1. अध्याय एक नज़र में
Paper I भाग B के तीन खंड: जनसंख्या भूगोल (वृद्धि और वितरण, जनांकिकीय विशेषताएँ, प्रवास, अति-अल्प-अनुकूलतम जनसंख्या, जनसंख्या सिद्धांत, समस्याएँ और नीतियाँ, सामाजिक कल्याण, सामाजिक पूँजी), अधिवास भूगोल (ग्रामीण अधिवासों के प्रकार और प्रतिरूप, नगरीय पदानुक्रम, नगरीय आकारिकी, प्रमुख नगर और श्रेणी-आकार नियम, नगरों का कार्यात्मक वर्गीकरण, नगरीय प्रभाव-क्षेत्र, ग्रामीण-नगरीय उपांत, अनुषंगी नगर, नगरीकरण की समस्याएँ, सतत नगर) और प्रादेशिक नियोजन (प्रदेश की अवधारणा, प्रदेशों के प्रकार और प्रदेशीकरण की विधियाँ, वृद्धि केंद्र और वृद्धि ध्रुव, प्रादेशिक असंतुलन, विकास रणनीतियाँ, सतत विकास के लिए नियोजन)।
2025 में ये प्रश्न आए: प्रवास के प्रति धारणाएँ, प्रादेशिक असंतुलन, नगर नियोजन में तंत्र विश्लेषण, प्रमुख नगर, वृद्धि बनाम वृद्धावस्था, जनांकिकीय संक्रमण मॉडल और प्रादेशिक संश्लेषण। 2024 में CBD का ह्रास, एशिया-अफ़्रीका का नगरीकरण, पार-राष्ट्रवाद, नियोजन प्रदेशों के मानदंड, जेंडर-संवेदी प्रादेशिक विकास, और विकसित देशों में प्रवास बनाम प्रजनन पूछे गए।

2. विश्व जनसंख्या: वृद्धि, वितरण और सिद्धांत
- वृद्धि: संयुक्त राष्ट्र के अनुसार विश्व जनसंख्या 15 नवंबर 2022 को 8 अरब हुई। UN World Population Prospects 2024 के अनुमान से जनसंख्या 2080 के दशक के मध्य में लगभग 10.3 अरब पर शिखर तक पहुँचेगी। UN के अनुमान के अनुसार भारत अप्रैल 2023 में चीन को पीछे छोड़कर सबसे अधिक जनसंख्या वाला देश बना।
- वितरण के कारक: भौतिक कारक (जलवायु, उच्चावच, मृदा, जल), आर्थिक कारक (खनिज, उद्योग, नगरीकरण) और सामाजिक-राजनीतिक कारक। घने क्षेत्र हैं: पूर्वी एशिया, दक्षिण एशिया, पश्चिमी यूरोप और उत्तर-पूर्वी अमेरिका। विरल क्षेत्र हैं: मरुस्थल, ध्रुवीय प्रदेश, विषुवतीय वन और ऊँचे पर्वत। जनसंख्या का लगभग 90% भाग उत्तरी गोलार्ध में रहता है।
- जनांकिकीय विशेषताएँ: आयु-लिंग संरचना (आयु-पिरामिड), लिंगानुपात, साक्षरता, निर्भरता अनुपात, नगरीय-ग्रामीण संरचना, व्यावसायिक संरचना।
जनसंख्या सिद्धांत
| सिद्धांत | विचारक | मूल विचार |
|---|---|---|
| माल्थस का सिद्धांत | थॉमस रॉबर्ट माल्थस (An Essay on the Principle of Population, 1798) | जनसंख्या ज्यामितीय क्रम में और खाद्य अंकगणितीय क्रम में बढ़ता है; इसलिए सकारात्मक अवरोध (अकाल, रोग, युद्ध) और निवारक अवरोध (देर से विवाह, संयम) आते हैं |
| नव-माल्थसवाद | पॉल एर्लिख (The Population Bomb, 1968) | जनसंख्या विस्फोट पारिस्थितिक संकट का कारण है |
| मार्क्सवादी दृष्टि | कार्ल मार्क्स | "अति-जनसंख्या" पूँजीवाद की उपज है, यानी "आरक्षित श्रम सेना" |
| अनुकूलतम जनसंख्या | एडविन कैनन | वह जनसंख्या जिस पर प्रति व्यक्ति आय अधिकतम हो; इससे कम अल्प-जनसंख्या और इससे अधिक अति-जनसंख्या है |
| जनांकिकीय संक्रमण | वॉरेन थॉम्पसन (1929), फ़्रैंक नोटेस्टीन (1945) | विकास के साथ उच्च जन्म-मृत्यु दर से निम्न जन्म-मृत्यु दर की ओर संक्रमण |
| बोसरप का सिद्धांत | एस्टर बोसरप (The Conditions of Agricultural Growth, 1965) | जनसंख्या का दबाव कृषि-नवाचार और गहनता को प्रेरित करता है ("आवश्यकता आविष्कार की जननी") |
| द्वितीय जनांकिकीय संक्रमण | रॉन लेस्थेग और डर्क वान डे का (1986) | विकसित देशों में मूल्यों के परिवर्तन (व्यक्तिवाद, देर से विवाह, सहवास) से प्रजनन दर प्रतिस्थापन स्तर से नीचे स्थिर रहती है |
जनांकिकीय संक्रमण मॉडल (UPSC 2025)
| अवस्था | जन्म दर | मृत्यु दर | जनसंख्या वृद्धि | उदाहरण |
|---|---|---|---|---|
| 1. उच्च स्थिर | उच्च | उच्च, उतार-चढ़ाव वाली | धीमी | पूर्व-औद्योगिक समाज; आज कुछ पृथक जनजातियाँ |
| 2. प्रारंभिक विस्तार | उच्च | तेज़ी से घटती हुई | तीव्र ("विस्फोट") | नाइजर, सहेल के देश |
| 3. उत्तर विस्तार | घटती हुई | निम्न | धीमी पड़ती हुई | भारत, बांग्लादेश (संक्रमण के अंतिम चरण में) |
| 4. निम्न स्थिर | निम्न | निम्न | लगभग स्थिर | अमेरिका, फ़्रांस |
| 5. ह्रास | मृत्यु दर से कम | निम्न, वृद्धावस्था से थोड़ी बढ़ती | ऋणात्मक | जापान, इटली, दक्षिण कोरिया |
- मॉडल की प्रासंगिकता: यह यूरोप के अनुभव पर आधारित एक सरल सामान्यीकरण है। वर्तमान विकासशील देशों में मृत्यु दर का ह्रास बहुत तेज़ी से हुआ, क्योंकि आयातित चिकित्सा तकनीक उपलब्ध थी। प्रजनन में गिरावट का कारण केवल आर्थिक विकास नहीं है, बल्कि शिक्षा, स्त्री-सशक्तीकरण और परिवार नियोजन भी हैं; उदाहरण के लिए केरल और बांग्लादेश में कम आय पर भी प्रजनन घटा।
- सीमाएँ: यह मॉडल प्रवास की भूमिका की उपेक्षा करता है। समय-सीमा का अनुमान नहीं देता। HIV/AIDS जैसे संकटों से मृत्यु दर का बढ़ना और पाँचवीं अवस्था बाद में जोड़ी गई।
- भारत: NFHS-5 (2019-21) के अनुसार कुल प्रजनन दर (TFR) 2.0 है, जो प्रतिस्थापन स्तर (2.1) से कम है। फिर भी "जनांकिकीय गति" (demographic momentum) के कारण जनसंख्या कुछ दशकों तक बढ़ती रहेगी। राज्यों के बीच अंतर बड़ा है: बिहार में TFR लगभग 3.0 और केरल तथा तमिलनाडु में लगभग 1.8 है।
वृद्धि बनाम वृद्धावस्था: दोहरी जनांकिकीय चुनौती (UPSC 2025)
- वृद्धि की चुनौती: उप-सहारा अफ़्रीका और दक्षिण एशिया के कुछ भागों में उच्च प्रजनन से ये समस्याएँ उत्पन्न होती हैं: रोज़गार, शिक्षा, स्वास्थ्य और खाद्य पर दबाव, नगरों में झुग्गियाँ, और "युवा उभार" (youth bulge) जो अस्थिरता का कारण बन सकता है।
- वृद्धावस्था की चुनौती: जापान (65+ जनसंख्या लगभग 29%), इटली, दक्षिण कोरिया (विश्व की सबसे कम TFR, 1 से भी कम) और चीन में ये समस्याएँ हैं: श्रम-शक्ति का घटना, पेंशन और स्वास्थ्य-व्यय का बढ़ना, ग्रामीण क्षेत्रों का खाली होना (जापान के "अकिया" यानी खाली मकान), और आर्थिक गतिशीलता की कमी। चीन "अमीर होने से पहले बूढ़ा" होने के ख़तरे से जूझ रहा है।
- भारत की स्थिति: भारत दोनों के बीच है। अभी "जनांकिकीय लाभांश" (demographic dividend) की खिड़की खुली है, जो लगभग 2040 के दशक तक मानी जाती है। पर दक्षिणी राज्य पहले ही वृद्ध हो रहे हैं, जबकि उत्तरी राज्य युवा हैं। इससे अंतर-राज्य प्रवास और परिसीमन (प्रतिनिधित्व) के प्रश्न उभरते हैं।
- नीतिगत उत्तर: वृद्धि वाले देशों में स्त्री-शिक्षा, परिवार नियोजन और कौशल-विकास आवश्यक हैं। वृद्ध देशों में सेवानिवृत्ति-आयु बढ़ाना, स्वचालन और रोबोटिक्स, आप्रवासन, परिवार-अनुकूल नीतियाँ (शिशु-देखभाल, अभिभावक-अवकाश) और "रजत अर्थव्यवस्था" (silver economy) जैसे क़दम उठाए जा रहे हैं।

- सामाजिक कल्याण और जीवन-गुणवत्ता: HDI, सामाजिक प्रगति सूचकांक, "विश्व प्रसन्नता रिपोर्ट"।
- जनसंख्या सामाजिक पूँजी के रूप में: पियरे बोर्दियू, जेम्स कोलमैन और रॉबर्ट पुटनम (Bowling Alone, 2000) के अनुसार सामाजिक पूँजी का अर्थ है सामाजिक संबंध, विश्वास और नेटवर्क, जो सामूहिक क्रिया को सरल बनाते हैं। इसके उदाहरण हैं स्वयं सहायता समूह (केरल का कुदुंबश्री), सहकारिताएँ (अमूल) और प्रवासी नेटवर्क। शिक्षित और स्वस्थ जनसंख्या "भार" नहीं, "संसाधन" है।
3. प्रवास: कारण, परिणाम और सिद्धांत
| सिद्धांत / मॉडल | विचारक | मूल विचार |
|---|---|---|
| प्रवास के नियम | ई.जी. रेवेन्स्टीन (1885, 1889) | अधिकांश प्रवासी कम दूरी तक जाते हैं; प्रवास चरणों में होता है; हर धारा की एक प्रति-धारा होती है; प्रवास के पीछे मुख्यतः आर्थिक कारण होते हैं |
| हस्तक्षेपी अवसर | सैमुअल स्टूफ़र (1940) | प्रवास दूरी से नहीं, रास्ते के बीच में पड़ने वाले अवसरों से नियंत्रित होता है |
| प्रवास का सिद्धांत (धक्का-खिंचाव) | एवरेट ली (1966) | मूल स्थान और गंतव्य के धनात्मक-ऋणात्मक कारक, हस्तक्षेपी बाधाएँ और व्यक्तिगत कारक |
| अपेक्षित आय मॉडल | माइकल टोडारो (1969) | ग्रामीण-नगरीय प्रवास वास्तविक नहीं, बल्कि "अपेक्षित" आय-अंतर पर निर्भर है; इसीलिए नगरों में बेरोज़गारी के बावजूद प्रवास जारी रहता है |
| गतिशीलता संक्रमण | विल्बर ज़ेलिंस्की (1971) | जनांकिकीय संक्रमण की अवस्थाओं के साथ प्रवास के प्रकार बदलते हैं |
| नवीन प्रवास अर्थशास्त्र | ओडेड स्टार्क (1980 का दशक) | प्रवास परिवार का सामूहिक निर्णय है, जिसका उद्देश्य जोखिम का विविधीकरण है |
प्रवास के प्रति धारणाएँ (UPSC 2025)
- प्रवासी की धारणा: व्यवहारवादी दृष्टि से, निर्णय वास्तविक अवसरों पर नहीं, उनकी अनुभूत छवि पर निर्भर करता है। इस छवि के स्रोत हैं: पहले गए प्रवासियों से मिली सूचना (शृंखला-प्रवास), मीडिया, और स्थान-उपयोगिता (place utility; वोल्पर्ट)।
- गंतव्य समाज की धारणा: प्रवासी को "संसाधन" (श्रम, कौशल, विविधता) या "ख़तरा" (रोज़गार, संस्कृति, सुरक्षा) के रूप में देखा जाता है। इसका परिणाम "मूलनिवासीवाद" (nativism) की राजनीति, स्थानीय आरक्षण की माँग, और यूरोप-अमेरिका में आप्रवासन-विरोधी दलों के उभार में दिखता है।
- मूल समाज की धारणा: "प्रतिभा पलायन" (brain drain) बनाम "प्रतिभा लाभ" (brain gain), प्रेषित धन (remittances) और सामाजिक प्रेषण (नए विचार)।
- नीतिगत धारणा: प्रवास "समस्या" है या "विकास-रणनीति"? संयुक्त राष्ट्र का प्रवास पर ग्लोबल कॉम्पैक्ट (2018) प्रवास को "सुरक्षित, व्यवस्थित और नियमित" बनाने पर बल देता है।
- प्रवास के परिणाम: आर्थिक (प्रेषित धन, श्रम-आपूर्ति, कौशल), जनांकिकीय (लिंगानुपात का असंतुलन, जैसे खाड़ी देशों में पुरुष-प्रधान जनसंख्या और केरल-बिहार के गाँवों में स्त्री-प्रधान घर), सामाजिक (बहुसांस्कृतिकता, तनाव) और पर्यावरणीय (नगरों पर दबाव)।
- भारत: विश्व बैंक के अनुसार भारत विश्व में सबसे अधिक प्रेषित धन पाने वाला देश है (2024 में लगभग 129 अरब डॉलर)। आंतरिक प्रवास में बिहार और उत्तर प्रदेश से महाराष्ट्र, दिल्ली और गुजरात की ओर बड़ी धाराएँ हैं। कोविड-19 (2020) के समय प्रवासी श्रमिकों के "उलटे प्रवास" ने उनकी असुरक्षा को उजागर किया। ई-श्रम पोर्टल (2021) और "एक राष्ट्र एक राशन कार्ड" इसके बाद के क़दम हैं।
पार-राष्ट्रवाद (Transnationalism) (UPSC 2024)
- अर्थ: नीना ग्लिक शिलर, लिंडा बाश और क्रिस्टीना सैंटन ब्लैंक (1992, 1994) के अनुसार यह वह प्रक्रिया है जिसमें प्रवासी मूल देश और गंतव्य देश, दोनों से एक साथ सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक संबंध बनाए रखते हैं। प्रवासी "उखड़े हुए" नहीं, बल्कि "दो जगह जड़ें रखने वाले" होते हैं।
- आधार: सस्ता हवाई यात्रा, इंटरनेट, सोशल मीडिया, वीडियो-कॉल, डिजिटल प्रेषण, दोहरी नागरिकता या OCI जैसी व्यवस्थाएँ।
- आयाम: आर्थिक (प्रेषण, निवेश, व्यापार-नेटवर्क), राजनीतिक (विदेश से मतदान, प्रवासी लॉबी), सांस्कृतिक (त्योहार, धार्मिक संस्थाएँ, खान-पान) और सामाजिक (विवाह-नेटवर्क)।
- भारत: भारतीय प्रवासी समुदाय विश्व में सबसे बड़ा है। प्रवासी भारतीय दिवस (2003 से), OCI कार्ड, और खाड़ी, अमेरिका तथा ब्रिटेन में भारतीय समुदायों की भूमिका इसके उदाहरण हैं। कूटनीतिक "सॉफ़्ट पावर" के रूप में भी इसका उपयोग होता है।
- आलोचना: "आत्मसात" (assimilation) बनाम पार-राष्ट्रीय पहचान का तनाव, दोहरी निष्ठा पर संदेह, और यह तथ्य कि सभी प्रवासी, विशेषकर निर्धन श्रमिक, समान रूप से पार-राष्ट्रीय नहीं हो पाते।
विकसित देशों में प्रवास बनाम प्रजनन (UPSC 2024)
- संदर्भ: यूरोप, जापान और दक्षिण कोरिया में TFR प्रतिस्थापन स्तर से बहुत नीचे है। जनसंख्या में परिवर्तन अब प्राकृतिक वृद्धि से अधिक शुद्ध आप्रवासन से निर्धारित हो रहा है।
- प्रवास की भूमिका: संयुक्त राष्ट्र की "प्रतिस्थापन प्रवास" (Replacement Migration, 2000) रिपोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि केवल प्रवास से वृद्धावस्था को रोकना संभव नहीं है, क्योंकि इसके लिए अव्यावहारिक रूप से बड़ी संख्या में प्रवासी चाहिए। फिर भी जर्मनी, कनाडा और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों में जनसंख्या-वृद्धि का बड़ा भाग आप्रवासन से आता है।
- प्रजनन बढ़ाने के प्रयास: फ़्रांस और नॉर्डिक देशों में परिवार-अनुकूल नीतियों से TFR अपेक्षाकृत ऊँची रही है। हंगरी में कर-छूट दी गई। दक्षिण कोरिया में भारी व्यय के बावजूद सफलता सीमित रही। चीन ने 2016 में दो-संतान और 2021 में तीन-संतान नीति अपनाई।
- तुलना: प्रवास तात्कालिक श्रम-आपूर्ति देता है, पर उसके साथ सामाजिक एकीकरण की चुनौतियाँ और राजनीतिक विरोध आते हैं। प्रजनन बढ़ाना दीर्घकालिक, महँगा और अनिश्चित प्रयास है। इसलिए व्यावहारिक उत्तर दोनों का संयोजन है, साथ में स्वचालन और उत्पादकता-वृद्धि।
4. अधिवास भूगोल

- ग्रामीण अधिवासों के प्रकार: संहत या गुच्छित (गंगा के मैदान), अर्ध-संहत (गुजरात, राजस्थान के भाग), पल्लीकृत या पुरवा (मध्य गंगा मैदान, छत्तीसगढ़, जहाँ "पुरवा", "टोला" जैसे नाम मिलते हैं) और परिक्षिप्त (पूर्वोत्तर, पहाड़ी क्षेत्र, केरल के भाग)।
- प्रतिरूप: रैखिक (सड़क, नदी या नहर के किनारे), आयताकार, वृत्ताकार, तारा-आकार, T-आकार, दोहरा ग्राम, क्रॉस-आकार और सीढ़ीदार (पहाड़ी ढलान पर)।
- ग्रामीण अधिवासों के पर्यावरणीय मुद्दे: पेयजल, स्वच्छता (स्वच्छ भारत मिशन-ग्रामीण), जल-भराव, घरेलू वायु प्रदूषण (उज्ज्वला योजना), कच्चे मकान (PMAY-G), बाढ़ और सूखा।
- नगरीय पदानुक्रम और कार्यात्मक वर्गीकरण: चॉन्सी हैरिस (1943) और हॉवर्ड नेल्सन (1955) ने सांख्यिकीय वर्गीकरण दिए। भारत में अशोक मित्रा (1961 की जनगणना के आधार पर) ने वर्गीकरण किया। नगरों के प्रकार: प्रशासनिक, औद्योगिक, व्यापारिक, परिवहन, खनन, धार्मिक, शैक्षिक, पर्यटन और छावनी।
- नगरीय प्रभाव-क्षेत्र (Umland): वह क्षेत्र जहाँ से नगर सेवाएँ, श्रम और सब्ज़ी-दूध पाता है और जिसे वह सेवाएँ देता है। इसे बस-मार्गों, अख़बार-वितरण और दैनिक आवागमन से मापा जाता है।
- ग्रामीण-नगरीय उपांत (Rural-urban fringe): नगर के किनारे का संक्रमण क्षेत्र (जॉर्ज वेहरवीन, 1942)। यहाँ मिश्रित भूमि-उपयोग, भूमि का सट्टा, कृषि से गैर-कृषि की ओर परिवर्तन, अनियोजित निर्माण और सेवाओं का अभाव मिलता है। उदाहरण: दिल्ली के आसपास के "शहरी गाँव"।
- अनुषंगी नगर (Satellite towns): बड़े नगर के भार को कम करने के लिए बसाए गए स्वतंत्र पर निर्भर नगर, जैसे नवी मुंबई, गुरुग्राम, नोएडा और साल्ट लेक (कोलकाता)। एबेनेज़र हॉवर्ड के "उद्यान नगर" (Garden Cities of To-morrow, 1902) इस विचार की प्रेरणा रहे।
नगरीय आकारिकी और CBD का ह्रास (UPSC 2024)
- नगरीय संरचना के मॉडल: अर्नेस्ट बर्गेस का संकेंद्री वलय मॉडल (1925, शिकागो), होमर हॉयट का त्रिज्यखंड मॉडल (1939), और हैरिस-उलमैन का बहु-नाभिक मॉडल (1945)। विस्तार मॉडल अध्याय में है।
- CBD (केंद्रीय व्यापार क्षेत्र): पारंपरिक रूप से उच्चतम भूमि-मूल्य, सर्वोच्च पहुँच, ऊँची इमारतों और कार्यालय-खुदरा व्यापार का केंद्र।
- ह्रास के कारण:
- उपनगरीकरण और कार-स्वामित्व।
- भीड़भाड़ और पार्किंग की समस्या।
- ऊँचे किराए।
- उपनगरीय शॉपिंग मॉल और "किनारे के नगर" (edge cities; जोएल गैरो, 1991)।
- दूरसंचार, ई-कॉमर्स और कोविड-19 के बाद "घर से काम" की प्रवृत्ति।
- पुराने भवनों का जीर्ण होना और अपराध की धारणा।
- नीतिगत कारण, जैसे उपनगरों में IT पार्क और SEZ।
- परिणाम: "डोनट प्रभाव" (केंद्र का खोखला होना), कर-आधार में कमी, बहु-केंद्रीय नगर।
- पुनरुद्धार: नगरीय पुनर्जनन, सौम्यीकरण (gentrification), मिश्रित भूमि-उपयोग, पैदल-अनुकूल क्षेत्र, धरोहर-पर्यटन, और TOD (पारगमन-उन्मुख विकास)। भारत में स्मार्ट सिटी मिशन के "क्षेत्र-आधारित विकास" घटक इसके उदाहरण हैं।
- भारतीय संदर्भ: भारत में CBD का पूर्ण ह्रास कम दिखता है। पुराने बाज़ार (चाँदनी चौक) सक्रिय हैं, पर नए व्यावसायिक केंद्र (गुरुग्राम का साइबर सिटी, मुंबई का BKC) उभरे हैं, जिससे नगर "बहु-केंद्रीय" बन रहे हैं।
प्रमुख नगर (Primate city) और श्रेणी-आकार नियम (UPSC 2025)
- प्रमुख नगर: मार्क जेफ़रसन (1939, "The Law of the Primate City") के अनुसार प्रमुख नगर किसी देश का वह सबसे बड़ा नगर है जो दूसरे सबसे बड़े नगर से कई गुना बड़ा होता है और राष्ट्रीय भावना, अर्थव्यवस्था, संस्कृति और राजनीति का केंद्र होता है। उदाहरण: बैंकॉक, लीमा, पेरिस, लंदन, ढाका, ब्यूनस आयर्स।
- प्रमुखता के कारण: औपनिवेशिक विरासत (बंदरगाह-राजधानी), केंद्रीकृत शासन, छोटा देश, निर्यातोन्मुख अर्थव्यवस्था, और संचयी कार्य-कारण (मिर्डल)।
- परिणाम: सकारात्मक: समूहन की बचत, अंतरराष्ट्रीय संपर्क। नकारात्मक: प्रादेशिक असंतुलन, भीड़भाड़, झुग्गियाँ, प्रदूषण, और "परजीवी नगर" की धारणा (बर्ट होसेलिट्ज़ ने "उत्पादक" और "परजीवी" नगरों में भेद किया)।
- श्रेणी-आकार नियम: जॉर्ज ज़िफ़ (1949) के अनुसार Pn = P1 / n, यानी n-वें श्रेणी के नगर की जनसंख्या सबसे बड़े नगर की जनसंख्या का 1/n भाग होती है। यह नियम बड़े, विकसित और लंबे समय से नगरीकृत देशों (जैसे अमेरिका) में अपेक्षाकृत लागू होता है।
- भारत: राष्ट्रीय स्तर पर भारत में प्रमुखता कम है, क्योंकि मुंबई, दिल्ली, कोलकाता, चेन्नई और बेंगलुरु जैसे कई बड़े महानगर हैं, यानी वितरण "द्वि-प्रमुख या बहु-प्रमुख" है। पर कई राज्यों में राज्य-स्तरीय प्रमुखता है, जैसे पटना, कोलकाता और हैदराबाद।

एशिया और अफ़्रीका में नगरीकरण (UPSC 2024)
- प्रवृत्ति: UN World Urbanization Prospects 2018 के अनुसार विश्व की 55% जनसंख्या नगरीय थी और 2050 तक यह 68% होने का अनुमान है। आगामी नगरीय वृद्धि का लगभग 90% भाग एशिया और अफ़्रीका में होगा। अकेले भारत, चीन और नाइजीरिया 2018 से 2050 के बीच की वृद्धि का लगभग 35% योगदान करेंगे। अफ़्रीका की नगरीकरण दर सबसे तेज़ है।
- विशेषताएँ:
- "औद्योगीकरण के बिना नगरीकरण", यानी "अति-नगरीकरण"।
- अनौपचारिक अर्थव्यवस्था और झुग्गियाँ (विश्व में एक अरब से अधिक लोग झुग्गियों में)।
- मेगासिटी (टोक्यो, दिल्ली, शंघाई, ढाका, काहिरा, लागोस, किन्शासा)।
- प्रमुख नगरों का प्रभुत्व।
- प्राकृतिक वृद्धि और प्रवास, दोनों का योगदान।
- "मेगा-नगरीय क्षेत्र" या नगरीय गलियारे, जैसे पर्ल नदी डेल्टा।
- एशिया और अफ़्रीका में अंतर: पूर्वी एशिया (चीन, दक्षिण कोरिया) में नगरीकरण औद्योगीकरण के साथ हुआ। दक्षिण एशिया में यह धीमा और अनौपचारिक है (भारत में 2011 में 31.2%)। उप-सहारा अफ़्रीका में यह औद्योगिक आधार के बिना और प्राकृतिक वृद्धि से अधिक चलित है।
- समस्याएँ: आवास, जल, स्वच्छता, परिवहन, प्रदूषण, बाढ़ (जकार्ता, लागोस), और नगरीय ताप-द्वीप।
- समाधान: नया नगरीय एजेंडा (Habitat III, क्विटो, 2016), SDG 11, सस्ता आवास (PMAY-U), मेट्रो और सार्वजनिक परिवहन, झुग्गी का स्वस्थाने उन्नयन, "स्पंज सिटी" (चीन), और द्वितीयक नगरों का विकास।
नगर नियोजन में तंत्र विश्लेषण (UPSC 2025)
- आधार: लुडविग वॉन बर्टालान्फ़ी का सामान्य तंत्र सिद्धांत। नगर को अंतर्संबंधित उप-तंत्रों का एक "खुला तंत्र" माना जाता है, जिसमें भूमि-उपयोग, परिवहन, आवास, अर्थव्यवस्था, पर्यावरण और जनसंख्या शामिल हैं।
- विचारक: जे. ब्रायन मैकलॉफ़लिन (Urban and Regional Planning: A Systems Approach, 1969) और जॉर्ज चैडविक (A Systems View of Planning, 1971)।
- विधि: नियोजन को एक चक्रीय प्रक्रिया माना जाता है: लक्ष्य, विकल्प, मॉडलिंग (भूमि-उपयोग और परिवहन मॉडल, लोरी मॉडल), मूल्यांकन, क्रियान्वयन, निगरानी और प्रतिपुष्टि।
- लाभ: समग्र दृष्टि, अंतर्संबंधों और प्रतिपुष्टि (feedback) की समझ, अनुकरण (simulation) के माध्यम से नीतियों का परीक्षण। आधुनिक रूप हैं GIS, "डिजिटल ट्विन" और स्मार्ट सिटी के नियंत्रण केंद्र (ICCC)।
- सीमाएँ: यह उपागम तकनीकी और ऊपर से नीचे (top-down) है। सामाजिक संघर्ष और राजनीति की उपेक्षा करता है। डेटा की माँग बहुत अधिक है। इसलिए बाद में सहभागी (participatory) नियोजन पर बल दिया गया।
- सतत नगर: संहत नगर, मिश्रित भूमि-उपयोग, सार्वजनिक परिवहन, हरित भवन, अपशिष्ट से ऊर्जा, नगरीय वन, और "15 मिनट का नगर" (कार्लोस मोरेनो)।
5. प्रादेशिक नियोजन
- प्रदेश की अवधारणा: पृथ्वी के धरातल का वह भाग जो कुछ चयनित मानदंडों के आधार पर आंतरिक रूप से समरूप हो और पड़ोसी क्षेत्रों से भिन्न हो।
- प्रकार: औपचारिक या समरूप प्रदेश (जलवायु, कृषि प्रदेश), कार्यात्मक या नोडल प्रदेश (नगर का प्रभाव-क्षेत्र, बंदरगाह का पृष्ठ-प्रदेश), और नियोजन या कार्यक्रम प्रदेश (दामोदर घाटी निगम, सूखा-प्रवण क्षेत्र कार्यक्रम के क्षेत्र)।
- प्रदेशीकरण की विधियाँ: भारित सूचकांक, कारक या घटक विश्लेषण, गुच्छ (cluster) विश्लेषण, प्रवाह-विश्लेषण (टेलीफ़ोन, यात्रा), ग्राफ़ सिद्धांत, और GIS द्वारा परत-अध्यारोपण (overlay)।
प्रादेशिक संश्लेषण (UPSC 2025)
- अर्थ: किसी प्रदेश के भौतिक तत्वों (उच्चावच, जलवायु, मृदा, वनस्पति) और मानवीय तत्वों (जनसंख्या, अर्थव्यवस्था, संस्कृति) को एकीकृत करके उसके विशिष्ट "व्यक्तित्व" को समझना। क्रमबद्ध भूगोल "विश्लेषण" करता है, जबकि प्रादेशिक भूगोल "संश्लेषण"।
- परंपरा: विडाल डी ला ब्लाश के "पे" (pays) अध्ययन, यानी फ़्रांस के छोटे प्रदेश; हार्टशोर्न का क्षेत्रीय विभेदन; और भारत में ओ.एच.के. स्पेट का "India and Pakistan" (1954)।
- आलोचना और पुनर्जीवन: मात्रात्मक क्रांति ने इसे "विवरणात्मक" और "अवैज्ञानिक" कहकर आलोचना की। पर 1980 के दशक के बाद "नवीन प्रादेशिक भूगोल" उभरा, जिसमें प्रदेश को सामाजिक-आर्थिक प्रक्रियाओं के निर्माण के रूप में देखा जाता है। GIS ने परतों के एकीकरण से संश्लेषण को नया उपकरण दिया।
- महत्व: प्रादेशिक नियोजन (जलागम, कृषि-जलवायु प्रदेश), नीति-निर्माण और "स्थान-आधारित" विकास का आधार।
नियोजन प्रदेशों के मानदंड (UPSC 2024)
- मानदंड:
- आंतरिक समरूपता (संसाधन, समस्या)।
- कार्यात्मक एकता (नोडल केंद्र और उसका प्रभाव-क्षेत्र)।
- प्रशासनिक सुविधा (ज़िला या राज्य की सीमाएँ, ताकि डेटा और क्रियान्वयन सरल हो)।
- आर्थिक व्यवहार्यता (पर्याप्त संसाधन-आधार)।
- भौगोलिक सन्निकटता (contiguity)।
- उपयुक्त आकार (न बहुत बड़ा, न बहुत छोटा)।
- समस्या-आधारितता (सूखा, बाढ़, पहाड़ी, जनजातीय क्षेत्र)।
- सामाजिक-सांस्कृतिक एकरूपता और जन-पहचान।
- भारत के उदाहरण: योजना आयोग के 15 कृषि-जलवायु प्रदेश (1989); नदी-घाटी प्रदेश (DVC, 1948); पहाड़ी क्षेत्र विकास कार्यक्रम; जनजातीय उप-योजना क्षेत्र; बहुस्तरीय नियोजन (राष्ट्रीय, राज्य, ज़िला, खंड, पंचायत); और एल.एस. भट्ट तथा अन्य भूगोलवेत्ताओं के वृहद, मध्य और लघु नियोजन प्रदेश।
- चुनौती: प्रशासनिक सीमाएँ और कार्यात्मक या प्राकृतिक सीमाएँ (जलागम) प्रायः मेल नहीं खातीं।
प्रादेशिक असंतुलन (UPSC 2025)
- सिद्धांत: गुन्नार मिर्डल (1957): संचयी कार्य-कारण, यानी "पश्च प्रभाव" (backwash) असमानता बढ़ाते हैं और "प्रसार प्रभाव" (spread) उसे घटाते हैं। अल्बर्ट हिर्शमैन (1958): "रिसाव प्रभाव" (trickle-down) और "ध्रुवीकरण प्रभाव"। जेफ़्री विलियमसन (1965): आर्थिक विकास के साथ प्रादेशिक असमानता पहले बढ़ती और फिर घटती है (उल्टा U वक्र)।
- भारत में असंतुलन के कारण: औपनिवेशिक विरासत (बंदरगाह-नगरों का विकास), भौगोलिक कारक (पहाड़, सूखा), हरित क्रांति का चयनात्मक प्रसार, निवेश का केंद्रीकरण, शासन की गुणवत्ता, और अवसंरचना।
- सूचक: प्रति व्यक्ति NSDP (बिहार और गोवा या दिल्ली के बीच कई गुना अंतर), बहुआयामी ग़रीबी (NITI Aayog), और HDI।
- उपाय: वित्त आयोग के हस्तांतरण, पिछड़े क्षेत्र अनुदान कोष (2007), आकांक्षी ज़िला कार्यक्रम (2018) और आकांक्षी ब्लॉक कार्यक्रम (2023), विशेष श्रेणी राज्य, औद्योगिक गलियारे, पूर्वोत्तर के लिए विशेष योजनाएँ, और "पूर्वोदय" (पूर्वी भारत)।
जेंडर-संवेदी प्रादेशिक विकास (UPSC 2024)
- अवधारणा: विकास-नियोजन में स्त्रियों की भिन्न आवश्यकताओं, भूमिकाओं और बाधाओं को शामिल करना। इसकी पृष्ठभूमि में "विकास में महिलाएँ" (WID) से "जेंडर और विकास" (GAD) तक का विचार-परिवर्तन है, और कैरोलिन मोज़र (1989) का व्यावहारिक और सामरिक जेंडर-आवश्यकताओं का भेद।
- प्रादेशिक आयाम: स्त्री-श्रम भागीदारी में क्षेत्रीय अंतर (पूर्वोत्तर और हिमालयी राज्यों में अधिक, उत्तरी मैदानों में कम), लिंगानुपात (हरियाणा, पंजाब), पुरुष-प्रवास के कारण गाँवों में स्त्री-प्रधान परिवार, जल-ईंधन ढोने का बोझ, और गतिशीलता तथा सुरक्षा।
- उपाय: जेंडर बजटिंग (भारत में 2005-06 से), जेंडर-पृथक्कृत आँकड़े, स्वयं सहायता समूह (DAY-NRLM, कुदुंबश्री, जीविका), पंचायतों में आरक्षण, सुरक्षित सार्वजनिक परिवहन, जल जीवन मिशन, उज्ज्वला, और भूमि में स्त्रियों के अधिकार।
- वृद्धि केंद्र और वृद्धि ध्रुव: फ़्रांस्वा पेरू (1955) और जे.आर. बूदविल ने यह अवधारणा दी। भारत में इसका अनुप्रयोग प्रकाश राव और सेन (कोरापुट, 1970 का दशक) तथा "वृद्धि केंद्र योजना" (1988) में हुआ। विस्तार मॉडल अध्याय में है।
- प्रादेशिक नियोजन में पर्यावरणीय मुद्दे और सतत विकास: पर्यावरणीय प्रभाव आकलन (EIA), वहन-क्षमता, पारिस्थितिक-संवेदनशील क्षेत्र, जलागम-आधारित नियोजन, और SDG का स्थानीयकरण (NITI Aayog का SDG भारत सूचकांक)।
6. Master Summary Table
| विषय | मुख्य तथ्य | याद रखें |
|---|---|---|
| विश्व जनसंख्या | 8 अरब (15 नवंबर 2022); शिखर लगभग 10.3 अरब (2080 का दशक) | भारत सबसे अधिक जनसंख्या (2023) |
| सिद्धांत | माल्थस 1798; DTM: थॉम्पसन 1929, नोटेस्टीन 1945 | बोसरप 1965; द्वितीय DTM 1986 |
| भारत TFR | 2.0 (NFHS-5) | बिहार लगभग 3.0, केरल-तमिलनाडु लगभग 1.8 |
| प्रवास | रेवेन्स्टीन 1885; ली 1966; टोडारो 1969; ज़ेलिंस्की 1971 | स्टूफ़र 1940 |
| पार-राष्ट्रवाद | ग्लिक शिलर और साथी (1992-94) | भारत: प्रेषण लगभग 129 अरब डॉलर (2024) |
| प्रमुख नगर | जेफ़रसन 1939 | ज़िफ़ 1949: Pn = P1/n |
| नगर संरचना | बर्गेस 1925, हॉयट 1939, हैरिस-उलमैन 1945 | किनारे के नगर: गैरो 1991 |
| नगरीकरण | 55% (2018) से 68% (2050) | लगभग 90% वृद्धि एशिया-अफ़्रीका में |
| तंत्र विश्लेषण | मैकलॉफ़लिन 1969, चैडविक 1971 | बर्टालान्फ़ी |
| प्रादेशिक असंतुलन | मिर्डल 1957, हिर्शमैन 1958, विलियमसन 1965 | आकांक्षी ज़िले 2018 |
7. चार्ट: जनांकिकीय संक्रमण मॉडल
8. Mind Map
- वृद्धि, वितरण, DTM
- सिद्धांत, वृद्धि बनाम वृद्धावस्था
- रेवेन्स्टीन, ली, टोडारो
- धारणाएँ, पार-राष्ट्रवाद
- प्रकार, प्रतिरूप
- पर्यावरणीय मुद्दे
- प्रमुख नगर, श्रेणी-आकार
- CBD, उपांत, नगरीकरण
- तंत्र विश्लेषण
- प्रकार, प्रदेशीकरण
- संश्लेषण, असंतुलन
- जेंडर-संवेदी विकास
9. महत्वपूर्ण One-liners
- "An Essay on the Principle of Population": टी.आर. माल्थस (1798)।
- अनुकूलतम जनसंख्या सिद्धांत: एडविन कैनन।
- प्रवास के नियम: ई.जी. रेवेन्स्टीन; हस्तक्षेपी अवसर: स्टूफ़र (1940)।
- प्रमुख नगर का नियम: मार्क जेफ़रसन (1939); श्रेणी-आकार नियम: जॉर्ज ज़िफ़ (1949)।
- संकेंद्री वलय मॉडल: बर्गेस (1925)।
- "Garden Cities of To-morrow": एबेनेज़र हॉवर्ड (1902)।
- संचयी कार्य-कारण: गुन्नार मिर्डल (1957)।
- प्रादेशिक असमानता का उल्टा U वक्र: जेफ़्री विलियमसन (1965)।
- भारत में 15 कृषि-जलवायु प्रदेश: योजना आयोग (1989)।
- भारत की कुल प्रजनन दर (NFHS-5): 2.0।
10. टिप्स एवं ट्रिक्स
- DTM, आयु-पिरामिड, नगर-संरचना और श्रेणी-आकार के आरेख अवश्य बनाएँ।
- हर सिद्धांत के साथ विश्व और भारत का उदाहरण दें, जैसे प्रमुख नगर के लिए बैंकॉक और पटना।
- नवीनतम आँकड़े स्रोत के साथ लिखें: UN WPP 2024, NFHS-5, जनगणना 2011।
नगर संरचना के मॉडल: "ब-हॉ-हैउ" (बर्गेस 1925, हॉयट 1939, हैरिस-उलमैन 1945)। प्रवास: "रे-स्टू-ली-टो-ज़े"।
11. PYQ-आधारित प्रश्न एवं मॉडल उत्तर
जनांकिकीय संक्रमण मॉडल की व्याख्या कीजिए और विकासशील देशों के संदर्भ में उसकी प्रासंगिकता का परीक्षण कीजिए।
मॉडल उत्तर (रूपरेखा)
भूमिका: थॉम्पसन (1929) और नोटेस्टीन (1945); विकास के साथ जनांकिकीय परिवर्तन।
अवस्थाएँ: पाँच अवस्थाएँ, तालिका और आरेख के साथ, उदाहरण सहित।
विकासशील देशों में: मृत्यु दर का बहुत तेज़ ह्रास (आयातित चिकित्सा); प्रजनन में गिरावट शिक्षा और स्त्री-सशक्तीकरण से (केरल, बांग्लादेश); भारत में TFR 2.0 पर राज्यों के बीच बड़ा अंतर; जनांकिकीय गति।
सीमाएँ: यूरोप-केंद्रित; प्रवास की उपेक्षा; समय-सीमा नहीं; पाँचवीं अवस्था बाद में जोड़ी गई।
निष्कर्ष: यह मॉडल "भविष्यवाणी" नहीं, बल्कि "वर्णनात्मक ढाँचा" है, पर नीति-निर्माण के लिए उपयोगी है।
प्रमुख नगर की अवधारणा की व्याख्या कीजिए। विकासशील देशों में प्रमुख नगरों के उद्भव के कारणों और परिणामों की विवेचना कीजिए।
मॉडल उत्तर (रूपरेखा)
अवधारणा: जेफ़रसन (1939); सबसे बड़ा नगर दूसरे से कई गुना बड़ा; प्रमुखता सूचकांक।
उदाहरण: बैंकॉक, लीमा, ढाका, पेरिस; भारत में राष्ट्रीय स्तर पर कम, राज्य स्तर पर अधिक प्रमुखता।
कारण: औपनिवेशिक बंदरगाह-राजधानी, केंद्रीकरण, निर्यात अर्थव्यवस्था, संचयी कार्य-कारण।
परिणाम: समूहन की बचत बनाम असंतुलन, झुग्गी, प्रदूषण; "परजीवी नगर" (होसेलिट्ज़)।
तुलना: श्रेणी-आकार नियम (ज़िफ़), आरेख सहित।
निष्कर्ष: मध्यम और द्वितीयक नगरों का विकास संतुलित नगरीय तंत्र की कुंजी है।
"विश्व एक साथ जनसंख्या वृद्धि और वृद्धावस्था की दोहरी चुनौती का सामना कर रहा है।" विवेचना कीजिए।
मॉडल उत्तर (रूपरेखा)
संदर्भ: 8 अरब जनसंख्या; WPP 2024 के अनुमान; प्रजनन में असमानता।
वृद्धि: उप-सहारा अफ़्रीका; युवा उभार; रोज़गार और संसाधनों पर दबाव।
वृद्धावस्था: जापान, इटली, दक्षिण कोरिया, चीन; श्रम, पेंशन, स्वास्थ्य; "अमीर होने से पहले बूढ़ा"।
भारत: जनांकिकीय लाभांश; दक्षिण और उत्तर के राज्यों में अंतर; प्रवास और परिसीमन।
नीतियाँ: स्त्री-शिक्षा, परिवार नियोजन बनाम सेवानिवृत्ति-आयु, आप्रवासन, स्वचालन, रजत अर्थव्यवस्था।
निष्कर्ष: जनसंख्या नीति अब "संख्या" से "गुणवत्ता और संरचना" पर केंद्रित हो रही है।
भूगोल में प्रादेशिक संश्लेषण की अवधारणा और उसके महत्व की विवेचना कीजिए।
मॉडल उत्तर (रूपरेखा)
अर्थ: भौतिक और मानवीय तत्वों का एकीकरण; प्रदेश का "व्यक्तित्व"; विश्लेषण बनाम संश्लेषण।
परंपरा: ब्लाश के "पे", हार्टशोर्न, स्पेट (1954)।
आलोचना और पुनर्जीवन: मात्रात्मक क्रांति की आलोचना; नवीन प्रादेशिक भूगोल; GIS से परतों का एकीकरण।
महत्व: प्रादेशिक नियोजन, कृषि-जलवायु प्रदेश, जलागम, स्थान-आधारित नीतियाँ।
निष्कर्ष: संश्लेषण भूगोल की "आत्मा" है और उसकी समाकलनकारी पहचान का आधार।
एशिया और अफ़्रीका में नगरीकरण की प्रवृत्तियों, विशेषताओं और समस्याओं की विवेचना कीजिए।
मॉडल उत्तर (रूपरेखा)
प्रवृत्ति: UN WUP 2018: 55% से 68%; लगभग 90% वृद्धि एशिया-अफ़्रीका में; भारत, चीन, नाइजीरिया।
विशेषताएँ: अति-नगरीकरण, अनौपचारिकता, झुग्गियाँ, मेगासिटी, प्रमुख नगर, नगरीय गलियारे।
तुलना: पूर्वी एशिया (औद्योगीकरण के साथ), दक्षिण एशिया (धीमा, अनौपचारिक), अफ़्रीका (औद्योगिक आधार के बिना)।
समस्याएँ: आवास, जल, परिवहन, प्रदूषण, बाढ़, ताप-द्वीप।
समाधान: नया नगरीय एजेंडा, SDG 11, PMAY-U, स्वस्थाने उन्नयन, स्पंज सिटी, द्वितीयक नगर।
निष्कर्ष: 21वीं सदी का नगरीय भविष्य एशिया और अफ़्रीका में लिखा जाएगा।
पार-राष्ट्रवाद क्या है? अंतरराष्ट्रीय प्रवास के संदर्भ में इसकी विवेचना कीजिए।
मॉडल उत्तर (रूपरेखा)
अर्थ: ग्लिक शिलर और साथी; दोनों देशों से एक साथ संबंध बनाए रखना।
आधार: सस्ती यात्रा, डिजिटल संचार, OCI और दोहरी नागरिकता।
आयाम: आर्थिक (प्रेषण: भारत में लगभग 129 अरब डॉलर, 2024), राजनीतिक, सांस्कृतिक, सामाजिक।
भारत: प्रवासी समुदाय, प्रवासी भारतीय दिवस, सॉफ़्ट पावर।
आलोचना: आत्मसात बनाम पहचान; दोहरी निष्ठा; वर्ग-भेद।
निष्कर्ष: पार-राष्ट्रवाद ने "मूल देश बनाम गंतव्य देश" के द्विभाजन को धुंधला कर दिया है।
नियोजन प्रदेशों के सीमांकन के मानदंडों की विवेचना कीजिए।
मॉडल उत्तर (रूपरेखा)
प्रदेश के प्रकार: औपचारिक, कार्यात्मक, नियोजन।
मानदंड: समरूपता, कार्यात्मक एकता, प्रशासनिक सुविधा, व्यवहार्यता, सन्निकटता, आकार, समस्या-आधारितता, सांस्कृतिक एकरूपता।
विधियाँ: भारित सूचकांक, कारक और गुच्छ विश्लेषण, प्रवाह-विश्लेषण, GIS।
भारत: 15 कृषि-जलवायु प्रदेश, DVC, बहुस्तरीय नियोजन।
चुनौती: प्रशासनिक और प्राकृतिक सीमाओं में अंतर।
निष्कर्ष: आदर्श नियोजन प्रदेश वह है जो समरूपता और कार्यात्मकता को प्रशासनिक व्यावहारिकता के साथ संतुलित करे।
विकसित देशों में जनसंख्या परिवर्तन के निर्धारक के रूप में प्रवास, प्रजनन से अधिक महत्वपूर्ण होता जा रहा है। विवेचना कीजिए।
मॉडल उत्तर (रूपरेखा)
संदर्भ: प्रतिस्थापन स्तर से नीचे TFR; द्वितीय जनांकिकीय संक्रमण।
प्रवास की भूमिका: जर्मनी, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया; UN की "प्रतिस्थापन प्रवास" रिपोर्ट (2000) और उसकी सीमाएँ।
प्रजनन-नीतियाँ: फ़्रांस और नॉर्डिक देशों की सफलता; दक्षिण कोरिया की सीमित सफलता; चीन की नीतियों में परिवर्तन।
तुलना: प्रवास (तात्कालिक, पर एकीकरण और राजनीति की चुनौती) बनाम प्रजनन (दीर्घकालिक, महँगा)।
निष्कर्ष: कथन सही है; प्रवास, प्रजनन-नीति और उत्पादकता, तीनों का संयोजन आवश्यक है।
नगरों में केंद्रीय व्यापार क्षेत्र (CBD) के ह्रास के कारणों पर टिप्पणी कीजिए।
मॉडल उत्तर
CBD: उच्चतम भूमि-मूल्य और पहुँच (बर्गेस मॉडल)।
कारण: उपनगरीकरण, भीड़भाड़, किराया, मॉल और किनारे के नगर (गैरो 1991), ई-कॉमर्स, घर से काम, जीर्णता, नीतिगत कारण।
परिणाम: डोनट प्रभाव, बहु-केंद्रीय नगर।
पुनरुद्धार: पुनर्जनन, TOD, मिश्रित उपयोग; भारत में साइबर सिटी और BKC।
नगर नियोजन में तंत्र विश्लेषण की भूमिका पर टिप्पणी कीजिए।
मॉडल उत्तर
आधार: बर्टालान्फ़ी; नगर एक खुला तंत्र है।
विचारक: मैकलॉफ़लिन 1969, चैडविक 1971।
विधि: नियोजन चक्र; मॉडलिंग; प्रतिपुष्टि; GIS और डिजिटल ट्विन।
सीमा: तकनीकी और ऊपर से नीचे; सहभागी नियोजन की आवश्यकता।
जेंडर-संवेदी प्रादेशिक विकास की आवश्यकता पर टिप्पणी कीजिए।
मॉडल उत्तर
अवधारणा: WID से GAD; मोज़र की व्यावहारिक और सामरिक आवश्यकताएँ।
प्रादेशिक आयाम: स्त्री-श्रम भागीदारी और लिंगानुपात में क्षेत्रीय अंतर; प्रवास से स्त्री-प्रधान परिवार।
उपाय: जेंडर बजटिंग (2005-06), SHG (जीविका, कुदुंबश्री), पंचायत आरक्षण, जल जीवन मिशन, सुरक्षित परिवहन।
प्रवास के प्रति विभिन्न धारणाओं पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।
मॉडल उत्तर
प्रवासी की धारणा: स्थान-उपयोगिता (वोल्पर्ट), सूचना-नेटवर्क, शृंखला-प्रवास।
गंतव्य समाज: संसाधन बनाम ख़तरा; मूलनिवासीवाद।
मूल समाज: प्रतिभा पलायन और प्रतिभा लाभ; प्रेषण।
नीति: ग्लोबल कॉम्पैक्ट (2018); भारत का ई-श्रम।
12. Quick Revision Summary
- जनसंख्या: 8 अरब; वितरण के कारक; सिद्धांत (माल्थस, कैनन, बोसरप, DTM, द्वितीय DTM); वृद्धि बनाम वृद्धावस्था; सामाजिक पूँजी।
- प्रवास: रेवेन्स्टीन, स्टूफ़र, ली, टोडारो, ज़ेलिंस्की; धारणाएँ; पार-राष्ट्रवाद; विकसित देशों में प्रवास बनाम प्रजनन।
- अधिवास: ग्रामीण प्रकार और प्रतिरूप; कार्यात्मक वर्गीकरण; प्रभाव-क्षेत्र; उपांत; अनुषंगी नगर; CBD का ह्रास; प्रमुख नगर और श्रेणी-आकार; एशिया-अफ़्रीका का नगरीकरण; तंत्र विश्लेषण।
- प्रदेश: प्रकार, प्रदेशीकरण, संश्लेषण, नियोजन प्रदेशों के मानदंड, असंतुलन, जेंडर-संवेदी विकास, वृद्धि ध्रुव।