1. अध्याय एक नज़र में
Paper II का Section A सामाजिक-राजनीतिक दर्शन है। इस पहले भाग में मूल आदर्श और राज्य के सिद्धांत आते हैं:
- सामाजिक-राजनीतिक आदर्श: स्वतंत्रता, समानता, न्याय; इनका परस्पर संबंध।
- प्लेटो और अरस्तू: न्याय, लोकतंत्र की आलोचना, राज्यवाद और व्यक्तिवाद।
- सामाजिक अनुबंध सिद्धांत: हॉब्स, लॉक, रूसो, रॉल्स; भारतीय रूप।
- संप्रभुता: बोडाँ, ऑस्टिन, लास्की, कौटिल्य।
- व्यक्ति और राज्य: अधिकार, कर्तव्य और जवाबदेही; शासन के रूप।
2025 में प्लेटो की लोकतंत्र-आलोचना, मिल की समानता, कौटिल्य और "कोई स्थायी मित्र या शत्रु नहीं", न्याय के बिना स्वतंत्रता और समानता की अपर्याप्तता, और अधिकार-कर्तव्य संबंध पूछे गए। 2024 में प्लेटो का न्याय, सामाजिक अनुबंध की उत्पत्ति, स्वतंत्रता और समानता, अरस्तू बनाम प्लेटो, और अर्थशास्त्र में संप्रभुता आई।
2. स्वतंत्रता (Liberty)
- नकारात्मक स्वतंत्रता: बाहरी हस्तक्षेप का अभाव, "से स्वतंत्रता" (freedom from)। हॉब्स, लॉक, मिल, बर्लिन।
- सकारात्मक स्वतंत्रता: आत्म-निर्धारण और आत्म-विकास की क्षमता, "की स्वतंत्रता" (freedom to)। रूसो, हेगेल, टी.एच. ग्रीन ("सार्थक कार्य करने की सकारात्मक शक्ति")।
- ईसाया बर्लिन, "Two Concepts of Liberty" (1958): सकारात्मक स्वतंत्रता "सच्चे स्व" के नाम पर दमन का ख़तरा पैदा करती है ("लोगों को स्वतंत्र होने के लिए बाध्य करना")। नकारात्मक स्वतंत्रता अधिक सुरक्षित है।
- जे.एस. मिल, "On Liberty" (1859):
- हानि-सिद्धांत (Harm Principle): समाज व्यक्ति की स्वतंत्रता में केवल तभी हस्तक्षेप कर सकता है जब उसका कार्य दूसरों को हानि पहुँचाए। "अपने ऊपर, अपने शरीर और मन पर, व्यक्ति संप्रभु है।"
- विचार-स्वतंत्रता के तर्क: दबाया गया मत सत्य हो सकता है; असत्य मत भी सत्य को जीवंत रखता है; प्रायः सत्य दोनों पक्षों में बँटा होता है।
- "बहुमत का अत्याचार" (टॉकविल से) केवल सरकार का नहीं, सामाजिक रीति-रिवाज का भी।
- रिपब्लिकन स्वतंत्रता (पेटिट): प्रभुत्व का अभाव (non-domination); दयालु स्वामी का दास भी स्वतंत्र नहीं।
3. समानता (Equality)
- प्रकार: औपचारिक (विधि के समक्ष), अवसर की समानता, परिणाम की समानता, राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक समानता।
- अरस्तू: "समानों के साथ समान और असमानों के साथ असमान व्यवहार"; आनुपातिक समानता।
- सकारात्मक कार्रवाई: संरचनात्मक असमानता को दूर करने के लिए विशेष उपाय (भारत में आरक्षण; इंद्रा साहनी, 1992)।
3.1 जे.एस. मिल के अनुसार समानता की विशेषताएँ (UPSC 2025)
- उपयोगितावादी आधार: बेंथम का सूत्र "हर व्यक्ति एक गिना जाए, किसी को एक से अधिक नहीं"; सबके सुख का समान महत्व।
- समान स्वतंत्रता: हानि-सिद्धांत सब पर समान रूप से लागू; किसी वर्ग या समूह के लिए विशेषाधिकार नहीं।
- लैंगिक समानता: "The Subjection of Women" (1869, हैरियट टेलर मिल के प्रभाव में): स्त्रियों की अधीनता "मानव सुधार की सबसे बड़ी बाधाओं में से एक" है; विवाह, शिक्षा, संपत्ति और मताधिकार में पूर्ण समानता। 1867 में संसद में स्त्री-मताधिकार का प्रस्ताव रखा।
- अवसर की समानता और योग्यता: जन्म नहीं, योग्यता और प्रयास से पद; सबके लिए शिक्षा।
- आर्थिक दृष्टि: उत्तराधिकार पर सीमा, सहकारिता का समर्थन; जीवन के अंतिम चरण में समाजवाद के प्रति सहानुभूति ("Chapters on Socialism", मरणोपरांत 1879)।
- तनाव और आलोचना:
- "Considerations on Representative Government" (1861) में शिक्षित लोगों के लिए बहुल मताधिकार (plural voting) का सुझाव, यानी राजनीतिक समानता से विचलन।
- उपनिवेशों के लिए "उदार निरंकुशता" का समर्थन ("सभ्यता" का पदानुक्रम)।
- उच्च और निम्न सुखों का भेद ("असंतुष्ट सुकरात, संतुष्ट मूर्ख से बेहतर"), जो अभिजात दृष्टि लगती है।
3.2 स्वतंत्रता और समानता: राजनीतिक आदर्शों के रूप में (UPSC 2024)
- विरोध का मत (हायेक, नॉज़िक, लॉर्ड एक्टन): "समानता की इच्छा ने स्वतंत्रता की आशा को नष्ट किया।" परिणाम की समानता के लिए राज्य को पुनर्वितरण करना होगा, जो व्यक्तिगत स्वतंत्रता (संपत्ति, चुनाव) में हस्तक्षेप है। नॉज़िक का विल्ट चेम्बरलेन उदाहरण: स्वतंत्र विनिमय से असमानता अनिवार्य है।
- पूरकता का मत (टॉनी, लास्की, रॉल्स, सेन): गरीब व्यक्ति की "स्वतंत्रता" औपचारिक है; सार्थक स्वतंत्रता के लिए न्यूनतम समानता (शिक्षा, स्वास्थ्य, आय) चाहिए। टॉनी: "बहुत अधिक असमानता में स्वतंत्रता कुछ लोगों का विशेषाधिकार बन जाती है।"
- आलोचनात्मक मूल्यांकन:
- स्वतंत्रता अकेले असमानता और प्रभुत्व को जन्म दे सकती है (बाज़ार का "जंगल का क़ानून")।
- समानता अकेले एकरूपता, नौकरशाही नियंत्रण और प्रोत्साहन की हानि ला सकती है।
- दोनों आदर्श "अनिवार्य" पर "अपूर्ण" हैं; उनका संतुलन न्याय के सिद्धांत से तय होता है (अगला खंड)।
- भारतीय संविधान: प्रस्तावना में स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व; आंबेडकर: "तीनों की त्रिमूर्ति", एक को दूसरे से अलग नहीं किया जा सकता।
4. न्याय (Justice)
4.1 प्लेटो का न्याय-सिद्धांत (UPSC 2024)
- प्रचलित मतों का खंडन ("Republic", पुस्तक I-II):
- सेफ़ालस: "सच बोलना और ऋण लौटाना" (पागल मित्र को हथियार लौटाना न्याय नहीं)।
- पोलेमार्कस: "मित्रों का भला, शत्रुओं का बुरा" (किसी को हानि पहुँचाना न्याय नहीं)।
- थ्रेसीमेकस: "न्याय शक्तिशाली का हित है" (शासक की कला शासितों के हित में है)।
- ग्लॉकॉन: न्याय एक समझौता है (गायगेस की अंगूठी)।
- प्लेटो का सिद्धांत: न्याय है "हर व्यक्ति और हर वर्ग का अपने स्वभाव के अनुकूल कार्य करना और दूसरे के कार्य में हस्तक्षेप न करना।"
- राज्य में: तीन वर्ग: संरक्षक (शासक, बुद्धि), सहायक (सैनिक, साहस), उत्पादक (किसान, कारीगर, संयम)। सब अपने-अपने कार्य करें तो राज्य न्यायपूर्ण।
- आत्मा में: तीन भाग: बुद्धि (reason), उत्साह (spirit), वासना (appetite)। बुद्धि शासन करे, उत्साह सहायक हो, वासना अनुशासित रहे। न्याय आत्मा का "स्वास्थ्य" और "सामंजस्य" है।
- चार मूल सद्गुण: प्रज्ञा, साहस, संयम और न्याय (जो शेष तीनों का समन्वय है)।
- आलोचना: कार्यात्मक विशेषीकरण व्यक्ति की स्वतंत्रता और गतिशीलता को सीमित करता है; न्याय "कर्तव्य" है, "अधिकार" नहीं; पॉपर: अधिनायकवाद का बीज।
4.2 अन्य सिद्धांत
- अरस्तू: वितरणात्मक न्याय (योग्यता के अनुपात में पद और सम्मान) और सुधारात्मक न्याय (लेन-देन में संतुलन बहाल करना)।
- जॉन रॉल्स, "A Theory of Justice" (1971):
- मूल स्थिति और अज्ञान का पर्दा (Veil of Ignorance): लोग नहीं जानते कि समाज में उनका स्थान, वर्ग, प्रतिभा क्या होगी।
- दो सिद्धांत: (1) सबके लिए समान मूलभूत स्वतंत्रताएँ; (2) सामाजिक-आर्थिक असमानताएँ तभी स्वीकार्य हैं जब (क) वे सबसे वंचितों के सर्वाधिक हित में हों (भेद-सिद्धांत, Difference Principle) और (ख) पद सबके लिए निष्पक्ष अवसर-समानता से खुले हों।
- शाब्दिक प्राथमिकता: पहला सिद्धांत दूसरे से पहले।
- "न्याय सामाजिक संस्थाओं का पहला सद्गुण है।"
- रॉबर्ट नॉज़िक ("Anarchy, State, and Utopia", 1974): हक़दारी सिद्धांत (न्यायपूर्ण अर्जन, स्थानांतरण, सुधार); न्यूनतम राज्य।
- अमर्त्य सेन ("The Idea of Justice", 2009): "नीति" (संस्थागत नियम) बनाम "न्याय" (वास्तविक जीवन के परिणाम); क्षमता उपागम (Capability Approach)।
- सामुदायिकतावादी (सैंडल, वॉल्ज़र): न्याय समुदाय के साझा अर्थों में निहित है; "बहुल समानता" (Spheres of Justice)।
4.3 न्याय के बिना स्वतंत्रता और समानता अपर्याप्त क्यों? (UPSC 2025)
- स्वतंत्रता की अपर्याप्तता:
- असीमित स्वतंत्रता शक्तिशाली की स्वतंत्रता बन जाती है (बाल-श्रम और 19वीं शताब्दी का "मुक्त" अनुबंध)।
- स्वतंत्रता यह नहीं बताती कि संसाधन कैसे बाँटे जाएँ, या किसकी स्वतंत्रता किसकी से पहले।
- समानता की अपर्याप्तता:
- "किस चीज़ की समानता?" (सेन): आय, अवसर, कल्याण या क्षमता? समानता स्वयं यह तय नहीं करती।
- यांत्रिक समानता भिन्न आवश्यकताओं (दिव्यांग, बच्चे) की अनदेखी करती है और योग्यता तथा प्रयास को दंडित कर सकती है।
- बलपूर्वक समानता स्वतंत्रता को नष्ट कर सकती है।
- न्याय की भूमिका:
- न्याय वह उच्चतर सिद्धांत है जो तय करता है कि किस प्रकार की स्वतंत्रता और किस प्रकार की समानता उचित है, और दोनों में टकराव होने पर किसे प्राथमिकता मिले।
- रॉल्स इसका आदर्श उदाहरण: समान स्वतंत्रता (पहला सिद्धांत) + भेद-सिद्धांत (न्यायसंगत असमानता)।
- "न्याय" में "जिसका जो देय है" (suum cuique) का विचार है: योग्यता, आवश्यकता और अधिकार, तीनों का संतुलन।
- निष्कर्ष: स्वतंत्रता और समानता "सामग्री" हैं और न्याय उनका "रूप" या "संयोजक सिद्धांत" है। भारतीय संविधान की प्रस्तावना में "न्याय" का स्वतंत्रता और समानता से पहले आना भी इसी का संकेत है।
5. प्लेटो और अरस्तू
5.1 प्लेटो की लोकतंत्र-आलोचना (UPSC 2025)
- स्रोत: "Republic", पुस्तक VI और VIII; पृष्ठभूमि: एथेंस के लोकतंत्र द्वारा सुकरात को मृत्युदंड (399 ई.पू.)।
- प्रमुख तर्क:
- जहाज़ का दृष्टांत: जहाज़ चलाने के लिए नाविक-विद्या चाहिए; पर लोकतंत्र में अज्ञानी नाविक (जनता) कुशल चालक (दार्शनिक) को बेवकूफ़ समझकर स्वयं पतवार छीन लेते हैं।
- ज्ञान बनाम मत: शासन एक कला है जिसके लिए ज्ञान (episteme) चाहिए; जनता मत (doxa) पर चलती है।
- स्वतंत्रता की अति: लोकतंत्र "विविध रंगों का वस्त्र" है; हर व्यक्ति मनमानी करता है, अनुशासन टूटता है, पिता पुत्र से डरता है, शिक्षक शिष्यों से।
- वासना का शासन: लोकतांत्रिक मनुष्य सभी इच्छाओं को समान मानता है, आवश्यक और अनावश्यक का भेद नहीं करता।
- लोकलुभावन नेता (demagogues): जनता को खुश करने वाले वक्ता सत्ता पाते हैं, जैसे भीड़ को मिठाई देने वाला डॉक्टर से अधिक लोकप्रिय होता है ("Gorgias")।
- पतन का क्रम: आदर्श राज्य (अभिजाततंत्र) → सम्मानतंत्र (timocracy) → धनिकतंत्र (oligarchy) → लोकतंत्र → निरंकुशतंत्र (tyranny)। अति-स्वतंत्रता अराजकता लाती है, जिससे "रक्षक" के रूप में तानाशाह उभरता है।
- मूल्यांकन:
- प्लेटो ने लोकतंत्र की वास्तविक कमज़ोरियाँ पहचानीं: लोकलुभावनवाद, विशेषज्ञता की उपेक्षा, बहुमत का अत्याचार।
- आलोचना: कार्ल पॉपर ("The Open Society and Its Enemies", 1945) ने प्लेटो को "बंद समाज" का समर्थक कहा। प्रश्न "कौन शासन करे?" के बजाय "बुरे शासकों को बिना रक्तपात कैसे हटाएँ?" अधिक महत्वपूर्ण है, और लोकतंत्र इसका उत्तर है।
- दार्शनिक-राजा की ज्ञान-परीक्षा कौन करेगा? सत्ता का भ्रष्ट करने वाला प्रभाव।
5.2 राज्यवाद और व्यक्तिवाद के बीच मध्य मार्ग: अरस्तू बनाम प्लेटो (UPSC 2024)
| आधार | प्लेटो ("Republic") | अरस्तू ("Politics") |
|---|---|---|
| राज्य की एकता | अधिकतम एकता आदर्श | अति-एकता राज्य को परिवार, फिर व्यक्ति में बदल देगी; राज्य स्वभावतः बहुलता है |
| संपत्ति | संरक्षकों के लिए संपत्ति का साम्यवाद | निजी स्वामित्व, सार्वजनिक उपयोग; "जो सबका है उसकी सबसे कम परवाह होती है" |
| परिवार | संरक्षकों के लिए पत्नियों और बच्चों का साम्यवाद | परिवार प्राकृतिक और आवश्यक; "पतला किया हुआ" प्रेम किसी काम का नहीं |
| शासन | दार्शनिक-राजा, ज्ञान का शासन | विधि का शासन; मिश्रित संविधान (polity), मध्यम वर्ग |
| नागरिक | वर्ग-कार्य में सीमित | "राजनीतिक प्राणी"; शासन करने और शासित होने में भागीदार |
| पद्धति | आदर्शवादी, निगमनात्मक | अनुभवजन्य; 158 संविधानों का अध्ययन |
- अरस्तू का मध्य मार्ग: राज्य "स्वभावतः व्यक्ति से पहले" है (जैसे पूरा शरीर अंग से पहले), क्योंकि व्यक्ति आत्म-निर्भर नहीं; पर राज्य का प्रयोजन व्यक्ति का "उत्तम जीवन" (eudaimonia) है। इस प्रकार राज्यवाद (राज्य सर्वोपरि) और व्यक्तिवाद (व्यक्ति सर्वोपरि) का समन्वय।
- सहमति के तर्क: निजी संपत्ति, परिवार, विधि का शासन और मध्यम-वर्गीय संविधान, ये सब व्यक्ति की स्वायत्तता और सामुदायिक हित दोनों का संतुलन करते हैं।
- सीमाएँ: अरस्तू भी दासता को "प्राकृतिक" मानते हैं, स्त्रियों और श्रमिकों को नागरिकता से बाहर रखते हैं, और राज्य को व्यक्ति से "पहले" मानते हैं। इसलिए यह आधुनिक अर्थ में व्यक्तिवाद नहीं।
- निष्कर्ष: हाँ, अरस्तू प्लेटो की तुलना में अधिक सफल हैं, पर उनका "मध्य मार्ग" यूनानी नगर-राज्य की सीमाओं में बँधा है।
6. सामाजिक अनुबंध सिद्धांत: उत्पत्ति और विकास (UPSC 2024)
- प्राचीन बीज:
- सोफ़िस्ट और प्लेटो के "Republic" में ग्लॉकॉन: न्याय अन्याय करने और सहने से बचने का समझौता।
- एपिक्यूरस: न्याय परस्पर हानि न करने का समझौता।
- भारतीय रूप: बौद्ध "अग्गञ्ञ सुत्त" में लोग "महासम्मत" (सबके द्वारा चुने गए) राजा को धान का अंश देकर व्यवस्था के लिए नियुक्त करते हैं। अर्थशास्त्र और महाभारत (शांति पर्व) में "मत्स्यन्याय" (बड़ी मछली छोटी को खाती है) से बचने के लिए प्रजा ने मनु को राजा चुना और कर देना स्वीकार किया।
- मध्यकाल: शासक और प्रजा के बीच "शासन-अनुबंध"; मैनगोल्ड (11वीं शताब्दी), अल्थूसियस, ग्रोशियस।
- आधुनिक शास्त्रीय रूप:
| विचारक | प्राकृतिक अवस्था | अनुबंध | परिणाम |
|---|---|---|---|
| हॉब्स ("Leviathan", 1651) | "सबका सबके विरुद्ध युद्ध"; जीवन "एकाकी, दरिद्र, घृणित, क्रूर और अल्पकालिक" | सब अपने अधिकार एक संप्रभु को सौंपते हैं (संप्रभु अनुबंध का पक्ष नहीं) | निरपेक्ष संप्रभुता; विद्रोह का अधिकार नहीं (आत्म-रक्षा छोड़कर) |
| लॉक ("Two Treatises", 1690) | शांतिपूर्ण पर असुविधाजनक; प्राकृतिक अधिकार: जीवन, स्वतंत्रता, संपत्ति | दो चरण: समाज-निर्माण, फिर सरकार को "न्यास" (trust) | सीमित सरकार; सहमति; विद्रोह का अधिकार |
| रूसो ("The Social Contract", 1762) | "उदात्त वन्य मनुष्य"; निजी संपत्ति से पतन | हर व्यक्ति स्वयं को "सामान्य इच्छा" (General Will) को सौंपता है | लोकप्रिय संप्रभुता; "मनुष्य स्वतंत्र जन्मा है, पर हर जगह ज़ंजीरों में है" |
| रॉल्स (1971) | मूल स्थिति (काल्पनिक) | अज्ञान के पर्दे के पीछे सिद्धांतों का चयन | न्याय के दो सिद्धांत |
- आलोचना:
- ह्यूम: अनुबंध ऐतिहासिक कल्पना है; सरकारें प्रायः बल या संयोग से बनीं।
- हेगेल: राज्य अनुबंध नहीं, नैतिक जीवन का उच्चतम रूप है।
- नारीवादी (कैरोल पेटमैन, "The Sexual Contract", 1988): सामाजिक अनुबंध के पीछे एक छिपा "यौन अनुबंध" है जो पुरुष-वर्चस्व स्थापित करता है।
- चार्ल्स मिल्स ("The Racial Contract", 1997): नस्लीय बहिष्करण।
- स्थायी महत्व: राजनीतिक सत्ता की वैधता "शासितों की सहमति" पर; संवैधानिक लोकतंत्र और मानवाधिकार का आधार।
7. संप्रभुता (Sovereignty)
- ज्याँ बोडाँ ("Six Books of the Commonwealth", 1576): "किसी राज्य की निरपेक्ष और स्थायी शक्ति"। संप्रभु मानव-निर्मित क़ानूनों से ऊपर, पर ईश्वरीय और प्राकृतिक नियमों तथा मूल क़ानूनों से बँधा।
- जॉन ऑस्टिन ("Lectures on Jurisprudence", 1832):
- "यदि कोई निर्धारित मानव श्रेष्ठ, जो किसी अन्य श्रेष्ठ की आज्ञा का अभ्यस्त रूप से पालन नहीं करता, किसी समाज के अधिकांश लोगों से अभ्यस्त आज्ञापालन प्राप्त करता है, तो वह श्रेष्ठ उस समाज में संप्रभु है।"
- क़ानून = संप्रभु का आदेश, दंड के भय से समर्थित।
- संप्रभुता अविभाज्य, असीम, निर्धारित (determinate) और एकात्मक (monistic)।
- आलोचना: संघीय राज्यों में संप्रभु कौन? परंपरा और रीति-रिवाज के क़ानून; हार्ट ("The Concept of Law", 1961): क़ानून "आदेश" नहीं, "नियमों" की व्यवस्था है; डाकू के आदेश और क़ानून में भेद।
- हैरोल्ड लास्की (बहुलवाद):
- "A Grammar of Politics" (1925) में लास्की ने कहा कि राजनीति-विज्ञान के लिए "संप्रभुता की पूरी धारणा का त्याग" स्थायी लाभ का होगा।
- समाज में अनेक संघ (चर्च, श्रमिक संघ, व्यावसायिक संघ) हैं, जिनकी अपनी वैध सत्ता है; राज्य उनमें "प्रथम समानों में" है।
- व्यक्ति की निष्ठा बहुल है; राज्य की आज्ञा का पालन उसके नैतिक औचित्य पर निर्भर है।
- संप्रभुता "विभाजित" होनी चाहिए; अंतरराष्ट्रीय स्तर पर निरपेक्ष संप्रभुता युद्ध की जड़।
- लोकप्रिय संप्रभुता: रूसो; भारत में "हम, भारत के लोग"।
7.1 कौटिल्य: अर्थशास्त्र में संप्रभुता (UPSC 2024, 2025)
- सप्तांग सिद्धांत (अर्थशास्त्र 6.1): राज्य के सात अंग: स्वामी (राजा), अमात्य (मंत्री), जनपद (प्रदेश और जनता), दुर्ग (क़िला), कोश (ख़ज़ाना), दंड (सेना और दंड-शक्ति), मित्र (सहयोगी)। संप्रभुता इन सातों के सम्मिलित सामर्थ्य में है, केवल राजा में नहीं; राजा "कूटस्थ" (केंद्रीय) अंग है।
- राजा का धर्म: "प्रजासुखे सुखं राज्ञः प्रजानां च हिते हितम्" (प्रजा के सुख में राजा का सुख, प्रजा के हित में राजा का हित)। संप्रभुता निरंकुश होकर भी जन-कल्याण से बँधी है; "योगक्षेम" राजा का दायित्व।
- दंडनीति: दंड के बिना मत्स्यन्याय; दंड न्यायपूर्ण हो, न अति कठोर, न अति नरम।
- आंतरिक संप्रभुता: गुप्तचर-तंत्र, नौकरशाही, कर-व्यवस्था, न्याय (धर्मस्थीय और कंटकशोधन न्यायालय)।
- बाह्य संप्रभुता: मंडल सिद्धांत:
- केंद्र में विजिगीषु (विजय का इच्छुक राजा); उसका निकटतम पड़ोसी स्वाभाविक "अरि" (शत्रु); अरि का पड़ोसी विजिगीषु का "मित्र"; फिर "अरि-मित्र", "मित्र-मित्र" आदि। पीछे "पार्ष्णिग्राह" (पीछे का शत्रु) और "आक्रंद" (पीछे का मित्र)।
- मध्यम (दोनों से सटा मध्यवर्ती शक्तिशाली राजा) और उदासीन (तटस्थ, दूर का शक्तिशाली राजा)।
- षाड्गुण्य (छह नीतियाँ): संधि (शांति), विग्रह (युद्ध), आसन (प्रतीक्षा), यान (आक्रमण की तैयारी), संश्रय (आश्रय), द्वैधीभाव (एक से संधि, दूसरे से युद्ध)।
- चार उपाय: साम, दान, भेद, दंड।
- "कोई स्थायी मित्र या शत्रु नहीं":
- मित्रता और शत्रुता भूगोल और हित से निर्धारित होती है, भावना या नैतिकता से नहीं। आज का मित्र, शक्ति-संतुलन बदलने पर, कल का शत्रु हो सकता है।
- नीति का चुनाव तुलनात्मक शक्ति से: "जब स्वयं दुर्बल हो, संधि करो; जब प्रबल हो, विग्रह करो" (अर्थशास्त्र 7.1)।
- संप्रभुता का अंतिम लक्ष्य राज्य की सुरक्षा और समृद्धि है, यही "राष्ट्रीय हित" है।
- पश्चिमी समानता: पामर्स्टन (1848): "हमारे न स्थायी मित्र हैं, न स्थायी शत्रु; हमारे हित स्थायी हैं"; मॉर्गेंथाउ का यथार्थवाद।
- आधुनिक प्रासंगिकता:
- राष्ट्रीय हित पर आधारित विदेश नीति, रणनीतिक स्वायत्तता और "बहु-संरेखण" (multi-alignment)।
- आर्थिक राज्य-कला (कोश का महत्व), ख़ुफ़िया तंत्र, आंतरिक सुरक्षा।
- कल्याणकारी राज्य का विचार (योगक्षेम)।
- सीमाएँ: राजतंत्र-केंद्रित; लोकप्रिय संप्रभुता, मौलिक अधिकार और अंतरराष्ट्रीय क़ानून की अनुपस्थिति; छल और गुप्तचरी का नैतिक प्रश्न। इसलिए प्रासंगिकता सिद्धांत (यथार्थवादी विश्लेषण) में है, अक्षरशः अनुकरण में नहीं।
8. व्यक्ति और राज्य: अधिकार, कर्तव्य और जवाबदेही
- अधिकारों के प्रकार: प्राकृतिक (लॉक), विधिक (ऑस्टिन, बेंथम: प्राकृतिक अधिकार "ऊँचे खंभों पर बकवास"), नैतिक, और मानवाधिकार (सार्वभौम घोषणा, 1948)।
- होहफ़ेल्ड (1913): दावा-अधिकार (claim) का सहसंबंधी कर्तव्य (duty); स्वतंत्रता (privilege), शक्ति (power) और उन्मुक्ति (immunity)।
- लास्की: "अधिकार सामाजिक जीवन की वे परिस्थितियाँ हैं जिनके बिना कोई व्यक्ति अपना सर्वोत्तम रूप प्राप्त नहीं कर सकता।"
- गांधी: "अधिकारों का सच्चा स्रोत कर्तव्य है। यदि हम सब अपने कर्तव्य निभाएँ, तो अधिकारों को खोजना नहीं पड़ेगा।"
- भारत: मौलिक अधिकार (भाग III) और मौलिक कर्तव्य (अनुच्छेद 51A, 42वाँ संशोधन 1976, स्वर्ण सिंह समिति)।
- जवाबदेही: राज्य की जवाबदेही (संवैधानिक सीमाएँ, न्यायिक समीक्षा, चुनाव) और नागरिक की जवाबदेही (क़ानून-पालन, कर, सहभागिता)।
8.1 "कर्तव्य दायित्व हैं और अधिकार हक़दारी, इसलिए दोनों में कोई अनिवार्य संबंध नहीं" (UPSC 2025)
- कथन से असहमति के तर्क:
- तार्किक सहसंबंध (होहफ़ेल्ड): मेरा दावा-अधिकार, किसी और का कर्तव्य है। मेरे जीवन के अधिकार का अर्थ है दूसरों का मुझे न मारने का कर्तव्य। हक़दारी बिना दायित्व के अर्थहीन है।
- नैतिक पारस्परिकता: यदि मैं अपने लिए अधिकार माँगता हूँ, तो दूसरों के समान अधिकार का सम्मान करना मेरा कर्तव्य है (कांट का सार्वभौमिकता सिद्धांत)।
- सामाजिक आधार: अधिकार समाज से मिलते हैं, इसलिए समाज के प्रति कर्तव्य (लास्की, ग्रीन)।
- गांधी और भारतीय परंपरा: धर्म (कर्तव्य) प्राथमिक; अधिकार कर्तव्य-पालन का परिणाम।
- कथन के आंशिक समर्थन में (असममिताएँ):
- कुछ कर्तव्यों के सहसंबंधी अधिकार नहीं होते: "अपूर्ण कर्तव्य" (दान, उपकार), किसी विशेष व्यक्ति के पास दान पाने का अधिकार नहीं।
- कुछ अधिकार-धारकों के कर्तव्य नहीं: शिशु, गंभीर रूप से मानसिक रोगी, (कुछ मतों में) पशु और भावी पीढ़ियाँ।
- अधिकार का आधार "हित" या "गरिमा" है, कर्तव्य-पालन की शर्त नहीं; अपराधी के भी मूलभूत अधिकार बने रहते हैं।
- निष्कर्ष: अधिकार और कर्तव्य में अनिवार्य संबंध है, पर वह सदा "एक ही व्यक्ति में" नहीं होता। एक का अधिकार दूसरे का कर्तव्य (अंतर-वैयक्तिक सहसंबंध) सार्वभौमिक है; जबकि "मेरा अधिकार मेरे कर्तव्य पर निर्भर" (अंतः-वैयक्तिक) केवल सामान्य नैतिक नियम है, निरपेक्ष नहीं। इसलिए कथन से असहमति उचित है।
9. शासन के रूप (संक्षेप में)
- अरस्तू का वर्गीकरण: एक का शासन (राजतंत्र, विकृत रूप निरंकुशतंत्र), कुछ का (अभिजाततंत्र, विकृत धनिकतंत्र), अनेक का (Polity, विकृत "लोकतंत्र")।
- राजतंत्र: निरपेक्ष (हॉब्स) और संवैधानिक (ब्रिटेन)।
- लोकतंत्र: प्रत्यक्ष, प्रतिनिधि, विचार-विमर्शी (deliberative, हैबरमास); लिंकन: "जनता का, जनता द्वारा, जनता के लिए"।
- धर्मतंत्र (Theocracy): देखें अगला अध्याय।
10. Master Summary Table
| विषय | मुख्य विचारक | मूल धारणा | याद रखें |
|---|---|---|---|
| स्वतंत्रता | मिल, बर्लिन, ग्रीन | नकारात्मक बनाम सकारात्मक; हानि-सिद्धांत | On Liberty 1859; 1958 |
| समानता | मिल, टॉनी, सेन | "किस चीज़ की समानता?" | Subjection of Women 1869 |
| न्याय | प्लेटो, अरस्तू, रॉल्स, नॉज़िक, सेन | सामंजस्य; वितरणात्मक; अज्ञान का पर्दा | 1971; 1974; 2009 |
| लोकतंत्र-आलोचना | प्लेटो | जहाज़; पतन-क्रम | पॉपर 1945 |
| सामाजिक अनुबंध | हॉब्स, लॉक, रूसो | प्राकृतिक अवस्था, सहमति | 1651, 1690, 1762 |
| संप्रभुता | बोडाँ, ऑस्टिन, लास्की, कौटिल्य | निरपेक्ष; आदेश; बहुलवाद; सप्तांग-मंडल | 1576; 1832; 1925 |
| अधिकार-कर्तव्य | होहफ़ेल्ड, लास्की, गांधी | सहसंबंध | अनुच्छेद 51A |
11. चार्ट: कौटिल्य का मंडल सिद्धांत
12. Mind Map
- स्वतंत्रता, समानता
- न्याय संयोजक
- प्लेटो: न्याय, लोकतंत्र-आलोचना
- अरस्तू: मध्य मार्ग
- हॉब्स, लॉक, रूसो
- अग्गञ्ञ, मत्स्यन्याय
- बोडाँ, ऑस्टिन, लास्की
- कौटिल्य: सप्तांग, मंडल
- अधिकार-कर्तव्य
- जवाबदेही
13. महत्वपूर्ण One-liners
- हानि-सिद्धांत: जे.एस. मिल, "On Liberty" (1859)।
- "Two Concepts of Liberty": ईसाया बर्लिन (1958)।
- "हर व्यक्ति एक गिना जाए": बेंथम।
- भेद-सिद्धांत (Difference Principle): रॉल्स।
- "न्याय शक्तिशाली का हित है": थ्रेसीमेकस ("Republic")।
- राज्य का जहाज़ का दृष्टांत: प्लेटो।
- "मनुष्य राजनीतिक प्राणी है": अरस्तू।
- "महासम्मत": अग्गञ्ञ सुत्त (बौद्ध)।
- संप्रभुता की परिभाषा, "निर्धारित मानव श्रेष्ठ": ऑस्टिन।
- सप्तांग सिद्धांत: अर्थशास्त्र 6.1।
- "प्रजासुखे सुखं राज्ञः": कौटिल्य।
- मौलिक कर्तव्य: अनुच्छेद 51A (42वाँ संशोधन, 1976)।
14. टिप्स एवं ट्रिक्स
- Paper II के उत्तरों में भारतीय संदर्भ (संविधान, आंबेडकर, गांधी, अर्थशास्त्र) जोड़ने से उत्तर विशिष्ट बनता है।
- "क्या आप सहमत हैं?" वाले प्रश्नों में पहले स्पष्ट पक्ष लें, फिर विपक्ष के तर्क और उनका उत्तर दें।
- विचारक, ग्रंथ और वर्ष (जैसे "Leviathan", 1651) लिखना प्रामाणिकता बढ़ाता है।
सप्तांग: "स्वा-अ-ज-दु-को-दं-मि"। षाड्गुण्य: "सं-वि-आ-या-सं-द्वै"। अनुबंध: "हॉब्स-भय, लॉक-अधिकार, रूसो-सामान्य इच्छा"।
"No permanent friends, no permanent enemies, only permanent interests" का अंग्रेज़ी रूप लॉर्ड पामर्स्टन (1848) का है, कौटिल्य का नहीं। कौटिल्य का विचार मंडल सिद्धांत में निहित है; उद्धरण को उनके नाम से अक्षरशः न लिखें।
15. PYQ-आधारित प्रश्न एवं मॉडल उत्तर
प्लेटो की लोकतंत्र-आलोचना पर टिप्पणी कीजिए।
मॉडल उत्तर
पृष्ठभूमि: सुकरात का मृत्युदंड।
तर्क: जहाज़, ज्ञान बनाम मत, स्वतंत्रता की अति, demagogue, पतन-क्रम।
मूल्यांकन: पॉपर; वास्तविक कमज़ोरियाँ।
जे.एस. मिल के अनुसार समानता की प्रमुख विशेषताओं की विवेचना कीजिए।
मॉडल उत्तर
विशेषताएँ: उपयोगितावादी आधार, समान स्वतंत्रता, लैंगिक समानता, अवसर-समानता, आर्थिक दृष्टि।
तनाव: बहुल मताधिकार, उपनिवेश, उच्च-निम्न सुख।
प्लेटो की न्याय की अवधारणा की संक्षेप में विवेचना कीजिए।
मॉडल उत्तर
प्रचलित मतों का खंडन।
सिद्धांत: राज्य में तीन वर्ग, आत्मा में तीन भाग; सामंजस्य; चार सद्गुण।
आलोचना।
सामाजिक अनुबंध सिद्धांत की उत्पत्ति और विकास का संक्षिप्त विवरण प्रस्तुत कीजिए।
मॉडल उत्तर
बीज: ग्लॉकॉन, एपिक्यूरस, अग्गञ्ञ सुत्त, मत्स्यन्याय।
तालिका: हॉब्स, लॉक, रूसो, रॉल्स।
आलोचना और महत्व।
"कोई स्थायी मित्र या स्थायी शत्रु नहीं होता।" कौटिल्य के संप्रभुता-विचार के आलोक में इस कथन की विवेचना कीजिए।
मॉडल उत्तर (रूपरेखा)
सप्तांग और योगक्षेम।
मंडल (चार्ट), षाड्गुण्य, उपाय।
कथन: हित और भूगोल; पामर्स्टन और मॉर्गेंथाउ से तुलना; भारत की विदेश नीति।
न्याय के बिना स्वतंत्रता और समानता, दोनों सामाजिक और राजनीतिक आदर्शों के रूप में किस प्रकार अपर्याप्त हैं? विवेचना कीजिए।
मॉडल उत्तर (रूपरेखा)
स्वतंत्रता की अपर्याप्तता; समानता की अपर्याप्तता ("किस चीज़ की?")।
न्याय की भूमिका: रॉल्स, suum cuique।
निष्कर्ष: सामग्री और रूप; प्रस्तावना।
"कर्तव्य दायित्व के स्वरूप के हैं जबकि अधिकार हक़दारी के स्वरूप के। इसलिए दोनों में कोई अनिवार्य संबंध नहीं है।" क्या आप सहमत हैं? अपने उत्तर के लिए कारण और औचित्य दीजिए।
मॉडल उत्तर (रूपरेखा)
असहमति: होहफ़ेल्ड, पारस्परिकता, सामाजिक आधार, गांधी।
असममिताएँ: अपूर्ण कर्तव्य, शिशु, गरिमा-आधारित अधिकार।
निष्कर्ष: अंतर-वैयक्तिक सहसंबंध अनिवार्य।
राजनीतिक आदर्शों के रूप में स्वतंत्रता और समानता की अवधारणाओं का आलोचनात्मक मूल्यांकन कीजिए।
मॉडल उत्तर (रूपरेखा)
अवधारणाएँ: नकारात्मक-सकारात्मक स्वतंत्रता; समानता के प्रकार।
विरोध (हायेक, नॉज़िक) बनाम पूरकता (टॉनी, रॉल्स, सेन)।
निष्कर्ष: आंबेडकर की त्रिमूर्ति।
क्या आप इस मत से सहमत हैं कि अरस्तू "राज्यवाद" और "व्यक्तिवाद" के बीच मध्य मार्ग अपनाने में प्लेटो से अधिक सफल रहे? तर्क सहित विवेचना कीजिए।
मॉडल उत्तर (रूपरेखा)
तालिका: एकता, संपत्ति, परिवार, शासन, नागरिक, पद्धति।
मध्य मार्ग: राज्य स्वभावतः पहले, पर उत्तम जीवन के लिए।
सीमाएँ: दासता, बहिष्करण। निष्कर्ष।
संप्रभुता की अवधारणा के संबंध में अर्थशास्त्र क्या अंतर्दृष्टि देता है? क्या आधुनिक समय में इसकी कोई प्रासंगिकता है? आलोचनात्मक विवेचना कीजिए।
मॉडल उत्तर (रूपरेखा)
अंतर्दृष्टि: सप्तांग, कल्याण, दंडनीति, आंतरिक तंत्र, मंडल।
प्रासंगिकता: राष्ट्रीय हित, रणनीतिक स्वायत्तता, आर्थिक राज्य-कला, कल्याण।
सीमाएँ: राजतंत्र, अधिकारों का अभाव, नैतिकता।
ऑस्टिन के संप्रभुता सिद्धांत की लास्की द्वारा की गई बहुलवादी आलोचना का परीक्षण कीजिए। क्या संघीय लोकतंत्रों में "संप्रभुता" की धारणा अब भी उपयोगी है?
मॉडल उत्तर (रूपरेखा)
ऑस्टिन: परिभाषा, लक्षण।
लास्की: संघ, बहुल निष्ठा, विभाजित संप्रभुता; हार्ट।
भारत: संविधान की सर्वोच्चता, लोकप्रिय संप्रभुता।
16. Quick Revision Summary
- स्वतंत्रता: नकारात्मक-सकारात्मक; मिल का हानि-सिद्धांत; बर्लिन।
- समानता: प्रकार; मिल की विशेषताएँ और तनाव; स्वतंत्रता से संबंध।
- न्याय: प्लेटो (सामंजस्य), अरस्तू (आनुपातिक), रॉल्स (दो सिद्धांत), नॉज़िक, सेन; न्याय संयोजक सिद्धांत।
- प्लेटो-अरस्तू: लोकतंत्र-आलोचना; अरस्तू का मध्य मार्ग।
- अनुबंध: प्राचीन बीज से रॉल्स तक; आलोचनाएँ।
- संप्रभुता: बोडाँ, ऑस्टिन, लास्की; कौटिल्य का सप्तांग और मंडल।
- अधिकार-कर्तव्य: सहसंबंध अनिवार्य, पर असममिताएँ भी।