ: लगभग 98% अंतरराष्ट्रीय; सिलीगुड़ी गलियारा।

ख़तरे: अरुणाचल पर चीन का दावा, डोकलाम, ब्रह्मपुत्र पर बाँध।

अवसर: एक्ट ईस्ट, कलादान, त्रिपक्षीय राजमार्ग, BIMSTEC।

मानचित्र: गलियारा और सीमाएँ।

Q14UPSC 2024 · Paper II · 5(d) · 10 अंक

भारत में सूखा-प्रवण क्षेत्र कार्यक्रम पर टिप्पणी कीजिए।

मॉडल उत्तर

सीमांकन: सिंचाई आयोग 1972 के मानदंड।

क्षेत्र: राजस्थान, कच्छ, दक्कन का वृष्टि-छाया क्षेत्र, बुंदेलखंड, पलामू।

कार्यक्रम: DPAP 1973, DDP, IWDP, IWMP 2009, WDC-PMKSY।

मूल्यांकन: सफलताएँ बनाम ऊपर से नीचे का दृष्टिकोण और भू-जल का अति-दोहन।

Q15UPSC 2025 · Paper II · 5(d) · 10 अंक

पूर्वोत्तर भारत के भू-राजनीतिक और भू-सांस्कृतिक पक्षों पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।

मॉडल उत्तर

भू-राजनीतिक: सुरक्षा-सीमांत, सिलीगुड़ी गलियारा, चीन, एक्ट ईस्ट, AFSPA।

भू-सांस्कृतिक: जनजातीय और भाषायी विविधता, दक्षिण-पूर्व एशिया और तिब्बत से संबंध, मातृवंशीय समाज, पहचान और बेज़बरुआ समिति।

संतुलन: छठी अनुसूची, स्थानीय सहभागिता, शांति समझौते।

14. Quick Revision Summary

परीक्षा से पहले एक बार ज़रूर पढ़ें
  • नियोजन: योजनाएँ, लक्ष्य-क्षेत्र कार्यक्रम, बहुस्तरीय नियोजन, DVC, CAD, 73वाँ संशोधन।
  • पिछड़े क्षेत्र: सूखा-प्रवण, जनजातीय, पहाड़ी, द्वीप (ग्रेट निकोबार)।
  • विषमता और प्रवास: MPI, कारण, उपाय; प्रवास के प्रतिरूप और नीतियाँ।
  • राजनीतिक: संघवाद, पुनर्गठन, प्रादेशिक चेतना, सीमा और जल-विवाद।
  • सीमाएँ: सात पड़ोसी देश; पूर्वोत्तर; शिखर-सम्मेलन; हिंद महासागर (SAGAR, MAHASAGAR)।
  • समकालीन: मरुस्थलीकरण, नीली अर्थव्यवस्था, हरित वास्तुकला, आपदाएँ, EIA, नदी-जोड़, वैश्वीकरण।