1. अध्याय एक नज़र में
Paper II के खंड B का दूसरा भाग, यानी बीसवीं शताब्दी का विश्व:
- विश्वयुद्ध और उनका प्रभाव: प्रथम विश्वयुद्ध और विचार-जगत पर उसका प्रभाव; युद्धों के बीच का संकट; फ़ासीवाद और नाज़ीवाद; द्वितीय विश्वयुद्ध की वैश्विकता।
- क्रांति और प्रति-क्रांति: रूसी क्रांति, चीनी क्रांति और भूमि सुधार, और उपनिवेशों के प्रति सोवियत तथा चीनी दृष्टि।
- शीत युद्ध: दो शक्ति-गुट और विकास के दो मॉडल; गोर्बाचेव के सुधार; 1989 की क्रांतियाँ और सोवियत संघ का विघटन।
- विऔपनिवेशीकरण और अल्पविकास: वियतनाम (हो ची मिन्ह), दक्षिण अफ़्रीका (रंगभेद), और लैटिन अमेरिका (नव-साम्राज्यवाद)।
- यूरोप का एकीकरण: यूरोपीय कोयला और इस्पात समुदाय (ECSC) से यूरोपीय संघ (EU) तक।
2025 में प्रथम विश्वयुद्ध और चिंतन पर प्रभाव, उपनिवेशों के समाजवादी खेमे में जाने का सोवियत और चीनी विश्वास, 1932 का जर्मनी, गोर्बाचेव के सुधार, वियतनाम के गैर-कम्युनिस्ट नेताओं की विफलता, EEC के मुक्त व्यापार से EU तक, और जर्मनी में वैज्ञानिक शिक्षा और उद्योग पूछे गए। 2024 में चीन का भूमि सुधार, 1989 की क्रांतियाँ, फ़ासीवाद का उदय, द्वितीय विश्वयुद्ध की वैश्विकता, यूरोपीय आर्थिक एकीकरण के चरण, रंगभेद, दो गुट और विकास के दो मॉडल, लैटिन अमेरिका का अल्पविकास, और हो ची मिन्ह आए।

2. प्रथम विश्वयुद्ध और युद्धों के बीच का संकट
- कारण: सैन्यवाद, गुटबंदी (त्रिगुट बनाम त्रि-सहमति), साम्राज्यवादी प्रतिस्पर्धा, बाल्कन राष्ट्रवाद, और तात्कालिक कारण: 28 जून 1914 को साराजेवो में आर्चड्यूक फ़्रांज़ फ़र्डिनेंड की हत्या।
- परिणाम: वर्साय की संधि (1919; जर्मनी पर युद्ध-अपराध का अनुच्छेद 231 और क्षतिपूर्ति), चार साम्राज्यों (जर्मन, ऑस्ट्रियाई, उस्मानी, रूसी) का अंत, राष्ट्र संघ (1920), और विल्सन के 14 सूत्र (1918) तथा "आत्मनिर्णय"।
प्रथम विश्वयुद्ध और चिंतन के तरीक़े (UPSC 2025)
- प्रगति और तर्क में विश्वास का टूटना: उन्नीसवीं शताब्दी का "निरंतर प्रगति" का आशावाद खंदकों (trenches) के नरसंहार में ढह गया (सोम्म, 1916)। ओसवाल्ड स्पेंगलर ने "The Decline of the West" (1918) लिखी।
- साहित्य और कला: "खोई हुई पीढ़ी"; विल्फ़्रेड ओवेन की युद्ध-कविताएँ; एरिक मारिया रेमार्क का "All Quiet on the Western Front" (1929); टी.एस. एलियट का "The Waste Land" (1922); दादावाद और आधुनिकतावाद, यानी परंपरा से विद्रोह।
- मनोविज्ञान: "शेल-शॉक"; फ़्रायड का "Beyond the Pleasure Principle" (1920) और "मृत्यु-प्रवृत्ति" की अवधारणा।
- राजनीतिक विचार: उदार लोकतंत्र पर अविश्वास और चरम विचारधाराओं का उदय (1917 का बोल्शेविज़्म, फ़ासीवाद); शांतिवाद और अंतरराष्ट्रीयतावाद (राष्ट्र संघ); और "आत्मनिर्णय" का विचार, जिसने उपनिवेशों में राष्ट्रवाद को प्रेरित किया (भारत, मिस्र, चीन का चार मई आंदोलन 1919)।
- सामाजिक: युद्ध-कार्य में स्त्रियों की भागीदारी से मताधिकार (ब्रिटेन, 1918); "सर्वांगीण युद्ध" (total war) से राज्य की भूमिका का विस्तार; और पुराने अभिजात वर्ग की प्रतिष्ठा का पतन।
- निष्कर्ष: प्रथम विश्वयुद्ध ने बीसवीं शताब्दी की "मानसिकता" को जन्म दिया: संशय, विखंडन और विचारधाराओं का टकराव। एरिक हॉब्सबॉम ने इसी कारण "लघु बीसवीं शताब्दी" (1914-1991) की बात की।
युद्ध के बाद का यूरोप और फ़ासीवाद का उदय (UPSC 2024)
- अनुकूल परिस्थितियाँ:
- आर्थिक: युद्ध-ऋण, बेरोज़गारी, जर्मनी की अति-मुद्रास्फीति (1923) और महामंदी (1929)।
- सामाजिक: बेरोज़गार पूर्व-सैनिक, मध्य वर्ग में असुरक्षा, और बोल्शेविज़्म का भय (इटली का "लाल दो वर्ष" 1919-20, जिसमें कारख़ानों पर मज़दूरों का कब्ज़ा हुआ)।
- राजनीतिक: नए और कमज़ोर लोकतंत्र (वाइमार गणराज्य); आनुपातिक प्रतिनिधित्व से अस्थिर गठबंधन।
- राष्ट्रवादी आक्रोश: इटली की "अधूरी विजय" और जर्मनी में वर्साय का "अपमान"।
- वैचारिक: उदारवाद और मार्क्सवाद, दोनों के विरुद्ध "तीसरा मार्ग"; अधिनायक नेतृत्व की लालसा।
- इटली: मार्च ऑन रोम (अक्टूबर 1922) के बाद राजा ने मुसोलिनी को प्रधानमंत्री बनाया; 1925-26 तक तानाशाही स्थापित हुई।
- "अद्वितीय रूप से अनुकूल" कहने की सीमा: ब्रिटेन और फ़्रांस में भी संकट था, पर वहाँ लोकतंत्र टिका रहा, क्योंकि उनकी लोकतांत्रिक परंपराएँ पुरानी थीं और वे "विजेता" थे। इसलिए परिस्थितियों के साथ-साथ राष्ट्रीय इतिहास और अभिजात वर्ग के चुनाव भी निर्णायक थे।
1932 का जर्मनी: शासक वर्ग और अधिनायकवाद (UPSC 2025)
- संकट: 1932 तक बेरोज़गारी लगभग 60 लाख तक पहुँच गई। 1930-32 में चांसलर ब्रूनिंग ने संसद के बिना, वाइमार संविधान के अनुच्छेद 48 के अंतर्गत राष्ट्रपति के आदेशों से शासन किया।
- चुनाव: जुलाई 1932 में नाज़ी पार्टी को लगभग 37% मत मिले और वह सबसे बड़ी पार्टी बनी; नवंबर 1932 में मत घटकर लगभग 33% रह गए, जबकि कम्युनिस्टों (KPD) के मत बढ़े।
- शासक वर्ग की भूमिका:
- भूस्वामी यंकर, सेना, कुछ बड़े उद्योगपति और रूढ़िवादी राजनेता (फ़ॉन पापेन, हिंडनबर्ग का दरबार) लोकतंत्र, ट्रेड यूनियनों और कम्युनिज़्म से भयभीत थे।
- नवंबर 1932 में कुछ उद्योगपतियों और बैंकरों ने हिंडनबर्ग को पत्र लिखकर हिटलर को चांसलर बनाने का आग्रह किया।
- पापेन जैसे रूढ़िवादियों का भ्रम था कि वे हिटलर को "नियंत्रित" कर लेंगे।
- 30 जनवरी 1933 को हिटलर चांसलर बना; 23 मार्च 1933 के सक्षमकारी अधिनियम (Enabling Act) से तानाशाही स्थापित हुई।
- इतिहासलेखन: मार्क्सवादी व्याख्या में फ़ासीवाद "पूँजी का उपकरण" है; अन्य इतिहासकार (इयन कर्शॉ) नाज़ी आंदोलन के जन-आधार (निम्न-मध्य वर्ग, ग्रामीण प्रोटेस्टेंट) और हिटलर की करिश्माई भूमिका पर बल देते हैं।
- निष्कर्ष: कथन सही है। हिटलर ने सत्ता "छीनी" नहीं, बल्कि उसे "सौंपी" गई। शासक वर्ग ने आर्थिक संकट से बचने के लिए लोकतंत्र की बलि दे दी।
3. द्वितीय विश्वयुद्ध: वास्तव में वैश्विक (UPSC 2024)
- भौगोलिक विस्तार: यूरोप (1939 से, पोलैंड), उत्तरी अफ़्रीका (अल अलामीन, 1942), अटलांटिक (पनडुब्बी युद्ध), सोवियत संघ (1941 से; स्टालिनग्राद 1942-43), चीन (1937 से जापान का आक्रमण), प्रशांत (7 दिसंबर 1941 को पर्ल हार्बर; मिडवे 1942) और दक्षिण-पूर्व एशिया तथा भारत की सीमा (बर्मा; इंफाल-कोहिमा 1944)।
- मानव संसाधन: उपनिवेशों की भागीदारी, जैसे भारत की लगभग 25 लाख स्वयंसेवकों वाली सेना और अफ़्रीकी सैनिक।
- आर्थिक: "सर्वांगीण युद्ध", यानी पूरी अर्थव्यवस्था का युद्ध के लिए संगठन; अमेरिका का "लेंड-लीज़" कार्यक्रम।
- मानवीय: अनुमानित 7 से 8 करोड़ से अधिक मृत्यु (अधिकांश नागरिक); होलोकॉस्ट (लगभग 60 लाख यहूदी); हिरोशिमा और नागासाकी (अगस्त 1945); बंगाल अकाल (1943)।
- वैचारिक: फ़ासीवाद बनाम लोकतंत्र और साम्यवाद का अस्थायी गठबंधन।
- वैश्विक परिणाम: संयुक्त राष्ट्र (1945), ब्रेटन वुड्स संस्थाएँ (1944), दो महाशक्तियाँ और शीत युद्ध, यूरोप का पतन और विऔपनिवेशीकरण (भारत 1947, इंडोनेशिया 1949, अफ़्रीका 1950-60 का दशक)।
- सीमा: लैटिन अमेरिका अपेक्षाकृत कम प्रभावित रहा (ब्राज़ील ने यूरोप में सैनिक भेजे)। कुछ देश तटस्थ रहे (स्वीडन, स्विट्ज़रलैंड)।
- निष्कर्ष: विस्तार, भागीदारी और परिणाम, तीनों दृष्टियों से यह पहला सच्चा "विश्व" युद्ध था।
4. क्रांति: रूस और चीन
- रूसी क्रांति (1917): फ़रवरी क्रांति (ज़ारशाही का अंत) और अक्टूबर क्रांति (बोल्शेविक; लेनिन; "शांति, भूमि, रोटी"); गृहयुद्ध; युद्ध-साम्यवाद; नई आर्थिक नीति (NEP, 1921); और स्टालिन की पंचवर्षीय योजनाएँ (1928 से)।

- चीनी क्रांति: 1911 में राजवंश का अंत (सुन यात-सेन); चार मई आंदोलन (1919); चीनी कम्युनिस्ट पार्टी (1921); लंबा कूच (1934-35); जापान-विरोधी युद्ध; गृहयुद्ध; और 1 अक्टूबर 1949 को चीनी जनवादी गणराज्य की स्थापना।

चीन का भूमि सुधार (UPSC 2024)
- कृषि सुधार क़ानून (जून 1950): गाँवों को वर्गों में बाँटा गया (भूस्वामी, धनी किसान, मध्यम किसान, निर्धन किसान, खेतिहर मज़दूर)। भूस्वामियों की भूमि, पशु और उपकरण ज़ब्त करके निर्धन किसानों में बाँटे गए।
- "तेज़ी से और निर्ममता से": "संघर्ष सभाओं" (struggle sessions) में भूस्वामियों का सार्वजनिक अपमान और हिंसा हुई। मारे गए भूस्वामियों की संख्या के अनुमान लाखों से लेकर दसियों लाख तक हैं (विद्वानों में भिन्नता)। लगभग 1952-53 तक यह प्रक्रिया अधिकांश क्षेत्रों में पूरी हो गई।
- उद्देश्य: किसानों का समर्थन, ग्रामीण अभिजात सत्ता का विनाश, और पार्टी का गाँव तक नियंत्रण।
- आगे: परस्पर सहायता दल, सहकारी समितियाँ, 1958 में जन-कम्यून और "महान छलाँग" (Great Leap Forward), जिसके बाद भीषण अकाल (1959-61) पड़ा। अर्थात् भूमि का निजी वितरण अल्पकालिक रहा।
- निष्कर्ष: कथन सही है। सुधार तेज़ और व्यापक था, पर उसकी मानवीय क़ीमत भारी थी, और वह अंततः सामूहिकीकरण की ओर एक चरण सिद्ध हुआ।
सोवियत और चीनी दृष्टि: उपनिवेश "समाजवादी खेमे" में (UPSC 2025)
- सैद्धांतिक आधार: लेनिन के "साम्राज्यवाद" सिद्धांत और कॉमिन्टर्न की दूसरी कांग्रेस (1920) के राष्ट्रीय और औपनिवेशिक प्रश्न पर प्रस्ताव (लेनिन और एम.एन. रॉय की बहस)। विश्वास यह था कि उपनिवेशों के मुक्ति-आंदोलन साम्राज्यवाद को कमज़ोर करेंगे और स्वाभाविक रूप से समाजवाद की ओर जाएँगे। बाकू की "पूर्व के लोगों की कांग्रेस" (1920) और माओ का "तीसरी दुनिया" के क्रांतिकारी आंदोलनों को समर्थन भी इसी के अंग थे।
- सफलताएँ: वियतनाम, उत्तर कोरिया, क्यूबा (1959), अंगोला और मोज़ाम्बिक (1975)।
- सीमाएँ:
- अधिकांश नव-स्वतंत्र देशों ने राष्ट्रवादी नेतृत्व में "गुटनिरपेक्षता" अपनाई: भारत (नेहरू), इंडोनेशिया (सुकर्णो), मिस्र (नासिर); बांडुंग (1955) और गुटनिरपेक्ष आंदोलन (1961)।
- कई देशों ने मिश्रित अर्थव्यवस्था या पूँजीवादी मार्ग चुना।
- चीन-सोवियत विवाद (1960 के दशक) से "समाजवादी खेमा" स्वयं बँट गया।
- राष्ट्रवाद अंततः विचारधारा से अधिक शक्तिशाली सिद्ध हुआ।
- निष्कर्ष: यह विश्वास आंशिक रूप से सही निकला, पर अधिकांश उपनिवेश "समाजवादी कक्षा" में नहीं गए।
5. शीत युद्ध, गोर्बाचेव और 1989
दो गुट: दो विचारधाराएँ, विकास के दो मॉडल (UPSC 2024)
| आधार | पश्चिमी गुट (अमेरिका) | पूर्वी गुट (सोवियत संघ) |
|---|---|---|
| विचारधारा | उदार लोकतंत्र, व्यक्तिगत स्वतंत्रता | मार्क्सवाद-लेनिनवाद, एकदलीय राज्य |
| आर्थिक मॉडल | बाज़ार अर्थव्यवस्था, निजी संपत्ति; बाद में कल्याणकारी राज्य (कीन्सवाद) | केंद्रीय नियोजन (पंचवर्षीय योजनाएँ), राजकीय स्वामित्व, सामूहिक कृषि, भारी उद्योग को प्राथमिकता |
| संस्थाएँ | ब्रेटन वुड्स (IMF, विश्व बैंक; 1944), GATT (1947), मार्शल योजना (1948) | कोमेकॉन (COMECON, 1949) |
| सैन्य गठबंधन | NATO (1949) | वारसॉ संधि (1955) |
| तीसरी दुनिया के लिए आकर्षण | पूँजी, तकनीक, व्यापार | तेज़ औद्योगीकरण का उदाहरण; समानता |
- विश्लेषण: शीत युद्ध केवल सैन्य प्रतिस्पर्धा नहीं था, बल्कि "आधुनिकता के दो मार्गों" की प्रतिस्पर्धा भी था। तीसरी दुनिया के देशों (भारत की मिश्रित अर्थव्यवस्था) ने दोनों मॉडलों के तत्व लिए। अंततः सोवियत मॉडल की दक्षता, नवाचार और उपभोक्ता-वस्तुओं में विफलता ने 1989-91 का मार्ग खोला।
गोर्बाचेव के घरेलू सुधार (UPSC 2025)
- पेरेस्त्रोइका (पुनर्गठन): राजकीय उद्यम अधिनियम (1987) से उद्यमों को स्वायत्तता; सहकारी समितियाँ और सीमित निजी उद्यम (1988); संयुक्त उपक्रम और विदेशी निवेश।
- ग्लासनोस्त (खुलापन): सेंसरशिप में ढील, इतिहास का पुनर्मूल्यांकन (स्टालिन के अपराध), और 1986 के चेर्नोबिल के बाद पारदर्शिता का दबाव।
- लोकतंत्रीकरण: 1989 में "जन-प्रतिनिधियों की कांग्रेस" के अर्ध-प्रतिस्पर्धी चुनाव; 1990 में कम्युनिस्ट पार्टी की "अग्रणी भूमिका" (संविधान का अनुच्छेद 6) समाप्त; और राष्ट्रपति पद।
- विफलता के कारण:
- अधूरे आर्थिक सुधार: न योजना बची, न बाज़ार बना; परिणाम था अभाव, मुद्रास्फीति और कतारें।
- ग्लासनोस्त से उत्पन्न आलोचना ने व्यवस्था की वैधता ही समाप्त कर दी।
- गणराज्यों (बाल्टिक, यूक्रेन) में राष्ट्रवाद का उभार।
- रूढ़िवादियों और उग्र सुधारकों (येल्त्सिन) के बीच फँस जाना।
- अगस्त 1991 का असफल तख़्तापलट।
- परिणाम: 26 दिसंबर 1991 को सोवियत संघ का विघटन।
- मूल्यांकन: गोर्बाचेव ने व्यवस्था को "बचाने" के लिए सुधार किए, पर सुधारों ने उसे "समाप्त" कर दिया। फिर भी उन्होंने शीत युद्ध के शांतिपूर्ण अंत का मार्ग खोला।
1989 की क्रांतियाँ (UPSC 2024)
- घटनाएँ: पोलैंड (सॉलिडेरिटी; जून 1989 के चुनाव), हंगरी (ऑस्ट्रिया से लगी सीमा खोलना), पूर्वी जर्मनी (9 नवंबर 1989 को बर्लिन की दीवार का गिरना), चेकोस्लोवाकिया ("मख़मली क्रांति"; वाक्लाव हावेल), बुल्गारिया और रोमानिया (दिसंबर 1989; चाउशेस्कु को मृत्युदंड)। सोवियत संघ ने "ब्रेझनेव सिद्धांत" छोड़ दिया और हस्तक्षेप नहीं किया।
- "विचारधारा का भी अंत": पूर्वी यूरोप में साम्यवाद "शासकीय विचारधारा" के रूप में समाप्त हुआ; केंद्रीय नियोजन की जगह बाज़ार अर्थव्यवस्था और एकदलीय राज्य की जगह बहुदलीय लोकतंत्र आया। फ़्रांसिस फ़ुकुयामा ने "The End of History?" (1989) में उदार लोकतंत्र की अंतिम विजय की बात कही।
- प्रति-तर्क: चीन (तियानानमेन, जून 1989), वियतनाम, क्यूबा और उत्तर कोरिया में साम्यवादी शासन बना रहा। चीन ने "समाजवादी बाज़ार अर्थव्यवस्था" का नया मार्ग अपनाया। समाजवादी और समानतावादी विचार अन्य रूपों (लोकतांत्रिक समाजवाद, लैटिन अमेरिका का वामपंथ) में जीवित रहे। 2008 के वित्तीय संकट और अधिनायकवादी प्रवृत्तियों ने "इतिहास के अंत" की धारणा को चुनौती दी।
- निष्कर्ष: 1989 ने यूरोप में एक "शासन-प्रणाली" और "व्यावहारिक विचारधारा" का अंत किया, पर विचारधाराओं का अंत नहीं हुआ।
6. विऔपनिवेशीकरण: वियतनाम, दक्षिण अफ़्रीका, लैटिन अमेरिका

वियतनाम: गैर-कम्युनिस्ट नेतृत्व की विफलता और हो ची मिन्ह (UPSC 2024, 2025)
- गैर-कम्युनिस्ट नेता और धाराएँ:
- फ़ान बोई चाऊ (जापान-उन्मुख राष्ट्रवाद; "पूर्व की ओर चलो" आंदोलन)।
- फ़ान चू त्रिन्ह (फ़्रांसीसी ढाँचे में सुधार और आधुनिकीकरण)।
- वियतनाम क्वोक दान दांग (VNQDD, 1927; चीनी कुओमिन्तांग जैसा; 1930 का येन बाई विद्रोह, जिसे कुचल दिया गया)।
- सम्राट बाओ दाई (फ़्रांसीसी और जापानी कठपुतली)।
- न्गो दिन्ह दिएम (दक्षिण वियतनाम 1955-63; अमेरिका-समर्थित)।
- विफलता के कारण:
- नगरीय और शिक्षित अभिजात वर्ग तक सीमित आधार; किसानों के लिए भूमि सुधार का कोई कार्यक्रम नहीं।
- विदेशी संरक्षकों (जापान, फ़्रांस, अमेरिका) पर निर्भरता, जिससे राष्ट्रवादी वैधता घटी।
- फ़्रांसीसी दमन (1930 के बाद VNQDD का लगभग सफ़ाया)।
- आपसी फूट और संगठन का अभाव।
- दिएम का कैथोलिक अभिजात-आधारित दमनकारी शासन (1963 में बौद्ध भिक्षुओं का आत्मदाह)।
- हो ची मिन्ह का केंद्रीय नेता बनना:
- "न्गुयेन ऐ क्वोक" नाम से 1919 में वर्साय सम्मेलन को वियतनामी अधिकारों की याचिका।
- 1920 में फ़्रांसीसी कम्युनिस्ट पार्टी के संस्थापक सदस्य; कॉमिन्टर्न में प्रशिक्षण।
- 1925 में "थान निएन" (युवा क्रांतिकारी संघ); 1930 में इंडोचाइना कम्युनिस्ट पार्टी।
- 1941 में "वियत मिन्ह": राष्ट्रवाद (स्वतंत्रता) और सामाजिक कार्यक्रम (भूमि, कर-राहत) का संयोजन, जिससे व्यापक मोर्चा बना।
- जापान-विरोधी गुरिल्ला संघर्ष; 1945 के अकाल में अन्न-भंडार खोलकर जन-समर्थन।
- "अगस्त क्रांति"; 2 सितंबर 1945 को स्वतंत्रता की घोषणा (जिसमें अमेरिकी घोषणा का उद्धरण था)।
- दिएन बिएन फ़ू (1954) में फ़्रांस की हार; जिनेवा समझौता (1954)।
- निष्कर्ष: हो ची मिन्ह की सफलता का रहस्य "राष्ट्रवाद और किसान-क्रांति का संयोजन" था, और गैर-कम्युनिस्ट नेताओं के पास यही नहीं था।
रंगभेद (Apartheid) और लोकतंत्र का दावा (UPSC 2024)
- व्यवस्था: 1948 में नेशनल पार्टी सत्ता में आई। प्रमुख क़ानून: जनसंख्या पंजीकरण अधिनियम (1950; नस्लीय वर्गीकरण), समूह क्षेत्र अधिनियम (1950; आवासीय पृथक्करण), बंटू शिक्षा अधिनियम (1953), "बंटुस्तान" या "होमलैंड" (1959 से), पास-क़ानून, और मिश्रित विवाह निषेध।
- लोकतंत्र का दावा क्यों खोखला: चुनाव, संसद और न्यायालय थे, पर मताधिकार केवल श्वेत अल्पसंख्यक (लगभग 15-20%) को था। बहुसंख्यक अश्वेत नागरिकता और राजनीतिक अधिकारों से वंचित थे, और बंटुस्तानों के माध्यम से उन्हें "विदेशी" घोषित करने का प्रयास हुआ। 1983 की "त्रिसदनीय संसद" में श्वेत, अश्वेत-मिश्रित (Coloured) और भारतीय मूल के लोगों के अलग सदन थे, पर अश्वेत बाहर थे। विरोध का निर्मम दमन हुआ: शार्पविल (1960), ANC पर प्रतिबंध (1960), रिवोनिया मुक़दमा और मंडेला को आजीवन कारावास (1964), और सोवेटो (1976)।
- अंत: अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंध (भारत ने 1946 से ही विरोध किया था), आंतरिक प्रतिरोध और शीत युद्ध के अंत के बाद 1990 में मंडेला की रिहाई हुई, और 1994 में सर्व-नस्लीय चुनाव हुए।
- निष्कर्ष: "नस्लीय लोकतंत्र" स्वयं में विरोधाभास था; लोकतंत्र की संस्थाएँ बिना सार्वभौम नागरिकता के लोकतंत्र नहीं बनातीं।
लैटिन अमेरिका का अल्पविकास और नव-साम्राज्यवाद (UPSC 2024)
- नव-साम्राज्यवाद के तर्क (निर्भरता सिद्धांत):
- राउल प्रेबिश (संयुक्त राष्ट्र का लैटिन अमेरिका आर्थिक आयोग, ECLA): कच्चे माल के निर्यातकों के लिए "व्यापार की शर्तों" (terms of trade) का दीर्घकालिक ह्रास।
- आंद्रे गुंडर फ़्रैंक: "अल्पविकास का विकास" (1966)।
- कार्डोसो और फ़लेत्तो (1969): "निर्भर विकास"।
- अमेरिकी हस्तक्षेप: मुनरो सिद्धांत (1823), रूज़वेल्ट उपसिद्धांत (1904), ग्वाटेमाला (1954; यूनाइटेड फ़्रूट कंपनी के हित) और चिली (1973)।
- बहुराष्ट्रीय कंपनियों का खनिज और बागानों पर नियंत्रण।
- 1982 का ऋण-संकट और "खोया हुआ दशक"; "वॉशिंगटन सहमति"।
- आंतरिक कारण: औपनिवेशिक विरासत (विशाल ज़मींदारियाँ यानी "लातिफ़ुंडिया", असमानता), राजनीतिक अस्थिरता और सैन्य तानाशाहियाँ ("कौडिलो"), आयात-प्रतिस्थापन मॉडल की सीमाएँ, और कमज़ोर संस्थाएँ।
- प्रति-तर्क: पूर्वी एशिया (दक्षिण कोरिया, ताइवान) ने भी विश्व-बाज़ार से जुड़कर विकास किया, जिससे स्पष्ट होता है कि आंतरिक नीतियाँ और संस्थाएँ भी निर्णायक हैं।
- निष्कर्ष: नव-साम्राज्यवाद ने अल्पविकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, पर वह "एकमात्र" कारण नहीं था; बाहरी और आंतरिक कारक एक-दूसरे को पुष्ट करते रहे।
7. यूरोपीय एकीकरण और जर्मन विज्ञान
यूरोपीय आर्थिक एकीकरण के चरण (UPSC 2024, 2025)
| वर्ष | चरण | महत्व |
|---|---|---|
| 1950-51 | शूमान घोषणा (9 मई 1950); पेरिस की संधि से ECSC (छह देश) | फ़्रांस और जर्मनी का कोयला-इस्पात साझा, ताकि युद्ध "असंभव" हो जाए (जाँ मोने) |
| 1957 | रोम की संधियाँ: यूरोपीय आर्थिक समुदाय (EEC) और यूराटॉम | सीमा-शुल्क संघ (1968 में पूर्ण); साझी कृषि नीति (1962) |
| 1973 | पहला विस्तार (ब्रिटेन, आयरलैंड, डेनमार्क) | भौगोलिक विस्तार |
| 1979 | यूरोपीय मौद्रिक प्रणाली; यूरोपीय संसद के प्रत्यक्ष चुनाव | मौद्रिक सहयोग और लोकतांत्रिक आयाम |
| 1986 | एकल यूरोपीय अधिनियम | 1992 तक "एकल बाज़ार" (वस्तु, सेवा, पूँजी और व्यक्तियों का मुक्त आवागमन) |
| 1992-93 | मास्ट्रिख्ट संधि से यूरोपीय संघ (EU) | साझी विदेश नीति, न्याय और गृह मामले; यूरोपीय नागरिकता |
| 1999-2002 | यूरो (1999 से; नोट और सिक्के 2002 से) | मौद्रिक संघ |
| 2004-2009 | पूर्वी विस्तार (2004 में 10 देश); लिस्बन संधि (2009 से लागू) | संस्थागत सुधार |
| 2020 | ब्रेक्ज़िट | एकीकरण की सीमाएँ |
- EEC के मुक्त व्यापार का EU के निर्माण में योगदान: "कार्यात्मकतावाद" (functionalism; जाँ मोने) और "नव-कार्यात्मकतावाद" (अर्न्स्ट हास) के अनुसार आर्थिक एकीकरण का "छलकाव" (spillover) राजनीतिक एकीकरण की ओर ले जाता है। सीमा-शुल्क संघ से साझी व्यापार नीति, फिर एकल बाज़ार के लिए साझे नियम, फिर मुद्रा, और फिर साझी संस्थाओं की आवश्यकता बनी। समृद्धि (युद्धोत्तर "स्वर्ण युग") ने एकीकरण को लोकप्रिय बनाया।
- अन्य कारक: शांति और फ़्रांस-जर्मनी मेल-मिलाप, शीत युद्ध में सोवियत ख़तरा और अमेरिकी समर्थन (मार्शल योजना की शर्तें), 1990 में जर्मनी का एकीकरण (जिससे मास्ट्रिख्ट की राजनीतिक प्रेरणा बनी), और राजनेताओं की भूमिका (शूमान, अडेनाउअर, जाक डेलोर)।
- सीमाएँ: राष्ट्रीय संप्रभुता की बहस, ब्रेक्ज़िट, यूरो-संकट (2010), और "लोकतांत्रिक घाटा"।
- निष्कर्ष: मुक्त व्यापार EU की "नींव" था, पर उसकी "इमारत" राजनीतिक इच्छाशक्ति और सामरिक परिस्थितियों से बनी।
बीसवीं शताब्दी के प्रारंभ में जर्मनी: वैज्ञानिक शिक्षा और औद्योगिक विस्तार (UPSC 2025)
- संबंध:
- हम्बोल्ट का शोध-विश्वविद्यालय मॉडल (बर्लिन, 1810) और तकनीकी उच्च विद्यालय (Technische Hochschulen)।
- उद्योगों में अनुसंधान प्रयोगशालाएँ: रसायन (BASF, बायर, होख़्स्ट; कृत्रिम रंग) और विद्युत (सीमेंस, AEG)।
- कैसर विल्हेम सोसाइटी (1911)।
- हेबर-बॉश प्रक्रिया (अमोनिया संश्लेषण, 1909-13), जिससे उर्वरक और विस्फोटक दोनों बने।
- "दूसरी औद्योगिक क्रांति" में जर्मनी का नेतृत्व।
- समाज पर प्रभाव:
- नया पेशेवर और तकनीकी मध्य वर्ग (इंजीनियर, रसायनज्ञ, प्रबंधक)।
- शास्त्रीय "जिम्नेज़ियम" शिक्षा और तकनीकी शिक्षा के बीच प्रतिष्ठा की बहस, जिसमें तकनीकी शिक्षा को धीरे-धीरे समान दर्जा मिला।
- संगठित पूँजीवाद (कार्टेल, बड़े बैंक) और संगठित श्रम (SPD, ट्रेड यूनियन)।
- विज्ञान का राष्ट्रवाद और सैन्यीकरण: प्रथम विश्वयुद्ध में हेबर के नेतृत्व में रासायनिक हथियार, और 1914 में "93 बुद्धिजीवियों का घोषणापत्र"।
- नगरीकरण और जीवन-स्तर में वृद्धि।
- निष्कर्ष: विज्ञान और उद्योग के गठजोड़ ने जर्मनी को आर्थिक महाशक्ति बनाया, पर उसी ने विज्ञान को राष्ट्र-राज्य की शक्ति-राजनीति और युद्ध से भी जोड़ दिया। यह बीसवीं शताब्दी की एक बड़ी नैतिक दुविधा थी।
8. Master Summary Table
| विषय | मुख्य तथ्य | याद रखें |
|---|---|---|
| प्रथम विश्वयुद्ध और विचार | स्पेंगलर 1918; एलियट 1922; फ़्रायड 1920 | हॉब्सबॉम: लघु बीसवीं शताब्दी |
| फ़ासीवाद | मार्च ऑन रोम 1922; लाल दो वर्ष | अधूरी विजय |
| 1932 का जर्मनी | जुलाई में 37%; अनुच्छेद 48 | 30 जनवरी 1933; सक्षमकारी अधिनियम |
| द्वितीय विश्वयुद्ध | 1939-45; पर्ल हार्बर 1941 | संयुक्त राष्ट्र 1945 |
| चीन | 1949; कृषि सुधार क़ानून 1950 | कम्यून 1958 |
| उपनिवेश और समाजवाद | कॉमिन्टर्न 1920; बाकू | बांडुंग 1955 |
| दो गुट | NATO 1949, वारसॉ 1955; कोमेकॉन 1949 | ब्रेटन वुड्स 1944 |
| गोर्बाचेव | पेरेस्त्रोइका, ग्लासनोस्त; 1987, 1989 | 26 दिसंबर 1991 |
| 1989 | बर्लिन की दीवार 9 नवंबर | फ़ुकुयामा 1989 |
| वियतनाम | ICP 1930; वियत मिन्ह 1941; दिएन बिएन फ़ू 1954 | VNQDD: येन बाई 1930 |
| रंगभेद | 1948; 1950 के क़ानून | 1994 के चुनाव |
| लैटिन अमेरिका | प्रेबिश, फ़्रैंक 1966 | ग्वाटेमाला 1954, चिली 1973 |
| यूरोपीय एकीकरण | 1951, 1957, 1986, 1992, 1999 | मोने, हास |
| जर्मन विज्ञान | हम्बोल्ट 1810; KWG 1911 | हेबर-बॉश |
9. चार्ट: यूरोपीय एकीकरण की सीढ़ी
10. Mind Map
- प्रथम विश्वयुद्ध और विचार
- फ़ासीवाद, 1932, द्वितीय विश्वयुद्ध
- रूस, चीन
- भूमि सुधार, उपनिवेशों पर दृष्टि
- दो मॉडल
- गोर्बाचेव, 1989
- वियतनाम, रंगभेद
- लैटिन अमेरिका
- ECSC से EU तक
- जर्मन विज्ञान और उद्योग
11. महत्वपूर्ण One-liners
- "The Decline of the West": ओसवाल्ड स्पेंगलर (1918)।
- मार्च ऑन रोम: अक्टूबर 1922।
- हिटलर चांसलर बना: 30 जनवरी 1933।
- चीन का कृषि सुधार क़ानून: जून 1950।
- कोमेकॉन: 1949; वारसॉ संधि: 1955।
- बर्लिन की दीवार का गिरना: 9 नवंबर 1989।
- सोवियत संघ का विघटन: 26 दिसंबर 1991।
- वियत मिन्ह की स्थापना: 1941।
- "अल्पविकास का विकास": आंद्रे गुंडर फ़्रैंक।
- शूमान घोषणा: 9 मई 1950।
12. टिप्स एवं ट्रिक्स
- "क्यों विफल हुए" या "क्यों सफल हुए" वाले प्रश्नों में तुलना करें, जैसे गैर-कम्युनिस्ट नेता बनाम हो ची मिन्ह।
- 2024 और 2025 में "मॉडल" और "राजनीतिक अर्थव्यवस्था" पर बल था: दो गुट, नव-साम्राज्यवाद, यूरोपीय एकीकरण। आर्थिक तर्क अवश्य जोड़ें।
- समय-रेखा और तालिका (यूरोपीय एकीकरण, शीत युद्ध के गुट) से उत्तर संक्षिप्त और अंकदायी बनते हैं।
यूरोपीय एकीकरण: "51-57-86-92-99" (ECSC, EEC, SEA, मास्ट्रिख्ट, यूरो)। गोर्बाचेव: "पे-ग्ला-लो" (पेरेस्त्रोइका, ग्लासनोस्त, लोकतंत्रीकरण)।
13. PYQ-आधारित प्रश्न एवं मॉडल उत्तर
"1932 के चुनावों तक जर्मनी के शासक वर्ग यह महसूस करने लगे कि गहरे आर्थिक संकट से निकलने का एकमात्र मार्ग राजनीतिक सत्ता किसी अधिनायकवादी संस्था को सौंप देना है।" स्पष्ट कीजिए।
मॉडल उत्तर (रूपरेखा)
संकट: वर्साय, 1923, 1929; बेरोज़गारी लगभग 60 लाख; अनुच्छेद 48।
चुनाव: जुलाई (37%) और नवंबर (33%) 1932; KPD का उभार।
शासक वर्ग: यंकर, सेना, उद्योगपति; उद्योगपतियों का पत्र; पापेन का भ्रम; 30 जनवरी 1933; सक्षमकारी अधिनियम।
इतिहासलेखन: मार्क्सवादी बनाम कर्शॉ।
निष्कर्ष: सत्ता छीनी नहीं गई, सौंपी गई।
मिखाइल गोर्बाचेव के घरेलू सुधारों की प्रमुख विशेषताओं की आलोचनात्मक विवेचना कीजिए।
मॉडल उत्तर (रूपरेखा)
पेरेस्त्रोइका: 1987 का अधिनियम, 1988 की सहकारी समितियाँ, संयुक्त उपक्रम।
ग्लासनोस्त: सेंसरशिप में ढील, इतिहास, चेर्नोबिल।
लोकतंत्रीकरण: 1989, अनुच्छेद 6 (1990)।
विफलता: अधूरा सुधार, वैधता का क्षरण, राष्ट्रवाद, दो तरफ़ा दबाव, 1991 का तख़्तापलट।
निष्कर्ष: बचाने के प्रयास ने ही अंत किया; पर शीत युद्ध का शांतिपूर्ण अंत संभव हुआ।
गैर-कम्युनिस्ट वियतनामी नेता इंडोचाइना के उपनिवेश-विरोधी संघर्ष को सफल नेतृत्व देने में क्यों विफल रहे? विवेचना कीजिए।
मॉडल उत्तर (रूपरेखा)
नेता: फ़ान बोई चाऊ, फ़ान चू त्रिन्ह, VNQDD, बाओ दाई, दिएम।
कारण: अभिजात आधार, भूमि कार्यक्रम का अभाव, विदेशी निर्भरता, दमन, फूट, दिएम का शासन।
तुलना: वियत मिन्ह में राष्ट्रवाद और भूमि का संयोजन।
निष्कर्ष: किसान-प्रश्न ने परिणाम तय किया।
यूरोपीय आर्थिक समुदाय की मुक्त व्यापार की अवधारणा ने यूरोपीय संघ के निर्माण में किस सीमा तक योगदान दिया? परीक्षण कीजिए।
मॉडल उत्तर (रूपरेखा)
चरण: तालिका और सीढ़ी-चार्ट।
योगदान: कार्यात्मकतावाद और नव-कार्यात्मकतावाद; छलकाव; समृद्धि।
अन्य कारक: शांति, शीत युद्ध, 1990 का जर्मन एकीकरण, नेता।
सीमाएँ: संप्रभुता, ब्रेक्ज़िट, यूरो-संकट।
निष्कर्ष: नींव आर्थिक थी, इमारत राजनीतिक।
बीसवीं शताब्दी के प्रारंभ में जर्मन समाज पर वैज्ञानिक शिक्षा और औद्योगिक विस्तार के बीच के संबंधों के प्रभाव का परीक्षण कीजिए।
मॉडल उत्तर
संबंध: हम्बोल्ट, तकनीकी विद्यालय, औद्योगिक प्रयोगशालाएँ, KWG 1911, हेबर-बॉश।
प्रभाव: पेशेवर मध्य वर्ग, शिक्षा की प्रतिष्ठा पर बहस, संगठित पूँजी और श्रम, विज्ञान का सैन्यीकरण, नगरीकरण।
निष्कर्ष: आर्थिक शक्ति और नैतिक दुविधा।
प्रथम विश्वयुद्ध के बाद यूरोप का सामाजिक और राजनीतिक परिदृश्य फ़ासीवाद के उदय के लिए अद्वितीय रूप से अनुकूल था। विवेचना कीजिए।
मॉडल उत्तर (रूपरेखा)
परिस्थितियाँ: आर्थिक, सामाजिक, राजनीतिक, राष्ट्रवादी, वैचारिक।
इटली और जर्मनी: 1922; 1933।
सीमा: ब्रिटेन और फ़्रांस में लोकतंत्र टिका; राष्ट्रीय इतिहास और अभिजात वर्ग के चुनाव निर्णायक।
द्वितीय विश्वयुद्ध वास्तव में एक वैश्विक संघर्ष था। विवेचना कीजिए।
मॉडल उत्तर (रूपरेखा)
विस्तार: सभी मोर्चे; मानचित्र।
भागीदारी: उपनिवेश, सर्वांगीण युद्ध।
मानवीय क्षति: मृत्यु, होलोकॉस्ट, परमाणु बम, बंगाल।
परिणाम: संयुक्त राष्ट्र, ब्रेटन वुड्स, शीत युद्ध, विऔपनिवेशीकरण।
सीमा: लैटिन अमेरिका, तटस्थ देश।
रंगभेदी शासन की प्रकृति ने दक्षिण अफ़्रीका के लोकतांत्रिक राज्य होने के दावे को खोखला कर दिया। विवेचना कीजिए।
मॉडल उत्तर (रूपरेखा)
व्यवस्था: 1948; 1950 और 1953 के क़ानून; बंटुस्तान।
दावा बनाम वास्तविकता: श्वेत मताधिकार, नागरिकता से वंचना, 1983 की संसद, दमन।
अंत: प्रतिबंध, प्रतिरोध, 1990, 1994।
निष्कर्ष: "नस्लीय लोकतंत्र" विरोधाभास है।
दो शक्ति-गुटों का उदय केवल दो प्रतिस्पर्धी विचारधाराओं का ही नहीं, बल्कि आर्थिक विकास के दो वैकल्पिक मॉडलों का भी प्रतीक था। स्पष्ट कीजिए।
मॉडल उत्तर (रूपरेखा)
तुलना-तालिका: विचारधारा, अर्थव्यवस्था, संस्थाएँ, गठबंधन, आकर्षण।
तीसरी दुनिया: मिश्रित मॉडल (भारत)।
परिणाम: सोवियत मॉडल की विफलता, 1989-91।
लैटिन अमेरिका का अल्पविकास किस सीमा तक नव-साम्राज्यवाद के कारण है?
मॉडल उत्तर (रूपरेखा)
निर्भरता सिद्धांत: प्रेबिश, फ़्रैंक, कार्डोसो।
हस्तक्षेप: मुनरो, रूज़वेल्ट, ग्वाटेमाला, चिली; ऋण-संकट।
आंतरिक कारण: लातिफ़ुंडिया, असमानता, तानाशाही, ISI की सीमाएँ।
प्रति-तर्क: पूर्वी एशिया।
निष्कर्ष: महत्वपूर्ण, पर एकमात्र कारण नहीं।
हो ची मिन्ह वियतनामी स्वतंत्रता आंदोलन के केंद्रीय व्यक्तित्व के रूप में कैसे उभरे?
मॉडल उत्तर (रूपरेखा)
प्रारंभिक जीवन: वर्साय 1919; फ़्रांसीसी कम्युनिस्ट पार्टी 1920; कॉमिन्टर्न।
संगठन: थान निएन 1925, ICP 1930, वियत मिन्ह 1941।
रणनीति: राष्ट्रवाद और भूमि का मोर्चा; गुरिल्ला; 1945 का अकाल।
उपलब्धि: 2 सितंबर 1945; दिएन बिएन फ़ू 1954।
यूरोपीय आर्थिक एकीकरण के विभिन्न चरणों का वर्णन कीजिए।
मॉडल उत्तर
चरण: ECSC 1951, EEC 1957, विस्तार 1973, EMS 1979, SEA 1986, मास्ट्रिख्ट 1992, यूरो 1999, विस्तार 2004, लिस्बन, ब्रेक्ज़िट 2020।
सिद्धांत: मोने, हास।
निष्कर्ष: आर्थिक से राजनीतिक एकीकरण।
"प्रथम विश्वयुद्ध ने केवल राजनीतिक परिणाम ही उत्पन्न नहीं किए, उसने चिंतन के तरीक़ों पर भी गहरा प्रभाव डाला।" आलोचनात्मक परीक्षण कीजिए।
मॉडल उत्तर
प्रभाव: प्रगति में अविश्वास (स्पेंगलर), साहित्य और कला (ओवेन, रेमार्क, एलियट, दादा), मनोविज्ञान (फ़्रायड), राजनीतिक विचार (बोल्शेविज़्म, फ़ासीवाद, आत्मनिर्णय), सामाजिक परिवर्तन।
निष्कर्ष: बीसवीं शताब्दी की मानसिकता का जन्म।
"सोवियत संघ और चीन, दोनों में यह दृढ़ विश्वास था कि उपनिवेशों के साम्राज्य-विरोधी आंदोलन उन्हें समाजवादी कक्षा में ले आएँगे।" आलोचनात्मक परीक्षण कीजिए।
मॉडल उत्तर
आधार: लेनिन, कॉमिन्टर्न 1920, बाकू, माओ।
सफलताएँ: वियतनाम, क्यूबा, अंगोला।
सीमाएँ: गुटनिरपेक्षता, राष्ट्रवाद, चीन-सोवियत विवाद।
चीन की नई सरकार ने व्यापक भूमि-वितरण द्वारा किसान-प्रश्न का समाधान किया, जो तेज़ी से और निर्ममता से किया गया। आलोचनात्मक परीक्षण कीजिए।
मॉडल उत्तर
क़ानून: 1950; वर्ग-विभाजन; ज़ब्ती और वितरण।
निर्ममता: संघर्ष सभाएँ, हिंसा, अनुमानों में भिन्नता।
आगे: सहकारी समितियाँ, कम्यून, अकाल।
1989 की क्रांतियों ने केवल सरकारों को नष्ट नहीं किया, उन्होंने एक विचारधारा का भी अंत कर दिया। आलोचनात्मक परीक्षण कीजिए।
मॉडल उत्तर
घटनाएँ: पोलैंड, हंगरी, बर्लिन, चेकोस्लोवाकिया, रोमानिया।
अंत: यूरोप में शासकीय विचारधारा; फ़ुकुयामा।
प्रति-तर्क: चीन, वियतनाम, क्यूबा; समाजवाद के अन्य रूप; 2008।
14. Quick Revision Summary
- प्रथम विश्वयुद्ध: कारण, परिणाम, चिंतन पर प्रभाव।
- युद्धों के बीच: फ़ासीवाद, 1932 का जर्मनी।
- द्वितीय विश्वयुद्ध: वैश्विक विस्तार और परिणाम।
- क्रांति: रूस, चीन, भूमि सुधार, उपनिवेशों पर दृष्टि।
- शीत युद्ध: दो मॉडल, गोर्बाचेव, 1989, 1991।
- विऔपनिवेशीकरण: वियतनाम, रंगभेद, लैटिन अमेरिका।
- यूरोप: एकीकरण के चरण; जर्मन विज्ञान और उद्योग।