1. अध्याय एक नज़र में
Paper II, Section A का दूसरा भाग समकालीन सामाजिक मुद्दों पर दार्शनिक दृष्टि है:
- राजनीतिक विचारधाराएँ: अराजकतावाद, मार्क्सवाद, समाजवाद और साम्यवाद, मानववाद (टैगोर, एम.एन. रॉय)।
- धर्मनिरपेक्षता, बहुसंस्कृतिवाद और धर्मतंत्र।
- अपराध और दंड: भ्रष्टाचार, सामूहिक हिंसा, नरसंहार, मृत्युदंड।
- विकास और सामाजिक प्रगति; जनजातीय मूल्य।
- लैंगिक भेदभाव: कन्या भ्रूण-हत्या, भूमि और संपत्ति अधिकार, सशक्तीकरण।
- जाति भेदभाव: गांधी और आंबेडकर।
यह Paper II का सबसे अधिक पूछा जाने वाला अध्याय है: 2025 में 9 और 2024 में 9 प्रश्न इसी से आए।
2. राजनीतिक विचारधाराएँ
2.1 अराजकतावाद (Anarchism)
- मूल विचार: राज्य (बल पर आधारित सत्ता) अनावश्यक और हानिकारक है; समाज स्वैच्छिक सहयोग से चल सकता है।
- प्रमुख विचारक: प्रूधों ("संपत्ति चोरी है", 1840), बाकूनिन (राज्य-विरोधी समाजवाद), क्रोपोटकिन ("Mutual Aid", 1902: सहयोग भी विकास का नियम), टॉल्स्टॉय (ईसाई अराजकतावाद)।
- गांधी का "प्रबुद्ध अराजकता": आदर्श स्थिति में हर व्यक्ति स्वयं-शासित हो, तो राज्य की आवश्यकता नहीं; व्यवहार में "जो सबसे कम शासन करे, वही सर्वोत्तम सरकार"। ग्राम-स्वराज।
- आलोचना: मानव स्वभाव के प्रति अति-आशावाद; सामूहिक सुरक्षा और बड़े पैमाने के समन्वय की समस्या।
2.2 मार्क्सवाद एक राजनीतिक विचारधारा के रूप में (UPSC 2025)
- मूल सिद्धांत:
- ऐतिहासिक भौतिकवाद: उत्पादन के साधन और संबंध (आधार) राजनीति, क़ानून, धर्म, विचारधारा (अधिरचना) को निर्धारित करते हैं।
- द्वंद्वात्मक भौतिकवाद: हेगेल की द्वंद्वात्मकता "सिर के बल" से "पैरों पर"; विकास का प्रेरक भौतिक विरोध।
- वर्ग-संघर्ष: "अब तक के सभी समाजों का इतिहास वर्ग-संघर्ष का इतिहास है" ("Communist Manifesto", 1848)।
- अतिरिक्त मूल्य: पूँजीपति का लाभ श्रमिक के अवैतनिक श्रम से ("Das Kapital", 1867)।
- क्रांति, सर्वहारा का अधिनायकत्व, और राज्य का "मुरझा जाना"।
- शक्तियाँ: पूँजीवाद के शोषण और असमानता की गहरी आलोचना; श्रमिक अधिकारों, कल्याणकारी राज्य और उपनिवेश-विरोधी आंदोलनों पर प्रभाव; विचारधारा और सत्ता के संबंध का विश्लेषण (ग्राम्शी का "हेगेमनी")।
- कमज़ोरियाँ:
- आर्थिक नियतिवाद: धर्म, राष्ट्रवाद और संस्कृति की स्वतंत्र भूमिका की उपेक्षा।
- असफल भविष्यवाणियाँ: क्रांति विकसित पूँजीवादी देशों में नहीं, अपेक्षाकृत पिछड़े रूस (1917) और चीन (1949) में हुई; पूँजीवाद ने सुधार से स्वयं को ढाल लिया।
- अधिनायकवादी परिणाम: "सर्वहारा का अधिनायकत्व" व्यवहार में दल का अधिनायकत्व बना; व्यक्तिगत अधिकारों की उपेक्षा।
- पॉपर: सिद्धांत को हर स्थिति में सही ठहराने के लिए बदल दिया गया, इसलिए वह "अमिथ्यापनीय" (unfalsifiable) हो गया।
- संशोधनवाद (बर्नस्टीन): क्रांति नहीं, विकास से समाजवाद।
- निष्कर्ष: एक "विश्लेषणात्मक उपकरण" के रूप में मार्क्सवाद प्रासंगिक है, पर एक "पूर्ण राजनीतिक कार्यक्रम" के रूप में उसकी विश्वसनीयता घटी है।
2.3 मार्क्स का अलगाव (Alienation) सिद्धांत (UPSC 2024)
- स्रोत: "Economic and Philosophic Manuscripts" (1844)।
- अर्थ: पूँजीवादी उत्पादन में श्रमिक अपनी ही सृजनात्मक शक्ति से पराया हो जाता है। श्रम, जो मनुष्य की सार-अभिव्यक्ति होना चाहिए, उसके लिए दबाव और कष्ट बन जाता है।
- अलगाव के चार रूप:
- उत्पाद से: जो वस्तु श्रमिक बनाता है, वह पूँजीपति की हो जाती है और उसके विरुद्ध एक "परायी शक्ति" बनकर खड़ी होती है।
- उत्पादन-प्रक्रिया से: श्रम स्वैच्छिक नहीं, बाध्य है; श्रमिक काम के बाहर ही "स्वयं" को महसूस करता है।
- प्रजाति-सार (Species-being, Gattungswesen) से: मनुष्य की विशेषता स्वतंत्र, सचेत, सृजनात्मक क्रिया है; अलगाव में वह केवल जीवन-निर्वाह का साधन रह जाती है।
- दूसरे मनुष्यों से: मनुष्य-मनुष्य के संबंध प्रतिस्पर्धा और विनिमय के संबंध बन जाते हैं।
- कारण: निजी संपत्ति और श्रम-विभाजन। समाधान: साम्यवाद, जिसमें श्रम पुनः आत्माभिव्यक्ति बने।
- समकालीन प्रासंगिकता: गिग-अर्थव्यवस्था, एल्गोरिथ्म-नियंत्रित श्रम, उपभोक्तावाद (फ़्रैंकफ़र्ट स्कूल)।
2.4 समाजवाद और साम्यवाद की तुलना (UPSC 2024)
| आधार | समाजवाद | साम्यवाद |
|---|---|---|
| वितरण सिद्धांत | "हर एक से उसकी क्षमता के अनुसार, हर एक को उसके कार्य के अनुसार" | "हर एक से उसकी क्षमता के अनुसार, हर एक को उसकी आवश्यकता के अनुसार" (मार्क्स, "Critique of the Gotha Programme", 1875) |
| संपत्ति | प्रमुख उत्पादन-साधनों का सामाजिक या राजकीय स्वामित्व; कुछ निजी संपत्ति संभव | निजी संपत्ति का पूर्ण उन्मूलन |
| राज्य | राज्य बना रहता है (कल्याण और नियोजन के लिए) | राज्य-विहीन, वर्ग-विहीन समाज |
| मार्ग | प्रायः लोकतांत्रिक और क्रमिक (फ़ेबियन, सामाजिक लोकतंत्र) | क्रांतिकारी (मार्क्सवादी-लेनिनवादी) |
| मार्क्सवाद में स्थान | साम्यवाद की पहली, निम्न अवस्था | अंतिम, उच्च अवस्था |
| उदाहरण | स्कैंडिनेवियाई कल्याणकारी राज्य; भारत का "समाजवादी" (42वाँ संशोधन, 1976) लोकतंत्र | शुद्ध रूप में कहीं साकार नहीं; पूर्व सोवियत संघ जैसे राज्य स्वयं को "समाजवादी" कहते थे |
3. मानववाद (Humanism)
3.1 मानववाद के मूल सिद्धांत और प्रबोधन (UPSC 2024)
- मूल सिद्धांत:
- मनुष्य की गरिमा और केंद्रीयता ("मनुष्य सब वस्तुओं का मापदंड है", प्रोटागोरस)।
- बुद्धि और अनुभव पर भरोसा; अंधविश्वास और हठधर्मिता का विरोध।
- मानव स्वायत्तता और स्वतंत्र इच्छा।
- धर्मनिरपेक्ष (ईश्वर-निरपेक्ष) नैतिकता; इसी जीवन में कल्याण।
- प्रगति, शिक्षा और विज्ञान में विश्वास।
- सार्वभौमिक मानवाधिकार और भाईचारा।
- पुनर्जागरण मानववाद (14वीं-16वीं शताब्दी): पिको देला मिरांदोला ("Oration on the Dignity of Man", 1486: मनुष्य स्वयं को गढ़ने वाला); पेट्रार्क, इरास्मस; यूनानी-रोमन ग्रंथों का पुनरुद्धार।
- प्रबोधन (17वीं-18वीं शताब्दी) ने कैसे मार्ग प्रशस्त किया:
- बुद्धि की सर्वोच्चता: कांट, "What is Enlightenment?" (1784): "प्रबोधन मनुष्य का अपनी स्व-आरोपित अपरिपक्वता से निकलना है"; नारा "Sapere aude" (जानने का साहस करो)।
- वैज्ञानिक क्रांति: न्यूटन; प्रकृति बुद्धि-ग्राह्य नियमों से चलती है, चमत्कार से नहीं।
- धर्म-सत्ता की आलोचना: वॉल्टेयर ("Écrasez l'infâme"), धार्मिक सहिष्णुता (लॉक, 1689)।
- प्राकृतिक अधिकार और गणतंत्रवाद: लॉक, मोंटेस्क्यू, रूसो; अमेरिकी (1776) और फ़्रांसीसी (1789) घोषणाएँ।
- शिक्षा और ज्ञान का प्रसार: दिदरो का "Encyclopédie"।
- कांट की नैतिकता: मनुष्य को सदा "साध्य" मानो, केवल "साधन" नहीं; यही मानव गरिमा का दार्शनिक आधार।
- अन्य रूप: अस्तित्ववादी मानववाद (सार्त्र), मार्क्सवादी मानववाद (युवा मार्क्स), एम.एन. रॉय का "उग्र (नव) मानववाद" (Radical Humanism, 1940 के दशक): तर्क, नैतिकता और स्वतंत्रता पर आधारित; दलविहीन लोकतंत्र।
- आलोचना: "मानव-केंद्रवाद" से पर्यावरण का शोषण; उत्तर-आधुनिक आलोचना ("मनुष्य की मृत्यु", फ़ूको); प्रबोधन की बुद्धि का "साधनात्मक बुद्धि" में बदलना (अडोर्नो और हॉर्कहाइमर, 1944)।
3.2 टैगोर के मानववाद में विरोधों का समन्वय (UPSC 2025)
- स्रोत: "The Religion of Man" (हिबर्ट व्याख्यान, ऑक्सफ़र्ड, 1930), "Sadhana" (1913), "Nationalism" (1917)।
- समन्वय के आयाम:
- सीमित और असीम: मनुष्य में "अतिरेक" (surplus) है, जो उसे भौतिक आवश्यकताओं से आगे सृजन, कला और प्रेम की ओर ले जाता है; यही उसमें असीम की झलक है।
- मानव और दिव्य: ईश्वर मनुष्य से बाहर नहीं, "मनुष्य का ईश्वर" (Man the Eternal) है; "जीवन-देवता" की धारणा। धर्म का अर्थ मानवता में दिव्यता की अनुभूति।
- व्यक्ति और विश्व: व्यक्ति का पूर्ण विकास विश्व-चेतना से जुड़ने में; "विश्व-मानव"।
- मनुष्य और प्रकृति: प्रकृति से संघर्ष नहीं, सामंजस्य; शांतिनिकेतन की शिक्षा प्रकृति के बीच।
- पूर्व और पश्चिम: पश्चिम का विज्ञान और पूर्व का आत्म-ज्ञान, दोनों का मिलन; विश्वभारती का आदर्श-वाक्य "यत्र विश्वं भवत्येकनीडम्" (जहाँ विश्व एक घोंसला बनता है)।
- राष्ट्र और मानवता: संकीर्ण राष्ट्रवाद (राष्ट्र एक "मशीन") की आलोचना; अंतरराष्ट्रीयतावाद।
- परंपरा और आधुनिकता, बुद्धि और भावना।
- समन्वय का सिद्धांत: विरोधी तत्वों का एक को मिटाकर दूसरे की जीत नहीं, बल्कि "लय" और "सामंजस्य" (harmony), जैसे संगीत में स्वर। प्रेम ही वह शक्ति है जो द्वैत को एकता में बाँधती है।
- मूल्यांकन: एक समृद्ध, समावेशी और पर्यावरण-संवेदी मानववाद; पर व्यवस्थित तर्क के बजाय काव्यात्मक अंतर्दृष्टि पर आधारित; राजनीतिक व्यवहार (उपनिवेशवाद, संघर्ष) में व्यावहारिक मार्ग अस्पष्ट (गांधी से "चरखा" और असहयोग पर मतभेद)।
4. धर्मनिरपेक्षता, बहुसंस्कृतिवाद और धर्मतंत्र
4.1 धर्मनिरपेक्षता के मॉडल
| मॉडल | स्वरूप | उदाहरण |
|---|---|---|
| पृथक्करण ("दीवार") | राज्य और धर्म पूर्णतः अलग; राज्य किसी धर्म को न सहायता दे, न बाधा | अमेरिका (प्रथम संशोधन, 1791) |
| लाइसीते (Laïcité) | सार्वजनिक क्षेत्र से धर्म का बहिष्कार; राज्य धर्म से ऊपर | फ़्रांस (1905 का क़ानून) |
| भारतीय: "सैद्धांतिक दूरी" | सभी धर्मों के प्रति समान सम्मान; सुधार और समानता के लिए राज्य का हस्तक्षेप संभव | अनुच्छेद 25-28; 25(2) सुधार; एस.आर. बोम्मई (1994): धर्मनिरपेक्षता मूल ढाँचे का हिस्सा |
"सैद्धांतिक दूरी" (Principled Distance) राजीव भार्गव की संकल्पना है; "सर्व धर्म समभाव" गांधी का आदर्श।
4.2 गांधी की धर्मनिरपेक्षता: लोकतंत्र का आधार (UPSC 2024)
- धर्म और नैतिकता: गांधी के लिए राजनीति धर्म (नैतिकता, सत्य) से अलग नहीं हो सकती: "जो कहते हैं धर्म का राजनीति से कोई संबंध नहीं, वे धर्म का अर्थ नहीं जानते।" यहाँ "धर्म" का अर्थ नैतिक सत्य है, संप्रदाय नहीं।
- राज्य और संप्रदाय का पृथक्करण: उन्होंने लिखा कि धर्म व्यक्ति का निजी विषय है और राज्य का उससे कोई लेना-देना नहीं होना चाहिए; राज्य धर्मनिरपेक्ष हो और सबके कल्याण की चिंता करे (हरिजन, 1946-47 के लेख)।
- सर्व धर्म समभाव: सभी धर्मों के प्रति समान आदर; हर धर्म में सत्य है और हर धर्म अपूर्ण है। सर्व-धर्म प्रार्थना सभाएँ।
- सहिष्णुता से आगे: "सहिष्णुता" में श्रेष्ठता का भाव झलकता है; गांधी "समान आदर" चाहते थे।
- लोकतंत्र के आधार के रूप में:
- समान नागरिकता: धर्म के आधार पर कोई भेद नहीं; अल्पसंख्यकों की सुरक्षा (1947 के दंगों में उनके उपवास)।
- अहिंसा और सत्याग्रह, जो संवाद आधारित लोकतंत्र का नैतिक आधार हैं।
- राष्ट्रीय एकता: हिंदू-मुस्लिम एकता स्वराज की पूर्व-शर्त।
- आलोचना: धार्मिक प्रतीकों ("रामराज्य", प्रार्थना सभाओं) के प्रयोग से कुछ अल्पसंख्यकों में आशंका; आंबेडकर और नेहरू का अधिक सख़्त धर्मनिरपेक्ष दृष्टिकोण।
4.3 क्या धर्मनिरपेक्षता का विचार अनिवार्यतः धार्मिक बहुलवाद से जुड़ा है? (UPSC 2025)
- संबंध के पक्ष में:
- ऐतिहासिक रूप से धर्मनिरपेक्षता धार्मिक बहुलता से उपजी: यूरोप के धर्म-युद्धों के बाद वेस्टफ़ेलिया (1648) और लॉक का "A Letter Concerning Toleration" (1689)।
- भारत में धर्मनिरपेक्षता गहरी धार्मिक विविधता का उत्तर है।
- मानक स्तर पर, बहुलवाद (विविधता को मूल्यवान मानना) धर्मनिरपेक्ष राज्य के "समान आदर" को मज़बूत करता है।
- अनिवार्यता के विरुद्ध:
- बहुलवाद बिना धर्मनिरपेक्षता: अकबर का "सुलह-ए-कुल", ऑटोमन "मिल्लत" व्यवस्था। ये धार्मिक राज्य थे, पर विविधता को स्थान देते थे।
- धर्मनिरपेक्षता बिना बहुलवाद: धार्मिक रूप से अपेक्षाकृत समरूप समाज भी स्वतंत्रता और समानता के कारण धर्मनिरपेक्ष हो सकता है (राज्य को किसी धर्म का पक्ष न लेना, नास्तिकों के अधिकार)।
- विरोध की संभावना: उग्र धर्मनिरपेक्षता (लाइसीते) सार्वजनिक क्षेत्र में धार्मिक पहचान (जैसे सिर ढकने के प्रतीक) को सीमित करके व्यावहारिक बहुलता को कम कर सकती है।
- निष्कर्ष: संबंध "अनिवार्य" नहीं, बल्कि "आकस्मिक पर गहरा" है। धर्मनिरपेक्षता का मूल आधार समान नागरिकता और अंतःकरण की स्वतंत्रता है; बहुलवाद उसकी सबसे सामान्य परिस्थिति और औचित्य है।
4.4 बहुसंस्कृतिवाद: सहिष्णुता और सह-अस्तित्व (UPSC 2024)
- बहुसंस्कृतिवाद: सांस्कृतिक विविधता का केवल तथ्य नहीं, बल्कि उसकी मान्यता और संरक्षण का मानक सिद्धांत।
- विल किमलिका ("Multicultural Citizenship", 1995): अल्पसंख्यक-विशिष्ट अधिकार।
- चार्ल्स टेलर ("The Politics of Recognition", 1992): ग़लत मान्यता भी उत्पीड़न है।
- भीखू पारेख ("Rethinking Multiculturalism", 2000): संस्कृतियों के बीच संवाद।
- नैतिक सिद्धांतों की भूमिका:
- सहिष्णुता: असहमत होते हुए भी दूसरे को सहन करना (लॉक, मिल, वॉल्टेयर)। यह न्यूनतम शर्त है, जो हिंसा रोकती है।
- सह-अस्तित्व और समान आदर: सहन करने से आगे, सम्मान और संवाद। अशोक का बारहवाँ शिलालेख: "समवाय (मेल-मिलाप) ही प्रशंसनीय है"; दूसरे संप्रदाय का आदर करने से अपना संप्रदाय भी बढ़ता है।
- जैन अनेकांतवाद: सत्य के अनेक पक्ष, जो बौद्धिक विनम्रता देते हैं।
- ये सिद्धांत पहचान की राजनीति को संघर्ष से संवाद की ओर ले जाते हैं।
- सीमाएँ और आलोचना:
- सहिष्णुता का विरोधाभास (पॉपर, 1945): असहिष्णु के प्रति असीम सहिष्णुता अंततः सहिष्णुता को नष्ट कर देती है।
- सुज़न ओकिन ("Is Multiculturalism Bad for Women?", 1999): समूह-अधिकार समूह के भीतर स्त्रियों के उत्पीड़न को ढक सकते हैं।
- सापेक्षवाद और "समानांतर समाज" (ghettoisation) का ख़तरा।
- निष्कर्ष: सहिष्णुता और सह-अस्तित्व बहुसांस्कृतिक समाज की नैतिक नींव हैं, पर उन्हें सार्वभौमिक मानवाधिकारों की सीमा में रहना होगा।
4.5 क्या धर्मतंत्र (Theocracy) शासन का वैध रूप है? (UPSC 2025)
- अर्थ: ऐसा शासन जिसमें सत्ता ईश्वर के नाम पर धार्मिक नेताओं या धार्मिक क़ानून के माध्यम से चलती है (शब्द: यहूदी इतिहासकार जोसेफ़स)। उदाहरण: वेटिकन, ईरान (1979 के बाद "विलायत-ए-फ़कीह"), तालिबान का अफ़ग़ानिस्तान।
- पक्ष के तर्क: नैतिक आधार और सामाजिक एकता; आस्थावानों के लिए वैधता; भौतिकवाद और भ्रष्टाचार का विरोध।
- विपक्ष के तर्क:
- समान नागरिकता का उल्लंघन: अन्य धर्मों के लोग, नास्तिक और असहमत संप्रदाय दूसरे दर्जे के नागरिक बन जाते हैं।
- व्याख्या की समस्या: "ईश्वर की इच्छा" कौन तय करेगा? मानव पुरोहितों की व्याख्या, यानी वास्तव में कुछ लोगों का शासन, जिसे ईश्वरीय कहकर आलोचना से परे कर दिया जाता है।
- अंतःकरण की स्वतंत्रता: आस्था बलपूर्वक नहीं थोपी जा सकती (लॉक)।
- लोकतंत्र और जवाबदेही: ईश्वरीय वैधता चुनावी जवाबदेही को कमज़ोर करती है।
- रॉल्स का "सार्वजनिक तर्क": बहुल समाज में क़ानूनों का औचित्य ऐसे तर्कों से होना चाहिए जिन्हें सभी नागरिक स्वीकार कर सकें, किसी एक धर्म के सिद्धांतों से नहीं।
- इतिहास में धार्मिक उत्पीड़न (इंक्विज़िशन) के उदाहरण।
- निष्कर्ष: आधुनिक बहुल समाज में धर्मतंत्र वैध शासन-रूप नहीं माना जा सकता। धार्मिक मूल्य लोकतांत्रिक संवाद को नैतिक प्रेरणा दे सकते हैं, पर राज्य-सत्ता का आधार संवैधानिक, धर्मनिरपेक्ष और मानवाधिकार-सम्मत होना चाहिए।
5. अपराध और दंड
5.1 दंड के सिद्धांत
- प्रतिशोधात्मक (Retributive): अपराधी दंड का "पात्र" है (desert)। कांट: "यदि नागरिक समाज भंग भी होने वाला हो, तो भी जेल का अंतिम हत्यारा फाँसी पर चढ़ाया जाए।" दंड अपराध के अनुपात में।
- निवारक (Deterrent): बेंथम (उपयोगितावाद): दंड का औचित्य भविष्य के अपराधों को रोकने में।
- सुधारात्मक (Reformative): अपराधी रोगी है, उसका उपचार हो। गांधी: "पाप से घृणा करो, पापी से नहीं।"
- निरोधात्मक (Preventive): अपराधी को समाज से अलग कर अपराध की क्षमता छीनना।
5.2 मृत्युदंड: क्या यह प्रभावी निवारक है? (UPSC 2024)
- स्वीकार करने के तर्क:
- प्रतिशोध और न्याय: जघन्य अपराध (बलात्कार-हत्या, आतंकवाद) के लिए आनुपातिक दंड।
- निवारण: मृत्यु का भय सबसे बड़ा भय है (बेंथम का तर्क)।
- पीड़ित परिवार और समाज की न्याय-भावना।
- अस्वीकार करने के तर्क:
- निवारण का अनुभवजन्य प्रमाण अनिर्णायक: अमेरिकी नेशनल रिसर्च काउंसिल (2012) ने निष्कर्ष दिया कि मौजूदा अध्ययन मृत्युदंड के निवारक प्रभाव के बारे में कुछ भी निश्चित नहीं बताते। जुनून में या आतंकवादी विचारधारा से किए गए अपराधों में भय काम नहीं करता।
- अपरिवर्तनीयता और न्यायिक भूल: निर्दोष की फाँसी को वापस नहीं लिया जा सकता।
- भेदभाव: भारत में विधि आयोग की 262वीं रिपोर्ट (2015) ने पाया कि मृत्युदंड पाने वालों में आर्थिक और सामाजिक रूप से कमज़ोर लोगों का अनुपात अधिक है; उसने आतंकवाद और राज्य के विरुद्ध युद्ध को छोड़ शेष अपराधों में इसके उन्मूलन की सिफ़ारिश की।
- सुधार की असंभवता; "राज्य द्वारा हत्या" का नैतिक प्रश्न।
- भारत की स्थिति: बचन सिंह बनाम पंजाब राज्य (1980): मृत्युदंड केवल "विरलतम में विरल" (rarest of rare) मामलों में; माछी सिंह (1983) में मार्गदर्शन।
- वैश्विक प्रवृत्ति: दो-तिहाई से अधिक देशों ने क़ानून या व्यवहार में मृत्युदंड समाप्त कर दिया है (एमनेस्टी इंटरनेशनल के आँकड़े)।
5.3 क्या जीवन का अधिकार निरपेक्ष हो सकता है? (UPSC 2025)
- निरपेक्ष मानने के तर्क:
- बेकारिया ("On Crimes and Punishments", 1764): सामाजिक अनुबंध में किसी ने राज्य को अपना जीवन लेने का अधिकार नहीं सौंपा।
- मानव गरिमा (कांट का "साध्य"); जीवन अन्य सभी अधिकारों का आधार।
- अंतरराष्ट्रीय प्रवृत्ति: ICCPR का द्वितीय वैकल्पिक प्रोटोकॉल (1989), जो मृत्युदंड उन्मूलन का लक्ष्य रखता है।
- निरपेक्ष न मानने के तर्क:
- अधिकार-त्याग (Forfeiture) सिद्धांत (लॉक): जो दूसरों का जीवन लेता है, वह स्वयं जीवन के अधिकार का दावा खो देता है।
- आत्म-रक्षा और युद्ध में जीवन लेना सामान्यतः स्वीकार्य माना जाता है, यानी जीवन का अधिकार व्यवहार में "प्रथमदृष्टया" (prima facie) है।
- कांट: न्याय की माँग; दंड अपराधी की "बौद्धिकता" का सम्मान है।
- भारतीय संवैधानिक स्थिति: अनुच्छेद 21: "विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया के अनुसार ही" जीवन से वंचित किया जा सकता है; मेनका गांधी (1978): प्रक्रिया न्यायसंगत, उचित और युक्तियुक्त हो। अतः भारत में यह अधिकार निरपेक्ष नहीं, पर अत्यंत संरक्षित है।
- निष्कर्ष: नैतिक दृष्टि से जीवन के अधिकार को "लगभग निरपेक्ष" मानना उचित है: उसे केवल तात्कालिक ख़तरे (आत्म-रक्षा) में सीमित किया जाए। दंड के रूप में, जब आजीवन कारावास से समाज की सुरक्षा संभव है, मृत्युदंड का औचित्य कमज़ोर है।
5.4 भ्रष्टाचार: विशिष्टतावादी और सार्वभौमिकतावादी मानदंड (UPSC 2025)
- पद: टैलकॉट पार्सन्स के "प्रतिमान चर" (pattern variables): विशिष्टतावाद (particularism, संबंध के आधार पर व्यवहार: परिवार, जाति, मित्र) बनाम सार्वभौमिकतावाद (universalism, सब पर समान, निष्पक्ष नियम)।
- कथन से सहमति के तर्क:
- वेबर की आधुनिक नौकरशाही सार्वभौमिक, निर्वैयक्तिक नियमों पर टिकी है; पर सामाजिक जीवन में व्यक्ति पर परिवार और समुदाय के प्रति विशिष्ट दायित्व हैं।
- भाई-भतीजावाद, जातिगत पक्षपात और "उपहार" की संस्कृति इसी तनाव से उपजते हैं: जिसे समुदाय "कर्तव्य" मानता है, वह पद की दृष्टि से "भ्रष्टाचार" है।
- एडवर्ड बैनफ़ील्ड की "अनैतिक परिवारवाद" (amoral familism, 1958) की अवधारणा।
- सीमाएँ:
- भ्रष्टाचार केवल मानदंडों के टकराव से नहीं, बल्कि लोभ, संस्थागत कमज़ोरी, अपर्याप्त वेतन, विवेकाधिकार और दंड के अभाव से भी होता है (क्लिटगार्ड का सूत्र: भ्रष्टाचार = एकाधिकार + विवेकाधिकार - जवाबदेही)।
- विकसित, सार्वभौमिक-नियम वाले समाजों में भी बड़े कॉर्पोरेट घोटाले होते हैं।
- हर विशिष्ट दायित्व अनैतिक नहीं: परिवार के प्रति प्रेम स्वाभाविक है; समस्या तब है जब वह सार्वजनिक पद में प्रवेश करे।
- निष्कर्ष: कथन आंशिक रूप से सही है: यह तनाव भ्रष्टाचार की एक महत्वपूर्ण "सांस्कृतिक व्याख्या" है, पूर्ण व्याख्या नहीं। समाधान: सार्वजनिक और निजी क्षेत्र का स्पष्ट भेद, पारदर्शिता, और सार्वभौमिक मानदंडों का सामाजिक आंतरिकीकरण।
5.5 सामूहिक हिंसा और नरसंहार
- नरसंहार (Genocide): शब्द राफ़ेल लेमकिन (1944); संयुक्त राष्ट्र नरसंहार अभिसमय (1948): किसी राष्ट्रीय, नृजातीय, नस्लीय या धार्मिक समूह को पूर्णतः या आंशिक रूप से नष्ट करने के इरादे से किए गए कृत्य।
- दार्शनिक विश्लेषण: हन्ना आरेंट ("Eichmann in Jerusalem", 1963): "बुराई की साधारणता" (banality of evil), यानी विचारहीन आज्ञापालन; "अन्य" का अमानवीकरण।
6. विकास और सामाजिक प्रगति
6.1 क्या आर्थिक विकास सामाजिक प्रगति की आवश्यक या पर्याप्त शर्त है? (UPSC 2024)
- अवधारणाएँ: आर्थिक विकास (GDP, आय-वृद्धि; रोस्टो के विकास-चरण) बनाम सामाजिक प्रगति (स्वास्थ्य, शिक्षा, समानता, स्वतंत्रता, गरिमा)।
- आवश्यक शर्त (हाँ, सामान्यतः): संसाधनों के बिना स्कूल, अस्पताल, सामाजिक सुरक्षा कठिन; ग़रीबी निवारण के लिए वृद्धि आवश्यक।
- पर्याप्त शर्त (नहीं):
- आय-वृद्धि के साथ असमानता, रोज़गार-विहीन वृद्धि और पर्यावरण-क्षति संभव।
- कुछ उच्च-आय वाले देशों में स्त्री-अधिकार, राजनीतिक स्वतंत्रता कम।
- केरल का उदाहरण: अपेक्षाकृत मध्यम आय पर भी उच्च मानव विकास (साक्षरता, जीवन-प्रत्याशा), सार्वजनिक नीति और सामाजिक आंदोलनों के कारण।
- दार्शनिक दृष्टियाँ:
- अमर्त्य सेन ("Development as Freedom", 1999): विकास "वास्तविक स्वतंत्रताओं का विस्तार" है; आय साधन है, साध्य नहीं।
- UNDP मानव विकास सूचकांक (1990, महबूब उल हक़)।
- गांधी का सर्वोदय और अंत्योदय; शूमाकर, "Small is Beautiful" (1973)।
- सतत विकास: ब्रंटलैंड रिपोर्ट (1987)।
- निष्कर्ष: आर्थिक विकास "सामान्यतः आवश्यक पर पर्याप्त नहीं" है; और कुछ आयाम (जैसे सामाजिक सुधार, लैंगिक समानता) आय के बिना भी आगे बढ़ सकते हैं, इसलिए वह पूर्णतः "आवश्यक" भी नहीं।
6.2 विकास और जनजातीय मूल्यों का समन्वय (UPSC 2025)
- जनजातीय मूल्य: सामुदायिक स्वामित्व, प्रकृति से सामंजस्य (वन, नदी, पहाड़ पवित्र), समतावाद, पारस्परिकता, आवश्यकता-आधारित उपभोग, मौखिक परंपरा।
- टकराव: विकास परियोजनाओं (खनन, बाँध, उद्योग) से विस्थापन, भूमि-हस्तांतरण, सांस्कृतिक क्षरण; "विकास का शिकार" बनना।
- नीतिगत दृष्टियाँ:
- अलगाववादी (संरक्षित क्षेत्र), आत्मसातवादी (मुख्यधारा में विलय), और एकीकरणवादी।
- नेहरू का "जनजातीय पंचशील" (1958, वेरियर एल्विन की पुस्तक की प्रस्तावना): जनजातियाँ "अपनी प्रतिभा के अनुसार" विकसित हों; उनकी भूमि और वन-अधिकारों का सम्मान; उन्हें स्वयं प्रशासन के लिए प्रशिक्षित करना।
- समन्वय के साधन: पाँचवीं-छठी अनुसूची; PESA (1996), जिसमें ग्राम सभा की सहमति; वन अधिकार अधिनियम (2006); नियमगिरि निर्णय (2013), जिसमें ग्राम सभाओं ने खनन को अस्वीकार किया; लाभ-साझेदारी; सहभागी नियोजन; पारंपरिक ज्ञान का सम्मान।
- निष्कर्ष: समन्वय संभव है, बशर्ते विकास "उनके साथ और उनकी सहमति से" हो, उनके "ऊपर" नहीं; और प्रगति का माप केवल आय नहीं, गरिमा, स्वायत्तता और पर्यावरणीय संतुलन भी हो। जनजातीय मूल्य स्वयं सतत विकास के लिए सबक़ देते हैं।
7. लैंगिक भेदभाव
7.1 सामाजिक निर्मिति के रूप में जेंडर (UPSC 2025)
- लिंग बनाम जेंडर: लिंग (sex) जैविक है; जेंडर सामाजिक रूप से निर्मित भूमिकाएँ, अपेक्षाएँ और पहचान है (एन ओकली, 1972)।
- सिमोन द बोउवार ("The Second Sex", 1949): "कोई स्त्री के रूप में जन्म नहीं लेती, बल्कि स्त्री बनती है।" पुरुष "विषय" और स्त्री "अन्य" (Other)।
- जूडिथ बटलर (1990): जेंडर "प्रदर्शनात्मक" (performative) है, बार-बार दोहराए गए व्यवहार से बनता है।
- अवसरों पर प्रभाव: शिक्षा में बालिकाओं की प्राथमिकता कम; "पुरुषों के" और "स्त्रियों के" पेशे; श्रम-बल भागीदारी में अंतर; वेतन-अंतर; अवैतनिक देखभाल-कार्य का बोझ।
- अधिकारों पर प्रभाव: संपत्ति और उत्तराधिकार (भारत में हिंदू उत्तराधिकार संशोधन अधिनियम, 2005 के बाद पुत्रियों को सहदायिक अधिकार); राजनीतिक प्रतिनिधित्व; हिंसा से सुरक्षा।
- संसाधनों तक पहुँच: भूमि-स्वामित्व (बीना अग्रवाल, "A Field of One's Own", 1994: भूमि-अधिकार स्त्री-सशक्तीकरण की कुंजी), ऋण, तकनीक, स्वास्थ्य और पोषण।
- अंतर्विभाजकता (Intersectionality, किम्बर्ले क्रेंशॉ, 1989): जाति, वर्ग और धर्म के साथ जेंडर मिलकर भेदभाव को बहुगुणित करता है (दलित स्त्री का दोहरा या तिहरा शोषण)।
- आलोचनात्मक पक्ष: कुछ विचारक जैविक भिन्नताओं की भूमिका पर ज़ोर देते हैं; पर भिन्नता से असमानता या अधीनता का औचित्य नहीं निकलता।
7.2 लैंगिक समानता, सशक्तीकरण और कन्या भ्रूण-हत्या (UPSC 2024)
- लैंगिक समानता सशक्तीकरण की आवश्यक शर्त: नायला कबीर का ढाँचा: सशक्तीकरण = संसाधन + कर्तृत्व (agency) + उपलब्धि। जब तक क़ानून, परिवार और समाज में समान स्थिति नहीं, तब तक चुनने की वास्तविक क्षमता (agency) नहीं बनती।
- कन्या भ्रूण-हत्या की समस्या: 2011 की जनगणना में बाल लिंगानुपात (0-6 वर्ष) 918 था। कारण: पुत्र-वरीयता (वंश, अंत्येष्टि संस्कार, वृद्धावस्था सुरक्षा), दहेज, पुत्री को "पराया धन" मानना, और लिंग-परीक्षण तकनीक का दुरुपयोग।
- क़ानून और नीति: PCPNDT अधिनियम (1994, 2003 में संशोधित); "बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ" (2015)।
- सशक्तीकरण की भूमिका:
- शिक्षित और आर्थिक रूप से स्वतंत्र स्त्रियाँ पुत्र-वरीयता के दबाव का विरोध कर सकती हैं।
- पुत्रियों का आर्थिक और सामाजिक मूल्य बढ़ने से (रोज़गार, संपत्ति-अधिकार, माता-पिता की देखभाल) "पुत्र ही सहारा" की धारणा कमज़ोर होती है।
- स्त्रियों का राजनीतिक प्रतिनिधित्व (पंचायतें) स्थानीय निगरानी बढ़ाता है।
- एक विरोधाभास: भारत में कुछ समृद्ध और शिक्षित क्षेत्रों में भी लिंग-चयन अधिक रहा है, यानी केवल आय और शिक्षा पर्याप्त नहीं। पितृसत्तात्मक मानसिकता, दहेज और वंश-परंपरा में सांस्कृतिक परिवर्तन आवश्यक है।
- निष्कर्ष: लैंगिक समानता सशक्तीकरण की आवश्यक शर्त है, और सशक्तीकरण कन्या भ्रूण-हत्या रोकने का दीर्घकालिक उपाय। इसके साथ क़ानून का कड़ा पालन और पुरुषों की मानसिकता में बदलाव चाहिए।
8. जाति भेदभाव
8.1 जाति भेदभाव के मुख्य कारक (UPSC 2024)
- शुद्धता-अशुद्धता की धारणा: लुई ड्यूमॉन्ट ("Homo Hierarchicus", 1966): पदानुक्रम का मूल सिद्धांत।
- अंतर्विवाह: आंबेडकर ("Castes in India", 1916): बहिर्विवाह पर अंतर्विवाह का आरोपण ही जाति का सार है।
- धार्मिक-शास्त्रीय स्वीकृति: वर्ण-व्यवस्था और धर्मशास्त्रों का औचित्य; कर्म और पुनर्जन्म से जन्म-आधारित स्थिति का समर्थन।
- आर्थिक कारक: भूमिहीनता, जजमानी व्यवस्था, वंशानुगत "अशुद्ध" पेशे (हाथ से मैला ढोना)।
- राजनीतिक कारक: जाति-आधारित वोट-बैंक और संरक्षण।
- सामाजिक नियंत्रण और हिंसा: जाति-पंचायतें, "सम्मान" के नाम पर हिंसा, सामाजिक बहिष्कार।
- शैक्षिक अभाव और समाजीकरण के माध्यम से पूर्वाग्रहों का हस्तांतरण।
8.2 जाति भेदभाव पर गांधी और आंबेडकर की बहस (UPSC 2025)
| आधार | गांधी | आंबेडकर |
|---|---|---|
| अस्पृश्यता | हिंदू धर्म पर "कलंक" और "पाप"; उसका उन्मूलन आवश्यक | जाति-व्यवस्था का अनिवार्य परिणाम |
| वर्ण | आरंभ में वर्ण को कार्य-विभाजन मानकर स्वीकार किया, पदानुक्रम नहीं; बाद में (1940 के दशक) अंतर्जातीय विवाह का समर्थन किया | वर्ण और जाति अविभाज्य; वर्ण ही "श्रमिकों का विभाजन" (division of labourers) है |
| शास्त्र | शास्त्रों की अस्पृश्यता-समर्थक बातें प्रक्षिप्त या अमान्य | जाति का शास्त्रीय आधार नष्ट किए बिना उन्मूलन असंभव ("Annihilation of Caste", 1936) |
| पद्धति | हृदय-परिवर्तन, सवर्णों का प्रायश्चित, मंदिर-प्रवेश, "हरिजन" सेवा | क़ानूनी सुरक्षा, राजनीतिक शक्ति, शिक्षा; "शिक्षित बनो, संगठित रहो, संघर्ष करो" |
| राजनीतिक प्रतिनिधित्व | पृथक निर्वाचन का विरोध (1932 का आमरण उपवास); हिंदू समाज की एकता | पृथक निर्वाचन की माँग; पूना पैक्ट (सितंबर 1932) में आरक्षित सीटें (148) स्वीकार कीं |
| धर्म | हिंदू धर्म का भीतर से सुधार | "मैं हिंदू के रूप में नहीं मरूँगा" (1935); 1956 में बौद्ध धर्म अपनाया |
| गाँव | आदर्श ग्राम-स्वराज | गाँव "स्थानीयता का गड्ढा, अज्ञान, संकीर्णता और सांप्रदायिकता का अड्डा" |
- मूल्यांकन:
- गांधी ने अस्पृश्यता-विरोध को राष्ट्रीय आंदोलन का अंग बनाया और सवर्ण चेतना को झकझोरा; पर उनका दृष्टिकोण पितृसत्तात्मक (paternalistic) माना गया, जिसमें दलित "सुधार के पात्र" थे, कर्ता नहीं।
- आंबेडकर ने दलितों को स्वयं अपनी मुक्ति का कर्ता बनाया, संवैधानिक सुरक्षाएँ (अनुच्छेद 15, 17, 46, आरक्षण) दिलाईं, और जाति की संरचनात्मक प्रकृति को उजागर किया।
- दोनों का योग: नैतिक परिवर्तन (गांधी) और संरचनात्मक-विधिक परिवर्तन (आंबेडकर), दोनों आवश्यक हैं; आज भी जाति-भेद दोनों स्तरों पर चुनौती है।
9. Master Summary Table
| विषय | मुख्य विचारक / स्रोत | मूल विचार |
|---|---|---|
| अराजकतावाद | प्रूधों, क्रोपोटकिन, गांधी | राज्य-विहीन स्वैच्छिक समाज |
| मार्क्सवाद | Manifesto 1848; Kapital 1867 | वर्ग-संघर्ष, अतिरिक्त मूल्य |
| अलगाव | Manuscripts 1844 | चार रूप |
| समाजवाद-साम्यवाद | Gotha 1875 | कार्य बनाम आवश्यकता |
| मानववाद | पिको 1486; कांट 1784; टैगोर 1930; एम.एन. रॉय | गरिमा, बुद्धि, सामंजस्य |
| धर्मनिरपेक्षता | गांधी; भार्गव; बोम्मई 1994 | समान आदर, सैद्धांतिक दूरी |
| बहुसंस्कृतिवाद | किमलिका, टेलर, पारेख; अशोक | मान्यता, सहिष्णुता, समवाय |
| मृत्युदंड | बेकारिया 1764; बचन सिंह 1980; विधि आयोग 2015 | विरलतम में विरल |
| भ्रष्टाचार | पार्सन्स, वेबर, बैनफ़ील्ड | विशिष्टतावाद बनाम सार्वभौमिकतावाद |
| विकास | सेन 1999; HDI 1990; पंचशील 1958 | स्वतंत्रता के रूप में विकास |
| जेंडर | बोउवार 1949; बटलर; कबीर; अग्रवाल | सामाजिक निर्मिति; सशक्तीकरण |
| जाति | गांधी; आंबेडकर 1916, 1936 | हृदय-परिवर्तन बनाम उन्मूलन |
10. चार्ट: दंड के सिद्धांत
11. Mind Map
- अराजकतावाद, मार्क्सवाद
- मानववाद, टैगोर
- धर्मनिरपेक्षता, गांधी
- बहुसंस्कृतिवाद, धर्मतंत्र
- मृत्युदंड, जीवन का अधिकार
- भ्रष्टाचार, नरसंहार
- सेन, HDI
- जनजातीय मूल्य
- सामाजिक निर्मिति, भ्रूण-हत्या
- गांधी बनाम आंबेडकर
12. महत्वपूर्ण One-liners
- "संपत्ति चोरी है": प्रूधों (1840)।
- "Mutual Aid": क्रोपोटकिन (1902)।
- "हर एक को उसकी आवश्यकता के अनुसार": मार्क्स, "Critique of the Gotha Programme" (1875)।
- "Sapere aude": कांट, "What is Enlightenment?" (1784)।
- "The Religion of Man": टैगोर (1930)।
- "सैद्धांतिक दूरी" (Principled Distance): राजीव भार्गव।
- सहिष्णुता का विरोधाभास: कार्ल पॉपर।
- "विरलतम में विरल": बचन सिंह (1980)।
- "बुराई की साधारणता": हन्ना आरेंट (1963)।
- "Development as Freedom": अमर्त्य सेन (1999)।
- "कोई स्त्री के रूप में जन्म नहीं लेती, बल्कि बनती है": सिमोन द बोउवार (1949)।
- "Annihilation of Caste": आंबेडकर (1936)।
- पूना पैक्ट: सितंबर 1932।
13. टिप्स एवं ट्रिक्स
- इस अध्याय के प्रश्न "समकालीन" हैं: दार्शनिक सिद्धांत के साथ भारतीय क़ानून, न्यायिक निर्णय और आँकड़े (जनगणना 2011 का बाल लिंगानुपात 918) जोड़ें।
- "क्या ... वैध है?", "क्या आप सहमत हैं?" जैसे प्रश्नों में स्पष्ट पक्ष लें और संतुलित निष्कर्ष दें।
- गांधी-आंबेडकर, समाजवाद-साम्यवाद जैसे तुलना-प्रश्नों में तालिका दें।
अलगाव के चार रूप: "उ-प्र-प्रजा-मनु" (उत्पाद, प्रक्रिया, प्रजाति-सार, मनुष्य)। दंड के चार सिद्धांत: "प्र-नि-सु-नि" (प्रतिशोधात्मक, निवारक, सुधारात्मक, निरोधात्मक)।
गांधी के वर्ण-विचार को स्थिर न मानें; 1920 के दशक से 1940 के दशक तक उनके विचार बदले (अंतर्जातीय विवाह का समर्थन)। यह विकास बताने से उत्तर संतुलित होता है।
14. PYQ-आधारित प्रश्न एवं मॉडल उत्तर
"भ्रष्ट आचरण विशिष्टतावादी और सार्वभौमिकतावादी मानक मानदंडों के बीच अंतर्निहित तनाव को प्रकट करते हैं।" क्या आप इस कथन से सहमत हैं? कारण और औचित्य दीजिए।
मॉडल उत्तर
पद: पार्सन्स के प्रतिमान चर।
सहमति: वेबर, भाई-भतीजावाद, बैनफ़ील्ड।
सीमाएँ: लोभ, संस्थाएँ, क्लिटगार्ड। निष्कर्ष: आंशिक।
सामाजिक निर्मिति के रूप में जेंडर व्यक्तियों के अवसरों, अधिकारों और संसाधनों तक पहुँच को कैसे प्रभावित करता है? आलोचनात्मक विवेचना कीजिए।
मॉडल उत्तर
लिंग बनाम जेंडर; बोउवार, बटलर।
प्रभाव: अवसर, अधिकार, संसाधन (अग्रवाल); अंतर्विभाजकता।
आलोचनात्मक पक्ष।
क्या धर्मनिरपेक्षता का विचार अनिवार्य रूप से धार्मिक बहुलवाद के विचार से संबंधित है? विवेचना कीजिए।
मॉडल उत्तर
संबंध के पक्ष में: इतिहास (लॉक), भारत।
विरुद्ध: सुलह-ए-कुल, समरूप समाज, लाइसीते।
निष्कर्ष: आकस्मिक पर गहरा।
जाति भेदभाव के लिए उत्तरदायी मुख्य कारकों की विवेचना कीजिए।
मॉडल उत्तर
सात कारक: शुद्धता (ड्यूमॉन्ट), अंतर्विवाह (आंबेडकर), धार्मिक, आर्थिक, राजनीतिक, सामाजिक नियंत्रण, शिक्षा।
निष्कर्ष: बहुआयामी समाधान।
मार्क्स द्वारा प्रतिपादित अलगाव की अवधारणा की व्याख्या कीजिए।
मॉडल उत्तर
स्रोत और अर्थ।
चार रूप; कारण और समाधान; समकालीन प्रासंगिकता।
दो भिन्न राजनीतिक विचारधाराओं के रूप में समाजवाद और साम्यवाद की तुलना कीजिए।
मॉडल उत्तर
तालिका: वितरण, संपत्ति, राज्य, मार्ग, मार्क्सवाद में स्थान, उदाहरण।
जाति भेदभाव के मुद्दे पर गांधी और आंबेडकर के बीच बहस का विस्तृत विवरण प्रस्तुत कीजिए।
मॉडल उत्तर (रूपरेखा)
तालिका: अस्पृश्यता, वर्ण, शास्त्र, पद्धति, प्रतिनिधित्व (पूना पैक्ट), धर्म, गाँव।
मूल्यांकन: नैतिक और संरचनात्मक परिवर्तन, दोनों आवश्यक।
एक राजनीतिक विचारधारा के रूप में मार्क्सवाद का मूल्यांकन कीजिए।
मॉडल उत्तर (रूपरेखा)
मूल सिद्धांत।
शक्तियाँ और कमज़ोरियाँ (नियतिवाद, भविष्यवाणियाँ, अधिनायकवाद, पॉपर)।
निष्कर्ष: विश्लेषणात्मक उपकरण बनाम कार्यक्रम।
क्या किसी व्यक्ति का जीवन का अधिकार निरपेक्ष हो सकता है? मृत्युदंड के विचार के संदर्भ में उत्तर दीजिए।
मॉडल उत्तर (रूपरेखा)
निरपेक्षता के पक्ष: बेकारिया, गरिमा, ICCPR।
विपक्ष: लॉक का अधिकार-त्याग, आत्म-रक्षा, कांट।
भारत: अनुच्छेद 21, मेनका गांधी, बचन सिंह। निष्कर्ष।
टैगोर के मानववाद में विरोधों का समन्वय कैसे होता है? मूल्यांकन कीजिए।
मॉडल उत्तर (रूपरेखा)
स्रोत; सात आयाम (सीमित-असीम, मानव-दिव्य, व्यक्ति-विश्व, मनुष्य-प्रकृति, पूर्व-पश्चिम, राष्ट्र-मानवता)।
सामंजस्य का सिद्धांत; मूल्यांकन।
क्या सामाजिक और आर्थिक प्रगति के लिए विकास की अवधारणा को जनजातीय मूल्यों से समन्वित करना संभव है? विवेचना कीजिए।
मॉडल उत्तर (रूपरेखा)
जनजातीय मूल्य और टकराव।
दृष्टियाँ: पंचशील (1958)।
साधन: PESA, FRA, नियमगिरि, सहभागिता। निष्कर्ष।
क्या धर्मतंत्र को शासन के एक वैध रूप के रूप में स्वीकार किया जा सकता है? अपने उत्तर के समर्थन में कारण और औचित्य दीजिए।
मॉडल उत्तर (रूपरेखा)
अर्थ और उदाहरण।
पक्ष और विपक्ष (नागरिकता, व्याख्या, अंतःकरण, जवाबदेही, सार्वजनिक तर्क)।
निष्कर्ष: वैध नहीं।
मानववाद के मूल सिद्धांतों को रेखांकित कीजिए। यूरोप में प्रबोधन का आगमन मानववाद का मार्ग कैसे प्रशस्त करता है? विवेचना कीजिए।
मॉडल उत्तर (रूपरेखा)
छह सिद्धांत; पुनर्जागरण।
प्रबोधन: कांट, विज्ञान, धर्म-सत्ता की आलोचना, अधिकार, शिक्षा, गरिमा।
अन्य रूप और आलोचना।
लोकतंत्र के आधारभूत सिद्धांतों में से एक के रूप में धर्मनिरपेक्षता पर गांधी के विचारों की व्याख्या कीजिए।
मॉडल उत्तर (रूपरेखा)
धर्म = नैतिकता; राज्य और संप्रदाय का पृथक्करण।
सर्व धर्म समभाव; लोकतंत्र का आधार।
आलोचना।
प्रभावी निवारक के रूप में मृत्युदंड के विचार को आप किन आधारों पर स्वीकार या अस्वीकार करेंगे? विवेचना कीजिए।
मॉडल उत्तर (रूपरेखा)
दंड के सिद्धांत (चार्ट)।
स्वीकार और अस्वीकार के तर्क (NRC 2012, विधि आयोग 2015)।
भारत और विश्व; निष्कर्ष।
सामाजिक प्रगति प्राप्त करने के लिए क्या आर्थिक विकास एक आवश्यक शर्त है, पर्याप्त शर्त है, दोनों है या कोई भी नहीं? अपने उत्तर के लिए कारण और औचित्य दीजिए।
मॉडल उत्तर (रूपरेखा)
अवधारणाएँ।
आवश्यक (सामान्यतः), पर्याप्त नहीं (केरल)।
सेन, HDI, गांधी, ब्रंटलैंड। निष्कर्ष।
स्त्रियों के सशक्तीकरण की आवश्यक शर्त के रूप में लैंगिक समानता की विवेचना कीजिए। कन्या भ्रूण-हत्या की समस्या पर अंकुश लगाने में स्त्री-सशक्तीकरण की भूमिका का भी परीक्षण कीजिए।
मॉडल उत्तर (रूपरेखा)
कबीर का ढाँचा।
भ्रूण-हत्या: 918 (2011), कारण, PCPNDT, BBBP।
सशक्तीकरण की भूमिका और विरोधाभास।
बहुसांस्कृतिक समाजों के उदय में सहिष्णुता और सह-अस्तित्व के नैतिक सिद्धांतों की भूमिका की विवेचना कीजिए।
मॉडल उत्तर (रूपरेखा)
बहुसंस्कृतिवाद: किमलिका, टेलर, पारेख।
भूमिका: सहिष्णुता, समवाय (अशोक), अनेकांत।
सीमाएँ: पॉपर, ओकिन। निष्कर्ष।
"नरसंहार केवल कुछ दुष्ट व्यक्तियों का कार्य नहीं, बल्कि विचारहीन आज्ञापालन का परिणाम है।" हन्ना आरेंट के विचारों के आलोक में विवेचना कीजिए।
मॉडल उत्तर (रूपरेखा)
नरसंहार की परिभाषा (1948)।
बुराई की साधारणता; अमानवीकरण; नैतिक उत्तरदायित्व।
15. Quick Revision Summary
- विचारधाराएँ: अराजकतावाद; मार्क्सवाद का मूल्यांकन; अलगाव के चार रूप; समाजवाद बनाम साम्यवाद।
- मानववाद: मूल सिद्धांत, प्रबोधन; टैगोर का सामंजस्य।
- धर्म-राज्य: धर्मनिरपेक्षता के मॉडल; गांधी; बहुलवाद से संबंध; बहुसंस्कृतिवाद; धर्मतंत्र अवैध।
- अपराध-दंड: चार सिद्धांत; मृत्युदंड; जीवन का अधिकार; भ्रष्टाचार; नरसंहार।
- विकास: आवश्यक पर पर्याप्त नहीं; जनजातीय मूल्यों से समन्वय।
- जेंडर और जाति: सामाजिक निर्मिति; सशक्तीकरण और भ्रूण-हत्या; जाति के कारक; गांधी बनाम आंबेडकर।