1. अध्याय एक नज़र में
Paper II के खंड A का अंतिम भाग, 1915 से 1960 के दशक तक:
- गांधीवादी राष्ट्रवाद: चंपारण से भारत छोड़ो तक; जन-आंदोलनों की रणनीति।
- राष्ट्रीय आंदोलन की अन्य धाराएँ: क्रांतिकारी (भगत सिंह), वामपंथ, मज़दूर और किसान आंदोलन।
- अलगाववाद की राजनीति: मुस्लिम लीग, पाकिस्तान की माँग, विभाजन।
- संवैधानिक विकास: 1909, 1919, 1935 के अधिनियम और संघीय योजना।
- राष्ट्र के रूप में सुदृढ़ीकरण: रियासतों का विलय, भाषायी राज्य, क्षेत्रवाद, जाति-न्याय, भूमि सुधार, विकास-रणनीति।
2025 में भगत सिंह और क्रांति का अर्थ, 1917-22 में गांधी द्वारा आंदोलन का "भारतीयकरण", भाषायी राज्यों से "बाल्कनीकरण" का भय, और 1947 के बाद जाति-अन्याय के उन्मूलन के प्रयास पूछे गए। 2024 में 1935 के अधिनियम की संघीय योजना और रियासतें, पाकिस्तान कार्यक्रम की अस्पष्टता, भूमि सुधार का राष्ट्रीय एजेंडा न बनना, 1947 के बाद क्षेत्रवाद, ट्रेड यूनियन आंदोलन और राष्ट्रवाद, और विकास-रणनीति पर आर्थिक बनाम वैचारिक प्रभाव आए।
2. गांधी और जन-राष्ट्रवाद
| आंदोलन | वर्ष | मुख्य बिंदु |
|---|---|---|
| चंपारण | 1917 | नील की "तिनकठिया" प्रथा के विरुद्ध; राजकुमार शुक्ल का आमंत्रण; भारत में पहला सत्याग्रह |
| अहमदाबाद मिल हड़ताल | 1918 | मज़दूरी बढ़ाने के लिए; गांधी का पहला अनशन; अनुसूया साराभाई |
| खेड़ा | 1918 | फ़सल ख़राब होने पर लगान-माफ़ी; वल्लभभाई पटेल |
| रौलट सत्याग्रह | 1919 | पहला अखिल भारतीय आंदोलन; 13 अप्रैल को जलियाँवाला बाग़ |
| ख़िलाफ़त और असहयोग | 1920-22 | नागपुर अधिवेशन (दिसंबर 1920); बहिष्कार, स्वदेशी, राष्ट्रीय विद्यालय; 4 फ़रवरी 1922 को चौरी चौरा के बाद आंदोलन वापस |
| सविनय अवज्ञा | 1930-34 | दांडी (12 मार्च से 6 अप्रैल 1930); गांधी-इरविन समझौता (1931); दूसरा गोलमेज़ सम्मेलन |
| भारत छोड़ो | 1942 | 8 अगस्त, गोवालिया टैंक; "करो या मरो"; समानांतर सरकारें (बलिया, तामलुक, सतारा) |
गांधी का उदय: राष्ट्रीय आंदोलन का "भारतीयकरण" (1917-22) (UPSC 2025)
- भाषा और प्रतीक: सत्याग्रह, अहिंसा, स्वराज और "रामराज्य" जैसे भारतीय नैतिक-धार्मिक मुहावरे; हिंदुस्तानी और क्षेत्रीय भाषाओं का उपयोग; खादी, चरखा और साधारण वेशभूषा। इन्होंने राजनीति को अंग्रेज़ी-शिक्षित अभिजात के ड्राइंग-रूम से निकालकर गाँवों तक पहुँचाया।
- जन-आधार: चंपारण और खेड़ा के किसान, अहमदाबाद के मज़दूर, और ख़िलाफ़त के माध्यम से मुसलमान, यानी पहली बार "जन-राष्ट्रवाद"।
- संगठनात्मक भारतीयकरण (1920): कांग्रेस का भाषायी आधार पर प्रांतीय समितियों में पुनर्गठन, चार आने की सदस्यता, और गाँव तक समितियाँ।
- नैतिक दृष्टि: साधन और साध्य की पवित्रता; अस्पृश्यता-विरोध, हिंदू-मुस्लिम एकता और रचनात्मक कार्यक्रम।
- इतिहासलेखन: जूडिथ ब्राउन (Gandhi's Rise to Power, 1972) ने स्थानीय "उप-ठेकेदार" नेताओं की भूमिका पर बल दिया; शाहिद अमीन ("Gandhi as Mahatma", 1984) ने दिखाया कि किसानों ने "महात्मा" की छवि अपने ढंग से गढ़ी।
- सीमाएँ: धार्मिक मुहावरों से कुछ वर्गों (मुस्लिम लीग, अंबेडकर, धर्मनिरपेक्ष वामपंथी) को आपत्ति थी। ख़िलाफ़त का धार्मिक आधार बाद में सांप्रदायिकता का कारण भी बना। चौरी चौरा के बाद आंदोलन वापस लेने की आलोचना हुई।
- निष्कर्ष: गांधी ने राष्ट्रवाद को "भारतीय भाषा" दी। इससे आंदोलन जन-आंदोलन बना, यद्यपि इस भाषा की कुछ सीमाएँ भी थीं।
3. राष्ट्रीय आंदोलन की अन्य धाराएँ
भगत सिंह और क्रांति का विस्तारित अर्थ (UPSC 2025)
- घटनाक्रम: सितंबर 1928 में दिल्ली में हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन (HSRA) बनी, जिसके नाम में "सोशलिस्ट" शब्द जोड़ा गया। दिसंबर 1928 में लाला लाजपत राय की मृत्यु का बदला लेने के लिए सॉन्डर्स की हत्या हुई। 8 अप्रैल 1929 को बटुकेश्वर दत्त के साथ केंद्रीय विधान सभा में बम फेंका गया, जिसका उद्देश्य किसी को मारना नहीं, "बहरों को सुनाना" था (पब्लिक सेफ़्टी बिल और ट्रेड डिस्प्यूट्स बिल का विरोध)। जेल में भूख-हड़ताल हुई (1929 में जतींद्रनाथ दास की मृत्यु)। 23 मार्च 1931 को राजगुरु और सुखदेव के साथ फाँसी दी गई।
- क्रांति का अर्थ:
- "इंक़लाब ज़िंदाबाद": क्रांति का अर्थ हिंसा या बम नहीं, बल्कि "मनुष्य द्वारा मनुष्य के शोषण का अंत" है।
- समाजवाद: केवल अंग्रेज़ों को हटाना नहीं, बल्कि भारतीय पूँजीपति और ज़मींदार के शोषण से भी मुक्ति।
- धर्मनिरपेक्षता और सांप्रदायिकता-विरोध।
- तर्कवाद और नास्तिकता ("मैं नास्तिक क्यों हूँ", 1930)।
- अस्पृश्यता-विरोध।
- व्यक्तिगत आतंकवाद के बजाय जन-संगठन (किसान और मज़दूर) की आवश्यकता, जो उनके अंतिम लेखों में स्पष्ट है।
- भगवतीचरण वोहरा का "बम का दर्शन" (1930), जो गांधी के "बम की पूजा" लेख का उत्तर था।
- प्रभाव: युवाओं में लोकप्रियता; अदालत को प्रचार का मंच बनाना; और कराची कांग्रेस (1931) के मौलिक अधिकार तथा आर्थिक नीति प्रस्ताव पर वातावरण का प्रभाव।
- निष्कर्ष: कथन सही है। भगत सिंह ने "क्रांति" को राजनीतिक परिवर्तन से आगे सामाजिक और वैचारिक रूपांतरण के रूप में परिभाषित किया।
ट्रेड यूनियन आंदोलन और राष्ट्रवाद (UPSC 2024)
- अखिल भारतीय ट्रेड यूनियन कांग्रेस (AITUC, 1920): पहले अध्यक्ष लाला लाजपत राय थे और एन.एम. जोशी इसके प्रमुख संगठनकर्ता। बाद में सी.आर. दास और नेहरू जैसे नेता इससे जुड़े।
- परस्पर सुदृढ़ीकरण:
- असहयोग आंदोलन (1920-22) में मज़दूरों की हड़तालें।
- अहमदाबाद टेक्सटाइल लेबर एसोसिएशन (गांधी और अनुसूया साराभाई, 1920): "वर्ग-सहयोग" और मध्यस्थता का मॉडल।
- बंबई की कपड़ा-मिल हड़तालें (1928; गिरनी कामगार यूनियन)।
- भारत छोड़ो आंदोलन (1942) में अहमदाबाद और जमशेदपुर में हड़तालें।
- 1946 के नौसैनिक (RIN) विद्रोह के समर्थन में बंबई की आम हड़ताल।
- औपनिवेशिक दमन: ट्रेड डिस्प्यूट्स एक्ट (1929) और मेरठ षड्यंत्र केस (1929), जिसने राष्ट्रवादियों को मज़दूर नेताओं के पक्ष में खड़ा किया (नेहरू, अंसारी)।
- तनाव:
- राष्ट्रवादी नेतृत्व के पूँजीपति समर्थकों और मज़दूरों के हितों का टकराव (गांधी का वर्ग-सहयोग बनाम कम्युनिस्टों का वर्ग-संघर्ष)।
- 1929 में AITUC में फूट (एन.एम. जोशी के नरमपंथी अलग हुए)।
- 1942 में कम्युनिस्टों की "जनयुद्ध" नीति, जिससे वे भारत छोड़ो से दूर रहे।
- 1947 में कांग्रेस ने अलग यूनियन INTUC बनाई।
- निष्कर्ष: मज़दूर आंदोलन और राष्ट्रवाद ने एक-दूसरे को शक्ति दी, पर "राष्ट्रीय एकता" और "वर्ग-हित" के बीच तनाव अंत तक बना रहा।
- वामपंथ और किसान आंदोलन: भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (ताशकंद 1920; कानपुर 1925), कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी (1934), अखिल भारतीय किसान सभा (1936; स्वामी सहजानंद सरस्वती), तेभागा (1946, बंगाल) और तेलंगाना सशस्त्र संघर्ष (1946-51)।
- अंबेडकर और दलित आंदोलन: महाड़ सत्याग्रह (1927), कालाराम मंदिर सत्याग्रह (1930), पूना पैक्ट (1932) और इंडिपेंडेंट लेबर पार्टी (1936)।
4. संवैधानिक विकास और 1935 का अधिनियम
| अधिनियम | मुख्य प्रावधान |
|---|---|
| मॉर्ले-मिंटो (1909) | विधान परिषदों का विस्तार; मुसलमानों के लिए पृथक निर्वाचन |
| मॉन्टेग्यू-चेम्सफ़ोर्ड (1919) | प्रांतों में द्वैध शासन (हस्तांतरित और आरक्षित विषय); केंद्र में द्विसदनीय विधायिका; पृथक निर्वाचन का विस्तार |
| भारत सरकार अधिनियम (1935) | प्रांतीय स्वायत्तता; केंद्र में द्वैध शासन; अखिल भारतीय संघ (प्रांत और रियासतें); संघीय न्यायालय (1937); RBI (1935); बर्मा का अलगाव |
- बीच की घटनाएँ: साइमन कमीशन (1927), नेहरू रिपोर्ट (1928), जिन्ना के 14 सूत्र (1929), गोलमेज़ सम्मेलन (1930-32), सांप्रदायिक पंचाट (1932) और पूना पैक्ट (1932)।
1935 के अधिनियम की संघीय योजना और रियासतें (UPSC 2024)
- संघीय योजना: ब्रिटिश प्रांतों और रियासतों का एक अखिल भारतीय संघ। यह तभी लागू होना था जब पर्याप्त रियासतें "विलय-पत्र" (Instrument of Accession) पर हस्ताक्षर करें, यानी ऊपरी सदन में रियासतों के लिए निर्धारित सीटों में से आधी सीटों के अधिकारी और रियासतों की कुल जनसंख्या के आधे का प्रतिनिधित्व करने वाले राज्य।
- रियासतों का हठ:
- राजा अपनी आंतरिक संप्रभुता, सर्वोपरिता (paramountcy) और वित्तीय अधिकारों की ठोस गारंटी चाहते थे।
- उन्हें संघीय विधायिका में कांग्रेस के प्रभुत्व और लोकतांत्रिक दबाव का भय था, क्योंकि रियासतों में प्रजामंडल आंदोलन चल रहे थे और कांग्रेस ने हरिपुरा (1938) में रियासतों के लोकतंत्रीकरण का समर्थन किया था।
- नरेंद्र मंडल (Chamber of Princes) में बड़े और छोटे राज्यों के बीच मतभेद थे।
- ब्रिटिश सरकार की ओर से भी उत्साह कम था।
- परिणाम: संघीय भाग कभी लागू नहीं हुआ, और 1939 में द्वितीय विश्वयुद्ध के कारण उसे स्थगित कर दिया गया। केवल प्रांतीय स्वायत्तता लागू हुई (1937 के चुनाव; कांग्रेस ने आठ प्रांतों में सरकारें बनाईं)।
- अन्य कारण: कांग्रेस और मुस्लिम लीग दोनों ने संघीय योजना की आलोचना की। कांग्रेस के अनुसार इसमें रियासतों के मनोनीत प्रतिनिधियों के माध्यम से प्रतिक्रियावादी तत्वों को अधिक भार दिया गया था; लीग को "हिंदू-बहुल केंद्र" का भय था।
- निष्कर्ष: कथन सही है। राजाओं का हठ प्रत्यक्ष कारण था, पर अन्य राजनीतिक कारकों ने भी संघ को विफल किया। फिर भी 1935 का अधिनियम भारतीय संविधान का एक प्रमुख स्रोत बना।
5. अलगाववाद, पाकिस्तान और विभाजन
- पृष्ठभूमि: अलीगढ़ आंदोलन, मुस्लिम लीग (1906), पृथक निर्वाचन (1909), लखनऊ समझौता (1916), हिंदू महासभा (1915), 1920 के दशक के सांप्रदायिक दंगे, और 1937 के बाद लीग का पुनर्गठन।
- पाकिस्तान का विचार: इक़बाल का इलाहाबाद अभिभाषण (1930), रहमत अली का "Now or Never" (1933; "PAKSTAN" शब्द) और लाहौर प्रस्ताव (23 मार्च 1940)।
"पाकिस्तान कार्यक्रम की शक्ति उसकी अस्पष्टता थी" (UPSC 2024)
- अस्पष्टता के रूप: लाहौर प्रस्ताव में "पाकिस्तान" शब्द नहीं था; उसमें "स्वतंत्र राज्यों" (बहुवचन) की बात थी; सीमाएँ, अल्पसंख्यकों की स्थिति और केंद्र से संबंध, सब अस्पष्ट थे।
- अलग-अलग वर्गों के लिए अलग अर्थ:
- उत्तर प्रदेश और बिहार के मुस्लिम अभिजात (अल्पसंख्यक प्रांत) के लिए: हिंदू-बहुल शासन से सुरक्षा और राजनीतिक बराबरी।
- पंजाब के ज़मींदारों के लिए: अपने हितों की रक्षा।
- बंगाल के मुस्लिम किसानों के लिए: हिंदू ज़मींदारों और साहूकारों से मुक्ति।
- उलेमा के लिए: इस्लामी राज्य।
- व्यापारियों के लिए: नया बाज़ार।
- लाभ: इस अस्पष्टता ने विविध और विरोधी हितों को एक मंच पर ला दिया। 1946 के चुनावों में लीग को मुस्लिम सीटों पर भारी सफलता मिली।
- इतिहासलेखन: आयशा जलाल (The Sole Spokesman, 1985) के अनुसार जिन्ना के लिए पाकिस्तान की माँग प्रारंभ में "सौदेबाज़ी का साधन" थी, यानी एक ढीले संघ में मुसलमानों के लिए समान हिस्सेदारी। कैबिनेट मिशन योजना (1946) की "समूह" व्यवस्था को लीग ने पहले स्वीकार किया था।
- दुष्परिणाम: अस्पष्टता ने अंततः पंजाब और बंगाल के विभाजन ("कटा-फटा पाकिस्तान") को जन्म दिया, जो लीग के कई समर्थकों की अपेक्षा के विपरीत था, और सीमावर्ती क्षेत्रों में भीषण हिंसा हुई।
- घटनाक्रम: क्रिप्स मिशन (1942), वेवेल योजना और शिमला सम्मेलन (1945), कैबिनेट मिशन (1946), प्रत्यक्ष कार्रवाई दिवस (16 अगस्त 1946), माउंटबेटन योजना (3 जून 1947), भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम (जुलाई 1947) और रैडक्लिफ़ रेखा।
6. राष्ट्र के रूप में सुदृढ़ीकरण
- रियासतों का विलय: सरदार पटेल और वी.पी. मेनन; "विलय-पत्र" और "स्थिरता समझौता" (Standstill Agreement)। अपवाद: जूनागढ़ (जनमत-संग्रह, फ़रवरी 1948), हैदराबाद ("ऑपरेशन पोलो", सितंबर 1948) और कश्मीर (विलय, अक्टूबर 1947)।
भाषायी राज्य और "बाल्कनीकरण" का भय (UPSC 2025)
- पृष्ठभूमि: कांग्रेस ने 1920 में भाषायी आधार पर प्रांतीय समितियाँ बनाकर इस सिद्धांत को स्वीकार किया था।
- स्वतंत्रता के बाद की आशंकाएँ:
- विभाजन का आघात और रियासतों के विलय की चुनौती।
- भाषायी पहचान से केंद्र-विरोधी (centrifugal) प्रवृत्तियों का डर।
- राष्ट्रीय एकता, आर्थिक नियोजन और प्रशासनिक स्थिरता को प्राथमिकता।
- समितियाँ: धर (Dhar) आयोग (1948) ने भाषायी राज्यों का विरोध किया; JVP समिति (1949; नेहरू, पटेल, पट्टाभि सीतारमैया) ने इसे स्थगित रखने की सलाह दी।
- दबाव और परिवर्तन: 15 दिसंबर 1952 को पोट्टी श्रीरामुलु की अनशन से मृत्यु हुई, और 1 अक्टूबर 1953 को आंध्र राज्य बना। राज्य पुनर्गठन आयोग (1953-55; फ़ज़ल अली, के.एम. पणिक्कर, एच.एन. कुंज़रू) के बाद राज्य पुनर्गठन अधिनियम (1956) आया। संयुक्त महाराष्ट्र आंदोलन से 1960 में बंबई का विभाजन हुआ, और 1966 में पंजाब का पुनर्गठन।
- परिणाम: आशंकाएँ काफ़ी हद तक निराधार निकलीं। भाषायी राज्यों ने लोकतंत्र को जनता की भाषा में पहुँचाया, प्रशासन को सुगम बनाया, और क्षेत्रीय पहचान को राष्ट्रीय पहचान के साथ "सह-अस्तित्व" में रखा (बिपिन चंद्र, India Since Independence)।
- निष्कर्ष: "बाल्कनीकरण" का भय राष्ट्र-निर्माण के प्रारंभिक संकट की उपज था। भाषायी पुनर्गठन ने अंततः भारत की एकता को मज़बूत किया।
1947 के बाद क्षेत्रवाद (UPSC 2024)
- भाषायी कारण: 1950 के दशक के भाषायी आंदोलन; DMK का हिंदी-विरोधी आंदोलन (1965)।
- विकास-जनित कारण:
- तेलंगाना: 1969 का आंदोलन और 2014 में अलग राज्य। इसके पीछे "मुल्की नियम", नौकरियों, जल और कोष के वितरण में असमानता थी, जबकि भाषा तेलुगु ही थी।
- झारखंड, छत्तीसगढ़, उत्तराखंड (2000): जनजातीय और पहाड़ी क्षेत्रों का पिछड़ापन और संसाधनों का दोहन।
- विदर्भ और बुंदेलखंड की माँगें।
- "धरती-पुत्र" आंदोलन, जैसे शिवसेना (1966), जिनका आधार नौकरियाँ थीं।
- असम आंदोलन (1979-85): प्रवास और आर्थिक संसाधन।
- पंजाब: नदी-जल और आनंदपुर साहिब प्रस्ताव (1973)।
- निष्कर्ष: भाषा 1950-60 के दशक का मुख्य आधार थी, पर उसके बाद "विकास की राजनीति" क्षेत्रवाद का प्रमुख कारण बनी। इसलिए कथन सही है। भारतीय संघ ने संवाद और पुनर्गठन से इन माँगों को समायोजित किया।
1947 के बाद जाति-अन्याय और असमानता के उन्मूलन के प्रयास (UPSC 2025)
- संवैधानिक प्रावधान: अनुच्छेद 14, 15, 16(4) (आरक्षण), 17 (अस्पृश्यता का उन्मूलन), 46 (कमज़ोर वर्गों के शैक्षिक और आर्थिक हित), 330 और 332 (विधायिकाओं में आरक्षण), और 338 (राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग)।
- क़ानून: अस्पृश्यता (अपराध) अधिनियम 1955, जो 1976 में नागरिक अधिकार संरक्षण अधिनियम बना; SC/ST (अत्याचार निवारण) अधिनियम 1989 (2015 और 2018 में संशोधित); हाथ से मैला ढोने वालों के नियोजन के निषेध और पुनर्वास का अधिनियम (2013)।
- नीतियाँ: शिक्षा और नौकरियों में आरक्षण; मंडल आयोग (1980) की सिफ़ारिशों पर 1990 में OBC के लिए 27% आरक्षण; इंद्रा साहनी निर्णय (1992); छात्रवृत्तियाँ; अनुसूचित जाति उप-योजना (1979); और भूमि आवंटन।
- मूल्यांकन: प्रतिनिधित्व, शिक्षा और एक मध्यम वर्ग के उदय में उल्लेखनीय प्रगति हुई। पर अत्याचार, अंतर्जातीय विवाह का विरोध, और भूमि तथा संपत्ति में असमानता बनी हुई है।
भूमि सुधार राष्ट्रीय एजेंडा क्यों नहीं बना (UPSC 2024)
- जो हुआ: 1950 के दशक में ज़मींदारी उन्मूलन लगभग पूरा हुआ (पहला संशोधन, 1951, और नौवीं अनुसूची)।
- जो नहीं हुआ: भूमि-सीमा और भूमि-पुनर्वितरण, और काश्तकारों की सुरक्षा व्यापक रूप से नहीं हो सकी।
- कारण:
- कांग्रेस की ग्रामीण शक्ति-संरचना धनी किसानों और पूर्व ज़मींदारों पर निर्भर थी।
- भूमि राज्य सूची का विषय है (राज्य सूची की प्रविष्टि 18), इसलिए क्रियान्वयन राज्यों पर निर्भर रहा और उनमें भारी भिन्नता थी।
- क़ानूनी छिद्र: बेनामी हस्तांतरण और पारिवारिक विभाजन।
- अदालती चुनौतियाँ (संपत्ति का अधिकार)।
- नियोजन में उद्योग को प्राथमिकता।
- हरित क्रांति ने "पुनर्वितरण" के बजाय "उत्पादन" और तकनीक पर ध्यान केंद्रित किया।
- कुमारप्पा समिति (1949) की सिफ़ारिशों की उपेक्षा।
- भूमि अभिलेखों की कमज़ोरी।
- तेलंगाना संघर्ष के बाद किसान संगठनों का कमज़ोर होना और भूदान जैसे स्वैच्छिक विकल्प।
- अपवाद: केरल (1969-70), पश्चिम बंगाल (ऑपरेशन बरगा, 1978) और जम्मू-कश्मीर (1950)।
- निष्कर्ष: भूमि सुधार "क़ानून" के रूप में उपस्थित था, पर "राजनीतिक इच्छाशक्ति और जन-आंदोलन" के रूप में राष्ट्रीय एजेंडा नहीं बना।
स्वतंत्रता के बाद विकास-रणनीति: आर्थिक या वैचारिक? (UPSC 2024)
- रणनीति: योजना आयोग (1950); औद्योगिक नीति प्रस्ताव (1956); दूसरी पंचवर्षीय योजना (1956-61) में नेहरू-महालनोबिस मॉडल, यानी भारी उद्योग, सार्वजनिक क्षेत्र, आयात-प्रतिस्थापन और आत्मनिर्भरता।
- आर्थिक बाध्यताएँ:
- पूँजी की कमी; निजी क्षेत्र भारी उद्योगों में निवेश करने में असमर्थ था। "बॉम्बे प्लान" (1944) में स्वयं उद्योगपतियों ने राज्य की बड़ी भूमिका माँगी थी।
- औपनिवेशिक विऔद्योगीकरण की विरासत।
- विदेशी मुद्रा और भुगतान-संतुलन की समस्या।
- रक्षा और आर्थिक संप्रभुता की आवश्यकता।
- दीर्घकालिक वृद्धि के लिए पूँजीगत वस्तुओं का घरेलू उत्पादन।
- वैचारिक प्रभाव: नेहरू का फ़ेबियन समाजवाद, सोवियत नियोजन का आकर्षण, "समाजवादी ढाँचे का समाज" (आवडी, 1955), और गांधीवादी ग्रामोद्योग।
- निष्कर्ष: रणनीति मुख्यतः आर्थिक बाध्यताओं से निर्धारित थी, पर उसे वैचारिक रूप और भाषा दी गई। "मिश्रित अर्थव्यवस्था" दोनों का समझौता थी।
7. Master Summary Table
| विषय | मुख्य तथ्य | याद रखें |
|---|---|---|
| गांधी का उदय | चंपारण 1917, अहमदाबाद और खेड़ा 1918, रौलट 1919 | ब्राउन 1972; अमीन 1984 |
| भगत सिंह | HSRA 1928; बम 8 अप्रैल 1929; फाँसी 23 मार्च 1931 | "मैं नास्तिक क्यों हूँ" |
| ट्रेड यूनियन | AITUC 1920; TLA 1920; मेरठ 1929 | INTUC 1947 |
| 1935 का अधिनियम | संघ लागू नहीं; 1937 की प्रांतीय सरकारें | हरिपुरा 1938 |
| पाकिस्तान | लाहौर 1940; "राज्यों" | जलाल 1985 |
| विलय | पटेल और मेनन; पोलो 1948 | जूनागढ़ में जनमत |
| भाषायी राज्य | धर 1948; JVP 1949; आंध्र 1953; SRC; 1956 | श्रीरामुलु |
| जाति-न्याय | अनुच्छेद 17; अत्याचार निवारण अधिनियम 1989; मंडल 1990 | इंद्रा साहनी 1992 |
| भूमि सुधार | पहला संशोधन 1951; राज्य सूची की प्रविष्टि 18 | केरल, बंगाल अपवाद |
| विकास | महालनोबिस; IPR 1956 | बॉम्बे प्लान 1944 |
8. Mind Map
- भारतीयकरण
- असहयोग, सविनय अवज्ञा, भारत छोड़ो
- भगत सिंह
- मज़दूर, किसान, अंबेडकर
- 1909, 1919, 1935
- संघ और रियासतें
- लाहौर प्रस्ताव
- अस्पष्टता, कैबिनेट मिशन
- विलय, भाषायी राज्य, क्षेत्रवाद
- जाति, भूमि, विकास
9. महत्वपूर्ण One-liners
- भारत में गांधी का पहला सत्याग्रह: चंपारण (1917)।
- असहयोग आंदोलन की वापसी: चौरी चौरा (4 फ़रवरी 1922)।
- HSRA की स्थापना: सितंबर 1928, दिल्ली।
- AITUC के पहले अध्यक्ष: लाला लाजपत राय (1920)।
- संघीय न्यायालय: 1937 (1935 के अधिनियम के अंतर्गत)।
- लाहौर प्रस्ताव: 23 मार्च 1940।
- "The Sole Spokesman": आयशा जलाल।
- आंध्र राज्य का गठन: 1 अक्टूबर 1953।
- राज्य पुनर्गठन आयोग के अध्यक्ष: फ़ज़ल अली।
- भूमि का संवैधानिक स्थान: राज्य सूची की प्रविष्टि 18।
10. टिप्स एवं ट्रिक्स
- "नकारात्मक" प्रश्न ("क्यों नहीं हुआ") के उत्तर में अभाव के कारण लिखें: हित, बाधाएँ और विकल्प।
- स्वतंत्रता के बाद के प्रश्नों में संवैधानिक प्रावधान, क़ानून, आयोग और न्यायालय के निर्णय वर्ष सहित दें।
- इतिहासकारों के नाम दें: बिपिन चंद्र, सुमित सरकार, जूडिथ ब्राउन, आयशा जलाल।
गांधी के प्रारंभिक आंदोलन: "चं-अ-खे-रौ" (1917-19)। भाषायी राज्यों का क्रम: "धर-JVP-आंध्र-SRC" (1948, 1949, 1953, 1955)।
11. PYQ-आधारित प्रश्न एवं मॉडल उत्तर
"भाषायी राज्यों के आंदोलन ने राष्ट्रवादी अभिजात वर्ग में गहरी आशंकाएँ उत्पन्न कीं। उन्हें भय था कि इससे भारत का बाल्कनीकरण हो जाएगा।" परीक्षण कीजिए।
मॉडल उत्तर (रूपरेखा)
पृष्ठभूमि: 1920 की कांग्रेस प्रतिबद्धता।
आशंकाएँ: विभाजन, केंद्र-विरोधी प्रवृत्तियाँ, नियोजन; धर (1948) और JVP (1949)।
परिवर्तन: श्रीरामुलु, आंध्र 1953, SRC, 1956, 1960, 1966।
निष्कर्ष: आशंकाएँ निराधार निकलीं; एकता मज़बूत हुई।
"गांधी का उदय राष्ट्रीय आंदोलन के भारतीयकरण का सूचक था।" 1917 से 1922 के बीच उनके प्रारंभिक आंदोलनों के संदर्भ में विश्लेषण कीजिए।
मॉडल उत्तर (रूपरेखा)
आंदोलन: चंपारण, अहमदाबाद, खेड़ा, रौलट, असहयोग।
भारतीयकरण: भाषा और प्रतीक, जन-आधार, संगठन (1920), नैतिक दृष्टि।
इतिहासलेखन: ब्राउन, अमीन।
सीमाएँ: धार्मिक मुहावरे, ख़िलाफ़त, चौरी चौरा।
1947 के बाद जातिगत अन्याय और असमानता को दूर करने के लिए भारत सरकार द्वारा उठाए गए प्रमुख क़दमों की विवेचना कीजिए।
मॉडल उत्तर
संवैधानिक: अनुच्छेद 15, 16(4), 17, 46, 330, 332, 338।
क़ानून: 1955 से 1976, अत्याचार निवारण अधिनियम 1989, 2013 का अधिनियम।
नीतियाँ: आरक्षण, मंडल, इंद्रा साहनी, उप-योजना।
मूल्यांकन: प्रगति बनाम बनी हुई चुनौतियाँ।
1947 के बाद भूमि सुधार की माँग राष्ट्रीय राजनीति का एजेंडा क्यों नहीं बन सकी? स्पष्ट कीजिए।
मॉडल उत्तर (रूपरेखा)
हुआ: ज़मींदारी उन्मूलन; पहला संशोधन।
नहीं हुआ: सीमा, पुनर्वितरण, काश्तकारी सुरक्षा।
कारण: ग्रामीण शक्ति-संरचना, राज्य सूची, छिद्र, अदालतें, उद्योग को प्राथमिकता, हरित क्रांति, कुमारप्पा, अभिलेख, कमज़ोर किसान संगठन।
अपवाद: केरल, बंगाल, जम्मू-कश्मीर।
निष्कर्ष: क़ानून था, इच्छाशक्ति नहीं।
1947 के बाद भारत में क्षेत्रवाद भाषायी विशिष्टता जितना ही विकास की आवश्यकताओं से भी उत्पन्न हुआ। स्पष्ट कीजिए।
मॉडल उत्तर (रूपरेखा)
भाषायी: 1950 का दशक, DMK 1965।
विकास-जनित: तेलंगाना, 2000 के राज्य, विदर्भ, शिवसेना, असम, पंजाब।
निष्कर्ष: विकास की राजनीति प्रमुख बनी; संघ ने समायोजन किया।
ट्रेड यूनियन आंदोलन औपनिवेशिक शासन के विरुद्ध संघर्ष में राष्ट्रवादी राजनीति की मुख्यधारा से जुड़ गया, ताकि दोनों एक-दूसरे को मज़बूत कर सकें। टिप्पणी कीजिए।
मॉडल उत्तर (रूपरेखा)
AITUC 1920: लाजपत राय, जोशी।
सुदृढ़ीकरण: असहयोग, TLA, 1928, भारत छोड़ो, RIN 1946।
दमन: 1929 का अधिनियम, मेरठ।
तनाव: वर्ग बनाम राष्ट्र; 1929 की फूट; जनयुद्ध; INTUC।
स्वतंत्रता के बाद भारत की विकास-रणनीति वैचारिक विचारों से नहीं, बल्कि आर्थिक बाध्यताओं से प्रभावित थी। टिप्पणी कीजिए।
मॉडल उत्तर (रूपरेखा)
रणनीति: योजना आयोग, IPR 1956, महालनोबिस।
आर्थिक: पूँजी, बॉम्बे प्लान, विऔद्योगीकरण, विदेशी मुद्रा, रक्षा।
वैचारिक: फ़ेबियन, सोवियत, आवडी, गांधीवाद।
निष्कर्ष: मिश्रित अर्थव्यवस्था दोनों का समझौता।
"भगत सिंह और उनके साथियों ने क्रांति के अर्थ और क्षेत्र का उल्लेखनीय विस्तार किया और उसे केवल राजनीतिक उथल-पुथल से आगे सामाजिक और वैचारिक रूपांतरण के रूप में पुनर्परिभाषित किया।" आलोचनात्मक परीक्षण कीजिए।
मॉडल उत्तर
घटनाक्रम: HSRA, सॉन्डर्स, विधान सभा बम, भूख-हड़ताल, फाँसी।
विस्तार: शोषण का अंत, समाजवाद, धर्मनिरपेक्षता, नास्तिकता, अस्पृश्यता-विरोध, जन-संगठन; "बम का दर्शन"।
निष्कर्ष: कथन सही है।
1935 के भारत सरकार अधिनियम के संघीय प्रावधान रियासतों के हठ की चट्टान से टकराकर विफल हो गए। आलोचनात्मक परीक्षण कीजिए।
मॉडल उत्तर
योजना: प्रांत और रियासतें; विलय-पत्र की शर्त।
हठ: संप्रभुता, सर्वोपरिता, वित्त; कांग्रेस का भय; नरेंद्र मंडल।
अन्य कारण: कांग्रेस और लीग की आपत्तियाँ; युद्ध (1939)।
पाकिस्तान कार्यक्रम की शक्ति उसकी अस्पष्टता थी। इसका अर्थ हर किसी के लिए सब कुछ था। आलोचनात्मक परीक्षण कीजिए।
मॉडल उत्तर
अस्पष्टता: लाहौर प्रस्ताव में "राज्यों"; सीमाएँ अस्पष्ट।
विविध अर्थ: उत्तर प्रदेश के अभिजात, पंजाब के ज़मींदार, बंगाल के किसान, उलेमा।
जलाल: सौदेबाज़ी का साधन।
दुष्परिणाम: कटा-फटा पाकिस्तान, हिंसा।
12. Quick Revision Summary
- गांधी: प्रारंभिक आंदोलन, भारतीयकरण, संघर्ष-विराम-संघर्ष।
- अन्य धाराएँ: भगत सिंह, मज़दूर आंदोलन, वामपंथ, किसान, अंबेडकर।
- संविधान: 1909, 1919, 1935; संघ की विफलता।
- विभाजन: लाहौर प्रस्ताव, अस्पष्टता, कैबिनेट मिशन, 1947।
- राष्ट्र-निर्माण: विलय, भाषायी राज्य, क्षेत्रवाद, जाति-न्याय, भूमि सुधार, विकास-रणनीति।