UPSC Mains · History · Paper I · अध्याय 2

वैदिक काल, महाजनपद एवं मौर्य साम्राज्य

Vedic Age, Mahajanapadas and the Mauryan Empire

आर्य और वैदिक समाज, महापाषाण संस्कृतियाँ; महाजनपद, बौद्ध-जैन धर्म; मौर्य प्रशासन, अशोक का धम्म, कला और अर्थव्यवस्था।

Paper I 22 मिनट

1. अध्याय एक नज़र में

Paper I का यह अध्याय भारत में "राज्य" के जन्म और पहले साम्राज्य की कहानी है:

  • वैदिक काल: आर्यों का विस्तार; धार्मिक और दार्शनिक साहित्य; ऋग्वैदिक से उत्तर वैदिक काल तक राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक परिवर्तन; राजतंत्र और वर्ण-व्यवस्था का विकास।
  • महाजनपद काल: गणराज्य और राजतंत्र; द्वितीय नगरीकरण; व्यापार-मार्ग; सिक्कों की शुरुआत; जैन और बौद्ध धर्म का उदय; मगध और नंदों का उत्कर्ष; ईरानी और मकदूनियाई आक्रमण।
  • मौर्य साम्राज्य: चंद्रगुप्त, कौटिल्य और अर्थशास्त्र; अशोक, धम्म और अभिलेख; प्रशासन, अर्थव्यवस्था, कला; पतन; शुंग और कण्व।

2025 में जैन-बौद्ध धर्म की सामाजिक-आर्थिक जड़ें, क्षेत्रीय गणराज्यों की उत्पत्ति और गंगा-घाटी की भौतिक संस्कृति के प्रसार में मौर्यों की भूमिका पूछी गई। 2024 में बौद्ध संस्थानों, व्यापारियों, श्रेणियों और राजसत्ता का सहजीवी संबंध, मौर्य साम्राज्य में बौद्ध धर्म की भूमिका, और ऋग्वैदिक से उत्तर वैदिक काल तक राज्य और कराधान का विकास आए।

इतिहास: कुरु-पंचाल मानचित्र और शक सिक्के
उत्तर वैदिक काल के कुरु-पंचाल क्षेत्र का मानचित्र और प्राचीन सिक्कों के उदाहरण (NCERT आधारित infographic)।

2. वैदिक काल

आधारऋग्वैदिक काल (लगभग 1500-1000 ई.पू.)उत्तर वैदिक काल (लगभग 1000-600 ई.पू.)
भौगोलिक क्षेत्रसप्त-सिंधु (पंजाब, अफ़ग़ानिस्तान के भाग)गंगा-यमुना दोआब (कुरु-पंचाल); पूर्व में विदेह तक (शतपथ ब्राह्मण में विदेघ माथव की कथा)
पुरातात्विक संस्कृतिस्पष्ट नहीं; गांधार कब्रें और अन्य स्थल चर्चा मेंचित्रित धूसर मृद्भांड (PGW): हस्तिनापुर, अहिच्छत्र, अतरंजीखेड़ा
अर्थव्यवस्थामुख्यतः पशुपालन ("गविष्टि" यानी गायों की खोज, युद्ध का पर्याय); सीमित कृषि (यव)स्थायी कृषि (धान "व्रीहि", गेहूँ); लोहा ("श्याम" या "कृष्ण अयस्"); शिल्प-विशेषीकरण
राजनीतिजनजातीय "जन"; राजन (सीमित सत्ता); सभा, समिति, विदथ; "बलि" स्वैच्छिक भेंटक्षेत्रीय "जनपद" और "राष्ट्र"; राजसूय, वाजपेय, अश्वमेध यज्ञ; "रत्नी"; बलि, भाग और शुल्क नियमित कर बने
समाजवर्ण-भेद प्रारंभिक; पुरुष-सूक्त (दसवाँ मंडल, बाद का अंश); स्त्रियों की अपेक्षाकृत बेहतर स्थिति (सभा में भागीदारी)वर्ण-व्यवस्था कठोर; गोत्र; आश्रम-व्यवस्था; स्त्रियों का सभा से बहिष्कार
धर्मप्रकृति-देवता: इंद्र, अग्नि, वरुण, सोम; सरल यज्ञजटिल कर्मकांड (ब्राह्मण ग्रंथ); प्रजापति, विष्णु, रुद्र; उपनिषदों में ज्ञान-मार्ग (ब्रह्म, आत्मा, कर्म, पुनर्जन्म)
  • साहित्य: चार वेद (ऋग्वेद में 10 मंडल और 1,028 सूक्त), ब्राह्मण, आरण्यक और उपनिषद। वेदांग छह हैं: शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, छंद और ज्योतिष।
  • दाशराज्ञ युद्ध: परुष्णी (रावी) नदी के तट पर भरत जन के राजा सुदास की दस राजाओं पर विजय (ऋग्वेद का सातवाँ मंडल)।
  • आर्यों के प्रश्न पर वर्तमान दृष्टि: "आक्रमण" के बजाय क्रमिक "प्रवासन" का सिद्धांत अधिक स्वीकार्य है। भाषाशास्त्रीय और प्राचीन DNA साक्ष्य (राखीगढ़ी 2019, नरसिम्हन और साथी 2019) से संकेत मिलता है कि सिंधु सभ्यता के लोगों में स्टेपी-वंश नहीं था और वह बाद में आया। इस विषय पर बहस जारी है, इसलिए उत्तर में संतुलित भाषा रखें।

ऋग्वैदिक से उत्तर वैदिक काल तक राज्य और कराधान का विकास (UPSC 2024)

  • ऋग्वैदिक काल: "राजन" जन का मुखिया था, जिसका मुख्य कार्य गायों और जन की रक्षा तथा युद्ध था। उसकी सत्ता सभा, समिति और विदथ जैसी जनजातीय सभाओं से सीमित थी। स्थायी सेना या नौकरशाही नहीं थी। "बलि" स्वैच्छिक भेंट थी, और युद्ध की लूट (गायें) का वितरण होता था। यह "पुनर्वितरण-आधारित" (redistributive) व्यवस्था थी।
  • परिवर्तन के कारण: स्थायी कृषि और लोहे से अधिशेष उत्पादन; क्षेत्रीय बस्तियाँ; जन से जनपद (भूमि से जुड़ी पहचान); और वर्ण-विभाजन, जिससे वैश्य करदाता वर्ग बना।
  • उत्तर वैदिक काल:
    • राजत्व वंशानुगत और दैवीय होने लगा।
    • राजसूय (अभिषेक), वाजपेय (रथ-दौड़) और अश्वमेध (क्षेत्रीय प्रभुत्व) यज्ञों ने राजा की सत्ता को कर्मकांडी वैधता दी, जिसमें पुरोहितों की भूमिका केंद्रीय थी।
    • "रत्नी" (शतपथ ब्राह्मण) अधिकारियों का प्रारंभिक रूप थे: पुरोहित, सेनानी, संग्रहीता (कोषाध्यक्ष), भागदुघ (कर-संग्राहक) आदि।
    • बलि, भाग और शुल्क नियमित कर बन गए, जिनका भार मुख्यतः वैश्यों पर था। ऐतरेय ब्राह्मण में वैश्य को "दूसरे को कर देने वाला" कहा गया।
    • सभा और समिति का महत्व घट गया।
  • सीमा: उत्तर वैदिक काल में भी पूर्ण विकसित "राज्य" नहीं था, क्योंकि स्थायी सेना, नियमित कर-तंत्र और नौकरशाही का अभाव था। रोमिला थापर (From Lineage to State, 1984) के अनुसार यह "वंश-आधारित समाज" से "राज्य" की ओर संक्रमण का चरण था, जो महाजनपद काल में पूरा हुआ।
  • निष्कर्ष: राज्य और कराधान का विकास अर्थव्यवस्था (पशुपालन से कृषि), समाज (वर्ण) और विचारधारा (यज्ञ) के परिवर्तनों का संयुक्त परिणाम था।

3. महाजनपद, द्वितीय नगरीकरण और मगध

  • 16 महाजनपद: बौद्ध ग्रंथ अंगुत्तर निकाय की सूची में ये हैं: अंग, मगध, काशी, कोसल, वज्जि, मल्ल, चेदि, वत्स, कुरु, पंचाल, मत्स्य, शूरसेन, अश्मक (एकमात्र दक्षिणी, गोदावरी तट पर), अवंति, गांधार और कंबोज। जैन ग्रंथ भगवती सूत्र में सूची भिन्न है।
  • दो प्रकार की शासन-पद्धति: राजतंत्र (मगध, कोसल, वत्स, अवंति) और गण-संघ या गणराज्य (वज्जि संघ जिसमें लिच्छवि भी थे, मल्ल, शाक्य, कोलिय, पिप्पलिवन के मोरिय)।
  • द्वितीय नगरीकरण (लगभग 600 ई.पू. से): उत्तरी काली पॉलिशदार मृद्भांड (NBPW); आहत सिक्के (कार्षापण); नगर (राजगृह, श्रावस्ती, कौशांबी, वाराणसी, उज्जयिनी, चंपा); व्यापार-मार्ग (उत्तरापथ और दक्षिणापथ); श्रेणियाँ (शिल्पी संघ); और गृहपति तथा सेट्ठि जैसे नए वर्ग।
इतिहास: प्रारंभिक भारतीय राज्य और अशोक का सिंह-शीर्ष
महाजनपद और प्रारंभिक राज्य का मानचित्र तथा सारनाथ का सिंह-शीर्ष (NCERT आधारित infographic)।

क्षेत्रीय गणराज्यों की उत्पत्ति (UPSC 2025)

  • कथन: गणराज्यों की उत्पत्ति को उत्तर वैदिक काल में विकसित जीवन-शैली की प्रतिक्रिया के रूप में देखा गया है।
  • प्रतिक्रिया-सिद्धांत के तर्क:
    • गणराज्य वंशानुगत राजत्व और खर्चीले ब्राह्मणवादी यज्ञों (राजसूय, अश्वमेध) को अस्वीकार करते थे।
    • सत्ता एक कुल (क्षत्रिय वंश) की सभा ("संथागार") में थी। निर्णय बहुमत से होते थे और "शलाका" (मतदान की लकड़ी) का उपयोग होता था।
    • ब्राह्मणों की भूमिका गौण थी।
    • भौगोलिक रूप से ये हिमालय की तलहटी और गंगा के उत्तर के क्षेत्रों में थे, जो ब्राह्मणवादी केंद्र (कुरु-पंचाल) से दूर थे।
    • बुद्ध (शाक्य) और महावीर (वज्जि संघ के ज्ञातृक कुल) गणराज्यों से आए, यानी ये विरोधी (heterodox) विचारों के भी केंद्र थे।
  • सीमाएँ:
    • गणराज्य "लोकतंत्र" नहीं थे, बल्कि क्षत्रिय कुल का अल्पतंत्र (oligarchy) थे, जिसमें दास और कर्मकार वंचित थे।
    • कुछ गणराज्य ऋग्वैदिक "जन" की सभा-परंपरा की निरंतरता भी माने जाते हैं, केवल प्रतिक्रिया नहीं।
    • पंजाब और उत्तर-पश्चिम के गणराज्य (मालव, क्षुद्रक; सिकंदर के समय) अलग संदर्भ में थे।
    • भौगोलिक कारक (कम उपजाऊ तराई और जंगल, जहाँ बड़े राजतंत्र का संसाधन-आधार नहीं था) भी महत्वपूर्ण थे।
  • निष्कर्ष: गणराज्य वैचारिक प्रतिक्रिया, जनजातीय परंपरा की निरंतरता और भौगोलिक परिस्थितियों का संयुक्त परिणाम थे। अंततः मगध के विस्तार (अजातशत्रु द्वारा वज्जि संघ की पराजय) ने उन्हें समाप्त कर दिया।

जैन और बौद्ध धर्म की सामाजिक-आर्थिक जड़ें (UPSC 2025)

  • कृषि-विस्तार: पूर्वी गंगा मैदान में लोहे के उपकरणों से वन-कटाई और धान की आर्द्र कृषि से अधिशेष उत्पादन हुआ।
  • पशु-संरक्षण की आवश्यकता: कृषि के लिए बैल आवश्यक थे, जबकि वैदिक यज्ञों में पशुबलि होती थी। जैन और बौद्ध धर्म का अहिंसा का उपदेश इस आवश्यकता के अनुकूल था।
  • नगर, व्यापार और मुद्रा: व्यापारी वर्ग (सेट्ठि) और गृहपति धनी हुए, पर ब्राह्मणवादी वर्ण-व्यवस्था में उन्हें निम्न स्थान मिला। धर्मशास्त्र ब्याज (कुसीद) और समुद्र-यात्रा को हीन मानते थे, जबकि बौद्ध धर्म ने व्यापार, ब्याज और संपत्ति का विरोध नहीं किया। अनाथपिंडक जैसे व्यापारियों ने बौद्ध संघ को संरक्षण दिया, और जैन धर्म व्यापारी समुदायों में फैला।
  • सामाजिक असंतोष: वर्ण-कठोरता के प्रति असंतोष, क्षत्रिय और ब्राह्मण के बीच प्रतिस्पर्धा (बुद्ध और महावीर दोनों क्षत्रिय थे), और नगरीय जीवन की असुरक्षा तथा दुःख।
  • वैचारिक चुनौती: वेदों की प्रामाणिकता, यज्ञ और ईश्वर-केंद्रित कर्मकांड का अस्वीकार; कर्म का नैतिक सिद्धांत; मध्यम मार्ग (बौद्ध) और अनेकांतवाद (जैन); और सरल लोकभाषाएँ (पालि, प्राकृत)।
  • इतिहासलेखन: आर.एस. शर्मा (भौतिक आधार), उमा चक्रवर्ती (The Social Dimensions of Early Buddhism, 1987) और रोमिला थापर।
  • सीमा: केवल आर्थिक व्याख्या अधूरी है। आध्यात्मिक खोज, उपनिषदों की परंपरा और श्रमण आंदोलन की व्यापक परंपरा (आजीविक, चार्वाक) भी कारण थे।
  • निष्कर्ष: इन धर्मों का उदय "नए समाज के लिए नई विचारधारा" था, यानी कृषि, नगर और व्यापार की नई दुनिया की नैतिक भाषा।
  • मगध का उत्कर्ष: हर्यक वंश (बिंबिसार, अजातशत्रु), शिशुनाग वंश और नंद वंश (महापद्म नंद, जिन्हें "सर्वक्षत्रांतक" और "एकराट्" कहा गया)। उत्कर्ष के कारण: उपजाऊ भूमि, लौह-अयस्क (छोटानागपुर के निकट), हाथी (पूर्वी वनों से), प्राकृतिक दुर्ग (राजगृह की पाँच पहाड़ियाँ; पाटलिपुत्र का नदियों से घिरा "जलदुर्ग"), व्यापार-मार्गों पर नियंत्रण (गंगा), और महत्वाकांक्षी शासक।
  • ईरानी आक्रमण: दारा प्रथम (लगभग 518 ई.पू.) ने गांधार और सिंधु क्षेत्र को हख़ामनी साम्राज्य का प्रांत (क्षत्रपी) बनाया। इसके प्रभाव: खरोष्ठी लिपि (अरामाइक से विकसित), प्रशासनिक विचार और कला पर प्रभाव (अशोक के अभिलेखों की शैली और स्तंभ-शीर्ष पर चर्चा)।
  • सिकंदर का आक्रमण (326 ई.पू.): झेलम (हाइडेस्पीज़) के युद्ध में पोरस (पुरु) से संघर्ष हुआ; ब्यास (हाइफ़ेसिस) नदी पर उसकी सेना ने आगे बढ़ने से मना कर दिया। प्रभाव: उत्तर-पश्चिम के छोटे राज्यों का कमज़ोर होना (जिससे चंद्रगुप्त को अवसर मिला), स्थल और समुद्री मार्गों का ज्ञान, और यूनानी बस्तियाँ। इसका दीर्घकालिक सांस्कृतिक प्रभाव गांधार कला पर बाद में (हिंद-यवनों के माध्यम से) दिखा।

4. मौर्य साम्राज्य

  • चंद्रगुप्त मौर्य (लगभग 321-297 ई.पू.): नंदों का अंत किया। सेल्यूकस से संधि (लगभग 305-303 ई.पू.) में अराकोसिया (कंधार), गेड्रोसिया (बलूचिस्तान) और पैरोपेमिसडे (काबुल) प्राप्त किए और 500 हाथी दिए। मेगस्थनीज़ उसके दरबार में दूत था। जैन परंपरा के अनुसार उसने अंत में श्रवणबेलगोला में संलेखना ली।
  • बिंदुसार: "अमित्रघात"; यूनानी स्रोतों में "अमित्रोकेटस"। आजीविक संप्रदाय से उसका संबंध बताया जाता है।
  • अशोक (लगभग 268-232 ई.पू.): राज्याभिषेक के आठवें वर्ष (लगभग 261 ई.पू.) में कलिंग युद्ध हुआ। तेरहवें बृहद शिलालेख के अनुसार 1.5 लाख लोग बंदी बनाए गए और 1 लाख मारे गए। इसके बाद "धम्म-विजय" की नीति अपनाई गई।
  • कौटिल्य का अर्थशास्त्र: सप्तांग सिद्धांत (स्वामी, अमात्य, जनपद, दुर्ग, कोष, दंड, मित्र); मंडल सिद्धांत; गुप्तचर-तंत्र। इसकी रचना-तिथि पर बहस है: टॉमस ट्राउटमान के सांख्यिकीय विश्लेषण के अनुसार वर्तमान पाठ अनेक लेखकों का है और बाद की शताब्दियों में संकलित हुआ। इसलिए इसे मौर्य प्रशासन का "प्रत्यक्ष विवरण" मानने में सावधानी आवश्यक है।
इतिहास: पूरे भारत में अशोक के अभिलेख
अशोक के बृहद शिलालेख, लघु शिलालेख और स्तंभ-लेखों का वितरण मानचित्र (NCERT आधारित infographic)।

अशोक के अभिलेख और धम्म

प्रकारस्थलमुख्य बात
14 बृहद शिलालेखगिरनार, कालसी, शाहबाज़गढ़ी और मानसेहरा (खरोष्ठी में), धौली और जौगड़ (कलिंग; 11-13 के स्थान पर पृथक कलिंग अभिलेख), सोपारा, एर्रागुडी, सन्नतिधम्म, पशुबलि-निषेध, धम्म-महामात्र (पाँचवाँ लेख), कलिंग युद्ध (तेरहवाँ लेख)
लघु शिलालेखमास्की, गुज्जर्रा, निट्टूर, उडेगोलम (इन चारों में "अशोक" नाम मिलता है), ब्रह्मगिरि, रूपनाथ, सासाराम, बैराटबौद्ध धर्म से व्यक्तिगत जुड़ाव
7 स्तंभ-लेखदिल्ली-टोपरा (सातों लेख), दिल्ली-मेरठ, लौरिया-नंदनगढ़, रामपुरवा, इलाहाबाद-कौशांबीधम्म-नीति का सारांश
लघु स्तंभ-लेखलुंबिनी (रुम्मिनदेई), सारनाथ, साँचीलुंबिनी में "बलि" से छूट और "भाग" घटाकर आठवाँ हिस्सा; संघ-भेद के विरुद्ध चेतावनी
द्विभाषीकंधार (यूनानी और अरामाइक)उत्तर-पश्चिम में बहुसांस्कृतिक जनता
  • धम्म का स्वरूप: बौद्ध धर्म का प्रचार नहीं, बल्कि एक नैतिक संहिता: माता-पिता और गुरुजनों का आदर, दासों और सेवकों से उचित व्यवहार, अहिंसा, सहिष्णुता (बारहवें बृहद शिलालेख में "वचोगुप्ति", यानी दूसरे संप्रदायों की निंदा न करना), दान और संयम।
  • धम्म के उद्देश्य: रोमिला थापर (Asoka and the Decline of the Mauryas, 1961) के अनुसार यह विविधतापूर्ण साम्राज्य को जोड़ने वाली "राजनीतिक-सामाजिक विचारधारा" थी, यानी नैतिकता के माध्यम से शासन।

मौर्य साम्राज्य में बौद्ध धर्म की भूमिका (UPSC 2024)

  • राजकीय संरक्षण: अशोक स्वयं उपासक बना (भाब्रू अभिलेख में बुद्ध, धम्म और संघ के प्रति आस्था); तीसरी बौद्ध संगीति पाटलिपुत्र में मोग्गलिपुत्त तिस्स की अध्यक्षता में हुई; श्रीलंका (महेंद्र और संघमित्रा), सुवर्णभूमि और गांधार में धर्म-प्रचारक भेजे गए।
  • सामाजिक-धार्मिक परिदृश्य पर प्रभाव:
    • पशुबलि और "समाज" (उत्सवों) पर प्रतिबंध से ब्राह्मणवादी कर्मकांड को चुनौती मिली।
    • स्तूपों का निर्माण (परंपरा के अनुसार 84,000 स्तूप) और तीर्थ-स्थलों का विकास (लुंबिनी, बोधगया, सारनाथ, कुशीनगर)।
    • नैतिकता-आधारित नागरिक जीवन; मनुष्यों और पशुओं के लिए चिकित्सा, कुएँ और छायादार वृक्ष (दूसरा बृहद शिलालेख)।
    • प्राकृत भाषा और ब्राह्मी लिपि के माध्यम से जन-संपर्क।
  • सीमाएँ और संतुलन: अशोक ने ब्राह्मणों और श्रमणों दोनों के प्रति आदर का निर्देश दिया और आजीविकों को बराबर गुफ़ाएँ दान कीं। इसलिए यह "राजधर्म" नहीं, बल्कि बहु-धार्मिक सहिष्णुता थी। ब्राह्मणवादी असंतोष भी शायद बढ़ा (हरप्रसाद शास्त्री के "ब्राह्मण प्रतिक्रिया" सिद्धांत पर बहस है)।
  • निष्कर्ष: बौद्ध धर्म ने मौर्य काल में धर्म को "व्यक्तिगत मोक्ष" से "सामाजिक नैतिकता" की ओर मोड़ा और उसे एशिया-व्यापी धर्म बनने का आधार दिया।
इतिहास: भारत के प्रमुख बौद्ध स्थल
प्रमुख बौद्ध स्थल: लुंबिनी, बोधगया, सारनाथ, कुशीनगर, साँची, अजंता और अन्य (NCERT आधारित मानचित्र)।

बौद्ध संस्थान, व्यापारी, श्रेणियाँ और राजसत्ता का सहजीवी संबंध (UPSC 2024)

  • भौगोलिक साक्ष्य: बौद्ध विहार और स्तूप व्यापार-मार्गों पर स्थित थे: साँची (विदिशा के पास, दक्षिणापथ पर), भरहुत, और पश्चिमी घाट की गुफ़ाएँ (कार्ले, भाजा, नासिक, कन्हेरी, जुन्नार), जो दक्कन के पठार को सोपारा और कल्याण जैसे बंदरगाहों से जोड़ने वाले दर्रों पर थीं।
  • व्यापारियों और श्रेणियों का दान: साँची और भरहुत के दान-अभिलेखों में व्यापारियों, शिल्पियों और श्रेणियों के नाम हैं; साँची के तोरण पर विदिशा के हाथी-दाँत कारीगरों का अभिलेख है। कार्ले के चैत्य में भी व्यापारियों के दान दर्ज हैं।
  • विहारों की आर्थिक भूमिका: यात्रियों के लिए विश्राम-स्थल, भंडार, ऋण और "अक्षय-नीवी" (स्थायी निधि, जिसका ब्याज विहार को मिलता था; नासिक के अभिलेख)। विहारों ने लेखन, मानक माप और व्यापारिक नैतिकता का प्रसार भी किया।
  • राजकीय भूमिका: अशोक और बाद में सातवाहन तथा कुषाण शासकों ने भूमि, ग्राम और कर-छूट के दान दिए। बदले में संघ ने राजत्व को नैतिक वैधता दी।
  • वैचारिक आधार: बौद्ध धर्म में दान को पुण्य और धन को नैतिक माना गया (यदि सदाचार से अर्जित हो), जिससे व्यापारियों का धर्म से सहज संबंध बना।
  • इतिहासलेखन: हिमांशु प्रभा रे की "Monastery and Guild" (1986) इस सहजीवी संबंध पर केंद्रित प्रमुख अध्ययन है।
  • निष्कर्ष: मौर्य और मौर्योत्तर काल में धर्म, अर्थव्यवस्था और राजनीति एक-दूसरे को पोषित करने वाले तीन स्तंभ थे।

5. मौर्य प्रशासन, अर्थव्यवस्था, भौतिक संस्कृति और कला

  • प्रशासन: राजा, मंत्रिपरिषद, और अध्यक्ष (विभागाध्यक्ष, अर्थशास्त्र के अनुसार); समाहर्ता (राजस्व संग्रह) और सन्निधाता (कोषाध्यक्ष); प्रांत (तक्षशिला, उज्जयिनी, तोसली, सुवर्णगिरि, और केंद्र में पाटलिपुत्र), जिनके शासक "कुमार" या "आर्यपुत्र" थे; और राजुक तथा युक्त जैसे अधिकारी। मेगस्थनीज़ के अनुसार नगर-प्रशासन में पाँच-पाँच सदस्यों की छह समितियाँ थीं।
  • केंद्रीकरण की बहस: पहले इसे अत्यधिक केंद्रीकृत साम्राज्य माना गया। रोमिला थापर ने बाद में (The Mauryas Revisited, 1987) "महानगरीय क्षेत्र, केंद्रीय क्षेत्र और परिधि" का मॉडल दिया, यानी नियंत्रण का स्तर अलग-अलग क्षेत्रों में भिन्न था।
  • अर्थव्यवस्था: राज्य के कृषि-फ़ार्म (सीता भूमि), भाग (उपज का हिस्सा; सामान्यतः छठा भाग, पर भिन्नता), सिंचाई (जूनागढ़ अभिलेख के अनुसार चंद्रगुप्त के प्रांतपाल पुष्यगुप्त ने सुदर्शन झील बनवाई), खनन पर राज्य का एकाधिकार, आहत सिक्के, व्यापार, और सोहगौरा ताम्रपत्र (गोरखपुर; अकाल-राहत के लिए अन्नागार)।

गंगा-घाटी की भौतिक संस्कृति का प्रसार (UPSC 2025)

  • प्रसारित तत्व: लोहे के उपकरण, धान की आर्द्र कृषि, NBPW मृद्भांड, पकी ईंटें, वलय-कूप (ring wells), आहत सिक्के, ब्राह्मी लिपि (लेखन) और नगरीय जीवन।
  • मौर्यों की भूमिका:
    • प्रांतीय राजधानियाँ (तोसली, सुवर्णगिरि, उज्जयिनी) और प्रशासनिक केंद्र नई "नगरीय चौकियाँ" बने।
    • अभिलेखों का पूरे उपमहाद्वीप में वितरण साक्षरता और लेखन का प्रसार दिखाता है।
    • सड़कें (उत्तरापथ; पाटलिपुत्र से तक्षशिला) और व्यापार।
    • सैनिक और प्रशासनिक बस्तियाँ।
    • उदाहरण: कलिंग में शिशुपालगढ़ और बंगाल में महास्थानगढ़ (जहाँ मौर्य-कालीन अभिलेख मिला है)।
  • आर.एस. शर्मा का तर्क: मौर्यों ने गंगा-घाटी की भौतिक संस्कृति को कलिंग, आंध्र और कर्नाटक तक पहुँचाया, जिससे बाद में वहाँ स्थानीय राज्य (सातवाहन, चेदि) बने।
  • सीमाएँ:
    • दक्षिण भारत में महापाषाणीय लौह संस्कृति पहले से थी, यानी लोहा मौर्यों से नहीं आया।
    • अनेक क्षेत्रों में मौर्य उपस्थिति केवल अभिलेखों तक सीमित थी।
    • प्रसार में व्यापारियों और बौद्ध संघ की भूमिका भी थी।
    • स्थानीय संस्कृतियों ने सक्रिय रूप से नए तत्वों को अपनाया और बदला।
  • निष्कर्ष: मौर्यों ने प्रसार को "गति और दिशा" दी, पर वे इसके एकमात्र कारक नहीं थे। यह एक "द्वि-मार्गी" सांस्कृतिक प्रक्रिया थी।
  • मौर्य कला:
    • राजकीय कला: चुनार के बलुआ पत्थर के एकाश्म स्तंभ, जिन पर दर्पण जैसी चमकदार पॉलिश ("मौर्य पॉलिश") है, और उनके पशु-शीर्ष: सारनाथ का सिंह-शीर्ष (26 जनवरी 1950 से राष्ट्रीय प्रतीक) और रामपुरवा का बैल।
    • शैलकृत गुफ़ाएँ: बराबर (लोमस ऋषि; आजीविकों को दान) और नागार्जुनी पहाड़ियाँ।
    • लोक कला: यक्ष-यक्षी (दीदारगंज यक्षी; इसकी तिथि पर बहस है), धौली का हाथी।
    • स्तूप: साँची और भरहुत का मूल केंद्र (बाद में शुंगों द्वारा विस्तार)।
    • ईरानी प्रभाव की बहस: घंटाकार शीर्ष और पॉलिश में हख़ामनी (पर्सेपोलिस) प्रभाव माना जाता है, पर स्तंभों में आधार का अभाव और पशु-आकृतियों का भारतीय स्वरूप स्थानीय विशेषताएँ हैं।
  • पतन के कारण: ब्राह्मण प्रतिक्रिया (हरप्रसाद शास्त्री; विवादित), अशोक की शांतिवादी नीति (हेमचंद्र रायचौधरी), आर्थिक संकट (कोसांबी; सिक्कों में मिलावट), कमज़ोर उत्तराधिकारी, विशाल साम्राज्य का अति-केंद्रीकरण, और थापर के अनुसार राज्य के बजाय व्यक्तिगत राजा के प्रति निष्ठा। लगभग 185 ई.पू. में पुष्यमित्र शुंग ने अंतिम मौर्य शासक बृहद्रथ की हत्या की।

6. Master Summary Table

विषयमुख्य तथ्ययाद रखें
ऋग्वेद10 मंडल, 1,028 सूक्त; दाशराज्ञ युद्धसभा, समिति, विदथ; बलि स्वैच्छिक
उत्तर वैदिकPGW, लोहा, कुरु-पंचालरत्नी, राजसूय, अश्वमेध
महाजनपद16 (अंगुत्तर निकाय); अश्मक दक्षिण मेंNBPW, आहत सिक्के
गणराज्यवज्जि, मल्ल, शाक्यसंथागार, शलाका
जैन और बौद्ध धर्मकृषि, नगर, व्यापार, अहिंसाउमा चक्रवर्ती 1987
आक्रमणदारा लगभग 518 ई.पू.; सिकंदर 326 ई.पू.खरोष्ठी; झेलम और ब्यास
चंद्रगुप्तसेल्यूकस संधि; मेगस्थनीज़सुदर्शन झील
अशोककलिंग लगभग 261 ई.पू.; 14 बृहद शिलालेखतेरहवाँ लेख: कलिंग; बारहवाँ: सहिष्णुता
प्रशासन5 प्रांत; थापर का मॉडलसमाहर्ता, सन्निधाता
कलाचुनार के स्तंभ, मौर्य पॉलिशसिंह-शीर्ष: राष्ट्रीय प्रतीक
पतन185 ई.पू.: पुष्यमित्र शुंगशास्त्री, रायचौधरी, कोसांबी, थापर

7. चार्ट: मौर्य साम्राज्य के प्रांतीय केंद्र (सरलीकृत)

पाटलिपुत्र (राजधानी) तक्षशिला (उत्तरापथ) उज्जयिनी (अवंति) तोसली (कलिंग) सुवर्णगिरि (दक्षिणापथ) रेखाएँ प्रशासनिक संबंध दर्शाती हैं, वास्तविक मार्ग नहीं; सीमा सांकेतिक है
मौर्य प्रशासन: पाटलिपुत्र से संचालित चार प्रमुख प्रांतीय राजधानियाँ, जो कुमार या आर्यपुत्र के अधीन थीं (स्थितियाँ सांकेतिक)।

8. Mind Map

वैदिक से मौर्य तक
वैदिक
  • ऋग्वैदिक बनाम उत्तर वैदिक
  • राज्य और कर का विकास
महाजनपद
  • गणराज्य, राजतंत्र
  • द्वितीय नगरीकरण
नए धर्म
  • सामाजिक-आर्थिक जड़ें
  • संघ और व्यापार
मगध
  • उत्कर्ष के कारण
  • ईरानी और यूनानी आक्रमण
मौर्य
  • अशोक, धम्म, अभिलेख
  • प्रशासन, प्रसार, कला, पतन

9. महत्वपूर्ण One-liners

  • दाशराज्ञ युद्ध: परुष्णी (रावी) नदी के तट पर।
  • उत्तर वैदिक काल का मृद्भांड: चित्रित धूसर मृद्भांड (PGW)।
  • एकमात्र दक्षिणी महाजनपद: अश्मक।
  • "सर्वक्षत्रांतक": महापद्म नंद।
  • खरोष्ठी लिपि का स्रोत: अरामाइक।
  • सुदर्शन झील: पुष्यगुप्त (चंद्रगुप्त का प्रांतपाल)।
  • कलिंग युद्ध का वर्णन: तेरहवाँ बृहद शिलालेख।
  • "अशोक" नाम वाला लघु शिलालेख: मास्की (तथा गुज्जर्रा, निट्टूर, उडेगोलम)।
  • कर-छूट का लघु स्तंभ-लेख: लुंबिनी (रुम्मिनदेई)।
  • "Monastery and Guild" (1986): हिमांशु प्रभा रे।

10. टिप्स एवं ट्रिक्स

वैदिक-मौर्य उत्तर
  • "विकास" वाले प्रश्नों में तालिका (ऋग्वैदिक बनाम उत्तर वैदिक) बनाएँ।
  • अशोक के प्रश्नों में अभिलेख और उसकी संख्या का उल्लेख करें, जैसे तेरहवाँ और बारहवाँ बृहद शिलालेख।
  • इतिहासकारों के नाम दें: आर.एस. शर्मा, रोमिला थापर, उमा चक्रवर्ती, हिमांशु प्रभा रे। 2025 के प्रश्न "कथन के परीक्षण" वाले थे।
याद रखने की तरकीब

सप्तांग: "स्वा-अ-ज-दु-को-दं-मि" (स्वामी, अमात्य, जनपद, दुर्ग, कोष, दंड, मित्र)। मौर्य प्रांत: "त-उ-तो-सु"।

11. PYQ-आधारित प्रश्न एवं मॉडल उत्तर

Q1UPSC 2025 · Paper I · 2(c)

"जैन और बौद्ध धर्म द्वारा प्रस्तुत वैचारिक चुनौती की जड़ें पूर्वी भारत में कृषि बस्तियों के विस्तार से उत्पन्न सामाजिक-आर्थिक परिवर्तनों में थीं।" स्पष्ट कीजिए।

मॉडल उत्तर (रूपरेखा)

पृष्ठभूमि: लोहा, धान, अधिशेष; मध्य गंगा मैदान।

सामाजिक-आर्थिक परिवर्तन: नगर, व्यापार, सिक्के; गृहपति और सेट्ठि; बैलों का महत्व।

वैचारिक चुनौती: यज्ञ और पशुबलि का विरोध; वर्ण-कठोरता का विरोध; ब्याज और व्यापार का समर्थन; लोकभाषा।

इतिहासलेखन: आर.एस. शर्मा, उमा चक्रवर्ती, थापर।

सीमा: आध्यात्मिक खोज और श्रमण परंपरा भी कारण थीं।

निष्कर्ष: "नए समाज के लिए नई नैतिकता"; कथन मुख्यतः सही है।

Q2UPSC 2025 · Paper I · 3(a)

"क्षेत्रीय गणराज्यों की उत्पत्ति को उत्तर वैदिक काल में विकसित जीवन-शैली की प्रतिक्रिया के रूप में देखा गया है।" विश्लेषण कीजिए।

मॉडल उत्तर (रूपरेखा)

गणराज्य: वज्जि, मल्ल, शाक्य; संथागार, शलाका।

प्रतिक्रिया के तर्क: वंशानुगत राजत्व और यज्ञ का अस्वीकार; ब्राह्मणों की गौण भूमिका; भौगोलिक दूरी; विरोधी विचारों के केंद्र।

सीमाएँ: क्षत्रिय अल्पतंत्र; जनजातीय सभा-परंपरा की निरंतरता; उत्तर-पश्चिम के गणराज्य; भौगोलिक कारक।

अंत: मगध का विस्तार।

निष्कर्ष: अनेक कारणों की उपज; "प्रतिक्रिया" एक महत्वपूर्ण पर अधूरी व्याख्या है।

Q3UPSC 2025 · Paper I · 3(b)

मौर्यों ने गंगा के मैदानों की भौतिक संस्कृति के प्रसार को कहाँ तक सुगम बनाया? स्पष्ट कीजिए।

मॉडल उत्तर (रूपरेखा)

भौतिक संस्कृति: लोहा, धान, NBPW, पकी ईंट, वलय-कूप, सिक्के, लेखन।

मौर्यों की भूमिका: प्रांतीय राजधानियाँ, अभिलेख, सड़कें, व्यापार, शिशुपालगढ़, महास्थानगढ़; आर.एस. शर्मा का तर्क।

सीमाएँ: महापाषाणीय लोहा पहले से; सीमित उपस्थिति; व्यापारियों और संघ की भूमिका; स्थानीय सक्रियता।

मानचित्र: अभिलेखों का वितरण।

निष्कर्ष: मौर्यों ने प्रसार को गति दी, पर वे एकमात्र कारक नहीं थे।

Q4UPSC 2024 · Paper I · 3(a)

बौद्ध संस्थानों, व्यापारियों, शिल्पी श्रेणियों और राजकीय समर्थन के सहजीवी संबंधों ने मौर्य और मौर्योत्तर काल में धर्म, अर्थव्यवस्था और राजनीति को निकट ला दिया। परीक्षण कीजिए।

मॉडल उत्तर (रूपरेखा)

भौगोलिक साक्ष्य: व्यापार-मार्गों पर विहार; साँची, भरहुत, पश्चिमी घाट की गुफ़ाएँ।

दान: व्यापारी, श्रेणियाँ (विदिशा के हाथी-दाँत कारीगर), कार्ले।

आर्थिक भूमिका: अक्षय-नीवी, विश्राम-स्थल, ऋण।

राजकीय भूमिका: अशोक, सातवाहन, कुषाण; वैधता का आदान-प्रदान।

वैचारिक आधार: दान और धन के प्रति बौद्ध दृष्टि।

इतिहासलेखन: हिमांशु प्रभा रे।

निष्कर्ष: कथन पूरी तरह सही है।

Q5UPSC 2024 · Paper I · 3(b)

मौर्य साम्राज्य के सामाजिक-धार्मिक परिदृश्य को आकार देने में बौद्ध धर्म की भूमिका की विवेचना कीजिए।

मॉडल उत्तर (रूपरेखा)

राजकीय संरक्षण: भाब्रू अभिलेख, तीसरी संगीति, धर्म-प्रचारक।

प्रभाव: पशुबलि पर निषेध, स्तूप और तीर्थ, नैतिक नागरिकता, लोकभाषा और ब्राह्मी।

संतुलन: धम्म बनाम बौद्ध धर्म; आजीविकों को दान; ब्राह्मणों और श्रमणों का आदर।

बहस: ब्राह्मण प्रतिक्रिया।

निष्कर्ष: धर्म का व्यक्तिगत मोक्ष से सामाजिक नैतिकता की ओर मोड़।

Q6UPSC 2024 · Paper I · 3(c)

ऋग्वैदिक काल से उत्तर वैदिक काल तक राज्य-संस्था और कराधान प्रणाली के विकास की विवेचना कीजिए।

मॉडल उत्तर (रूपरेखा)

ऋग्वैदिक: जन, राजन, सभाएँ, स्वैच्छिक बलि, लूट का पुनर्वितरण।

परिवर्तन के कारण: कृषि, लोहा, जनपद, वर्ण।

उत्तर वैदिक: वंशानुगत और दैवीय राजत्व; यज्ञ; रत्नी; बलि, भाग और शुल्क अनिवार्य; वैश्य करदाता; सभाओं का पतन।

सीमा: पूर्ण राज्य नहीं; थापर का "वंश से राज्य"।

निष्कर्ष: अर्थव्यवस्था, समाज और विचारधारा का संयुक्त परिणाम।

Q7अभ्यास प्रश्न · 15 अंक

अशोक का धम्म बौद्ध धर्म का प्रचार था या एक राजनीतिक विचारधारा? विवेचना कीजिए।

मॉडल उत्तर (रूपरेखा)

बौद्ध धर्म के पक्ष में: भाब्रू, संगीति, स्तूप, धर्म-प्रचारक।

राजनीतिक विचारधारा के पक्ष में: नैतिक संहिता; सहिष्णुता (बारहवाँ लेख); धम्म-महामात्र; विविध साम्राज्य को जोड़ना (थापर)।

निष्कर्ष: व्यक्तिगत आस्था बौद्ध थी, पर राजनीतिक धम्म सार्वभौमिक नैतिकता था।

12. Quick Revision Summary

परीक्षा से पहले एक बार ज़रूर पढ़ें
  • वैदिक: साहित्य; ऋग्वैदिक और उत्तर वैदिक की तुलना; राज्य और कराधान का विकास; आर्यों के प्रश्न पर संतुलित दृष्टि।
  • महाजनपद: 16 महाजनपद; गणराज्यों की उत्पत्ति; द्वितीय नगरीकरण; मगध के उत्कर्ष के कारण।
  • नए धर्म: सामाजिक-आर्थिक जड़ें; व्यापारियों और श्रेणियों से संबंध।
  • आक्रमण: दारा, सिकंदर और उनके प्रभाव।
  • मौर्य: चंद्रगुप्त, अर्थशास्त्र (तिथि पर बहस), अशोक के अभिलेख, धम्म, प्रशासन, भौतिक संस्कृति का प्रसार, कला, पतन।