1. अध्याय एक नज़र में
हम सब किसी न किसी देश के नागरिक (Citizen) हैं। नागरिकता हमें पहचान देती है — पासपोर्ट, मतदाता पहचान-पत्र, अधिकार और सुरक्षा। पर जिन लोगों के पास किसी भी देश की नागरिकता नहीं, उनका क्या? क्या सभी नागरिकों को वास्तव में बराबर अधिकार मिलते हैं? इस अध्याय में हम नागरिकता का अर्थ, समान अधिकार, नागरिक और राष्ट्र का संबंध, सार्वभौमिक नागरिकता और विश्व नागरिकता के विचार को समझेंगे।
- नागरिकता — राजनीतिक समुदाय की पूर्ण और समान सदस्यता।
- टी. एच. मार्शल के तीन प्रकार के अधिकार।
- भारत में नागरिकता — संवैधानिक प्रावधान और नागरिकता अधिनियम, 1955।
- शहरी गरीब, आदिवासी, प्रवासी — समान नागरिकता की चुनौतियाँ।
- शरणार्थी, राज्यविहीन लोग, सार्वभौमिक और विश्व नागरिकता।
2. नागरिकता क्या है?
नागरिकता की परिभाषा है — किसी राजनीतिक समुदाय की पूर्ण और समान सदस्यता (full and equal membership)। आधुनिक विश्व में राजनीतिक समुदाय का अर्थ प्रायः राष्ट्र-राज्य है।
- नागरिकों को राज्य से राजनीतिक अधिकार (मत देना, चुनाव लड़ना), नागरिक अधिकार (अभिव्यक्ति, धर्म, संपत्ति) और सामाजिक-आर्थिक अधिकार (शिक्षा, स्वास्थ्य, न्यूनतम मज़दूरी) मिलते हैं।
- नागरिकता के साथ कर्तव्य भी हैं — कानून का पालन, कर देना, देश की रक्षा, और साथी नागरिकों के प्रति सम्मान।
- नागरिकता केवल कानूनी दर्जा नहीं, बल्कि साझा पहचान और भावनात्मक जुड़ाव भी है।
इतिहास में नागरिकता के अधिकार संघर्षों से मिले हैं — 1789 की फ़्रांसीसी क्रांति, अमेरिका में अश्वेतों का नागरिक अधिकार आंदोलन, दक्षिण अफ़्रीका में रंगभेद-विरोधी संघर्ष और भारत में स्वतंत्रता आंदोलन। इन सबका लक्ष्य था सभी लोगों के लिए समान नागरिकता।
ब्रिटिश समाजशास्त्री टी. एच. मार्शल ने अपनी पुस्तक "सिटिज़नशिप एंड सोशल क्लास" (1950) में नागरिकता को "किसी समुदाय के पूर्ण सदस्यों को दिया गया दर्जा" बताया और नागरिकता में तीन प्रकार के अधिकार गिनाए — नागरिक (civil), राजनीतिक (political) और सामाजिक (social)। उनके अनुसार सामाजिक अधिकार (शिक्षा, स्वास्थ्य, कल्याण) के बिना वर्ग-असमानता नागरिकता की समानता को खोखला कर देती है।
3. समान अधिकार — एक चुनौती
भारत में हर नागरिक को कानूनी रूप से समान अधिकार हैं, पर व्यवहार में कई समूहों के लिए ये अधिकार कमज़ोर पड़ते हैं:
| समूह | चुनौती |
|---|---|
| शहरी गरीब / झुग्गीवासी | शहरों के विकास में योगदान (घरेलू काम, निर्माण, रेहड़ी-पटरी) के बावजूद आवास, पानी, सफ़ाई, स्वास्थ्य सुविधाओं का अभाव; बार-बार बेदख़ली का डर |
| आदिवासी और वनवासी | जंगल और ज़मीन पर पारंपरिक निर्भरता, पर विकास परियोजनाओं, खनन से विस्थापन; वन अधिकार अधिनियम, 2006 इसी समस्या के लिए बना |
| प्रवासी मज़दूर | दूसरे राज्य में काम करने पर स्थानीय लोगों के विरोध, राशन-कार्ड और मतदान की कठिनाई; "वन नेशन वन राशन कार्ड" जैसी पहल से कुछ राहत |
| महिलाएँ, दलित, अल्पसंख्यक | सामाजिक भेदभाव के कारण अधिकारों का पूरा उपयोग न कर पाना |
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 19(1)(d) और (e) हर नागरिक को देश के किसी भी हिस्से में आने-जाने और बसने का अधिकार देता है। इसलिए किसी राज्य में दूसरे राज्य के लोगों के विरुद्ध भेदभाव संवैधानिक मूल्यों के विरुद्ध है। सरकारी और गैर-सरकारी संगठनों की भूमिका है कि वे इन वंचित समूहों की आवाज़ बनें।
4. भारत में नागरिकता
संविधान के भाग II (अनुच्छेद 5-11) में नागरिकता के प्रावधान हैं। अनुच्छेद 11 संसद को नागरिकता पर कानून बनाने का अधिकार देता है, जिसके तहत नागरिकता अधिनियम, 1955 बना। भारत में एकल नागरिकता है — राज्यों की अलग नागरिकता नहीं (अमेरिका के विपरीत)।
| नागरिकता प्राप्त करने के तरीक़े | नागरिकता समाप्त होने के तरीक़े |
|---|---|
| 1. जन्म द्वारा | 1. त्याग (Renunciation) — स्वेच्छा से छोड़ना |
| 2. वंश द्वारा | 2. समाप्ति (Termination) — किसी अन्य देश की नागरिकता लेने पर स्वतः |
| 3. पंजीकरण द्वारा | 3. वंचन (Deprivation) — धोखाधड़ी या देशद्रोह पर सरकार द्वारा |
| 4. देशीयकरण (Naturalisation) द्वारा | |
| 5. किसी क्षेत्र के भारत में विलय द्वारा |
भारत में दोहरी नागरिकता नहीं है, पर विदेश में बसे भारतीय मूल के लोगों के लिए OCI (ओवरसीज़ सिटिज़नशिप ऑफ़ इंडिया) कार्ड की व्यवस्था है, जो कुछ सुविधाएँ देता है पर मताधिकार नहीं देता। नागरिकता (संशोधन) अधिनियम, 2019 ने अफ़ग़ानिस्तान, बांग्लादेश और पाकिस्तान से 31 दिसंबर 2014 तक आए कुछ धार्मिक अल्पसंख्यक समुदायों के लिए नागरिकता की प्रक्रिया आसान की; इसके नियम मार्च 2024 में अधिसूचित हुए। इस कानून पर देश में व्यापक बहस हुई है।
5. नागरिक और राष्ट्र
राष्ट्र-राज्य अपनी पहचान के आधार पर नागरिकता के नियम तय करते हैं। कुछ देश (जैसे फ़्रांस) स्वयं को धर्मनिरपेक्ष और समावेशी मानते हुए भी सार्वजनिक जीवन में नागरिकों से साझा राष्ट्रीय संस्कृति अपनाने की अपेक्षा करते हैं। कुछ देश धर्म या जातीयता के आधार पर नागरिकता तय करते हैं।
भारत ने स्वयं को एक धर्मनिरपेक्ष, लोकतांत्रिक राष्ट्र के रूप में परिभाषित किया है। संविधान निर्माताओं ने विविध समुदायों को साथ लेकर चलने वाली समावेशी नागरिकता का विचार अपनाया — अनुसूचित जातियों, जनजातियों, धार्मिक और भाषाई अल्पसंख्यकों, महिलाओं, दूर-दराज़ के समुदायों सबको समान नागरिक माना गया।
6. सार्वभौमिक नागरिकता और विश्व नागरिकता
- शरणार्थी (Refugees): युद्ध, उत्पीड़न या संघर्ष के कारण अपना देश छोड़कर आए लोग। भारत ने इतिहास में तिब्बती, श्रीलंकाई तमिल, बांग्लादेश युद्ध (1971) के समय के शरणार्थियों को शरण दी।
- राज्यविहीन लोग (Stateless): जिनके पास किसी भी देश की नागरिकता नहीं — वे शिक्षा, स्वास्थ्य, रोज़गार और यात्रा जैसे बुनियादी अधिकारों से वंचित रह जाते हैं।
- सार्वभौमिक नागरिकता: यह विचार कि हर व्यक्ति को किसी न किसी देश की नागरिकता मिलनी चाहिए, क्योंकि नागरिकता के बिना अधिकार सुरक्षित नहीं। संयुक्त राष्ट्र की संस्था UNHCR शरणार्थियों की सहायता करती है।
- विश्व नागरिकता (Global Citizenship): इंटरनेट, टीवी, व्यापार और यात्रा से दुनिया जुड़ गई है; जलवायु परिवर्तन, महामारी, आतंकवाद जैसी समस्याएँ सीमाओं को नहीं मानतीं। इसलिए हमें स्वयं को एक विश्व समुदाय का सदस्य मानकर मानवता के प्रति ज़िम्मेदारी भी निभानी चाहिए। आलोचक कहते हैं कि अभी अधिकारों की रक्षा का मुख्य साधन राष्ट्रीय नागरिकता ही है; इसलिए दोनों को साथ लेकर चलना चाहिए।
7. मास्टर तालिका : मुख्य शब्दावली
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| नागरिकता | राजनीतिक समुदाय की पूर्ण और समान सदस्यता |
| एकल नागरिकता | पूरे देश की एक नागरिकता; राज्यों की अलग नहीं |
| देशीयकरण | विदेशी व्यक्ति को निर्धारित शर्तों पर नागरिकता देना |
| OCI | विदेश में बसे भारतीय मूल के लोगों के लिए विशेष दर्जा; मताधिकार नहीं |
| शरणार्थी | उत्पीड़न / युद्ध से बचकर दूसरे देश में आए लोग |
| राज्यविहीन | जिनके पास किसी देश की नागरिकता नहीं |
| सार्वभौमिक नागरिकता | हर व्यक्ति को किसी देश की नागरिकता मिलने का विचार |
| विश्व नागरिकता | स्वयं को विश्व समुदाय का सदस्य मानना |
| UNHCR | संयुक्त राष्ट्र शरणार्थी उच्चायुक्त |
8. मास्टर सारांश तालिका
| विषय | मुख्य बिंदु |
|---|---|
| अर्थ | पूर्ण व समान सदस्यता; अधिकार + कर्तव्य + पहचान |
| मार्शल (1950) | नागरिक, राजनीतिक, सामाजिक अधिकार |
| भारत | भाग II (अनु. 5-11), नागरिकता अधिनियम 1955, एकल नागरिकता, CAA 2019 |
| चुनौतियाँ | शहरी गरीब, आदिवासी, प्रवासी, सामाजिक भेदभाव |
| व्यापक विचार | शरणार्थी, राज्यविहीन, सार्वभौमिक व विश्व नागरिकता |
चार्ट — नागरिकता अधिनियम, 1955 के अनुसार:
9. माइंड मैप
- पूर्ण, समान सदस्यता
- अधिकार-कर्तव्य
- नागरिक, राजनीतिक
- सामाजिक
- अनु. 5-11
- अधिनियम 1955
- झुग्गी, आदिवासी
- प्रवासी
- शरणार्थी
- विश्व नागरिकता
10. टिप्स और ट्रिक्स
- प्राप्ति के 5 तरीक़े "ज-वं-पं-दे-वि": जन्म, वंश, पंजीकरण, देशीयकरण, विलय।
- समाप्ति के 3 तरीक़े "त्या-स-वं": त्याग, समाप्ति, वंचन।
- मार्शल के अधिकार "ना-रा-सा": नागरिक, राजनीतिक, सामाजिक।
- OCI दोहरी नागरिकता नहीं है; इसमें मताधिकार नहीं।
- भारत में एकल नागरिकता है, अमेरिका जैसी दोहरी (संघ + राज्य) नहीं।
- शरणार्थी और राज्यविहीन व्यक्ति एक नहीं — शरणार्थी के पास मूल देश की नागरिकता हो सकती है।
11. महत्त्वपूर्ण वन-लाइनर
- नागरिकता राजनीतिक समुदाय की पूर्ण और समान सदस्यता है।
- टी. एच. मार्शल ने "सिटिज़नशिप एंड सोशल क्लास" (1950) लिखी।
- संविधान के भाग II में नागरिकता के प्रावधान हैं।
- अनुच्छेद 11 संसद को नागरिकता पर कानून बनाने का अधिकार देता है।
- नागरिकता अधिनियम 1955 में बना।
- भारत में एकल नागरिकता है।
- CAA 2019 के नियम मार्च 2024 में अधिसूचित हुए।
- वन अधिकार अधिनियम 2006 में बना।
- अनुच्छेद 19(1)(e) देश में कहीं भी बसने का अधिकार देता है।
- UNHCR शरणार्थियों की सहायता करने वाली संयुक्त राष्ट्र संस्था है।
12. बोर्ड परीक्षा-पैटर्न प्रश्न (विस्तृत उत्तर सहित)
भारत में नागरिकता से संबंधित प्रावधान संविधान के किस भाग में हैं?
- भाग I
- भाग II
- भाग III
- भाग IV
उत्तर देखें
भाग II (अनुच्छेद 5-11) में नागरिकता के प्रावधान हैं; भाग III में मौलिक अधिकार हैं।
उत्तर: (ख) भाग II
नागरिकता के तीन प्रकार के अधिकारों का विचार किसने दिया?
- जॉन लॉक
- टी. एच. मार्शल
- जॉन रॉल्स
- रूसो
उत्तर देखें
टी. एच. मार्शल ने नागरिक, राजनीतिक और सामाजिक अधिकारों का वर्गीकरण दिया।
उत्तर: (ख) टी. एच. मार्शल
नागरिकता की परिभाषा दीजिए।
उत्तर देखें
नागरिकता किसी राजनीतिक समुदाय (आज मुख्यतः राष्ट्र-राज्य) की पूर्ण और समान सदस्यता है, जिसमें व्यक्ति को राज्य से अधिकार मिलते हैं और उसके कुछ कर्तव्य भी होते हैं।
उत्तर: राजनीतिक समुदाय की पूर्ण और समान सदस्यता
भारत में नागरिकता प्राप्त करने के तरीक़े बताइए।
उत्तर देखें
नागरिकता अधिनियम, 1955 के अनुसार: (1) जन्म द्वारा, (2) वंश द्वारा — माता या पिता के भारतीय नागरिक होने पर, (3) पंजीकरण द्वारा, (4) देशीयकरण द्वारा — निर्धारित अवधि तक भारत में निवास और शर्तें पूरी करने पर, (5) किसी नए क्षेत्र के भारत में विलय द्वारा।
उत्तर: जन्म, वंश, पंजीकरण, देशीयकरण, क्षेत्र विलय
शहरी गरीबों के लिए समान नागरिकता की समस्याएँ बताइए।
उत्तर देखें
शहरी गरीब घरेलू कामगार, निर्माण मज़दूर, रेहड़ी-पटरी वाले के रूप में शहर की अर्थव्यवस्था में बड़ा योगदान देते हैं, पर अधिकतर झुग्गियों में रहते हैं जहाँ पानी, शौचालय, सफ़ाई, स्वास्थ्य सुविधाएँ कम हैं; बेदख़ली का डर बना रहता है; पते का प्रमाण न होने से सरकारी योजनाओं का लाभ नहीं मिलता। इसलिए कानूनी रूप से समान होते हुए भी व्यवहार में उनकी नागरिकता अधूरी है।
उत्तर: आवास, सुविधाएँ और पहचान-प्रमाण का अभाव
शरणार्थी और राज्यविहीन व्यक्ति में अंतर बताइए।
उत्तर देखें
शरणार्थी वह है जो युद्ध, उत्पीड़न या संघर्ष के कारण अपने देश से भागकर दूसरे देश में शरण लेता है; उसके पास मूल देश की नागरिकता हो सकती है, पर वह वहाँ लौट नहीं सकता। राज्यविहीन व्यक्ति के पास किसी भी देश की नागरिकता नहीं होती। दोनों ही शिक्षा, रोज़गार, स्वास्थ्य जैसे अधिकारों से वंचित रहते हैं।
उत्तर: शरणार्थी देश छोड़ने को विवश; राज्यविहीन के पास कोई नागरिकता नहीं
प्रवासी मज़दूरों के प्रति भेदभाव संविधान के किन मूल्यों के विरुद्ध है?
उत्तर देखें
अनुच्छेद 19(1)(d) और (e) हर नागरिक को भारत के किसी भी भाग में स्वतंत्र रूप से आने-जाने और बसने का अधिकार देते हैं; अनुच्छेद 15 और 16 जन्म-स्थान के आधार पर भेदभाव रोकते हैं; और भारत में एकल नागरिकता है। इसलिए किसी राज्य में दूसरे राज्यों के लोगों को रोज़गार या सुविधाओं से वंचित करना समान नागरिकता और बंधुता के संवैधानिक मूल्यों के विरुद्ध है।
उत्तर: अनु. 15, 16, 19 और एकल नागरिकता के विरुद्ध
टी. एच. मार्शल के नागरिकता संबंधी विचारों की व्याख्या कीजिए। भारत के संदर्भ में इनकी प्रासंगिकता बताइए।
उत्तर देखें
मार्शल ने नागरिकता में तीन अधिकार बताए: (1) नागरिक — अभिव्यक्ति, संपत्ति, न्याय; (2) राजनीतिक — मत देना और चुनाव लड़ना; (3) सामाजिक — शिक्षा, स्वास्थ्य, न्यूनतम आर्थिक सुरक्षा। उनका तर्क था कि सामाजिक अधिकारों के बिना वर्ग-असमानता नागरिकता की समानता को खोखला कर देती है। भारत में नागरिक और राजनीतिक अधिकार मौलिक अधिकारों में हैं, जबकि सामाजिक अधिकार अधिकतर नीति-निदेशक तत्त्वों में; बाद में शिक्षा का अधिकार (अनु. 21A), खाद्य सुरक्षा कानून और मनरेगा से सामाजिक नागरिकता मज़बूत हुई। इस प्रकार मार्शल का विचार भारत के कल्याणकारी राज्य के लक्ष्य से मेल खाता है।
उत्तर: नागरिक-राजनीतिक-सामाजिक अधिकार; भारत में DPSP व कल्याण कानूनों से सामाजिक नागरिकता
विश्व नागरिकता की अवधारणा का मूल्यांकन कीजिए।
उत्तर देखें
पक्ष: वैश्वीकरण, इंटरनेट और यात्रा ने दुनिया को जोड़ दिया है; जलवायु परिवर्तन, महामारी, आतंकवाद, शरणार्थी संकट जैसी समस्याएँ किसी एक देश की सीमा में हल नहीं हो सकतीं; विश्व नागरिकता का विचार हमें पूरी मानवता के प्रति ज़िम्मेदार बनाता है और राष्ट्रीय सीमाओं के पार सहयोग को प्रोत्साहित करता है। विपक्ष: अभी कोई "विश्व सरकार" नहीं जो अधिकारों की गारंटी दे; अधिकारों की रक्षा का वास्तविक साधन राष्ट्रीय नागरिकता और राष्ट्रीय न्यायालय हैं। निष्कर्ष: विश्व नागरिकता राष्ट्रीय नागरिकता का विकल्प नहीं, पूरक है — हमें राष्ट्र और विश्व दोनों के प्रति ज़िम्मेदार होना चाहिए।
उत्तर: वैश्विक समस्याओं के लिए उपयोगी; राष्ट्रीय नागरिकता का पूरक
"नागरिकता केवल कानूनी दर्जा नहीं, अधिकारों के लिए संघर्ष भी है।" ऐतिहासिक उदाहरणों से स्पष्ट कीजिए।
उत्तर देखें
(1) फ़्रांसीसी क्रांति (1789) ने राजशाही और सामंतों के विशेषाधिकारों के विरुद्ध "स्वतंत्रता, समानता, बंधुत्व" के आधार पर नागरिकता की नई धारणा दी। (2) अमेरिका का नागरिक अधिकार आंदोलन (मार्टिन लूथर किंग जूनियर) अश्वेतों के लिए समान अधिकारों का संघर्ष था। (3) दक्षिण अफ़्रीका में रंगभेद के विरुद्ध नेल्सन मंडेला का संघर्ष। (4) भारत का स्वतंत्रता आंदोलन, दलित आंदोलन और महिला आंदोलन। इन संघर्षों ने दिखाया कि समान नागरिकता अपने आप नहीं मिलती; इसे बार-बार माँगना और बचाना पड़ता है।
उत्तर: फ़्रांसीसी क्रांति, नागरिक अधिकार आंदोलन, रंगभेद-विरोध, भारतीय आंदोलन
आदिवासी और वनवासी समुदायों के लिए समान नागरिकता की चुनौतियाँ और उनके समाधान बताइए।
उत्तर देखें
चुनौतियाँ: उनकी आजीविका जंगल, ज़मीन और जल पर निर्भर है, पर बाँध, खनन और उद्योग जैसी विकास परियोजनाओं से विस्थापन होता है; भूमि के कागज़ी अधिकार न होने से वे अपनी ही ज़मीन पर "अतिक्रमणकारी" कहे जाते हैं; उनकी संस्कृति और भाषा पर संकट। समाधान: वन अधिकार अधिनियम (2006) से पारंपरिक वन अधिकारों को मान्यता; PESA (1996) से ग्राम सभा को शक्ति; पाँचवीं-छठी अनुसूची के प्रावधान; न्यायसंगत पुनर्वास नीति और परियोजनाओं में उनकी सहमति। इस प्रकार विकास और समान नागरिकता में संतुलन बनाया जा सकता है।
उत्तर: विस्थापन व भूमि अधिकारों का अभाव; FRA 2006, PESA, अनुसूचियाँ, पुनर्वास
13. त्वरित पुनरावृत्ति सारांश
- नागरिकता = राजनीतिक समुदाय की पूर्ण और समान सदस्यता; अधिकार, कर्तव्य, पहचान।
- मार्शल (1950): नागरिक, राजनीतिक, सामाजिक अधिकार।
- भारत: भाग II (अनु. 5-11), नागरिकता अधिनियम 1955 — प्राप्ति के 5 और समाप्ति के 3 तरीक़े; एकल नागरिकता; OCI; CAA 2019।
- चुनौतियाँ: शहरी गरीब, आदिवासी (FRA 2006), प्रवासी मज़दूर।
- शरणार्थी, राज्यविहीन, सार्वभौमिक नागरिकता; विश्व नागरिकता — राष्ट्रीय नागरिकता का पूरक।