UPSC Mains · Public Administration · Paper I · अध्याय 1

लोक प्रशासन: परिचय एवं शास्त्रीय सिद्धांत

Introduction and Classical Administrative Theories

अर्थ, क्षेत्र, विल्सन का दृष्टिकोण, विकास, नया लोक प्रशासन, NPM, लोक चयन; टेलर का वैज्ञानिक प्रबंधन, फ़ेयोल, गुलिक-उर्विक, वेबर की नौकरशाही।

Paper I 20 मिनट

1. अध्याय एक नज़र में

लोक प्रशासन (Public Administration) Paper I की नींव यह अध्याय है:

  • परिचय: लोक प्रशासन का अर्थ, क्षेत्र और महत्व; विल्सन का दृष्टिकोण; विषय का विकास और उसकी वर्तमान स्थिति।
  • नए प्रतिमान: नया लोक प्रशासन (New Public Administration), लोक चयन उपागम (Public Choice), उदारीकरण की चुनौतियाँ, नवीन लोक प्रबंधन (NPM), सुशासन (good governance) और नवीन लोक शासन (New Public Governance)।
  • शास्त्रीय सिद्धांत: टेलर का वैज्ञानिक प्रबंधन, फ़ेयोल, गुलिक-उर्विक (प्रशासनिक प्रबंधन) और वेबर की नौकरशाही, तथा उनकी आलोचनाएँ।

2025 में लोक चयन उपागम की सीमाएँ, NPM से "नवीन लोक शासन" तक का संक्रमण, विधि का शासन, और "नौकरशाही काल्पनिक राज्य है" (मार्क्स) पूछे गए। 2024 में राजनीति-प्रशासन द्विभाजन, सुशासन के मानक तत्व, और NPM बनाम नवीन लोक शासन आए।

2. लोक प्रशासन: अर्थ, क्षेत्र और महत्व

  • अर्थ: सरकार की नीतियों को लागू करने वाली गतिविधि और उसका अध्ययन। एल.डी. व्हाइट के अनुसार यह "सार्वजनिक नीति की पूर्ति के लिए की गई सभी क्रियाएँ" है। लूथर गुलिक के अनुसार यह "सरकार के उस भाग से संबंधित है जो कार्य करवाता है", यानी कार्यपालिका।
  • संकीर्ण बनाम व्यापक दृष्टि: संकीर्ण दृष्टि (साइमन, गुलिक) में केवल कार्यपालिका; व्यापक दृष्टि (व्हाइट, फ़िफ़नर) में विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका, तीनों की प्रशासनिक गतिविधियाँ।
  • क्षेत्र: (1) POSDCORB दृष्टिकोण (गुलिक, 1937): नियोजन (Planning), संगठन (Organising), कार्मिक (Staffing), निर्देशन (Directing), समन्वय (Coordinating), प्रतिवेदन (Reporting) और बजट (Budgeting); (2) विषय-वस्तु दृष्टिकोण (रक्षा, शिक्षा, स्वास्थ्य जैसे विभागों का ज्ञान); (3) लोक नीति दृष्टिकोण।
  • लोक बनाम निजी प्रशासन: साइमन, एपलबी और फ़ेयोल ने इस अंतर पर विचार किया। लोक प्रशासन में राजनीतिक दिशा, सार्वजनिक उत्तरदायित्व, विधि-बद्धता, एकाधिकार, लाभ के बजाय सेवा का उद्देश्य, और "पारदर्शिता के कटघरे" (fishbowl) में काम करना होता है। फ़ेयोल ने "प्रशासन की सार्वभौमिकता" की बात की, यानी दोनों में समान सिद्धांत लागू होते हैं।
  • महत्व: कल्याणकारी और विकासशील राज्य का उपकरण; लोकतंत्र में नागरिक और राज्य का संपर्क-बिंदु; और "प्रशासनिक राज्य" का उदय (ड्वाइट वाल्डो, 1948)।

3. विषय का विकास: विल्सन से नवीन लोक शासन तक

चरणकालप्रमुख विचारक और कृतियाँमूल विचार
1. राजनीति-प्रशासन द्विभाजन1887-1926वुडरो विल्सन ("The Study of Administration", 1887), फ़्रैंक गुडनॉ ("Politics and Administration", 1900), एल.डी. व्हाइट (पहली पाठ्य-पुस्तक, 1926)राजनीति नीति बनाती है, प्रशासन उसे लागू करता है; प्रशासन "व्यवसाय का क्षेत्र" है
2. प्रशासन के सिद्धांत1927-1937विलोबी (1927), मूनी और रेली (1931), गुलिक और उर्विक (1937)सार्वभौमिक "सिद्धांत" खोजना; प्रशासन एक "विज्ञान"
3. चुनौती का युग1938-1947चेस्टर बर्नार्ड (1938), हर्बर्ट साइमन ("Administrative Behavior", 1947), रॉबर्ट डाल (1947)सिद्धांत "कहावतें" (proverbs) हैं; मूल्य, व्यवहार और संस्कृति की उपेक्षा
4. पहचान का संकट1948-1970ड्वाइट वाल्डो ("The Administrative State", 1948)राजनीति विज्ञान और प्रबंधन के बीच विषय की पहचान का संकट; तुलनात्मक और विकास प्रशासन का उदय
5. नया लोक प्रशासन1968 सेमिनोब्रुक सम्मेलन I (1968, वाल्डो); फ़्रैंक मरीनी (1971)प्रासंगिकता, मूल्य, सामाजिक समता, परिवर्तन, ग्राहक-केंद्रितता
6. लोक चयन1960-70 का दशकब्यूकैनन और टुलॉक (1962), विलियम निस्केनन (1971), विंसेंट ऑस्ट्रोम (1973)नौकरशाह भी स्वार्थी "तर्कसंगत अभिनेता" है; बाज़ार-जैसी प्रतिस्पर्धा
7. नवीन लोक प्रबंधन (NPM)1980-90 का दशकक्रिस्टोफ़र हुड (1991), ऑस्बॉर्न और गेब्लर ("Reinventing Government", 1992)"खेना नहीं, दिशा देना" (steering, not rowing); बाज़ार, परिणाम, प्रतिस्पर्धा, ग्राहक
8. नवीन लोक सेवा और सार्वजनिक मूल्य1995-2000मार्क मूर (Public Value, 1995), डेनहार्ट दंपती (New Public Service, 2000)"दिशा देना नहीं, सेवा करना"; नागरिक, ग्राहक नहीं
9. नवीन लोक शासन (NPG)2006 सेस्टीफ़न ऑस्बॉर्न (2006)बहुल और अंतर-संगठनात्मक शासन; नेटवर्क, साझेदारी, सह-उत्पादन

राजनीति-प्रशासन द्विभाजन की बहस अभी जीवित है (UPSC 2024)

  • द्विभाजन का तर्क: विल्सन के अनुसार प्रशासन को "राजनीति की हलचल" से अलग रखकर कुशल और पेशेवर बनाया जा सकता है; गुडनॉ के अनुसार राजनीति "राज्य की इच्छा की अभिव्यक्ति" है और प्रशासन उस इच्छा का "क्रियान्वयन"। इसी से योग्यता-आधारित सिविल सेवा (अमेरिका का पेंडलटन अधिनियम, 1883) और लूट-प्रणाली (spoils system) का अंत जुड़ा।
  • आलोचना: पॉल एपलबी (Policy and Administration, 1949) के अनुसार प्रशासन स्वयं "नीति-निर्माण" है; नौकरशाह नीति का प्रारूप बनाते हैं और विवेकाधिकार का प्रयोग करते हैं। साइमन ने "तथ्य" और "मूल्य" में भेद किया, पर कहा कि व्यवहार में दोनों मिले रहते हैं। जेम्स स्वारा (1985) ने "द्विभाजन-द्वैत" (dichotomy-duality) मॉडल दिया: मिशन (राजनीतिक) से प्रबंधन (प्रशासनिक) तक भूमिकाओं का क्रमिक मिश्रण।
  • बहस क्यों जीवित है:
    • NPM: राजनेता "नीति" तय करें और स्वायत्त एजेंसियाँ "प्रबंधन" करें (ब्रिटेन की "नेक्स्ट स्टेप्स" एजेंसियाँ, 1988), यानी द्विभाजन का नया रूप।
    • भारत में: सिविल सेवा की तटस्थता बनाम "प्रतिबद्ध नौकरशाही" (1970 का दशक); बार-बार के तबादले; राजनीतिक कार्यपालिका और स्थायी कार्यपालिका के बदलते संबंध। सर्वोच्च न्यायालय ने टी.एस.आर. सुब्रमण्यन बनाम भारत संघ (2013) में सिविल सेवा बोर्ड, निश्चित कार्यकाल और लिखित आदेशों का निर्देश दिया।
    • नियामक संस्थाएँ: राजनीति से "स्वतंत्र" विशेषज्ञ निकाय (RBI, SEBI, TRAI)।
  • निष्कर्ष: पूर्ण द्विभाजन न संभव है, न वांछनीय। पर राजनीतिक दिशा और प्रशासनिक पेशेवरता के बीच "स्वस्थ संतुलन" की खोज आज भी प्रशासन की केंद्रीय समस्या है, इसलिए बहस जीवित है।

4. नए प्रतिमान: लोक चयन, NPM, सुशासन और नवीन लोक शासन

नया लोक प्रशासन (New Public Administration)

  • पृष्ठभूमि: 1960 के दशक के अमेरिका की उथल-पुथल: वियतनाम युद्ध, नागरिक अधिकार आंदोलन, नगरीय संकट। परंपरागत लोक प्रशासन "मूल्य-निरपेक्ष" और "कुशलता-केंद्रित" होकर अप्रासंगिक माना गया।
  • मिनोब्रुक I (1968): युवा विद्वानों का सम्मेलन (वाल्डो के संरक्षण में); फ़्रैंक मरीनी की "Toward a New Public Administration" (1971)।
  • चार लक्ष्य: (1) प्रासंगिकता (relevance), (2) मूल्य (values), (3) सामाजिक समता (social equity; एच. जॉर्ज फ़्रेडरिकसन), (4) परिवर्तन (change)। साथ में ग्राहक-केंद्रितता, विकेंद्रीकरण और सहभागिता।
  • आगे: मिनोब्रुक II (1988) और III (2008)।
  • आलोचना: विचार अधिक, ठोस सिद्धांत कम; रॉबर्ट गोलेम्बिएव्स्की ने इसे "अस्थायी" और "क्रांतिकारी तेवर वाला" बताया।

लोक चयन उपागम (Public Choice) और उसकी सीमाएँ (UPSC 2025)

  • मूल विचार: अर्थशास्त्र की "तर्कसंगत चयन" (rational choice) पद्धति को राजनीति और प्रशासन पर लागू करना। मतदाता, राजनेता और नौकरशाह सभी "स्वहित को अधिकतम करने वाले" हैं। प्रमुख नाम: जेम्स ब्यूकैनन और गॉर्डन टुलॉक ("The Calculus of Consent", 1962), विलियम निस्केनन (नौकरशाह "बजट को अधिकतम करने वाला" है, 1971), और विंसेंट ऑस्ट्रोम ("The Intellectual Crisis in American Public Administration", 1973; "लोकतांत्रिक प्रशासन" और बहु-केंद्रीय व्यवस्था)।
  • निष्कर्ष: सरकार का आकार घटाना, प्रतिस्पर्धा, निजीकरण, अनुबंध (contracting out), उपयोगकर्ता शुल्क और नागरिक का "चयन" (वाउचर)।
  • सीमाएँ:
    • अपूर्ण बाज़ार: सार्वजनिक वस्तुएँ (रक्षा, क़ानून-व्यवस्था), बाह्य प्रभाव (प्रदूषण), सूचना की असमानता (स्वास्थ्य, शिक्षा) और प्राकृतिक एकाधिकार (जल, बिजली-ग्रिड)। यहाँ बाज़ार विफल होता है, इसलिए "चयन" वास्तविक नहीं रहता।
    • राजनीतिक कारक: हित-समूहों का दबाव, "किराया-प्राप्ति" (rent-seeking), चुनावी चक्र, वोट-बैंक की राजनीति, और सत्ता का असमान वितरण।
    • मानव-व्यवहार की सरल धारणा: लोक-सेवा की प्रेरणा (public service motivation; जेम्स पेरी), नैतिकता और कर्तव्य-भाव की उपेक्षा।
    • समता का प्रश्न: निर्धन नागरिक "उपभोक्ता" के रूप में चयन करने में असमर्थ; नागरिकता को ग्राहक-संबंध तक सीमित करना।
    • विकासशील देशों में: बाज़ार और नियामक संस्थाएँ कमज़ोर, इसलिए निजीकरण से "निजी एकाधिकार" बनने का ख़तरा।
  • निष्कर्ष: लोक चयन ने सरकार की अक्षमता और नौकरशाही के स्वहित को उजागर किया, पर अपूर्ण बाज़ार और राजनीतिक वास्तविकताओं के कारण वह सार्वभौम समाधान नहीं है।

नवीन लोक प्रबंधन (NPM)

  • हुड के सात तत्व (1991): पेशेवर प्रबंधन ("प्रबंधकों को प्रबंधन करने दो"), स्पष्ट मानक और कार्य-निष्पादन माप, परिणामों पर नियंत्रण, इकाइयों का विघटन (एजेंसीकरण), प्रतिस्पर्धा, निजी क्षेत्र की प्रबंधन-शैली, और संसाधनों के उपयोग में अनुशासन तथा मितव्ययिता।
  • ऑस्बॉर्न और गेब्लर (1992) के दस सिद्धांत: उत्प्रेरक सरकार ("दिशा दो, खेओ मत"), समुदाय के स्वामित्व वाली, प्रतिस्पर्धी, मिशन-चालित, परिणाम-उन्मुख, ग्राहक-चालित, उद्यमी, पूर्वानुमानकारी, विकेंद्रीकृत और बाज़ार-उन्मुख सरकार।
  • उदाहरण: ब्रिटेन (थैचर; नेक्स्ट स्टेप्स 1988; सिटिज़न्स चार्टर 1991), न्यूज़ीलैंड, ऑस्ट्रेलिया; भारत में नागरिक चार्टर (1997), PPP और विनिवेश।
  • आलोचना: नागरिक को "ग्राहक" बनाना, लोकतांत्रिक उत्तरदायित्व का धुंधलापन, विखंडन ("खोखला राज्य"), और समता की उपेक्षा।

NPM से नवीन लोक शासन (NPG) तक: एक संक्रमणकालीन अवस्था (UPSC 2024, 2025)

  • ऑस्बॉर्न का तर्क (2006): लोक प्रशासन का विकास तीन चरणों में हुआ: (1) परंपरागत लोक प्रशासन (लगभग 1970 के दशक तक; नियम, पदानुक्रम, नौकरशाही); (2) NPM (1980 से लगभग 2000 तक; बाज़ार, प्रबंधन); (3) नवीन लोक शासन (NPG; बहुलवादी राज्य, नेटवर्क)। इस दृष्टि में NPM कोई स्थायी प्रतिमान नहीं, बल्कि "संक्रमणकालीन अवस्था" थी।
आधारपरंपरागत लोक प्रशासनNPMनवीन लोक शासन (NPG)
सैद्धांतिक आधारराजनीति विज्ञान, विधिलोक चयन, प्रबंधनसंगठन-सिद्धांत, नेटवर्क-सिद्धांत
राज्य की प्रकृतिएकात्मकविखंडित (एजेंसियाँ)बहुल (pluralist) और बहुलवादी (plural)
केंद्र-बिंदुनीति-निर्माण और क्रियान्वयनसंगठन के भीतर का प्रबंधनअंतर-संगठनात्मक संबंध, प्रक्रियाएँ
संसाधन-आवंटनपदानुक्रमबाज़ार और अनुबंधनेटवर्क, विश्वास, संबंधपरक अनुबंध
मूल्यलोक-सेवा का भावप्रतिस्पर्धा, दक्षतासहयोग, वैधता, सह-उत्पादन
नागरिकलाभार्थी या प्रजाग्राहकसह-उत्पादक, भागीदार
  • NPM के संक्रमणकालीन होने के कारण: विखंडन से समन्वय की समस्या, जिसके उत्तर में ब्रिटेन में "संयुक्त सरकार" (joined-up government) और ऑस्ट्रेलिया-न्यूज़ीलैंड में "संपूर्ण सरकार" (whole-of-government) आए; जटिल समस्याएँ ("wicked problems") जिन्हें कोई एक एजेंसी या बाज़ार हल नहीं कर सकता; और लोकतांत्रिक उत्तरदायित्व का क्षरण।
  • भारतीय उदाहरण: PPP, स्वयं सहायता समूहों के माध्यम से सेवा-वितरण (कुदुंबश्री, जीविका), नागरिक-सहभागी मंच (MyGov), और कोविड-19 के समय सरकार, नागरिक समाज और निजी क्षेत्र का नेटवर्क।
  • निष्कर्ष: NPM ने "दक्षता" जोड़ी, पर "वैधता" और "समन्वय" की कमी से वह स्वयं एक नए प्रतिमान की ओर संक्रमण बन गया। NPG दोनों के अनुभवों का संश्लेषण है।

सुशासन: मानक और मूल्यांकनात्मक तत्व (UPSC 2024)

  • उद्भव: विश्व बैंक के प्रकाशन (उप-सहारा अफ़्रीका पर 1989 की रिपोर्ट; "Governance and Development", 1992); "शासन" यानी आर्थिक और सामाजिक संसाधनों के प्रबंधन में सत्ता का प्रयोग।
  • UNDP (1997) के तत्व: सहभागिता, विधि का शासन, पारदर्शिता, अनुक्रियाशीलता (responsiveness), सर्वसम्मति-उन्मुखता, समता और समावेशिता, प्रभावशीलता और दक्षता, उत्तरदायित्व, और सामरिक दृष्टि।
  • मानक (normative) तत्व: सुशासन केवल "शासन कैसे होता है" नहीं, बल्कि "कैसा होना चाहिए" बताता है: लोकतंत्र, मानवाधिकार, नैतिकता और समता।
  • मूल्यांकनात्मक (evaluative) तत्व: सूचकांकों से शासन को मापना और तुलना करना: विश्व बैंक के वैश्विक शासन संकेतक (WGI; छह आयाम), भारत में "सुशासन सूचकांक" (DARPG, 2019 और 2021) और "सुशासन दिवस" (25 दिसंबर)।
  • आलोचना: पश्चिमी और नव-उदारवादी शर्तों (conditionalities) का साधन होना; "एक माप सब पर" लागू करना; और ऊपर से थोपा गया दृष्टिकोण। इसके उत्तर में "पर्याप्त सुशासन" (good enough governance; मर्ली ग्रिंडल, 2004) की धारणा आई।
  • भारत: RTI (2005), लोकपाल (2013), नागरिक चार्टर, ई-गवर्नेंस, द्वितीय प्रशासनिक सुधार आयोग (2005-09) और "न्यूनतम सरकार, अधिकतम शासन"।

5. शास्त्रीय सिद्धांत

विचारककृतिमुख्य योगदानआलोचना
एफ़.डब्ल्यू. टेलर"The Principles of Scientific Management" (1911)समय और गति अध्ययन; "एक सर्वोत्तम विधि"; श्रमिकों का वैज्ञानिक चयन और प्रशिक्षण; विभेदक मज़दूरी दर; कार्यात्मक फ़ोरमैनशिप (8 फ़ोरमैन); प्रबंधन और श्रमिक का "मानसिक क्रांति" से सहयोगमनुष्य को "मशीन" और "आर्थिक मानव" मानना; श्रमिकों का शोषण (कार्य की गति बढ़ाना); ट्रेड यूनियनों का विरोध
हेनरी फ़ेयोल"Administration Industrielle et Générale" (1916)प्रबंधन के पाँच कार्य (POCCC: पूर्वानुमान और नियोजन, संगठन, आदेश, समन्वय, नियंत्रण); 14 सिद्धांत (श्रम-विभाजन, सत्ता और उत्तरदायित्व, आदेश की एकता, निर्देश की एकता, केंद्रीकरण, पद-सोपान, "गैंगप्लैंक" (समानांतर स्तर पर सीधा संवाद), समता, कर्मचारी-स्थायित्व, पहल, "एस्प्री द कोर" आदि); प्रशासन की सार्वभौमिकतासिद्धांत परस्पर-विरोधी और अनुभवजन्य परीक्षण के बिना (साइमन)
गुलिक और उर्विक"Papers on the Science of Administration" (1937)POSDCORB; नियंत्रण का विस्तार (span of control); विभागीकरण के चार आधार (उद्देश्य, प्रक्रिया, व्यक्ति या ग्राहक, स्थान); उर्विक के 29 सिद्धांत"यांत्रिक" और "संरचनात्मक" दृष्टि; मानवीय पक्ष की उपेक्षा
मैक्स वेबर"Economy and Society" (मरणोपरांत, 1922)सत्ता के तीन प्रकार (पारंपरिक, करिश्माई, विधिक-तर्कसंगत); आदर्श-प्रारूप नौकरशाहीनीचे देखें

वेबर की नौकरशाही

  • सत्ता के प्रकार: पारंपरिक (रीति और वंश), करिश्माई (व्यक्तिगत गुण) और विधिक-तर्कसंगत (नियमों और पद पर आधारित)। आधुनिक राज्य विधिक-तर्कसंगत सत्ता पर आधारित है, और उसका संगठनात्मक रूप "नौकरशाही" है।
  • आदर्श-प्रारूप की विशेषताएँ: पद-सोपान (hierarchy); विशेषज्ञता और श्रम-विभाजन; लिखित नियम; अवैयक्तिकता (impersonality); लिखित अभिलेख (फ़ाइलें); योग्यता-आधारित नियुक्ति; वेतन और पेंशन वाला पूर्णकालिक करियर; पद और व्यक्ति का पृथक्करण।
  • वेबर का दृष्टिकोण: नौकरशाही "तकनीकी रूप से सबसे श्रेष्ठ" संगठन है। पर वेबर ने स्वयं चेताया कि तर्कसंगतता मनुष्य को "लौह पिंजरे" (iron cage) में बंद कर सकती है।
  • आलोचनाएँ:
    • रॉबर्ट मर्टन (1940): "नौकरशाही व्यक्तित्व" और "लक्ष्यों का विस्थापन", यानी नियम स्वयं लक्ष्य बन जाते हैं; वेबलेन की "प्रशिक्षित अक्षमता"।
    • फ़िलिप सेल्ज़निक: उप-इकाइयों के अपने लक्ष्य।
    • एल्विन गोल्डनर: नौकरशाही के प्रकार (दंडात्मक, प्रतिनिधिक, नकली)।
    • मिशेल क्रोज़ियर: "नौकरशाही दुष्चक्र"।
    • विकासशील देशों में (रिग्स, ला पालोम्बारा): नौकरशाही का अत्यधिक शक्तिशाली होना और जवाबदेही की कमी।
    • मार्क्सवादी आलोचना: नीचे देखें।

"नौकरशाही काल्पनिक राज्य है और राज्य का अध्यात्मवाद है" (UPSC 2025)

  • स्रोत: कार्ल मार्क्स ने "हीगल के अधिकार-दर्शन की आलोचना" (1843) में यह कहा। हीगल ने नौकरशाही को "सार्वभौम वर्ग" माना था, जो निजी हितों से ऊपर उठकर पूरे समाज के सामान्य हित का प्रतिनिधित्व करती है।
  • मार्क्स का तर्क:
    • "काल्पनिक राज्य": नौकरशाही स्वयं को "राज्य" और "सामान्य हित" मान लेती है, जबकि वास्तव में वह अपने विशेष हितों (पद, पदोन्नति, सत्ता) वाला एक विशेष समूह है। वह वास्तविक राज्य (समाज) के समानांतर एक "काल्पनिक राज्य" बना लेती है।
    • "राज्य का अध्यात्मवाद": जैसे धर्म में रहस्य और पवित्रता होती है, वैसे ही नौकरशाही "गोपनीयता", "पद-सोपान" और "औपचारिकता" को पवित्र बना देती है। ज्ञान ऊपर से नीचे "रहस्य" के रूप में चलता है, और "सत्ता की पूजा" उसका धर्म बन जाती है।
    • नौकरशाही उन्हीं वर्गीय संबंधों को बनाए रखती है जिन पर राज्य टिका है।
  • बाद के विचार: मार्क्सवादी परंपरा (लेनिन, "राज्य और क्रांति", 1917) ने नौकरशाही को शासक वर्ग का उपकरण माना। विडंबना यह है कि सोवियत संघ में नौकरशाही स्वयं "नया वर्ग" बन गई (मिलोवन जिलास, 1957)।
  • प्रासंगिकता: गोपनीयता (भारत में शासकीय गुप्त बात अधिनियम 1923 बनाम RTI 2005), लालफ़ीताशाही और "बाबूशाही" की आलोचना, और पारदर्शिता तथा जवाबदेही की आवश्यकता।
  • निष्कर्ष: मार्क्स की आलोचना वेबर के "तटस्थ, तर्कसंगत" मॉडल का प्रतिवाद है। सत्य दोनों के बीच है: नौकरशाही आवश्यक है, पर उसे लोकतांत्रिक नियंत्रण और पारदर्शिता में बाँधना ज़रूरी है।

विधि का शासन: लोक प्रशासन, NPM और लोक शासन की नींव (UPSC 2025)

  • अर्थ (ए.वी. डाइसी, 1885): (1) मनमानी शक्ति के स्थान पर विधि की सर्वोच्चता; (2) विधि के समक्ष समानता (अधिकारी भी सामान्य न्यायालयों के अधीन); (3) अधिकारों का स्रोत न्यायालयों के निर्णय।
  • परंपरागत लोक प्रशासन में: वेबर की विधिक-तर्कसंगत सत्ता; नियम-आधारित, अवैयक्तिक निर्णय; और प्रशासनिक विधि तथा न्यायिक पुनर्विलोकन।
  • NPM में: बाज़ार अनुबंधों पर चलता है, और अनुबंध विधि के शासन, संपत्ति-अधिकार और निष्पक्ष विवाद-समाधान पर निर्भर हैं। नियामक संस्थाएँ विधि से ही बनती हैं। विधि के शासन के बिना निजीकरण "सांठगांठ वाला पूँजीवाद" (crony capitalism) बन जाता है।
  • लोक शासन (NPG) में: नेटवर्क और साझेदारी विश्वास पर चलती हैं, और विश्वास का आधार पारदर्शी नियम, अधिकार (RTI, सेवा-अधिकार क़ानून) और जवाबदेही है।
  • भारत: अनुच्छेद 14 (मेनका गांधी, 1978 में "मनमानेपन के विरुद्ध"), न्यायिक पुनर्विलोकन, और केशवानंद भारती (1973) में मूल ढाँचा।
  • निष्कर्ष: प्रतिमान बदलते रहे, पर विधि का शासन तीनों का "स्थिर आधार" बना रहा।

6. Master Summary Table

विषयमुख्य तथ्ययाद रखें
विल्सन"The Study of Administration", 1887द्विभाजन; गुडनॉ 1900
चुनौतीसाइमन 1947; डाल 1947"कहावतें"
पहचान का संकटवाल्डो 1948"The Administrative State"
नया लोक प्रशासनमिनोब्रुक 1968; मरीनी 1971प्रासंगिकता, मूल्य, समता, परिवर्तन
लोक चयनब्यूकैनन-टुलॉक 1962; निस्केनन 1971; ऑस्ट्रोम 1973सीमाएँ: अपूर्ण बाज़ार, राजनीति
NPMहुड 1991; ऑस्बॉर्न-गेब्लर 1992दिशा दो, खेओ मत
नवीन लोक सेवाडेनहार्ट 2000; मूर 1995सेवा करो
NPGऑस्बॉर्न 2006NPM संक्रमणकालीन
सुशासनविश्व बैंक 1992; UNDP 1997WGI; सुशासन दिवस 25 दिसंबर
टेलर1911; समय और गति अध्ययन8 फ़ोरमैन
फ़ेयोल1916; 14 सिद्धांतगैंगप्लैंक
गुलिक-उर्विक1937; POSDCORB4 आधार
वेबर3 प्रकार की सत्ता; आदर्श-प्रारूपमर्टन 1940; "लौह पिंजरा"
मार्क्स1843; "काल्पनिक राज्य"हीगल का "सार्वभौम वर्ग"

7. चार्ट: लोक प्रशासन के प्रतिमानों का विकास

परंपरागत लोक प्रशासनपदानुक्रम, नियमविल्सन, वेबरनागरिक: लाभार्थी1887 से 1970 का दशक नवीन लोक प्रबंधनबाज़ार, अनुबंधहुड, ऑस्बॉर्न-गेब्लरनागरिक: ग्राहक1980 से 2000 तक नवीन लोक शासननेटवर्क, विश्वासऑस्बॉर्न 2006नागरिक: सह-उत्पादक2000 के बाद आधार में सदा: विधि का शासन ऑस्बॉर्न की दृष्टि: NPM एक संक्रमणकालीन अवस्था
लोक प्रशासन के तीन प्रमुख प्रतिमान: परंपरागत लोक प्रशासन, नवीन लोक प्रबंधन और नवीन लोक शासन। तीनों का साझा आधार विधि का शासन है (कालखंड लगभग)।

8. Mind Map

लोक प्रशासन: परिचय और शास्त्रीय सिद्धांत
परिचय
  • अर्थ, क्षेत्र, POSDCORB
  • लोक बनाम निजी
विकास
  • द्विभाजन से पहचान-संकट तक
  • नया लोक प्रशासन
नए प्रतिमान
  • लोक चयन, NPM
  • सुशासन, NPG
शास्त्रीय
  • टेलर, फ़ेयोल
  • गुलिक-उर्विक
नौकरशाही
  • वेबर, मर्टन
  • मार्क्स, विधि का शासन

9. महत्वपूर्ण One-liners

  • "The Study of Administration": वुडरो विल्सन (1887)।
  • लोक प्रशासन की पहली पाठ्य-पुस्तक: एल.डी. व्हाइट (1926)।
  • POSDCORB: लूथर गुलिक (1937)।
  • "Administrative Behavior": हर्बर्ट साइमन (1947)।
  • "The Administrative State": ड्वाइट वाल्डो (1948)।
  • मिनोब्रुक सम्मेलन I: 1968।
  • "Reinventing Government": ऑस्बॉर्न और गेब्लर (1992)।
  • "नवीन लोक शासन" (NPG): स्टीफ़न ऑस्बॉर्न (2006)।
  • "गैंगप्लैंक" का सिद्धांत: हेनरी फ़ेयोल।
  • "नौकरशाही काल्पनिक राज्य है": कार्ल मार्क्स (1843)।

10. टिप्स एवं ट्रिक्स

लोक प्रशासन के उत्तर
  • हर उत्तर में विचारक, कृति और वर्ष दें, और फिर भारतीय उदाहरण (ARC, RTI, सुशासन सूचकांक) से जोड़ें।
  • "कथन" वाले प्रश्नों में पहले कथन का स्रोत और अर्थ बताएँ (जैसे मार्क्स और हीगल), फिर विश्लेषण करें।
  • प्रतिमानों की तुलना हमेशा तालिका में करें।
याद रखने की तरकीब

POSDCORB: "नि-सं-का-नि-स-प्र-ब" (नियोजन, संगठन, कार्मिक, निर्देशन, समन्वय, प्रतिवेदन, बजट)। नए लोक प्रशासन के 4 लक्ष्य: "प्रा-मू-स-प"।

11. PYQ-आधारित प्रश्न एवं मॉडल उत्तर

Q1UPSC 2025 · Paper I · 2(a)

नवीन लोक प्रबंधन वास्तव में परंपरागत लोक प्रशासन से उस विकास की एक संक्रमणकालीन अवस्था रहा है जिसे यहाँ नवीन लोक शासन कहा गया है। परीक्षण कीजिए।

मॉडल उत्तर (रूपरेखा)

भूमिका: ऑस्बॉर्न (2006) का तीन-चरणीय विकास।

तुलना-तालिका: परंपरागत लोक प्रशासन, NPM, NPG।

संक्रमणकालीन क्यों: विखंडन और समन्वय की समस्या; संयुक्त सरकार; जटिल समस्याएँ; लोकतांत्रिक उत्तरदायित्व।

भारत: PPP, SHG, MyGov, कोविड का नेटवर्क।

आलोचनात्मक दृष्टि: NPM के तत्व आज भी जीवित हैं (परिणाम-बजट), इसलिए यह "प्रतिस्थापन" नहीं, "परतों का जुड़ना" है।

निष्कर्ष: NPG दोनों अनुभवों का संश्लेषण।

Q2UPSC 2025 · Paper I · 4(c)

"नौकरशाही काल्पनिक राज्य है और राज्य का अध्यात्मवाद है।" स्पष्ट कीजिए।

मॉडल उत्तर (रूपरेखा)

स्रोत: मार्क्स (1843); हीगल का "सार्वभौम वर्ग"।

काल्पनिक राज्य: विशेष हितों को सामान्य हित के रूप में प्रस्तुत करना।

अध्यात्मवाद: गोपनीयता, पद-सोपान, सत्ता की पूजा।

वेबर से तुलना और बाद के विचार (लेनिन, जिलास)।

प्रासंगिकता: OSA बनाम RTI; लालफ़ीताशाही।

निष्कर्ष: नौकरशाही आवश्यक, पर लोकतांत्रिक नियंत्रण अनिवार्य।

Q3UPSC 2025 · Paper I · 3(b)

लोक प्रशासन, नवीन लोक प्रबंधन और लोक शासन की नींव "विधि के शासन" पर टिकी है। विवेचना कीजिए।

मॉडल उत्तर (रूपरेखा)

अर्थ: डाइसी के तीन तत्व।

परंपरागत: वेबर, नियम, प्रशासनिक विधि।

NPM: अनुबंध, संपत्ति-अधिकार, नियामक; सांठगांठ वाले पूँजीवाद का ख़तरा।

NPG: विश्वास, अधिकार, जवाबदेही।

भारत: अनुच्छेद 14, मेनका गांधी, केशवानंद।

निष्कर्ष: बदलते प्रतिमानों का स्थिर आधार।

Q4UPSC 2024 · Paper I · 2(b)

सुशासन शासन की प्रक्रिया में मानक और मूल्यांकनात्मक गुण जोड़ता है। टिप्पणी कीजिए।

मॉडल उत्तर (रूपरेखा)

उद्भव: विश्व बैंक 1989 और 1992; शासन बनाम सुशासन।

तत्व: UNDP 1997।

मानक: लोकतंत्र, अधिकार, नैतिकता, समता।

मूल्यांकनात्मक: WGI, सुशासन सूचकांक।

आलोचना: शर्तें, एक माप सब पर; "पर्याप्त सुशासन"।

भारत: RTI, लोकपाल, ARC।

Q5UPSC 2024 · Paper I · 4(c)

उभरते प्रतिमान "नवीन लोक शासन" की तुलना नवीन लोक प्रबंधन के बाज़ार-आधारित दृष्टिकोण से की जाती है। टिप्पणी कीजिए।

मॉडल उत्तर (रूपरेखा)

NPM: हुड के तत्व; बाज़ार; ग्राहक।

NPG: बहुल राज्य; नेटवर्क; सह-उत्पादन; विश्वास।

तुलना-तालिका।

भारतीय उदाहरण और सीमाएँ (नेटवर्क में जवाबदेही का धुंधलापन)।

Q6UPSC 2025 · Paper I · 1(a) · 10 अंक

अपूर्ण बाज़ार और राजनीतिक कारक लोक चयन उपागम के अनुप्रयोग को सीमित करते हैं। स्पष्ट कीजिए।

मॉडल उत्तर

उपागम: ब्यूकैनन-टुलॉक, निस्केनन, ऑस्ट्रोम।

अपूर्ण बाज़ार: सार्वजनिक वस्तुएँ, बाह्य प्रभाव, सूचना-असमानता, प्राकृतिक एकाधिकार।

राजनीतिक कारक: हित-समूह, किराया-प्राप्ति, चुनावी चक्र।

अन्य: लोक-सेवा प्रेरणा, समता।

Q7UPSC 2024 · Paper I · 1(a) · 10 अंक

"राजनीति-प्रशासन द्विभाजन की बहस अभी भी जीवित है।" टिप्पणी कीजिए।

मॉडल उत्तर

द्विभाजन: विल्सन, गुडनॉ; पेंडलटन अधिनियम।

आलोचना: एपलबी, साइमन, स्वारा।

जीवित क्यों: NPM की एजेंसियाँ; भारत में तटस्थता बनाम प्रतिबद्धता, तबादले, टी.एस.आर. सुब्रमण्यन (2013); नियामक।

12. Quick Revision Summary

परीक्षा से पहले एक बार ज़रूर पढ़ें
  • परिचय: अर्थ, क्षेत्र (POSDCORB), लोक बनाम निजी, महत्व।
  • विकास: नौ चरण; द्विभाजन की बहस।
  • प्रतिमान: नया लोक प्रशासन, लोक चयन और उसकी सीमाएँ, NPM, नवीन लोक सेवा, सुशासन, NPG।
  • शास्त्रीय: टेलर, फ़ेयोल, गुलिक-उर्विक।
  • नौकरशाही: वेबर, उसकी आलोचनाएँ, मार्क्स; विधि का शासन।