Class 11 Political Science · Chapter 5 · राजनीतिक सिद्धांत

अधिकार

अधिकार क्या हैं, अधिकार कहाँ से आते हैं, कानूनी अधिकार और राज्य, अधिकारों के प्रकार और अधिकार व जिम्मेदारियाँ।

NCERT भारत का संविधान : सिद्धांत और व्यवहार + राजनीतिक सिद्धांतCBSE Class 11 12 min read

1. अध्याय एक नज़र में

आज हम "अधिकार" शब्द का प्रयोग बहुत करते हैं — शिक्षा का अधिकार, सूचना का अधिकार, मताधिकार, मानवाधिकार। पर अधिकार वास्तव में क्या हैं? वे कहाँ से आते हैं? क्या हर माँग अधिकार बन जाती है? इस अध्याय में हम अधिकार (Rights) का अर्थ, उनके स्रोत — प्राकृतिक अधिकार और मानवाधिकार, अधिकारों के प्रकार, और अधिकारों के साथ जुड़ी ज़िम्मेदारियों को समझेंगे।

इस अध्याय में आप सीखेंगे
  • अधिकार का अर्थ — उचित दावा।
  • प्राकृतिक अधिकार और मानवाधिकार; सार्वभौमिक मानवाधिकार घोषणा-पत्र।
  • कानूनी अधिकार और राज्य की भूमिका।
  • अधिकारों के प्रकार — राजनीतिक, आर्थिक, सांस्कृतिक।
  • अधिकार और ज़िम्मेदारियाँ।

2. अधिकार क्या हैं?

अधिकार एक दावा (claim) है — ऐसी चीज़ जिसे पाने का हमें हक़ है। पर हर इच्छा या माँग अधिकार नहीं होती। अधिकार वह उचित दावा (justified claim) है जिसे समाज स्वीकार करता है और जो हमें सम्मान और गरिमा के साथ जीने के लिए आवश्यक है।

  • गरिमा के लिए आवश्यक: जीवन, स्वतंत्रता, शिक्षा, आजीविका — इनके बिना मानव गरिमापूर्ण जीवन नहीं जी सकता।
  • हमारी भलाई के लिए आवश्यक: अधिकार व्यक्ति को अपनी प्रतिभा और क्षमताओं के विकास का अवसर देते हैं — जैसे शिक्षा का अधिकार।
  • सबके लिए: कोई दावा तभी अधिकार है जब वह सभी लोगों के लिए समान रूप से माँगा जाए। उदाहरण: मुझे यह माँगने का अधिकार नहीं कि मैं दूसरों को परेशान करूँ, क्योंकि यही अधिकार सबको देने पर समाज चल नहीं सकेगा।

इसलिए धूम्रपान करना या प्रतिबंधित दवा लेना "अधिकार" नहीं कहा जा सकता — ये न गरिमा के लिए आवश्यक हैं और न समाज की भलाई के लिए।

3. अधिकार कहाँ से आते हैं?

प्राकृतिक अधिकार (Natural Rights)

17वीं और 18वीं शताब्दी के चिंतकों ने तर्क दिया कि कुछ अधिकार मनुष्य को प्रकृति या ईश्वर से मिले हैं — वे जन्मजात हैं और किसी शासक या सरकार ने उन्हें नहीं दिया, इसलिए कोई उन्हें छीन नहीं सकता। अंग्रेज़ दार्शनिक जॉन लॉक ने तीन प्राकृतिक अधिकार बताए: जीवन, स्वतंत्रता और संपत्ति। यह विचार निरंकुश राजाओं की मनमानी के विरुद्ध एक हथियार बना।

मानवाधिकार (Human Rights)

आज "प्राकृतिक अधिकार" के स्थान पर मानवाधिकार शब्द अधिक प्रचलित है। इसका आधार यह विचार है कि हर व्यक्ति, केवल मनुष्य होने के नाते, कुछ अधिकारों का हक़दार है — चाहे वह किसी भी देश, धर्म, जाति, लिंग या वर्ग का हो। सभी मनुष्य स्वतंत्र और समान हैं।

सार्वभौमिक मानवाधिकार घोषणा-पत्र (UDHR)

संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 10 दिसंबर 1948 को सार्वभौमिक मानवाधिकार घोषणा-पत्र (Universal Declaration of Human Rights) अपनाया, इसलिए 10 दिसंबर को मानवाधिकार दिवस मनाया जाता है। इसमें 30 अनुच्छेद हैं, जिनमें जीवन, स्वतंत्रता, समानता, शिक्षा, काम, अभिव्यक्ति और धर्म की स्वतंत्रता जैसे अधिकार शामिल हैं। भारत में मानवाधिकार संरक्षण अधिनियम, 1993 के तहत राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) का गठन हुआ।

मानवाधिकारों का दायरा समय के साथ बढ़ा है। दुनिया भर में दमित समूहों — दासता से मुक्त हुए लोग, उपनिवेशों की जनता, महिलाएँ, दलित, आदिवासी, दिव्यांग — ने अपने संघर्षों से मानवाधिकारों की नई व्याख्याएँ कीं। आज स्वच्छ पर्यावरण, स्वच्छ पानी, निजता जैसे नए अधिकारों की भी माँग की जाती है।

मानवाधिकारों की घोषणा अपने आप में पर्याप्त नहीं; उन्हें लागू कराने के लिए कानूनी मान्यता चाहिए। कई देशों में अधिकारों को संविधान में लिखकर कानूनी रूप दिया गया है — जैसे भारतीय संविधान के भाग III में मौलिक अधिकार, जिन्हें न्यायालय में लागू कराया जा सकता है (अनु. 32, 226)।

  • अधिकार राज्य पर दायित्व डालते हैं — कि वह कुछ काम करे (जैसे सबको शिक्षा दे) और कुछ काम न करे (जैसे मनमानी गिरफ़्तारी न करे)।
  • इस प्रकार अधिकार राज्य की शक्ति पर सीमा भी लगाते हैं; राज्य को अपने नागरिकों के अधिकारों की रक्षा के लिए अपनी शक्ति का प्रयोग करना चाहिए, उन्हें कुचलने के लिए नहीं।
  • कोई अधिकार कानूनी रूप ले, इसके लिए पहले उसे नैतिक दावे के रूप में समाज में स्वीकार्यता मिलनी चाहिए — जैसे सूचना का अधिकार पहले जन आंदोलन से उठा, फिर RTI अधिनियम, 2005 बना।

5. अधिकारों के प्रकार

प्रकारउदाहरणमहत्त्व
राजनीतिक / नागरिक अधिकारमतदान, चुनाव लड़ना, राजनीतिक दल बनाना, अभिव्यक्ति, न्यायपूर्ण सुनवाईलोकतांत्रिक सरकार में नागरिकों की भागीदारी; सरकार को जवाबदेह बनाना
आर्थिक अधिकारन्यूनतम मज़दूरी, आवास, भोजन, स्वास्थ्य, रोज़गार गारंटी (मनरेगा)मूलभूत ज़रूरतें पूरी हुए बिना राजनीतिक अधिकारों का अर्थ नहीं
सांस्कृतिक अधिकारमातृभाषा में प्राथमिक शिक्षा, अपनी भाषा-संस्कृति के संरक्षण के लिए संस्थाएँ बनानाविविधता और अल्पसंख्यक पहचान की रक्षा (भारत में अनु. 29-30)
मानव गरिमा और भलाई राजनीतिक मत, अभिव्यक्ति आर्थिक भोजन, रोज़गार सांस्कृतिक भाषा, संस्कृति आधार: संविधान, कानून, न्यायालय और जागरूक नागरिक
अधिकारों के तीन प्रकार — गरिमापूर्ण जीवन के स्तंभ (विचार-चित्र)।

6. अधिकार और ज़िम्मेदारियाँ

अधिकार केवल राज्य पर दायित्व नहीं डालते, बल्कि हम पर भी कुछ ज़िम्मेदारियाँ डालते हैं:

  1. सामूहिक भलाई की चिंता: अधिकार हमें केवल अपने निजी हित नहीं, बल्कि समाज के साझा हितों — जैसे स्वच्छ पर्यावरण, ओज़ोन परत की रक्षा, प्रदूषण कम करना — के बारे में सोचने के लिए प्रेरित करते हैं।
  2. दूसरों के अधिकारों का सम्मान: मेरी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अर्थ यह नहीं कि मैं दूसरों के समान अधिकार की अनदेखी करूँ।
  3. अधिकारों में संतुलन: कभी-कभी अधिकार टकराते हैं — जैसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और किसी की निजता; हमें संतुलन बनाना होता है।
  4. सतर्कता: नागरिकों को सतर्क रहना चाहिए कि सरकार सुरक्षा के नाम पर नागरिकों के अधिकारों को अनुचित रूप से सीमित न करे — जैसे बिना उचित प्रक्रिया के लंबी हिरासत।

भारतीय संविधान में 42वें संशोधन (1976) से मौलिक कर्तव्य (अनु. 51A) जोड़े गए — जैसे संविधान का पालन, पर्यावरण की रक्षा, सार्वजनिक संपत्ति की सुरक्षा, वैज्ञानिक दृष्टिकोण का विकास।

7. मास्टर तालिका : मुख्य शब्दावली

शब्दअर्थ
अधिकारगरिमापूर्ण जीवन के लिए आवश्यक, समाज द्वारा स्वीकृत उचित दावा
प्राकृतिक अधिकारजन्मजात अधिकार — लॉक: जीवन, स्वतंत्रता, संपत्ति
मानवाधिकारमनुष्य होने के नाते सबको मिलने वाले अधिकार
UDHRसार्वभौमिक मानवाधिकार घोषणा-पत्र, 10 दिसंबर 1948, 30 अनुच्छेद
कानूनी अधिकारकानून / संविधान द्वारा मान्य और न्यायालय में लागू होने वाले अधिकार
राजनीतिक अधिकारमत देना, चुनाव लड़ना, अभिव्यक्ति, संगठन
आर्थिक अधिकारभोजन, आवास, रोज़गार, न्यूनतम मज़दूरी
सांस्कृतिक अधिकारभाषा, संस्कृति, मातृभाषा में शिक्षा
NHRCराष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (1993 के अधिनियम से)
मौलिक कर्तव्यअनु. 51A — नागरिकों के संवैधानिक दायित्व

8. मास्टर सारांश तालिका

विषयमुख्य बिंदु
अर्थउचित दावा; गरिमा व भलाई के लिए आवश्यक; सबके लिए समान
स्रोतप्राकृतिक अधिकार (लॉक) → मानवाधिकार (UDHR 1948)
कानूनी रूपसंविधान, कानून; राज्य पर दायित्व और सीमा
प्रकारराजनीतिक, आर्थिक, सांस्कृतिक
ज़िम्मेदारियाँसामूहिक भलाई, दूसरों का सम्मान, संतुलन, सतर्कता; अनु. 51A

चार्ट — मौलिक अधिकारों की श्रेणियाँ (भारतीय संविधान, भाग III):

मूल संविधान (1950)7 श्रेणियाँ
44वें संशोधन (1978) के बाद — संपत्ति का अधिकार हटा6 श्रेणियाँ

9. माइंड मैप

अधिकार
अर्थ
  • उचित दावा
  • गरिमा
स्रोत
  • प्राकृतिक (लॉक)
  • मानवाधिकार
कानूनी
  • संविधान
  • राज्य पर दायित्व
प्रकार
  • राजनीतिक, आर्थिक
  • सांस्कृतिक
ज़िम्मेदारी
  • सामूहिक भलाई
  • अनु. 51A

10. टिप्स और ट्रिक्स

याद रखने के सूत्र
  • लॉक के तीन अधिकार "जी-स्व-सं": जीवन, स्वतंत्रता, संपत्ति।
  • UDHR: 10 दिसंबर 1948, 30 अनुच्छेद — "10-48-30"।
  • तीन प्रकार "रा-आ-सां": राजनीतिक, आर्थिक, सांस्कृतिक।
आम गलतियाँ
  • हर इच्छा या माँग अधिकार नहीं होती।
  • UDHR 1945 में नहीं (तब संयुक्त राष्ट्र बना), 1948 में अपनाया गया।
  • अधिकार केवल राज्य पर नहीं, नागरिकों पर भी ज़िम्मेदारी डालते हैं।

11. महत्त्वपूर्ण वन-लाइनर

  • अधिकार एक उचित दावा है।
  • जॉन लॉक ने जीवन, स्वतंत्रता और संपत्ति को प्राकृतिक अधिकार माना।
  • UDHR 10 दिसंबर 1948 को अपनाया गया।
  • UDHR में 30 अनुच्छेद हैं।
  • 10 दिसंबर मानवाधिकार दिवस है।
  • भारत में NHRC 1993 के अधिनियम से बना।
  • सूचना का अधिकार अधिनियम 2005 में बना।
  • मौलिक अधिकार संविधान के भाग III में हैं।
  • मौलिक कर्तव्य अनुच्छेद 51A में हैं।
  • सांस्कृतिक अधिकार अनुच्छेद 29-30 में संरक्षित हैं।

12. बोर्ड परीक्षा-पैटर्न प्रश्न (विस्तृत उत्तर सहित)

प्र1आसान

सार्वभौमिक मानवाधिकार घोषणा-पत्र कब अपनाया गया?

  1. 1945
  2. 1948
  3. 1950
  4. 1966
उत्तर देखें

संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 10 दिसंबर 1948 को UDHR अपनाया; इसीलिए 10 दिसंबर मानवाधिकार दिवस है।

उत्तर: (ख) 1948

प्र2आसान

मातृभाषा में शिक्षा पाने का अधिकार किस प्रकार का अधिकार है?

  1. राजनीतिक
  2. आर्थिक
  3. सांस्कृतिक
  4. प्राकृतिक
उत्तर देखें

भाषा और संस्कृति के संरक्षण से जुड़े अधिकार सांस्कृतिक अधिकार हैं।

उत्तर: (ग) सांस्कृतिक

प्र3आसान

प्राकृतिक अधिकार से क्या तात्पर्य है?

उत्तर देखें

प्राकृतिक अधिकार वे अधिकार हैं जो मनुष्य को जन्म से, प्रकृति या ईश्वर द्वारा प्राप्त माने गए हैं; ये किसी शासक या सरकार की देन नहीं, इसलिए इन्हें छीना नहीं जा सकता। जॉन लॉक ने जीवन, स्वतंत्रता और संपत्ति को प्राकृतिक अधिकार माना।

उत्तर: जन्मजात, अहस्तांतरणीय अधिकार

प्र4मध्यम

किसी दावे को अधिकार मानने की कौन-सी शर्तें हैं?

उत्तर देखें

(1) वह दावा व्यक्ति के गरिमापूर्ण जीवन के लिए आवश्यक हो; (2) वह व्यक्ति की भलाई और क्षमता-विकास में सहायक हो; (3) वह सबके लिए समान रूप से माँगा जा सके — कोई ऐसा दावा जो दूसरों को हानि पहुँचाए, अधिकार नहीं हो सकता; (4) समाज उसे उचित मानकर स्वीकार करे।

उत्तर: गरिमा, भलाई, सार्वभौमिकता और सामाजिक स्वीकृति

प्र5मध्यम

अधिकार राज्य पर किस प्रकार के दायित्व डालते हैं?

उत्तर देखें

(1) सकारात्मक दायित्व: राज्य कुछ काम करे — जैसे निःशुल्क शिक्षा, स्वास्थ्य सुविधा, न्यूनतम मज़दूरी सुनिश्चित करना। (2) नकारात्मक दायित्व: राज्य कुछ काम न करे — जैसे मनमानी गिरफ़्तारी, अभिव्यक्ति पर अनुचित रोक। इस प्रकार अधिकार राज्य की शक्ति को सीमित भी करते हैं और उसे नागरिकों के कल्याण के लिए प्रेरित भी करते हैं।

उत्तर: करने और न करने — दोनों प्रकार के दायित्व

प्र6मध्यम

राजनीतिक, आर्थिक और सांस्कृतिक अधिकारों का एक-एक उदाहरण देकर उनका महत्त्व बताइए।

उत्तर देखें

राजनीतिक — मताधिकार: नागरिकों को सरकार चुनने और उसे जवाबदेह बनाने की शक्ति देता है। आर्थिक — मनरेगा के तहत रोज़गार: भूख और गरीबी से सुरक्षा, जिसके बिना राजनीतिक अधिकार अर्थहीन हो जाते हैं। सांस्कृतिक — अल्पसंख्यकों का अपनी शिक्षण संस्थाएँ चलाने का अधिकार (अनु. 30): भाषाई और धार्मिक विविधता की रक्षा।

उत्तर: मताधिकार, रोज़गार, अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थाएँ

प्र7मध्यम

मानवाधिकारों का दायरा समय के साथ कैसे बढ़ा है?

उत्तर देखें

प्रारंभ में अधिकार मुख्यतः जीवन, स्वतंत्रता और संपत्ति तक सीमित थे और कई समूहों (दास, महिलाएँ, उपनिवेशों के लोग) को इनसे बाहर रखा गया। इन समूहों के संघर्षों — दासता-विरोधी, उपनिवेशवाद-विरोधी, नारीवादी, दलित आंदोलन — से अधिकार सबके लिए हुए। अब स्वच्छ पर्यावरण, पेयजल, निजता, बच्चों और दिव्यांगों के विशेष अधिकार जैसे नए अधिकार भी मान्यता पा रहे हैं।

उत्तर: संघर्षों से सार्वभौमिकता और नए अधिकारों की मान्यता

प्र8कठिन

"अधिकार ज़िम्मेदारियों के साथ आते हैं।" इस कथन की व्याख्या कीजिए।

उत्तर देखें

(1) अधिकार हमें सामूहिक भलाई की चिंता करना सिखाते हैं — स्वच्छ पर्यावरण का अधिकार तभी सुरक्षित है जब हम स्वयं प्रदूषण न फैलाएँ। (2) मेरे अधिकार का प्रयोग दूसरों के समान अधिकार का सम्मान करते हुए होना चाहिए — अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अर्थ दूसरों की मानहानि नहीं। (3) अधिकारों के टकराव में संतुलन बनाना पड़ता है — जैसे अभिव्यक्ति और निजता। (4) नागरिकों को सतर्क रहना चाहिए कि सुरक्षा के नाम पर सरकार अधिकारों को अनुचित रूप से सीमित न करे। संविधान के अनु. 51A में मौलिक कर्तव्य भी यही भावना दर्शाते हैं।

उत्तर: सामूहिक भलाई, दूसरों का सम्मान, संतुलन और सतर्कता

प्र9कठिन

प्राकृतिक अधिकार और कानूनी अधिकार में अंतर करते हुए बताइए कि मानवाधिकारों को कानूनी रूप देना क्यों आवश्यक है।

उत्तर देखें

प्राकृतिक अधिकार नैतिक दावे हैं जो मनुष्य होने के नाते माने जाते हैं; पर इन्हें लागू कराने का कोई औपचारिक तंत्र नहीं होता। कानूनी अधिकार संविधान या कानून द्वारा मान्य होते हैं और उनके उल्लंघन पर न्यायालय से उपचार मिलता है। मानवाधिकारों को कानूनी रूप देना इसलिए ज़रूरी है ताकि (1) राज्य उनका पालन करने के लिए बाध्य हो, (2) पीड़ित व्यक्ति न्यायालय जा सके (भारत में अनु. 32 और 226), और (3) NHRC जैसी संस्थाएँ उनकी निगरानी कर सकें। उदाहरण: सूचना का अधिकार पहले जन आंदोलन की माँग था, RTI अधिनियम 2005 के बाद कानूनी अधिकार बना।

उत्तर: नैतिक दावा बनाम लागू करने योग्य अधिकार; कानूनी रूप से सुरक्षा और उपचार

प्र10कठिन

क्या सुरक्षा के नाम पर नागरिक अधिकारों पर प्रतिबंध उचित हैं? विवेचना कीजिए।

उत्तर देखें

राष्ट्रीय सुरक्षा और सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखना राज्य का कर्तव्य है, इसलिए आतंकवाद या हिंसा की स्थिति में कुछ प्रतिबंध उचित हो सकते हैं। पर इतिहास दिखाता है कि सरकारें कभी-कभी सुरक्षा के नाम पर आलोचकों को लंबे समय तक बिना सुनवाई के हिरासत में रखती हैं या अभिव्यक्ति को दबाती हैं। इसलिए प्रतिबंध (1) कानून द्वारा निर्धारित हों, (2) उचित और आनुपातिक हों, (3) न्यायिक समीक्षा के अधीन हों, और (4) अस्थायी हों। नागरिकों की सतर्कता और स्वतंत्र न्यायपालिका ही सुरक्षा और स्वतंत्रता के बीच संतुलन बनाए रख सकती है।

उत्तर: सीमित, आनुपातिक और न्यायिक समीक्षा के अधीन प्रतिबंध ही उचित

प्र11कठिन

"आर्थिक अधिकारों के बिना राजनीतिक अधिकार अधूरे हैं।" भारत के संदर्भ में स्पष्ट कीजिए।

उत्तर देखें

भारत में 1950 से सभी वयस्कों को मताधिकार है, पर यदि किसी व्यक्ति के पास भोजन, रोज़गार, आवास और स्वास्थ्य नहीं, तो वह अपने वोट का स्वतंत्र प्रयोग नहीं कर पाता — वह लालच या दबाव में आ सकता है, और चुनाव लड़ना तो उसके लिए लगभग असंभव है। इसीलिए भारत ने खाद्य सुरक्षा अधिनियम (2013), मनरेगा (2005), शिक्षा का अधिकार (2009) जैसे कानून बनाए और न्यायपालिका ने अनु. 21 की व्याख्या में आजीविका और गरिमापूर्ण जीवन को शामिल किया। इस प्रकार राजनीतिक और आर्थिक अधिकार एक-दूसरे के पूरक हैं।

उत्तर: बुनियादी आर्थिक सुरक्षा के बिना राजनीतिक अधिकारों का प्रभावी प्रयोग संभव नहीं

13. त्वरित पुनरावृत्ति सारांश

2 मिनट में दोहराएँ
  • अधिकार = गरिमा और भलाई के लिए आवश्यक, सबके लिए समान, समाज द्वारा स्वीकृत उचित दावा।
  • प्राकृतिक अधिकार (लॉक: जीवन, स्वतंत्रता, संपत्ति) → मानवाधिकार (UDHR: 10 दिसंबर 1948, 30 अनुच्छेद); NHRC 1993।
  • कानूनी अधिकार राज्य पर दायित्व डालते हैं और उसकी शक्ति सीमित करते हैं; RTI 2005।
  • प्रकार: राजनीतिक, आर्थिक, सांस्कृतिक।
  • ज़िम्मेदारियाँ: सामूहिक भलाई, दूसरों का सम्मान, संतुलन, सतर्कता; मौलिक कर्तव्य अनु. 51A।