1. अध्याय एक नज़र में
Paper I भाग B के पहले दो खंड: मानव भूगोल के परिप्रेक्ष्य (क्षेत्रीय विभेदन, प्रादेशिक संश्लेषण, द्विभाजन और द्वैतवाद, पर्यावरणवाद, मात्रात्मक क्रांति, अवस्थितिक विश्लेषण, आमूल परिवर्तनवादी, व्यवहारवादी, मानववादी और कल्याणकारी उपागम; भाषाएँ, धर्म और धर्मनिरपेक्षीकरण; विश्व के सांस्कृतिक प्रदेश; मानव विकास सूचकांक) और आर्थिक भूगोल (विश्व आर्थिक विकास, संसाधन, ऊर्जा संकट, वृद्धि की सीमाएँ, कृषि, खाद्य सुरक्षा, उद्योग, विश्व व्यापार)।
2025 में ये प्रश्न आए: कल्याणकारी उपागम, द्विभाजन और द्वैतवाद, महत्वपूर्ण खनिज, भाषा-धर्म आधारित सांस्कृतिक प्रदेश, बागानी फ़सलें, तेल और ऊर्जा सुरक्षा। 2024 में व्यवहारवादी उपागम, दिक् (space) का भौतिक दृष्टिकोण, जल-अभाव और अर्धचालक (semiconductor) उद्योग पूछे गए।

2. मानव भूगोल के परिप्रेक्ष्य: विचारधाराओं का विकास
| चरण / उपागम | प्रमुख विचारक और कृति | मूल विचार |
|---|---|---|
| पर्यावरण निश्चयवाद | फ़्रेडरिक रैटज़ेल (Anthropogeographie, 1882-91), एलेन चर्चिल सेम्पल (Influences of Geographic Environment, 1911), एल्सवर्थ हंटिंगटन (Civilization and Climate, 1915) | प्रकृति मानव के क्रियाकलापों का निर्धारण करती है |
| संभववाद | विडाल डी ला ब्लाश ("genre de vie" — जीवन-शैली), लूसियन फ़ेब्रे ने "संभववाद" शब्द दिया (1922) | प्रकृति संभावनाएँ देती है; चुनाव मानव करता है |
| नव-निश्चयवाद | ग्रिफ़िथ टेलर — "रुको और जाओ" (stop-and-go) निश्चयवाद | मानव प्रकृति की गति को तेज़ या धीमा कर सकता है, दिशा नहीं बदल सकता |
| क्षेत्रीय विभेदन | रिचर्ड हार्टशोर्न (The Nature of Geography, 1939) | भूगोल पृथ्वी के धरातल पर स्थानों की भिन्नता का अध्ययन है; विवरणात्मक (idiographic) |
| मात्रात्मक क्रांति | फ़्रेड शेफ़र (Exceptionalism in Geography, 1953), इयान बर्टन (1963), विलियम बुंगे (Theoretical Geography, 1962) | सांख्यिकी, मॉडल और नियम खोजना; नियमान्वेषी (nomothetic), प्रत्यक्षवाद |
| अवस्थितिक विश्लेषण | पीटर हैगेट (Locational Analysis in Human Geography, 1965) | गति, जाल, नोड, पदानुक्रम और सतह का स्थानिक क्रम |
| व्यवहारवादी | विलियम कर्क (व्यवहारिक पर्यावरण), जूलियन वोल्पर्ट (1964), केविन लिंच (The Image of the City, 1960), गूल्ड और व्हाइट (Mental Maps, 1974) | निर्णय वास्तविक पर्यावरण पर नहीं, उसकी धारणा पर निर्भर करते हैं |
| आमूल परिवर्तनवादी (Radical) | डेविड हार्वे (Social Justice and the City, 1973), रिचर्ड पीट, Antipode पत्रिका (1969) | मार्क्सवाद; असमानता, ग़रीबी और पूँजीवाद की आलोचना |
| मानववादी | यी-फ़ू तुआन (Topophilia, 1974; Space and Place, 1977), एडवर्ड रेल्फ़ (Place and Placelessness, 1976), ऐन बटिमर | मानव अनुभव, अर्थ, मूल्य, "स्थान-बोध" (sense of place) |
| कल्याणकारी | डेविड एम. स्मिथ (Human Geography: A Welfare Approach, 1977) | "कौन, क्या, कहाँ और कैसे पाता है" |
| उत्तर-आधुनिक, नारीवादी | एडवर्ड सोजा (Postmodern Geographies, 1989), जिलियन रोज़ (Feminism and Geography, 1993) | बहुलता, "अन्य" की आवाज़, लैंगिक दृष्टि |
द्विभाजन और द्वैतवाद (UPSC 2025)
- अर्थ: भूगोल के विकास में विरोधी दिखने वाले जोड़ों के बीच लंबी बहस चली। द्विभाजन (dichotomy) का अर्थ है किसी विषय को दो परस्पर विरोधी भागों में बाँटना। द्वैतवाद (dualism) वह दार्शनिक स्थिति है जिसमें दोनों पक्षों को अलग और स्वतंत्र माना जाता है।
- (1) क्रमबद्ध बनाम प्रादेशिक: बर्नहार्ड वारेनियस (Geographia Generalis, 1650) ने सामान्य और विशिष्ट भूगोल में भेद किया। अलेक्ज़ेंडर वॉन हम्बोल्ट (Kosmos) क्रमबद्ध उपागम के और कार्ल रिटर (Erdkunde) प्रादेशिक उपागम के प्रतीक माने जाते हैं। वास्तव में दोनों पूरक हैं: क्रमबद्ध अध्ययन प्रादेशिक संश्लेषण का आधार है।
- (2) भौतिक बनाम मानव भूगोल: प्रकृति-विज्ञान बनाम सामाजिक विज्ञान की बहस। आज "मानव-पर्यावरण संबंध" इस भेद को जोड़ता है, जैसे जलवायु परिवर्तन, संकट और भूमि-उपयोग के अध्ययन।
- (3) निश्चयवाद बनाम संभववाद: प्रकृति की प्रधानता बनाम मानव की प्रधानता। नव-निश्चयवाद और "सांस्कृतिक पारिस्थितिकी" मध्य मार्ग हैं।
- (4) विवरणात्मक बनाम नियमान्वेषी: हार्टशोर्न के अनुसार भूगोल अद्वितीय स्थानों का विवरण करता है; शेफ़र के अनुसार भूगोल सामान्य नियम खोजने वाला विज्ञान है। हार्टशोर्न-शेफ़र विवाद (1953-55) इसका प्रसिद्ध उदाहरण है।
- (5) अन्य जोड़े: सैद्धांतिक बनाम व्यावहारिक, गुणात्मक बनाम मात्रात्मक, स्थान (place) बनाम दिक् (space)।
- मूल्यांकन: ये द्विभाजन कृत्रिम हैं। भूगोल की पहचान "समाकलनकारी" (integrative) विषय की है। प्रणाली उपागम, GIS और सतत विकास के अध्ययन इन भेदों को पाटते हैं। इसलिए आधुनिक भूगोल द्वैतवाद के बजाय अद्वैत (holism) की ओर बढ़ा है।
दिक् (Space) का भौतिक दृष्टिकोण (UPSC 2024)
- निरपेक्ष दिक् (Absolute space): यह न्यूटन और कांट की धारणा है। इसमें दिक् एक "पात्र" (container) है, वस्तुओं से स्वतंत्र, स्थिर और मापने योग्य। इसे अक्षांश-देशांतर, दूरी (किमी) और क्षेत्रफल से व्यक्त किया जाता है। कांट ने भूगोल को दिक् का और इतिहास को काल का विज्ञान कहा।
- सापेक्ष दिक् (Relative space): दिक् वस्तुओं के बीच संबंधों से परिभाषित होता है, जैसे समय-दूरी, लागत-दूरी और संपर्क। उदाहरण के लिए मेट्रो के बाद नगर के दो छोर "निकट" हो जाते हैं, जिसे "दिक्-काल अभिसरण" (time-space convergence; जेनेल, 1968) कहते हैं।
- संबंधपरक दिक् (Relational space): डेविड हार्वे (1973) ने निरपेक्ष, सापेक्ष और संबंधपरक, तीनों रूपों की चर्चा की। इस दृष्टि में दिक् सामाजिक प्रक्रियाओं से निर्मित होता है।
- सामाजिक और अनुभूत दिक्: हेनरी लेफ़ेब्र (The Production of Space, 1974) के अनुसार दिक् सामाजिक उत्पाद है। तुआन ने बताया कि अर्थ से भरा दिक् "स्थान" (place) बन जाता है।
- भौतिक दृष्टिकोण का महत्व: मात्रात्मक क्रांति, अवस्थिति सिद्धांत (वॉन थ्यूनेन, वेबर, क्रिस्टालर) और दूरी-क्षय (distance decay) सभी निरपेक्ष या सापेक्ष दिक् पर आधारित हैं। GIS और रिमोट सेंसिंग इसी दृष्टिकोण के आधुनिक उपकरण हैं।
- सीमाएँ: यह दृष्टिकोण मानव के अनुभव, शक्ति-संबंधों और संस्कृति की उपेक्षा करता है, जिसकी आलोचना व्यवहारवादी, मानववादी और आमूल परिवर्तनवादी उपागमों ने की।

व्यवहारवादी उपागम (UPSC 2024)
- पृष्ठभूमि: 1960 के दशक में मात्रात्मक क्रांति के "आर्थिक मानव" (economic man) की धारणा की प्रतिक्रिया में यह उपागम उभरा। "आर्थिक मानव" पूर्ण जानकारी और पूर्ण तार्किकता वाला काल्पनिक व्यक्ति था।
- मूल विचार: मानव का स्थानिक व्यवहार वस्तुगत पर्यावरण पर नहीं, बल्कि अनुभूत (perceived) पर्यावरण पर निर्भर करता है। विलियम कर्क ने "प्रत्यक्ष पर्यावरण" और "व्यवहारिक पर्यावरण" में भेद किया।
- हर्बर्ट साइमन: उन्होंने "सीमित तार्किकता" (bounded rationality) और "संतोषकर्ता" (satisficer) की धारणा दी, यानी मनुष्य सर्वोत्तम के बजाय "पर्याप्त अच्छे" विकल्प को चुनता है।
- जूलियन वोल्पर्ट (1964): स्वीडन के किसानों के अध्ययन में उन्होंने पाया कि किसान अधिकतम लाभ के बजाय संतोषकारी निर्णय लेते हैं।
- प्रमुख अवधारणाएँ: मानसिक मानचित्र (केविन लिंच के नगर-छवि के पाँच तत्व: मार्ग, किनारे, ज़िले, नोड, चिह्न), पर्यावरणीय धारणा, संकट-बोध (गिल्बर्ट व्हाइट, बाढ़-मैदानों पर अध्ययन), प्रवास के निर्णय, खरीदारी का व्यवहार।
- आलोचना: यह व्यक्ति पर अत्यधिक बल देता है और संरचनात्मक बाधाओं (वर्ग, शक्ति) की उपेक्षा करता है, जो आमूल परिवर्तनवादियों की मुख्य आलोचना है। धारणा को मापना भी कठिन है।
कल्याणकारी उपागम (UPSC 2025)
- उद्भव: 1970 के दशक में ग़रीबी, भूख, नस्लीय भेदभाव और नगरीय संकट जैसी सामाजिक समस्याओं के प्रति भूगोल की "प्रासंगिकता" की माँग से यह उपागम उभरा। डेविड एम. स्मिथ (1977) इसके प्रमुख प्रवक्ता हैं।
- केंद्रीय प्रश्न: "कौन क्या पाता है, कहाँ और कैसे" (who gets what, where and how)। यानी आय, स्वास्थ्य, शिक्षा, आवास और पर्यावरणीय गुणवत्ता का स्थानिक वितरण।
- विधियाँ: सामाजिक संकेतक, जीवन-गुणवत्ता सूचकांक, "क्षेत्रीय न्याय" (territorial justice; ब्लेडी डेविस, 1968), कल्याण के मानचित्र।
- भारत में उदाहरण: आकांक्षी ज़िला कार्यक्रम (2018), बहुआयामी ग़रीबी सूचकांक (NITI Aayog), पिछड़े क्षेत्रों पर केंद्रित योजनाएँ।
- सीमा: यह उपागम वितरण का वर्णन तो करता है पर असमानता के मूल कारणों (उत्पादन-संबंधों) तक नहीं पहुँचता। आमूल परिवर्तनवादियों की आलोचना यही है।
3. भाषा, धर्म, सांस्कृतिक प्रदेश और मानव विकास
भाषा और धर्म के आधार पर विश्व के सांस्कृतिक प्रदेश (UPSC 2025)
| भाषा परिवार | प्रमुख क्षेत्र | टिप्पणी |
|---|---|---|
| भारोपीय (Indo-European) | यूरोप, अमेरिका, दक्षिण एशिया, रूस, ईरान | बोलने वालों की संख्या में सबसे बड़ा; औपनिवेशिक प्रसार |
| चीनी-तिब्बती (Sino-Tibetan) | चीन, म्यांमार, हिमालय क्षेत्र | मंदारिन सबसे अधिक मातृभाषी |
| अफ़्रो-एशियाई | उत्तरी अफ़्रीका, पश्चिम एशिया | अरबी, हिब्रू, अम्हारिक |
| नाइजर-कांगो | उप-सहारा अफ़्रीका | भाषाओं की संख्या में सबसे बड़ा परिवारों में से एक; बंटू, स्वाहिली |
| ऑस्ट्रोनेशियाई | इंडोनेशिया, फ़िलिपींस, प्रशांत द्वीप, मेडागास्कर | सबसे विस्तृत भौगोलिक प्रसार |
| द्रविड़, ऑस्ट्रो-एशियाई | दक्षिण भारत; मुंडा (भारत), खमेर, वियतनामी | भारत के प्राचीन भाषा परिवार |
| अल्टाई / तुर्क, यूराली | मध्य एशिया, तुर्की, फ़िनलैंड, हंगरी | वर्गीकरण पर विद्वानों में मतभेद |
- धर्म: सार्वभौमिक (universalising) धर्म, जैसे ईसाई, इस्लाम और बौद्ध, धर्मांतरण द्वारा फैले। जातीय (ethnic) धर्म, जैसे हिंदू, यहूदी और शिंतो, किसी विशेष समुदाय या क्षेत्र से जुड़े रहे। प्रसार दो प्रकार से होता है: पुनःस्थापन प्रसार (प्रवास द्वारा) और विस्तार प्रसार (संक्रामक या पदानुक्रमिक)।
- सांस्कृतिक प्रदेश: विद्वानों ने भाषा, धर्म, नस्ल, अर्थव्यवस्था और इतिहास को मिलाकर विश्व को "सांस्कृतिक परिमंडलों" (culture realms) में बाँटा है, जैसे रसेल और निफ़ेन, ब्रोक और वेब, तथा हार्म डी ब्लिज के वर्गीकरण। प्रमुख परिमंडल ये हैं:
- पश्चिमी यूरोपीय या पाश्चात्य (भारोपीय भाषाएँ, ईसाई धर्म)
- स्लाव या रूसी (स्लाव भाषाएँ, ऑर्थोडॉक्स चर्च)
- लैटिन अमेरिकी (स्पेनिश, पुर्तगाली, कैथोलिक)
- इस्लामी या उत्तरी अफ़्रीका-पश्चिम एशिया (अरबी, फ़ारसी, तुर्की)
- उप-सहारा अफ़्रीकी (नाइजर-कांगो भाषाएँ, ईसाई और जनजातीय धर्म)
- भारतीय या दक्षिण एशियाई (भारोपीय और द्रविड़ भाषाएँ, हिंदू, इस्लाम, बौद्ध, सिख)
- पूर्वी एशियाई या सिनिक (चीनी-तिब्बती भाषाएँ, कन्फ़्यूशियस, बौद्ध)
- दक्षिण-पूर्व एशियाई (ऑस्ट्रोनेशियाई भाषाएँ; बौद्ध, इस्लाम, ईसाई)
- ऑस्ट्रेलिया-न्यूज़ीलैंड और प्रशांत
- संक्रमण क्षेत्र (shatter belts): बाल्कन, कॉकेशस, साहेल और पूर्वोत्तर भारत जहाँ अनेक संस्कृतियाँ मिलती हैं और संघर्ष की संभावना रहती है। सैमुअल हंटिंगटन की "सभ्यताओं का संघर्ष" (1996) धारणा और उसकी आलोचना भी उल्लेखनीय है।
- धर्मनिरपेक्षीकरण (Secularisation): पश्चिमी यूरोप में चर्च-उपस्थिति घटी है, जबकि अफ़्रीका, लैटिन अमेरिका और एशिया में धार्मिकता बनी हुई है या बढ़ी है। इसलिए "विश्व का पुनः धार्मिकीकरण" (desecularisation; पीटर बर्जर) की बहस भी चलती है।
मानव विकास सूचकांक (HDI)
- शुरुआत: UNDP ने 1990 में पहली मानव विकास रिपोर्ट प्रकाशित की। इसके प्रणेता महबूब-उल-हक़ थे और अमर्त्य सेन का "क्षमता उपागम" (capability approach) इसका दार्शनिक आधार है।
- तीन आयाम: दीर्घ और स्वस्थ जीवन (जन्म के समय जीवन-प्रत्याशा), ज्ञान (स्कूली शिक्षा के औसत और अपेक्षित वर्ष), और जीवन-स्तर (प्रति व्यक्ति GNI, PPP)। 2010 से इनका ज्यामितीय माध्य लिया जाता है।
- सहायक सूचकांक: IHDI (असमानता-समायोजित), GII (लैंगिक असमानता), MPI (बहुआयामी ग़रीबी; OPHI और UNDP, 2010), PHDI (ग्रह-दबाव समायोजित)।
- भारत: मानव विकास रिपोर्ट 2025 में भारत 193 देशों में 130वें स्थान पर रहा (2023 के आँकड़ों पर HDI 0.685), यानी "मध्यम मानव विकास" श्रेणी में।
4. आर्थिक भूगोल: संसाधन, ऊर्जा और विकास
- आर्थिक विकास का मापन: GDP/GNI, प्रति व्यक्ति आय, HDI, औद्योगीकरण, नगरीकरण, उपभोग, ऊर्जा-उपभोग।
- विकास के मॉडल: रोस्टो की आर्थिक वृद्धि की अवस्थाएँ, केंद्र-परिधि (फ़्रीडमैन), विश्व-व्यवस्था सिद्धांत (इमैनुअल वालरस्टीन), निर्भरता सिद्धांत (आंद्रे गुंडर फ़्रैंक)। इनका विस्तार मॉडल अध्याय में है।
- संसाधन: एरिक ज़िमरमैन (1933) का कथन प्रसिद्ध है: "संसाधन होते नहीं, बनते हैं।" वर्गीकरण के आधार हैं: नवीकरणीय बनाम अनवीकरणीय, जैविक बनाम अजैविक, वास्तविक बनाम संभाव्य।
- वृद्धि की सीमाएँ: क्लब ऑफ़ रोम की रिपोर्ट "The Limits to Growth" (मीडोज़ और साथी, 1972) ने कंप्यूटर मॉडल (World3) के आधार पर चेतावनी दी कि घातीय वृद्धि संसाधनों और प्रदूषण की सीमाओं से टकराएगी। आलोचकों (जूलियन साइमन) ने प्रौद्योगिकी द्वारा विकल्प खोजने की क्षमता पर बल दिया। आज "ग्रहीय सीमाएँ" (planetary boundaries; रॉकस्ट्रॉम और साथी, 2009) इस बहस का आधुनिक रूप हैं।
- ऊर्जा संकट: 1973 और 1979 के तेल-आघात, जीवाश्म ईंधन की सीमितता, जलवायु परिवर्तन और भू-राजनीतिक व्यवधान (2022 का रूस-यूक्रेन युद्ध)।
तेल और ऊर्जा सुरक्षा (UPSC 2025)
- ऊर्जा सुरक्षा का अर्थ: अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (IEA) के अनुसार, "किफ़ायती मूल्य पर ऊर्जा स्रोतों की निर्बाध उपलब्धता।" इसके "4 A" हैं: उपलब्धता (availability), पहुँच (accessibility), वहनीयता (affordability) और स्वीकार्यता (acceptability)।
- तेल की भू-राजनीति: विश्व के तेल भंडार कुछ क्षेत्रों में केंद्रित हैं: वेनेज़ुएला, सऊदी अरब, ईरान, इराक, कनाडा (तेल-रेत)। OPEC की स्थापना 1960 में बग़दाद में हुई, और 2016 से "OPEC+" (रूस सहित) सक्रिय है। संकीर्ण समुद्री मार्ग (chokepoints) महत्वपूर्ण हैं: होर्मुज़ जलडमरूमध्य, मलक्का, बाब-अल-मंदेब, स्वेज़। अमेरिका की "शेल क्रांति" ने उसे बड़ा उत्पादक बना दिया।
- भारत की निर्भरता: भारत अपनी कच्चे तेल की आवश्यकता का लगभग 85% से अधिक आयात करता है। रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद रूस भारत के प्रमुख आपूर्तिकर्ताओं में शामिल हो गया, जो आपूर्ति के विविधीकरण का उदाहरण है।
- भारत की रणनीति:
- सामरिक पेट्रोलियम भंडार: ISPRL के विशाखापत्तनम, मंगलुरु और पादुर में भूमिगत भंडार, कुल लगभग 5.33 मिलियन टन।
- विदेशी परिसंपत्तियाँ: ONGC विदेश के माध्यम से विदेशों में तेल क्षेत्रों में हिस्सेदारी।
- घरेलू उत्पादन: HELP नीति (2016) और OALP।
- विकल्प: इथेनॉल मिश्रण (E20 लक्ष्य), संपीड़ित बायोगैस (SATAT), हरित हाइड्रोजन, इलेक्ट्रिक वाहन, 2030 तक 500 GW गैर-जीवाश्म क्षमता।
- कूटनीति: अंतरराष्ट्रीय सौर गठबंधन (2015), वैश्विक जैव-ईंधन गठबंधन (G20, 2023), IEA के साथ सहयोग।
- चुनौतियाँ: मूल्य-अस्थिरता से चालू खाता घाटा और महँगाई, पश्चिम एशिया के संघर्ष, समुद्री मार्गों पर ख़तरा (2023-24 में लाल सागर पर हमले), और ऊर्जा संक्रमण के लिए महत्वपूर्ण खनिजों पर नई निर्भरता।
महत्वपूर्ण खनिज (UPSC 2025)
- अर्थ: वे खनिज जो आर्थिक विकास और राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए आवश्यक हैं पर जिनकी आपूर्ति कुछ देशों में केंद्रित होने या उपलब्धता कम होने के कारण जोखिम में है। उदाहरण: लिथियम, कोबाल्ट, निकल, ग्रेफ़ाइट, दुर्लभ मृदा तत्व (REE), टंगस्टन, गैलियम।
- उपयोग: बैटरी, इलेक्ट्रिक वाहन, सौर पैनल, पवन टरबाइन, अर्धचालक, रक्षा उपकरण।
- वैश्विक भूगोल: लिथियम का "त्रिभुज" (चिली, अर्जेंटीना, बोलीविया) और ऑस्ट्रेलिया; कोबाल्ट में कांगो लोकतांत्रिक गणराज्य; दुर्लभ मृदा तत्व और प्रसंस्करण में चीन का प्रभुत्व; निकल में इंडोनेशिया।
- भारत:
- खान मंत्रालय ने 2023 में 30 महत्वपूर्ण खनिजों की सूची जारी की।
- खान और खनिज (विकास और विनियमन) संशोधन अधिनियम 2023 के बाद महत्वपूर्ण खनिज ब्लॉकों की नीलामी शुरू हुई।
- राष्ट्रीय महत्वपूर्ण खनिज मिशन को जनवरी 2025 में मंज़ूरी मिली।
- KABIL (खनिज बिदेश इंडिया लिमिटेड) ने अर्जेंटीना में लिथियम अन्वेषण ब्लॉक लिए।
- भारत 2023 में खनिज सुरक्षा साझेदारी (Mineral Security Partnership) में शामिल हुआ।
- GSI ने 2023 में जम्मू-कश्मीर के रियासी में लिथियम संसाधन की सूचना दी।
- चुनौतियाँ: अन्वेषण और प्रसंस्करण की तकनीक की कमी, पर्यावरणीय और सामाजिक प्रभाव (जनजातीय क्षेत्रों में खनन), पुनर्चक्रण की कमज़ोर व्यवस्था, आपूर्ति-शृंखला की भू-राजनीति।
जल-अभाव (UPSC 2024)
- मापन: फ़ाल्केनमार्क सूचक के अनुसार प्रति व्यक्ति प्रति वर्ष 1,700 घन मीटर से कम जल उपलब्ध होने पर "जल-तनाव", 1,000 से कम पर "जल-अभाव" और 500 से कम पर "पूर्ण अभाव" माना जाता है।
- प्रकार: भौतिक अभाव, जब जल ही कम हो (मरुस्थल, पश्चिम एशिया); आर्थिक अभाव, जब जल उपलब्ध हो पर अवसंरचना और पूँजी न हो (उप-सहारा अफ़्रीका)।
- कारण: जनसंख्या वृद्धि, नगरीकरण, सिंचाई (विश्व के मीठे जल उपयोग का लगभग 70%), भू-जल का अति-दोहन, प्रदूषण, जलवायु परिवर्तन (हिमनदों का पिघलना, सूखे), असमान वितरण, सीमापार नदियों पर विवाद।
- उदाहरण: केप टाउन का "डे ज़ीरो" संकट (2018), चेन्नई (2019), बेंगलुरु (2024)।
- भारत: विश्व की लगभग 18% जनसंख्या के पास विश्व के मीठे जल संसाधनों का लगभग 4% है। प्रति व्यक्ति उपलब्धता 1,700 घन मीटर से नीचे आ चुकी है, यानी भारत "जल-तनाव" वाला देश है। NITI Aayog के समग्र जल प्रबंधन सूचकांक (2018) के अनुसार लगभग 60 करोड़ लोग उच्च से चरम जल-तनाव झेल रहे थे। पंजाब, हरियाणा और राजस्थान में भू-जल का अति-दोहन गंभीर है।
- समाधान: वर्षा-जल संचयन, सूक्ष्म-सिंचाई ("प्रति बूँद अधिक फ़सल"), फ़सल-विविधीकरण, अपशिष्ट जल का पुनर्चक्रण, जल-मूल्य निर्धारण, सहभागी प्रबंधन (अटल भू-जल योजना, 2019), जल जीवन मिशन, अंतर-बेसिन जल अंतरण (सावधानी के साथ)।
5. विश्व कृषि और खाद्य सुरक्षा

- कृषि की प्रारूपिकी (typology): डेरवेंट व्हिटलसी (1936) ने 13 कृषि प्रदेश बताए (विस्तार मॉडल अध्याय में)। अन्य वर्गीकरण हैं: निर्वाह बनाम वाणिज्यिक, गहन बनाम विस्तृत, और IGU कृषि-प्रारूपिकी आयोग (जर्ज़ी कोस्त्रोविकी)।
- प्रमुख प्रकार: आदिम निर्वाह (स्थानांतरी कृषि: झूम, मिल्पा, लदांग), गहन निर्वाह (चावल-प्रधान, मानसून एशिया), विस्तृत वाणिज्यिक अनाज कृषि (प्रेयरी, पम्पास, स्टेपी, डाउन्स), मिश्रित कृषि, डेयरी, भूमध्यसागरीय कृषि, बाज़ार-बागवानी (truck farming), बागानी कृषि।

बागानी फ़सलें (UPSC 2025)
- विशेषताएँ: बड़े आकार के एस्टेट, एकल-फ़सल (monoculture), भारी पूँजी निवेश, वैज्ञानिक प्रबंधन, खेत पर या पास में प्रसंस्करण, निर्यातोन्मुखता, बड़ी संख्या में श्रमिक, और परिवहन से जुड़ाव (बंदरगाह तक रेल और सड़क)।
- ऐतिहासिक मूल: यूरोपीय उपनिवेशवाद। इसका संबंध ग़ुलाम व्यापार (कैरिबियाई गन्ना बागान) और गिरमिटिया या अनुबंधित श्रम से रहा, जब भारतीय श्रमिकों को मॉरीशस, फ़िजी और त्रिनिदाद भेजा गया।
- वितरण:
- चाय: चीन, भारत (असम, दार्जिलिंग, नीलगिरि), केन्या, श्रीलंका।
- कॉफ़ी: ब्राज़ील, वियतनाम, कोलंबिया, इंडोनेशिया, इथियोपिया; भारत में कर्नाटक।
- प्राकृतिक रबर: थाईलैंड, इंडोनेशिया, वियतनाम; भारत में केरल।
- ऑयल पाम: इंडोनेशिया और मलेशिया (विश्व उत्पादन का अधिकांश)।
- कोको: कोटे डी आइवर और घाना।
- गन्ना और केला: ब्राज़ील, भारत, कैरिबियाई द्वीप, मध्य अमेरिका।
- भौगोलिक दशाएँ: उष्णकटिबंधीय और उपोष्ण जलवायु, अधिक वर्षा, ढलानदार और जल-निकासी वाली भूमि (चाय और कॉफ़ी के लिए), सस्ता श्रम, बंदरगाहों तक पहुँच।
- समस्याएँ: वनोन्मूलन (इंडोनेशिया में ऑयल पाम से ओरंगुटान के आवास का नाश), मृदा-क्षरण, एकल-फ़सल से रोग और कीटों का ख़तरा, वैश्विक मूल्य-अस्थिरता, श्रमिकों का शोषण (चाय-बागानों में कम मज़दूरी), बाल-श्रम (कोको), खाद्य फ़सलों से भूमि हट जाना।
- सुधार: उचित व्यापार (Fair Trade) प्रमाणन, RSPO (सतत पाम ऑयल), छोटे उत्पादक (भारत में चाय में छोटे उत्पादकों की हिस्सेदारी बढ़ी है), EU का वनोन्मूलन-मुक्त उत्पाद विनियमन, विविधीकरण, कृषि-वानिकी।
खाद्य सुरक्षा, पोषण और अकाल
- परिभाषा: विश्व खाद्य शिखर सम्मेलन (FAO, 1996) के अनुसार खाद्य सुरक्षा तब होती है जब "सभी लोगों को हर समय सक्रिय और स्वस्थ जीवन के लिए पर्याप्त, सुरक्षित और पौष्टिक भोजन तक भौतिक और आर्थिक पहुँच हो।" इसके चार स्तंभ हैं: उपलब्धता, पहुँच, उपयोग और स्थिरता।
- वैश्विक स्थिति: FAO की SOFI 2024 रिपोर्ट के अनुसार 2023 में लगभग 73 करोड़ लोग भूख से प्रभावित थे। उप-सहारा अफ़्रीका और दक्षिण एशिया सबसे अधिक प्रभावित हैं। "छिपी भूख" यानी सूक्ष्म पोषक तत्वों की कमी, और बच्चों में ठिगनापन (stunting) तथा दुबलापन (wasting) भी गंभीर समस्याएँ हैं।
- अकाल: अमर्त्य सेन (Poverty and Famines, 1981) का "हकदारी उपागम" (entitlement approach) बताता है कि अकाल केवल खाद्य की कमी से नहीं, बल्कि लोगों की ख़रीद-क्षमता और हकदारी के टूटने से होते हैं। 1943 का बंगाल अकाल इसका उदाहरण है। सेन ने यह भी कहा कि लोकतंत्र और स्वतंत्र प्रेस वाले देशों में बड़े अकाल नहीं पड़ते।
- भारत: राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम (2013), प्रधानमंत्री ग़रीब कल्याण अन्न योजना, पोषण अभियान (2018), PDS, बाजरा-मोटे अनाज का अंतरराष्ट्रीय वर्ष (2023)।
6. उद्योग, अर्धचालक और विश्व व्यापार

- औद्योगिक अवस्थिति के कारक: कच्चा माल, शक्ति, श्रम, बाज़ार, परिवहन, पूँजी, सरकारी नीति, समूहन लाभ (agglomeration), जड़त्व (industrial inertia)। अल्फ़्रेड वेबर (1909) का न्यूनतम लागत सिद्धांत मॉडल अध्याय में है।
- विश्व के प्रमुख औद्योगिक प्रदेश: उत्तर-पूर्वी अमेरिका, पश्चिमी यूरोप (रूर), रूस, पूर्वी एशिया (जापान, चीन, कोरिया), और उभरते क्षेत्र (भारत, वियतनाम, मेक्सिको)।
- प्रवृत्तियाँ: अनौद्योगीकरण (पुराने औद्योगिक क्षेत्रों का "रस्ट बेल्ट" बनना), "नया अंतरराष्ट्रीय श्रम विभाजन", वैश्विक मूल्य-शृंखलाएँ, "चीन + 1" रणनीति, और "फ़्रेंड-शोरिंग"।
अर्धचालक (Semiconductor) उद्योग (UPSC 2024)
- महत्व: इन्हें "डिजिटल युग का तेल" कहा जाता है। मोबाइल, कंप्यूटर, वाहन, रक्षा, AI और दूरसंचार, सबमें चिप चाहिए।
- अवस्थिति के कारक:
- अत्यधिक पूँजी निवेश (एक उन्नत fab पर अरबों डॉलर)।
- अति-कुशल श्रम और अनुसंधान संस्थान।
- अति-शुद्ध जल और निर्बाध बिजली की बड़ी मात्रा।
- भूकंप और कंपन से सुरक्षित भूमि, स्वच्छ कक्ष (clean rooms)।
- विशेष गैसों, रसायनों और उपकरणों (जैसे नीदरलैंड की ASML की लिथोग्राफ़ी मशीनें) का आपूर्ति-तंत्र।
- समूहन, जैसे सिलिकॉन वैली और ताइवान का सिंचु विज्ञान पार्क।
- सरकारी प्रोत्साहन, जैसे अमेरिका का CHIPS and Science Act (2022) और EU Chips Act (2023)।
- वैश्विक भूगोल: मूल्य-शृंखला के अलग-अलग चरण अलग-अलग देशों में केंद्रित हैं। डिज़ाइन में अमेरिका आगे है; उपकरणों में अमेरिका, नीदरलैंड और जापान; निर्माण (fabrication) में ताइवान (TSMC) और दक्षिण कोरिया (सैमसंग); और असेंबली-परीक्षण (ATMP/OSAT) में चीन, मलेशिया और वियतनाम। उन्नत चिपों का बड़ा भाग ताइवान में बनता है, इसलिए ताइवान जलडमरूमध्य का भू-राजनीतिक महत्व है।
- भारत: भारत अर्धचालक मिशन (2021) के अंतर्गत कई परियोजनाएँ स्वीकृत हुईं: गुजरात के साणंद में माइक्रॉन की ATMP इकाई, और धोलेरा में टाटा इलेक्ट्रॉनिक्स तथा ताइवान की PSMC का fab। भारत की ताक़त चिप-डिज़ाइन में है, जहाँ वैश्विक डिज़ाइन-इंजीनियरों का बड़ा हिस्सा भारत में काम करता है। चुनौतियाँ हैं: अति-शुद्ध जल और बिजली, आपूर्ति-शृंखला का पारिस्थितिकी तंत्र, कुशल श्रम।

- विश्व व्यापार के प्रतिरूप: GATT (1947) से WTO (1995) तक का विकास। व्यापार में सेवाओं और विनिर्मित वस्तुओं का बढ़ता हिस्सा, क्षेत्रीय व्यापार समझौते (EU, USMCA, ASEAN, RCEP), संरक्षणवाद का पुनरुत्थान (2018 से अमेरिका-चीन व्यापार युद्ध और 2025 के अमेरिकी शुल्क), तथा "दक्षिण-दक्षिण" व्यापार की वृद्धि।
7. Master Summary Table
| विषय | मुख्य तथ्य | याद रखें |
|---|---|---|
| निश्चयवाद-संभववाद | रैटज़ेल, सेम्पल, हंटिंगटन बनाम ब्लाश, फ़ेब्रे | टेलर: "रुको और जाओ" |
| क्षेत्रीय विभेदन | हार्टशोर्न 1939 | बनाम शेफ़र 1953 |
| व्यवहारवाद | कर्क, वोल्पर्ट 1964, लिंच 1960 | संतोषकर्ता, मानसिक मानचित्र |
| आमूल परिवर्तनवाद | हार्वे 1973, Antipode 1969 | मार्क्सवाद |
| मानववाद | तुआन 1974, रेल्फ़ 1976 | स्थान-बोध |
| कल्याणकारी | डी.एम. स्मिथ 1977 | कौन, क्या, कहाँ, कैसे |
| दिक् | निरपेक्ष, सापेक्ष, संबंधपरक | लेफ़ेब्र 1974 |
| HDI | UNDP 1990; HDR 2025 | भारत 130वाँ (0.685) |
| वृद्धि की सीमाएँ | क्लब ऑफ़ रोम 1972 | ग्रहीय सीमाएँ 2009 |
| ऊर्जा सुरक्षा | OPEC 1960; भारत 85% से अधिक आयात | SPR: लगभग 5.33 मिलियन टन |
| महत्वपूर्ण खनिज | भारत की सूची: 30 (2023) | राष्ट्रीय मिशन 2025, KABIL |
| जल-अभाव | फ़ाल्केनमार्क: 1700/1000/500 घन मीटर | भारत: 18% जनसंख्या, लगभग 4% जल |
| अकाल | सेन 1981: हकदारी उपागम | बंगाल 1943 |
| अर्धचालक | CHIPS Act 2022; भारत अर्धचालक मिशन 2021 | साणंद, धोलेरा |
8. चार्ट: मानव भूगोल की विचारधाराओं का कालक्रम
9. Mind Map
- निश्चयवाद-संभववाद
- द्विभाजन, द्वैतवाद
- मात्रात्मक, व्यवहारवादी, कल्याणकारी
- निरपेक्ष, सापेक्ष
- संबंधपरक, सामाजिक
- भाषा, धर्म
- सांस्कृतिक परिमंडल, HDI
- तेल, ऊर्जा सुरक्षा
- महत्वपूर्ण खनिज, जल-अभाव
- बागानी फ़सलें, खाद्य सुरक्षा
- अर्धचालक, विश्व व्यापार
10. महत्वपूर्ण One-liners
- "संभववाद" शब्द दिया: लूसियन फ़ेब्रे; संभववाद के प्रणेता: विडाल डी ला ब्लाश।
- "रुको और जाओ निश्चयवाद": ग्रिफ़िथ टेलर।
- "The Nature of Geography" (1939): रिचर्ड हार्टशोर्न।
- "Exceptionalism in Geography" (1953): फ़्रेड शेफ़र।
- "Topophilia" (1974): यी-फ़ू तुआन।
- "Social Justice and the City" (1973): डेविड हार्वे।
- "Human Geography: A Welfare Approach" (1977): डेविड एम. स्मिथ।
- "संसाधन होते नहीं, बनते हैं": एरिक ज़िमरमैन।
- "The Limits to Growth": क्लब ऑफ़ रोम, 1972।
- अकाल का हकदारी उपागम: अमर्त्य सेन (1981)।
- OPEC की स्थापना: 1960, बग़दाद।
11. टिप्स एवं ट्रिक्स
- हर उपागम के लिए यह क्रम रखें: पृष्ठभूमि, विचारक और कृति (वर्ष सहित), मूल अवधारणाएँ, उदाहरण, आलोचना, वर्तमान प्रासंगिकता।
- उपागमों को एक-दूसरे की "प्रतिक्रिया" के रूप में जोड़ें, जैसे मात्रात्मक क्रांति के बाद व्यवहारवाद, और उसके बाद आमूल परिवर्तनवाद।
- संसाधन और उद्योग के प्रश्नों में विश्व मानचित्र और भारत के नवीनतम नीतिगत क़दम दोनों जोड़ें।
दिक् के तीन रूप: "नि-सा-सं" (निरपेक्ष, सापेक्ष, संबंधपरक)। ऊर्जा सुरक्षा के 4 A: "उपलब्धता, पहुँच, वहनीयता, स्वीकार्यता"।
12. PYQ-आधारित प्रश्न एवं मॉडल उत्तर
भूगोल में द्विभाजन और द्वैतवाद की अवधारणा की विवेचना कीजिए।
मॉडल उत्तर (रूपरेखा)
भूमिका: द्विभाजन और द्वैतवाद का अर्थ; भूगोल के दार्शनिक विकास में इनकी भूमिका।
प्रमुख द्विभाजन: क्रमबद्ध बनाम प्रादेशिक (वारेनियस, हम्बोल्ट-रिटर); भौतिक बनाम मानव; निश्चयवाद बनाम संभववाद; विवरणात्मक बनाम नियमान्वेषी (हार्टशोर्न-शेफ़र); गुणात्मक बनाम मात्रात्मक; स्थान बनाम दिक्।
मूल्यांकन: ये भेद कृत्रिम हैं और दोनों पक्ष पूरक हैं। प्रणाली उपागम, मानव-पर्यावरण संबंध और GIS इन्हें जोड़ते हैं।
निष्कर्ष: भूगोल की शक्ति उसकी समाकलनकारी प्रकृति में है, इसलिए वह द्वैत से अद्वैत की ओर बढ़ा है।
ऊर्जा सुरक्षा के संदर्भ में तेल के भू-राजनीतिक महत्व की विवेचना कीजिए। भारत अपनी ऊर्जा सुरक्षा कैसे सुनिश्चित कर रहा है?
मॉडल उत्तर (रूपरेखा)
ऊर्जा सुरक्षा: IEA की परिभाषा और 4 A।
तेल की भू-राजनीति: भंडारों का कुछ क्षेत्रों में केंद्रण; OPEC (1960) और OPEC+; होर्मुज़, मलक्का, बाब-अल-मंदेब जैसे संकीर्ण मार्ग; 1973 और 1979 के तेल-आघात; अमेरिकी शेल क्रांति; रूस-यूक्रेन युद्ध।
भारत: 85% से अधिक आयात-निर्भरता; आपूर्ति का विविधीकरण (रूस); सामरिक भंडार (लगभग 5.33 मिलियन टन); ONGC विदेश; HELP और OALP; इथेनॉल (E20), हरित हाइड्रोजन, EV; ISA और वैश्विक जैव-ईंधन गठबंधन।
मानचित्र: तेल-भंडार और संकीर्ण समुद्री मार्ग।
निष्कर्ष: दीर्घकालिक ऊर्जा सुरक्षा का रास्ता जीवाश्म ईंधन से विविधीकरण और नवीकरणीय संक्रमण है, पर उसके साथ महत्वपूर्ण खनिजों पर नई निर्भरता का भी प्रबंधन करना होगा।
बागानी फ़सलों की विशेषताओं, विश्व-वितरण और उनसे जुड़ी समस्याओं की विवेचना कीजिए।
मॉडल उत्तर (रूपरेखा)
विशेषताएँ: बड़े एस्टेट, एकल-फ़सल, पूँजी, प्रसंस्करण, निर्यात, श्रम, परिवहन।
उत्पत्ति: उपनिवेशवाद, ग़ुलाम और गिरमिटिया श्रम।
वितरण (मानचित्र सहित): चाय, कॉफ़ी, रबर, ऑयल पाम, कोको, गन्ना और उनके भौगोलिक कारक।
समस्याएँ: वनोन्मूलन, मृदा-क्षरण, रोग, मूल्य-अस्थिरता, श्रमिक-शोषण, बाल-श्रम, खाद्य सुरक्षा पर प्रभाव।
उपाय: उचित व्यापार, RSPO, छोटे उत्पादक, EU वनोन्मूलन विनियमन, विविधीकरण।
निष्कर्ष: बागान कृषि को औपनिवेशिक विरासत से निकालकर सतत और न्यायपूर्ण मूल्य-शृंखला में बदलना ज़रूरी है।
भाषा और धर्म के आधार पर विश्व के सांस्कृतिक प्रदेशों का वर्णन कीजिए।
मॉडल उत्तर (रूपरेखा)
सांस्कृतिक प्रदेश: साझी भाषा, धर्म, जीवन-शैली और इतिहास वाले क्षेत्र।
भाषा परिवार: भारोपीय, चीनी-तिब्बती, अफ़्रो-एशियाई, नाइजर-कांगो, ऑस्ट्रोनेशियाई, द्रविड़ आदि, मानचित्र सहित।
धर्म: सार्वभौमिक और जातीय धर्म; प्रसार के रूप।
परिमंडल: पाश्चात्य, स्लाव, लैटिन अमेरिकी, इस्लामी, उप-सहारा अफ़्रीकी, भारतीय, सिनिक, दक्षिण-पूर्व एशियाई, ऑस्ट्रेलियाई-प्रशांत।
संक्रमण क्षेत्र और गतिशीलता: बाल्कन, साहेल, पूर्वोत्तर भारत; धर्मनिरपेक्षीकरण और वैश्वीकरण का प्रभाव।
निष्कर्ष: सांस्कृतिक प्रदेश स्थिर नहीं हैं; प्रवास और डिजिटल संचार उन्हें निरंतर बदलते रहते हैं।
अर्धचालक उद्योग के अवस्थिति कारकों और उसके वैश्विक वितरण की विवेचना कीजिए। भारत की संभावनाएँ क्या हैं?
मॉडल उत्तर (रूपरेखा)
महत्व: "डिजिटल युग का तेल"।
अवस्थिति कारक: पूँजी, कुशल श्रम, शुद्ध जल, बिजली, स्थिर भूमि, आपूर्ति-तंत्र, समूहन, सरकारी प्रोत्साहन।
वैश्विक वितरण: डिज़ाइन (अमेरिका), उपकरण (अमेरिका, नीदरलैंड, जापान), निर्माण (ताइवान, दक्षिण कोरिया), ATMP (चीन, मलेशिया, वियतनाम); ताइवान का भू-राजनीतिक महत्व।
भारत: भारत अर्धचालक मिशन 2021; साणंद (माइक्रॉन), धोलेरा (टाटा-PSMC); डिज़ाइन में ताक़त; चुनौतियाँ।
निष्कर्ष: भारत "विश्वसनीय मूल्य-शृंखला" का भागीदार बन सकता है, पर इसके लिए पारिस्थितिकी तंत्र का दीर्घकालिक निर्माण आवश्यक है।
मानव भूगोल में दिक् (space) के भौतिक दृष्टिकोण की व्याख्या कीजिए।
मॉडल उत्तर (रूपरेखा)
भूमिका: दिक् भूगोल की केंद्रीय अवधारणा है; कांट ने भूगोल को दिक् का विज्ञान कहा।
निरपेक्ष दिक्: न्यूटन और कांट; पात्र की धारणा; मापन।
सापेक्ष दिक्: समय-दूरी, लागत-दूरी; दिक्-काल अभिसरण।
उपयोग: मात्रात्मक क्रांति, अवस्थिति सिद्धांत, दूरी-क्षय, GIS।
सीमाएँ और विकल्प: संबंधपरक दिक् (हार्वे), सामाजिक दिक् (लेफ़ेब्र), स्थान (तुआन)।
निष्कर्ष: भौतिक दृष्टिकोण विश्लेषण का आधार है, पर दिक् को पूरी तरह समझने के लिए सामाजिक और मानवीय आयाम भी जोड़ने होंगे।
मानव भूगोल में कल्याणकारी उपागम पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।
मॉडल उत्तर
उद्भव: 1970 के दशक में प्रासंगिकता की माँग; डी.एम. स्मिथ (1977)।
मूल प्रश्न: "कौन क्या पाता है, कहाँ और कैसे।"
विधियाँ: सामाजिक संकेतक, क्षेत्रीय न्याय।
उदाहरण: आकांक्षी ज़िले, MPI।
सीमा: वितरण पर बल, संरचनात्मक कारणों की उपेक्षा।
महत्वपूर्ण खनिज क्या हैं? उनके भू-राजनीतिक महत्व पर टिप्पणी कीजिए।
मॉडल उत्तर
अर्थ और उदाहरण: लिथियम, कोबाल्ट, निकल, REE, ग्रेफ़ाइट।
भू-राजनीति: चिली-अर्जेंटीना-बोलीविया, कांगो, चीन का प्रसंस्करण में प्रभुत्व, निर्यात-प्रतिबंध।
भारत: 30 खनिजों की सूची (2023), राष्ट्रीय मिशन (2025), KABIL, MSP, रियासी।
निष्कर्ष: ऊर्जा संक्रमण की सफलता आपूर्ति-शृंखला के विविधीकरण और पुनर्चक्रण पर निर्भर है।
मानव भूगोल में व्यवहारवादी उपागम की व्याख्या कीजिए।
मॉडल उत्तर
पृष्ठभूमि: "आर्थिक मानव" की आलोचना।
मूल विचार: अनुभूत पर्यावरण; कर्क, साइमन की सीमित तार्किकता, वोल्पर्ट 1964।
अवधारणाएँ: मानसिक मानचित्र (लिंच), संकट-बोध (व्हाइट)।
आलोचना: व्यक्ति-केंद्रित, संरचनात्मक बाधाओं की उपेक्षा।
विश्व में जल-अभाव के कारणों और परिणामों पर टिप्पणी कीजिए।
मॉडल उत्तर
मापन: फ़ाल्केनमार्क सूचक; भौतिक और आर्थिक अभाव।
कारण: जनसंख्या, सिंचाई (लगभग 70%), भू-जल दोहन, प्रदूषण, जलवायु परिवर्तन।
परिणाम: खाद्य असुरक्षा, स्वास्थ्य, प्रवास, संघर्ष; केप टाउन, चेन्नई।
भारत: 18% जनसंख्या, लगभग 4% जल; NITI Aayog CWMI 2018।
उपाय: वर्षा-जल संचयन, सूक्ष्म-सिंचाई, पुनर्चक्रण, सहभागी प्रबंधन।
13. Quick Revision Summary
- परिप्रेक्ष्य: निश्चयवाद, संभववाद, क्षेत्रीय विभेदन, मात्रात्मक क्रांति, व्यवहारवादी, आमूल परिवर्तनवादी, मानववादी, कल्याणकारी, उत्तर-आधुनिक।
- द्विभाजन: क्रमबद्ध-प्रादेशिक, भौतिक-मानव, निश्चय-संभव, विवरणात्मक-नियमान्वेषी।
- दिक्: निरपेक्ष, सापेक्ष, संबंधपरक, सामाजिक।
- संस्कृति: भाषा परिवार, धर्म, सांस्कृतिक परिमंडल, धर्मनिरपेक्षीकरण, HDI।
- संसाधन: वृद्धि की सीमाएँ, तेल और ऊर्जा सुरक्षा, महत्वपूर्ण खनिज, जल-अभाव।
- कृषि और उद्योग: बागानी फ़सलें, खाद्य सुरक्षा और अकाल, अर्धचालक, विश्व व्यापार।